शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

आधुनिक स्त्रीवाद परिवार और समाज का अंतर्द्वन्द्व

आधुनिक स्त्रीवाद परिवार और समाज का अंतर्द्वन्द्व
 

सृष्टि के विकासक्रम में निरंतर अपनी जैविक उन्नति करते हुए हजारों लाखों वर्षों बाद पुरुष और स्त्री आज जिस स्थिति में पहुँचे हैं, वहॉं उनके संबंधों की कोई सर्वस्वीकार्य व्याख्या करना लगभग असंभव है| आज जैविक विकास के मुकाबले उनका बौद्धिक, सामाजिक एवं तकनीकी विकास कहीं अधिक हो चुका है| जैविक दृष्टि से तो आज भी स्त्री-पुरुष की देह और उसकी दैहिक आवश्यकताएँ वही हैं, जो हजारों वर्ष पूर्व उस प्रस्तर काल में थीं, जब वे नंगे रहते थे, शिकार व फलों पर जीवित थे और वस्त्र के नाम पर कभी-कभी जानवरों की खाल या वृक्षों की छाल लपेट लेते थे, लेकिन बौद्धिक व सामाजिक स्तर पर उनकी पहचान, उनकी आवश्यकताएँ तथा उनकी सोच इतनी बदल गई है कि यहॉं यह कल्पना की जाने लगी कि स्त्री-पुरुष किसी एक ग्रह के प्राणी ही नहीं हैं| पुरुष मंगल ग्रह से आया और स्त्री शुक्र ग्रह से| लेकिन सच्चाई यही है कि वे न केवल एक ही ग्रह के हैं, बल्कि एक ही जैविक इकाई के दो अंग हैं और दोनों की ही प्रतिष्ठा एक-दूसरे के सहयोग में निहित है, न कि संघर्ष में|

पिछले दिनों घटित दिल्ली के बहुचर्चित बलात्कार कांड के बाद देश में स्त्री-पुरुष संबंधों, स्त्री के अधिकारों, स्त्रीवादी विचारों तथा स्त्री संबंधी कानूनों पर एक नई बहस शुरू हो गई है| इस बहस ने काफी गंभीर रूप ले लिया है| इस दौरान एक रोचक बात यह सामने आ रही है कि स्त्रीवादी आधुनिकाओं के विचार तथा उनकी मॉंगों पर स्वयं स्त्री समुदाय एकमत नहीं है| यह स्थिति केवल इस देश में नहीं, बल्कि दुनिया के हर देश में है| आज ऐसी स्त्रियॉं बहुमत में हैं, जो स्त्री के पक्ष में तो खड़ी हैं, लेकिन स्त्रीवाद की समर्थक नहीं हैं|
सृष्टि के विकासक्रम में निरंतर अपनी जैविक उन्नति करते हुए हजारों लाखों वर्षों बाद पुरुष और स्त्री आज जिस स्थिति में पहुँचे हैं, वहॉं उनके संबंधों की कोई सर्वस्वीकार्य व्याख्या करना लगभग असंभव है| आज जैविक विकास के मुकाबले उनका बौद्धिक, सामाजिक एवं तकनीकी विकास कहीं अधिक हो चुका है| जैविक दृष्टि से तो आज भी स्त्री-पुरुष की देह और उसकी दैहिक आवश्यकताएँ वही हैं, जो हजारों वर्ष पूर्व प्रस्तर काल में थीं, जब वे नंगे रहते थे, शिकार व फलों पर जीवित थे और वस्त्र के नाम पर कभी-कभी जानवरों की खाल या वृक्षों की छाल लपेट लेते थे, लेकिन बौद्धिक व सामाजिक स्तर पर उनकी पहचान, उनकी आवश्यकताएँ तथा उनकी सोच इतनी बदल गई है कि यहॉं यह कल्पना की जाने लगी कि स्त्री-पुरुष किसी एक ग्रह के प्राणी ही नहीं हैं| पुरुष मंगल ग्रह से आया और स्त्री शुक्र ग्रह से|
इसमें दो राय नहीं कि स्त्री और पुरुष दोनों एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं| उनकी शारीरिक संरचना ही नहीं, बौद्धिक बनावट में भी भिन्नता है, फिर भी वे किन्हीं दो भिन्न ग्रहों के प्राणी नहीं हैं| वे एक ही ग्रह पर जैविक विकास की समान परिस्थितियों में एक साथ जन्मे व विकसित हुए हैं| वस्तुतः वे एक ही जैविक इकाई के दो खंड हैं, जो परस्पर कितने भी भिन्न हों, लेकिन वे परस्पर मिलकर ही एक पूर्ण जैविक इकाई बनाते हैं| हॉं, यहॉं यह जरूर ध्यान देने की बात है कि प्रकृति से कोई खास स्त्री किसी खास पुरुष की ही अनुपूरक नहीं होती| कोई भी स्त्री किसी भी पुरुष से मिलकर एक इकाई बना सकती है| यह इकाई ही सृष्टि क्रम को आगे बढ़ाने का कार्य करती है| इसमें चयन की प्रक्रिया सामाजिक स्तर पर उनके बौद्धिक विकास की देन है, जिसमें उनकी सौंदर्य दृष्टि, सुविधाएँ तथा अन्य रुचियॉं शामिल हो गई हैं|
हजारों वर्षों तक यही अवधारणा बनी रही कि स्त्री पुरुष एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, क्योंकि प्रजनन के लिए या सृष्टिक्रम को आगे बढ़ाने के लिए उनका एक-दूसरे से मिलना जरूरी था| इस जैविक नैकट्य की आवश्यकता ने उनकी सामाजिक निकटता को भी आगे बढ़ाया, जिससे परिवार, कुल, गोत्र आदि की अवधारणा आगे बढ़ी, और समाज का एक सुसंगठित रूप सामने आया| यों प्रकृति ने तो सारे स्त्री पुरुषों को स्वतंत्रता दे रखी थी कि कोई भी स्त्री किसी भी पुरुष से मिलकर सृष्टि को आगे बढ़ाने का कार्य कर सकती थी, किंतु क्रमशः विकसित सौंदर्य दृष्टि तथा विशिष्ट रुचियों ने किसी खास स्त्री के लिए पुरुषों में अथवा किसी खास पुरुष के लिए स्त्रियों में संघर्ष या प्रतिस्पर्धा की स्थिति को जन्म दिया| इस संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए विवाह की व्यवस्था शुरू की गई, जिसके अंतर्गत किसी स्त्री के किसी पुरुष के साथ संबंध को सामाजिक स्तर पर इस तरह स्थिर कर दिया गया कि कोई बाहरी पुरुष या स्त्री उसमें हस्तक्षेप न कर सके| जो स्त्री किसी पुरुष के साथ विवाह बंधन में बंध गई, उसे पाने की किसी अन्य पुरुष की कोशिश को अपराध बताया गया और उसके साथ बलात सहवास के प्रयास को दंडनीय घोषित किया गया| विवाहिता स्त्री के लिए भी वैवाहिक संबंधों के बाहर यौन संबंध बनाने से कड़ाई से रोका गया|
स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंधों के बारे में भारत की अवधारणा पश्‍चिमी देशों के मुकाबले अधिक व्यावहारिक तथा उदार थी| यहॉं यौन संबंध या 'सेक्स' पाप नहीं था| पाप या अपराध था समाज के निर्धारित नियमों को तोड़ना| किसी स्वतंत्र स्त्री या कुमारी से दैहिक संबंध बनाना न पाप था न अपराध| विवाह के लिए यौन शुचिता की कोई शर्त या आग्रह नहीं था| किंतु विवाहिता के साथ संबंध बनाना अपराध था| यहॉं यह अवश्य कहा जा सकता है कि विवाह के दायरे के बाहर यौन संबंध बनाने के मामले में पुरुषों के प्रति भारतीय समाज के नियम जहॉं काफी उदार थे, वहॉं स्त्रियों के प्रति कठोर| इसका कारण व्यावहारिक था| किसी भी यौन संबंध के बाद स्त्री के गर्भवती हो जाने का खतरा था और उससे भी बड़ी समस्या थी उस गर्भ से उत्पन्न होने वाली संतान के लिए| उसका पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा, संस्कार आदि कैसे होंगे, कौन करेगा, उसकी सामाजिक स्थिति क्या होगी, आदि आदि| फिर ऐसी संतान यदि सामाजिक उपेक्षा की शिकार हुई, तो वह कुंठावश अपराध का रास्ता अपना सकती थी| ऐसे में वह स्वयं को बरबाद करने के साथ-साथ समाज के लिए भी हानिकर सिद्ध हो सकती थी| इसलिए समस्या को जड़ से ही रोकने के लिए विवाहिता स्त्री के लिए पति से भिन्न किसी पुरुष के साथ सेक्स को कठोरता से रोका गया और पुरुष के बारे में ढील बरती गई| उसको भी किसी विवाहिता स्त्री पर नजर डालने से दृढ़ता से रोका गया और इसे दंडनीय अपराध करार दिया गया| दूसरे की स्त्री से संबंध यानी 'परदारागमन' को घोर पाप की संज्ञा दी गई|
धर्मशास्त्रों के निर्माता ऋषियों ने माना कि विवाह करने वाली स्त्री एक परिवार के विकास तथा समाज की सुव्यवस्था के लिए अपनी स्वतंत्रता के सुखों की बलि देती है, इसलिए उसे अत्यंत सम्मान का दर्जा दिया गया| किंतु यहॉं स्वतंत्र स्त्री को कभी अपमान का पात्र नहीं बनाया गया, हॉं तुलनात्मक दृष्टि से उसका दर्जा किसी विवाहिता के मुकाबले न्यून अवश्य हो गया| यहॉं गणिकाएँ, वेश्याएँ भी समाज में सम्मानित स्थान रखती थीं| यज्ञादि में पुरोहितों के साथ ही वेश्याओं (वेश्याएँ मूलतः दूसरों के मनोरंजन के लिए नर्तन, गायन करने वाली तथा नाटकों में वेश बदल-बदल कर अनेक पात्रों का अभिनय करने वाली स्त्रियॉं थीं| ये स्वतंत्र स्त्रियॉं होती थीं| इन पर स्थिर दाम्पत्य का प्रतिबंध नहीं था| ये किसी भी पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बना सकती थीं| नाटकों में ये किसी पुरुष की कभी पत्नी, कभी मॉं, कभी बेटी, कभी बहन, कभी प्रेमिका, कभी रानी तो कभी नौकरानी की भूमिका निभाया करती थीं, इसलिए उसे स्थिर संबंध से मुक्त कर दिया गया| राजा उसकी इस स्वतंत्रता की गारंटी भी देता था| कोई पुरुष उस पर अपना एकाधिकार कायम नहीं कर सकता था और न बलात्कार कर सकता था|) को भी सबसे पहले आमंत्रित किया जाता था, क्योंकि यज्ञों में मनोरंजन के कार्यक्रमों की भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी| भारतीय लोक परंपरा में गणिका या वेश्या को शुभ प्रतीकों में गिना गया है| उसे 'मंगलामुखी'बताया गया| क्योंकि वह कभी विधवा नहीं होती| पूरा समाज उसका पालनकर्ता पति है, तो यह समाज तो किसी न किसी रूप में हमेशा जीवित बना रहेगा, इसलिए सारी वेश्याएँ सदैव वैधव्य से मुक्त रहेंगी| इससे यह भी सिद्ध होता है कि पति का अर्थ मालिक नहीं पालनकर्ता होता है| पिता और पति भी अंशतः समानार्थक शब्द ही हैं|
समाज की सुव्यवस्था एवं स्त्री की गरिमा रक्षा के लिए ही शास्त्रकारों ने यह व्यवस्था की कि स्त्री के लिए जन्म से मृत्यु तक रक्षा की गारंटी होनी चाहिए| बचपन में -यानी जन्म से युवा होने तक- पिता उसका पोषक या रक्षक होता है| यौवन काल में यह दायित्व उसके पति के कंधे पर आ जाता है| वृद्धावस्था में पति स्वयं असहाय हो गया रहेगा या मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा, तो वह स्त्री की भी क्या रक्षा कर पाएगा, इसलिए उस समय स्त्री के पोषण-रक्षण का दायित्व पुत्र पर आ जाता है| मनु का प्रसिद्ध श्‍लोक 'पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने, पुत्रः रक्षति वार्धक्ये न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति' इसी अर्थ में है| यह एक आदर्श स्थिति है, लेकिन इसके अंतिम शब्द समूह से यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि शास्त्रकारों ने स्त्री को स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार ही नहीं दिया| वेश्याओं, गणिकाओं आदि के अतिरिक्त ब्रह्मचारिणियों तथा संन्यासिनियों की स्वतंत्र जीवन व्यवस्था का उल्लेख इन्हीं शास्त्रकारों ने किया है|
स्त्री गरिमा रक्षा के लिए ही शास्त्रकारों ने कई अनूठी व्यवस्थाएँ भी कीं| एक तो यह कि जो स्त्री वेश्या नहीं है, लेकिन स्वतंत्र और अविवाहित है, यदि उससे कोई पुरुष दैहिक संबंध स्थापित करता है, तो उसे उस स्त्री के आजीवन भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी| आचार्यों ने इस तरह के हर यौन संबंध को विवाह का प्रमाण-पत्र दे दिया| भारतीय शास्त्रों में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं| वस्तुतः ये विवाह के प्रकार नहीं, बल्कि आठ ही ऐसे तरीके हैं, जिनमें पुरुष स्त्री परस्पर मिल सकते हैं| नौवॉं कोई तरीका ही नहीं है| वेश्या के साथ भी बिना शुल्क दिए सहवास तथा बलात सहवास अवैध एवं दंडनीय घोषित किया| संन्यासिनियों, भिक्षुणियों तथा शिक्षार्थी ब्रह्मचारिणियों के साथ सेक्स भी दंडनीय अपराध था| शास्त्रकारों ने वेश्यावृत्ति का भी नियमन किया और उसे सामाजिक मान्यता तथा सम्मान प्रदान किया| कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में उसके व्यावसायिक अधिकारों की भी चर्चा की है|
कुल मिलाकर आशय यह है कि एक मनुष्य के रूप में अपने देश में स्त्री पुरुष से कतई हीन नहीं है, बल्कि उसे मात्र स्त्री होने के नाते कुछ विशेष सम्मान तथा अधिकार हासिल हैं| किंतु स्त्रियों में विवाहिता स्त्री अधिक सम्मानित है, क्योंकि वह परिवार तथा समाज के लिए अपने उन्मुक्त जीवन के सुखों का त्याग करती है| पति के प्रति एकनिष्ठता के भाव की प्रशंसा में काव्यकारों ने असंख्य पृष्ठ रंग डाले हैं| वैसे दुनिया की कोई ऐसी व्यवस्था नहीं, कोई ऐसा नियम या सिद्धांत नहीं, जिनमें विकृतियों की घुसपैठ न हुई हो या जिनमें सड़न न पैदा हुई हो, यहॉं भी ऐसा हुआ है, लेकिन यहॉं की शास्त्रीय व्यवस्थाओं में स्त्री को गुलाम बनाने की कोई साजिश कभी नहीं रही|
अपने देश में दाम्पत्य तथा स्त्री-पुरुष प्रेम के तीन प्रसिद्ध उदाहरण सर्वाधिक ख्यातिप्राप्त हैं- एक शिव और पार्वती, दूसरे राम और सीता, तीसरे कृष्ण और राधा| इन तीनों उदाहरणों में तीन तरह की स्त्रियॉं हैं और तीनों ही अति पूज्य तथा सम्मानित हैं| इनमें समाज की आदर्श स्त्री सीता हैं, जो व्यवस्था का पालन करने वाली और पति की एकनिष्ठ अनुगामिनी है| दूसरी तरफ राधा अत्यंत उत्कट प्रेम की प्रतीक है| ऐसा प्रेम जो किसी शास्त्रीय, सामाजिक या पारिवारिक बंधन की परवाह नहीं करता| सारे आदर्शों, नियमों, प्रतिबंधों को तोड़कर अपने पति, पुत्र परिवार की उपेक्षा करके प्रेमी कृष्ण से जा मिलने की अदम्य प्रेम भावना को भी इस देश ने आदर दिया है| तीसरी स्त्री सती या पार्वती आम स्त्री के अधिक निकट है| वह पति की हर बात को आँख बंद करके नहीं मानती, कभी-कभी झूठ भी बोल देती है| मायके जाने का भी आकर्षण रहता है| लेकिन जो पति के अपमान पर अपने पिता को भी माफ नहीं करती और उसका यज्ञ विध्वंस कर देती है| और पति शंकर भी कितना सहज है कि पत्नी के झूठ बोलने पर भी उसकी प्रताड़ना नहीं करता| मायके जाने की जिद पर भी झिड़कता नहीं| मना करता है, लेकिन न मानने पर पत्नी की इच्छा का सम्मान करता है और अपने कुछ आदमियों के साथ मायके भेज देता है| जिसने ससुराल कभी न जाने की शपथ ले रखी है, वह पत्नी के निधन की खबर सुनकर पागलों की तरह वहॉं पहुँचता है और उसके अधजले शव को कंधे पर रखकर त्रयलोक्य में भागता फिरता है|
भारतीय मनीषियों ने जीवन को समग्रता में ग्रहण किया है| उन्होंने आदर्शों की सृष्टि की है, किंतु उससे भिन्न स्वाभाविक व्यवहारों को भी स्वीकृति व सम्मान प्रदान किया है| यहॉं पर यह सवाल किया जा सकता है कि तो फिर भारतीय समाज में इतनी विकृतियॉं कहॉं से आ गईं, तो इसका सीधा-सा जवाब है कि यदि शिक्षा और संस्कार लगातार सुधार कार्य न करते रहें, तो हर व्यवस्था बिगड़ जाती है और जंगल-न्याय हावी हो जाता है| दूसरे हमारे यहॉं की अधिकांश विकृतियॉं बाहरी आक्रमणकर्ता जातियों एवं संप्रदायों की देन हैं| ईसाई और इस्लामी आचरण व मान्यताओं ने हमारी समाज व्यवस्था को ही नहीं, हमारी सोच को भी बिगाड़कर रख दिया है|
आज जब स्त्रियॉं अपनी स्तवंत्रता, अपने सम्मान, अपनी गरिमा रक्षा तथा अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर स्त्री की गरिमा का आशय क्या है? उसे समाज में क्यों कोई विशेषाधिकार मिलना चाहिए? क्या केवल इसलिए कि वह स्त्री है?
जी हॉं, स्त्री को केवल स्त्री होने के नाते भी विशेष सम्मान मिलना चाहिए, क्योंकि वह गर्भधारण करती है, स्त्री पुरुष दोनों की जननी है और सृष्टि चक्र को चलाए रखने का दायित्व निभाती है| लेकिन यदि कोई स्त्री यह कहे कि वह बच्चे क्यों पैदा करे, वह पुरुष की रक्षिता क्यों बने, कोई पुरुष उसकी रक्षा का दावा क्यों करे, वह पुरुष निरपेक्ष जीवन क्यों न जिए, तो वह समाज के एक सम्मानित नागरिक का अधिकार अवश्य रखती है, लेकिन अन्य किसी विशेषाधिकार की हकदार नहीं रह जाती|
आज की स्त्रीवादी (फेमिनिस्ट) स्त्रियों को उनके अधिकार अवश्य मिलने चाहिए| हमें पुरानी रूढ़ियों से बाहर निकलना चाहिए| विवाह के बाद कोई स्त्री सिंदूर नहीं लगाना चाहती, चूड़ियॉं नहीं पहनना
चाहती, मंगलसूत्र नहीं लटकाना चाहती, बिछुए अँगूठी के प्रतीक नहीं धारणा करना चाहती, तो यह छूट तो उसको मिलनी चाहिए, लेकिन यदि वह यह कहे कि मैं परिवार को नहीं स्वीकार करती, बच्चे नहीं पैदा करना चाहती, तो फिर उसे विवाह व्यवस्था को भी अस्वीकार करके स्वतंत्र स्त्री का जीवन
अपनाना चाहिए| विवाह भी करना और स्वतंत्र जीवन की आकांक्षा भी पालना दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं, जो एक साथ नहीं चल सकतीं|
आज की स्त्री कहती है कि वह कोई 'सेक्स की गुड़िया' नहीं तो फिर बाकी ऐसी क्या चीज है, जो उसे स्त्रीत्व से मंडित करती है| अपने पुरुषत्व या पुंसत्व के स्तर पर तो पुरुष भी 'सेक्स का गुड्डा' ही है| यह 'सेक्स' ही तो है, जो स्त्री को 'स्त्री' और पुरुष को 'पुरुष' बनाता है| अन्यथा तो दोनों एक जैसे हैं| यौनांगों और यौन रसायनों की भिन्नता ही उनकी भिन्नता और पहचान है| बाकी मामलों में तो दोनों ही समान हैं| स्त्री में से उसके 'स्त्रीत्व' या 'स्त्रीपन' को अलग कर दिया जाए, तो किसी पुरुष को उसकी क्या जरूरत, बाकी काम तो वह किसी पुरुष से भी ले सकता है| ठीक इसी तरह यदि किसी पुरुष से उसके 'पुंसत्व' को अलग कर दिया जाए, तो बाकी बचे पुरुष की स्त्री के लिए भी कोई उपयोगिता नहीं रह जाएगी| बाकी के काम वह किसी स्त्री से भी चला लेगी|
कल-कारखाने चलाना, युद्ध करना, राजनीति करना, वैज्ञानिक अनुसंधान करना, साहित्य रचना इत्यादि ये सब कार्य तो सभी पुरुष और सभी स्त्रियॉं समान रूप से कर सकती हैं| इसलिए इनमें कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए| फिर भी अपनी शारीरिक बनावट तथा सहज प्राकृतिक अभिरुचियों के हिसाब से कुछ काम पुरुष बेहतर कर सकते हैं तथा कुछ काम स्त्रियॉं बेहतर कर सकती हैं| इसलिए सुविधा के लिए रुचि और सामर्थ्य के अनुसार स्त्री-पुरुष में काम का बँटवारा कर दिया जाए, तो इसमें कोई गलत बात तो नहीं, लेकिन नये स्त्रीवादी आंदोलनों को इस पर भी आपत्ति है| प्राचीन समाजों में स्त्री और पुरुष के बीच कार्य विभाजन सुविधा के लिए ही किया गया था| आज उसको आवश्यकतानुसार पुनः संशोधित किया जा सकता है| लेकिन पुरुष विरोधी स्त्री पक्षधरता या स्त्री विरोधी पुरुष पक्षधरता, दोनों ही समाज के लिए हानिकारक हैं|
पश्‍चिम में Aशुरू हुए स्त्री आंदोलन के पहले दो चरण निश्‍चय ही बहुत सार्थक थे| वहॉं की स्त्रियॉं सारे अधिकारों से वंचित वास्तव में गुलामों का जीवन जी रही थीं| उन्हें न संपत्ति रखने का अधिकार था, न उत्तराधिकार पाने का अधिकार था, वे अपने बच्चों के लिए भी नहीं बोल सकती थीं| राजनीतिक स्तर पर सामाजिक तंत्र टूटा, लोकतंत्र आया, लेकिन उस लोकतंत्र में स्त्री को वोट देने का भी अधिकार नहीं था| ऐसे में वहॉं स्त्रीवादी आंदोलन भड़कना स्वाभाविक था और उसकी सार्थकता भी थी| ऐसे आंदोलनों को सफलता भी मिली| देर से ही सही, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्त्रियों के प्रति सहानुभूति जगी| प्रथम और द्वितीय चरण के आंदोलनों में, जो १९वीं शती के प्रारंभ से करीब १९८० तक चला, स्त्री को भारी सफलता मिली| नये युग के लोकतांत्रिक भावना वाले पुरुषों ने भी उनका साथ दिया| उन्हें वोट का अधिकार तो मिला ही, साथ ही संपत्ति का अधिकार, उत्तराधिकार का अधिकार, कार्यस्थल पर काम के समान अवसर तथा समान वेतन पाने का अधिकार, यह सब हासिल हुआ| अब १९८० के बाद का तीसरे चरण का आंदोलन शुद्ध रूप से यौन स्वतंत्रता के अधिकार का आंदोलन है| यह यौन अधिकार केवल स्वतंत्र यौन उपभोग का ही अधिकार नहीं है, बल्कि यह यौन निरपेक्ष व्यक्ति के रूप में जीने का अधिकार बन गया है, जब उसकी पहचान केवल एक व्यक्ति के रूप में हो, न कि एक स्त्री के रूप में|
आज के तकनीकी विकास के युग में इतना तो मानना ही पड़ेगा कि 'परिवार संस्था' या 'परिवार संस्कृति' खतरे में है| पश्‍चिम का 'व्यक्तिवादी' जीवन सिद्धांत जो आज के पश्‍चिमी शैली के लोकतंत्र के भी मूल में है, परिवार को दिनोंदिन अर्थहीन बनाता जा रहा है| स्त्री-पुरुष की सामाजिक समानता के सिद्धांत ने स्त्री की स्थिरता छीन ली है और उसे भी पुरुषों की तरह दिन-रात की भागदौड़ वाली जिंदगी के चक्र में डाल दिया है| आधुनिक स्त्री इस व्यवस्था में प्रसन्न भी है| इसलिए आज के राजनीतिक एवं सामाजिक तंत्र को ऐसी व्यवस्था तो करनी ही चाहिए कि कोई स्त्री बिना किसी परिवार का अंग बने, बिना विवाह किए और बिना बच्चे पैदा किए भी सामान्य मानवीय गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जी सके| वह समुद्र तट पर निर्वस्त्र होकर लेटना चाहती है, तो बिना किसी भय के लेट सके| लेकिन इसके साथ यह भी सत्य है कि इस स्वतंत्रता के साथ कोई स्त्री वह सम्मान अर्जित नहीं कर सकती, जो एक गृहिणी को या एक मॉं को प्राप्त है| मातृत्व त्याग, समर्पण, सेवा, करुणा, प्रेम, ममता आदि गुणों की समन्वित अभिव्यक्ति का प्रतीक है| नारी की गरिमा इन गुणों में निहित है, उसके शरीर में नहीं| हमेशा तप और त्याग सम्मानित हुआ है, भोग और स्वार्थ नहीं|
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गरीबी, अशिक्षा व संस्कारहीनता का दोष
दिल्ली के दामिनी (कल्पित नाम) सामूहिक बलात्कार कांड के बाद पूरी दुनिया के सारे पुरुष कटघरे में खड़े कर दिए गए| बलात्कारी को 'फॉंसी दो, फॉंसी से कम कोई सजा नहीं' की मॉंग करने वाले लोगों ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि ऐसा नृशंस अपराध करने की घृणित मानसिकता क्यों और कैसे पैदा हुई| इस सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल युवकों की पारिवारिक व सामाजिक पृष्ठभूमि का यदि अध्ययन किया जाए, तो यह अच्छी तरह से स्पष्ट हो जाएगा कि इसके पीछे केवल पुरुष मानसिकता नहीं, बल्कि गरीबी, अशिक्षा, कुसंस्कार एवं कुसंगति की भी गहरी भूमिका है| फिल्मों, टी.वी., इंटरनेट आदि पर परोसी जा रही नग्नता एवं कामुकता के साथ शहरी धनी वर्ग के वैभव सिंचित देह प्रदर्शन का भी इसमें कम योगदान नहीं है| क्या कोई कानून व्यवस्था इन अपराधियों के लिए भी कोई दंड विधान करेगी|
इस कांड का सबसे कम उम्र अपराधी -जिसे नाबालिग होने का लाभ मिल गया है- इस कांड का सर्वाधिक क्रूर व बर्बर अपराधी है, लेकिन यदि उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और बचपन के वातावरण को देखा जाए, तो उसके प्रति सहानुभूति पैदा होने लगेगी|
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स्त्रियों को भी अपना नजरिया बदलना होगा
 
समाज में यौन अपराधों (बलात्कार, छेड़छाड़, उत्पीड़न) में हो रही वृद्धि निश्‍चय ही आधुनिक सभ्यता की देन है| यह आधुनिक सभ्यता पश्‍चिमी देशों से फैली, इसलिए उसे पश्‍चिमी सभ्यता का भी नाम दे दिया गया है| आदिम समाजों में या आज के भी आदिवासी समाजों में यह समस्या नहीं है| इस आधुनिक सभ्यता ने एक तरफ तो 'यौन संबंधों' को ही अपराध बोध से भर दिया और दूसरी तरफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च मानव मूल्य बना दिया| पश्‍चिमी देशों में इसके वाजिब कारण हैं| वहॉं की दास प्रथा ने जहॉं आधी से अधिक जनसंख्या की निजी स्वतंत्रता का अपहरण कर रखा था, वहीं चर्च ने स्त्री को पाप मूर्ति बना दिया था| इसलिए वहॉं उभरी मानव मुक्ति की कामना ने सीधे पूर्ण वैयक्तिक स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य बनाया|
पश्‍चिमी देशों में यौन संबंधों के नियमन के लिए विवाह व्यवस्था तो विकसित हुई, लेकिन वहॉं संयुक्त परिवार, कुल, गोत्र, जाति आदि की व्यवस्था नहीं पनप सकी| इस व्यवस्था के अभाव में पश्‍चिमी समाज के गठन का मूल आधार 'रिलीजन' बना| पश्‍चिम में व्यक्ति की स्वतंत्रता को नियमित करने वाली एकमात्र व्यवस्था 'रिलीजन' थी, इसलिए जब 'रिलीजन' का प्रभाव कमजोर पड़ा, तो व्यक्ति स्वतंत्रता को नियमित करने वाली बीच की कोई और व्यवस्था नहीं थी| इसके विपरीत पूर्व की यानी भारत की समाज व्यवस्था कुल-गोत्र आदि पर आधारित थी, इसलिए यहॉं रिलीजन का कभी कोई सामाजिक वर्चस्व नहीं था| लेकिन उपनिवेशीकरण (कोलोनाइजेशन) के युग में जब पश्‍चिम के लोग भारत जैसे देशों में पहुँचे, तो उन्होंने अपनी सामाजिक स्थापनाएँ यहॉं के लोगों पर भी थोप दीं|
यहॉं के अंगे्रजी पढ़े तथा पश्‍चिमी सभ्यता से सभ्य बने समाज में पश्‍चिम के सारे रोग आ गए| देश का निचला समाज अभी भी परिवार, कुल, गोत्र में बँधा है, लेकिन उससे निकल कर जो व्यक्ति आधुनिक शहरी परिवेश में पहुँच रहा है, वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संस्कृति में दीक्षित हो रहा है| यौन स्वतंत्रता भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही अंग है| लेकिन वहॉं दोहरे प्रतिबंध हैं| भारतीय परंपरा भी मुक्त यौन संबंधों की छूट नहीं देती और पश्‍चिमी परंपरा भी उस पर प्रतिबंध लगाती है| फर्क यही है कि भारतीय परंपरा में 'स्त्री-पुरुष' का दैहिक संबंध कोई पाप कर्म नहीं है| यहॉं यदि संबंधों का नियमन किया गया है, तो वह समाज की सुव्यवस्था के लिए, किंतु पश्‍चिम में यह शुद्ध पाप कर्म है| चर्च ने तो हर तरह के यौन संबंध को 'मूल पाप' और उसमें शामिल होने वाली स्त्री को 'पापिनी' करार दे दिया है| वहॉं शुद्ध और पवित्र स्त्री तो केवल वह है, जो 'सेक्स' से पूरी तरह दूर रहकर पूर्ण 'ब्रह्मचर्य' का पालन करते हुए चर्च के आश्रय में रहकर साधनामय जीवन बिताए| सेक्स से या संभोग से स्त्री अपवित्र हो जाती है, यह धारणा भारतीय परिवेश में भी इतने गहरे तक पैठ गई कि इसे भारतीय संस्कृति के आधार से भी जोड़ दिया गया| सेक्स के साथ इस 'पाप बोध' का ही परिणाम है कि बलात्कार या छेड़छाड़ (मोलेस्टेशन) की शिकार स्त्री स्वयं अपने पापबोध में गड़ जाती है| वह अपने को ही दूषित, अपवित्र तथा भ्रष्ट मानने लगती है और समाज के सामने सहज भाव से अपने ऊपर किए गए अपराध का प्रतिकार करने के बजाए अपना मुँह छिपाने लगती है और आत्महत्या करके अपना जीवन ही समाप्त करने पर उतारू हो जाती है| समाज भी उसे पतिता व भ्रष्ट करार देकर नीची निगाह से देखने लगता है|
जाहिर है इस दलदल से यदि स्वयं स्त्री को बाहर निकलना है या सभ्य समाज उसे बाहर निकालने के लिए उत्सुक है, तो दोनों को ही अपना नजरिया बदलना होगा| सबसे पहले तो स्त्री को स्वयं यह साहस करना होगा कि वह इस अवधारणा को नकारे कि बलात्कार से वह दूषित, पतित या भ्रष्ट हो गई है| दूसरे उसे स्वेच्छा से बनाए गए अपने यौन संबंधों को भी स्वीकार करने का साहस दिखाना होगा| विवाह में पति को कुमारीत्व का उपहार देना प्रशंसनीय बात हो सकती है, लेकिन इसकी कोई अनिवार्यता तो नहीं कि इसके लिए कुमारीत्व का नाटक किया जाए या कृत्रिम 'सतीच्छद' का निर्माण कराया जाए| पढ़ी-लिखी तथा आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर युवतियॉं यदि इसकी पहल करेंगी, तो धीरे-धीरे पूरे समाज का भी नजरिया बदलेगा|
यदि हम 'सेक्स' को विवाह और संतानोत्पत्ति से अलग करके देखना चाहते हैं, तो 'सेक्स' को हमें सामान्य दैहिक व्यवहार की तरह स्वीकार करना पड़ेगा और इसके साथ जुड़ी पवित्रता-अपवित्रता या पाप-पुण्य की भावना को नकारना होगा| हमें आधुनिक स्वच्छंदता के युग में जीना है, तो हमें पुरुष की भी यौन प्रवृत्तियों और आकांक्षाओं को समझना और उसका सम्मान करना होगा, अन्यथा हमें फिर से उस पुरानी व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार होना पड़ेगा, जिसमें अपने ढंग से स्त्री सुरक्षा के उपाय किए गए थे तथा वैयक्तिक स्वतंत्रता की भी सीमाएँ नर्धारित की गई थीं|.
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समाज का दोहरापन
हमारे समाज की विडंबना यह है कि उसकी जीवनशैली तो आधुनिक हो गई है, लेकिन उसके जीवन मूल्य या सामाजिक आदर्श पुराने ही चलते आ रहे हैं| भारत की पुरानी सामाजिक अवधारणाएँ तत्कालीन सामाजिक आर्थिक व्यवस्थाओं के आधार पर बनी थीं, अब आज यदि वे व्यवस्थाएँ बदल गई हैं, तो उन अवधारणाओं को भी बदल दिया जाना चाहिए| आज शैक्षिक एवं आर्थिक आवश्यकताओं के कारण विवाह की आयु की कोई ऊपरी सीमा नहीं रह गई है, नीचे की सीमा को भी बढ़ा दिया गया है| इस सीमा निर्धारण में पुरुष-स्त्री के जैविक परिवर्तनों या आवश्यकताओं का कोई ध्यान नहीं रखा गया है| स्त्री-पुरुष की विवाह की आयु बढ़ाने का एक कारण जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित भी करना था| लेकिन यह करते समय यह ध्यान नहीं रखा गया कि 'प्यूबर्टी एज' (यौन सक्रियता का प्रारंभ काल) आने के बाद लड़के-लड़कियों की कामेच्छाओं का क्या होगा| आदर्शवादी यह अपेक्षा कर सकते हैं कि विवाह होने तक उन्हें संयम बरतना चाहिए| किंतु यह नितांत अप्राकृतिक अपेक्षा है| सेक्स को नियमित, नियंत्रित व वैधानिक बनाने का एक ही तरीका है कि प्रकृति के साथ संतुलन बैठाते हुए उसका नियमन किया जाए|
भारतवर्ष के पुराने समाज शास्त्रियों ने यही किया था| उन्होंने लड़की के रजस्वला होने (जब उसमें काम भावना का जागरण होता है या जब प्रकृति उसे संतानोत्पत्ति लायक करार दे देती है) के पहले ही या उसके तुरंत बाद विवाह की व्यवस्था की थी| यह भी विधान किया था कि यदि लड़की का पिता या भाई रजस्वला होने के एक साल बाद तक उसका विवाह न कर दे, तो लड़की स्वयं अपना वर चुन कर विवाह कर ले| यह व्यवस्था 'सेक्स' को नियमित करने के लिए की गई थी| लड़कों की यह आयु परिवार व समाज से दूर गुरुकुल में बीतती थी, जहॉं उनको अपने काम भाव पर नियंत्रण रखने वाली जीवनचर्या का पाठ पढ़ाया जाता था| उन्हें कामोद्दीपक हर वस्तु से दूर रखने का प्रयास किया जाता था| उनका किसी स्त्री के साथ मिलना वर्जित था| गुरु पत्नी को भी दूर से प्रणाम करने का निर्देश था| दैहिक शृंगार, संगीत आदि से दूर ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने के लिए शिक्षित किया जाता था| ब्रह्मचर्य, विद्यार्थी की जीवनशैली का पर्याय था और शिक्षाक्रम या विद्यार्थी जीवन समाप्त होते ही (दीक्षांत स्नान के बाद) उसके विवाह की व्यवस्था कर दी जाती थी| शिक्षा समाप्ति का लगभग अगला ही दिन उसके गृहस्थ जीवन यानी वैवाहिक जीवन का प्रारंभ होता था| यह प्रकृति के अनुकूल व्यवस्था थी| गुरुकुल में रहने वाली लड़कियों के लिए भी यही व्यवस्था थी| वे पुरुषों से दूर स्त्री आचार्याओं के अनुशासन में रहती थीं और दीक्षांत के बाद उनके भी विवाह की व्यवस्था कर दी जाती थी|
लेकिन अब यह व्यवस्था समाप्त हो चुकी है| आज लड़की-लड़के दोनों ही कॅरियर की दौड़ में हैं| सह शिक्षा व्यवस्था में यौवनागमन के बाद भी वे साथ-साथ रह रहे हैं, शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं या कामकाज कर रहे हैं| लेकिन दोनों के बीच वर्जना की दीवार खड़ी है| परिवार और समाज ने एक तरफ तो विवाहपूर्व यौन संसर्ग को वर्जित किया हुआ है, दूसरी तरफ विवाह को अनिश्‍चितकाल के लिए टाल रखा है| ऐसे में जो हो सकता है, वह हो रहा है, लेकिन उसे पाप और अपराध के नजरिए से देखा जा रहा है| ज्यादातर युवाओं की इसके लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि वे तलवार की धार पर चलते हुए परिवार तथा समाज के आरोपित संयम एवं वर्जनाओं का पालन कर रहे हैं| अभी भी उनका प्रतिशत कम है, जो वर्जनाओं का निर्वाह नहीं कर पाते और प्राकृतिक आकांक्षाओं के प्रवाह में बह जाते हैं, किंतु उन्हें भी इसके लिए दोषी नहीं करार दिया जा सकता| यदि उन्होंने कोई अपराध किया है, तो उसका दोषी वह समाज तथा परिवार है, जिसने उन्हें दोहरे प्रतिबंधों के शिकंजे में डाल रखा है, ऐसे में पहली जरूरत है कि समाज अपना दोहरापन छोड़े और व्यावहारिक व्यवस्था की तलाश करे|
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कितने सार्थक कठोर कानून!
स्त्री के विरुद्ध अपराध के मामले में कानूनी व्यवस्था अवश्य कठोर होनी चाहिए, लेकिन केवल कानून समस्या का समाधान नहीं है| पहली बात तो यह कि कानून कितने ही कठोर कर दिए जाएँ, लेकिन यहॉं की पुलिस व्यवस्था और न्याय प्रणाली उसे विफल कर देगी| दूसरे यह कि
स्त्री -पुरुष संसर्ग तथा काम भावना से जुड़े इस तरह के अपराधों में अपराधी को सजा मिल भी जाए, तो भी स्त्री की सम्मान रक्षा नहीं हो सकती| कड़े कानून और कठोर सजा के प्रावधान स्त्री के विरुद्ध अपराध को कम करने में शायद कुछ सहायक सिद्ध भी हों, लेकिन वे बलात्कार की शिकार स्त्री को लांछित और अपमानित होने से नहीं बचा सकते| आज भी दिल्ली के चर्चित बलात्कार कांड की शिकार युवती का नाम छिपाया जा रहा है| इस घटना के बाद से अब तक बलात्कार और हत्या के ५० से अधिक मामले सामने आ चुके हैं| इनमें कई ऐसे हैं, जिनमें स्त्री ने आत्महत्या कर ली है| आखिर क्यों? किसी लड़की के साथ बलात्कार हो गया, तो इसमें उसका क्या दोष? वह क्यों पतिता हो गई? उसे क्यों मुँह छिपाना पड़ता है? वह क्यों सिर उठाकर सामान्य जिंदगी नहीं जी सकती? किसी लड़के के छूते ही दूषित क्यों हो जाती है? इन सवालों के जवाब किसी कानून या अदालत के पास नहीं है| कानून जरूर कठोर होने चाहिए, सजा जरूरी कड़ी मिलनी चाहिए, लेकिन स्त्री की गरिमा या उसका सम्मान समाज के नजरिए पर निर्भर है, न कि कानून या अदालत की कार्रवाई पर|