मंगलवार, 2 जुलाई 2013

क्या मोदी अब राष्ट्रीय राजनीति में आएँगे?

क्या मोदी अब राष्ट्रीय राजनीति में आएँगे?


नरेंद्र मोदी का करिश्मा जारी है| उन्होंने लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा का चुनाव जीत लिया है| इसके साथ ही अब चर्चा शुरू हो गई है कि क्या अब वह राष्ट्रीय राजनीति की ओर रुख करेंगे| उनके समर्थक अब उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं| लेकिन प्रधानमंत्री का रास्ता इतना आसान नहीं है| अव्वल तो पूरा देश गुजरात नहीं है, दूसरे स्वयं भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी शायद ही उन्हें अगले आम चुनाव का नेतृत्व सौंपने का साहस और उदारता दिखा सके| फिर भी २०१४ के आम चुनाव को मोदी की जरूरत है| सवाल है कि क्या वह स्वयं इसके लिए तैयार हैं| और तैयार भी हैं, तो क्या वह राष्ट्रीय स्तर पर भी वही करिश्मा दिखा सकते हैं, जो उन्होंने गुजरात में दिखाया है?
वर्ष २०१४ का आम चुनाव भारत के राजनीतिक इतिहास का एक अहम चुनाव होगा| यह शायद इस शताब्दी के पूर्वार्ध का सबसे महत्वपूर्ण चुनाव साबित हो, क्योंकि यह चुनाव इस देश के भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगा| इसमें पार्टियों के भाग्य का नहीं, इस देश के भाग्य का फैसला होगा|
इस देश की सबसे पुरानी और ताकतवर पार्टी कांग्रेस अपने युवराज राहुल गांधी को इस चुनाव मेंे आगे करने जा रही है| उन्हें देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाना है| राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है, तो उसके लिए यह चुनाव जीतना अनिवार्य है| शायद वह आगे के और पॉंच साल की प्रतीक्षा न कर सकें| इसलिए जैसे भी हो कांग्रेस को यह चुनाव जीतना ही है| इसके लिए वह कुछ भी उठा नहीं रखेगी| सरकारी सब्सिडी (यानी राजकीय सहायता) सीधे पिछड़े व गरीब लाभार्थियों के खाते में डालने की योजना इसी प्रयास का एक अंग है| मीडिया में उद्धृत किए गए कथन पर विश्‍वास करें, तो स्वयं राहुल गांधी इस योजना से बहुत उत्साहित हैं| उन्होंने कहा कि यह योजना अगर ठीक से लागू हो गई, तो कांग्रेस की आगे आने वाले एक नहीं, दो आम चुनावों में जीत पक्की है| कांग्रेस के खलीते में अभी और कितनी ऐसी योजनाएँ हैं, इसका पता नहीं| आगे आने वाले वर्ष २०१३-१४ का बजट शायद इसका कुछ संकेत लेकर आए|
दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी 'भारतीय जनता पार्टी' है| वह बुरी तरह अंतर्कलह से ग्रस्त है| वहॉं किसी एक का उत्कर्ष दूसरे को फूटी आँखों नहीं  सुहाता| वहॉं प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले अनेक लोग बैठे हुए हैं, लेकिन पार्टी को प्रधानमंत्री चुनने की हैसियत तक पहुँचाने की कूवत रखने वाला कोई नजर नहीं आता| ऐसे में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उसकी एकमात्र आशा की किरण हैं| पार्टी की निचली पंक्ति के नेता तथा कार्यकर्ता मोदी में अपना भविष्य देख रहे हैं, जबकि नेतागण भारी असमंजस में हैं कि क्या करें या न करें| मोदी को केंद्रीय राजनीति में आमंत्रित करें या उन्हें राज्य के हाशिये में ही पड़ा रहने दें|
मोदी ने गुजरात में लगातार तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी लोकप्रियता और रणनीतिक कुशलता का डंका बजा दिया है| चौतरफा हमलों तथा पार्टी की अपनी ही भितरघात के बावजूद तीसरी बार भी चुनाव जीत लेना आसान काम नहीं था| राज्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्‍व हिंदू परिषद ने मोदी की कोई मदद नहीं की| उनके कार्यकर्ता भले उनके साथ रहे हों, लेकिन नेतागण उनके खिलाफ थे| भारतीय जनता पार्टी के नेता और कार्यकर्ता अवश्य पूरी तरह मैदान में थे| दिल्ली के शीर्ष नेता भी वहॉं पहुँचे| मोदी की प्रशंसा की| लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार करने का संकेत भी दिया और कहा कि उनमें देश का प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है और वह प्रधानमंत्री बन सकते हैं| लेकिन सच कहें तो यह पार्टी की आवाज नहीं थी| गुजरात के चुनाव में मोदी का प्रशस्तिवाचन हवा का रुख देखते हुए किया गया| यह देखा गया कि गुजरात की बहुसंख्यक जनता मोदी के साथ है| और गुजरात ही क्यों, देश भर की भारतीयता की समर्थक जागरूक जनता मोदी के साथ है| यदि ये नेता गुजरात न जाते तो देश के अन्य भागों में भी उनकी छवि खराब होती| मोदी ने इन सभी नेताओं का सम्मान किया, लेकिन भरोसा किसी का नहीं किया| उन्होंने चुनाव अभियान चलाने का श्रेय भी किसी को नहीं लेने दिया| उन्होंने पार्टी का जो चुनाव घोषणा-पत्र जारी किया, वह इसका प्रमाण है| इस पर मोदी के अतिरिक्त और किसी नेता का चित्र नहीं है|
अब यह अहम सवाल किया जा रहा है कि क्या मोदी राज्य में अपनी सफलता का झंडा गाड़ने के बाद अब केंद्र की ओर रुख करेंगे| राजनीतिक दलों में से तो कोई अभी इसकी बात नहीं कर रहा है, किंतु मीडिया ने इस सवाल को बॉंसों उछाल दिया है| मोदी के हाव भाव एवं व्यवहार में इसके संकेत भी ढूँढ़ लिए गए हैं| मोदी ने चुनाव जीतने के बाद मीडिया के सामने अपना जो कृतज्ञता ज्ञापन का भाषण दिया, उसे लेकर यह कहा जा रहा है कि यह स्पष्ट संकेत है कि मोदी अब राष्ट्रीय राजनीति की तरफ अपना रुख करना चाहते हैं| उन्होंने अपना पूरा चुनाव प्रचार गुजराती में किया| पत्रकारों के कहने पर भी वह हिंदी नहीं बोलते थे, फिर इस जीत के बाद उन्होंने अपना भाषण हिंदी में क्यों दिया| कहा जा रहा था कि यह भाषण गुजरातियों को नहीं, बल्कि शेष भारत को संबोधित करके दिया गया था| उसमें उत्तर प्रदेश व बिहार के वोटरों से परोक्षतः अपील थी कि वे जाति और संप्रदाय के खेमों में बँटकर वोट न करें| विकास चाहते हैं तो इन दायरों से बाहर निकलकर वोट दें| ठीक है, माना कि मोदी अब राष्ट्रीय राजनीति में उतरना चाहते हैं, तो अब यही मीडिया सवाल उठा रहा है कि                                      फिर गुजरात का क्या होगा| मोदी गुजरात को किसके भरोसे छोड़कर जाएँगे| क्या उस स्थिति में गुजरात भाजपा के हाथ से निकल नहीं जाएगा|
मोदी निश्‍चय ही आज की राजनीति में कांग्रेस को चुनौती दे सकने में समर्थ एकमात्र विपक्षी चेहरा हैं| भाजपा के शीर्ष नेतागण भी यह जानते और समझते हैं, फिर भी वे मोदी को केंद्रीय राजनीति में फिलहाल लाने के लिए तैयार नहीं हैं| मोदी चाहते भी हों तो वह स्वयं राष्ट्रीय राजनीति में नहीं कूद सकते| उन्हें इसकी प्रतीक्षा करनी ही होगी कि केंद्रीय नेतागण उन्हें इसके लिए आमंत्रित करें| उनके लिए इसकी जगह बनाएँ| लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेताओं को दो डर है| एक तो वे सब केंद्रीय राजनीति में मोदी के आते ही बौने नजर आने लगेंगे| मोदी कितनी भी विनम्रता बरतें, उन्हें कितना भी आदर दें, लेकिन वे सब मोदी की छाया में ढक जाएँगे| ऐसा कोई भी केंद्रीय नेता नहीं चाहता| दूसरे शीर्ष केंद्रीय नेताओं को ङ्गएनडीएफ गठबंधन की चिंता है| उन्हें भय है कि मोदी को यदि केंद्रीय राजनीति में लिया गया और उन्हें प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो उसके अन्य सहयोगी दल बिदक जाएँगे| जनता दल (यू) ने अभी से स्पष्ट कर दिया है कि आगामी आम चुनाव में एनडीए का नेतृत्व किसी ङ्गसेकुलरफ हाथ में होना चाहिए| भाजपा यदि मोदी को सामने रखकर चुनाव लड़ती है, तो उसे अकेले ही चुनाव लड़ना पड़ेगा, जद (यू) उसके साथ नहीं रहेगी|
एनडीए में इस समय दो ही ऐसे नेता हैं, जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय छवि है और जिन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य समझा जा रहा है| एक हैं गुजरात के मुख्यमंत्री, भाजपा नेता नरेंद्र मोदी और दूसरे बिहार के मुख्यमंत्री जनता दल (यू) के नेता नीतीश कुमार| एनडीए यदि आम चुनाव में विजयी होता है, तो नीतीश कुमार उसके सर्वसम्मत नेता बन सकते हैं| उन्हें बाहर से उन अन्य दलों का समर्थन भी मिल सकता है, जो अभी एनडीए में नहीं हैं| जैसे पश्‍चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायुडू, उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता| यदि कांग्रेस सरकार बनाने में समर्थ न हुई तो उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियों समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी के नेता मुलायम सिंह व मायावती भी बाहर रह कर समर्थन कर सकते हैं| जाहिर है एनडीए के लिए नीतीश मोदी के मुकाबले अधिक स्वीकार्य हैं| लेकिन यह स्थिति बनेगी तब, जब भाजपा कांग्रेस से अधिक सीटें प्राप्त कर सकेगी| यदि भाजपा कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर रहेगी तो सारी अन्य क्षेत्रीय पार्टियॉं सांप्रदायिकता को दूर रखने के बहाने कांग्रेस को अपना समर्थन देने के लिए तैयार हो जाएँगी|
इसलिए भाजपा को पहले तो यह जुगाड़ करना चाहिए कि वह अगले आम चुनाव में कांग्रेस को पछाड़ सके| उसका बाकी सारा गुणा भाग तो उसके बाद शुरू होगा| और अभी पार्टी की जो हालत है, उसमें कतई यह आशा नहीं की सकती कि वह आम चुनाव में कांग्रेस को पीछे कर सकती है| कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार एकमात्र मुद्दा है| और इस ताजा चुनाव को भी देखें तो मतदाता ने भ्रष्टाचार के आरोपों को कोई महत्व नहीं दिया है| यदि भ्रष्टाचार कोई मुद्दा होता, तो न तो कांग्रेस हिमाचल प्रदेश में चुनाव जीत सकती थी और न गुजरात में अपने विधायकों की संख्या बढ़ा सकती थी| हिमाचल प्रदेश के नये मुख्यमंत्री बनने जा रहे वीरभद्र सिंह ने भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते ही केंद्रीय मंत्रिपद छोड़कर राज्य का रुख लिया था| तो भ्रष्टाचार कोई नकारात्मक मुद्दा नहीं है| जाहिर है कि चुनाव में जीत-हार कुछ अन्य मुद्दों पर निर्भर करेगी| वह मुद्दा चाहे हिन्दुत्व का हो, चाहे विकास का हो, चाहे सुशासन का या चाहे कोई और| अकेले विकास की राजनीति भी चुनावों के लिए कुछ खास कारगर नहीं होती| उसके साथ कुछ भावनात्मक मुद्दा भी चाहिए| गुजरात में मोदी केवल विकास और सुशासन के बूते पर चुनाव नहीं जीते हैं|
यह जानना बड़ा रोचक है कि गुजरात का मुसलमान २००२ को पीछे छोड़कर आगे निकल गया है, लेकिन सेकुलरिज्म के तथाकथित ठेकेदार बुद्धिजीवी व पत्रकार अभी भी उसे ढोए जा रहे हैं| प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल यदि उसे जीवित रखना चाहते हैं, तो यह किसी हद तक स्वाभाविक कहा जा सकता है कि इसमें उनका राजनीतिक स्वार्थ है, किंतु अन्य लोग क्यों सहज नहीं हो पा रहे हैंै और इस बार भी २००२ की चक्की ही पीसते जा रहे हैं|
गुजरात में मोदी ने अपनी पार्टी की तरफ से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव के मैदान में नहीं उतारा, फिर भी राज्य के बहुत से मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन उन्हें मिला| राज्य की १९ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जो मुस्लिम बहुल हैं, मतलब यहॉं जिसे मुस्लिम वोट न मिले वह चुनाव नहीं जीत सकता| मोदी को इन १९ में से १२ सीटों पर जीत हासिल हुई है| जाहिर है कि यह जीत मुस्लिम समर्थन से ही मिली है| इसके विपरीत कांग्रेस ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से ४ मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए थे, उनमें से दो ही जीत हासिल कर सके| कांग्रेस के दिग्गज मुस्लिम नेता अहमद पटेल के इलाके भरुच की पॉंचों सीटें भाजपा के हाथ लगीं| मीडिया में गुजराती मुसलमानों के जो बयान आ रहे हैं, वे मोदी के पक्ष में हैं| उनका कहना है कि २००२ में जो कुछ हुआ हो, किंतु उसके बाद से तो राज्य में अब तक कोई दंगा नहीं हुआ| राज्य में मुसलमानों को भी विकास के उतने ही अवसर उपलब्ध हैं, जितने की दूसरों को| राज्य में शांति और स्थिरता है, तो मुसलमानों के भी कारोबार फल-फूल रहे हैं| उनके विकास के रास्ते में मोदी का हिंदुत्व कोई रुकावट नहीं बन रहा है|
खैर, इस चुनाव को पीछे छोड़कर अब आगे के बारे में कुछ सोचा जाए| पार्टियों को तो केवल सत्ता चाहिए, लेकिन देश तथा देशवासियों के लिए और भी चिंतनीय मुद्दे हैं| आज देश के हर बुद्धिजीवी तथा देश और समाज की चिंता करने वाले को यह सवाल उठाना चाहिए कि आज देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है| भ्रष्टाचार की समस्या को तो यह देश नकार चुका है| अब इस देश की राजनीति की सबसे बड़ी समस्या है वंशवाद, जातिवाद और सांप्रदायिक तुष्टीकरण| कांग्रेस का एकमात्र लक्ष्य राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना, चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े| कांग्रेस की देखा-देखी आज पूरे देश में वंशवादी राजनीति ने कब्जा जमा लिया है| इसलिए वंशवाद को पराजित करना है, तो कांग्रेस को पराजित करना होगा| यह किसी से छिपा नहीं है कि राहुल को गद्दीनशीन करने के लिए ही प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन भेजा गया| अब उनके बाद पार्टी के भीतर उनके लिए कोई चुनौती नहीं है| हॉं, बाहर जरूर दो जबर्दस्त चुनौतियॉं हैं- एक नरेंद्र मोदी की और दूसरी नीतीश कुमार की| दोनों इस समय विकास और सुशासन के प्रतीक बने हैं| यह बात अलग है कि एक के माथे पर हिंदुत्व का टीका लगा हुआ है और दूसरे के माथे पर सेकुलरिज्म की टोपी सजी है| चुनावों के पूर्व शायद दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते, लेकिन चुनाव के बाद भी तालमेल न हो सके, यह नहीं कहा जा सकता| मोदी ने अपने एक दशक से अधिक के शासन में यह सिद्ध किया है कि वह सांप्रदायिक नहीं हैं| २००२ में जो भी हुआ हो, लेकिन उसके बाद से अब तक मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ| एक उदाहरण पुलिस में हुई भर्ती का लिया जा सकता है| मोदी के काल में राज्य पुलिस में हुई पुलिस की भर्ती का प्रतिशत उनकी राज्य में कुल जनसंख्या के प्रतिशत से अधिक है|
भाजपा के शीर्ष नेतागण यदि अपनी- अपनी महत्वाकांक्षा व अहंकार की ग्रंथियों से बाहर निकलकर देशहित में २०१४ की चुनावी रणनीति नहीं बनाते, तो उन्हें इतिहास के गर्त में डूबने के लिए तैयार रहना चाहिए| समय किसी की प्रतीक्षा        नहीं करता| वह किसी का हित-अहित भी नहीं पहचानता| हित-अहित की पहचान तो मनुष्य के अपने विवेक से जुड़ी है| २०१४ इतिहास का एक प्रस्थान बिंदु बनने वाला है| वह किसी पानीपत या पलासी की लड़ाई से कम नहीं है, जो इतिहास की धारा तथा देश का भाग्य बदलने के लिए प्रसिद्ध है| राहुल गांधी और उनके दोस्तों-रिश्तेदारों का दल यदि देश की सत्ता पर काबिज हो गया, तो इसका क्या परिणाम होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है|
यहॉं यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्या मोदी में यह क्षमता है कि वह राहुल को सत्ता का केंद्र बनने से रोक सकें और स्वयं प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाल सकें| उत्तर फिलहाल सकारात्मक नहीं है| मोदी व्यक्तिगत रूप से भले ही इसके कितने ही योग्य क्यों न हों, लेकिन पूरा देश गुजरात नहीं है| गुजरात में तीन बार चुनाव जीत लेने का मतलब यह नहीं कि वह यदि केंद्रीय राजनीति में आ जाएँ तो वह पूरे देश को उसी तरह मुट्ठी में कर लेंगे, जिस तरह उन्होंने गुजरात को कर लिया है| फिर भी केंद्रीय राजनीति में उनकी आवश्यकता है| अब यह भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं पर निर्भर करता है कि वे मोदी को इसका मौका देते हैं या नहीं|
इस देश का इस्लामी कट्टरपंथी समुदाय इस बात को लेकर बगलें बजा रहे हैं कि इस देश में अब हिंदुत्व की या भारतीयता की राजनीति का अंत हो चुका है| वह ६ दिसंबर १९९२ की घटना को अपने लिए एक वरदान मान रहा है, क्योंकि इस अकेली घटना ने एक तरफ पूरे देश के मुसलमानों को एकताबद्ध कर दिया है, दूसरी तरफ हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को इस तरह अलग-थलग कर दिया है कि अब वे केंद्र में अपनी सत्ता कायम करने का सपना भी नहीं देख सकते| अकेले अपने बलबूते पर वे कभी इतना बहुमत नहीं जुटा सकते कि केंद्र में सरकार बना सकें, क्योंकि उनका समाज, जातियों, भाषाओं और क्षेत्रीयता के खेमों में इस तरह बँटा हुआ है कि वह कभी एकजुट हो ही नहीं सकता और दूसरे किसी क्षेत्रीय दल में इसका साहस नहीं कि वह उसे समर्थन देने के लिए आगे आ सके| शिवसेना और अकाली दल जैसे छोटे दल साथ रहें भी तो उससे कोई खास सहारा मिलने वाला नहीं| हिंदुत्व को आज एक लांछित शब्द बना दिया गया| हिंदू माने फासिस्ट, जो दूसरों के धर्मस्थलों का आदर नहीं करता| सामूहिक हमला करके मस्जिद को गिरा देता है| ऐसे निंदित अछूत के साथ कौन खड़ा हो सकता है| आज इस देश में इस अछूतवाद को दूर करने की जरूरत है, लेकिन भाजपा की राष्ट्रीय इकाई शायद उन्हें यह अवसर नहीं देगी, क्योंकि उसे डर है कि मोदी को केंद्रीय राजनीति में लाया गया, तो सत्ता की संभावना उससे बहुत दूर हो जाएगी| वैसे अच्छा होता कि भाजपा के शीर्ष नेता अब यह समझने की कोशिश करते कि सत्ता के बजाए देश के बारे में सोचें| आश्‍चर्य है कि आज देश में कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है, जो सत्ता के बजाए कुछ मूल्यों या राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा के लिए राजनीति करने का संकल्प ले|