बुधवार, 26 जून 2013

ओबामा का दुबारा जीतना भारत के लिए एक अवसर
 

अमेरिका के राष्ट्रपतीय चुनाव में डेमोक्रेट पार्टी के प्रत्याशी बराक हुसैन ओबामा दूसरी बार भी चुनाव जीत अवश्य गए हैं, लेकिन पिछले सौ से भी अधिक वर्षों में दुबारा चुनाव जीतने वाले वे ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं, जिन्हें अपने दूसरे  चुनाव में पहली बार के मुकाबले कम वोट मिला| अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव कुछ ऐसा होता है, मानो वहां पूरी दुनिया चुनाव लड़ रही हो, क्योंकि अमेरिकी राजनीति से किसी न किसी रूप में पूरी दुनिया प्रभावित होती है|

अमेरिका के राष्ट्रपतीय चुनाव में डेमोक्रेट पार्टी के प्रत्याशी बराक हुसैन ओबामा दूसरी बार भी चुनाव जीत अवश्य गए हैं, लेकिन पिछले सौ से भी अधिक वर्षों में दुबारा चुनाव जीतने वाले वे ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं, जिन्हें अपने दूसरे चुनाव में पहली बार के मुकाबले कम वोट मिले| अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव कुछ ऐसा होता है, मानो वहॉं पूरी दुनिया चुनाव लड़ रही हो, क्योंकि अमेरिकी राजनीति से किसी न किसी रूप में पूरी दुनिया प्रभावित होती है| यह सही है कि अमेरिकी सत्ता में पार्टी बदलने या नेतृत्व बदलने का उसकी विदेश नीति पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता, फिर भी नए नेता के सामने आने पर उसके साथ नए सिरे से तालमेल बैठाने की चिंता तो रहती है| इसलिए ओबामा की इस जीत का प्रायः पूरी दुनिया में स्वागत ही किया गया है| उनकी जीत से इतना तो तय है कि अमेरिकी नीतियॉं कमोबेश आगे भी वही रहेंगी, जो इस चुनाव के पहले थीं, उनकी सरकार के ज्यादातर चेहरे भी वही रहेंगे, जो पहले थे| पहले से जाने-पहचाने चेहरे और जानी-पहचानी नीतियों के साथ आगे बढ़ना प्रायः सभी के लिए सुविधाजनक होता है|
ओबामा की दूसरी पारी वाली सरकार में एक जो सबसे बड़ा परिवर्तन संभावित है, वह है विदेश मंत्री का महत्वपूर्ण पदभार संभालने वाले व्यक्ति का| वर्तमान विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन यह संकेत दे चुकी हैं कि वे आगे अब और इस पद पर रहने की इच्छुक नहीं हैं| उनका स्थान कौन व्यक्ति लेगा, यह अभी तय नहीं हो सका है, इसलिए पूरी दुनिया बड़ी उत्सुकता से इस प्रतीक्षा में है कि ओबामा अब किस व्यक्ति को यह पदभार सौंपते हैं|
वास्तव में इस समय प्रायः पूरी दुनिया राजनीतिक व सामाजिक संकटों से आक्रांत है| अमेरिका स्वयं अपनी आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है, बेरोजगारी का संकट बढ़ता जा रहा है| अमेरिका यों अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक व सैनिक शक्ति है, फिर भी नई उभरती शक्तियों की तरफ से उसे कड़ी चुनौती मिल रही है| ऐसी संभावना है कि २०१४ या २०१६ तक चीन आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका को पीछे छोड़ देगा| सामरिक क्षेत्र में भी उसने इतनी क्षमता अर्जित कर ली है कि किसी तरह की अमेरिकी धौंस उस पर कारगर नहीं हो सकती| अमेरिका एशियायी प्रशांत क्षेत्र में पुनः अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है, लेकिन चीन उसे पूरी तरह अपने आधिपत्य में रखना चाहता है और अमेरिका को कोई मौका नहीं देना चाहता कि इस क्षेत्र में वह किसी तरह की दखलंदाजी करे| इधर चीन में भी सत्ता परिवर्तन हो रहा है और वहॉं नया नेतृत्व कार्यभार संभालने जा रहा है| यह नया नेतृत्व अमेरिका के लिए नई चुनौतियॉं खड़ी कर सकता है|
वैसे आंतरिक मामलों को छोड़ दें, तो ओबामा के लिए सर्वाधिक चुनौती भरा क्षेत्र खाड़ी क्षेत्र है| भारत, चीन एवं पाकिस्तान का मामला तो कमोबेश पुराने ढर्रे पर चलता रहेगा, लेकिन खाड़ी के क्षेत्र में निश्‍चय ही ओबामा को अपने राजनीतिक कौशल की सबसे कठिन परीक्षा देनी होगी| यहॉं इजरायल और ईरान की तनातनी बढ़ती जा रही है, जिसके कारण इस क्षेत्र में शांति भंग का खतरा बढ़ गया है| इजरायल ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को ध्वस्त करने के लिए आकस्मिक सैनिक कार्रवाई करने पर आमादा है| ओबामा पर्दे के पीछे कूटनीतिक दबाव बनाकर उसे दबाने की कोशिश में लगे हैं| इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपना इरादा व्यक्त कर चुके हैं, फिर भी वह संयम बनाए हुए हैं, क्योंकि अगले वर्ष जनवरी में वहॉं भी चुनाव होने जा रहे हैं| ईरान ने घोषित कर रखा है कि यदि उसके विरुद्ध किसी भी तरह  की सैनिक कार्रवाई हुई, तो वह इजरायल को नेस्तनाबूद कर देगा| इजरायल के विरुद्ध अपने इस संकल्प के पक्ष में वह पूरे मुस्लिम जगत को एकजुट करना चाहता है, किंतु सऊदी अरब उसके इस प्रयास की सबसे बड़ी बाधा है| सऊदी में अरब सुन्नी राजशाही है, जबकि ईरान शियाबहुल देश है|  इसलिए खाड़ी या मध्यपूर्व का पूरा इलाका भीतर से शिया-सुन्नी खेमों में बँटा है| ईरान के परमाणु शस्त्र कार्यक्रम से इजरायल ही नहीं, सऊदी अरब भी चिंतित है| परमाणु शस्त्र संपन्न ईरान सुन्नी अरब जगत के लिए भी खतरा बन सकता है, इसलिए सऊदी अरब भी नहीं चाहता कि ईरान का परमाणु संवर्धन कार्यक्रम परवान चढ़े|
जहॉं तक भारत का सवाल है, तो उसके लिए ओबामा का बने रहना कमोबेश अच्छा ही है| ओबामा भारत को दक्षिण एशिया की प्रमुख शक्ति स्वीकार करते हैं| अफगानिस्तान में वह भारत की प्रमुख भूमिका को सुनिश्‍चित करने के पक्षधर हैं| अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वह भारत के समर्थक हैं| अब देखना केवल यह है कि रोजगार या व्यापार के मामले में वह आगे कैसी नीति अपनाते हैं| ‘आउट सोर्सिंग’ पर लगाम लगाने की नीति उनकी पुरानी है, जिस पर वह आगे भी अमल करेंगे, क्योंकि यह अमेरिकी नागरिकों के लिए नौकरियॉं जुटाने के सवाल से जुड़ा है| भारतीय तकनीशियों को अमेरिका में रोजगार का वीसा देने के मामले में उनकी कठोर नीति भारतीयों को रास नहीं आ रही है| लेकिन इन मामलों को भारत अमेरिका संबंधों के विकास में कोई रोड़ा नहीं माना जा सकता| भारतीय कार्पोरेट क्षेत्र ने भी अब इसे बहुत अधिक महत्व देना छोड़ दिया है| भारत अमेरिका आर्थिक सहयोग केवल कुछ नौकरियों तक सीमित नहीं है| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के साथ व्यापारिक व तकनीकी क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग की असीमित संभावनाएँ हैं| लगता तो है अमेरिका भी भारत के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग विस्तार के प्रति गंभीर है| चुनाव के पहले २५ सितंबर से अक्टूबर के अंत तक मात्र एक महीने कुछ दिन की अवधि में करीब एक दर्जन अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भारत आए, जिनमें से चार का नेतृत्व वहॉं के कैबिनेट स्तर के मंत्री कर रहे थे| मतदान से केवल दो दिन पहले एक अमेरिकी राजनयिक दिल्ली पहुँचे, जिन्होंने भारत-जापान-अमेरिका की त्रिपक्षीय बैठक की पृष्ठभूमि तैयार करने के बारे में बातचीत की| अमेरिका प्रतिरक्षा विभाग पेंटागन का एक सैन्य प्रतिनिधिमंडल भारतीय नौसेना के साथ अमेरिकी नौसेना का युद्धाभ्यास कार्यक्रम तय करने के लिए दिल्ली आया|
इस सबका यह मतलब नहीं है कि भारत अमेरिका के बीच कोई समस्या ही नहीं है| दोनों के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर वे कभी सहमत नहीं हो सकते| ईरान तथा अरब क्षेत्र का मसला ऐसा ही है| लेकिन बहुत से ऐसे मसले हैं, जिन पर अगले स्तर की बातचीत में सहमति बन सकती है| परमाणु क्षेत्र में सहयोग का मसला ऐसा ही है| ‘सिविलियन न्यूक्लियर कोऑपरेशन’ के मामले में भारत के ‘नाभिकीय दायित्व कानून’ (न्यूक्लियर लायबिलिटी ऐक्ट) को लेकर मतभेद अभी बरकरार है| भारत की मनमोहन सिंह की पहली सरकार ने अमेरिका के साथ नाभिकीय सहयोग के लिए अपनी सत्ता को भी दॉंव पर लगा दिया था, किंतु उसका अभी तक भारत को समुचित लाभ नहीं मिला है| अमेरिकी कंपनियॉं २००४-२००५ से लेकर अब तक करीब १० अरब डॉलर का सैनिक हार्डवेयर भारत को बेच चुकी हैं| भारत को इनकी जरूरत भी थी, लेकिन अब वह अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) तथा संयुक्त क्षेत्र में उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है| अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के बाद आशा थी कि अब भारत को अमेरिका से दोहरे उपयोग वाली संवेदनशील उच्च तकनीक मिलने में कोई रुकावट नहीं आएगी, किंतु अमेरिका अभी उस क्षेत्र में अपनी मुट्ठी बंद ही रखे है| इसलिए ओबामा की इस नई पारी के चार वर्षों में भारत को अपना यह सारा लक्ष्य पूरा कर लेना है|
इसमें दो राय नहीं कि आज की दुनिया में अमेरिका और भारत का घनिष्ठ सहयोग अत्यावश्यक है| दोनों ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और विश्‍व राजनीतिक व्यवस्था में लोकतंत्र के प्रगतिशील मूल्यों की रक्षा का दायित्व इन दोनों देशों पर सर्वाधिक है| इसके लिए जरूरी है कि इन दोनों देशों के बीच परस्पर विश्‍वास का घनिष्ठ वातावरण बने| विश्‍वास किया जाना चाहिए कि ओबामा के इस दूसरे चरण के शासनकाल में भारत-अमेरिका संबंध परस्पर सहयोग के वांछित स्तर तक पहुँच सकेंगे, जिसका लाभ शायद पूरी दुनिया के सभी लोकतंत्रों को मिल सके|
अमेरिकी कांग्रेस की पहली हिंदू सदस्य
तुलसी गब्बार्ड
 
३१ वर्षीया तुलसी गब्बार्ड ने डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर अमेरिकी कांग्रेस का चुनाव भारी बहुमत से जीत कर एक ऐसा इतिहास रचा है, जिस पर भारत गर्व कर सकता है| वह अमेरिका की पहली हिंदू राजनेता हैं, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में अपना स्थान बनाया है| यद्यपि वह भारतीय मूल की नहीं है, किंतु भारतीय हिंदू धर्म एवं संस्कृति की पक्की अनुयायी हैं| वह गर्वपूर्वक अपने को हिंदू कहती हैं और वह अन्य अमेरिकी हिंदुओं एवं भारतीय मूल के हिंदुओं को भी यह सलाह देती हैं कि वे अपने धर्म के प्रदर्शन पर शर्मिंदा न हों और अपनी पहचान के साथ राजनीतिक व सामाजिक कार्यों में आगे बढ़कर भाग लें| गब्बार्ड का कहना है कि यह चुनाव जीतकर उन्होंने अमेरिका में बसे हिंदुओं को विश्‍वास दिलाया है कि वे बिना किसी दबाव के या भय के यहॉं न केवल राजनीति कर सकते हैं, बल्कि चुनाव भी जीत सकते हैं|
यहॉं यह उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राजनीति में भारतीय मूल के दो नाम सर्वाधिक चर्चित हैं एक बाबी जिंदल और दूसरे निकी हेली, लेकिन इन दोनों ने वहॉं अपना धर्म बदल लिया है और ईसाई बन गए हैं| बाबी जिंदल पहले हिंदू थे और निकी हेली सिख, मगर उन्हें शायद लगा कि इस धार्मिक पहचान के साथ वे अमेरिका में राजनीति नहीं कर सकते| ऐसा उन्होंने अपनी निजी सोच से किया या किसी दबाव में, लेकिन उन्होंने राजनीतिक लाभ के लोभ में अपने धर्म, परंपरा व संस्कृति का परित्याग तो किया ही| ऐसे में तुलसी गब्बार्ड भारतीय मूल की न होते हुए भी अमेरिका में भारतीयों के गर्व एवं स्वाभिमान की सबसे बड़ी प्रतीक बन गई हैं| उनकी जीत पर अमेरिकी भारतीयों तथा हिंदू अमेरिकियों ने उनका बहुत शानदार स्वागत किया है| गब्बार्ड हवाई की रहने वाली हैं और वहॉं के ‘सेकंड कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट’ से चुनाव जीती हैं| उन्होंने कुल ८१ प्रतिशत मत पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी को जबर्दस्त शिकस्त दी है|
गब्बार्ड केवल हिंदू मत की ही अनुयायी नहीं हैं, वह भारत की भी जबर्दस्त समर्थक हैं| उन्होंने कश्मीरी पंडितों को उनका अधिकार         दिलाने, पाकिस्तान के हिंदू अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दिलाने तथा भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता दिलाने का  आह्वान किया है| गब्बार्ड रुढ़िवादी हिंदू नहीं हैं, बल्कि वह प्रगतिशील हिंदू धर्म की अनुयायी हैं| उन्होंने समलैंगिक विवाह तथा आवश्यक होने पर गर्भपात के पक्ष में विचार व्यक्त किया है|