मंगलवार, 2 जुलाई 2013

नेताजी : भारत अपनी स्वतंत्रता के लिए जिनका सर्वाधिक ऋणी है

नेताजी : भारत अपनी स्वतंत्रता के लिए जिनका सर्वाधिक ऋणी है

पश्‍चिम बंगाल की सरकार ने अभी वर्ष २०११ से नेताजी के जन्मदिवस २३ जनवरी को 'देश प्रेम दिवसफ के रूप में मनाना शुरू किया है| इसके पूर्व ऑल इंडिया फार्वर्ड ब्लॉक (जिसकी स्थापना स्वयं नेताजी ने की थी) ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया था कि २३ जनवरी पूरे देश के स्तर पर 'देशप्रेम दिवसफ के रूप में मनाने की घोषणा की जाए, किंतु केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि स्वातंत्र्य संग्राम में बहुत से लोगों का योगदान है, इसलिए किसी एक के जन्मदिन को 'देश प्रेम दिवसफ के रूप में घोषित नहीं किया जा सकता|

स्वामी विवेकानंद के बाद जिस दूसरे व्यक्ति ने भारतीय युवाओं को सर्वाधिक प्रेरित किया, वह थे नेताजी सुभाषचंद्र बोस| २३ जनवरी १८९७ को कटक (उड़ीसा) -जो उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आता था- में एक बंगाली हिंदू कायस्थ परिवार में जन्में सुभाषचंद बोस भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम के अकेले ऐसे व्यक्ति हैें, जिन्होंने देश की मुक्ति के लिए हिंसा का यानी युद्ध का मार्ग अपनाया| यह बात अलग है कि वह अपने अभियान में सफल नहीं हुए और उनकी 'आजाद हिंद फौजफ को ब्रिटिश सेना के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा, किंतु उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक एवं सैनिक जीवन में देश के अंदर आत्म स्वतंत्रता के लिए बलिदान की जैसी भावना जागृत की, वैसा कोई दूसरा नहीं कर सका| भारत में ब्रिटिश राजकाल के प्रसिद्ध इतिहासकार माइकेल एडवार्डेस ने अपनी पुस्तक 'द लास्ट इयर्स ऑफ ब्रिटिश इंडियाफ (ब्रिटिश भारत के अंतिम वर्ष) में लिखा कि 'भारत के उस अकेले व्यक्ति ने एक अलग रास्ता अपनाया, जिसमें भले ही वह विफल हुआ हो, किंतु सही अर्थ में भारत अन्य किसी भी व्यक्ति के मुकाबले उस व्यक्ति का अधिक ऋणी है| लेकिन अफसोस कि इस देश के सत्ताधारियों ने और उनके प्रभाव में अन्य लोगों ने भी इस अद्भुत व्यक्ति को एकदम विस्मृत कर दिया है|
पश्‍चिम बंगाल की सरकार ने अभी वर्ष २०११ से नेताजी के जन्मदिवस २३ जनवरी को 'देश प्रेम दिवसफ के रूप में मनाना शुरू किया है| इसके पूर्व ऑल इंडिया फार्वर्ड ब्लॉक (जिसकी स्थापना स्वयं नेताजी ने की थी) ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया था कि २३ जनवरी पूरे देश के स्तर पर 'देश प्रेम दिवसफ के रूप में मनाने की घोषणा की जाए, किंतु केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि स्वातंत्र्य संग्राम में बहुत से लोगों का योगदान है, इसलिए किसी एक के जन्मदिन को 'देश प्रेम दिवसफ के रूप में घोषित नहीं किया जा सकता| यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में अनेक नेताओं के नाम पर तरह-तरह के दिवस मनाए जाते हैं, जैसे गांधी जी के निधन को शहीद दिवस, पंडित नेहरू के जन्मदिवस को बाल दिवस, सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस, आदि के रूप में मनाया जाता है, वहॉं नेताजी के जन्मदिन को 'देश प्रेम दिवसफ के रूप में मनाने से इनकार कर दिया जाता है| क्या ऐसा केवल इसलिए नहीं है कि वह कांग्रेस से बाहर कर दिए गए थे और बाहर निकाले जाने के बाद उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ अपना सैन्य अभियान चलाया|
नेताजी उस समय भारत के पूर्ण स्वराज्य की मांग बुलंद कर रहे थे, जब कांग्रेस के बाकी नेता चरणों में स्वराज्य पाने की बात कर रहे थे और पहले चरण में डोमिनियन स्टेट की स्थिति पाने की ही सर्वोच्च आकांक्षा रख रहे थे| वास्तव में सुभाषचंद्र बोस के सतत अभियान के परिणाम स्वरूप लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की मांग का प्रस्ताव स्वीकार किया|
नेताजी अपने राजनीतिक जीवन में कुल ११ बार जेल गए| पहली बार वह १९२४ में गिरफ्तार हुए और मांडले की जेल में रखे गए| १९२७ में जब छूटे तब कांग्रेस पार्टी के महासचिव चुने गए और जवाहर लाल नेहरू के साथ कांग्रेस का कामकाज आगे बढ़ाया| बोस, नागरिक अवज्ञा आंदोलन में फिर गिरफ्तार हुए| इस बार रिहा हुए तो वह १९३० में कलकत्ता के मेयर चुने गए| १९३० के दशक के मध्य उन्होंने यूरोप की यात्रा की| उन्होंने वहॉं के प्रख्यात राजनीतिक
नेताओं से मुलाकात की और वहॉं के राजनीतिक तंत्र का अध्ययन किया| १९३८ तक बोस की राजनीतिक पहचान राष्ट्रीय नेताओं के रूप में होने लगी, जिसके परिणामस्वरूप १९३८ में वह कांग्रेस के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार बने|
नेताजी लगातार दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए| कांग्रेस के सर्वोपरि नेता गांधी जी के खुले विरोध के बावजूद कांग्रेस के प्रतिनिधियों ने अध्यक्ष पद के लिए नेताजी को अपना समर्थन दिया, लेकिन दूसरी बार (१९३९) की जीत के बाद गांधी जी के स्पष्ट विरोध के कारण उन्हें कांग्रेस से हटना पड़ा| इसके तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नजरबंद कर दिया| इस समय दूसरे विश्‍व युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी, किंतु नेता जी १९४१ में ब्रिटिश सरकार की आँख में धूल झोंककर देश से भाग निकले| आगे की कहानी लोगों को मालूम है कि किस तरह उन्होंने जापानियों के सहयोग से 'आजाद हिंद फौजफ का गठन किया और अंगे्रजों के खिलाफ एक विधिवत संगठित युद्ध की शुरुआत की|
आज देश को किसी सैन्य युद्ध की जरूरत नहीं है, किंतु नेताजी के जैसे सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिकोण की सख्त जरूरत है| नेताजी, विवेकानंद के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे और उदार, वैज्ञानिक सोच वाले हिंदुत्व के समर्थक थे| इसलिए आज के भारत के लिए स्वामी विवेकानंद जैसे चिंतक के साथ नेता जी जैसे योद्धा की प्रेरणा की भी अत्यधिक जरूरत है|