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रविवार, 4 सितंबर 2011

ये हिंदी किस 'भाषा' का नाम है? -1

लाल किले में मुगल बादशाह शाहजहां का दरबार, जहां हिन्दुस्तानियों की जुबान
हिंदी या हिंदवी से अलग ‘जुबाने उर्दुए मुअल्ला‘ ने रूपाकार ग्रहण किया।

कभी पूरे हिन्दुस्तान की लोक व्यवहार की भाषा को ‘हिंदी‘ नाम दिया गया था। तब संस्कृत भी हिंदी थी, पाली भी हिंदी थी, अवधी भी हिंदी थी, या यों कहें कि देशभर की सभी प्रकृत व संस्कृत भाषाएं हिंदी थी, लेकिन अब केवल उत्तर के कुछ प्रदेश ही हिंदी भाषी कहे जाते हैं। पूरा देश हिंदी भाषी और हिंदीतर भाषी में बंट गया है। कहने को यह ‘हिंदी‘ देश की राजभाषा है, लेकिन इसे राष्ट्र भाषा का दर्जा अब तक नहीं मिला है और यह संविधान की भाषाई अनुसूची में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ ही परिगणित है। इसी अंग्रेजी की समकक्षता भी प्राप्त नहीं है। भाषा आधारित प्रांतों की रचना ने इसे और हाशिए की ओर ठेल दिया है।
यह शीर्षक कुछ लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है। जो भाषा इस देश की संविधान स्वीकृत राजभाषा है, उसके नाम को लेकर यह सवाल उठाना कि यह किस भाषा का नाम है, सवाल उठाने वाले की अल्पज्ञता व मूर्खता ही नहीं, हिमाकत भी कही जाएगी। अब आप मुझे जो भी कहें या जो भी समझें, लेकिन यह सवाल उठाना मुझे बहुत महत्वपूर्ण लग रहा है, विशेषकर इसके ऐतिहासिक संदर्भ में। हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति व हिन्दू जाति की तरह देशव्यापी (व देश के बाहर भी) उपस्थिति के बावजूद इसकी भी कोई सुस्पष्ट पहचान या परिभाषा नहीं बतायी जा सकती।

वास्तव में इस देश के लोगों को हिंदी नाम की भाषा व हिन्दू नाम की जाति व धर्म की कोई जानकारी नहीं थी। शायद उन्हें अपने देश का नाम भी पता नहीं था। पश्चिम से यानी यूनान, अरब, फारस, मध्येशिया आदि से आये लोगों ने यहां के लोगों को बताया कि वे हिन्दू हैं, उनकी भाषा हिंदी है और उनका देश हिन्दुस्तान। इस देश की धरती, यहां के निवासियों, उनकी भाषा व धर्म को यह नाम तो बहुत पहले मिल चुका था, किंतु यह स्थापित तब हुआ, जब यहां बहुत से मुस्लिम आ गये और मुस्लिम शासन स्थापित हुआ, क्योंकि जब वे बाहर थे, तो इन्हीं नामों से यहां के लोगों को जानते-पहचानते थे। उनके आधिपत्य में रहते-रहते यहां के लोगों ने भी इसी पहचान को अंगीकार कर लिया। यहां यह जानना रोचक होगा कि देश, जाति व धर्म के रूप में तो इस शब्द की राष्ट्रीय पहचान अब भी बनी हुई है, लेकिन भाषा के स्तर पर यह सिकुड़कर केवल उत्तर के कुछ इलाकों तक ही सीमित रह गयी है और उत्तर में भी उसकी एक परजीवी (कृपया शब्दों पर जाएं, बल्कि उसके निहितार्थ को ही ग्रहण करें) की हालत बनी हुई है। यद्यपि इसको बोलने-समझने वाले पूरे देश में क्या दुनिया भर में फैले हुए हैं, लेकिन इसे उत्तर के कुछ प्रातों की ही स्वाभाविक भाषा माना जाता है और उसी को हिंदी क्षेत्र और वहां के निवासियों को ही हिंदीभाषी कहा जाता है। बाकी क्षेत्र को गैर हिंदी क्षेत्र और गैर हिंदी भाषी माना जाता है। वहां के हिंदी विद्वानों को गैर हिंदी भाषी विद्वान की संज्ञा दी जाती है। तो भाषा के स्तर पर आकर हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान की परिभाषा इस तरह सिकुड़ गयी कि उसकी ठीक-ठीक पहचान ही मुश्किल हो गयी ।

यहां एक और रोचक बात भी हुई कि देश जब स्वतंत्र हुआ तो हमने भाषा, जाति और धर्म के नाम से तो हिंदी-हिन्दू जोड़े रखा, लेकिन देश के नाम के तौर पर हिन्दुस्तान को नहीं अपनाया। उसके लिए हमने अंग्रेजों द्वारा दिया गया ‘इंडिया‘ अपना लिया।

इस सबका परिणाम यह हुआ कि देश के स्वतंत्र होने पर जब हम अपनी विविध प्रकार की पहचान समेटने की स्थिति में आए, तो हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान की सारी संगति बिगड़ चुकी थी। अब न यह देश हिन्दुस्तानल रह गया था, न यहां के निवासी हिन्दू थे और न यहां के निवासियों की भाषा हिंदी रह गयी थी। हिन्दुस्तान तो खैर गुम हो गया, जिसके पुनः आगमन की भी कोई संभावना नहीं रह गयी (शायद कोई जरूरत भी नहीं), क्योंकि यदि किसी ने लाने की कोशिश भी की, तो फौरन कुछ लोग सवाल उठायेंगे कि क्या यह देश केवल हिन्दुओं का है, इसलिए बाकी बचे हिंदु और हिन्दू। किंतु उनकी भी पहचान संकीर्ण हो गयी। यहां केवल कुछ लोग ही हिन्दू रह गये और केवल कुछ लोगों की भाषा हिंदी रह गयी। यानी पूरे देश की पहचान से इनका कोई लेना-देना नहीं बचा। जब राष्ट्र के रूप में अंग्रेजों का दिया देश हमने स्वीकार किया तो भाषा के रूप में उनकी दी हुई भाषा भी अपना ही और उनकी दी ‘बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुरंगी, बहुभाषी खिचड़ी (फ्लूरल) पहचान भी स्वीकार कर ली। इतना ही नहीं, उस पर गर्व भी करने लगे। अपनी इस नई पहचान में राष्ट्रीय एकता की भावना का कोई तत्व शेष नहीं रह गया- न भाषा, न संस्कृति, न जाति, न धर्म। किसी खिचड़ी में एकरसता कायम करनी हो, तो दो ही रास्ते रह जाते हैं या तो उसके सारे भेदों को ठुकरा दो या सबको उनकी पृथकता के साथ सम्मान भाव से स्वीकार कर लो। तो इसके लिए हमारे देश के आधुनिक मनीषियों ने धर्म के स्तर पर तो दो महान तत्वों को स्वीकार किया, एक तो ‘धर्मनिरपेक्षता‘ (सेकुलरिज्म) और दूसरा ‘सर्व धर्म समभाव‘। लेकिन इनका भी व्यवहारिक स्तर पर निर्वाह नहीं हो सका। राजनीतिक स्वार्थ व अवसरवाद ने ‘धर्मनिरपेक्षता‘ और ‘भेदभाववाद‘ को अधिक महत्व दिया। और भाषा के संदर्भ में तो इतना भी परवाह करने की जरूरत नहीं समझाी। गयी। क्षेत्रीय भाषाओं के आधार पर प्रांतों का निर्माण करके क्षेत्रीयता को संतुष्ट कर दिया गया और राष्ट्र के स्तर पर तो ‘इंडिया‘ और ‘इंग्लिश‘ स्वीकार की ही जा चुकी थी। विविध धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र के बुद्धिजीवियों व राजनेताओं ने अपनी-अपनी श्रेष्ठता प्रतिपादित करने के प्रयास में ऐसा देशव्यापी भ्रमजाल पैदा किया कि एक राजनीतिक जागीरदारी के अलावा राष्ट्र की कोई सर्वमान्य पहचान ही नहीं रह गयी।

वस्तुतः हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान परस्पर सम्बद्ध शब्द और भाव हैं। प्रारंभ में इनका धर्म (मजहब या रिलीजन) से कोई संबंध नहीं था, लेकिन अब हिन्दू शब्द तो केवल धर्म (रिलीजन) की पहचान बन गया है, वह भी एक ऐसे धर्म की, जिसकी अब तक कोई सर्वमान्य परिभाषा ही नहीं बन सकी है। इसे धर्म मानने का काम अंग्रेजों या यूरोपीय विद्वानों ने किया, बाद में उनके प्रभाव के कारण इस पहचान वाले भारतीयों ने भी उसे स्वीकार कर लिया और इसकी गौरवगाथा लिखने में लग गये। लेकिन इस विडंबना की तरफ लोगों का ध्यान प्रायः नहीं गया कि न तो इस हिन्दू का देश हिन्दुस्तान रह गया और न इस हिन्दू की भाषा हिंदी बन सकी। यह ‘हिन्दू‘ एक जाति और एक संस्कृति के रूप में भी नहीं खड़ा हो सका, इसीलिए यह मान्य अंतर्राष्ट्रीय परिभाषा के अनुसार हिन्दू राष्ट्र (हिन्दू नेशन) भी नहीं बन सका। आज जो ‘इंडिया‘ नाम का देश है, उसे विदेशी विद्वान ‘एक राष्ट्र‘ नहीं, बल्कि ‘बहुराष्ट्रीय देश‘ (मल्टीनेशन कंट्री) कहते हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह बन गयी है कि इसे जो जैसे चाहे परिभाषित कर सकता है। खैर, यह पूरा विषय बहुत विस्तृत है, जिसके ऐतिहासिक क्रम में ब्यौरेवार विवेचन की जरूरत है, किंतु यहां इस समय की चर्चा केवल भाषा पर केंद्रित है।

पुराणों तथा अन्य पारंपरिक ग्रंथों से हम जानते हैं कि हिमालय के दक्षिण का समुद्र पर्यंत भूभाग ‘भारत वर्ष‘ कहलाता था, लेकिन ज्ञात इतिहास काल में इस क्षेत्र में ऐसी कोई राजनीतिक इकाई या साम्राज्य नहीं था, जिसकी ‘भारत‘ या ‘भारत वर्ष‘ के नाम से पहचान रही हो। इसलिए इस क्षेत्र से बाहर के लोग अपनी सुविधा से इस क्षेत्र का नामकरण कर लेते थे। पश्चिमी क्षेत्र से इस भूक्षेत्र को अलग करने वाली प्राचीन पहचान ‘सिंधु‘नदी थी, इसलिए पश्चिम के लोगों ने इसके पूर्व के निवासियों को इसी नदी के नाम से पहचान दी। पर्सिया या फारसी में प्रायः ‘स‘ का उच्चारण ‘ह‘ हो जाता है। वहां महाप्राण ‘ध‘ की जगह अल्पप्राण ‘द‘ के उच्चारण की भी प्रवृत्ति देखी जाती है, इसलिए वहां ‘सिन्धु‘ या ‘हिन्दू‘ हो जाना स्वाभाविक था, जैसे संस्कृत का ‘सप्ताह‘ वहां ‘हफ्ता‘ हो गया और ‘असुर‘ का ‘अहुर‘। यूनानियों ने शायद फारस वालों से ही नाम की पहचान प्राप्त की और अपनी सुविधा से ‘हिन्दू‘ का ‘इंडु‘ या ‘इंडस‘ कर लिया। यूरोपियनों ने यूनान से ही इस देश का नाम ‘इंडिया‘ प्राप्त किया। यूनानियों की पहचान के आधार पर ही उन्होंने इस देश की भौगोलिक व सामाजिक पहचान प्राप्त की। अरबी-फारसी परंपरा से प्रभावित लोग इस देश को हिन्दुस्तान कहने लगे, तो यूनानी प्रभाव वाले पश्चिमी देश ‘इंडिया‘। तो विदेशी नजर में इस देश के दो नाम हो गये ‘इंडिया‘ और ‘हिन्दुस्तान‘ (संक्षेप में हिंद-बिल्कुल सिंध की तर्ज पर)। लेकिन आगे की विडंबना यह रही कि जब यहां विदेशियों के शासन का प्रारंभ हुआ, तो शुरुआत में जितने इलाकों पर अफगानों, तुर्कों व फारस वालों का शासन कायम हुआ, उतना ही क्षेत्र हिन्दुस्तान के नाम से चर्चित हुआ, बाकी का इलाका अलग-अलग क्षेत्रीय नामों से ही जाना जाता था। बाद में जब अंग्रेज आए, तो जितने इलाकों पर उनका कब्जा हुआ, वह ‘इंडिया‘ या ‘ब्रिटिश इंडिया‘ कहा जाने लगा और बाकी के इलाके या रियासतें अपने क्षेत्रीय नाम या वंश नाम से चलती रहीं। इस बीच राजनीतिक पहचान के रूप में भारत कहीं नहीं था। प्रारंभिक मुस्लिम काल के प्राकृत व अपभ्रंश साहित्य में प्रायः जहां भी ‘भारत‘ या ‘भारतीय‘ का इस्तेमाल हुआ है, वह गैर मुस्लिमों के अर्थ में हुआ है। जैसे ‘इह भरये‘ यानी ‘यह भारतों का‘। यदि ब्रिटिश काल के गजेटियरों को देखें, तो वहां दंतकथाओं के आधार पर संकलित इतिहास में ‘भर‘ जाति या ‘भ्रों के टीलों‘ का बहुत उल्लेख है। उस पर पूरा भरोसा करें, तो लगेगा कि कम से कम उत्तर भारत में राजस्थान से लेकर बंगाल तक शताब्दियों तक ‘भरों‘ का शासन था, जबकि अन्य इतिहास ग्रंथों या पुराने साहित्य में इनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। वास्तव में ये ‘भरों‘ नहीं, बल्कि ‘भरतों‘ या ‘भारतीयों‘ के टीले यानी उनके नगरों व किलों के ध्वंसावशेष हैं। प्रारंभिक काल में यहां आए मुस्लिम यहीं की भाषा व्यवहार में लाते थे, इसलिए उन्होंने अपना द्वारा स्थापित नगरों, किलों के अतिरिक्त जो कुछ पुराना था, उसे यहां के देशी लोगों की भाषा में ‘भरतों‘ या ‘भरों‘ का करार दे दिया है। आश्चर्य की बात है कि मध्यकाल या उत्तर मध्यकालीन इतिहास के पंडित अभी भी इतिहास की इस गुत्थी में उलझे हैं और भ्रों की पहचान में लगे हैं। यहां थोड़ा विषयांतर हो गया है, लेकिन इसका उद्देश्य यह बताना था कि हमने मध्यकालीन लोकभाषा की सम्यक पड़ताल नहीं की है। हमने ज्यादातर दरबारी कवियों की रचनाओं और मठों में सुरक्षित धार्मिक (रिलीजस) गं्रथों के आधार पर अपने भाषा इतिहास की रचना कर ली है।

यहां इतना तो स्पष्ट है कि बाहर के लोगों ने सिंधु नदी के पूर्व के सारे लोगों को हिन्दू, उनकी भाषा को हिंदी और पूरे समुद्र पर्यंत क्षेत्र को हिन्दुस्तान कहा। उन्होंने यहां के मजहब का कोई जिक्र नहीं किया। अब उनकी मूल बात मानें, तो इस देश की सारी भाषाएं हिंदी हैं। ईरान के प्रसिद्ध बादशाह नौश्ेरवां (531-579 ई.) में बजरोया नाम के एक विद्वान को ‘पंचतंत्र‘ का अनुवाद फारसी में करने के लिए भारत भेजा। ‘पंचतंत्र‘ संस्कृत का गं्रथ है, लेकिन इस अनुवाद की भूमिका में बजरोया पंचतंत्र की भाषा को ‘जबाने हिंदी‘ कहता है। इसी तरह मिनहाजुस्खी की पुस्तक ‘हबकाते नासिरी‘ में बताया गया है कि जबाने हिंदी में ‘बिहार‘ का अर्थ मदरसा होता है। यहां पालि या अप्रभंश के लिए ‘जबाने हिन्दी‘ शब्द का प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ‘अवधी‘ को हिन्दुई कहते हैं। ‘तुरकी, अरबी, हिन्दुई भाषा जेते आहि जेहिमह मारग प्रेमकर सबै सराहैं ताहि।।‘ नूर मोहम्मद (1764) में अपनी अवधी को हिंदी कहते हैं। ‘हिन्दू मग पर पांव न राखौं, का जौ बहुतै हिंदी भाखौं।‘ इन नूर मुहम्मद साहब से भी 21 वर्ष पहले गिरिधर राय (1743) ब्रजी के लिए हिंदी शब्द का प्रयोग करते हैं। ‘हिंदी मांहि फकीर के अच्छर लागैं तीन।‘ दक्कन के शेख अहमद लिखते हैं, ‘जबां हिंदी, हिंदवी, मुझसूं होर देहलवी- न जानू अरब होर अजब मसनवीं।‘

आशय यह कि बाहर से आए मुसलमान चाहे जिस भाषा क्षेत्र-तुर्की, अफगानी (पश्तो), फारसी, अरबी आदि- ये आए रहे हों, लेकिन वे यहां के बाजारों, कस्बों व शहरों की भाषा ही यहां इस्तेमाल करते थे। उसमें उनकी अपनी मातृभाषा या क्षेत्र भाषा के शब्द संभवतः मिलते गये होंगे। तो उनके आने से स्थानीय प्राकृत या अपभ्रंश भाषा में विदेशी शब्द भी मिलते गये। इसीलिए इस भाषा को ‘रेख्ता‘ (मिलीजुलीख जैसे आज हिंगलिश दिखायी देती है) भी कहा गया। उत्तर में अपनी सल्तनत कायम करने वाले मुस्लिम शासकों ने जब दक्षिण में हमले किये, तो उनके साथ अरबी-फारसी मिश्रित यह भाषा दक्षिण भी पहुंची। इस देश में निले स्तर पर जनसंपर्क की एक भाषा पहले से विद्यमान थी, जिसे व्यापारी, सैनिक, मजदूर, पर्यटक तथा साधु संत इस्तेमाल करते थे। उपरी स्तर पर व्यवहार के लिए इस्तेमाल होने वाली आम आदमी की भाषा को केवल भाषा ही कहा जाता रहा है। इसमें स्थानीय प्राकृत (स्वाभाविक रूप से विकसित क्षेत्रीय भाषा) के शब्दों के साथ संस्कृत का अपभ््रांश रूप शामिल था। प्राकृत क्षेत्रीय भाषाएं थीं, लेकिन अपभ्रंश और संस्कृत का कोई क्षेत्र विशेष नहीं था, ये राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय रूप से व्याप्त थीं। इनमें खासकर जनभाषा यानी अपभ्रंश में क्षेत्रीय भेद क्षेत्रीय प्राकृत भाषाओं की प्रकृति के अनुरूप ही हुआ है। मुसलमानों के आने से केवल यह हुआ कि इसमें फारसी, तुर्की, पश्तो और अरबी के भी कुछ शब्द मिल गये। मूलतः इसी भाषा को हिंदी या हिंदवी कहा गया है। चूंकि मुस्लिमों का दीर्घकालिक स्थाई शासन उत्तर में ही रहा और उस उत्तरी क्षेत्र का अफगानिस्तान, तुर्किस्तान व फारस से अधिक निकट संपर्क रहा, इसलिए आधुनिक हिंदी का यह नया रूप उत्तर में ज्यादे व्यापकता और गहराई से स्थापित हो सका। लेकिन प्रारंभ में यह भाषा भी हिंदी या हिंदवी ही थी और आम व्यवहार में भारतीय नागरी लिपि में ही लिखी जाती थी। बाहर से आये लोग चूंकि अपनी-अपनी क्षेत्रीय लिपियों में अभ्यस्त थे, इसलिए वे अपने निजी नोट अपनी तुर्की या फारसी लिपि में लिखते थे।

यहां यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों के इस देश में आने के कई सौ साल बाद तक भाषा में कोई मजहबी भेद नहीं पैदा हुआ था। आम बोलचाल और व्यवहार की भाषा बदल रही थी, लेकिन उसकी कोई हिन्दू मुस्लिम पहचान नहीं बन रही थी। लिपि को लेकर भी कोई झगड़ा नहीं था। इस देश में राजकाज की भाषा फारसी बन जाने के बाद भी (जो मुगल बादशाह अकबर के जमाने में हुई) उसकी पहचान मजहब के साथ नहीं जुड़ी। मुसलमान संस्कृत पढ़ते थे, हिन्दू फारसी। केंद्रीय दरबार का कामकाज फारसी में चलता था, लेकिन स्थानीय व्यवहार की भाषा हिंदी या हिंदवी ही थी। टोडर मल संस्कृत के भी पंडित थे, फारसी के भी। खुसरो की बहुभाषी रचनाओं से सभी परिचित हैं। रहीम खन खाना और बीरबल जैसे दरबारी संस्कृत और फारसी दोनों के पंडित थे, लेकिन उनके आम बोलचाल व व्यवहार की भाषा हिंदी थी। वही हिंदी, जो कबीर, रैदास और नानक जैसे संत इस्तेमाल कर रहे थे।

वस्तुतः भाषा पर मजहबी रंग चढ़ना तब शुरू हुआ, जब बादशाह शाहजहां ने दिल्ली का लालकीला बनवाकर तैयार किया (1639 ई.) और उसके आसपास शहजहांनाबाद शहर बसाया तथा राजधानी आगरा से हटाकर शहजहांनाबाद (आधुनिक दिल्ली) के लालकिले में पहुंचाया। अब तक बाहरी इस्लामी मुल्कों के विद्वान, शायरों, मजहबी नेताओं तथा राजनीतिक पंडितों का यहां आना काफी बढ़ गया था। लालकिले की शनदार इमारत बन जाने के बाद मुगल बादशाह शाहजहां की शोहरत और फैली, जिससे और बड़ी संख्या में फारसी अरबी के विद्वान वहां आने लगे। दरबार में एक नयी तरह की नफीस भाषा विकसित होने लगी, जिसमें फारसी से लिये गये। अब इस उच्च स्तरीय दरबारी भाषा को एक नया नाम दिया गया ‘जबाने उर्दूए मुअल्ला‘। इस पर इस्लामी मजहब का गहरा रंग चढ़ा हुआ था। किला जब बना, तो उसके पास बाजार की भी स्थापना होनी थी, सैनिक छावनी भी बननी थी। इस छावनी में अब फारसी व तुर्क सैनिकों की संख्या अधिक थी। उर्दू (ओर्डू) का शब्दार्थ होता है किला, अड्डा या शिविर। यह अंग्रेजी के ‘होर्ड‘ शब्द जैसा है। इस किले को उर्दू संज्ञा मिलने के बाद उसके पास के बाजार का नाम भी उर्दू बाजार पड़ गया। तो यह उर्दू किले के भीतर के सभ्य व कुलीन मुसलमानों की भाषा बनी।

यहां यह ध्यान देने की बात है कि भारत में आने के बासद यहां की भाषा को ‘हिंदी‘ नाम इन मुस्लिम हमलावरों द्वारा ही दिया गया था, लेकिन अब यह ‘हिंद‘ यानी इस देश की भाषा बन गयी थी और यहां के मूल निवासियों को हिंदी की संज्ञा मिल गयी थी। इसलिए दरबार के कुलीन मुस्लिम वर्ग को अपनी एक अलग पहचान वाली भाषा चाहिए थी। इन नये दरबारियों को यहां की भाषा पिछड़ी और कविता फूहड़ लगती थी, लेकिन उनकी आंख तब खुली की खुली रह गयी, जब दखिन के हिंदवी के शायर वली मुहम्मद (1667-1707) वर्ष 1700 में दिल्ली पहुंचे। उनकी शायरी के आगे ‘उर्दुए मुअल्ला‘ के शायर फीके लगे। उनकी ‘रेख्ता‘ व ‘हिंदवी‘ की कविता फारसी के विद्वानों को चमत्कृत करने वाली थी। उन्होंने वली को उर्दू ए मुअल्ला‘ में रचनाएं करने को कहा। वली साहब मान गये और वह उर्दू गजल के ‘बाबा आदम‘ का खिताब पाने के हकदार बन गये। इस लालकिले के दरबार से ही ‘उर्दू‘ (जबाने उर्दू ए मुअल्ला का संक्षिप्त रूप) ने अपना नया भाषाई और मजहबी रंग रूप अख्तियार करना शुरू किया। उसने पर्सियन लिपि की नश्तालिक लिखावट शैली (घसीट वाली)अख्तियार की। दक्षिण एशियायी जरूरी के अनुसार उसमें कुछ अक्षर (हर्फ) बढ़ाये गये और इस रूप में उसे हिंदी या हिंदवी से एक अलग पहचान दिलाने की कोशिश शुरू हुई। अभी तक हिंदी या हिंदवी की एक और लिपि नहीं तय थी। वह पर्सियन व तुर्की लिपि में भी लिखी जाती थी, नागरी में भी और अन्य भारतीय लिपियों में लिखी जाती थी। लेकिन अब उर्दू का नश्तालिक फारसी शैली में लिखना अनिवार्य हो गया। उर्दू का छंद विधान व वूर्य विषय भी फारसी शैली का हो गया। उर्दू के शायर अपना तखल्लुस (उपनाम या पेन नेम) रखने लगे, जो फारसी की परंपरा थी। इन्होंने अपनी उर्दू में फारसी, अरबी व तुर्की के शब्दों को बढ़ा दिया। संस्कृत के अपभं्रश शब्दों को भी लेने से परहेज किया जाने लगा।

भाषा के इस मजहबीकरण की प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी। अब हिन्दू के नाम से अभिहित भारतीयों ने अपनी अलग भाषाई पहचान के लिए ‘हिन्दू‘ शब्द से जुड़ी इस ‘हिंदी‘ को अपनी भाषा के रूप में विकसित करना शुरू किया। अब यहां दिक्कत यह पैदा हुई कि इस वर्ग का संस्कृत से नाता बहुत पहले ही टूट चुका था। वह केवल धार्मिक कर्मकांड तथा ऐतिहासिक साहित्य के अध्ययन अध्यापन तक सीमित रह गयी थी। मुस्लिमकाल में जो मिलीजुली भाषा विकसित हुइ्र और उसमें जो लौकिक साहित्य रचा गया, वह ज्यादातर फारसी लिपि में था, जो मुस्लिमों द्वारा लिखा गया था। अब भाषा के मुस्लिम मजहबीकरण की प्रतिक्रिया में जो भाषाई जागरूकता आयी, वह भला मुस्लिम रचनाकारों की रचनाओं को क्यों अपने साथ जोड़ती। उन्होंने केवल उन्हीं मुस्लिम रचनाकारों को अपने इतिहास में जोड़ा, जिन्होंने नागरीलिपि में लिखा या यहां के भक्ति आंदोलन से प्रभावित थे अथवा भारतीय इतिहास के हिन्दू कथानकों को अपना वूर्य विषय बनाया। इन्होंने उर्दू की प्रतिक्रिया में अपनी हिंदी में संस्कृत के शब्दों को अधिक संख्या में शामिल करना शुरू कर दिया। भाषा के इस मजहबी विभाजन को अंग्रेजी सत्ता ने आकर और पुष्ट किया, क्योंकि इसमें उसका दीर्घकालिक राजनीतिक हित था। (जारी)

4/09/2011

रविवार, 28 अगस्त 2011

अन्ना हजारे बनाम भारतीय लोकतंत्र



गांधीवादी नेता अन्ना हजारे ने देश में आपाद मस्तक व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ऐसी लड़ाई छेड़ रखी है, जिसमें प्रायः पूरे देश का आम आदमी उनके साथ है, किंतु देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रायः सारे कर्णधार उनके खिलाफ हैं। वास्तव में आज भारत का संविधान, भारतीय संसद और पूरा लोकतंत्र कुछ निहित स्वार्थी तत्वों का बंधक बनगया है। इन्होंने आम आदमी के अधिकारों का ठेका भी अपनी जेब में रख छोड़ा है, जिससे इनके गुट के बाहर के किसी आदमी को आम आदमी की बात उठाने का अधिकार भी नहीं रह गया है। सत्ता के दलाल बुद्धिजीवी, लेखक व पत्रकार उस आवाज को ही लोकतंत्र विरोधी, फासिस्ट व जिहादी सिद्ध करने में लगे हैं, जो इस बंधक बने लोकतंत्र को मुक्त कराने की चाहत रखता है।

अन्ना हजारे आज शायद दुनिया का सर्वाधिक चर्चित नाम है। 74 वर्षीय यह वृद्ध यौवन की अदम्य अंगड़ाई का प्रतीक बन गया है। अन्ना देश के जनजन में ऐसे व्याप्त हो गये हैं कि हर व्यक्ति अपने को अन्ना कहने लगा है। ‘मैं अन्ना हूॅं‘ छपी टोपियां और कमीजें युवाओं की ‘फैशन स्टेटमेंट‘ बन गयीं। अन्ना की रंगीन तस्वीरें किशोरियों के नाखूनों तक पर सज गयीं। ऐसी दीवानगी अब से पहले शायद ही किसी को लेकर उमड़ी हो। इस देश की हठीली संसद और अपने ही अहंकार मे डूबी जिद्दी सरकार को अन्ना की इस तूफानी लहर के आगे झुकना पड़ा। यद्यपि अभी यह नहीं कहा जा सकता है कि इसके साथ ही आम जनता जीत गयी है और भ्रष्टाचारियों की संरक्षक सरकार और राजनेताओं की फौज पराजित हो गयी है, फिर भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि उनमें पहली बार देश की आम जनता का एक खौफ पैदा हुआ है। लेकिन स्वयं अन्ना और उनके साथ खड़े युवाओं तथा देश के आम लोगों को यह समझना होगा कि देश की सत्ता पर कुंडली मारे बैठा राजनीतिक वर्ग मात्र अनशन और शांतिपूर्ण प्रतीकात्मक विरोधों से झुकने वाला नहीं है। सत्ताधारी वर्ग सत्तामद में इतने जड़ हो चुके हैं कि उन्हें अनुनय विनय की भाषा समझ में ही नहीं आती। पुरानी कहावत है कि ‘भय बिन होइ न प्रीति‘। लोगों को रामायण की उस पुराण कथा का स्मरण होगा, जब श्रीराम ने जलाधिपति समुद्र से लंका जाने का मार्ग देने की प्रार्थना करते हुए उसके तट पर तीन दिन निराहार व्रत करते गुजारे थे, लेकिन अपनी विराट सत्ता के अहंकार में डूबे समुद्र ने उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। इसके बाद राम ने अनुनय-विनय का व्रत छोड़कर जब शस्त्र शक्ति का संधान किया, तो भागा भागा आया और राम को तरीका सुझाने लगा कि वह कैसे स्वयं लंका जाने का मार्ग बना सकते हैं, जिसमें वह स्वयं भी सहायता के लिए तत्पर रहेगा। इस कथा का संदेश साफ है कि सत्ताधारी वर्ग को जब तक अपनी सत्ता जाने का भ्य नहीं उत्पन्न होता, तब तक वह किसी के भी आगे झुकने के लिए तैयार नहीं होता। अन्ना को भी इस कथा से सबक लेना चाहिए। बहुत हो गया अनशन। अब शक्ति प्रदर्शन का समय आ गया है। अन्ना को यदि अपनी मांग मनवानी है और उन्हें पूरे देश के समर्थन का विश्वास है, तो उन्हें अब संवेदना जगाने के बजाए चेतना जगाने का काम शुरू करना चाहिए। लेकिन यह काम अराजनीतिक पद्धति से नहीं हो सकता। इसके लिए राजनीति में उतरना होगा। वे स्वयं यदि कोई राजनीतिक पार्टी बनाकर यह लड़ाई नहीं लड़ सकते, तो उन्हें ऐसी राजनीतिक पार्टियों का मंच बनाना चाहिए, जो उनकी नीतियों को स्वीकार करती हों या जिनमें तथाकथित दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ने का जज्बा हो। उन्हें अब इस नाटकीय सिद्धांत की ओट नहीं लेनी चाहिए कि वे न तो किसी पार्टी के खिलाफ हैं और न वह किसी सरकार को गिराना चाहते हैं।

वह अहिंसा में विश्वास रखते हैं, यह तो निश्चय ही अच्छी बात है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यवस्था परिवर्तन के लिए हिंसा की कोई जरूरत भी नहीं है। यहां तो केवल ऐसी वैचारिक क्रांति की जरूरत है, जिसके साथ देश की आम जनता जुड़ सके। किसी अराजनीतिक क्रांति द्वारा व्यवस्था परिवर्तन का सपना कभी पूरा नहीं किया जा सकता। अन्ना को समझना चाहिए कि देश के तमाम भ्रष्ट लोगों ने प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों तरीके अपनाकर संसद, संविधान तथा न्याय व्यवस्था तीनों पर अपना कब्जा जमा रखा है। देश की वर्तमान संसद व देश का संविधान ही उनका रक्षा कवच बना हुआ है, इसलिए वह अपने इस किले में किसी को भी सेंध लगाने की कभी इजाजत नहीं देंगे।

इस देश में तमाम बुद्धिजीवी, पत्रकार व लेखक प्रायः सत्ता की दलाली में अपनी सारी मेधा खर्च करने में लगे रहते हैं। वे संविधान, कानून व परंपरा की ऐसी व्याख्या करेंगे कि नायक खलनायक और खलनायक नायक बन जाए। कांग्रेस के, विशेषकर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के एक चहेते बुद्धिजीवी व पत्रकार हैं दिलीप पडगांवकर, वह अन्ना को फासिस्ट और जिहादियों की श्रृंखला में सिद्ध करने में लगे हैं। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित अपने एक आलेख में उन्होंने अन्ना को पोप, कम्युनिस्ट कमांडरों, फासिस्ट नेताओं व जिहादी सिद्धांतकारों की पंक्ति में गिनते हुए कहा कि वह भी अपने ही विचारों को सर्वोच्च व अकाट्य समझते हैं। वे उसी सिद्धांत को मानते हैं, जिसके प्रमाण अकेले वहीं हैं। उन्होंने अन्ना के विचारों की खिल्ली उड़ाते हुए लिखा है कि वह अपनी ‘अंतरात्मा‘ की आवाज पर लक्ष्य पाना चाहते हैं। वह उसे संसद- जो जनता की इच्छाओं का प्रतिरूप है- और संविधान (जो लोकतंत्र की कसौटी है) के भी उपर मानते हैं।

मतलब यह कि क्या सही है क्या गलत यह वे ही तय करेंगे। अकेले वे ही जानते हैं कि सत्य क्या है और जनता को किस लक्ष्य तक पहुंचना है। उस लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग अकेला वही है जिसे उन्होंने तैयार किया है। दूसरे शब्दों में भ्रष्टाचार दूर करने का उनका ही एक तरीका है, जिसे वे ही लागू करने के अधिकारी हैं। अब इस तरह वह क्या कहना चाहते हैं, इसे कोई भी समझ सकता है। वह हिंसक नक्सली नेताओं और जिहादियों से अन्ना और उनके समर्थकों को अलग नहीं मानते, क्योंकि वे भी संविधान और संसद के तौर-तरीकों को नहीं मानते और अपने मन की व्यवस्था लागू करना चाहते हैं।

उन्होंने अपनी बात की पुष्टि के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर के एक वक्तव्य को भी उद्धृत किया है, जो उन्होंने संविधान सभा की बैठक में नवंबर 1949 में दिया था। उस समय तक संविधान निर्माण का कार्य पूरा हो चुका था। अंबेडकर ने उस वक्तव्य में कहा था कि यदि भारत को अपना लोकतंत्र बनाये रखना है, केवल बाहरी ढांचे के रूप में नहीं, बल्कि वास्तव में, तो इसके लिए सबसे पहले यह करना होगा कि देश को जो भी सामाजिक, आर्थिक लक्ष्य प्राप्त करने हैं, उसके लिए केवल संवैधानिक तरीके अपनाएं जाएं। इसका मतलब यह है कि अब हमें क्रांति यानी धरना-प्रदर्शन-आंदोलन आदि के तौर-तरीकों को छोड़ना होगा (वी मस्ट एबैंडन द ब्लडी मेथड्स ऑफ रिवोल्यूशन)। उन्होंने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा कि हमें नागरिक अवज्ञा (सिविल डिस ओबिडियेंस) असहयोग (नॉन कोऑपरेशन) तथा सत्याग्रह जैसे तरीकों का परित्याग करना होगा। जहां संवैधानिक तौर तरीकों के रास्ते खुले हों, वहां इनको इस्तेमाल करने का कोई औचित्य नहीं है। ये तौर तरीके और कुछ नहीं, बल्कि अराजकता पैदा करने के साधन (ग्रामर ऑफ एनार्की) हैं, इसलिए इन्हें जितनी जल्दी छोड़ दिया जाए, उतना ही अच्छा होगा। इसके आगे अम्बेडकर ने जॉन स्टुअर्ट मिल की उस चेतावनी को उद्धृत किया, जिसे उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए दिया था। मिल ने कहा था कि जो लोग लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें अपनी स्वतंत्रता किसी महापुरुष के आगे भी नहीं समर्पित करना चाहिए (चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो) और न उसे इसका अधिकार देना चाहिए कि वह उनकी संस्थाओं को उलट पलट कर दे। अम्बेडकर ने इस चेतावनी को भारत के संदर्भ में विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहा था कि भारत एक ऐसा देश है, जहां भक्ति की प्रधानता है। यहां की राजनीति में भी व्यक्ति पूजा और भक्ति मार्ग की जैसी प्रधानता व प्रभाव है, वैसा किसी अन्य देश में नहीं है। उन्होंने सावधान किया था कि अपने देश में भक्ति या व्यक्ति पूजा का ऐसा प्रभाव है कि उससे लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन हो सकता है और तानाशाही उसका स्थान ले सकती है।

अम्बेडकर के उपर्युक्त वक्तव्य से असहमति नहीं व्यक्त की जा सकती, किंतु जनाब पडगांवकर साहब इस उद्धरण का जिस संदर्भ में इस्तेमाल कर रहे हैं, वह निश्चय ही उनकी बदनीयती का परिचायक है। वह अम्बेडकर के कथन का इस्तेमाल करके अन्ना हजारे को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का विरोधी सिद्ध करना चाहते हैं। यह वही पडगांवकर साहब हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कश्मीरियों से बातचीत करके अपनी रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त कर रखा है। ये वही पडगांवकर साहब हैं, जो पाकिस्तानी आई.एस.आई. के अमेरिका स्थित एजेंट गुलाम अहमद फई के भी दोस्त हैं और भारत के प्रधानमंत्री के भी। ये कश्मीरी अलगाववादियों के आंदोलन और विरोध का तो समर्थन करते हैं और भारत सरकार को भी सलाह देते हैं कि उनकी मांगें मानी जानी चाहिए और उनके प्रति उदारता बरतनी चाहिए, लेकिन अन्ना हजारे को यह फासिस्ट और आतंकी सिद्ध करने में लगे हैं। उन्हें नेहरू परिवार की व्यक्ति पूजा का खतरा नहीं दिखयी देता, किंतु अन्ना को मिल रहे जनसमर्थन से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा नजर आ रहा है। उनके अनुसार आज तो अनशन करके जान देने की धमकी देकर अन्ना हजारे अपने विचारों का लोकपाल बिल पास करना चाहते हैं, कल कोई ‘खाप-न्याय‘ (रिवायत के नाम पर) को लागू करने के लिए कानून बनाने को कहने लगे या किसी पूजा स्थल को गिराने की बात करने लगे या पर्यावरण के नाम पर कल कारखानों व परमाणु रियेक्टरों का निर्माण रोकने के लिए अनशन करने लगे, तो क्या होगा। अब इन बातों से उनके कुतर्कों का कोई भी अनुमान लगा सकता है।

निश्चय ही किसी भी व्यक्ति या समूह को संसदीय या लोकतांत्रिक व्यवस्था के अपहरण की इजाजत नहीं दी जा सकती, लेकिन यहां अहम सवाल यह है कि इस देश के संविधान, संसद व लोकतंत्र का अपहरण किसने कर रखा है। व्यक्ति पूजा किसकी हो रही है। भक्ति मार्ग का अनुसरण सत्तारूढ़ दल कर रहा है या कोई और।

अम्बेडकर ने जो चेतावनी दी थी, वह आदर्श संसदीय स्थिति के लिए थी। आज का सच तो यह है कि देश की संसदीय व्यवस्था का अपहरण हो चुका है। आज की असली समस्या देश के संविधान, संसद तथा लोकतंत्र को अपहर्ताओं के चंगुल से मुक्त कराने की है। आज देश की सबसे बड़ी पार्टी सबसे अधिक भक्तिमार्गी है। यहां उसके एक सर्वोच्च देवता हैं, उनका परिवार है और उनके गणधर, दरबारियों का दल है। बाकी सब कीर्तनिया हैं, जो नाम जप और आरती-भोग में लगे रहते हैं और नित्य प्रसाद की आकांक्षा में मंदिर के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं।

इन पंक्तियों के आपके पास पहुंचने तक हो सकता है कि अन्ना हजारे का 12 दिनों से चला आ रहा अनशन समाप्त हो गया रहे। शायद वह संसद की अपील मान लें। वैसे भी यह अनशन अब उन्हें तोड़ ही देना चाहिए, क्योंकि इससे जनशक्ति के नवजागरण का जितना काम हो सकता था, हो गया है। अब इसके बाद उन्हें स्वस्थ होकर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई शुरू करनी चाहिए। वह लड़ाई निश्चय ही लंबी होगी, लेकिन उसके लिए अब जमीन तैयार हो चुकी है। देश में वास्तविक जनसापेक्ष लोकतंत्र की स्थापना करनी है, तो हमें नया संविधान और नई राजनीतिक प्रणाली विकसित करनी होगी। इसके लिए हमें ब्रिटिश उत्तराधिकार के बोझ से बाहर निकलकर अपनी जनकेंद्रित व्यवस्था लागू करनी होगी।

28/08/2011

बुधवार, 23 जून 2010

लोग केवल एंडर्सन के पीछे क्यों पड़े हैं ?




भोपाल गैस दुर्घटना के दायित्व से एंडर्सन को मुक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे इसका मुख्य दोषी भी करार नहीं दिया जा सकता। मुख्य दोषी यदि कोई है, तो वह यूनियन कार्बाइड की भारतीय इकाई के अध्यक्ष केशव महेंद्र और मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, जिनकी आपराधिक लापरवाही से यह दुर्घटना हुई। लेकिन प्रायः सारे लोग एंडर्सन के पीछे पड़े हैं, क्योंकि वह विदेशी है और उसकी ओट में सारे देशी लोगों के पाप छिपाए जा सकते हैं। एंडर्सन को वापस भेजना नहीं उसे गिरफ्तार किया जाना गलत कदम था। दुर्घटना के बाद भारत आना उसकी कोई बाध्यता नहीं थी। वह संवेदना व सहानुभूतिवश यहां आया था, लेकिन गिरफ्तारी ने सारा मामला ही बदल दिया। वर्तमान कानूनी दायरे में एंडर्सन को भारत वापस बुलाना लगभग असंभव है, इसलिए बेहतर है कि भारत सरकार, राहत, पुनर्वास, चिकित्सा, पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान दे और मुआवजे की राशि को यथार्थपरक बनाए, जिससे पीड़ितों को शांति मिले, क्योंकि अब 25 साल बाद दोषियों को उचित सजा दिलाना उसके वश का काम नहीं।





बुरा जो देखन मैं चला बुरा न दीखा कोय
जो घट सौधों आपना तो मुझसा बुरा न कोय

कबीरदास की यह वाणी तो संतवाणी है, जो अध्यात्मिक यथार्थ की ओर संकेत करती हैं, किंतु अपने देश की राजनीतिक स्थिति पर यदि दृष्टि डाली जाए, तो वह भी कमोबेश हमें ऐसी ही नजर आएगी। अपने देश की यह प्रवृत्ति बहुत पुरानी है कि अपना दोष मढ़ने के लिए किसी दूसरे का गला या सिर ढूंढ़ लिया जाए। अपने देश की सांप्रदायिकता की समस्या हो, जातिवाद की समस्या हो, सांस्कृतिक पतन की समस्या हो, हम इस सबके लिए विदेशियों को खासतौर से अंग्रेजों, यूरोपियनों व अमेरिकियों को आसानी से जिम्मेदार ठहरा देते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी सब दूध के धोए, पवित्र देव पुरुष हैं और सारे पाप की खान हम स्वयं हैं, लेकिन सच यही है कि विदेशियों ने केवल हमारे दोषों व दुर्बलताओं का लाभ उठाया। उन्होंने हमें ईमानदार से बेईमान व वीर से कायर नहीं बनाया, बल्कि हमारे भीतर जो बेईमानी व कायरता थी, उसका अपने लिए इस्तेमाल किया। यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन के भोपाल कारखाने और दिसंबर 1984 में हुई उसकी दुर्घटना तथा उसके बाद की अब तक की त्रासदी की कहानी भी यही है। 1984 से आज तक हम अमेरिकी बहुराष्ट्र्ीय कंपनी यू.सी.सी.(यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन, अमेरिका)के पूर्व अध्यक्ष व मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडर्सन के पीछे पड़े हैं, लेकिन हमारी अपनी सरकारों, अपने राजनेताओं, अपने अफसरों व अपने न्यायाधीशों के अपराधों की तरफ हमारी कोई नजर नहीं है। यह कहने का मतलब भी एंडर्सन का बचाव करना या उसे निर्दोष साबित करना नहीं, बल्कि यह बताना है कि हमारे अपने लोग उसके मुकाबले कहीं अधिक दोषी हैं।

7 जून 2010 को भोपाल के मुख्य न्यायिक अधिकारी की अदालत से दुर्घटना के 25 लंबे वर्षों बाद सुनाये गये फैसले के बाद से रहस्यों की रोज एक न एक नई परत खुलती जा रही है। अब सारी कवायद अपने-अपने राजनीतिक बचाव की चल रही है। भला हो उस अदालत व कानून का, जिसने दोषियों को इतनी कम सजा सुनाई कि लगभग पूरा देश गुस्से से भड़क उठा। जिस दुर्घटना में 20 से 25 हजार तक लोग मारे गये और करीब 6 लाख उत्पीड़ित हुए, उसके दोषियों को मात्र दो साल के कारावास की सजा और उस पर भी तत्काल जमानत। किसी को एक मिनट के लिए भी जेल जाने की नौबत नहीं। अदालत में मात्र एक-दो घंटे की पेशी और फिर अपने क्लब या गोल्फ के मैदान में जाकर मौज मनाने की फुरसत।

7 जून के फैसले के बाद जब प्रायः पूरे देश के मीडिया में हंगामा खड़ा हुआ, तो पहले तो एक दूसरे पर दोषारोपण का दौर चला, फिर जब ऐसा लगा कि इससे भड़की आग की सारी आंच केंद्र सरकार व कांग्रेस पार्टी की तरफ आ रही है, तो उसके बचाव के विशेष प्रबंध किये जाने लगे। केंद्र सरकार ने सारे मामले के एकमुश्त निपटारे के लिए 9 सदस्यों की एक मंत्रिमंडलीय समिति गठित की, जिसके अध्यक्ष गृहमंत्री पी. चिदंबरम बनाए गये। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मंत्रियों के इस समूह को आदेश दिया कि वह फौरन अपनी बैठकें शुरू करें और 10 दिन के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करे, जिससे इस मामले में तत्काल कार्रवाई शुरू की जा सके। बीते शुक्रवार को इस दल की पहली बैठक हुई। तय हुआ कि इसकी रोज बैठक होगी और 4 दिन के अंदर यानी 10 दिन की अवधि पूरी होने के 2 दिन पहले ही सोमवार तक उसकी रिपोर्ट दे दी जाएगी।

शुक्रवार को यह बैठक अभी शुरू ही होने वाली थी कि उसके पहले ही योजना आयोग ने भोपाल गैस पीड़ितों की सहायता के लिए 982 करोड़ रुपये की विशेष धनराशि जारी करने की घोषणा की। यह राशि इस मामले पर विचार के लिए गठित मंत्रिसमूह की संस्तुति के बाद राज्य सरकार को दी जाएगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश की राज्य सरकार ने भोपाल गैस पीड़ितों के सहायतार्थ एक ‘एक्शन प्लान’ 2008 में योजना आयोग के समक्ष पेश किया था, लेकिन आयोग ने उस समय उसे रद्द कर दिया था और कहा थ कि यह प्रस्ताव तर्कसंगत नहीं है, इसलिए इसके लिए कोई धन आवंटित नहीं किया जा सकता, मगर अब फटाफट उसी ‘एक्शन प्लान’ के अनुसार 982 करोड़ की धनराशि दिये जाने की घोषणा कर दी गयी। एक्शन प्लान में राज्य सरकार ने कहा था कि इस दुर्घटना में 16,000 लोग मरे हैं, 5000 से अधिक औरतें विधवा हुई हैं, लाखें बीमार हैं, इसलिए उनकी चिकित्सकीय, आर्थिक, सामाजिक तथा पर्यावरणीय सहायता के लिए बड़ी धनराशि की जरूरत है। यह प्रस्ताव शायद इसलिए भी रद्द कर दिया गया कि राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वार पेश किया गया था। धन केंद्र सरकार देती और उसका श्रेय राज्य सरकार को मिलता, इसलिए प्रस्ताव ही रद्द कर दिया गया।

मंत्रियों के समूह की पहले दिन बैठक में शामिल मंत्रियों की भावनाओं को पढ़ने वाली अखबारी रिपोर्टों में कहा गया है कि प्रायः सभी मंत्रियों की एक ही चिंता थी कि ‘कुछ तो करना ही पड़ेगा और वह भी जल्दी।’ चिदंबरम ने बैठक के बाद पत्रकारों को बताया कि ‘हम लोग पीड़ितों के प्रति अत्यंत सहानुभूतिपूर्वक अधिकतम जो कुछ संभव हो सकेगा वह करेंगे। पूरे मुद्दे को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा गया है। एक तो कानूनी मुद्दा है, जिसके अंतर्गत यह देखा जाएगा कि क्या इस आपराधिक मामले को फिर से खोला जा सकता है और क्या यूनियन कार्बाइड के पूर्व अध्यक्ष एंडर्सन को भारत लाया जा सकता है। दूसरा हिस्सा मुआवजे एवं पर्यावरण की साफ-सफाई से संबंधित है। इसके अंतर्गत मुआवजे की राशि बढ़ाने के अलावा विशैले कचरे की सफाई, भूगर्भ जल का परिशोधन तथा दूषित हुए इलाके में शुद्ध पेयजल की आपूर्ति आदि का मामला है। इसके लिए कानून, स्वास्थ्य, रसायन व पर्यावरण मंत्री तथ उनके विभाग रातदिन श्रम करने में लगे हैं।

विधि मंत्रालय ने एक विस्तृत नोट तैयार किया है, जिसमें मंत्रिसमूह को सलाह दी गयी है कि दोषियों की सजा बढ़ाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक ‘क्यायेरेटिव पिटीशन’ (संशोधन याचिका) दायर की जाए तथा इस कानूनी संभावना का भी पता लगाया जाए कि क्या एंडर्सन को वापस बुलाया जा सकता है। स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भी इस बीच अपने स्वास्थ्य अधिकारियों की कई बैठकें की तथा आई.सी.एम.आर. (इंडियन कौंसिल आॅफ मंडिकल रिसर्च) के वैज्ञानिकों के साथ भी मुलाकातें की। वह अब व्यक्तिगत रूप से यह जानकारी हासिल करने में गे हैं कि ‘मिथाइल आइसो सायनाइट’ (मिक) जैसी विशैली गैस का अब तक क्या प्रभाव पड़ा है, विशेषकर बच्चों और गर्भवती स्त्रियों को इससे क्या नुकसान पहुंचा है। भोपाल में कैंसर के रोगियों की संख्या वृद्धि में इसकी क्या भूमिका है तथा पीड़ितों का इलाज करने वाले अस्पतालों की वर्तमान स्थिति क्या है। मंत्रिसमूह की इस बैठक में रसायन एवं उर्वरक विभाग के सचिव विजय चटर्जी ने दुर्घटना के बाद से अब तक की विस्तृत जानकारी दी। अब तक सारी कानूनी कार्रवाई, मुआवजा साफ-सफाई तथा चिकित्सा के मोर्चे पर अब तक जो कुछ हुआ, वह सारी जानकारी उन्होंने दी, क्योंकि मूलतः इस दुर्घटना का सारा मामला उनके विभाग से ही संबंधित था। उन्होंने यह भी बताया कि कचरा हटो का दायित्व ‘डाउ’ कंपनी पर डालने के लिए जबलपुर की हाईकोर्ट पीठ में मामला चल रहा है। करीब 350 मीट्र्कि टन का यह कचरा अंकलेश्वर (गुजरात) भेजा जाने वाला था, लेकिन गुजरात ने इसकी अनुमति नहीं दी। जब रामविलास पासवान केंद्र में रसायन व उर्वरक मंत्री थे, तो उन्होंने यह कचरा हटाने के लिए डाउ कंपनी से 100 करोड़ रुपये की मांग की थी। तो न तो उसने पैसे दिये न कचरा हटा और कचरा हटाने के दायित्व का विवाद हाईकोर्ट में लटका हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि दुर्घटना के कारण प्रदूषित पर्यावरण के सुधार के लिए सीएसआईआर (केंद्रीय वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान संस्थान) शोधकार्य कर रहा है, जिसकी रिपोर्ट इसी महीने आने वाली है।

9 मंत्रियों के समूह (गृहमंत्री पी. दिंबरम, वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, विधि मंत्री वीरप्पा मोइली, भूतल परिवहन मंत्री कमलनाथ, स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद, शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी, रसायन एवं उर्वरक मंत्री एम.के. अलागेरी, पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश, पर्यटन मंत्री कुमारी शैलजा, इसके अलावा अतिरिक्त म.प्र. के राहत व पुनर्वास मंत्री बाबूलाल गौर स्थाई आमंत्रित सदस्य हैं) की इस बैठक में इन मंत्रियों के अलावा मंत्रिमंडलीय सचिव (कैबिनेट सेक्रेटरी) के.एम. चंद्रशेखर, गृहसचिव जी.के. पिल्लइ तथा विदेशा सचिव निरूपमा राव भी भग ले रही हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस मंत्रिमंडलीय समूह में शामिल पी. चिदंबरम व कमलनाथ ने 2006-07 में जब वे क्रमशः वित्त व वाणिज्य मंत्री थे, राय दी थी कि भोपाल गैस दुर्घटना से दूषित हुए इलाके से कचरा हटाने तथ उस स्थल को विषैले प्रभाव से शुद्धि के लिए एक ट्र्स्ट (साइड रेमिडिएशन ट्र्स्ट) बनाया जाए, जिसमें भारतीय कार्पोरेट क्षेत्र की कंपनियां अंशदान करें और उस धन से सफाई का कार्य किया जाए। तब वे न तो इसकी जिम्मेदारी ‘डाउ’ कंपनी पर भी डालने के लिए तैयार नहीं थे, जिसने यू.सी.सी. को खरीद लिया है। उनके ऐसे सुझावों के कारण न तो कोई कंपनी इस काम के लिए आगे आयी और न सरकार ने ही यह काम अपने हाथ में लिया। ‘डाउ’ कंपनी का कहना है कि उसका भोपाल में कभी कोई कारोबार नहीं था, इसलिए वह इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। इसके अतिरिक्त भारत सरकार ने स्वयं उसे यह क्लीन चिट दी है कि यू.सी.आई.एल. (यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड) भोपाल की दुर्घटना का कोई दायित्व उसके उपर नहीं है। ‘डाउ’ के वकील तथा कांग्रेस के वर्तमान प्रवक्ता अभिषेक मनु संघवी ने भी उस समय कंपनी को यही सलाह दी थी कि भोपाल में साफ-सफाई का कोई दायित्व जब यू.सी.सी. पर ही नहीं था, तो वह उसके उपर कैसे आ सकता है। भारत सरकार ने 1989 में यू.सी.सी. से 47 करोड़ डॉलर में अंतिम समझौता कर लिया था। सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से यह समझौता हुआ था, जिसमें यू.सी.सी. को सारे दायित्वों से मुक्त कर दिया गया था और केंद्र सरकार ने उसके विरुद्ध दायर सारे दीवानी (सिविल) व फौजदारी (क्रिमिनल) मामले वापस ले लिये थे। इसके अंतर्गत कारखाना स्थल का कचरा हटाये बिना उसे वह जमीन हस्तांतरित करने का अधिकार भी दे दिया गया था।

दिसंबर 1984 की दुर्घटना के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की तरफ से देश की प्रसिद्ध न्यायिक सेवा कंपनी ‘जे.बी. दादाचांदी एंड कं.’ की सेवाएं ली थीं। इस कंपनी के नानी पालखीवाला, फालीनारीमम व अनिल दीवान जैसे देश के शीर्ष वकीलों की सेवाएं प्राप्त की थी। भारत सरकार के पूर्व एटार्नी जनरल सोली सोराब जी का अकेला ऐसा नाम है, जो इस लड़ाई में यूनियन कार्बाइड की तरफ से खड़े होने से इनकार कर दिया। कंपनी ने जब सोली सोराब जी से संपर्क किया, तो उन्होंने साफ कह दिया कि इस मामले में पीड़ितों को कानूनी सहायता की अधिक जरूरत है, वह उनके खिलाफ अमेरिकी कंपनी के पक्ष में अदालत में नहीं खड़े हो सकते।

इस कांड में 1984 के बाद जितने आंदोलन व विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उसमें सर्वोच्च खलनायक के रूप में एंडर्सन का नाम ही सबसे उपर है। 20 से 25 हजार तक की मौतों का जिम्मेदार अकेले उसे ही ठहराया जाता रहा है। अब तक शायद ही कोई ऐसा पोस्टर दिखायी दिया हो, जिस पर यू.सी.आई.एल. के अध्यक्ष केशव महेंद्र का फोटो छपा हो। प्रायः पूरे देश की चिंता है कि वह अमेरिकी यहां से कैसे भाग निकला। इसकी जांच कराने की मांग पर अधिक जोर है कि उसे देश से भगाने में किसने मदद की। कोई इसकी जांच कराने की मांग नहीं कर रहा है कि यू.सी.सी. को भोपाल में शहर के बीच कारखाना लगाने का लाइसेंस कैसे मिला। इस कारखाने की डिजाइन दोषपूर्ण थी और सुरक्षा के पर्याप्त साधन नहीं थे, तो इसे उत्पादन की अनुमति कैसे मिली। और दुर्घटना हुई तो उसके प्रत्यक्ष जिम्मेदार अधिकारियों को छोड़कर लोग केवल एंडर्सन के पीछे भागते क्यों नजर आए?

अब पता चल रहा है कि इस कारखाने की स्थापना का लाइसेंस इंदिरा गांधी के शासन में आपातकाल के दौरान दिया गया। इस मामले में कोर्ट में दायर की गयी सी.बी.आई. की एक एफिडेविड (शपथपत्र) के अनुसार यू.सी.सी. ने 1 जनवरी 1970 में 5000 टन कीटनाशक बनाने की क्षमता वाला कारखाना स्थापित करने के लिए लाइसेंस दिये जाने का आवेदन पत्र केंद्र सरकार के उद्योग मंत्रालय -जो उस समय औद्योगिक विकास मंत्रालय कहा जाता था- के समक्ष प्रस्तुत किया। यह आवेदन 5 साल तक पड़ा रहा। तत्कालीन उद्योग विकास मंत्रालय के अधिकारी व संबंधित मंत्री यह लाइसेंस देने के पक्ष में नहीं थे। अतः 31 अक्टूबर 1975 को यह लाइसेंस मिल गया। लाइसेंस कैसे और किसके सहयोग से मिला, वस्तुतः यह भी एक जांच का विषय है। इस शपथ पत्र में यह भी जिक्र है कि उस समय के एक अंतर्राष्ट्र्ीय पर्यावरण रक्षक संगठन ‘टाक्सिक वॉच एलायंस’ ने कहा था कि भारत में आपातकाल न लगता, तो भोपाल में गैस कांड भी न होता। इस संगठन के एक सदस्य गोपाल कृष्ण ने भी कहा है कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि यह लाइसेंस कैसे मिला। औद्योगिक विकास मंत्रालय के तत्कालीन उपनिदेशक आर.के. शाही (जो बाद में योजना आयोग के उपसलाहकार बने) के अनुसार लगभग पूरा विभाग यह लाइसेंस देने के खिलाफ था। वास्तव में यह भी जांच का विषय है कि यू.सी.सी. को भोपाल में इस कारखाने को लगाने के लिए इतनी बड़ी सरकारी जमीन कैसे दी गयी। लाइसेंस के आवेदन में यह साफ लिखा गया था कि कीटनाशक का निर्माण के लिए मिथाइल आइसोसायनाइट (मिक) गैस का इस्तेमाल किया जाएगा। क्या इसके भयानक विषैलेपन का अहसास किसी को नहीं था? यहां यह भी उल्लेखनीय है कि केंद्रीय वैज्ञानिकों का दल जब यूसीसी के वर्जीमियां प्लांट को देखने के लिए गया, तो उसे प्लांट के भीतर जाने की अनुमति नहीं दी गयी।

आश्चर्य है कि देश के तमाम लोग अन्य सारी बातों को छोड़कर इस बात के पीछे पड़े हैं कि एंडर्सन 1984 में जब भारत आया, तो उसे बाहर क्यों जाने दिया गया। वास्तव में एंडर्सन की तो इसके लिए प्रशंसा की जानी चाहिए थी कि इस भयावह दुर्घटना की खबर पाकर स्थिति का स्वयं आकलन करने के लिए उसने भारत आने का निश्चय किया। उस समय देश में आम चुनाव होने वाले थे और राजनीतिक माहौल गर्म था, इसलिए एंडर्सन ने पहले से अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करना जरूरी समझा। जैसी खबरें मिल रही हैं, उसके अनुसार उसने भारत स्थित अपने दूतावास से संपर्क किया। उस समय दूतावास के उपप्रधान गार्डन स्ट्र्ीब ने इस बारे में भारत सरकार से संपर्क किया। उसने विदेश सचिव से संपर्क किया होगा। चूंकि मामला गृहमंत्रालय से संबद्ध था, इसलिए विदेश विभाग ने गृहविभाग से संपर्क किया गया। उस समय गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव थे जो बाद में प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री उस समय चुनाव प्रचार के सिलसिले में राजधानी से बाहर थे। एंडर्सन को देश में सुरक्षा की गारंटी देने के लिए गृहमंत्री स्वयं सक्षम थे, लेकिन उन्होंने इस बारे में प्रधानमंत्री से संपर्क न किया हो यह कम ही संभव है। केंद्र सरकार की सुरक्षा की गारंटी पाकर एंडर्सन भोपाल पहुंचे। वह दुर्घटनास्थल पर जाने की तैयारी में थे। भोपाल के कलक्टर मोती सिंह ने स्वयं कहा है कि जब वह हवाई अड्डे पहुंचे, तो एंडर्सन हाथ में गैस मास्क लिये टहल रहे थे।

एंडर्सन को सपने में भी यह आशंका नहीं रही होगी कि वहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। भोपाल में दुर्घटना के बाद पुलिस में जो एफ.आई.आर. दर्ज हुई थी, उसमें एंडर्सन का भी नाम था, इसलिए पुलिस अधीक्षक ने उन्हें कैद में ले लिया। एंडर्सन ने केंद्र सरकारक को संपर्क किया होगा। निश्चय ही इस पर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को केंद्र से निर्देश मिला होगा कि एंडर्सन को पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दी गयी है, इसलिए जैसे भी हो, उन्हें फौरन दिल्ली वापस भेजो। एंडर्सन ने दिल्ली में गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव से तथा राष्ट्र्पति जैल सिंह से मुलाकात की। उन्होंने तत्कालीन विदेश सचिव महाराज कृष्ण रसगोत्रा से भी मुलाकात की। शायद धन्यवाद देने के लिए उन्होंने ये मुलाकातें की।

गार्डन स्ट्र्ीव ने अपने एक बयान में इस बात की पुष्टि की है कि केंद्र सरकार के निर्देश पर एंडर्सन भोपाल से सुरक्षित दिल्ली वापस लाए गये और वहां से उन्हें न्यूयार्क भेजा गया।

तत्कालीन विदेश सचिव रसगोत्रा ने भी सी.एन.एन. आईबीएन न्यूज चैनल पर करण थापर के साथ एक साक्षत्कार में स्वीकार किया कि केंद्र के निर्देश पर उन्हें गिरफ्तारी से मुक्त कराकर वापस भेजा गया। उनकी राय में यह आवश्यक था। यदि ऐसा न किया जाता, तो उसके लिए केंद्र सरकार पर अंतर्राष्ट्र्ीय स्तर पर विश्वास हनन का आरोप लगता।

यहां यह ध्यान देने की बात है कि दुर्घटना के बाद एंडर्सन का भारत आना आवश्यक नहीं था। संवेदना व सहानुभूतवश वह यहां आया था। राहत व मुआवजे के लिए उसकी मदद ली जानी चाहिए थी। रसगोत्रा के अनुसार भी एंडर्सन दुर्घटना का उत्तर दायित्व महसूस करके ही यहां आया था और पीड़ितों की अधिकतम सहायता करना चाहता था। अब यदि दुर्घटना के अपराध की जिम्मेदारी ही तय करनी हो, तो उसकी सर्वाधिक जिम्मेदारी यू.सी.आई.एल. के अध्यक्ष व अन्य अधिकारियों पर जाती है। एंडर्सन पर नहीं। उसके लिए मध्य प्रदेश की सरकार व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जिम्मेदार ठहराये जा सकते हैं, जिन्होंने असुरक्षा की शिकायतों पर स्वयं कारखाने का दौरा करके यहा प्रमाण-पत्र दिया कि वहां कोई समस्या नहीं है, बल्कि सब कुछ ठीक-ठाक है। अर्जुन सिंह ने तो एंडर्सन से भी अधिक गैरजिम्मेदारी दिखायी। एंडर्सन अमेरिका से चलकर भोपाल पहुंचा, लेकिन अर्जुन सिंह दुर्घटना की सुबह अपने चुरहट महल में रहने चले गये कि कहीं गैस का कोई प्रभाव उन तक न पहुंच पाए।

वास्तव में केंद्र सरकार की गलती यह नहीं है कि उसने एंडर्सन को वापस भेजा, बल्कि गलती यह है कि आज के केंद्रीय नेताओं में इसे स्वीकार करने का साहस नहीं है, क्योंकि पूरे देश की यह मानसिकता है कि यदि किसी मामले में कोई विदेशी हाथ लग जाए, तो उसकी ओट में अपने सारे पाप छिपा लो। अर्जुन सिंह ने भी लंबे मौन के बाद अब अपनी जबान खोल दी है। उनका साफ कहना है कि एंडर्सन को दिल्ली भेजवाने से उनका कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने विस्तार से तो कुछ नहीं बताया, लेकिन शनिवार को उन्होंने एंडर्सन के मामले से अपनी गर्दन छुड़ाकर उसे केंद्र के उूपर डाल दिया।

अब इसका निपटारा 10 सदस्यीय ‘मंत्री समूह’ को करना है। एंडर्सन का मामला राज्य सरकार के सिर थोपने की केंद्रीय नेताओं की कोशिश नाकाम हो गयी है। देश का कोई एक व्यक्ति भी यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि बिना केंद्र की अनुमति के एंडर्सन देश के बाहर जा सकता है। इसलिए मंत्रिसमूह को अब एंडर्सन का मसला भी हल करना है। अपने नेताओं, अफसरों तथा केशव महेंद्र जैसे भारतीय उद्यमियों का बचाव करने के लिए एंडर्सन को ‘स्केप गोट’ बनाना आवश्यक है। देश भर से यह मांग उठ रही है कि भोपाल गैस मामले को दुबारा खोला जाए और ताजा आंकड़ों के आधार पर नया आरोप पत्र दायर किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय तथा प्रधानमंत्री के पास ऐसे अनुरोध वाले करीब 76 हजार पुत्र पहुंचे हैं और आते भी जा रहे हैं। देश के 69 सांसदों ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस मामले में अदालती कार्रवाई दुबारा शुरू करने को कहा है।

इस मामले में अब केंद्र और मध्य प्रदेश की राज्य सरकार के बीच प्रतिस्पर्धा है। मध्य प्रदेश सरकार भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में ‘क्योरेटिव’ याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है। केंद्रीय विधि मंत्रालय ने भी मंत्रियों के समूह को ऐसी ही याचिका दायर करने की सलाह दी है।

खैर, अब अधिक देर नहीं है। 10 सदस्यीय मंत्रिसमूह कल सोमवार या मंगलवार तक अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को दे देगा, जिसमें राहत, पुनर्वास व मुआवजे बढ़ाने की संस्तुतियों के साथ कुछ कानूनी संस्तुतियां भी होंगी, जिसमें एंडर्सन को भारत बुलाने की संभावनाएं तलाशने की बात भी होगी। जैसे भी हो देश भर में भड़के असंतोष को शांत करने की कोशिश की जाएगी। भोपाल गैस त्रासदी के असली दोषी देश के भीतर हैं, बाहर नहीं। मुश्किल यही है कि इन भीतरवालों को कोई सजा नहीं मिल पाएगी। लेकिन इस सारे हंगामें का लाभ गैस पीड़ितों को अवश्य मिलेगा। कम से कम उनके राहत और पुनर्वास का प्रबंध बेहतर हो जाएगाअ और संभवतः मुआवजा राश् िभी कुछ हजार से बढ़कर एक-दो लाख हो जाए।(20.6.2010)

यह राजनीति और न्याय की त्रासदी

भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल से अधिक गुजर गये हैं। एक ऐसी त्रासदी जिसकी कल्पना से भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन इन 25 वर्षों में इसे लेकर जो राजनीतिक व न्यायिक प्रक्रिया का खेल खेला गया, वह और भी अधिक त्रासद है। इतना बड़ा अपराध, जिसमें 22 हजार से अधिक लोग मारे गये और 6 लाख से अधिक पीड़ित हुए, उसके लिए किसी को एक घंटे की भी सजा नहीं। कहने को 7 लोगों को 2-2 वर्ष के कारावास की सजा दी गयी, लेकिन कोई एक मिनट के लिए भी जेल नहीं गया। तमाम लोग एंडर्सन के पीछे पड़े हैं, लेकिन भोपाल कांड के असली अपराधी तो इस देश के ही हैं। और एंडर्सन को भी न्याय की पहुंच से दूर पहुंचाने वाले भी इस देश के ही लोग हैं। आखिर उनके लिए सजा का कौनसा प्रावधान है।





अब से करीब 26 वर्ष पूर्व भोपाल मेंे एक भयावह औद्योगिक दुर्घटना हुई थी (जो पूरी दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है) जिसमें 22000 से अधिक लोग (अधिकृत आंकड़ा 15134) मारे गये थे और करीब 6 लाख लोग प्रभावित हुए थे, यानी विभिन्न स्तर की विकलांग जिंदगी जीने के लिए मजबूर हुए थे। इनमें भी तब से हर दिन औसतन एक व्यक्ति की उस दुर्घटना के प्रभाव से मौत हो रही है।

2-3 दिसंबर 1984 की रात मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के शहरी इलाके में स्थित ‘यूनियन कार्बाइड इंडिया लि. (यूसीआईएल)’ के कीटनाशक कारखाने का अत्यंत विषैली गैस ‘मिथाइल आइसो साइनेट’ (मिक) से भरा टैंक फट गया था और इस घातक गैस ने शहर के एक बड़े भाग को अपनी चपेट में ले लिया था। पहले ही दिन 4000 से अधिक लोग मारे गये और फिर तो मौतों का सिलसिला चल निकला, जिसके आंकड़े 22 हजार की संख्या भी पार कर गये।

यह ऐसी दुर्घटना थी कि पूरा देश दहल उठा। उस समय केंद्र और राज्य दोनों ही स्थानों पर कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। केंद्र में राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और राज्य में ठाकुर अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री। देश में उपचुनाव होने वाले थे। प्रधानमंत्री राजीव गांधी चुनाव प्रचार अभियान पर थे। वह प्रचार अभियान बीच में छोड़कर भोपाल आए और पीड़ितों से मिले। 3 दिसंबर को नगर के हनुमान गंज पुलिस स्टेश्न पर घटना की प्राथमिक रिपोर्ट पुलिस ने दर्ज की, जिसमें यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडर्सन सहित 14 लोगों के उूपर आरोप दर्ज किया गया। कुछ ही दिनों के भीतर इस पूरे कांड की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सी.बी.आई.न) को सौंप दी गयी। दुर्घटना की खबर पाकर स्थिति का जायजा लेने के लिए यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन (यू.सी.सी.) के अध्यक्ष वारेन एंडर्सन 7 दिसंबर को प्रातः भोपाल पहुंच। वह दुर्घटना स्थल पर जाकर स्थिति का जायजा लेना चाहते थे, किंतु भोपाल के जिलाधिकारी (कलक्टर) मोती सिंह और पुलिस अधीक्षक ने हवाई अड्डे पर पहुंचकर उन्हें सूचित किया कि उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। उनके साथ यूसीआईएल के अध्यक्ष केशव महेंद्र तथा उपाध्यक्ष विजय प्रकाश गोखले भी थे। उन तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन तीनों के नाम एफ.आई.आर. में थे। उन्हें गिरफ्तार करके किसी सरकारी कार्यालय में नहीं, बल्कि यूनियन कार्बाइड के अतिथि गृह (गेस्टहाउस) में ले जाया गया। बताया जाता है कि एंडर्सन के कमरे में टेलीफोन था, जिससे उन्होंने अपने संपर्क वाले उच्चाधिकारियों को संपर्क किया। किसे संपर्क किया, यह नहीं मालूम, लेकिन उसके बाद फौरन उनकी रिहाई की प्रक्रिया शुरू हो गयी और उन्हें ससम्मान वापस दिल्ली भेजने का प्रबंध किया जाने लगा। उन तीनों को वहीं फटाफट गेस्टहाउस में ही जमानत हो गयी और एंडर्सन को राज्य सरकार के विशेष विमान से अपराह्न दिल्ली के लिए रवाना कर दिया गया। उनसे कहा गया कि उनका यहां रहना ठीक नहीं है, इसलिए वे फौरन निकल जाएं। एंडर्सन दिल्ली पहुंचने के शायद तुरंत बाद न्यूयार्क के लिए रवाना हो गये। उनके साथ उस विशेष विमान में कोई और गया या नहीं, इसकी सही-सही जानकारी नहीं है। केशव महेंद्र और विजय प्रकाश गोखले की आगे की कहानी का भी पता नहीं है।

अब सबसे अहम सवाल यह उठता है कि इतनी भयावह दुर्घटना के जिम्मेदार अधिकारियों को इस तरह गिरफ्तार करने के बाद क्यों छोड़ दिया गया ? और छोड़ ही नहीं दिया गया, उन्हें राज्य सरकार के किसी विशेष राजकीय अतिथि की तरह राज्य सरकार के विमान से दिल्ली भेजा गया और कभी वापस न लौटने के लिए न्यूयार्क रवाना करा दिया गया। यह सब कैसे हुआ ? किसके आदेश से हुआ? वह कौन व्यक्ति है, जिसे अपने देश के हजारों पीड़ित नागरिकों के बजाए उसकी सुरक्षा की चिंता अधिक थी, जो इन हजारों लोगों की मौता और लाखों लोगों की असीमित पीड़ा का उत्तरदायी था?

हनुमानगंज पुलिस थाने के प्रभारी सुरेंद्र सिंह के अनुसार दुर्घटना के बाद उसके जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध भारतीय दंड विधान संहिता (आई.पी.सी.) की धारा 304 (ए), 120 (बी) 278, 284, 426 व 429 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया था। इनमें से 304 (ए) गैरजमानती है। यानी इसकी जमानत पुलिस नहीं ले सकती। खबर है कि एंडर्सन व महेंद्र को जमानत दिलाने के लिए एफ.आई.आर. में से 304 (ए) को हटवा दिया गया -बाद में आगे चलकर सी.बी.आई. ने एंडर्सन, महेंद्र और गोखले पर 304 (प्प्) लगाने की संस्तुति की थी, किंतु उस समय सर्वोच्च न्यायालय ने से 304 (ए) में बदल दिया था। 304 (प्प्) में यदि मुकदमा चलता, तो अपराध सिद्ध होने पर अभियुक्तों को अधिकतम 1 0 वर्ष कैद की सजा हो सकती थी, किंतु 304 (ए) में अधिकतम केवल 2 साल की सजा तथा 1 लाख जुर्माना करने का प्रावधान है और उसमें भी दोषी को तत्काल जमानत भी मिल सकती है। मतलब यह कि दो साल के कारावास की सजा मिल भी जाए, तो अभियुक्त को जेल न जाना पड़े और फौरन मामूली मुचलके पर जमानत मिल जाए। गत 7 जून को वही हुआ कि भोपाल के सत्र न्यायाधीश ने जिन 7 लोगों को 2-2 साल की कैद की सजा सुनाई, उन सबको तत्काल जमानत भी दे दी और वे सजा सुनकर आराम से अपने अपने घर चले गये। कोई भी पूछ सकता है कि किसके आदेश पर यह सारी कार्रवाई हुई। भोपाल के जिलाधिकारी मोती सिंह का कहना है कि उन्हें राज्य के मुख्य सचिव ब्रह्मस्वरूप से निर्देश प्राप्त हुआ थ कि एंडर्सन की तत्काल रिहाई का इंतजाम करके उन्हें वापस भेजना है। उनके ही निर्देश पर पुलिस ने आगे की कार्रवाई की और पुलिस अधीक्षक स्वराजपुरी ने पुलिस के स्तर की सारी व्यवस्था की। मुख्य सचिव ब्रह्मस्वरूप का निधन हो चुका है। इसलिए उनसे किसी बात की पुष्टि नहीं हो सकती, किंतु ब्रह्मस्वरूप के परिवार के लोग मोती सिंह के बयान से बहुत आहत हैं। ब्रह्मस्वरूप के एक संबंधी डॉ. रामस्वरूप का कहना है कि मोती सिंह राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खास आदमी हैं, इसलिए वह अर्जुन ंिसंह को बचाने के लिए सारे आरोप उस व्यक्ति पर मढ़ रहे हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं है। यदि ब्रह्मस्वरूप ने कोई निर्देश दिया भी होगा, तो वह मुख्यमंत्री अर्जुन ंिसंह के कहने पर ही दिया होगा। एंडर्सन की रिहाई और उन्हें विशेष विमान से बाहर भेजने का कार्य बिना मुख्यमंत्री की अनुमति या बिना उनके निर्देश के नहीं हो सकता। कम से कम राज्य सरकार का विमान तो मुख्यमंत्री की अनुमति के बिना एंडर्सन को लेकर नहीं जा सकता था। उस विशेष विमान के पायलट के अनुसार उस विमान से एंडर्सन दिल्ली ले जाने का संदेश मुख्यमंत्री आवास से आया था। अब इस प्रकरण पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह चुप्पी साधे हुए हैं। उनका कहना है कि वे उचित समय आने पर ही इस बारे में अपना मुंह खोेलेंगे। वास्तव में यहां लाख टके का सवाल यह उठाया जा रहा है कि यूनियन कार्बाइट कार्पोरेशन (अमेरिका) के अध्यक्ष एंडर्सन को गिरफ्तारी से छुड़ाकर देश से बाहर पहुंचाने का काम किसके निर्देश पर हुआ। राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के निर्देश पर या प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निर्देश पर। क्योंकि केवल मुख्य सचिव, जिला अधिकारी या पुलिस अधीक्षक के स्तर पर यह सब नहीं हो सकता। इतना बड़ा कार्य राज्य सरकार का कोई अफसर बिना मुख्यमंत्री के आदेश के नहीं कर सकता। अब प्रश्न है कि यह फैसला क्या अर्जुन सिंह का अपना था या उन्होंने केंद्र सरकार के निर्देश पर यह सब किया। यदि केंद्र सरकार के निर्देश पर एंडर्सन को बाहर भेजने का इंतजाम किया गया, तो इसका पूरा दायित्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सिर जाता है, लेकिन यह सवाल भी कुछ कम गंभीर नहीं है कि क्या मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह या कोई भी दूसरा मुख्यमंत्री ऐसा निर्णय ले सकता है। एंडर्सन एक   अंतर्राष्ट्रीय कम्पनी  का अध्यक्ष था, कोई मध्य प्रदेश का उद्योगपति नहीं। एक अंतर्राष्ट््रीय हैसियत वाले ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तारी से छुड़ाकर देश के बाहर भेजने का काम कोई मुख्यमंत्री भी बिना केंद्र को सूचित किये या बिना उसकी अनुमति लिए नहीं कर सकता। फिर मान लिया जाए कि अर्जुन सिंह ने अपने स्तर पर ही यह सारी कार्रवाई की तो सवाल है कि फिर इस बारे में केंद्र सरकार ने उनसे कोई जवाब क्यों नहीं तलब किया। ऐसा तो नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री सहित किसी केंद्रीय मंत्री को इस गैस दुर्घटना की भयावहता की कोई जानकारी ही न रही हो। फिर केंद्र सरकार इस घटना की ऐसी अनदेखी कैसे कर सकती है।

राजीव गांधी के तत्कालीन प्रधान सचिव रहे पी.सी. एलेक्जेंडर का वक्तव्य इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। एलेेक्जेंडर ने बताया है कि 10 दिसंबर को प्रधानमंत्री के आवास पर बुलायी गयी मंत्रिमंडल की रजानीतिक मामलों की समिति (सी.सी.पी.ए.) की बैठक में भोपाल गैस त्रासदी के राजनीतिक प्रभावों पर विचार किया गया, किंतु इसमें एंडर्सन का कोई जिक्र नहीं आया। उनके वक्तव्य की सबसे खास बात है कि इस बैठक में अर्जुन सिंह भी शामिल थे। केंद्रीय कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की कमेटी की बैठक में कभी कोई मुख्यमंत्री नहीं बुलाया जाता। उसकी उपस्थिति का कोई औचित्य भी नहीं है, किंतु अर्जुन सिंह वहां उपस्थित थे। उनके अनुसार जब वह इस महत्वपूर्ण बैठक के लिए पहुंचे अर्जुन सिंह उसके पहले वहां उपस्थित थे और बैठक के उपरांत उनके जाने के बाद भी वे राजीव गांधी के ही पास थे।

ऐसा समझा जाता है कि राजीव गांधी ने अमेरिकी दबाव में आकर एंडर्सन की रिहाई की व्यवस्था की और इसके लिए मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को कहा, लेकिन राजनीतिक तौर पर दबाव की इस बात कोई सरकार स्वीकार नहीं कर सकती। लेकिन यहां सबसे बड़ी समस्या है कि केंद्र की राजीव गांधी की सरकार खुद भी यह स्वीकार नहीं कर सकती थी कि उसने एंडर्सन को रिहा कराकर बाहर भेजवाया। सच्चाई आइने की तरह साफ होने के बावजूद इस सार्वजनिक तौर स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए स्वयं अर्जुन सिंह ने उस समय पत्रकारों के समक्ष कहा कि उन्हें एंडर्सन को रिहा करने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से कोई निर्देश नहीं दिया गया। 9 दिसंबर 1984 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार अर्जुन सिंह ने इस बात से साफ इनकार किया कि उन्हें एंडर्सन को छोड़ने के लिए केंद्र सरकार से कोई आदेश मिला था, लेकिन उन्होंने यह जरूर स्पष्ट किया कि एंडर्सन को पकड़ने और छोड़े जाने की जानकारी प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दे दी गयी थी। उन्होंने एंडर्सन को क्यों रिहा कराया और क्यों उसे देश छोड़ने की इजाजत दी, इसके जवाब में उनका कहना था कि पुलिस को लगा कि गैस कांड की जांच के लिए एंडर्सन का यहां रहना जरूरी नहीं है, इसलिए उसे जाने दिया गया। तत्कालीन गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने भी इस बात की सफाई दी कि एंडर्सन की रिहाई के लिए अमेरिका से कोई दबाव था।

अमेरिका दबाव का मुद्दा नये सिरे से अभी कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह के एक बयान से उठ खड़ा हुआ। अपनी पत्नी के इलाज के लिए अमेरिका गये दिग्विजय सिंह ने वहीं से एक वक्तव्य देते हुए तत्कालीन राज्य सरकार का कोई दोष नहीं है। दिग्विजय सिंह उस समय अर्जुन सिंह के मंत्रिमंडल में मंत्री थे और अर्जुन सिंह उनके राजनीतिक गुरु भी समझे जाते हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस मामले में अमेरिकी दबाव हो सकता है। उन्होंने वास्तव में अर्जुन सिंह और राजीव गांधी दोनों का एक साथ बचाव करने की कोशिश की और यह बताना चाहा कि तत्कालीन सरकार को अमेरिकी दबाव में यह निर्णय लेना पड़ा। लेकिन उनका यह बयान रजानीतिक दृष्टि से उल्टा पड़ गया। इसका अर्थ हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अमेरिकी दबाव में आकर राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह एंडर्सन को छोड़ दे और देश के बाहर जाने दे। इससे एंडर्सन के खिलाफ कानूनी मसले को कमजोर करने का आरोप भी उनके ऊपर आ जाता है। इसलिए फौरन दिग्विजय सिंह पर दबाव पड़ा कि वह अपना बयान बदलें। तो उन्हों ने  सारी जिम्मेदारी अपने गुरु अर्जुन सिंह  पर डालते हुए कहा कि उस समय उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था और चुनाव अभियान में शामिल थे, इसलिए उन्हें ठीक-ठीक इसकी कोई जानकारी नहीं कि एंडर्सन की रिहाई कैसे हुई। निश्चय ही इसकी पूरी जानकारी अर्जुन सिंह के पास है और वे ही इसका खुलासा कर सकते हैं। कांग्रेस की प्रवक्ता जयंती नटराजन का कहना है कि वे एक ही बात विश्वासपूर्वक कह सकती हैं कि एंडर्सन की रिहाई में तत्कालीन केंद्र सरकार का कतई कोई हाथ नहीं था। वास्तव में इस समय कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता व तमाम वरिष्ठ नेता राजीव गांधी के बचाव में उतर आए हैं। इस मसले पर गत शुक्रवार की शाम केंद्र सरकार की कोर कमेटी की बैठक हुई। इसमें क्या चर्चा हुई, यह तो पता नहीं, किंतु बाहर जो दिखायी दे रहा है, उसके अनुसार एंडर्सन की फरारी की पूरी जिम्मेदारी अकेले अर्जुन सिंह पर डाली जा रही है। अर्जुन सिंह पार्टी के विशेष रूप से गांधी परिवार के सर्वाधिक वफादार सेवकों में गिने जाते हैं। उन्होंने 1984 में तो राजीव गांधी का साफ बचाव किया था, किंतु इस समय चुप्पी साधे हुए हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है। सारे नेता यही चाहते हैं कि अर्जुन सिंह सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर  लेते हुए बयान दें, लेकिन यदि वे ऐसा करते हैं, तो जीवन के अवासान काल में उन्हें भोपाल के गैस पीड़ितों की गहरी निंदा का सामना करना पड़ेगा। राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने भी उन्हें पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वे सारे मामले का खुलासा करें।

खैर, यह तो एक मुद्दा हुआ कि भोपाल गैस त्रासदी के जिम्मेदारी लोगों के बचाव में राजनीतिक नेताओं, सरकारों व अधिकारियों की किस तरह की भूमिका रही। बातें बहुत साफ हैं। सभी लोग खुले ढंग से अपने निष्कर्ष निकाल सकते हैं और राजनीति के वास्तविक चरित्र का अनुभव भी कर सकते हैं। किंतु इस प्रकरण में इस देश के न्यायपालिका की भूमिका भी अत्यंत संदिग्ध रही है। और आरोपों के दायरे से देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को भी बाहर नहीं रखा जा सकता।

एंडर्सन की रिहाई का निर्देश भले ही तत्कालीन केंद्र सरकार से मिला हो, लेकिन अर्जुन ंिसंह इस मामले में पूरी तरह निर्दोष करार नहीं दिये जा सकते, बल्कि ईमानदारी से सारे प्रकरण की समीक्षा की जाए, तो एंडर्सन से अधिक बड़े अपराधी भारत के लोग नजर आते हैं। अब तो अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी.आई.ए. के वे पेपर भी सामने आ गये, जिसमें यह स्पष्ट संकेत हैं कि तत्कालीन केंद्र सरकार ने एंडर्सन को बाहर निकलने में मदद की। इसलिए इस प्रकरण पर आगे की बहस छोड़ ही देनी चाहिए, लेकिन अर्जुन सिंह सरकार इस आरोप से तो अपने को मुक्त नहीं कर सकती कि उसकी लापरवाही और गैर जिम्मेदारीपूर्ण रवैये के कारण यह भयावह दुर्घटना हुई। स्वयं यूनियन कार्बाइट के जांच दल ने आकर कारखाने का निरीक्षण किया था और जांच रिपोर्ट दी थी कि वहां सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी की जा रही है। विषैली गैस को ठंडा करने के ‘कूलिंग प्लांट’ बंद पड़े हैं। कर्मचारियों की यूनियनों की तरफ से भी शिकायतें की गयी थीं। 2-3 दिसंबर 84 की रात से पहले भी कारखाने में गैस के रिसाव से छोटी-मोटी कई दुर्घटनाएं हो चुकी थीं, जिसमें कई श्रमिक मारे भी गये थे। लेकिन अुर्जन सिंह ने इस दुर्घटना के कुछ दिन पहले ही राज्य विधानसभा में कहा था कि उन्होंने स्वयं कारखाने का निरीक्षण किया है और वहां सब कुछ ठीक-ठाक है। कोई समस्या नहीं है। इस पूरे प्रकरण के दो स्पष्ट पक्ष हैं। एक तो है वह आपराधिक लापरवाही, जो कारखाने की स्थापना व उसके रख-रखाव में बरती गयी। इसके जिम्मेदार लोग ही वास्तव में उस भयावह दुर्घटना के जिम्मेदार हैं, जिसमें 22000 से अधिक लोग मारे गये। उनकी इस आपराधिक लापरवाही के लिए सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए, जिससे कि फिर कोई उद्यमी या अधिकारी ऐसी लापरवाही न बरते। दुसरा पक्ष है इस दुर्घटना से प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने का। उनके इलाज व क्षतिपूर्ति स्वरूप मुआवजा दिलाने का। लेकिन इन दोनों ही मामलों में राजनेताओं, सरकारों तथा सर्वोच्च न्यायालय तक ने घोर संवेदनशून्यता का परिचय दिया है।

दुर्घटना के दो महीने बाद ही भारत सरकार की तरफ से एक अमेरिकी अदालत में यूनियन कार्बाइड के खिलाफ 3.3 अरब डॉलर का मुआवजा देने का दावा ठोका गया। अमेरिकी अदालत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई भारत में ही होनी चाहिए, क्योंकि घटना भारत की है और दुर्घटना की शिकार कंपनी भी भारत की है। उसके सभी अधिकारी भारतीय हैं और यू.सी.सी. का इतना दायित्व है कि उसमें उसके 50 प्रतिशत से कुछ अधिक के शेयर हैं। मामला भारतीय अदालत में आ गया। दिसंबर 1987 में एंडर्सन और अन्य आरोपियों के खिलाफ सी.बी.आई. ने अपना आरोप पत्र पेश किया। उसके खिलाफ कार्बाइड की तरफ से सर्वोच्च अदालत में अपील की गयी।

सी.बी.आई. ने जो आरोप पत्र पेश किया था, उसमें एंडर्सन तथा अन्य आरोपियों के खिलाफ आई.पी.सी. की अन्य धाराओं के साथ 304 (2) भी लगाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमदी ने जाने क्यों 304 (2) को रद्द करके उसे 304 (ए) करने की सलाह दी। उनका कहना था कि 304 (2) न्यायालय के समक्ष प्रमाणित नहीं होगा।

न्यायाधीश अहमदी आज यह कह रहे हैं कि इस देश के पास ऐसी औद्योगिक दुर्घटनाओं से निपटने के लिए कानून ही नहीं है। उस समय सीबीआई द्वारा एकत्र प्रमाणों के आधार पर उन्होंने उपर्युक्त सलाह दी थी। सवाल है कि उस समय न्यायाधीश अहमदी ने सरकार को यह सलाह क्यों नहीं दी कि वह इस कांड के लिए नये कानून बनाए और उसके अंतर्गत सुनवाई हो। आश्चर्य है कि उन्होंने उपलब्ध कानून को भी और नरम करने का काम किया।

इसके बाद की घटना और रोचक है। अहमदी ने यू.सी.सी. और भारत सरकार के बीच मुआवजे की रकम के बारे में भी एक समझौता कराया। यह समझौता अदालत के बाहर हुआ। और समझौता होने के साथ ही भारत सरकार ने यू.सी.सी. के खिलाफ सारे मामले वापस ले लिये। यह समझौता मात्र 47 कराड़ डॉलर का हुआ। मात्र 3000 मृतक के लिए 75000 रुपये और पीड़ित के लिए 25000 रुपये मात्र थी।

अमेरिकी अदालत में जहां 330 करोड़ डॉलर के मुआवजे का दावा किया गया था और भारत में वह मात्र 47 करोड़ पर तय हो गया। यह समझौता कराने में न्यायाधीश अहमदी की प्रमुख भूमिका थी। भोपाल में यूनियन कार्बाइड द्वारा एक सर्वसुविधा संपन्न 500 बिस्तरों वाला अस्पताल बनावाया गया। कहा गया कि इसमें गैस पीड़ितों की निःशुल्क चिकित्सा होगी। लेकिन यहां अब गैस पीड़ितों को कोई पूछने वाला नहीं है। इस अस्पताल के मुख्य कक्ष में आज भी एक बड़ा चित्र लगा हुआ है, जो बरबस लोगों का ध्यान आकृष्ट करता है- वह चित्र है भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमी का। सेवानिवृत्ति के बाद यू.सी.सी. ने उन्हें इसका मैनेजिंग ट्र्स्टी (प्रबंध न्यासी) बना दिया। उनकी सहायता के लिए अमेरिका की तरफ से उन्हें एक और पुरस्कार मिला। अमेरिकी सहयोग से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय   न्यायालय (इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस) में स्थान मिल गया। अहमदी साहब इस समय देश में अल्पसंख्यकों के कानूनी अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।

गत 7 जून को भोपाल के सत्र न्यायाधीश ने 25 वर्षों बाद जो फैसला दिया, उससे पूरे देश का चैंकना स्वाभाविक था। जिन अधिकारियों की घोर लापरवाहीवश इतना बड़ा हादसा हुआ, उन्हें इतनी कम सजा। यह कोई न्याय है या न्याय का मजाक ? लेकिन इस तरह से चैंकने वाले केवल आम लोग हैं, जिन्हें न अदालतों के नाटक की जानकारी है, न राजनेताओं के मायाजाल की। सरकारों तथा कानून के जानकारों को तो पहले से पता था कि इस मामले में किसी को कोई वास्तविक सजा नहीं होनी है। दो साल के कैद की सजा भी एक कागजी कर्मकांड है। लेकिन फैसले की घोषणा के बाद मीडिया में जो हंगामा मचा, तो अब सारी सरकारें बचाव मुद्रा में आ गयी हैं। आलोचनाओं से बचने के लिए केंद्र सरकार ने 10 सदस्यीय मंत्रिमंडलीय समिति बनायी है, तो मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने कानूनी विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरी समिति। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि वे अभियुक्तों की सजा बढ़वाने के लिए अपील करेंगे, जबकि उन्हें पता ही नहीं है कि इस मामले में न तो वे कोई अपील कर सकते हैं, न किसी की सजा बढ़ सकती है, क्योंकि कानून की सीमा में अधिकतम सजा दी जा चुकी है। और जिस मामले में जांच करके मामला दर्ज कराने वाली सीबीआई जैसी कोई केंद्रीय संस्था हो, उसमें अपील का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है, राज्य सरकार को नहीं।

केंद्र सरकार भी कह रही है कि वह एंडर्सन को भारत में प्रत्यर्पण कराकर फिर मुकदमा चला सकती है। अमेरिका के साथ भारत की प्रत्यर्पण संधि है। अमेरिकी सरकार ने भी कहा है कि यदि भारत कोई इस तरह का अनुरोध करता है, तो वह इस पर विचार करने के लिए तैयार है। लेकिन अव्वल तो यह होने वाला नहीं, दूसरे हो भी जाए, तो उससे होगा क्या? हमारे पास इसके लिए जरूरी कानून तो अभी भी नहीं है। और कानून बन भी जाए, तो क्या देश का राजनीतिक चरित्र बदल जाएगा ? क्या वह आगे विदेशी दबावों में नहीं आएगा ? क्या तब यहां के न्यायालय आम आदमी के पक्षधर बन जाएंगे ? 90 वर्षीय एंडर्सन निश्चय ही अमेरिका में बैठा हंस रहा होगा भारत की सरकारों, यहां के राजनेताओं और न्यायालयों पर। लेकिन क्या यहां किसी को उसकी हंसी सुनाई दे रही है। (13-6-2010)

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

क्षेत्रवादी राजनीति में फंसा आंध्र प्रदेश

केंद्र सरकार ने पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा तो कर दी, लेकिन यह घोषणा होते ही राज्य की राजनीति में क्षेत्रीयता का ऐसा ज्वार उठ खड़ा हुआ कि 48 घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री को घोषणा करनी पड़ी कि जल्दबाजी में कुछ नहीं किया जाएगा और आगे का कदम सबकी सहमति से उठाया जाएगा। लेकिन इससे कोई भी आश्वस्त नहीं है, हां इससे यह आशंका जरूर उठ खड़ी हुई है कि सरकार घोषणा करके भी अपना अगला कदम अनिश्चितकाल के लिए टाल सकती है। राज्य का हर हिस्सा आंदोलित है, लेकिन केंद्रीय नेता कूटनीतिक शब्दावली से इस आंदोलन की आग को शांत करना चाहते हैं। चिंता की बात यह है कि इस समय राज्य में क्षेत्रीयता की राजनीति दलीय राजनीति के ऊपर हावी हो गयी है। लोग पार्टी का दायरा तोड़कर क्षेत्रीयता के दायरे में संगठित हो रहे हैं।


तेलंगाना के भाग्य का निर्णय प्राय: केन्द्र सरकार के हाथों ही होता आया है, चाहे वह उसकी इच्छाओं के विरुद्ध रहा हो, या समर्थन में। 1956 में तेलंगाना क्षेत्र (पूर्व निजाम स्टेट) को आंध्र में शामिल करने का निर्णय भी केन्द्र सरकार ने ही लिया था और आज 2009 में उसे अलग करने का निर्णय भी केन्द्र सरकार ने ही लिया है। तब भी केन्द्र में कांग्रेस की ही सरकार थी और आज भी उसी की सरकार है। तब कांग्रेस के सर्वोच्च नेता व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे तो आज भी केन्द्रीय सत्ता की मुख्यनियंता उनकी दौहित्रवधू सोनिया गांधी है।
केन्द्र सरकार ने उस समय तेलंगाना क्षेत्र के लोगों की सहमति प्राप्त किये बिना (या यों कहें कि उनकी आशंकाओं और विरोधों के बावजूद) इस क्षेत्र को आंध्र प्रदेश का अंग बना दिया था । आज करीब 55 वर्षों बाद उसने फिर बिना किसी से पूछे इस प्रदेश को आंध्र से अलग करने का निर्णय लिया है। यह बात अलग है कि इस तरह उसने मात्र अपनी गलती सुधारी है। विलय के समय उसने तेलंगाना वालों से उनकी सहमति नहीं ली तो आज अलग करते समय उसने आंध्र के लोगों से उनकी सलाह नहीं ली। तो इसमें नया क्या हो गया? बल्कि उस समय तो पंडित नेहरू की सरकार ने फजल अली के नेतृत्व में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट की अवहेलना करके तेलंगाना को आंध्र में शामिल करने का निर्णय लिया था। फजल अली ने तो अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा था कि तेलंगाना के लोग आंध्र में मिलने के लिए तैयार नहीं हैं। उनको बहुत सी आशंकाएं हैं। इसलिए उसे अभी आंध्र में शामिल नहीं किया जा सकता। फिर भी उन्होंने विलय का रास्ता खुला छोड़ा था और सलाह दी थी कि 1961 के चुनाव में तेलंगाना विधानसभा के गठन के बाद यदि सदन के दो तिहाई विधायक अपने राज्य का विलय आंध्र में करने का निर्णय लें तो ऐसा हो सकता है, लेकिन केंद्र सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को दरकिनार करके एक तरह से जबर्दस्ती तेलंगाना के क्षेत्र को आंध्र प्रदेश का अंग बना लिया। क्षुब्ध तेलंगानावासियों को संतुष्टï करने के लिए एक सभ्य समद्ब्राौता (जेटिलमेंस एग्रीमेंट) तैयार किया गया, जिसमें तेलंगाना क्षेत्र को अलग राज्य जैसी ही सुविधाएं व अधिकार देने का वचन दिया गया, जिसका कभी पालन नहीं हुआ। इसके विपरीत आज का निर्णय तो राज्य की प्राय: सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आम राय के अनुसार लिया गया है। यह बात दूसरी है कि निर्णय के बाद ये सारी पार्टियां अपनी राय से पलट गयीं हैं।
वास्तव में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब मद्रास प्रांत का विभाजन हुआ और आंध्रा अलग हुआ, तभी से आंध्र प्रदेश के ताकतवर नेताओं की नजर तेलंगाना क्षेत्र और निजाम की राजधानी हैदराबाद व उसकी संपत्ति पर लगी हुई थी । वे अपने राज्य का आकार भी बढ़ाना चाहते थे जिससे कि उनकी ताकत और बढ़ जाए। आज भी मूल द्ब्रागड़ा हैदराबाद शहर को लेकर है, जो पहले निजाम की और आज आंध्र प्रदेश की राजधानी है। तेलंगाना को अलग करने के केन्द्र सरकार के निर्णय का विरोध करते हुए आंध्र प्रदेश के नेतागण कह रहे हैं कि उनकी वहां जो संपत्तियां हैं, जो वहां निवेश किया गया है, उसे वे कैसे छोड़ सकते हैं। उन्हें शायद इसका स्मरण नहीं कि जिस समय तेलंगाना का आंध्र प्रदेश में विलय किया गया था उस समय पूरा तेलंगाना क्षेत्र शिक्षा व विकास की दृष्टिï से पिछड़ा अवश्य था, लेकिन उसका कुल राजस्व (सरकारी आमदनी) आंध्र के राजस्व से कहीं अधिक था। निजाम की अकूत संपदा भी विलय के साथ आंध्र के नेताओं के ही हाथ लगी। तेलंगाना की खनिज व जल संपदा आंध्र क्षेत्र के अधिक काम आई, जिससे उनकी समृद्धि बढ़ी। फिर आज यदि तेलंगाना के वंचित लोगों के हित में 1956 का फैसला उलटा जा रहा है तो इससे उनका दर्द इतना क्यों बढ़ गया है।
फिर ऐसा भी तो नहीं कि तेलंगाना अलग राज्य बन जाएगा तो यहां से आंध्र या रायलसीमा के लोग निकाल बाहर किये जाएंगे। विभाजन का आधार क्षेत्रीय है कोई जातीय तो नहीं। यदि निजाम के राज्य में यहां देश के तमाम राज्यों से आए लाखों लोग रह सकते हैं, उद्योग व्यवसाय कर सकते हैं, संपत्तियां खरीद सकते हैं तो आंध्र या रायलसीमा के लोग यहां यह सब क्यों नहीं कर सकते। हां उन इलाकों के भूमाफियाओं, बिल्डरों व बड़े ठेकेदारों का नुकसान अवश्य हो सकता है, लेकिन मुट्ठी भर ऐसे लोगों की रक्षा के लिए करोड़ों तेलंगानावासियों को कोई बंधक बनाकर तो नहीं रख जा सकता।
राज्य के विभाजन के विरुद्ध एक तर्क और दिया जा रहा है कि इस विभाजन से भाषायी एकता टूटेगी। भाषा आधारित राज्यों का गठन इसलिए किया गया था कि एक भाषाभाषी समुदाय एक राज्य क्षेत्र में रहें। अब यदि तेलुगु भाषा के आधार पर गठित एक राज्य को तोड़कर दो तेलुगु भाषी राज्य बनाए जाते हैं तो यह राज्यों के पुनर्गठन की मूल अवधारणा के विरुद्ध कार्य होगा। वस्तुत: यह कोई तर्क नहीं, बल्कि एक मिथ्या तर्काभास है। वास्तव में भाषा आधारित राज्य का गठन किया जाना ही एक बहुत बड़ी राजनीतिक व सामाजिक भूल थी। आज के जमाने में कोई क्षेत्र, राज्य या देश एक भाषा-भाषी नहीं हो सकता। वह किसी एक पारंपरिक संस्कृति का अनुयायी भी नहीं हो सकता। उद्योग, व्यवसाय तथा सेवाओं के लिये प्राय: हर क्षेत्र के लोग अन्य क्षेत्रों में आते-जाते तथा बसते रहे हैं और आते-जाते तथा बसते रहेंगे। यह भाषायी राजनीतिक अस्मिता भी यूरोपीय महाप्रभुओं की देन है जिसके कारण हम आज इतने विभाजित व संकीर्ण मानसिकता वाले हो गये हैं। इसलिए एक भाषा के एक से अधिक राज्यों का होना कोई निन्दनीय बात नहीं।
यह बात सही है कि पृथक तेलंगाना राज्य बनना अभी भी आसान नहीं है। तेलंगाना के लोग यदि यह समद्ब्राते हों कि अब उन्हें कुछ नहीं करना है, अब तो जो कुछ करना है वह केन्द्र सरकार को ही करना है। उसने वायदा किया है तो उसे पूरा करने की जिम्मेदारी भी उसी की है। अपना काम तो केवल जश्न मनाना रह गया है। तो यह उनकी भारी भूल होगी। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि केन्द्र सरकार की तरफ से बुधवार की मध्यरात्रि जो घोषणा की गई थी उसका मूल उद्देश्य अलग तेलंगाना राज्य बनाना नहीं, बल्कि तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चन्द्रशेखर राव के आमरण अनशन से भड़के छात्र आंदोलन को शांत करना था। यद्यपि अभी भी यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि केन्द्र ने आखिर कैसे एक मध्यरात्रि को इतने बड़े निर्णय की घोषण कर दी। आखिर उस पर क्या दबाव था। राज्य की राजनीतिक स्थिति की केन्द्र को जानकारी न हो ऐसी बात भी नहीं। केन्द्रीय नेता यह अच्छी तरह जानते हैं कि तेलंगाना के प्रश्न पर राज्य की तमाम पार्टियां जो भी बोलती रही हैं वह सच नहीं है। पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थन में दिये गये सारे बयान मिथ्या थे, जो तेलंगाना क्षेत्र के लोगों का समर्थन प्राप्त करने के राजनीतिक उद्देश्य से दिये गये थे। सभी जानते थे कि तेलंगाना के बारे में केन्द्र सरकार जल्दी कोई फैसला नहीं लेने वाली इसलिए तेलंगाना क्षेत्र को क्यों अकेले टी.आर.एस. की झोली में जाने दिया जाए। क्यों न उसके प्रति बराबर की सहानुभूति जताकर उसका समर्थन अपने लिये भी जुटा लिया जाए।
कांग्रेस ने इसीलिए इस तरह का बयान दिया कि वह तेलंगाना के विरुद्ध नहीं है, लेकिन फैसला केन्द्र सरकार को या पार्टी हाईकमान को करना है। वह इसके लिए तैयार हो जाए तो उन्हें यानी राज्य के नेताओं को कोई आपत्ति नहीं। इसे देखते हुए तेलुगु देशम पार्टी ने भी पृथक तेलंगाना के समर्थन की घोषणा कर दी। और इन दोनों की प्रतिस्पर्धा में आई मेगास्टार चिरंजीवी की पार्टी प्रजा राज्यम भी भला क्यों पीछे रहती, उसने भी तेलंगाना राज्य के समर्थन की घोषणा कर दी। राज्य कांग्रेस को यह रणनीति अपनाने की सलाह केन्द्र के नेताओं ने ही दी थी इसलिए राज्य के नेतागण आश्वस्त थे कि तेलंगाना क्षेत्र के लोग कितना भी हाथ पांव मारे, लेकिन केन्द्र कोई निर्णय लेने वाला नहीं। किन्तु चन्द्रशेखर राव के अनशन के कारण भड़के छात्र आंदोलन ने मामला एकाएक गड़बड़ कर दिया।
चन्द्रशेखर राव के लिए भी अपनी डूबती राजनीति को बचाने के लिए कुछ करना आवश्यक हो गया था। लोकसभा, विधानसभा व अभी हाल में सम्पन्न व्रहत्तर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में अपनी गिरती साख से वह बेचैन हो गये और फिर से अपनी लोकप्रियता बढ़ाने व जनसमर्थन समेटने के लिए उन्होंने आमरण अनशन की घोषणा कर दी। सरकार ने यह योजना विफल करने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सरकार को इसका कतई भरोसा नहीं था कि राव का अनशन दो चार दिन भी चल सकेगा। वह कोई महात्मा गांधी या पोट्टी श्रीरामुलु तो हैं नहीं। वह अच्छी जिंदगी व खान-पान के अभ्यस्त हैं। मरना वह कतई चाहेंगे नहीं इएलिए यह अनशन चल ही नहीं सकता। हुआ भी ऐसा ही। अगले ही दिन उनकी जूस पीकर अनशन तोडऩे की तस्वीर मीडिया में फैल गई। इससे आंदोलनकारी छात्र और भड़क गये। उन्होंने राव को धोखेबाज व नाटकबाज करार देते हुए उनका पुतला फूंकना शुरू कर दिया। ऐसी स्थिति में उनके लिए पुन: अनशन जारी रखने की घोषणा करना अनिवार्य हो गया। अन्यथा तेलंगाना की पूरी राजनीति ही उनके हाथ से निकल जाती। डॉक्टर उन्हें शिरामाध्यम से पोषण पहुंचा रहे थे। ऊपर से पानी वह ले ही रहे थे। इससे उनके प्राणों के लिए कोई तात्कालिक खतरा नहीं था, फिर भी उनके रोगजर्जर शरीर (वह बीपी व शुगर के मरीज हैं साथ ही अत्यधिक मद्यसेवन से उनका लिवर भी काफी खराब हो चुका है) को देखते हुए कोई भी इस दृष्टिï से आशंका मुक्त नहीं था। अनशन जब 10 दिनों तक लगातार जारी रहा और अनशन तोड़वाने की राज्य सरकार की सारी कोशिशें विफल हो गयीं, तो सत्तारुढ़ पार्टी के केंद्रीय नेताओं को चिंता होने लगी। प्राय: पूरे तेलंंगाना क्षेत्र में गांव-गांव तक भड़क उठे तेलंगाना आंदोलन के दृश्य लगातार टी.वी. पर देखे जा रहे थे।
कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं को दिल्ली में जो खबरें मिल रही थीं उसके अनुसार इस आंदोलन को इतना उग्र रूप देने में अपनी ही पार्टी के उन लोगों का बड़ा हाथ था, जो वर्तमान रोशैया सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं। उन्हें यह भी आशंका थी कि नक्सली संगठन भी इस आंदोलन में कूद सकते हैं। 10 दिसंबर को 'विधानसभा चलो के आह्वान को लेकर भारी अंदेशा था। इसमें कुछ भी हो सकता है। साथ में यह भय भी था कि कहीं इस बीच चंद्रशेखर राव की जान को कुछ हो गया तो स्थिति एकदम काबू से बाहर हो जाएगी। रोशैया विरोधी ताकतों का खेल सफल न होने पाए इसके लिए भारी जल्दबाजी में 10 दिसंबर की सुबह होने के बहुत पहले मध्यरात्रि में ही तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की मांग स्वीकार कर ली गयी। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने मीडिया के सामने आकर संक्षिप्त सा बयान दिया कि पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण की प्रक्रिया शीघ्र ही शुरू की जाएगी। इसके लिए राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया जाएगा। इसलिए अब चंद्रशेखर राव को अपना अनशन तोड़ देना चाहिए और छात्रों को भी अपना आंदोलन वापस ले लेना चाहिए। सरकार के पास इस तरह के एकतरफा निर्णय की घोषणा के लिए पर्याप्त राजनीतिक आधार भी था, क्योंकि अभी कुछ दिन पहले ही मुख्यमंत्री रोशैया द्वारा बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक में प्राय: सभी प्रमुख पार्टियों ने पृथक तेलंगाना का समर्थन किया था। अब केंद्र को और कोई सहमति जुटाने की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उसने फटाफट तेलंगाना राज्य निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा कर दी।
यह घोषणा निश्चय ही सभी के लिए चौंकाने वाली थी। टीआरएस के लोगों को भी इतनी जल्दी ऐसी घोषणा की आशा नहीं थी। घोषणा होते ही टीआरएस सहित तेलंगाना क्षेत्र के सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता-सांसद, विधायक आदि नाच उठे और आंध्र व रायलसीमा के नेतागण अवाक रह गये। लेकिन स्तब्धता जल्दी ही टूटी और उन्होंने घोषणा का विरोध करना शुरू कर दिया। स्वयं कांग्रेस पार्टी के अपने विधायकों व सांसदों ने विरोध का द्ब्रांडा बुलंद कर दिया और केंद्र पर आरोप लगाना शुरू कर दिया कि उसने बिना राज्य के विभिन्न अंचलों के लोगों की राय लिए एकतरफा तौर पर यह फैसला ले लिया है, जो उन्हें मान्य नहीं है। वे यह भी भूल गये कि अभी तक वे स्वयं ही तो कह रहे थे कि वे तेलंगाना के खिलाफ नहीं हैं और इस बारे में पार्टी हाईकमान यानी सोनिया गांधी जो भी निर्णय लेंगी, वह उन्हें मान्य होगा। अब जब सोनिया गांधी ने निर्णय ले लिया और उसकी घोषणा हो गयी, तो फिर क्यों वे इसका विरोध कर रहे हैं। इस पर इन क्षेत्रों के कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि उन्हें क्या पता था कि वह वास्तव में कोई इस तरह का फैसला ले लेने वाली हैं। उन्हें तो पार्टी के राजनीतिक हित के लिए केवल ऐसी बात कहते रहने के लिए कहा गया था।
घोषणा के बाद 10 तारीख की सुबह होते-होते इस मसले पर सारी पार्टी लाइन टूट गयी। राजनीति ने नितांत क्षेत्रीय रूप ग्रहण कर लिया। तेलंगाना क्षेत्र के सारे नेता एक साथ और आंध्र तथा रायलसीमा के सारे नेता एक साथ। एक वर्ग जश्न मनाने में लगा है, तो दूसरा विरोध करने में। आंध्र व रायलसीमा क्षेत्र के विधायकों का इस्तीफे देने का तांता लग गया। ताजा खबरों के अनुसार इन दोनों क्षेत्रों के कुल 175 विधायकों में से अब तक करीब 135विधायक व 5 सांसद इस्तीफ दे चुके हैं। इन सबकी मांग है कि 9-10 की मध्यरात्रि को की गयी घोषणा वापस ली जाए और आंध्र को वर्तमान 'समेक्य आंध्र के रूप में बनाये रखा जाए। राज्य दका प्राय: हर वर्ग क्षेत्रीय आधार पर बंट गया है। उनके बीच की राजनीतिक विभाजक रेखा क्षीण हो गई है और क्षेत्रीयता की रेखा गरही हो गई है। राजधानी हैदराबाद में तो इसको बिल्कुल साफ-साफ देखा जा सकता है। राज्यकर्मचारी हों, अफसर हों, पुलिस हों, शिक्षक हों, छात्र हों, वकील हों या व्यवसायी प्राय: सबके बीच क्षेत्रीयता की विभाजक रेखा खिंच गई है। हाईकोर्ट के वकीलों में तो 11 दिसंबर की सुबह बाकायदे भिडंत हो गई। आंध्र व रायलसीमा के वकीलों ने अदालत परिसर में 'समेक्य आंध्र का नारा लगाते हुए प्रदर्शन किया और मांग की कि हाई कोर्ट की सारी अदालतें बंद की जाएं। इस पर तेलंगाना के वकीलों ने विरोध किया। फिर 'जय तेलंगाना व 'जय समेक्य आंध्र की मुकाबले की नारेबाजी शुरू हो गई। अदालतें अपने आप ठप हो गयीं। इसी दौरान पता चला कि वकीलों के ही एक समूह ने राजठाकरे की 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की तर्ज पर 'एक तेलंगाना नव निर्माण सेना का गठन कर लिया है। उनका कहना है कि अब तक हमने बहुत नरमी बरती, लेकिन अब हम भी कठोर रुख अपनाएंगे।
अब केन्द्र सरकार इस दूसरी आग को ठंडा करने की कोशिश में है। वह पृथक तेलंगाना की घोषणा अब वापस तो ले नहीं सकती इसलिए आंध्र व रायलसीमा क्षेत्र को शांत करने का एक ही उपाय है कि नये राज्य निर्माण के मसले को अनिश्चितकाल के लिए अधर में लटका दिया जाए। गृहमंत्री की घोषणा के 48 घंटे के अंदर ही यह घोषणा हो गई कि अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण का प्रस्ताव राज्य विधानसभा के चालू सत्र में पेश नहीं किया जाएगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी रायलसीमा व आंध्र क्षेत्र के सांसदों को आश्वस्त किया कि नये राज्य निर्माण् के लिए कोई जल्दबाजी नहीं की जाएगी। सबकी राय से सबके हितों का ध्यान रखते हुए ही आगे कोई कदम बढ़ाया जाएगा। कांग्रेस के एक वरिष्ठï नेता ने इससे एक कदम और आगे बढ़कर यह कहा कि 'हम लोग आम राजनीतिक सहमति के आधार पर तेलंगाना राज्य निर्माण के पक्ष में थे। लेकिन ऐसे निर्णय एकतरफा नहीं लिये जा सकते। हमने जब निर्णय लिया तो राज्य की प्राय: सभी प्रमुख पार्टियां एकमत थीं, लेकिन अब जबकि टीडीपी पीछे हट गई है तो राजनीतिक सहमति कहां है? इसलिए अभी हम मामले को टाल देना चाहते हैं।निश्चय ही कांग्रेस अब मसले को टालने के मूड में हैं। लेकिन अब राज्य में क्षेत्रीयता की जो आग भड़क उठी है वह आसानी से शांत होने वाली नहीं। आंध्र व रायलसीमा के आंदोलनकारी चाहते हैं कि गृहमंत्री दुबारा बयान दें तभी स्थिति सामान्य हो सकती है। उनका सीधा आरोप है कि वर्तमान अशांति के लिए गृहमंत्री दुबारा बयान दें तभी स्थिति सामान्य हो सकती है। उनका सीधा आरोप है कि वर्तमान अशांति के लिए गृहमंत्री चिदंबरम सीधे जिम्मेदार हैं। उनके गृह सचिव जी.के. पिल्लइ ने शुक्रवार को एक बयान देकर और आग में घी डाल दिया। उन्होंने कहा कि पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और हैदराबाद इस नये राज्य की राजधानी होगी। रोचक है कि जिस समय प्रधानमंत्री क्षुब्ध सांसदों को यह समझा रहे थे कि जल्दबाजी में कुछ नहीं किया जाएगा (नथिंग विल बी डन इन हेस्ट) उसी समय गृहसचिव का बयान था कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और राजधानी का मसला भी तय हो चुका है। बाद में यद्यपि वह अपने बयान में पलट गये और कहा कि अभी राजधानी के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है। उन्होंने यह बात केवल इस समद्ब्रा के आधार पर कह दी थी कि यदि तेलंगाना राज्य बनेगा तो हैदराबाद स्वाभाविक रूप से उसकी राजधानी बनेगा। अब भले ही वह अपने बयान से पलट गये हों, लेकिन उनके कथन से इतना तो स्पष्टï हो ही गया है कि दिल्ली में बैठे ब्यूरोक्रेट्स की नजर में हैदराबाद ही तेलंगाना की स्वाभाविक राजधानी है।
राज्य की राजनीति में क्षेत्रीयता को लेकर एक अजीब उथल-पुथल मची है। चतुर्दिक ऊहापोह व्याप्त है। रायलसीमा और आंध्र की पहली मांग यही है कि राज्य का विभाजन न हो लेकिन यदि केन्द्र इस पर आमादा है तो आगे की क्या रणनीति हो सकती है, इस पर भी विचार किया जा रहा है। रायलसीमा व आंध्र के लोगों का, विभाजन की स्थिति में पहला दबाव यह है कि हैदराबाद को तेलंगाना को न दिया जाए। उसे केन्द्र शासित क्षेत्र बना दिया जाए। यदि ऐसा हो जाए तो शहर हैदराबाद से जुड़े उनके सारे हित सुरक्षित रह सकते हैं। लेकिन तेलंगाना के लोग क्या इसे स्वीकार करेंगे? तो अगला विकल्प क्या हो सकता है। रायलसीमा के लोगों की मांग है कि उस स्थिति में उन्हें भी अलग राज्य का दर्जा दिया जाए और नेल्लूर तथा प्रकाशम जिले को उनके साथ जोड़ा जाए। राज्य में इस समय 22 जिले हैं जिनमें से 9 तेलंगाना क्षेत्र में आते हैं, 4 रायलसीमा में और शेष आंध्र क्षेत्र में। मद्रास प्रांत से जब आंध्र को अलग किया गया था तो कर्नूल उसकी राजधानी बनी थी, जो रायलसीमा क्षेत्र में है। लेकिन तेलंगाना के साथ विलय के बाद यह राजधानी उनसे छिन गई और हैदराबाद नई राजधानी बन गई। अब रायलसीमा के लोग तिरुपति को अपनी राजधानी बना सकते हैं, लेकिन उन्हें पृथक राज्य बनने के लिए आंध्र क्षेत्र का नेल्लूर और प्रकाशम जिला जरूर चाहिए। उधर आंध्र क्षेत्र में भी इसकी बहस शुरू हो गई है कि यदि राज्य का विभाजन हो ही गया तो उनकी राजधानी कहां स्थापित होगी।
खैर, यह सारा मुद्दा और विवाद तो अभी लम्बे समय तक चलता रहेगा, परंतु गृहमंत्री की पृथक तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा से देश के अन्य क्षेत्रीय आंदोलनों में भी नई जान आ गई है। लेकिन सवाल है इस विभाजन की श्रृंखला का अंत कहां है। यह दावा मिथ्या है कि छोटे राज्य प्रशाशन की दृष्टि से सुविधाजनक होते हैं या इससे उनके विकास की गति तेज होती है। फिर भी यदि लगातार विभाजन की मांगें उठ रही हैं, तो उनके उठने के दो मुख्य कारण हैं। एक तो क्षेत्रीय नेताओं की बढ़ती महत्वाकांक्षा दूसरी सत्ता के वर्चस्वधारी लोगों द्वारा किसी क्षेत्र विशेष की उपेक्षा या उसका शोषण। जाहिर है कि राजनीतिक व्यवस्था में आंतरिक लोकतंत्र तथा न्याय का अभाव इस तरह की मांगों को भड़काने के मुख्य कारण है। इसलिए राजनीतिक व्यवस्था में इस विभाजन प्रक्रिया को यदि रोकना है तो राजनीतिक व्यवस्था या दलों के बीच आंतरिक लोकतंत्र तथा प्रशासन में सम्यक न्याय की स्थापना करनी होगी। यदि यह नहीं होगा तो ये विभाजन की श्रृंखला और नीचे तक फैलती ही जाएंगी। आंध्र प्रदेश में भी यदि तेलंगाना के साथ न्याय किया गया होता और 'जेंटिलमेन एग्रीमेंट को ईमानदारी से लागू किया गया होता तो आज विभाजन की यह नौबत न आती। परंतु अब बात जहां तक बढ़ चुकी है, उसमें इस राज्य के विभाजन को अनंतकाल के लिए नहीं टाला जा सकता। आज नहीं तो कल, विभाजन के दौर से इसे गुजरना ही पड़ेगा फिर भले इसके एक के दो टुकड़े हों या तीन।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट और अयोध्या का सच

6 दिसंबर 1992 को तथाकथित बाबरी मस्जिद के ध्वंस के कारणों, परिस्थितियों तथा जिम्मेदारियों का पता लगाने के लिए गठित लिब्रहान जांच आयोग की रिपोर्ट सबके सामने आ चुकी है। लेकिन सवाल है कि क्या यही कुल सच है, अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का, और उसके ध्वंस के कारणों का। क्या यह सच नहीं है कि 6 दिसंबर की यह घटना शताब्दियों की प्रशासनिक और न्यायिक विफलता का परिणाम थी। देश की यह समस्या तो तब की है,जब संघ, भाजपा व विहिप की पैदाइश भी नहीं हुई थी। यह तो आज की राजनीति है कि इसे 22 दिसंबर 1949 या 6 दिसंबर 1992 की घटनाओं में सीमित कर दिया गया है। वस्तुत: यह समस्या 1528 की है, जो अब तक चली आ रही है। आखिर इसके समाधान की कब तक और प्रतीक्षा करनी होगी।


तथाकथित बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाए जाने के कारणों की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय लिब्रहान जांच आयोग ने करीब साढ़े छ: करोड़ रुपये खर्च करके 16 वर्ष 6 महीने 14 दिन बाद अपनी रिपोर्ट गत 30 जून 2009 को सरकार को सौंपी। करीब 1024 पृष्ठ की इस विशाल रिपोर्ट में केवल एक व्यक्ति को छोड़कर और सभी को दोषी ठहरा दिया गया। व्यक्तिगत रूप से 68 लोगों को दोषी करार दिया गया है, किन्तु किसी के खिलाफ किसी दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश नहीं है। केंद्र सरकार ने चुपचाप इस रिपोर्ट को दबाकर रख था। विपक्ष की भी इसमें कोई खास रुचि नहीं थी, इसलिए किसी ने भी इसे संसद के पटल पर रखने के लिए जोर नहीं दिया। सरकार के पास यों भी ऐसी रिपोर्ट पेश करने के लिए कम से कम 6 महीने का समय था, इसलिए वह भी दिसंबर तक तो निश्चिन्त ही थी। लेकिन एक दिन सुबह (23 नवंबर 2009) एक अंग्रेजी दैनिक ने रिपोर्ट लीक कर दी। यह रिपोर्ट किसके द्वारा लीक करायी गयी, यह अब तक रहस्य बना हुआ है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने इसे खुद लीक कराया, लेकिन यह बात विश्वसनीय नहीं लगती, क्योंकि उसे लीक कराने की क्या जरूरत थी, वह इसे सीधे सदन में पेश कर सकती थी। उसने इससे अब तक सदन में पेश नहीं किया था, तो शायद इसीलिए कि वह खुद भी इस पर चर्चा या बहस से बचना चाहती थी। सरकारी सूत्रों की माने, तो वह इसे संसद के वर्तमान सत्र के अंतिम दो दिन में पेश करना चाहती थी, मगर रिपोर्ट लीक हो जाने से उसे मजबूरन अगले दिन यानी 24 नवंबर को उसे सदन में पेश करना पड़ा।
सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मोहिन्दर सिंह लिब्रहान के नेतृत्व में यह जांच आयोग मस्जिद ढहने की घटना (6 दिसंबर 1992) के मात्र 10 दिन बाद 16 दिसंबर को गठित किया गया था। कांग्रेसी नेतृत्व की तत्कालीन केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने इसके गठन की घोषणा की थी। आयोग को यह पता लगाना था कि मस्जिद किन परिस्थितियों में ढहायी गयी और कौन इसके जिम्मेदार हैं। लिब्रहान साहब ने अपने नियोक्ता का पूरा ध्यान रखा। उन्होंने प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव को हर तरह के आरोप व दोष से मुक्त कर दिया है, बाकी भारतीय जनता पार्टी व संघ परिवार के नीचे से ऊपर तक सारे नेताओं को दोषी करार दिया है। उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह उनके केंद्रीय निशाने पर हैं, बाकी प्रशासन व पुलिस किसी को माफ नहीं किया है। भविष्य में ऐसी कोई घटना फिर न दोहरायी जाए इसके लिए जस्टिस लिब्रहान ने 65 सिफारिशें की हैं। इनमें कई ऐसी सिफारिशें हैं, जिन पर सरकार को सौ बार विचार करना पड़ेगा। जैसे सांप्रदायिकता व जातिवाद से पुलिस व अफसरशाही यानी प्रशासन को दूर रखने की उनकी सिफारिश सरकार की आरक्षण योजना को ध्वस्त कर सकती है। उनकी यह भी सिफारिश है कि जो लोग लाभ के पदों पर कार्यरत हैं, उन्हें धार्मिक संगठनों, चैरिटी व ट्रस्टों का सदस्य बनने की अनुमति न दी जाए। यही नहीं वह यह भी चाहते हैं कि यदि धार्मिक कार्ड इस्तेमाल करके कोई पार्टी चुनाव जीतकर आती है, तो उसे सत्ता संभालने से रोकने के उपाय किये जाएं।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भाजपा, संघ परिवार एवं कल्याण सिंह की सरकार पर पूरा गुस्सा निकाला है। इसमें उन्होंने किसी को माफ नहीं किया है। हां थोड़ा वर्गीकरण अवश्य किया है, जैसे कि कल्याण सिंह, उमा भारती, गोविंदाचार्य आदि को 'रेडिकल्स में गिना है, तो भाजपा के तीन शीर्ष नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी एवं मुरली मनोहर जोशी को छद्म उदारवादी (श्यूडो माडरेट) यानी ऐसा व्यक्ति बताया है, जो सिर्फ देखने सुनने में उदारवादी है या यों कहें कि उन्होंने उदारवाद का चोला पहन रखा है, वैसे हैं वे भी 'रेडिकल ही। उनका यह भी कहना है कि बाबरी मस्जिद को योजनाबद्ध ढंग से गिराया गया। इसे गिराने की सोची-समझी साजिश थी। यह कोई आकस्मिक आक्रोश या उत्तेजना का परिणाम नहीं था। यह साजिश वास्तव में किसने रची और किसने इसे कार्यान्वित किया, यह ठीक-ठीक जानकारी लिब्रहान के पास नहीं है। लेकिन उन्होंने भाजपा व संघ परिवार के शीर्ष नेताओं तक को इसके लिए इसलिए जिम्मेदार ठहराया कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन्हें इसकी जानकारी न रही हो। सच्चाई यह है कि इसके बारे में लिब्रहान साहब ऐसी कोई जानकारी खोजकर नहीं ला सके, जो नई हो या जिसके बारे में आम जनता को पहले से कोई जानकारी न हो।
मोटे तौर पर यह सभी जानते हैं कि जिन्होंने बाबरी मस्जिद के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, यह नारा दिया कि 'मंदिर वहीं बनाएंगे यानी उसी जगह पर, जिस जगह पर वह मस्जिद खड़ी है, वहीं नये मंदिर का निर्माण करेंगे, जिन्होंने कार सेवा शुरू की तथा जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए देशभर से शिलाएं एकत्रित की, अयोध्या में मंदिर निर्माण कार्यशाला खोली, वे ही मस्जिद ढहाने के भी जिम्मेदार हैं। यदि वे इस घटना के बाद प्रतिवर्ष उस दिन देशभर में शौर्यदिवस मनाते हैं, तो वे इस बात की ही पुष्टि करते हैं कि वे इसके जिम्मेदार हैं। इसलिए यदि लिब्रहान साहब अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नीचे तक भाजपा व संघ परिवार को इसका स्थूलतया दोषी मानते हैं, तो कुछ भी गलत नहीं करते। विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल भी यह मानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी भी राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन के अंग थे। इसके लिए लखनऊ में वह गिरफ्तार भी हुए थे। लेकिन यहां सवाल है कि क्या यही पता लगाने के लिए उन्होंने करीब 17 वर्षों का लंबा समय लिया।
अपनी इस रिपोर्ट में उन्होंने केवल एक बात सही कही है, जो आम आदमी की अवधारणा के खिलाफ है और उसे चकित करने वाली है। वह है इस मामले में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव को पूरी तरह दोषमुक्त करार दे देना। इसमें दो राय नहीं कि बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने में उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी, लेकिन उनकी मूक स्वीकृति अवश्य थी। क्योंकि इतना तय है कि यदि वह न चाहते, तो मस्जिद का ढांचा नहीं गिर सकता था। सच कहा जाए, तो उन्होंने बड़ी चतुराई से बाबरी मस्जिद को अपनी राजनीति का मुहरा बना लिया था। वास्तव में उन्होंने इस मंदिर आंदोलन के खिलाफ भाजपा को ही इस्तेमाल करने की चाल चली। इस चाल में उन्हें अपने दोनों हाथों में राजनीतिक लाभ के लड्ïडू नजर आ रहे थे और आत्मिक तृप्ति का अलग से लाभ मिलने की भी संभावना थी।
उन्होंने उत्तर प्रदेश राज्य की भाजपा सरकार के कंधे पर मस्जिद रक्षा का भार स्थापित किया। संवैधानिक नियमों में बंधी सरकार यह नहीं कह सकती थी कि वह मस्जिद के ढांचे की सुरक्षा नहीं कर सकती। इसलिए उसने राष्टï्रीय एकता परिषद की बैठक में भी यह वचन दिया और अदालत को भी इसका आश्वासन दिया। लेकिन इसके साथ ही वह राम मंदिर आंदोलन व कारसेवा को भी रोकने में असमर्थ थी, क्योंकि जिस राम मंदिर आंदोलन की लहरों ने उसे सत्ता तक पहुंचाया था, वह अब उसी ज्वार को रोकने का साधन कैसे बन सकती थी। उसे इन लहरों के साथ बहना ही था। नरसिंह राव साहब ने कल्याण सिंह को हर तरह की मदद का आश्वासन दिया। यह भी कहा कि जितनी केंद्रीय पुलिस की जरूरत हो, वह देने के लिए तैयार हैं। लेकिन मस्जिद की रखवाली उन्हें ही करनी पड़ेगी। राव साहब की यह चाल भाजपा की सरकार के लिए एक शिकंजा थी। ऐसा नहीं हो सकता कि मस्जिद को ढहाने की कोई साजिश हो और उसकी भनक केंद्र को बिल्कुल न हो। लेकिन राव साहब जानते थे कि बिना कठोर बल प्रयोग, यानी बिना रक्तपात के अब इसे रोका नहीं जा सकता। कल्याण सिंह यदि मस्जिद को बचाने का वचन निभाएंगे, तो उन्हें कारसेवकों पर लाठी डंडे ही नहीं गोली भी चलानी पड़ेगी। और यदि वे यह नहीं करेंगे, तो मस्जिद का ढहना तय है। राव साहब की दृष्टिï में ये दोनों स्थितियां उनकी पार्टी के हित में थीं। यदि कल्याण सिंह गोली चलवाएंगे, तो मस्जिद भले बच जाए, लेकिन भाजपा का पूरा जनाधार ध्वस्त हो जाएगा और यदि उन्होंने कुछ न किया और मस्जिद गिरने दी, तो फिर केंद्र सरकार हरकत में आएगी और मस्जिद के साथ भाजपा की सरकारों को ध्वस्त करके वहां के शासन अपने हाथ में ले लेगी।
इसमें दो राय नहीं कि राव साहब यदि चाहते तो मस्जिद का बाल भी बांका नहीं हो सकता था। वह विवादित परिसद को केंद्र के अधिकार में लेकर उसके चारों तरफ अर्धसैनिक बलों का पहरा लगवा सकते थे। यह काम बिना राज्य सरकार को बर्खास्त किये भी हो सकता था, लेकिन उस स्थिति में कांग्रेस को देशव्यापी हिन्दू आक्रोश का सामना करना पड़ता, जिसका निश्चय ही उसे भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ता। इसलिए उन्होंने एक तीर से तीन शिकार करने की कोशिश की और बदनामी द्ब्रोलकर भी न केवल भाजपा को धूलिसात किया, बल्कि कांग्रेस पार्टी का भी बचाव किया। यह बात दूसरी है कि उनकी इस राजनीति से देश का मुस्लिम समुदाय बिदक गया और उन्हें भी बाबरी मस्जिद ध्वंस के लिए कल्याण सिंह से कम जिम्मेदार नहीं माना। किन्तु लिब्रहान साहब ने नरसिंह राव को इस मामले में पूरी तरह निर्दोष करार दिया है। उनका तर्क है कि चूंकि उनके पास उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की तरफ से कोई रिपोर्ट नहीं थी, इसलिए उनके हाथ-पांव बंधे थे, क्योंकि इस तरह की रिपोर्ट के बिना वह कोई कार्रवाई नहीं कर सकते थे। अब यह बात अलग है कि कोई भी व्यक्ति इसे अत्यंत बचकाना तर्क ही कहेगा। प्रधानमंत्री राज्यपाल से जैसी चाहते वैसी रिपोर्ट मंगवा सकते थे। फैजाबाद (जिसके अंतर्गत अयोध्या आता है) से प्रकाशित हिंदी दैनिक के संपादक शीतला सिंह ने अपने लेखों में लिखा है कि 6 दिसंबर के दिन वह लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क में थे। अयोध्या की मिनट-मिनट की खबर वहां पहुंच रही थी, फिर भी प्रधानमंत्री कार्यालय तब तक हरकत में नहीं आया, जब तक कि मस्जिद पूरी तरह भूमिसात नहीं हो गयी। केंद्रीय सुरक्षा बल तथा केंद्र से भेजी गयी 'रैपिड एक्शन फोर्स की बटालियनें दो दिन पहले से घटना स्थल से मात्र 8 कि.मी. दूरी पर तैनात थीं। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का इस्तीफा दिन के साढ़े तीन बजे ही पहुंच गया था, लेकिन उन्हें बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लागू करने की कार्रवाई रात 8.30 पर हुई। शीतला सिंह की रिपोर्ट पर यदि विश््वास करें, तो मस्जिद ढहने के बाद उस विवादित स्थल पर अस्थाई राम मंदिर के निर्माण की सारी कार्रवाई राष्टï्रपति शासनकाल में और केंद्रीय बलों के घेरे में हुई।
कोई भी जांच आयोग या न्यायालय अपना फैसला कानूनों के तकनीकी दायरे के भीतर साक्ष्यों के आधार पर देता है। इसमें उसकी मानवीय सीमाएं भी होती हैं। फिर ऐसे जांच आयोगों के गठन वस्तुत: राजनीतिक आधार पर होते हैं और बहुधा उनका निश्चित राजनीतिक लक्ष्य भी होता है। लिब्रहान आयोग भी इसका अपवाद नहीं। इसके आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी है, लेकिन सरकार को राजनीतिक कार्रवाइयां करने का प्रचुर अवसर दिया गया है।
अब यदि पूरे प्रकरण पर तटस्थ ढंग से विचार करें, तो देखेंगे कि राममंदिर का यह आंदोलन छेडऩे वाला भले ही कोई एक पार्टी, एक संगठन या एक सांगठनिक परिवार रहा हो या भले ही इसका लाभ किसी एक पार्टी ने उठाया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें लोग पार्टियों की सीमा तोड़कर शामिल हुए थे। सांस्कृतिक दृष्टिï से देश का हर संवेदनशील नागरिक इस आंदोलन के साथ था। राजनीतिक दृङ्क्षष्टï से जो भाजपा के विरोधी थे, वे भी अंतर्मन से इस मुद्दे पर उसके साथ थे। मस्जिद ढहने पर केवल संघियों व भाजपाइयों ने ही नहीं कांग्रेसियों व कम्युनिस्टों में से भी तमाम लोगों ने हर्ष मनाया था। वे बयान कुछ और देते थे, लेकिन भावनात्मक स्तर पर वे इसे ढहाने वालों के साथ थे। उन्हें अफसोस था तो केवल यह कि इसे ढहाने वाले सीधे सामने आकर यह क्यों नहीं कहते कि हां हमने ढहाया है। भाजपा को या आडवाणी को इसकी सजा नहीं मिली है कि वे मंदिर नहीं बनवा सके। उन्हें सजा मिली है कि वे उनमें यह साहस नहीं है कि वे कह सकें कि उन्हें इसकी प्रसन्नता है, क्योंकि वे चाहते थे कि यह ढह जाए। यहां के नेताओं का दोहरापन यहां की राजनीति का सबसे बड़ा रोगा है। वे चाहते कुछ हैं, करते कुछ हैं और कहते कुछ और हैं। आखिर वे साहसपूर्वक संसद में व जनता के बीच यह क्यों नहीं कहते कि राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद का विवाद कोई 1992 या 1949 का नहीं, बल्कि 1528 का है।
राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर की लड़ाई न तो संघ परिवार ने शुरू की है और न भारतीय जनता पार्टी ने। इन्होंने तो केवल इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की है। इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कांग्रेस ने भी की, लेकिन उसने ऐसे साहस का प्रदर्शन नहीं किया कि वह भाजपा व संघ को इस मामले में पीछे छोड़ सके। राजीव गांधी ने जब अयोध्या में मस्जिद के मुख्य द्वार के सामने बमुश्किल 20 गज की दूरी पर मंदिर का शिलान्यास कराया तथा चुनाव प्रचार की अपनी शुरुआत अयोध्या से 'रामराज्य लाने के नारे के साथ की, तो उनका लक्ष्य स्पष्टï था, किन्तु कांग्रेस का इतिहास हमेश मुस्लिमों की तरफ झुका रहा है। लेकिन इससे इतना तो प्रमाणित होता ही है कि कांग्रेस का बहुसंख्यक कार्यकर्ता वर्ग मंदिर के पक्ष में था और वह चाहता था कि राम मंदिर निर्माण का लाभ विपक्ष के खाते में जाने के बजाए कांग्रेस के खातेे में आए।
बहुत से लोगों को शायद यह न पता हो कि तथाकथित बाबरी मस्जिद एक दिन भी विवादमुक्त नहीं रही। 1528 में वहां स्थित मंदिर को ढहाने के बाद (अब इसके पुरातात्विक साक्ष्य भी प्राप्त हो चुके हैं), जब मस्जिद का निर्माण शुरू हुआ, तभी से स्थानीय लोगों ने उसका विरोध शुरू कर दिया था। आज भले उन संघर्षों का कोई क्रमबद्ध-दस्तावेजी प्रामाणिक इतिहास न उपलब्ध् हो, लेकिन लोककथाओं में वह इतिहास जीवित है और पारिस्थितिक साक्ष्य उसकी पुष्टि करते हैं। अब तक बहुत बार यह सारी कहानी दुहरायी जा चुकी है, लेकिन याद ताजा करने के लिए इनका संक्षिप्त उल्लेख किया जा सकता है।
कहा जाता है कि इस विवादित स्थल के लिए लगातार चल रहे खूनी संघर्ष को टालने के लिए बादशाह अकबर ने मस्जिद परिसर के भीतर ही हिन्दुओं को एक चबूतरे पर राम की पूजा करने की अनुमति दे दी। पूरी दुनिया के इतिहास में यह अनूठा उदाहरण है, जब मस्जिद परिसर में मूर्ति पूजा की अनुमति मिली हो। यह हिन्दुओं को शांत करने का एक अस्थाई उपाय था, लनेकिन यह अस्वाभाविक व्यवस्था थी। इस्लाम जो मूर्ति पूजा का कट्टर विरोधी है, उसके साथ यह व्यवस्था शांतिपूर्वक तो नहीं चल सकती थी, फिर भी यह व्यवस्था लगातार ब्रिटिश काल तक चलती रही। कम से कम ब्रिटिश दस्तावेजों में इसका रिकार्ड है। 1905 के 'फैजाबाद के गजेटियर के अनुसार 1855 तक हिन्दू तथा मुस्लिम एक ही भवन (यहां मस्जिद नाम का उल्लेख नहीं है, लेकिन भवन से आशय बाबरी मस्जिद ही है) में अपनी-अपनी पूजा किया करते थे, लेकिन विद्रोह (1857) के बाद मस्जिद के आंगन में मुख्य भवन के सामने एक दीवाल खड़ी कर दी गयी, जिसके भीतर हिन्दुओं को आने से रोक दिया गया। वे (हिन्दू) इस दीवाल के बाहर एक चबूतरे पर अपनी पूजा किया करते थे। 1857 से 1949 तक यही व्यवस्था चलती रही, लेकिन बीच में हिन्दू चुप नहीं बैठे रहे। 1883 में रघुबर दास नाम से एक साधु ने उस चबूतरे पर एक मंदिर बनाने का प्रयास किया, क्योंकि चबूतरे पर भी किसी स्थाई निर्माण का निषेध था। हिन्दू केवल एक घास-फूस की झोपड़ी -वह भी बमुश्किल तीन फिट ऊंची- रखकर पूजा किया करते थे। उन्होंने (रघुबर दास) डिप्टी कमिश्नर के यहां दरखास्त दी, लेकिन 19 जनवरी 1885 को डिप्टी कमिश्नर ने उनकी याचना रद्द कर दी। फिर जिला जज के यहां दरखास्त दी। उन्होंने भी मौका मुआयना करने के बाद मंदिर की अनुमति देने से इंकार कर दिया। उस समय जिला जज थे जे.इ.ए. चांबियार। उन्होंने 17 मार्च 1886 के अपने फैसले में कहा कि चबूतरे पर मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। फिर 25 मई 1886 को अवध प्रांत के जुडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग की अदालत में अपील की गयी। वह अपील भी खारिज हो गयी।
कानूनी तौर पर यद्यपि हिन्दुओं की कोई याचिका स्वीकार नहीं की गयी, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनका कोई दावा ही नहीं बनता था। बाबा रघुबर दास की याचिका रद्द करते हुए जिला जज ने अपने फैसले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी, 'मैंने देखा कि सम्राट बाबर द्वारा बनवायी गयी मस्जिद अयोध्या नगर के किनारे स्थित है... यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि यह मस्जिद ऐसी जगह पर बनायी गयी है, जो हिन्दुओं के लिए अत्यंत पवित्र एवं महत्वपूर्ण है, लेकिन चूंकि यह घटना 358 साल पहले की है, इसलिए इसके लिए बहुत देर हो चुकी है कि पीडि़त पक्ष की शिकायत दूर करके कोई राहत दी जा सके। ऐसे में जो कुछ किया जा सकता है, वह केवल यही है कि दोनों पक्षों के बीच यथास्थिति बनाए रखी जाए। ऐसे मामले में -जैसा की यह है- कोई नया कदम उठाने से लाभ के बजाए हानि अधिक हो सकती है और व्यवस्था बिगड़ सकती है।
जब कोई कानूनी प्रयास सफल नहीं हुआ, तो लोगों ने कानून का दरवाजा खटखटाने से तौबा कर लिया। तब तक कांग्रेस का गठन हो गया था। लोगों ने आजादी के आंदोलन की ओर ध्यान देना शुरू किया। यह माना गया कि अब देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद ही हिन्दुओं को राम जन्मभूमि पर अपना अधिकार मिल सकेगा। इस बीच अयोध्या में एक-दो दंगे हुए। दंगे प्राय: रामनवमी के अवसर पर हुए, जब संयोग से बकरीद भी उसी समय पड़ी और अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर ने मुसलमानों को गाय की कुरबानी करने की अनुमति दे दी। ऐसा एक दंगा 1912 में हुआ, लेकिन वह जल्दी नियंत्रित हो गया। 1934 में एक बड़ा दंगा हो गया, जिसमें हिन्दुओं ने बाबरी मस्जिद पर भी हमला कर दिया और उसके एक गुम्बद को ढहा दिया। अंग्रेज सरकार ने हमलावरों पर कड़ी कार्रवाई की और पूरी अयोध्या पर दंडात्मक कर (प्यूनिटिव टैक्स) लगा दिया। इससे एकत्रित धन से गुम्बर की मरम्मत करायी गयी।
इसके बाद अयोध्या के लोग देश की स्वतंत्रता की प्रतीक्षा करने लगे। 15 अगस्त 1947 को देश के विभाजन के साथ स्वतंत्रता भी हासिल हुई। मुसलमानों का अलग पाकिस्तान बन गया। अब इन्हें लगा कि अब तो राम जन्मभूमि परिसर पर उनका अधिकार हो ही जाएगा, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ, तो बेचैन अयोध्यावासियों ने इसके लिए सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। उन्होंने पूरी अयोध्या में अखंड रामचरितमानस का पाठ शुरू किया। वह महीनों चलता रहा, फिर भी प्रशासन नहीं चता तो रामचरण दास नाम के एक साधु ने बम से मस्जिद को उड़ा देने की योजना बनायी। लेकिन बम बनाते समय ही विस्फोट हो गया और वे अंधे हो गये। योजना विफल हो गयी। फिर कुछ उत्साही साधुओं ने 22 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि में मस्जिद में घुसकर वहां बालरूप राम की मूर्ति स्थापित कर दी और उस मस्जिद के भवन को ही मंदिर बना दिया।
यह खबर आग की तरह शहर में फैल गयी। सूचना प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू तक पहुंची। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को आदेश दिया मूर्तियां तत्काल हटा दी जाएं। पंत जी ने राज्य के मुख्य सचिव भगवान सहाय और आई.जी. पुलिस (उस समय आई.जी. ही प्रदेश की पुलिस का सर्वोच्च अफसर हुआ करता था), वी.एन. लाहिड़ी को निर्देश दिया। उन्होंने फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर के.के. नैयर को यह फरमान सुनाया कि पंडित नेहरू तथा पं. पंत का आदेश है कि मूर्तियां फौरन हटा दी जाएं, मगर के.के. नैयर ने आदेश मानने से इंकार कर दिया और जवाब भेजा कि इस समय पूरी अयोध्या आंदोलित है और यदि ऐसे समय में मूर्तियां हटाने की कोशिश की गयी, तो भारी खून-खराबा हो सकता है। तो इसके विकल्प स्वरूप परिसर को पुलिस घेरे में ले लिया गया और यथास्थिति बनाये रखने का निर्देश दिया गया। 16 जनवरी 1950 को अयोध्या केएक नागरिक गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज के पास याचिका दी कि उन्हें वहां निर्बाध पूजा व दर्शन का अधिकार दिया जाए। ऐसी ही एक याचिका रामचंद परमहंस द्वारा दायर की गयी। तबसे इन मुकदमों का दूसरा दौर शुरू हुआ।
विश्व हिन्दू परिषद ने तो 1984 में इस मसले में हाथ डाला। यहां उसकी पृष्ठभूमि देना संभव नहीं है, लेकिन यह सच्चाई है कि इसके पहले विश्व हिन्दू परिषद, भाजपा या संघ का इस माले में कोई संबंध नहीं था। सारी लड़ाई स्थानीय लोग ही लड़ रहे थे।
इधर की दोनों पक्षों की स्थिति से सभी वाकिफ हैं, लेकिन एक तथ्य बहुत कम चर्चा में आ पाता है, वह यह है कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद हाईकोर्ट के आदेश पर उस जमीन का पुरातात्विक उत्खनन भी हो चुका है, जिस पर उपर्युक्त मस्जिद खड़ी थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) विभाग द्वारा कराये गये इस उत्खनन में यह असंदिग्ध रूप से प्रमाणित हो चुका है कि वहां पर ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी का बना एक भव्य मंदिर खड़ा था, जिसे तोड़कर यह मस्जिद बनी थी। यही नहीं, उपुर्यक्त मंदिर की सतह के नीचे भी एक फर्श मिली है, जिससे यह संकेत मिलता है कि इस मंदिर के पहले भी वहां कोई मंदिर था, जिसके कालक्रम में ढह जाने के कारण गहड़वाल नरेश गोविंदचंद्र ने इस मंदिर का निर्माण कराया था, लेकिन मुस्लिम पक्ष इस पुरातात्विक प्रमाण को भी मानने के लिए तैयार नहीं है।
अब इस पृष्ठभूमि में 6 दिसंबर 1992 की घटना पर विचार करें। लिब्रहान साहब कहते हैं कि पुलिस और सुरक्षा बल के जवान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। लोग मस्जिद ढहाते रहे। प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी सब कल्याण सिंह के षडï्ïयंत्र में शामिल थे। जैसा कि शीतला सिंह ने लिखा है, यह सच है कि राम जन्मस्थल पर मस्जिद ढहने के बाद जो अस्थाई मंदिर बना, वह राष्ट्रपति शासन काल में यानी नरसिंह राव साहब के शासन में और केंद्रीय सुरक्षा बलों के घेरे में उनकी देख-रेख में हुआ है। सुरक्षा बल या प्रशासन में शामिल होने मात्र से कोई व्यक्ति एकाएक अपने पूरे इतिहास व संस्कृति से अपने को अलग नहीं कर सकता। शताब्दियों का अपमान धोने का यदि अवसर मिले, तो कौन संवेदनशील चेतन व्यक्ति चूकना चाहेगा।
जब न्याय के दरवाजे बंद हो जाएं, तो किसी व्यक्ति या समुदाय के पास कानून हाथ में लेने या हिंसा पर उतारू होने के अलावा और रास्ता ही क्या बचता है। 1528 से लेकर 1992 तक की अनवरत प्रतीक्षा फिर भी न्याय के मंदिरों और प्रशासन के शीर्ष मंचों से कोई फैसला नहीं, कोई न्याय नहीं। कैसी विडंबना कि अकबर का फैसला ही आगे भी जारी रख गया। न अंग्रेजों ने बदला, न स्वतंत्र भारत की सरकार ने। देश हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर बट गया। पाकिस्तान अलग हो गया। फिर भी राम जन्मभूमि पर हिन्दुओं को अधिकार नहीं मिल सका। ऐसे में इस देश से किस प्रतिक्रिया की आशा की जा रही थी। लिब्रहान साहब कोई भी रिपोर्ट दें, लेकिन इस देश के इतिहास, संस्कृति तथा राष्ट्रीय चेतना से जुड़े हर व्यक्ति के लिए इस मस्जिद के ढहाए जाने की जिम्मेदारी बाबर से लेकर 1992 तक की देश की सारी राष्ट्रीय सरकारों और न्यायालयों के ऊपर जाती है। आहत समुदाय आखिर कब तक सरकारों और न्यायालयों की प्रतीक्षा करे। अफसोस की बात यह है कि इसका श्रेय उन कायर संगठनों और नेताओं को दिया जा रहा है, जिनमें यह स्वीकार करने का साहस नहीं है कि उन्होंने यह किया। जो इस पर अफसोस व्यक्त कर रहे हैं, इन्हें माफ कर दिया जाना चाहिए। असल में कभी-कभी लगता है कि आज के युग में न्याय भी राजनीति का गुलाम हो गया है या शायद राजकीय न्याय, हमेशा ही राजनीति का गुलाम रहा है। कम से कम राम जन्मभूमि व बाबरी मस्जिद प्रकरण से तो यही प्रमाणित होता है।