बुधवार, 26 जून 2013

जैव विविधता का बढ़ता क्षय
प्रकृति पर मंडराता खतरा

भारत सरकार अपनी जैव संपदा के संरक्षण के प्रति चिंतित तो नजर आती है, लेकिन वह उसके लिए गंभीरता से कुछ करती नजर नहीं आती| वह अब तक अपने क्षेत्र में उपलब्ध जीवों तथा वनस्पति प्रजातियों का आंकड़ा तक एकत्र नहीं कर पाई है| सरकार की नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी (एनबीए) अब तक देश के ७० प्रतिशत इलाके में पाई जाने वाली प्राणि-पादपों की केवल १ लाख ५० हजार प्रजातियों के आंकड़े एकत्र कर सकी है| जाहिर है अभी काफी बड़ी संख्या के आंकड़े एकत्र करना बाकी है| अभी कितनी अनजानी प्रजातियॉं पड़ी होंगी या अनजाने नष्ट हो रही होंगी इसका क्या पता| अभी २००५ में अरुणाचल प्रदेश में एक दुर्लभ जाति का बंदर मिला था| जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने २०११ में १९३ प्राणियों की १९३ नई प्रजातियों का पता लगाया| भारत के जल क्षेत्र में १३ हजार लुप्त प्रायः प्रजातियों की गणना की गई है, लेकिन हास्यास्पद तथ्य यह है कि भारत सरकार के पास इनके बचाव का फिलहाल कोई उपाय नहीं है|

इस अक्टूबर महीने की ८ से १९ तारीख तक हैदराबाद में एकत्र हुए दुनिया के करीब १२ हजार से अधिक विशेषज्ञों ने इस बात पर माथापच्ची की कि दुनिया के लुप्त हो रहे जीव जंतुओं तथा पादपों को कैसे बचाया जाए| इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन (आईयूसीएन) के अनुसार इस दुनिया की ९२९ जैव प्रजातियॉं विनाश के कगार पर में हैं| अब तक कितनी जैव प्रजातियॉं लुप्त हो चुकी हैं, इसका तो अनुमान भी लगाना कठिन है, लेकिन जो प्रजातियॉं खतरे में हैं, उनका तो बचाव किया जा सकता है| इन विशेषज्ञों की राय में विश्‍व की इस अनमोल जैविक संपदा के संरक्षण के लिए कम से कम ४० अरब डॉलर की जरूरत है| भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसमें अपनी सरकार की ओर से ५ करोड़ डॉलर के योगदान की घोषणा की है|
विशेषज्ञों का यह भारी दल संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में आयोजित कंवेंशन ऑन बायोलॉजिक डाइवर्सिटी (सी.बी.डी.) यानी जैव विविधता सभा के भागीदार देशों के ११वें सम्मेलन में भाग लेने के लिए हैदराबाद आया हुआ था| इस बार इस सम्मेलन की मेजबानी भारत ने की, क्योंकि वह इस सभा का महत्वपूर्ण सदस्य है| भारत अगले २ वर्षों के लिए सी.बी.डी. का अध्यक्ष भी है, इसलिए उसने काफी आगे बढ़कर इस सम्मेलन का एजेंडा तय किया| जैसे कि उसने समुद्री जीव संरक्षण के प्रस्ताव को विशेष प्रमुखता के साथ पेश किया| भारत के पास करीब ८००० किलोमीटर लंबा विशाल समुद्र तट है, जो जैव विविधताओं से भरपूर है| लेकिन इसके साथ ही यह भी एक दुखद यथार्थ है कि भारत के पास समुद्री जीव संरक्षण की न तो कोई योजना है, न कोई मशीनरी है और न ही कोई कानून| उसने सम्मेलन में आगे बढ़कर कागजी नेतागिरी तो अवश्य की है, लेकिन व्यवहार में उसने इस दिशा में अब तक कुछ नहीं किया है| और आगे भी कुछ खास हो सकने की संभावना नहीं है|
भारत जैव विविधता की दृष्टि से एक अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है| यह भारी जनसंख्या वाला क्षेत्र ही नहीं है, भारज जैव-वानस्पतिक प्रजाति संख्या वाला देश भी है, लेकिन इसका परिणाम यह हुआ है कि इस देश में मानव जाति और अन्य जीवों के बीच संघर्ष भी बहुत सघन रहा है, जिसके फलस्वरूप यहॉं के जाने कितने जीव और वनस्पति प्रजातियॉं नष्ट हो चुकी हैं और जाने कितनी नष्ट होने की कगार पर हैं| पिछले कुछ दशकों में ही भारत कई उल्लेखनीय प्रजातियों को खो चुका है| इनमें भारतीय चीता, छोटे कद वाला गैंडा, गुलाबी सिर वाली बत्तख, जंगली उल्लू और हिमालय का पहाड़ी बटेर जैसे प्राणी भी शामिल हैं| भारत के जल क्षेत्र में पाई जाने वाली करीब १३ हजार प्रजातियां ऐसी हैं, जो विलुप्त होने के कगार पर हैं| भारत की कुल आबादी इस समय करीब एक अरब इक्कीस करोड़ है, जो दुनिया की पूरी जनसंख्या का १८ प्रतिशत है, लेकिन भारत के पास उपलब्ध कुल जमीन दुनिया का मात्र २.४ प्रतिशत ही है| इसी २.४ प्रतिशत जमीन में मनुष्यों तथा सारी अन्य जैव एवं पादप प्रजातियों को निवास करना है| मानव जनसंख्या में हो रही तीव्र वृद्धि के कारण जंगली जीवों और पादपों का इलाका लगातार कम होता जा रहा है| अपने आहार तथा आर्थिक विकास के लिए भी मनुष्य न केवल अन्य प्राणिक्षेत्रों को हथियाने में लगा है, बल्कि स्वयं उन प्राणियों और पादप प्रजातियों को भी निगलता जा रहा है| जनसंख्या विस्तार तथा भोग की बढ़ती भूख से मनुष्य तथा वन्य प्राणि समुदाय के बीच का संघर्ष उग्र से उग्रतर होता जा रहा है, जिसमें वन्य प्राणियों को ही पराजय एवं विनाश का शिकार होना पड़ा रहा है|
भारत सरकार अपनी जैव संपदा के संरक्षण के प्रति चिंतित तो नजर आती है, लेकिन वह उसके लिए गंभीरता से कुछ करती नजर नहीं आती| वह अब तक अपने क्षेत्र में उपलब्ध जीवों तथा वनस्पति प्रजातियों का आंकड़ा तक एकत्र नहीं कर पाई है| सरकार की नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी (एन.बी.ए.) अब तक देश के ७० प्रतिशत इलाके में पाई जाने वाली प्राणि-पादपों की केवल १ लाख ५० हजार प्रजातियों के आंकड़े एकत्र कर सकी है| जाहिर है अभी काफी बड़ी संख्या के आंकड़े एकत्र करना बाकी है| अभी कितनी अनजानी प्रजातियॉं पड़ी होंगी या अनजाने नष्ट हो रही होंगी इसका क्या पता| अभी २००५ में अरुणाचल प्रदेश में एक दुर्लभ जाति का बंदर मिला था| जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने २०११ में १९३ प्राणियों की १९३ नई प्रजातियों का पता लगाया| भारत के जल क्षेत्र में १३ हजार लुप्त प्रायः प्रजातियों की गणना की गई है, लेकिन हास्यास्पद तथ्य यह है कि भारत सरकार के पास इनके बचाव का फिलहाल कोई उपाय नहीं है|
‘बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी’ की नेहा सिन्हा ने उपर्युक्त सम्मेलन के संदर्भ में लिखे अपने एक आलेख में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि जब भारत सरकार के पास अपने जल क्षेत्र के जीवों के संरक्षण की कोई मशीनरी ही नहीं है, तो वह अपनी लुप्त होती प्रजातियों को विनाश से कैसे बचा सकेगी| उन्होंने गुजरात के ‘समुद्री राष्ट्रीय उद्यान’ (मैरीन नेशनल पार्क) के संदर्भ में एक वाकये का जिक्र किया है| उन्होंने उसके बारे में उसकी देखरेख के लिए नियुक्त एक अधिकारी से कुछ जानना चाहा, तो उसने साफ कहा कि ‘वास्तव में मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है कि वहॉं समंदर के नीचे क्या है|’ वह अधिकारी वन विभाग में कार्यरत था|  नेहा ने एक अन्य अधिकारी से बात की तो उसको यह भी पता नहीं था कि ‘कोरल रीफ’ जीवित समुद्री प्राणियों से निर्मित होती है| यह तो खैर उस ऑफिसर की बात रही, लेकिन सवाल है कि क्या भारत सरकार के लोगों को पता है कि वहॉं समंदर के नीचे क्या है? क्या हमारे वन विभाग के अधिकारी ही समुद्र जल की भी देखरेख कर लेंगे? हमारे वन विभाग का गठन वास्तव में जंगलों के प्रबंधन, चारागाहों के नियंत्रण, वन पादप आरोपण तथा वन्य जीवोंे के संरक्षण के लिए किया गया था| यद्यपि देश के पास समुद्री जीव संरक्षण की वैज्ञानिक व तकनीकी जानकारी है, किंतु वन विभाग के अधिकारी तो उनसे वाकिफ नहीं हैं| उनका प्रशिक्षण धरती की सतह के लिए किया गया है, समुद्र की तलहटी के लिए नहीं| हमारे पास समुद्री जीव संरक्षण के लिए कानून भी नहीं है| हमारे पास वन्य जीव सुरक्षा कानून (वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन ऐक्ट) है, राज्य स्तर पर वृक्ष संरक्षण कानून (ट्री प्रिजर्वेशन ऐक्ट) है और पर्यावरण सुरक्षा कानून (इनवायर्नमेंट प्रोटेक्शन एक्ट) है, लेकिन इनमें से कोई भी समुद्री क्षेत्र पर लागू नहीं होता| कोरल रीफ (मूँगे की चट्टानों) को प्रायः समुद्री जंगल की संज्ञा दी जाती है और समुद्री घास भी प्राणियों के लिए मैदानी घांसों से कम महत्वपूर्ण नहीं है| जैसे मैदानी चारागाहों की घास गाय, भैंस जैसे प्राणियों के लिए आहार के प्रथम स्रोत हैं, उसी तरह ये समुद्री घास बहुत से समुद्री जानवरों के लिए है| इनमें एक बहुत महत्वपूर्ण प्राणि समुदाय है ‘डुगांग्स’ परिवार| ‘डुगांग्स’ समुद्र तल के विशाल स्तनपायी जंतु है, जिन्हें समुद्री गाय (सी काउ) के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि ये भी गायों की तरह समुद्र तल की घास को चरकर अपना पोषण करती हैं| इन समुद्री गायों की जतियॉं तेजी से विलुप्त हो रही हैं| कुछ तो पूरी तरह विलुप्त भी हो चुकी हैं| केवल दो वर्गों की तीन प्रजातियॉं| शेष बची हैं, वे भी लुप्त होने के निकट है, क्योंकि उनका शिकार तेजी से जारी है| कई देशों में समुद्री गायों के मॉंस के खास रेस्त्राओं का समूह फैला हुआ है|
अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर जैव विविधता की रक्षा की चिंता अब से करीब दो दशक पूर्व शुरू हुई| १९९२ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘पर्यावरण और विकास’ विषय पर एक सम्मेलन का आयोजन किया| इस सम्मेलन में शामिल १९२ देशों तथा यूरोपीय संघ ने मिलकर जैव विविधता को हो रही क्षति को रोकने तथा उसके संरक्षण पर विचार के लिए एक सभा ‘कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिक डायवर्सिटीज’ (सी.बी.टी.) की स्थापना की| इसके भागीदार देशों (कांफरेंस ऑफ द पार्टीज) २००२ में हुए सम्मेलन में तय किया गया कि २०१० तक जैव विविधता को हो रही क्षति में उल्लेखनीय स्तर तक कमी लाने का काम किया जाएगा| सी.बी.टी. ने जैव विविधता के महत्व को रेखांकित करते हुए अपने वक्तव्य में कहा कि ‘संसार की करीब ३० प्रतिशत अर्थव्यवस्था तथा गरीबों की ८० प्रतिशत आवश्यकताओं की पूर्ति विविध प्राणियों और पादपों पर निर्भर है| इसके अतिरिक्त प्राणियों व पादपों की जितनी अधिक संख्या रहेगी, चिकित्सकीय अनुसंधान, आर्थिक विकास तथा मौसम में बदलाव जैसी चुनौतियों का मुकाबला करने के उतने ही अधिक अवसर उपलब्ध होंगे|’ इससे जाहिर है कि जैव विविधता हमारी धरती, हमारे स्वास्थ्य तथा हमारी अर्थव्यवस्था के लिए कितनी महत्वपूर्ण है| किंतु तमाम सम्मेलनों, प्रस्तावों तथा व्याख्याओं के बावजूद जैव विविधता का क्षरण जारी है| लगातार अनेक प्राणियों व वनस्पतियों की प्रजातियां लुप्त होती जा रही हैं|
हम लोगों में से बहुत से लोगों को यह जानकारी होगी की प्रकृति में हर प्राणी परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर है| उनके परस्पर संबंधों के आधार पर ही प्रकृति की जीवनधारा प्रवाहित होती है| धरती पर सूक्ष्म जीवों की भी एक ऐसी शृंखला है, जिसके बिना मनुष्य जैसा बड़ा प्राणि समुदाय भी अपनी जीवन रक्षा नहीं कर सकता| इस ‘जीवन’ को सहारा देने वाली ‘जीवन प्रणाली’ का सामान्यतया कोई मूल्य नहीं आंका जाता, लेकिन उसके बिना धरती पर सामान्य जीवन स्थिर नहीं रह सकता|
यहॉं यह उल्लेखनीय है कि प्रकृति के अपने जैव संतुलन के बीच बाहरी जीवों का हस्तक्षेप भी भारी संकट खड़ा करता है| इस तरह का हस्तक्षेप करके जैव विनाश करने वालों में मनुष्य अग्रणी है| २०वीं शताब्दी में विश्‍व भर में जैव प्रजातियों की विनाश दर पिछले ६५० लाख वर्षों की औसत विनाश दर से १००० गुना अधिक है| उसके बाद की अर्थात वर्तमान २१वीं शताब्दी में यह दर १०,००० गुना अधिक हो सकती है| मनुष्य ने प्रकृति को कल्पनातीत नुकसान पहुँचाया है| एक अध्ययन के अनुसार १९५० के बाद जबसे मछली पकड़ना एक उद्योग बना, तब से आगे के ५० वर्षों में धरती के बड़े महासागरों में स्थित ९० प्रतिशत मछलियॉं पकड़ ली गईं| जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकीय दबाव का वर्तमान स्तर बना रहा, तो हम अपने जीवनकाल में ही व्यापक जैव विनाश का नजारा देख लेंगे| २०५० तक १५ से ३७ प्रतिशत (यानी करीब १२ लाख ५० हजार) जीवित प्रजातियॉं नष्ट हो चुकी रहेंगे| वैज्ञानिकों का आकलन है कि यदि विश्‍व तापमान (ग्लोबल टेम्परेचर) में ३.५ सेंटीग्रेड की वृद्धि हो गई, तो धरती पर मौजूद जीवों की ७० प्रतिशत ज्ञात प्रजातियों के विनष्ट हो जाने का खतरा है| सबसे बड़ा खतरा ‘ध्रुवीय हिम पट्टी’ तथा ‘समुद्री कोरल रीफ’ (मूंगे की चट्टानों) के लिए है| यदि ध्रुवीय बर्फ लगातार पिघलती रही, तो गर्मी की ऋतु में आर्कटिक  महासागर का पूरा जीव मंडल समाप्त हो जाएगा| इसके अतिरिक्त आप यह भी जान लें कि धरती के वायु मंडल में कार्बन डाई आक्साइड का स्तर जितना बढ़ता है, उतना ही वह समुद्री जल में बढ़ता है, जिसके कारण समुद्री जल की अम्लीयता का स्तर बढ़ता है| समुद्र में अम्लीयता बढ़ने का सीधा अर्थ है समुद्री जीव विविधता का क्षरण| अधिक कार्बन डाई आक्साइड से समुद्री प्रजातियों की खोल (शेल्स) कमजोर हो जाती हैं और जीव मर जाते हैं| इससे प्रजातियों की संख्या ही नहीं घटती, बल्कि प्राणियों का पूरा भोजनचक्र बिगड़ जाता है| इस बढ़ती अम्लीयता से सर्वाधिक प्रभावित होने वाला समुद्री प्राणी कोरल है| गर्म जल क्षेत्र की कोरल पट्टी में १९८० से अब तक ३० प्रतिशत की कमी आई है| और यदि मौसम की गर्मी बढ़ती रही, तो क्षति की दर और बढ़ती रहेगी|
विलियम क्विन नाम के एक पर्यावरण विज्ञानी ने अपने एक आलेख में लिखा था कि हम जिसे धरती कहते हैं, उसके जटिल प्राकृतिक स्वरूप का निर्माण जैव विविधता से ही हुआ है| यदि यह जैव विविधता नहीं रही, तो अतिवादी मौसम (इक्सट्रीम वेदर) का एक झोंका भी किसी एक जीवन मंडल (बायोम) के समस्त जीवों का सफाया कर देगा| यदि जैव विविधता का स्तर ऊँचा रहा, तो कैसी भी कोई  आपदा आए, प्रजातियों का एक वर्ग तो बचा ही रहेगा, जो फिर से धरती को जीव समृद्ध बना देगा| लेकिन आज तो स्वयं जैव विविधता ही खतरे में है| अपनी जनसंख्या वृद्धि के साथ मनुष्य प्रकृति का सबसे बड़ा विनाशक बन गया है| वह अपने आहार और निवास के लिए तो जैव संपदा का नाश कर ही रहा है, लेकिन उसकी विकास यात्रा में जो प्रदूषण बढ़ रहा है, मौसम बिगड़ रहा है, उसके कारण प्राकृतिक विविधता के लिए और अधिक खतरा पैदा हो गया है| इसलिए यह और अधिक आवश्यक हो गया है कि मनुष्य अपनी जीवनशैली को बदले, अन्यथा उन करोड़ों प्रजातियों के विनाश का खतरा सामने है, जिनको कभी फिर वापस नहीं लाया जा सकेगा| इसका कुल प्रभाव क्या पड़ेगा, यह शायद हम कभी नहीं जान सकेंगे|
अफसोस की बात है कि आज का समृद्ध विश्‍व हो या विकासशील विश्‍व हो, कोई भी इस खतरे के प्रति गंभीर नहीं है| धनी देश अपनी उपभोग शैली बदलने के लिए तैयार नहीं है, तो विकासशील देश समृद्ध देशों की कतार में पहुँचने के लिए प्रकृति का अधिक से अधिक दोहन करने में लगे हैं| फिर भी आशा की किरण अभी शेष है| छोटे स्तर पर ही सही मगर प्रकृति संरक्षण के उपाय शुरू हो गए हैं| आशा है ये कोशिशें तेज होंगी और कम से कम जैव प्रजातियों के और अधिक विनाश की दर तो कुछ रोकी जा सकेगी| जैव विविधता संरक्षण के अभियान का नेतृत्व फिलहाल भारत के हाथ में आने वाला है, इसलिए हम भारतीयों पर कुछ अधिक ही जिम्मेदारी है| हम तो प्रकृति के सबसे निकट उपासक हैं| हमारी पुराण कथाएँ यही उपदेश देती है कि शतरूपा किंवा अनंत रूपा प्रकृति के गर्भ से ही यह मानव सृष्टि हुई है और उसके संरक्षण या स्वास्थ्य पर ही इसका अस्तित्व अवलंबित है| हमने तो अपने जलचर (मत्स्य), उभयचर  (कच्छप) एवं थलचर (वाराह, नरसिंह आदि) प्राणियों को परमात्मा के अवतार के रूप में स्थापित कर रखा है| अगर हम इस अभियान में चूक गए, तो दुनिया की कोई और जाति कोई और देश तो कतई इस जीव विविधता की रक्षा का आधार नहीं बन सकेगा|