मंगलवार, 2 जुलाई 2013

पराजय की ओर हैं लोकतांत्रिक देश

पराजय की ओर हैं लोकतांत्रिक देश


क्या      दुनिया की लोकतांत्रिक शक्तियॉं बढ़ते इस्लामी कट्टरवाद का मुकाबला करने में सक्षम हैं? यह सवाल आधुनिक लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था के चिंतकों को दशकों से मथे हुए है, लेकिन जो उत्तर सामने नजर आ रहा है वह बहुत उत्साहवर्धक नहीं है| बहुत से अमेरिकी एवं यूरोपीय बुद्धिजीवी यह मान रहे हैं कि दुनिया की लोकतांत्रिक शक्तियॉं इस्लामी तानाशाही की बढ़ती लहर के आगे अपना सामर्थ्य खोती जा रही हैं और यदि ब्रिटिश उपन्यासकार मार्टिन आमस के करीब ६ साल पुराने आकलन को स्वीकार करें तो मानना पड़ेगा कि पश्‍चिमी दुनिया के आधुनिक लोकतंत्र के मुकाबले खड़ा जिहादी इस्लाम इस लड़ाई को पहले ही जीत चुका है| इसी तरह 'लूजिंग बैटिल विद इस्लामफ के लेखक डेविड शेल बेर्न ने अपने लेखन में १० ऐसे कारणों को गिनाया है जिनके चलते इस लड़ाकू इस्लाम को पराजित नहीं किया जा सकता| उपन्यासकार मार्टिन आमस ने ११ सितंबर की घटना की पॉंचवीं बरसी पर २००६ में 'द अब्जर्वरफ में एक लेख लिखा था, जिसके उपसंहार में उन्होंने यह प्रतिपादित किया था कि अपनी गलत अवधारणाओं के कारण पश्‍चिमी लोकतंत्र बिना लड़े ही पराजित हो चुका है और लड़ाकू इस्लाम ने लड़ाई जीत ली है| उन्होंने साफ लिखा है कि अभी हाल तक यह कहा जा रहा था कि जिहादी इस्लाम, इस्लाम की मुख्यधारा का अंग नहीं है| जिहादी इस्लाम के अन्य संस्कृतियों व विचारधाराओं पर हो रहे हमलों को भी कम करके आँका जा रहा था| कहा जा रहा था कि यह संस्कृतियों का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह इस्लाम के भीतर का संघर्ष है| यह उसके  भीतर के कट्टरपंथी तथा उदारवादी वर्गों के बीच का युद्ध है| लेकिन अब यह धारणा गलत साबित हो चुकी है| यह मान भी लें कि यह इस्लाम के भीतर का संघर्ष है तो अब यह युद्ध समाप्त हो चुका है और कट्टरपंथी इस्लामियत जीत चुकी है| तथाकथित उदारवादी हाशिए में जा चुके हैं| अमिस ने वास्तव में इस तथ्य को रेखांकित किया कि दुनिया में तथाकथित उदार मुस्लिम की कोई आवाज नहीं है| वह केवल कुछ अखबारों में संपादकीय पृष्ठ के सामने वाले पृष्ठों पर छपने वाले लेखकों तक सीमित रह गई है|
उनका साफ कहना है कि इस्लाम में किसी व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है, महत्वपूर्ण है 'उम्माफ| इस्लाम एक 'सर्वसत्तात्मकफ मजहब है| इसकी पहली मांग है कि इसका हर सदस्य अपने दिमाग की स्वतंत्रता 'उम्माफ अर्थात इस्लामी सिद्धांत में विश्‍वास करने वाले समूह को समर्पित कर दे| एक 'स्वतंत्र दिमाग (चिंतन या सोच) वाला मुस्लिमफ एक अंतर्विरोधी कथन है, यह हो ही नहीं सकता| प्रसिद्ध निबंध लेखक एवं उपन्यासकार सैमुअल हंटिंग्टन ने जब 'संस्कृतियों के बीच संभावित युद्धफ का सिद्धांत देते हुए यह भविष्यवाणी की थी कि आगे दुनिया में राष्ट्रों का नहीं संस्कृतियों का युद्ध छिड़ेगा तो दुनिया भर के तमाम बुद्धिजीवियों ने उनके सिद्धांत का खंडन किया| कुछ वर्ष पूर्व तक थोड़े से लोगों को छोड़कर दुनिया में कोई भी प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी उनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं था, लेकिन अब अपवादों को छोड़कर प्रायः सारे बुद्धिजीवी यह कहने लगे हैं कि दुनिया अब हंटिंग्टन की भविष्यवाणी के सत्य होने की मात्र प्रतीक्षा कर रही है|
'द लूजिंग बैटिल विद इस्लामफ के लेखक डेविड शेलबोर्न ने 'द टाइम्सफ में प्रकाशित अपने लेख में विस्तार से यह समझाने की कोशिश की है कि वह क्यों यह समझते हैं कि सभ्यता एवं संस्कृतियों की लड़ाई में इस्लाम का पलड़ा भारी है| उन्होंने दस ऐसे कारण गिनाए हैं जिनके कारण वर्तमान परिस्थितियों में इस्लाम की पराजय नहीं हो सकती|
पहला और बहुत महत्वपूर्ण कारण है कि गैर मुस्लिम संसार राजनीतिक दृष्टि से इस सवाल पर पूरी तरह विखण्डित है कि विश्‍वव्यापी इस्लामी आतंकवाद या मुस्लिम आक्रामकता का मुकाबला किस तरह किया जाए|
दूसरा, यह कि पश्‍चिमी (आधुनिक लोकतंत्रवादी) दुनिया अभी भी मुस्लिम विश्‍व की शक्ति को बहुत कम करके आँक रही है|
तीसरा, उसे इस्लाम की प्रकृति का सही-सही बोध नहीं है और वह इस बारे में भारी गलतफहमी का शिकार है|
चौथा, पश्‍चिमी राष्ट्रों विशेषकर अमेरिका में कमजोर नेतृत्व की स्थिति|
पॉंचवॉं, पश्‍चिम के नीति निर्धारकों में विश्‍वराय यानी मतैक्य का अभाव |
छठा, बहुत से गैरमुस्लिम देश इस बात से ही खुश होते रहते हैं कि अच्छा है, अमेरिका पिट रहा है|
सातवॉं, एक अति महत्वपूर्ण कारण है- पश्‍चिमी देशों की नैतिक दरिद्रता या आध्यात्मिक दीवालियापन|
आठवॉं बड़ा कारण है कि इस्लामी कट्टरपंथी मीडिया का बड़ी कुशलता और चतुराई से इस्तेमाल कर रहे हैं जो पश्‍चिमी लोकतांत्रिक देश नहीं कर पा रहे हैं|
नौवॉं कारण है, अरब और मुस्लिम देशों के भौतिक संसाधनों- जैसे पेट्रोलियम पर पश्‍चिम की निर्भरता|
और दसवीं सबसे बड़ी बात है, पश्‍चिमी दुनिया की यह गलतफहमी कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि उनके पास नवीनतम टेक्नालॉजी से युक्त आधुनिकता है|
यहॉं यह उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त संस्कृतियों के संघर्ष में भारत का या एशियायी लोकतांत्रिक देशों का अलग से कोई जिक्र नहीं किया गया है| शायद पश्‍चिमी लोकतांत्रिक देशों में पूर्वी लोकतंत्र को भी शामिल कर लिया गया है| यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिका एवं यूरोप के विद्वान बुद्धिजीवी जब संस्कृतियों के संघर्ष की बात करते हैं तो उसमें ईसाइयत या इस्लाम का जिक्र नहीं करते| वे इसे आधुनिकता बनाम पुरातनता अथवा लोकतांत्रिक उदारता बनाम अंध निष्ठाग्रस्त असहिष्णुता की लड़ाई में बदल देते हैं| आज की दुनिया में उभर रहे इस्लामी कट्टरपन की चुनौती का इस तरह सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता|
सच यह है कि पश्‍चिमी शैली के आधुनिक लोकतंत्र (जिसमें भारत भी शामिल है) के पास इस आक्रामक इस्लाम का मुकाबला करने लायक कोई हथियार नहीं है| हमलावर आतंकवादियों या जिहादियों को मारकर या उनके अड्डों को नष्ट करके उसके बढ़ते ज्वार को कतई नहीं रोका जा सकता, क्योंकि जिहादी हमलावर तो उसके मात्र हथियार हैं| उनके किसी जिहादी का मरना उनकी एक ए.के. राइफल के टूट जाने से अधिक कुछ नहीं है| लड़ाई जीतनी है तो उसके लिए युद्ध क्षेत्र की स्थितियों की ठीक-ठीक पहचान के बाद उसके हथियारों की शक्ति का तथा युद्धक्षेत्र की स्थितियों का भी ठीक-ठीक अध्ययन आवश्यक होता है| यह सब जानने के बाद उन हथियारों का चयन एवं विकास जरूरी होता है, जिसके द्वारा हमलावर के मुख्य शक्तिस्रोत को नष्ट किया जा सके| और यदि यह संभव नहीं है तो मानना ही पड़ेगा कि आधुनिक लोकतांत्रिक शक्तियॉं स्वीकार करें या न करें, लेकिन वे या तो पराजित हो चुकी हैं या पराजय
की ओर तेजी से अग्रसर हैं|