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सोमवार, 23 नवंबर 2009

ओबामा क्यों बिछ गये यों चीन के आगे

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पिछले दिनों चार एशियायी देशों- जापान, चीन, सिंगापुर एवं द. कोरिया- की यात्रा पर थे। इस यात्रा में उनका सर्वप्रमुख पड़ाव चीन का था। बड़ी आशाएं लेकर वह चीन गये थे, लेकिन एक भी पूरी नहीं हो सकीं। चीन का सहयोग पाने के लिए वह उसके सामने बिछ गये, लेकिन चीन ने तनिक भी रियायत नहीं बरती। उलटे उसने अमेरिकी राषट्रपति को अपने एजेंडे पर नचाया। यों, ओबामा की यह पूरी यात्रा ही विफल रही, लेकिन चीन में तो उन्हें भारी कूटनीतिक पराजय का मुंह देखना पड़ा। चीन ने उनका भरपूर राजनीतिक इस्तेमाल किया और बीजिंग में उनकी उपस्थिति को यह प्रदर्शित करने में अधिक उपयोग किया कि वह बाहरी दबावों को किस तरह परे धकेल सकता है और विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति से भी अपनी बातें मनवा सकता है।
आश्चर्य होता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा चीन के आगे इस तरह बिछ गये कि वह जो कुछ कहता गया, सब मानते गये और जितना झुकाता गया, उतना झुकते गये। जापान के सम्राट अकाहितो के आगे वह कहां तक झुक गये, यह तो सभी ने देखा, लेकिन चीन में तो लगता है वह पाणिपात की ही मुद्रा में आ गये थे। फिर भी चीन उनकी किसी अदा पर नहीं पसीजा और उनकी हर उस मांग को ठुकरा दिया, जिसे मनवाने की आशा लेकर वह उसके दरबार में गये थे। ओबामा की इस यात्रा के दौरान चीन ने यह अच्छी तरह प्रदर्शित किया कि बाहरी दबावों का न केवल वह आसानी से मुकाबला कर सकता है, बल्कि विपरीत स्थितियों में भी अपनी बातें पहले मनवा सकता है।
राष्ट्रपति ओबामा एशिया की पहली लंबी यात्रा पर 13 नवंबर को सबसे पहले जापान पहुंचे, वहां से सिंगापुर, फिर सिंगापुर से चीन और वहां से दक्षिण कोरिया। इनमें से दक्षिण कोरिया तो अमेरिका की रियाया ही है, इसलिए उसे तो इस यात्रा के आकलन से बाहर ही कर देना चाहिए। अब यदि बाकी तीन देशों की यात्राओं का मूल्यांकन करें, तो यही कहना पड़ेगा कि तमाम सार्वजनिक लोकप्रियता के बावजूद ओबामा की यह यात्रा पूरी तरह विफल रही।
यों शुरुआत बहुत निराशाजनक नहीं रही। यात्रा के प्रथम चरण में ओबामा जब टोकियो पहुंचे, तो निश्चय ही उनका एक विश्व नेता की तरह स्वागत हुआ। टोकियो की सड़कों पर लोग वर्षा के बावजूद उनके स्वागत में खड़े थे और नारे लगा रहे थे। यहां वह जापान के सम्राट अकाहितो से एकदम कमर तक झुक कर (कोर्निस की मुद्रा में) मिले। जापानी संस्कृति में झकने का अर्थ सम्मान प्रकट करना होता है। जितना अधिक झुकना उतना अधिक सम्मान। तो ओबामा साहब अधिकतम सम्मान प्रदर्शित करने के लिए कमर तक झुक गये। एक बुजुर्ग राष्ट्र प्रमुख को सम्मान देना कतई अनुचित नहीं, लेकिन ओबामा साहब ने ध्यान नहीं रखा कि अकाहितो जापानी राजशाही के अवशिष्ट प्रतीक हैं, जबकि वह स्वयं दुनिया के एक सर्वाधिक शक्तिशाली लोकतंत्र के प्रधान हैं। झुकें , लेकिन झुकने की भी तो कोई सीमा होनी चाहिए। खेद की बात यह है कि इतना झुकना भी जापानी नेताओं के साथ बातचीत में कोई काम नहीं आया। 'कांतेई(जापानी ह्वाईट हाउस) में बंद दरवाजों के पीछे जब प्रधानमंत्री यूकिओ हातोयामा के साथ बातचीत शुरू हुई, तो ओबामा को पता चला कि यहां का वातावरण टोकियो की सड़कों की तरह का नहीं है। अमेरिका, जापान के फ्यूटेन्मा स्थित अपने नौसैनिक एवं वायु सैनिक अड्डे के दक्षिणी द्वीप पर स्थापित करना चाहता है, लेकिन जापान इसके लिए सहमत नहीं है। वास्तव में जापान इस पुराने अड्डे को ही बंद कराना चाहता है, क्योंकि अब यह अमेरिकी अड्डा देश में बेहद अलोकप्रिय हो चुका है। ऐसे में नये अड्डे की स्वीकृति एक मुश्किल काम है, जबकि अमेरिका के लिए यह आवश्यक है। मतभेदों की गहराई को देखते हुए दोनों पक्षों ने इस मुद्दे पर विचार के लिए एक 'कार्यदल बनाने का निर्णय लेकर फिलहाल बातचीत को टाल दिया। वस्तुत: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने जापान को उसके सैन्य अधिकार से वंचित कर दिया और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। जापान को इसका लाभ भी हुआ, क्योंकि उसे रक्षा की चिंता छोड़कर अपने आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने का पूरा मौका मिला। लेकिन इससे उसका स्वाभिमान अब तक आहत बना हुआ है, इसलिए हर जापानी चाहता है कि जापान को स्वतंत्र सैन्य विकास का अवसर मिले और अमेरिका अपनी सेना पूरी तरह से वहां से हटा ले। जापानी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका और जापान के बीच सबसे बड़ा अकेला द्विपक्षीय सवाल यही है कि शीत युद्धकालीन उनके रक्षा गठबंधन को आज के समय में कैसे प्रासंगिक बनाये रखा जाए, जबकि बढ़ती चीनी शक्ति ने इस क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बिल्कुल बिगाड़ दिया है। किन्तु दोनों ही देश इस सवाल से आंखें चुराते नजर आते हैं।
ओबामा का अगला पड़ाव सिंगापुर था, जहां 'एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग सम्मेलन (एशिया पैस्फिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन कांफ्रेंस) में शामिल होना था। इस सम्मेलन ने इस वर्ष जो सुर्खियां बटोरीं वे निश्चय ही अमेरिकी पसंद की नहीं होंगी। इस संगठन में चीन और जापान भी शामिल हैं। इन देशों ने जल्दबाजी में बुलायी गयी एक सुबह नाश्ते की बैठक में इसी बात की पुष्टि की कि 'मौसम में बदलाव के सवाल पर अगले महीने कोपेनहेगेन में जो सम्मेलन होने जा रहा है, उसके पूर्व वे अपने मतभेदों को दूर नहीं कर सकेंगे।
यहां से ओबामा बीजिंग पहुंचे। वहां भी उनका बाहर स्वागत सत्कार बहुत शानदार था। चीन सरकार ने उनके सम्मान में एक भव्य भोज का भी आयोजन किया। सब कुछ ऐसा कि ओबामा अभिभूत थे। पर चीनी नेताओं ने ओबामा की कूटनीतिक शिथिलता का पूरा फायदा उठाया और उनसे चीन की सारी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का समर्थन कराने के बावजूद एक भी अमेरिकी मांग स्वीकार नहीं की। उन्होंने केवल उसी अमेरिकी प्रस्ताव को स्वीकार किया, जो चीन के हित में था, बाकी सारे मसलों पर टका सा जवाब दे दिया।
अमेरिकी दैनिक न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि 'चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के साथ 6 घंटे की बैठक, दो भोज तथा 30 मिनट की न्यूज कांफ्रेंस के दौरान- जिसमें हू ने किसी को सवाल करने की इजाजत नहीं दी थी- राष्ट्रपति ओबामा का मुकाबला एक ऐसे तेजी से उभर रहे चीन से हुआ, जो अमेरिका को केवल नकारने में अधिक रुचि रखता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि चीन ने अमेरिकी एजेंडे में शामिल अधिकांश बातों को नकार दिया।
अमेरिकी एजेंडे में तीन प्रमुख मुद्दे थे। एक तो ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम नियंत्रण। दूसरा चीनी मुद्रा युआन का मूल्य सही करना और तीसरा मानवाधिकारों का सम्मान, जिसमें तिब्बत का मसला भी शामिल था। चीन ने इनमें से किसी भी अमेरिकी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। राष्ट्रपति हू ने ईरान पर संभावित प्रतिबंध की सार्वजनिक तौर पर कोई चर्चा नहीं की। उन्होंने चीनी मुद्रा का मूल्य ठीक करना भी स्वीकार नहीं किया। चीन जानबूद्ब्राकर अपनी मुद्रा युआन का विनिमय मूल्य उसके वास्तविक मूल्य से कम रखे है जिससे कि उसका माल विदेशों में सस्ता पड़े और निर्यात को प्रोत्साहन मिले। उसकी इस नीति के कारण अमेरिका को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है, क्योंकि चीनी माल वहां सस्ते पड़ रहे हैं और दोनों देशों का व्यापारिक संतुलन चीन की तरफ द्ब्राुका हुआ है। यानी चीन अमेरिका को निर्यात अधिक करता है आयात कम। और मानवाधिकार के सवाल पर तो चीन ने संयुक्त घोषणापत्र में डंके की चोट पर कहा है कि इस मुद्दे पर दोनों देशों में मतभेद हैं यानी वह मानवाधिकार की अमेरिकी अवधारणा को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
चीन ने ओबामा की यात्रा का ऐसा सुनियोजित एवं सूक्ष्म प्रबंध किया था कि इसमें चीनी मत की पुष्टिï हो और अमेरिकी विचार चर्चा में भी न आने पाएं। चीन ने ऐसी व्यवस्था की कि ओबामा ऐसे बयान दें जिससे चीनी नीतियों की पुष्टिï व उसके उद्देश्यों का समर्थन हो। उसने बड़ी चतुराई से ऐसा कुछ किया कि मानवाधिकार तथा चीनी मुद्रा जैसे विषयों पर कोई चर्चा न हो। कार्नेल यूनिवर्सिटी में चीन मामलों के विशेषज्ञ ईश्वर एस. प्रसाद के अनुसार चीन ने बड़े अद्भुत कौशल से सार्वजनिक चर्चा को चीनी मुद्रा नीति के दुनिया पर पड़ रहे खतरनाक प्रभाव से हटाकर अमेरिका की ढीली वित्तीय नीति तथा उसकी संरक्षणवादी प्रवृत्ति की ओर मोड़ दिया।चीन के ऐसे प्रबंध के कारण ओबामा की इस चीन यात्रा से चीन को यह प्रदर्शित करने का बेहतर अवसर मिला कि किस तरह वह बाहरी दबावों को बिना प्रयास दूर धकेल सकता है और अमेरिका का अपना एजेंडा चर्चा से बाहर रह गया।
अपनी यात्रा शुरू करते ही सबसे पहले ओबामा ने यह घोषणा की कि तिब्बत चीन का अंग है। चीन को प्रसन्न करने के लिए ही उन्होंने वाशिंगटन में तिब्बती नेता दलाई लामा से मिलने से इनकार कर दिया था। ओबामा के चीन पहुंचने पर अमेरिकी पक्ष से कहा गया कि राष्ट्रपति चीनी युवाओं से मुलाकात करना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि इस मुलाकात को टीवी पर दिखाया जाए और उसे नेट पर भी ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाए। चीन ने इसकी भी व्यवस्था कर दी। शंघाई पहुंचने पर ओबामा को युवाओं से मिलने का मौका दे दिया गया, किन्तु इसमें सामान्य छात्रों के बजाय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को प्रमुखता से पेश किया गया। सरकार ने इसे शंघाई टीवी पर प्रसारित किये जाने की भी सुविधा दे दी। ओबामा ने युवाओं को प्रभावित किया, लेकिन मानवाधिकारों व अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर बहुत संभल कर बोले। उन्होंने 'नेट पर मुक्त सूचना प्रवाह का भी समर्थन किया, लेकिन काफी सावधानी के साथ जैसे यह कहा कि हर देश की अपनी संस्कृति होती है, अपनी आवश्यकता होती है, जिसके अनुसार वह अपनी व्यवस्था कर सकता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि चीन में नेट पर जो सूचनाएं प्राप्त होती है वे सरकारी तंत्र की छनाई के बाद ही आ पाती है। ओबामा ने यह जरूर कहा कि मुक्त सूचना प्रवाह से किसी भी देश या समाज की शक्ति और बढ़ सकती है मगर उन्होंने चीनी व्यवस्था की कोई निन्दा आलोचना नहीं की। उनकी नजर अगले दो दिन की उन मुलाकातों पर अधिक थी जो चीनी नेताओं के साथ होने वाली थी।
ओबामा असल में बड़ी आशाएं लेकर चीन की इस यात्रा पर गये थे। आर्थिक मंदी के कारण संकट के दौर से गुजर रहे अमेरिका के लिए चीन एक उद्धारक देश नजर आ रहा था। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा साहूकार है और सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार भी। ऐसे में चीन की थोड़ी सी रियायत भी अमेरिका के लिए काफी मददगार सिद्ध हो सकती थी किन्तु चीन ने ओबामा की राई रत्ती नहीं सुनी।
ऐसे में सच कहा जाए तो ओबामा की इस यात्रा के दौरान अमेरिका के हाथ कुछ नया नहीं लगा। यद्यपि ओबामा सरकार के अधिकारियों का दावा है कि राष्ट्रपति महोदय जिन लक्ष्यों को लेकर यात्रा पर गये थे उन्हें पूरा कर लिया गया है, लेकिन इस दावे की पुष्टि के लिए उनके पास कोई प्रमाण नहीं है। उनके अनुसार ओबामा की चीनी नेताओं के साथ बातचीत के बाद जारी पांच सूत्रीय संयुक्त विज्ञप्ति में अनेक मसलों पर दोनों देशों ने मिलकर काम करने का संकल्प लिया है। बयान में कहा गया है कि ओबामा और हू जिंताओ आपस में नियमित रूप से बातचीत करते रहेंगे और दोनों देश एक दूसरे की रणनीतिक चिन्ताओं की ओर अधिक ध्यान देंगे। बयान में यह भी कहा गया है कि दोनों देश आर्थिक मामलों, ईरान तथा मौसम में बदलाव के मसलों पर साझीदार की तरह कार्य करेंगे।
संयुक्त वक्तव्य के इन वाक्यों को देखकर कोई भी कह सकता है कि इनमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो अमेरिका के पक्ष में हो बल्कि इसमें अमेरिका को चीन के पक्ष में द्ब्राुकाने का प्रयत्न है। कूटनीतिक विशेषज्ञ जानते हैं कि ऐसी शब्दावलियों का क्या अर्थ होता है। यहां मुख्य सवाल यह है कि चीन की नाराजगी से बचने के लिए अब ओबामा ने वाशिंगटन में दलाई लामा से मिलने से इनकार किया उस समय की स्थिति के मुकाबले क्या चीन या किसी अन्य एशियायी देश में ओबामा अपना अमेरिकी एजेंडा कुछ भी आगे बढ़ाने में सफल हुए हैं। जवाब नकारात्मक ही मिलेगा।
जापान में उनके रवैये से लगता है कि ओकीनावा में अमेरिकी सैनिक अड्डा बनाने के सवाल पर अमेरिकी रुख और नरम हुआ है। सिंगापुर के क्षेत्रीय सम्मेलन में अमेरिका की एक और सर्वोच्च प्राथमिकता वाली विदेशनीति को आघात लगा जब उन्होंने वहां स्वीकार किया कि 'वैश्विक तपन (ग्लोबल वार्मिंग) के खिलाफ लड़ाई का कोई समझोता इस वर्ष संभव नहीं है। ईरान के मसले पर अमेरिकी अधिकारी रूस के राष्ट्रपति दिमित्र ए. मेद्वेदेव को तो यह कहने के लिए तैयार कर ले गये कि 'यदि बातचीत विफल हो जाती है तो ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों के सवाल पर उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं है।लेकिन यही बात ओबामा चीन से नहीं कहला सके। जबकि यह पता है कि ईरान के विरुद्ध किसी प्रतिबंध के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के लिए चीन की पूर्वानुमति आवश्यक होगी। चीन ने इस मसले पर अमेरिका के साथ साझीदार के तौर पर काम करने की बात तो की है, लेकिन साथ ही उसने यह भी कहा है कि 'ईरान नाभिकीय विवाद को बातचीत और सलाह मशविरे से हल किया जाना चाहिए।इतना ही नहीं संयुक्त वक्तव्य में हू ने यह भी कहा है कि 'बातचीत के दौरान हमने राष्ट्र पति ओबामा के समक्ष यह स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय परिस्थितियों की अपनी भिन्नता के कारण हम दोनों के लिए यह स्वाभाविक है कि कुछ मुद्दों पर हम असहमत रहें।
'व्हाइट हाउस के कुछ अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि ईरान के मामले में हम हू जिंताओ से वह नहीं प्राप्त कर सके जो हम चाहते थे, किन्तु ओबामा का तरीका दीर्घकाल में फलदायी होगा। हम यह आशा नहीं कर रहे हैं कि वे इस मामले का नेतृत्व करेंगे या कोई धारा में बदलाव ला देंगे, हम तो केवल यह चाहते हैं कि वे अड़ंगा लगाने का काम न करें। यदि यही लक्ष्य था तो भी चीन की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं था कि वह अमेरिकी रास्ते में अड़ंगा नहीं डालेगा।
संयुक्त वक्तव्य में कुछ बातों को अनावश्यक रूप से प्रमुखता से डाला गया। जैसे कि दक्षिण एशिया के बारे में चीन को दिया गया बेहतर भूमिका निभाने का आमंत्रण। अमेरिका को अच्छी तरह मालूम है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में चीन पूरी तरह पाकिस्तान के साथ है और अफगानिस्तान के प्रति भी चीन की वही नीति है जो पाकिस्तान की है फिर ओबामा साहब को यह जरूरत क्यों पड़ी कि वह संयुक्त बयान में यह घोषित करे कि चीन और अमेरिका मिलकर दक्षिण एशियायी देशों में शांति के लिए काम करेंगे। वास्तव में चीन दक्षिण एशिया में अपनी राजनीतिक भूमिका बढ़ाना चाहता है इसलिए उसने ओबामा को इसके लिए तैयार कर लिया कि दक्षिण एशियायी मामलों यानी भारत पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के मामलों में वे मिलकर काम करेंगे।
संयुक्त वक्तव्य के इस अंश पर भारत की गहरी आपत्ति के बाद चीन व अमेरिका दोनों ने अपनी-अपनी तरफ से सफाई दी है, लेकिन सवाल है ऐसे मुद्दे को संयुक्त वक्तव्य में डाला ही क्यों गया जिस पर बाद में सफाई देनी पड़े, जबकि अमेरिका को तथा राष्ट्रपति ओबामा को यह पता है कि पाकिस्तान के मामले में भारत कितना अधिक संवेदनशील है। भारत की नीति शुरू से ही पाकिस्तान से सम्बद्ध मामले में किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप के खिलाफ है। फिर इसका क्या औचित्य था कि ओबामा साहब दक्षिण एशिया के उस देश के मामले में चीन को हस्तक्षेप करने के लिए आमंत्रित करें जिन्हें वह भविष्य के लिए अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक साद्ब्राीदार मानते हैं।
अमेरिकी अधिकारी कह रहे हैं कि भारत ने इस संयुक्त वक्तव्य में उससे कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया है जितना कि उसमें लिखा गया है। लेकिन कूटनीतिक वक्तव्यों में पंक्तियों के बीच में पढऩा कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं। भारत का यह सवाल करना कुछ बहुत नाजायज तो नहीं कि संयुक्त वक्तव्य में इन वाक्यों की जरूरत क्या थी। जाहिर है कि इसका आग्रह चीन की तरफ से किया गया होगा, जिसे अमेरिकी पक्ष ने सहजता से स्वीकार कर लिया। जाहिर है इस मामले में भी चीन के हाथों ओबामा ही पिटे। उन्होंने अनावश्यक रूप से उन बातों को भी संयुक्त वक्तव्य में शामिल होने दिया, जिसे लेकर उनका एक मित्र देश भारत व्यथित हो सकता है।
अब यदि तटस्थ दृष्टिï से मूल्यांकन करें, तो इसमें ओबामा का कोई दोष नहीं, यह उनके स्वभाव का दोष है। वह समद्ब्राते हैं कि विनम्रता तथा मधुरता से पूरी दुनिया का दिल जीता जा सकता है। उन्होंने यह सीखा कि जापान में झुकना आदर सूचक है, तो वह सम्राट अकाहितो के सामने कमर तक झुक गये। शायद उन्होंने सोचा होगा कि इससे सारे जापानी खुश हो जाएंगे। इसी तरह वह सऊदी अरब के शाह के सामने द्ब्राुके थे। वहां भी उन्होंने यही सोचा होगा कि इससे पूरा इस्लामी जगत उनका मुरीद हो जाएगा। चीन पहुंचकर भी उन्होंने वह सारी बातें की, जो चीन को अच्छी लगें और हर चीनी इच्छा को स्वीकार कर लिया। शायद यह सोचकर कि चीन वास्तव में अमेरिका का सहयोगी बन जाएगा। उन्होंने प्रशांत के दोनों तटों के इन दो महान देशों का हवाला भी दिया और उनके बीच घनिष्ठ सहयोग की बातें की, लेकिन चीनी नेता ऐसे किसी दबाव में नहीं आए। उन्हें दुनिया की पहली महाशक्ति बनना है, तो अमेरिका को पछाड़कर ही आगे बढऩा होगा, उसे साथ लेकर नहीं।
कोई भी बड़ा राजनेता जब किसी देश की यात्रा पर जाता है, तो वह पहले से इसकी पृष्ठïभूमि बना चुका रहता है कि इस यात्रा से उसे क्या उपलब्धि होगी, लेकिन ओबामा ने शायद अपनी इस यात्रा के पूर्व ऐसी कोई तैयारी नहीं की थी। उन्हें शायद अपने करिश्मों पर भरोसा था। शायद उन्हें यह नहीं पता था कि चीन ऐसे करिश्मों से प्रभावित नहीं होता।
हो सकता है, ओबामा अपनी इस यात्रा से कुछ सबक लें। चीन के आगे पूरी तरह बिछकर उन्होंने देख लिया है। निश्चय ही अब उन्हें बेहतर विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। यहां उसकी आवश्यकता नहीं है कि वह एकाएक अकड़कर खड़े हो जाएं और प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति की घोषणा कर दें, लेकिन यदि उनमें जरूरी राजनीतिक संवेदनशीलता है, तो उन्हें इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि एशिया में कौन अमेरिका का सहयोगी हो सकता है, कौन प्रतिस्पर्धी। चीन अमेरिका का आर्थिक साझीदार बन सकता है, किन्तु रणनीतिक तौर पर वह उसका प्रतिस्पर्धी ही रहेगा। इसलिए उसे चीन के साथ सहयोग का संबंध अवश्य कायम करना चाहिए, लेकिन इसके लिए यह तो जरूरी नहीं कि वह एक हीन राष्ट्र की तरह उसके सामनेझुक जाएँ । (रविवार, 22 नवंबर 2009)

बीजिंग घोषणा-पत्र के साये में भारत-अमेरिका वार्ता

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अमेरिका की अपनी बहुचर्चित यात्रा पर आज सोमवार(२३ नवम्बर ) की सुबह (भारतीय समयानुसार) वहां पहुंच चुके हैं। यद्यपि अमेरिका में अभी यह रविवार की अपराह्न का समय रहेगा। वहां के मौसम विभाग की एक रोचक सूचना है कि उनके पहुंचने के अगले दिन यानी अमेरिकी सोमवार को राजधानी में वर्षा का मौसम रहेगा, फिर मंगलवार को चमकती धूप रहेगी, लेकिन अगले दिन यानी बुधवार फिर बादल और वर्षा का दिन रहेगा । यानी पूरे यात्राकाल में धूप-छांव का अच्छा खेल चलता रहेगा। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के पंडितों की नजर में यह मौसम भी भारत-अमेरिका संबंधों के बनते-बिगड़ते रूप को प्रतिबिंबित कर रहा है।
डॉ. सिंह अपनी चार दिन की इस यात्रा में करीब 90 से अधिक घंटे वाशिंगटन में बिताएंगे, फिर वहां से वापसी में त्रिनीदाद व टुबैगो की यात्रा पर जाएंगे। उनकी इस यात्रा में सबसे बड़ा घोषित एजेंडा परमाणु समझौते के कार्यान्वयन का है। प्रधानमंत्री की कोशिश है कि उनकी इस यात्रा पर इस पर हस्ताक्षर हो जाएं, लेकिन अभी अंतिम तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। यद्यपि दोनों तरफ के अधिकारियों का ख्याल है कि दोनों देशों के संयुक्त वक्तव्य जारी होने के पहले सारे मतभेद दूर कर लिए जाएंगे। भारत के स्तर पर जो एक बड़ी बाधा थी, वह दूर कर ली गयी है। उसने भारत में स्थापित होने वाले अमेरिकी परमाणु संयंत्रों में दुर्घटना होने की स्थिति में मुआवजा देने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने का विधेयक संसद में पास कराने का निर्णय ले लिया है। प्रधानमंत्री के अमेरिका रवाना होने के पहले ही कैबिनेट ने उसे स्वीकृति दे दी है। असल में इस विधेयक के बिना अमेरिका बीमा कंपनियां इन परमाणु संयंत्र लगाने वाली अमेरिकी कंपनियों को बीमा सुविधा नहीं देंगी । अब अमेरिका को अपने पक्ष की बाधा दूर करनी है। वह बाधा है अमेरिका द्वारा आपूर्त परमाणु ईंधन के पुनर्संस्करण अधिकार की। आशा की जा रही है कि कुछ शर्तों के आधार पर अमेरिका यह अधिकार दे देगा। यदि ऐसा हो गया, तो प्रधानमंत्री की इसी यात्रा में समद्ब्राौते को अंतिम रूप प्रदान कर दिया जाएगा, अन्यथा इसे फिर और आगे के लिए टाला गया, तो इससे भारत-अमेरिकी संबंधों में थोड़ी खटास पैदा होगी।
भारत अभी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की बीजिंग यात्रा के दौरान जारी संयुक्त विज्ञप्ति के आघात से उबरा नहीं है। यद्यपि उसे लेकर अमेरिका और चीन दोनों ने अपनी-अपनी तरफ से सफाई दी है। फिर भी उससे भारत को संतोष होने वाला नहीं है। भारत अपने को दक्षिण एशिया की एक प्रमुख शक्ति समद्ब्राता है, लेकिन उपर्युक्त संयुक्त विज्ञप्ति में आए उल्लेख से लगता है कि अमेरिकी दृष्टि में भारत का 'क्षेत्रीय शक्ति होने जैसा कोई दर्जा नहीं है। वह अभी भी कोई ऐसा देश है, जिसके आचरण व्यवहार को अमेरिका और चीन जैसे देश नियंत्रित करेंगे। भारत को इस मामले में चीन से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन अमेरिका से अवश्य शिकायत है। यदि उसकी दृष्टि में भारत की इतनी भी स्वतंत्र हैसियत नहीं है कि वह अपने क्षेत्र की स्वयं जिम्मेदारी का व्यवहार कर सके, तो भला अमेरिका के साथ उसकी कोई दोस्ती कैसे हो सकती है।
इसलिए ओबामा के साथ बातचीत में भारत जरूर यह जानना चाहेगा कि वह भारत को उसकी किस हैसियत में अपना साझीदार बनाना चाहता है। अमेरिका चीन संयुक्त विज्ञप्ति में अफगानिस्तान व पाकिस्तान के साथ भारत का जिस तरह उल्लेख किया गया है, वह भारत के लिए बहुत अपमानजनक है। भारत इसके लिए अमेरिका को संदेह का लाभ तो दे सकता है कि वह नासमझी में या गफलत में वैसी शब्दावली पर हस्ताक्षर कर आए, लेकिन इसका भरोसे लायक स्पष्टीकरण उन्हें वाशिंगटन में देना होगा, अन्यथा दोनों देशों के बीच आगे जो भी संबंध होंगे, वे कच्चे ही रहेंगे। भले ही उन्हें दोनों पक्ष कितना ही महिमामंडित क्यों न करें।(२३-११-२००९)

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

ओबामा का 'शर्म -अल -शेख '

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की चीन यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के साथ बातचीत के बाद दोनों नेताओं की तरफ से जो संयुक्त बयान जारी हुआ, उसे लेकर भारत के कूटनीतिक अधिकारी अवाक हैं। इसमें चीन को पूरे दक्षिण एशिया, यानी भारत, पाकिस्तान व अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका निभाने के लिए आमंत्रित किया गया है। इस अवसर पर प्रेस के सामने बोलते हुए हू जिंताओ ने यद्यपि भारत या पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, किन्तु ओबामा ने स्पष्ट किया कि अमेरिका और चीन पूरे दक्षिण एशिया में स्थिर एवं शांतिपूर्ण संबंधों को कायम करने के लिए मिल कर काम करने पर सहमत हो गये हैं। वास्तव में यह भारत-पाकिस्तान व अफगानिस्तान के मामले में कूटनीतिक हस्तक्षेप करने का चीन को दिया गया खुला निमंत्रण है। आश्चर्य है कि ओबामा ने उस देश के मामले में चीन को हस्तक्षेप करने के लिए आमंत्रित किया है, जिसे वह एशियायी क्षेत्र में अपना सबसे बड़ा रणनीतिक साझीदार बताते हैं।
कहा जा रहा है कि संयुक्त वक्तव्य का प्रारूप बीजिंग स्थित उन अमेरिकी कूटनीतिक अधिकारियों ने तैयार किया है, जिनकी भारत के साथ कोई संवेदना नहीं है। ऐसा हो भी सकता है, लेकिन तब तो यह मानना पड़ेगा कि कूटनीतिक मामले में ओबामा भी अपने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की ही तरह लापरवाह हैं। मनमोहन सिंह ने शर्म-अल-शेख में जैसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के दबाव में आकर उस संयुक्त बयान को जारी करने की स्वीकृति दे दी, जो भारतीय हितों व स्वाभिमान के खिलाफ था और जिस पर देश के भीतर एक तरह का हंगामा ही खड़ा हो गयाथा । उसके बारे में भी कहा गया था कि संयुक्त बयान का प्रारूप पाकिस्तान के अधिकारी पहले से ही बनाकर लाए थे और उसे ही मामूली फेरबदल के बाद स्वीकार कर लिया गया। लगता है ऐसा ही कुछ यहां भी हुआ।
खैर, भारत को इसे लेकर बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। कूटनीतिक जगत में ऐसा कुछ होता रहता था। निश्चय ही ओबामा ने भारी चीनी दबावों के कारण संयुक्त वक्तव्य की ऐसी शब्दावली को स्वीकार किया होगा। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा ऋणदाता है। चीनी बाजार भी अमेरिका के लिए सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन यह भी तय है क़ि ओबामा साहब चीन को खुश करने का जितना भी प्रयत्न कर लें, उनके बीच कभी कोई स्वाभाविक दोस्ती नहीं पनप सकती ।
उनकी चीन यात्रा के दौरान जारी यह संयुक्त विज्ञप्ति इस बात का भी प्रमाण है कि ओबामा साहब भाषण चाहे जितना अच्छा दे लें, किन्तु वे निर्णय लेने में कमजोर हैं। उनकी निर्णय लेने की अक्षमता का ही यह परिणाम है कि अमेरिका में भी उनकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे उतरता जा रहा है। भारत के लोगों को प्रतीक्षा करनी चाहिए डॉ. मनमोहन सिंह की अमेरिका की यात्रा का और उसके बाद जारी होने वाले संयुक्त वक्तव्य का। उसके उपरांत ही निर्णय किया जा सकता है कि दक्षिण एशिया के प्रति ओबामा का वास्तविक नजरिया क्या है और इसमें भारत को कितनी और कौनसी जगह हासिल है।

रविवार, 15 नवंबर 2009

अमेरिका, चीन और भारत के संबंधों का एक विश्लेषण

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अमेरिका और चीन आज दुनिया के दो सर्वाधिक श्क्तिशाली देश हैं। इन दोनों केअंतर्संबंध इतने जटिल हैं कि उनकी सरलता से व्याख्या नहीं की जा सकती। उनके बीच न कोई सांस्कृतिक संबंध है, न सैद्धांतिक, बस शुद्ध स्वार्थ का संबंध है। इसलिए न वे परस्पर शत्रु हैं, न मित्र। इनमें से एक भारत का पड़ोसी है, दूसरा एक नया-नया बना मित्र। पड़ोसी घोर विस्तारवादी व महत्वाकांक्षी है। ऐसे में भारत के पास एक ही विकल्प बचता है कि वह अमेरिका के साथ अपना गठबंधन मजबूत करे। यह गठबंधन चीन के खिलाफ नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका भी न तो चीन से लड़ सकता है और लडऩा चाहता है। लेकिन चीन की बढ़ती शक्ति से आतंकित वह भी है और भारत भी। इसलिए ये दोनों मिलकर अपने हितों की रक्षा अवश्य कर सकते हैं, क्योंकि चीन कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, वह अमेरिका और भारत की संयुक्त शक्ति के पार कभी नहीं जा सकता।
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अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा इस समय चार एशियायी देशों- जापान, सिंगापुर, चीन और दक्षिण कोरिया की यात्रा परहैं । यात्रा के पहले चरण में 13 नवंबर को वह जापान पहुंचे। वहां से सिंगापुर जाएंगे, फिर सोमवार 16 नवंबर को बीजिंग पहुंचेंगे। यहां से दक्षिण कोरिया जाने का कार्यक्रम है। निश्चय ही इस श्रृंखला में ओबामा की चीन यात्रा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
21वीं शताब्दी के लिए अमेरिका-चीन संबंधों को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व का 21वीं शताब्दी का स्वरूप अमेरिका चीन संबंधों के स्वरूप पर निर्भर करेगा। भारत के लिए भी आज अमेरिका चीन संबंधों का बहुत महत्व है।
भारत का चीन के साथ संबंध इस समय शत्रुभाव की तरफ द्ब्राुका हुआ है, जबकि अमेरिका के साथ वह साघन मैत्री की तरफ बढ़ रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका और चीन का संबंध न शत्रुतापूर्ण है न मित्रतापूर्ण। दोनों के आपसी संबंध बहुत ही जटिल ढंग से आपस में गुंथे हुए हैं और दोनों परस्पर प्रतिद्वंद्विता के रास्ते पर अग्रसर है। चीन और अमेरिका के आर्थिक संबंध शायद सर्वाधिक घनिष्ठ है, लेकिन अमेरिका की चिंता यह है कि उनका व्यापारिक संतुलन चीन की तरफ द्ब्राुका हुआ है। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है, लेकिन इसका सर्वाधिक लाभ भी चीन ही उठा रहा है। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा साहूकार भी है। उसने काफी बड़ी रकम अमेरिका को कर्ज दे रखी है। इस व्यापारिक असंतुलन को सुधारने के लिए अमेरिका सर्वाधिक चिंतित है। इसी चिंतावश पिछले दिनों उसने चीनी इस्पात की पाइपों पर 99 प्रतिशत का आयात कर लगा दिया। उसने चीनी टायरों के आयात पर भी अंकुश लगाया है। चीन अपने माल से अमेरिकी बाजार को पाट रहा है, ससे अमेरिकी सरकार की चिंता बढऩा स्वाभाविक है, क्योंकि इसके कारण अमेरिकी उद्योग प्रभावित हो रहे हैं और युवाओं में बेरोजगारी बढ़ रही है। वस्तुत: अमेरिका में चीनी माल सस्ता पड़ता है, जिसके कारण अमेरिकी उपभोक्ता भी उसकी तरफ आकर्षित होते हैं।
वास्तव में चीनी माल के सस्ते होने के तीन बड़े कारण हैं। एक तो चीन में मजदूरी दर कम है। कोई श्रमिक कानून न होने के कारण कर्मचारी कम वेतन में अधिक घंटे काम करके अधिक उत्पादन करते हैं। जबर्दस्त मशीनीकरण का भी इसमें भारी योगदान है। दूसरे वहां कच्चामाल, खनिज, बिजली, पानी सस्ते दर पर उपलब्ध हैं। तीसरे चीन की सरकार ने जान-बूझ कर अपनी मुद्रा का मूल्य कम कर रखा है, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिले। अब अमेरिका पहले दो कारणों को लेकर तो कुछ नहीं कर सकता, लेकिन वह चीन पर इसके लिए दबाव डाल सकता है कि वह अपनी मुद्रा का मूल्य बढ़ाए। चीन सामान्य स्थिति में तो अमेरिका की एक न सुनता, लेकिन वह जनता है कि उसके उत्पादित माल की सर्वाधिक खपत अमेरिका में होती है और यदि अमेरिका ने अपने बाजार उसके लिए बंद कर दिये तो उसे भारी व्यापारिक हानि उठानी पड़ सकती है, इसलिए वह अपनी मुद्रा का मूल्य कुछ बढ़ाने का निर्णय ले सकता है। वैसे यह मसला एकदम एकतरफा नहीं है। व्यापारिक संतुलन भले ही चीन के पक्ष में हो, लेकिन चीन अमेरिकी माल के लिए भी एक बहुत बड़ा बाजार है। आशय यह कि अमेरिका की चीन को जितनी जरूरत है उससे कम जरूरत अमेरिका को चीन की नहीं है। इसीलिए अपनी यात्रा के प्रथम चरण में जापान की राजधानी टोक्यो में बोलते हुए ओबामा ने कहा कि विश्व स्तर पर चीन की बढ़ती भूमिका पर अंकुश लगाने का कोई इरादा नहीं है। इसके विपरीत हम चीन की बड़ी भूमिका का स्वागत करते हैं। क्योंकि इस भूमिका में चीन की बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ-साथ उसकी जिम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। एक समृद्ध व सशक्त चीन का आगे बढऩा पूरे विश्व के हित में हो सकता है। वास्तव में अमेरिका को चीन के सहयोग की जरूरत है, क्योंकि 21वीं सदी की चुनौतियों का कोई भी देश अकेले सामना नहीं कर सकता।
ओबामा का यह चीन पहुंचने पूर्व का बयान है। जाहिर है कि वह इस तरह के बयान के द्वारा चीन के साथ वार्ता की पृष्ठïभूमि तैयार कर रहे हैं। चीन वास्तव में एक नितांत संकीर्ण स्वार्थी देश है। उसने अब तक कोई वैश्विक भूमिका निभाने की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया, न कभी इसकी महत्वाकांक्षा ही व्यक्त की। वह केवल अपनी आर्थिक व सामरिक शक्ति बढ़ाने की एकांत साधना में लगा रहा। अब इन दोनों क्षेत्रों में महाशक्तियों के समकक्ष स्थान पा लेने के बाद वह अपनी वैश्विक भूमिका की तरफ आगे बढ़ रहा है, लेकिन उसकी यह वैश्विक भूमिका भी नितांत उसकेआर्थिक व सामरिक हितों से नियंत्रित है। वह दूसरे देशों से संबंध बढ़ा रहा है तो केवल सस्ते कच्चेमाल तथा बाजार की तलाश में। वह यदि कुछ देशों के साथ सामरिक सहयोग कर रहा है तो केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों को घेरने तथा अपने शक्ति विस्तार के लिए। उसने कभी मानवाधिकार, रंगभेद, आर्थिक विषमता आदि को विदेश नीति का आधार नहीं बनाया। लोकतंत्र का तो वह स्वयं अनुपालक नहीं है तो दुनिया की लोकतांत्रिक लड़ाई में वह क्यों कोई भाग लेता। उसने केवल अपने राष्ट्रीय हित को विदेश नीति का आधार बनाया। इसलिए उसने तमाम तानाशाही सरकारों के साथ अच्छे संबंध और उसका लाभ उठाया। वह कभी किसी न्याय की लड़ाई का दावा नहीं करता। म्यांमार में लोकतंत्र का दमन हो रहा है या नहीं इससे उसका कोई लेना देना नहीं। उसने वहां लोकतंत्र के विरुद्ध सैनिक 'जुंटा का समर्थन किया तो केवल इसलिए कि इससे उसे वहां के जंगलों की कीमती लकड़ी तथा कच्चा तेल सस्ते में मिल सकता है। इसी तरह का उसका संबंध पाकिस्तान व अन्य देशों के साथ चला आ रहा है। जबकि भारत का रवैया सदा इसके विपरीत रहा है।
सोवियत संघ के बिखरने के बाद दुनिया ने एक ध्रुवीय रूप धारण कर लिया और अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति बन गया, लेकिन सोवियत संघ का भय खत्म होने के साथ ही अमेरिका के साथ मजबूरी में चिपके हुए देश भी अपने को स्वतंत्र महसूस करने लगे। इससे अमेरिका केभी वैश्विक प्रभुत्व में कमी आई। इस वातावरण में चीनी महत्वाकांक्षा का जगना स्वाभाविक था। अब वह बदली दुनिया में अमेरिका को पीछे छोड़कर स्वयं दुनिया की प्रथम महाशक्ति बनना चाहता है। इसके लिए उसने अपनी आर्थिक शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करना शुरू किया। उसने एशियायी देशों पर ही नहीं अफ्रीकी व दक्षिण अमेरिकी देशों पर भी अपना प्रभाव विस्तार कार्यक्रम शुरू किया।
यह अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है। अमेरिका की प्रशांत क्षेत्र पर सोवियत काल से ही काफी मजबूत पकड़ बनी हुई थी। जापान, ताइवान, हांगकांग, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपिन्स, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर ये सब उसके प्रभाव क्षेत्र वाले देश हैं। यद्यपि विभिन्न राजनीतिक कारणों से इन देशों पर अभी भी अमेरिकी वर्चस्व कायम है, लेकिन वह क्रमश: क्षीण हो रहा है। अब ओबामा के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य है इस क्षेत्र पर अमेरिकी प्रभुत्व को बरकरार रखना।
जापान तो अमेरिकी क्षत्रछाया में ही पल रहा था। उसकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी अमेरिका पर ही है, लेकिन अब जापानी जनता भी चाहती है कि अमेरिका वहां से निकल जाए। जापान के ओकीनावा द्वीप पर अमेरिका का एक मजबूत सैनिक अड्डा था ,जो धीरे-धीरे उपेक्षित हो गया। अब अमेरिका फिर वहां एक श्क्तिशाली अड्डा कायम करना चाहता है तो जापानी उसका विरोध कर रहे हैं।
अमेरिका और चीन इस समय दुनिया को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले देश हैं। वे प्रतिस्पर्धी भी हैं और परस्पर निर्भर भी। चीन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है तो अमेरिका का स्थान चौथा है, चीन की जनसंख्या दुनिया में सर्वाधिक है तो इस दृष्टिï से अमेरिका का स्थान तीसरा है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो दूसरा स्थान चीन का है। ये दोनों देश ही खनिज ईंधन का सर्वाधिक उपयोग करने वाले देश हैं तो ग्रीन हाउस गैसें छोडऩे में भी ये ही दो शीर्ष स्थान पर हैं।
आज दुनिया की जो भी बड़ी समस्याएं हैं उनके समाधान की बात चीन के सहयोग के बिना सोची भी नहीं जा सकती। मामला चाहे पर्यावरण यानी ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव का हो या परमाणु अप्रसार का, विश्व अर्थव्यवस्था का हो या व्यापारिक संतुलन का हर मामले में अमेरिका को चीन की जरूरत है। परमाणु अप्रसार की अमेरिकी नीति को धता बताने में चीन की बड़ी भूमिका रही है। आज यह कोई रहस्य की बात नहीं कि पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने की क्षमता चीन से मिली। अभी बीते हफ्ते की ताजा खबर है कि चीन ने दो परमाणु बम बनाने लायक संवर्धित यूरेनियम पाकिस्तान को दिया। ईरान का परमाणु कार्यक्रम हो या उत्तर कोरिया का, इनको चीनी सहायता के बिना नियंत्रित करना कठिन है। सुरक्षा परिषद में चीन के सहयोग के बिना ईरान या दक्षिण् कोरिया किसी के खिलाफ कोई प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता। वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) मामले में कार्बनिक गैसों के उत्सर्जन में कटौती के प्रश्न पर भी चीनी सहयोग आवश्यक है, क्योंकि ऐसी गैसों के उत्सर्जन में अमेरिका के बाद दूसरा स्थान चीन का ही है। यदि चीन अपने क्षेत्र में कोई कटौती योजना स्वीकार नहीं करता तो कोई भी दूसरा विकासशील देश इसके लिए तैयार नहीं होगा। अमेरिका का व्यापारिक घाटा चीन के साथ उसकी सीधे जुड़ी समस्या है।
ऐसा नहीं है कि ओबामा की इस यात्रा में कोई बड़ा फैसला हो जाएगा या चीन राष्ट्रपति ओबामा के सारे अनुरोधों को मान लेगा, लेकिन इस यात्रा में इन वैश्विक समस्याओं के प्रति चीन का रुख अवश्य स्पष्टï हो जाएगा। चीन अमेरिका के लिए या दुनिया के भविष्य के लिए अपनी महत्वाकांक्षा का मार्ग त्यागने वाला नहीं है, किन्तु वह अमेरिकी बाजार का अधिकतम उपयोग करने के लिए जितना आवश्यक होगा उतना परिवर्तन अवश्य स्वीकार कर लेगा। ओबामा निश्चय ही मानवाधिकारों के मसले भी उठाएंगे, लेकिन वह केवल खानापूरी की बात होगी, क्योंकि चीन मानवाधिकार के मसले को उस तरह कोई महत्व देता ही नहीं, जिस तरह दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देश देते आ रहे हैं।
अब इसके साथ ही भारत की भूमिका भी सामने आएगी। इस महीने की 25 तारीख को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब अमेरिका पहुंचेंगे तब ओबामा की इस करीब एक सप्ताह की एशियायी यात्रा की पृष्ठïभूमि में एशियायी मसलों पर बात हो सकेगी। चीन के बाद भारत एशिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। आर्थिक विकास की दृष्टिï से वह चीन के बाद दुनिया में सर्वाधिक तीव्रगति से विकास करने वाला देश है। स्वाभाविक है एशिया में चीन का प्रतिस्पर्धी भारत ही है। चीन और भारत के बीच भी व्यापार तीव्रगति से बढ़ रहा है, किन्तु समस्या यहां भी वही है कि व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है। चीन से भारत को निर्यात अधिक है आयात कम। चीन के साथ भारत का सीमा विवाद भी दोनों देशों के बीच खटास का एक बड़ा कारण है। दक्षिण पूर्व एशियायी या प्रशांत सागरीय देशों केसाथ भारत के संबंध विस्तार में चीनी प्रभाव सबसे बड़ा अवरोध है। भारत की एक और बड़ी समस्या है। वह यह है कि, वह लगभग चारों तरफ से चीनी प्रभाव क्षेत्र से घिरा है। उत्तर की तरफ वह स्वयं है। बीच में स्थित नेपाल भौगोलिक दृष्टिï से भारत की गोद में होते हुए भी चीनी प्रभाव से अधिक संचालित होता है। बंगलादेश, म्यांमार, श्रीलंका, पाकिस्तान यानी हरतरफ चीनी उपस्थिति से भारत घिरा है। एशियायी क्षेत्र में कोई ऐसा और देश नहीं है जिस पर भारत भरोसा कर सके। मतलब यह है कि भारत के पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं है कि वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत करे और एशियायी क्षेत्र में उसके साथ मिलकर काम करे।
आज के समय में किसी समस्या के समाधान के लिए युद्ध के विकल्प को नहीं चुना जा सकता। मसला चाहे आर्थिक हो या राजनीतिक, सीमा विवाद का हो या व्यापारिक असंतुलन का, केवल कूटनीतिक उपायों से ही इनका समाधान ढूंढ़ा जा सकता है। लेकिन यह कूटनीति भी अपनी राजनीतिक व आर्थिक सामथ्र्य पर निर्भर है। इसलिए भी यह जरूरी है कि नई विश्व व्यवस्था में अमेरिका व भारत जैसे देश परस्पर सहयोग करें।
इस धरती पर अमेरिका, चीन और भारत ही नहीं, बल्कि सभी अन्य देशों के विकास के लिए पर्याप्त अवसर हैं। लेकिन यदि कोई देश किसी अन्य देश की कीमत पर विकास करना चाहे अथवा अपनी सामरिक व आर्थिक शक्ति से किसी की विकासगति को अवरुद्ध करना चाहे तो वहां उस देश पर अंकुश लगाना जरूरी हो जाता है। यह अंकुश बिना शक्ति के नहीं लग सकता। कल को हो सकता है कि चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक या सामरिक शक्ति बन जाए, अमेरिका दूसरे स्थान पर आ जाए लेकिन यदि भारत और अमेरिका जैसे दो लोकतंत्र एक साथ रहे तो चीन कितना भी शक्तिशाली हो जाए, लेकिन वह भारत व अमेरिका की संयुक्त आर्थिक व सामरिक शक्ति को कभी पार नहीं कर सकता। इसलिए यह भविष्य की आवश्यकता है कि भारत और अमेरिका की मैत्री प्रगाढ़ हो।
यहां उल्लेखनीय है कि चीन के साथ भारत का राजनीतिक संबंध या आर्थिक संबंध 1950 के पूर्व नाममात्र का था लेकिन हमारे सांस्कृतिक संबंध हजारों वर्ष पुराने हैं। इसके विपरीत चीन और अमेरिका की परस्पर आर्थिक निर्भरता तब से है जब से अमेरिका और चीन का परस्पर परिचय हुआ लेकिन उनके बीच कोई सांस्कृतिक संबंध कभी विकसित नहीं हो सका। पुराने जमाने में द्विपक्षीय संबंधों के निर्वाह में प्राय: तीसरे की कोई जरूरत नहीं पड़ती थी, लेकिन आज की दुनिया में कोई संबंध नितांत द्विपक्षीय हो ही नहीं सकते।
हम पुराने भारत चीन संबंधों की बात करते हैं तो केवल सांस्कृतिक व व्यापारिक संबंधों की चर्चा करते हैं। व्यापारिक संबंधों में भी शायद चीन एकमात्र ऐसा देश था जिसके साथ हमारा व्यापार एकतरफा था। यानी हम चीन से कुछ मंगाते थे, लेकिन वहां भेजते कुछ नहीं थे। हमारे प्राचीन साहित्य चीनी रेशमी वस्त्रों (चीनांशुक) की चर्चा से भरे पड़े हैं। यह शायद चीनी रेशम की लोकप्रियता का प्रभाव था कि भारत व अरब को जाने वाले चीनी व्यापारिक मार्ग का नाम ही 'रेशमीपथ (सिल्क रूट) पड़ गया। लेकिन यह चीन के साथ हमारा कोई सीधा व्यापारिक संबंध नहीं। शायद व्यापारिक दलों के किसी तीसरे माध्यम से यह चीनी वस्त्र भारत आ जाया करता था। हां, चीन और भारत के बुद्धिजीवियों व बौद्ध आचार्यों का आना जाना अवश्य सामान्य था। चीन में शाओलिन के प्रसिद्ध बौद्ध केन्द्र की स्थापना भारत गये बातुओ (464-495 ए.डी.) बौद्ध संत द्वारा की गई। चीनी यात्री फाह्यान , ह्वेंत्सांग (इवान च्वांग), इत्सिंग आदि का नाम तो यहां परिचित है ही। चीन के 'चान व 'जेन मत के आचार्य भी भारत से गये। चीन के पुराने इतिहासज्ञ झान्ग्कियांग (113 बी.सी.)तथा सिमा कियान (145-90 बी.सी.) भारतीयों से परिचित थे। वे भी इन्हें 'सेन्धु का 'सिंधु से स्पष्ट संबंध देख सकते हैं। चीन से आज भी हमारा यह सांस्कृतिक या बौद्धिक संबंध बना रहता और कोई राजनीतिक द्वंद्व न खड़ा होता यदि बीच में तिब्बत का स्वतंत्र राष्ट्र बना रहता।
हमारी चीन के साथ सारी समस्या इसलिए खड़ी हो गई है कि इस तिब्बत पर चीन ने कब्जा कर लिया है और इसके साथ ही हमारी उत्तरी रक्षा प्राचीर (हिमालय की पर्वत श्र्रृंखला) भी चीन के कब्जे में चली गई। अब हमारी उत्तरी सीमा की रक्षा हिमालय से नहीं हमारे अपने शक्ति संतुलन से ही हो सकती है। अब यदि हमारी अकेली शक्ति इसके लिए काफी नहीं है तो हमें ऐसे गठबंधन बनाना चाहिए जिसकी संयुक्त शक्ति चीन की कुल शक्ति से अधिक हो।
अमेरिका और चीन का व्यापारिक संबंध बहुत पुराना है। चीन की वर्तमान उत्पादन व व्यापार की तकनीक भी कोई नई नहीं है। दूसरों की जरूरत समद्ब्राकर उनके लिए माल तैयार करना और उनके बाजार में छा जाना चीन का पुराना कौशल रहा है। अमेरिका के पहले लखपतियों की श्रृंखला उन्हीं की खड़ी हुई जो चीनी माल का व्यापार करते थे। 1784 में पहली बार चीन का एक व्यापारिक जहाज (इंप्रेस आफ चाइना) अमेरिका के कैंटम बंदरगाह पर उतरा था। इसके साथ ही चीन को एक शानदार बाजार मिल गया था। ऐसा नहीं कि अमेरिकियों व यूरोपियों ने भारत की तरह चीन पर कब्जा जमाने की कोशिश नहीं की लेकिन चीनी भारतीयों की तरह सहिष्णु और उदार नहीं थे। हमारे यहां कांग्रेस के गठन के करीब 14 वर्षों बाद 1899 में चीन एक संगठन बना जिसे अंग्रेज इतिहासकारों ने अंग्रेजी में 'सोसायटी आफ राइट एंड हार्मोनियस फिस्ट नाम दिया है। इस चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का पूर्व रूप कह सकते हैं। इसका लक्ष्य था देश से यूरोपीय विदेशियों व ईसाई मिशनरियों को मार भगाना। इन्हें अंग्रेजों ने 'विद्रोही बाक्सर(बाक्सर रिबेलियन) की भी संज्ञा दी है। इस संगठन के लोगों ने वर्ष 1900 में बीजिंग पर हमला बोल दिया और वहां स्थित यूरोपीय देशों के 230 कूटनीतिज्ञों (डिप्लोमेट्स) व्यापारिक अधिकारियों व मिशनरी नेताओं को मार डाला। उन्होंने उन चीनी नागरिकों पर भी हमला कर दिया जो ईसाई बन गये थे। हजारों की संख्या में ऐसे धर्मांतरित चीनी ईसाई मार डाले गये। ऐसे हमलों ने चीन के भीतरी हिस्सों में यूरोपियनों व अमेरिकियों के पांव उखाड़ दिये। वे केवल समुद्रतटीय इलाकों में ही यत्र-तत्र रह सके। इसीलिए चीन यूरोपियनों का गुलाम होने से बच गया।
खैर, ये सब तो इतिहास की बातें हैं और यह इतिहास बहुत पीछे छूट चुका है, लेकिन हम इतिहास से बहुत कुछ सीख सकते हैं। हमें अपने इतिहास से भी सबक सीखना चाहिए और दूसरों के इतिहास से भी। हमें अपने अहंकार में जीने के बजाए व्यावहारिक दृष्टिïकोण अपनाना चाहिए। हमें युद्ध के बारे में नहीं सोचना चाहिए किन्तु किसी भी तरह के युद्ध के खतरे के प्रति तैयार रहना चाहिए। यदि हमारा कोई पड़ोसी अधिक शक्तिशाली हो तो शांति से जीने के लिए एक शक्तिशाली मित्र मंडल बनाना चाहिए। हमें किसी दूसरे को दबाने की रणनीति नहीं अपनानी चाहिए लेकिन दूसरों के दबाव से बचने की रणनीति तो अवश्य अपनानी पड़ेगी, अन्यथा हम कुचल दिए जाएंगे।
भारत की चीन से कभी कोई निरपेक्ष मैत्री नहीं हो सकती, क्योंकि चीन एक विस्तारवादी देश है। एशिया में यदि शांति और शक्ति संतुलन को बनाए रखना है तो भारत और अमेरिका को एक मजबूत गठबंधन कायम करना ही होगा। आज की दुनिया में अमेरिका न तो अमेरिका तक सीमित रह कर जी सकता है, न भारत अपनी भारतीय सीमा में सीमित रह कर। इसलिए हमें एक ऐसी विश्व व्यवस्था कायम करने की जरूरत है जिसमें कोई भी देश बिना किसी दूसरे देश के मार्ग का रोड़ा बने विकास कर सके। ऐसा नहीं कि अमेरिका व यूरोप के देश बहुत दूध के धोए हैं। उन्होंने भी दूसरों की कीमत पर अपना विकास किया है। इसलिए उनको सीमा में रखने के लिए रूस और चीन जैसे देशों का विकास आवश्यक था। अब आज यदि चीन हमें दबाने की कोशिश कर रहा है तो हमें अमेरिका और यूरोप के साथ अपने रणनीतिक संबंध विकसित करने में गुरेज नहीं करना चाहिए। यही राजनीति का तकाजा है और यही समय की मांग भी है।
रविवार, 15 नवंबर २००९ (स्वतंत्र वार्ता -साप्ताहिकी )