बुधवार, 26 जून 2013

गोरक्षा के लिए
कृष्ण जैसे पराक्रमी की प्रतीक्षा
 
भारतीय परंपरा में गाय संपूर्ण प्रकृति की प्रतीक है और प्रकृति का सबसे बड़ा आश्रय यह अपनी पृथ्वी है| जब कोई भारतीय गाय की पूजा करता है, तो वस्तुतः वह संपूर्ण पृथ्वी या कि संपूर्ण प्रकृति की पूजा करता है| इस प्रकृति  में जड़चेतन सभी आ जाते हैं| गाय प्रकृति रूपा है, इसलिए प्रकृति के सारे देवी-देवता भी उस गोरूप में समाहित हो जाते हैं| गाय एक पशु के रूप में भी पूज्य है और एक प्रतीक के रूप में भी| पशु उसका स्थूल रूप है और उसमें निहित प्रतीक उसके सूक्ष्म आयाम है|
भगवान कृष्ण गोपालक है, इसका सीधा आशय है कि वे संपूर्ण प्रकृति के पालक हैं, उसके संरक्षक हैं| वे इस प्रकृति या जीव मंडल के बाहर किसी देवी-देवता का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते| इसीलिए वह ब्रज क्षेत्र में प्रचलित इंद्र की पूजा बंद करवाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा परंपरा शुरू करते हैं| गोवर्धन पूजा भी प्रतीकात्मक है| उसकी पूजा का अर्थ है उस पर स्थित वृक्षों, झाड़ियों, लता, गुल्मों, पशु-पक्षियों एवं कीट पतंगांें की पूजा, उनका संरक्षण, उनका संवर्धन| उसके नाम से ही स्पष्ट है कि उसकी प्राकृतिक संपदा से गोकुल का गौसंवर्धन होता था|
अपने देश में गाय-बैल-बछड़ों के माध्यम से प्रकृति के सम्मान और संरक्षण की परंपरा बहुत पुरानी है| भाद्रपद में पड़ने वाला हलषष्ठी व्रत बैलों के सम्मान में किया जाता है| इस दिन ग्राम स्त्रियां जो व्रत रहती हैं, उसमें बैलों के श्रम से उत्पन्न अन्न का आहार नहीं किया जाता| उस दिन उनसे कोई काम नहीं लिया जाता और उनको नहला-धुला कर, अच्छा आहार देकर पूरा आराम करने का अवसर दिया जाता है| इसी तरह कार्तिक कृष्णपक्ष में गोवत्स द्वादशी का व्रत होता है, जो बछड़ों को समर्पित है| कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी को होने वाला गोपाष्टमी व्रतोत्सव तो पूरे देश में प्रसिद्ध है, क्योंकि इस दिन वासुदेव कृष्ण पूर्ण गोपालक बन गये थे|
शुक्लाष्टमी कार्तिकेतु
स्मृता गोपाष्टमी बुधैः
ताद्दनाद वासुदेवा भूद्
गोपः पूर्णम तु वत्सपः
पौराणिक परंपरा के अनुसार इस दिन गोपाल कृष्ण कुमार से पौगंड (किशोर) आयु में प्रवेश करते हैं और उन्हें अब वन में गायों को चराने और उनकी रक्षा का अधिकार दिया जाता है| अब तक वे केवल छोटे बछड़ों की देखभाल करते थे, किंतु अब पूरे गोपालक बन गए थे, इसलिए इस समारोह को उनकी स्मृति में हर वर्ष मनाने की परंपरा चल पड़ी| पुराण तो विविध कथाओं से भरे हैं| इसलिए उसकी ऐसी एक कथा के अनुसार इस दिन कृष्ण ने वत्सासुर नामक एक राक्षस को मारा था, जो गायों के बीच बछड़ा बनकर आ छिपा था और कृष्ण को मारने की घात में था| गायों में छिपे इस असुर को पहचान कर मारने का पराक्रम करने के कारण यह मान लिया गया कि कृष्ण अब स्वतंत्र रूप से गायों की रक्षा करने में समर्थ हैं, इसलिए उन्हें इस दिन गायों की रखवाली का पूर्ण अधिकार मिल गया| एक अन्य परंपरा के अनुसार अपनी पूजा बंद किए जाने से नाराज इंद्र ने जब भारी वर्षा करके गोकुल को डुबा देने का प्रयास किया, तो कृष्ण ने गोवर्धन को उंगलियों पर उठाकर उसकी छाया में संपूर्ण गोकुल के मनुष्यों और पशुओं की रक्षा की थी| सात दिनों की अनवरत वर्षा के बाद हार कर जब इंद्र ने वर्षा बंद की और क्षमायाचना की मुद्रा में कृष्ण के समक्ष उपस्थित हुए, तब कृष्ण ने उस पर्वत को यथास्थान स्थापित किया| उनके इस चमत्कारी साहस और संकल्प के सम्मान में सबने मिलकर कृष्ण की पूजा की और कृष्ण ने गो रूपा प्रकृति और गोवर्धन के माध्यम से पृथ्वी की पूजा की| इसी समय से उनका एक नाम गगोविंदा’ भी पड़ गया|
वास्तव में कहानियॉं जो भी हों, वे कवि की कल्पनाएँ भी हो सकती हैं, लेकिन इन कहानियों और इस व्रतोत्सव का स्पष्ट संदेश यही है कि हमें प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए| अपने पोषण और उपभोग में इतना संयम बरतना चाहिए कि प्रकृति को किसी तरह कोई क्षति न पहुँचे| उसकी संपूर्ण पादप व जीव संपदा का निरंतर संरक्षण हो, संवर्धन हो|
अपने देश में बहुत पुराने समय में हो सकता है कभी गोमांस का भक्षण किया जाता रहा हो, किंतु सभ्यता के विकासक्रम में सभी जीवों के प्रति दया एवं करुणा का भाव विकसित हो गया| और गाय तो पहले से सम्मानित थी, इसलिए वह न केवल पूजनीय हो गई, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा बन गई| वह भारतीयता या भारतीय संस्कृति से इस तरह जुड़ गई कि विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीयों को अपमानित करने तथा उन पर अपनी ताकत का सिक्का कायम करने के लिए गायों को निशाना बनाना शुरू कर दिया| इन लोगों द्वारा कुरबानी के नाम पर गोकशी करना एक परंपरा बन गई| इतना ही नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल में गोमांस का व्यापार भी शुरू हो गया|
भारतीय परंपरा में आस्था रखने वालों को भरोसा था कि जब देश स्वतंत्र होगा, तो गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लग जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ| बल्कि स्वतंत्रता के बाद इसमें और वृद्धि हो गई| इस प्रवृत्ति से आहत भारतीयों ने ७ दिसंबर १९५२ को दिल्ली में पहली अखिल भारतीय गोहत्या विरेाधी रैली का आयोजन किया| इसमें देश भर के संस्कृतिप्रेमी गोभक्त प्रतिनिधियों ने भाग लिया और सरकार से गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की पुरजोर मॉंग की, लेकिन तत्कालीन पंडित नेहरू की सरकार ने इस तरफ तनिक भी ध्यान नहीं दिया| इसके बाद दूसरी रैली १३-१४ दिसंबर १९५८ को फिर दिल्ली में आयोजित हुई, किंतु वह भी विफल रही| इसके बाद ७ नवंबर १९६६ को दिल्ली में गोरक्षा के निमित्त पुनः एक विराट प्रदर्शन हुआ, जिसका आयोजन अखिल भारतीय गोरक्षा महाभियान समिति द्वारा किया गया था और नेतृत्व कर रहे थे प्रसिद्ध संत करपात्री जी| प्रशासन ने इस प्रदर्शन को विफल करने के लिए जिस तरह का बल प्रयोग किया उसकी किसी को आशंका न थी| गोभक्त आंदोलनकारियों पर लाठियॉं ही नहीं बरसाई गई, आँसू गैस के गोले और गोलियॉं भी चलाई| इसके बाद आज तक गोरक्षा के लिए दिल्ली में कोई बड़ा प्रदर्शन करने का किसी को साहस नहीं हुआ| यों देश में यत्र तत्र अनगिनत गोरक्षा समितियॉं काम कर रही हैं| छिटपुट आंदोलन भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर किसी संगठित प्रयास की अभी भी प्रतीक्षा है|
गोपाष्टमी पर गो पूजा के आयोजन तो होते हैं, लेकिन कृष्ण की तरह कोई ऐसा साहसी अभी सामने नहीं आ रहा है, जो गायों के लिए, वन,  पर्वतों तथा पर्यावरण के लिए देवराज इंद्र जैसे हठी एवं अहंकारी सत्ताधीशों  से टकराने की घोषणा कर सके और ऐसा पराक्रम कर सके कि कोई भी सत्ताधीश क्यों न हो, उसे झुकना पड़े|