मंगलवार, 25 जून 2013

क्या राहुल इस देश को नेतृत्व देने में सक्षम हैं?

युवराज राहुल गांधी को अगले चुनावी महासमर के लिए कांग्रेस का ध्वजवाहक घोषित कर दिया गया है| इस अभियान में यदि विजयश्री हासिल हुई, तो देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में उनका सिहासनारूढ़ होना तय है| लेकिन यहीं यह भी सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या राहुल इस विशाल देश का नेतृत्व करने में सक्षम हैं| अभी तक तो उन्होंने ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिया है, जिससे आश्‍वस्त हुआ जा सके| संदेह तो कांग्रेस के भीतर भी है, लेकिन वहॉं कोई अपना संदेह व्यक्त करने का साहस नहीं कर सकता, हॉं, इतना जरूर कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने राहुल को आगे करके बड़ा ही साहसपूर्ण दांव खेला है| सफलता मिली तो पौ बारह, मगर पांसा पलटा, तो निश्‍चय ही पार्टी को लेने के देने पड़ जाएँगे|

इस नवंबर महीने भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी घटना है देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस द्वारा युवराज राहुल गांधी को देश के अगले आम चुनाव की बागडोर सौंपना| ४२ वर्षीय राहुल गांधी इस समय पार्टी के महासचिव हैं और उन्हें देश के अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है| राहुल अपनी पार्टी की सरकार में अब तक कोई भी पद लेने से इनकार करते रहे हैं इसलिए महीनों से चर्चा चल रही थी कि उन्हें संगठन में कोई उच्चतर भूमिका दी जा सकती है| उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए जाने की चर्चा थी| लेकिन उन्हें क्या बनाया जा रहा है उस पर से पर्दा १५ नवंबर को उठा जब उन्हें पार्टी की चुनाव समन्वय समिति का मुखिया बनाने की घोषणा की गई| इस घोषणा से यह जाहिर हो गया कि पार्टी अगला आम चुनाव राहुल गांधी को आगे करके लड़ेगी| जनता के सामने उनका चेहरा कांग्रेस के चेहरे के रूप में सामने आएगा|
इसका मतलब है कि वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की स्थिति अब सुबह के चॉंद जैसी हो गई है| अगले दिन के सूरज के आने की भी घोषणा के बाद अब केवल समय की प्रतीक्षा है| अगले चुनाव का निर्धारित समय २०१४ है, लेकिन परिस्थितियॉं अनुकूल रहीं तो २०१३ में भी ये चुनाव संपन्न हो सकते हैं| निर्धारित चुनाव के समय से १८ महीने पहले ही चुनाव समन्वय समिति की घोषणा इसी बात का संकेत है कि आम चुनाव समय से पहले हों तो भी पार्टी उसके लिए तैयार रहे|
राहुल की इस चुनाव टीम में उनके सहित छः सदस्य हैं| पांच अन्य सदस्य हैं अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी, दिग्विजय सिंह, मधुसूदन मिस्त्री और जयराम रमेश| इन पांच में से तीन ऐसे हैं जिनका अपना भी चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं है| वे राज्य सभा की सदस्यता के सहारे ही देश की लोकतांत्रिक राजनीति में राजनेता हैं| निश्‍चय ही ये कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकारों में हैं किंतु इनके चुनाव का आधार केवल यह है कि ये राहुल के नजदीकी हैं और उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे देखना चाहते हैं| इस समिति के अंतर्गत तीन अन्य महत्वपूर्ण समितियॉं काम करेंगी, जिन्हें उपसमिति का दर्जा दिया गया है| एक है चुनाव पूर्व गठबंधन समिति, जो चुनावपूर्व देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ ताल मेल की संभावनाएँ देखेंगी तथा अनुकूलता दिखी तो उनके साथ गठबंधन का प्रयास करेगी| दूसरी कमेटी चुनाव घोषणापत्र तैयार करने को काम करेगी तथा चुनावी दृष्टि से सरकार के कार्यक्रम का निर्धारण करेगी| तीसरी कमेटी संचार, संपर्क एवं प्रचार कार्य देखने के लिए बनाई गई है| इन तीनों कमेटियों में से प्रथम दो की अध्यक्षता केंद्रीय प्रतिरक्षा मंत्री तथा सोनिया गांधी के परम विश्‍वस्त ए.के. एंटनी करेंगे और तीसरी कमेटी की अध्यक्षता ठाकुर दिग्विजय सिंह संभालेंगे| जो राहुल के राजनीतिक गुरु और पथ प्रदर्शक हैं| पहली समिति के अन्य सदस्य हैं एम. वीरप्पा मोइली, मुकुल वास्निक, सुरेश पचौरी, जितेंद्र सिंह तथा मोहन प्रकाश| दूसरी, घोषणापत्र कमेटी के अन्य सदस्य हैं पी. चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे, आनंद शर्मा, सलमान खुर्शीद, संदीप दीक्षित, अजित जोगी, रेणुका चौधरी और पी.एल. पूनिया| मोहन गोपाल इसके विशेष आमंत्रित सदस्य होंगे| तीसरी कमेटी में दिग्विजय सिंह के अतिरिक्त अंबिका सोनी, मनीश तिवारी, दीपेंद्र हुडा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजीव शुक्ल तथा भक्त चरन दास शामिल हैं|
अगले दिन यानी शुक्रवार १६ नवंबर को ‘सूरजकुंड’ (हरियाणा) में आयोजित पार्टी की ‘संवाद बैठक’ में इस बात की जानकारी दी गई कि चुनाव अभियान के लिए कमेटियॉं बनाई जा रही हैं| इस बैठक में यों वर्तमान राजनीतिक चुनौतियों के बीच कांग्रेस की स्थिति पर तथा अगामी चुनाव तैयारियों के संदर्भ में चर्चा हुई, लेकिन इसका मुख्य लक्ष्य पार्टी के राजनीतिक मामलों में राहुल को केंद्रीय भूमिका में पेश करना था| कांग्रेस के राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ जेएनयू के जोया हसन जैसे लोगों का मानना है कि राहुल की अगले चुनाव में निर्णायक भूमिका रहेगी| वह केवल प्रत्याशी चयन तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि चुनाव के कुल प्रबंधन में वह शीर्ष स्थान पर रहेंगे|
यद्यपि कांग्रेस के अधिकांश नेतागण अपनी टिप्पणियॉं करने में बहुत सावधान हैं और राहुल को सीधे देश का अगला प्रधानमंत्री कहने से बच रहे हैं, लेकिन पार्टी की केंद्रीय मंत्री जयंती नटराजन ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि कांग्रेस पार्टी अगला चुनाव जीत कर आती है तो राहुल गांधी देश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे| राहुल को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने के लिए सबसे अधिक उतावले रहे पार्टी नेता दिग्विजय सिंह से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अगला चुनाव सोनिया गांधी के ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा और अगले प्रधानमंत्री के चयन का अधिकार नए चुने गए सांसदों का होगा| जाहिर है वह केवल प्रश्‍न के सीधे उत्तर से बचना चाहते थे इसलिए तकनीकी स्थिति को सामने रखकर जवाब टाल गए| यदि सोनिया गांधी अध्यक्ष हैं तो पार्टी का चुनाव अभियान उनके नेतृत्व में ही चलेगा और संवैधानिक औपचारिकता पूरी करने के लिए प्रधानमंत्री के चयन का कर्मकांड संसदीय दल की बैठक में होता ही है| लेकिन सच्चाई यही है कि अगले चुनावी महासंग्राम के लिए राहुल गांधी को पार्टी का ध्वजवाहक बना दिया गया है, और यदि पार्टी जीतती है तो निश्‍चय ही प्रधानमंत्री पद की प्रथम दावेदारी इस ध्वजवाहक की ही होगी|
अब अहम सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी अभी पार्टी का और फिर आगे देश का नेतृत्व संभालने में सक्षम हैं| अभी तक उन्होंने ऐसी कोई योग्यता नहीं प्रदर्शित की है जिससे लगे कि वह देश का एक सक्षम नेतृत्व प्रदान कर सकेंगे| कांग्रेस के लिए भी वह अब तक कोई उपलब्धि हासिल नहीं कर सके हैं| यद्यपि उन्होंने स्वयं यह घोषणा की है कि वह अब किसी भी बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं, लेकिन वह भूमिका वे निभा सकेंगे इसमें संदेह है| राहुल गांधी युवा हैं, साहसी हैं, परिश्रमी हैं लेकिन ४२ साल की उम्र हो जाने के बावजूद बहुत से लोगों की राय में अभी वह ‘बच्चा है, कच्चा है’, लेकिन अब आगामी आम चुनाव उनके लिए शायद अंतिम कसौटी होगी जिस पर वह खरे न उतरे तो उनकी चमक को ग्रहण लगने में देर नहीं लगेगी|
अब तक राहुल गांधी की छवि को हर खतरे से बचाने का प्रयास जारी है| उन्हें जानबूझकर सत्ता के पदों से दूर रखा जा रहा है, जिससे कि सत्ता की विफलता या उसके भ्रष्टाचार की कोई छाया उन पर न पड़ने पाए| वह पार्टी के भीतर भी विपक्ष की आवाज बोलते नजर आते हैं, जिससे कि यह लगे कि वह पुरानी बूढ़ी पार्टी के बीच एक ताजी हवा हैं| लेकिन आखिर कब तक उन्हें इस तरह बचाया जाता रहेगा, कभी न कभी तो उन्हें असली लड़ाई में उतारना ही पड़ेगा| तो, अब वह समय आ गया हैं जब राहुल के लिए अपनी क्षमता प्रमाणित करना अनिवार्य हो गया है|
राहुल अवश्य इसके लिए तैयार हैं| उपर्युक्त समितियों के निर्माण की घोषणा भले ही १५ नवंबर को की गई हो, लेकिन उसकी बैठकें पहले ही शुरू हो चुकी हैं| प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पैनेल कमेटी की चार बैठकें १५ गुरुद्वारा, निकाबगंज रोड स्थित कांग्रेस के ‘वार रूम’ में हो चुकी है, जिसमें आंध्र प्रदेश की स्थिति पर प्रमुखता से विचार किया गया| राहुल ने ५४ सदस्यों की एक ‘आब्जर्वर टीम’ बनाई है, जिसकी अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है| इस टीम का चयन शायद उन्होंने खुद किया है| इसमें वर्तमान तथा पूर्व एमपी, एमएलए, एमएलसी, युवा कांग्रेस के नेता तथा विभिन्न क्षेत्रों के कुछ प्रोफेशनल शामिल है| इनका काम लोकसभा के सभी क्षेत्रों में जाकर वहां की विभिन्न जातियों-वर्गों का जनसंख्या-अनुपात (डेमोग्राफी) हासिल करना, पार्टी की संभावनाओं यानी उसकी ताकत एवं कमजोरी का पता लगाना तथा वर्तमान सांसद एवं अन्य सक्षम प्रतिनिधियों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना होगा| ये अपनी रिपोर्ट सीधे राहुल गांधी को देंगे|
राहुल गांधी ने एके एंटनी की १३ साल पुरानी उस रिपोर्ट को भी धूल झाड़कर बाहर निकाला है जो उन्होंने १९९९ में सोनिया गांधी के कहने पर तैयार की थी| १९९९ में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के पुनः चुनाव जीत जाने के बाद सोनिया ने अपनी पार्टी की हार के कारणों का पता लगाने के लिए एंटनी के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की थी| इस रिपोर्ट में एंटनी ने सुझाव दिया था कि प्रत्याशियों का चुनाव कम से कम तीन महीने पहले कर लिया जाए| अंतिम क्षण तक उम्मीदवार न तय हो पाने के कारण न तो उन्हें प्रचार का पूरा मौका मिलता है और न मतदाताओं को ही अपना निर्णय लेने के लिए पर्याप्त समय मिलता है|
चुनावों के संदर्भ में एंटनी की एक और रिपोर्ट है जो उन्होंने पिछली मई में दी थी| इस वर्ष उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा तथा उत्तराखंड राज्य विधानसभा चुनावों में भी पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा तो चुनावों के तुरंत बाद एंटनी को इस पर एक रिपोर्ट देने को कहा गया| इस रिपोर्ट में एंटनी ने गलत टिकट वितरण को पार्टी की पराजय का मुख्य कारण बताया और सलाह दी कि जब तक जीत बिल्कुल पक्की न हो, तब तक किसी क्षेत्र से कांग्रेस के नेताओं के बेटे, बेटियों, पत्नी, भाई या अन्य रिश्तेदारों को टिकट नहीं देना चाहिए| उन्होंने चुनाव प्रचार के नए इलेक्ट्रानिक तरीकों को भी गलत बताया और कहा कि पार्टी को अपने पारंपरिक प्रचार तरीकों का ही इस्तेमाल करना चाहिए| उनकी यह भी सलाह थी कि पार्टी को राज्यों में अपने मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा पहले नहीं करनी चाहिए बल्कि विकास के मुद्दों पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए| चुनाव की रणनीति पहले से तय होनी चाहिए तथा जनता का ‘फीडबैक’ सोशल मीडिया से प्राप्त करना चाहिए|
सूरजकुंड की संवाद बैठक में किसने क्या कहा यह तो ठीकठीक पता नहीं, लेकिन राहुल गांधी के बारे में बताया गया कि उन्होंने कहा कि कांग्रेस हमेशा बड़ी से बड़ी चुनौतियों पर विजय प्राप्त करती आई है, आगे भी वह किसी भी चुनौती से निपटने में सक्षम है| इस बैठक में पार्टी के ६६ लोग शामिल हुए| इसके बाद शायद राहुल की ५४ सदस्यीय ‘आब्जर्वर’ टीम की भी बैठक हो चुकी है|
अब उपर्युक्त विभिन्न कमेटियों के प्रारंभिक विचार-विमर्श तथा निरीक्षण के बाद प्राप्त निष्कर्षों  पर जनवरी में जयपुर में होने जा रही पार्टी की मंथन बैठक में विचार किया जाएगा और चुनाव के लिए पार्टी की रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा|
राहुल यद्यपि पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर रहे हैं| केंद्रीय मंत्रिमंंडल के पिछले फेरबदल तथा नई नियुक्तियों में उनका गहरा हाथ बताया जाता है| उनकी पसंद के युवा बिग्रेड को प्रोन्नत किया गया है तथा नई नियुक्तियॉं भी दी गई हैं| आगामी चुनाव के लिए प्रत्याशियों के चयन में उनकी प्रमुख भूमिका रहेगी ही| पूरी चुनाव मशीनरी का केंद्रीय नियंत्रण उन्हें पहले से ही सौंप दिया गया है| मुकाबले की अंतिम तारीख से १८ महीने पहले ही उन्हें चुनाव अभियान के लिए अधिकृत कर दिया गया है| अनुमान लगाया जा रहा है कि २०१३-१४ का वार्षिक आम बजट इस बार लोकलुभावन चुनावी बजट होगा|
चुनाव कब होगा, वास्तव में यह २०१३ में होने जा रहे कर्नाटक, मध्य प्रदेश एवं दिल्ली के राज्य विधानसभा चुनावों पर निर्भर करेगा| यदि इनमें कांग्रेस को सफलता मिली, तो उसके फौरन बाद आम चुनाव की घोषणा हो सकती है, अन्यथा फिर २०१४ के निर्धारित समय की प्रतीक्षा की जाएगी| राहुल अपने अभ्यास में लग गए हैं| चुनौती बहुत बड़ी है| भारत का आम चुनाव इस धरती का सबसे बड़ा चुनाव होता है| इसके प्रबंधन के लिए यद्यपि सरकारी मशीनरी है, किंतु किसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए अपना चुनाव प्रबंधन भी कुछ कम चुनौतीपूर्ण नहीं होता| टिकटों का बँटवारा अपने आप में पार्टी नेताओं के राजनीतिक कौशल की कसौटी होता है| जिन क्षेत्रों में केाई सर्वस्वीकार्य प्रतिनिधि नहीं है, वहॉं टिकट चाहने वालों की संख्या यों ही बढ़ जाती है| टिकटों की खरीद की बातें भी अभी से चर्चा में आ गई हैं| चुनावों के लिए धन संग्रह भी एक बड़ा काम होता है| धन संग्रह से जुड़ी रहती हैं तमाम सौदेबाजियॉं तथा भविष्य के वायदे, जहॉं से अगली सरकार के भ्रष्टाचार के बीज पड़ते है॥ वर्तमान सरकार भ्रष्टाचार और महंगाई के आरोपों से ही सर्वाधिक आक्रांत है और प्रायः हर आम चुनाव के बाद ये दोनों ही समस्याएँ और बढ़ जाती हैं| राहुल को इसी कंटाकाकीर्ण साथ ही दलदली राह से आगे बढ़ कर संसद में अपना विजय ध्वज स्थापित करना है| देखना है वह इस चुनौती पर अपनी विजय की छाप लगा पाते हैं या नहीं|