शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

बोधगया विस्फोट

बोधगया विस्फोट
म्यॉंमार का बदला भारत में 

बोधगया में कभी भी कुछ हो सकता है, इसके संकेत पिछले एक वर्ष से लगातार मिल रहे थे| म्यॉंमार (बर्मा) में रोहिंग्या मुस्लिमों तथा बौद्धों के बीच चल रहे दंगे से यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि इसकी प्रतिक्रिया में भारत में भी कुछ हो सकता है और खासकर उस स्थिति में, जब पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन सीधे यह आरोप लगा रहे हों कि भारत सरकार म्यॉंमार में वहॉं की सरकार के साथ मिलकर मुसलमानों का सफाया करने में लगी है| मुस्लिमों के विरुद्ध दुनिया में कहीं कोई छोटी सी भी घटना हो तो उसकी प्रतिक्रिया भारत में अवश्य होती है, फिर यदि पड़ोस के उस इलाके में कोई घटना हो रही हो, जिसका संबंध सीधे भारत के इतिहास के साथ जुड़ा है, तो उसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी|

विश्‍व में शांति के अग्रदूत समझे जाने वाले भगवान बुद्ध की संबोधिस्थली ‘बोधगया' में रविवार ७ जुलाई को हुए श्रृंखलाबद्ध विस्फोट ने वैश्‍विक आतंकवाद को एक नये आयाम में पहुँचा दिया है| यद्यपि अभी प्रामाणिक तौर पर इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी है कि इन विस्फोटों के पीछे किसका हाथ है, लेकिन यह अनुमान लगाना बिल्कुल कठिन नहीं है कि इसके पीछे कौन लोग हैं| संयोगवश विस्फोटों की यह श्रृंखला बहुत घातक सिद्ध नहीं हुई, क्योंकि कोई मृत्यु नहीं हुई, केवल कुछ लोग घायल ही हुए| महाबोधि मंदिर को भी कोई बड़ी क्षति नहीं हुई, किन्तु यह विस्फोट होना ही एक बड़े खतरे का परिचायक है| मंदिर परिसर में कुल १३ विस्फोटक लगाये गए थे जिसमें से केवल १० में विस्फोट हुआ और बाकी ३ विस्फोट से पहले ही निष्क्रिय कर दिए गए| विस्फोट स्थलों को देखने से यह भी पता चल गया कि विस्फोटक कम क्षमता वाले थे| मगर इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि विस्फोटक लगाने वाला बहुत उदार था और वह नहीं चाहता था कि इससे ज्यादा लोग हताहत हों| इतने विस्फोटक एक  साथ लगाने के साथ स्थान और समय का जिस तरह चयन किया गया उससे साफ जाहिर होता है कि विस्फोटक लगाने वालों का इरादा बड़ी संख्या में लोगों को मौत के घाट उतारना था| यह तो संयोग ऐसा ठहरा कि विस्फोटक कम क्षमता के निकले और वे शायद निर्धारित समय से पहले फट गए जिससे कम लोग ही उसके शिकार हुए|
यह निश्‍चय ही भारत के आंतरिक सुरक्षा बलों, गुप्तचर संगठनों तथा राजनीतिक प्रशासकों की घोर लापरवाही का परिणाम है कि बोधगया में यह विस्फोट हुआ| बताया जा रहा है कि केन्द्रीय एजेंसियों को वहॉं संभावित आतंकी हमले की जानकारी पहले से थी लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया गया| इस वर्ष फरवरी में दिल्ली पुलिस ने यह ‘एलर्ट' जारी किया था कि बोधगया आतंकियों के निशाने पर है| हैदराबाद के बम विस्फोट के सिलसिले में पकड़े गए ‘इंडियन मुजाहिदीन' के एक आतंकवादी ने इसकी स्पष्ट जानकारी दी थी, फिर भी उसे महत्व नहीं दिया गया| ये सारी जानकारियॉं न भी होतीं तो भी यदि प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियॉं सतर्क होतीं तो यह हादसा टल सकता था| अपने देश के पश्‍चिमी और पूर्वी दोनों पड़ोसी क्षेत्रों में जिहादी आतंकवाद का नंगा नाच दशकों से चल रहा है, लेकिन हम उसकी तरफ नजर उठाने से भी बचने की कोशिश करते रहे हैं| पूर्वी क्षेत्र की तरफ से तो हमने अपनी आँखें ही बंद कर रखी हैं| सुरक्षा तंत्र विगत एक वर्ष से मिल रहे खतरे के संकेतों को पढ़ने में नाकाम रहा| म्यॉंमार के दंगों को भारत से अलग-थलग मानकर तो नहीं चलना चाहिए था| इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो कहना पड़ेगा कि अच्छा हुआ कि बोधगया में यह विस्फोट हुआ, कम से कम इससे नए पनप रहे खतरे के प्रति इस देश की आँखें तो खुलेंगी|
इस विस्फोट ने यह सिद्ध कर दिया है कि एशिया में जिहादी ताकतों का कहीं किसी से टकराव हो किन्तु उसका कुछ न कुछ परिणाम भारत को अवश्य भुगतना पड़ेगा, क्योंकि भारत हर तरफ से जिहादी ताकतों से घिरा हुआ है| अभी तक यही माना जाता रहा है कि चूँकि भारत, कश्मीर पर जबरिया कब्जा जमाए हुए है इसलिए कश्मीर को मुक्त कराने वाली जिहादी ताकतें भारत के विरुद्ध हिंसक कार्रवाई करने में लगी हैं, लेकिन बोध गया के विस्फोटों से जाहिर हो गया है कि म्यॉंमार में बौद्धों के साथ चल रहे संघर्ष में भी भारत को दोषी ठहराया जा रहा है और वहॉं बौद्धों की जवाबी कार्रवाई का बदला भी भारत में लिया जाएगा|
म्यॉंमार (बर्मा) में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय १९४७ के पहले से ही जब भारत का विभाजन एवं पाकिस्तान का निर्माण तय हुआ था- अपना जिहादी संघर्ष शुरू किए हुए है| १९४६ में बर्मा को स्वतंत्रता दिए जाने के समय से ही उन्होंने बर्मा से अलग होकर पाकिस्तान (पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बँगलादेश बन गया है) में शामिल होने का संघर्ष छेड़ दिया था| कश्मीरी मुसलमानों की तरह वे भी अब तक अपना मुक्ति संग्राम छेड़े हुए हैं| उनकी दिक्कत यह है कि वहॉं शांतिप्रिय बौद्धों ने भी हथियार उठा लिया है और जिहादियों को उनके ही सिक्के में जवाबी भुगतान करना शुरू कर दिया है| आज की स्थिति में दुनिया के सारे जिहादी संगठन रोहिंग्या मुस्लिमों की मदद में आ खड़े हुए हैं, लेकिन वे म्यॉंमार के बौद्धों को दबा नहीं पा रहे हैं|
अभी विगत १४ जून को जमात-उद-दवा (लश्करे तैयबा) की तरफ से पाकिस्तान के ९ शहरों में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में प्रदर्शनों का आयोजन किया गया जिसमें अन्य जिहादी संगठनों के लोग भी शामिल हुए| १५ जून को कराची में हुई एक सभा में लश्कर-ए-तैयबा तथा जमात-उद-दवा के संस्थापक हाफिज सईद ने कहा कि म्यॉंमार में रोहिंग्या मुसलमानों के सफाए में भारत की सरकार वहॉं की सरकार की मदद कर रही है| रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ भारत की भूमिका की आलोचना करते हुए उसने आरोप लगाया कि म्यॉंमार की पूरी मुस्लिम आबादी को मिटाने के लिए भारत सरकार म्यॉंमार सरकार के साथ मिलकर काम कर रही है| सईद ने पूरे मुस्लिम जगत का आह्वान करते हुए कहा कि म्यॉंमार के रोहिंग्या मुसलमानों के अधिकार और सम्मान को बचाने की जिम्मेदारी समूचे मुस्लिम उम्मा पर है| उसने म्यॉंमार के मुसलमानों को हथियार उठाने और अपनी अलग तंजीम बनाने की सलाह दी तथा आश्‍वासन दिया कि उसका संगठन म्यॉंमार के मुस्लिमों की पूरी मदद करेगा| पाकिस्तान में न कोई बौद्ध आबादी है न बौद्ध मंदिर इसलिए वहॉं कोई बदले की कार्रवाई नहीं हो सकी इसलिए जिहादी गुस्से में भारत के सर्वाधिक पवित्र बौद्ध स्थल को लहूलुहान करने की साजिश रची गई| इसके साथ ही श्रीलंका, मलेशिया तथा इंडोनेशिया में भी बदले की कार्रवाई की खबरें आ रही हैं| बँगलादेश के जिहादी संगठन बौद्धों को निशाना बनाने में रोहिंग्या गुटों की मदद कर रहे हैं|
रोहिंग्या मूवमेंट
रोहिंग्या मुसलमानों के संघर्ष का इतिहास भी दक्षिण एशिया में इस्लामी विस्तार तथा उनके आपसी एवं स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष के इतिहास का हिस्सा है| यहॉं उसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है| उनकी वर्तमान संघर्ष गाथा द्वितीय विश्‍व युद्ध के काल से शुरू होती है जो १९४७ से एक नया रंग ले लेती है| काण्डा विश्‍वविद्यालय के इतिहासकार अयेचान के अनुसार द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान १९४२ में (२८ मार्च १९४२) रोहिंग्या मुसलमानों ने उत्तरी अराकान (बर्मा) क्षेत्र में करीब २०,००० बौद्धों को मार डाला था| मुस्लिमों ने अराकान के दो शहरी क्षेत्रों - बुथिडौंग तथा मौंगडाऊ में- हत्या, लूट, आगजनी का भयावह खेल खेला था| जवाब में अराकानों ने भी मिम्व्या तथा म्रउक वू शहरों में करीब ५००० मुस्लिमों की हत्या कर दी थी|
वास्तव में अंग्रेजों ने जापानी फौजों के मुकाबले से पीछे हटते हुए बीच में लड़ाकू रोहिंग्या मुसलमानों को खड़ा करने की कोशिश की थी| उन्होंने इन मुसलमानों को ढेरों हथियार उपलब्ध कराया तथा यह आश्‍वासन दिया कि इस युद्ध में यदि उन्होंने मित्र राष्ट्रों का समर्थन किया तो उन्हें उनका वांछित ‘इस्लामी राष्ट्र' दे दिया जाएगा| हथियार पाकर इन रोहिंग्या मुसलमानों ने उनका प्रयोग जापानियों के खिलाफ करने के बजाए, अराकानों (जिनमें ज्यादातर बौद्ध थे) के सफाए में किया| उन्होंने अंग्रेजों की कृपा से अपना राज्य पाने के बजाए स्वयं अराकानों का सफाया करके अपना राष्ट्र हासिल कर लेना चाहा लेकिन वह संभव न हो सका|
इसके बाद अगला संगठित संघर्ष का अभियान १९४७ में ‘मुजाहिदीन मूवमेंट' के नाम से शुरू हुआ जो १९६१ तक चला| इस अभियान के अंतर्गत अराकान के रोहिंग्या आबादी वाले मायू क्षेत्र को पश्‍चिमी बमार्र् से अलग करके पूर्वी पाकिस्तान में शामिल करने का प्रयास किया गया|                                             
 बर्मा सरकार के खिलाफ जिहाद की शुरुआत
मई १९४६ में बर्मा की स्वतंत्रता से पहले कुछ अराकानी मुस्लिम नेताओं ने भारत के मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क किया और मायू क्षेत्र को पाकिस्तान में शामिल कराने के लिए उनकी सहायता मॉंगी| इसके पूर्व अराकान में ‘जमीयतुल उलेमा ए इस्लाम' नामक एक संगठन की स्थापना हुई जिसके अध्यक्ष उमरा मियॉं थे| इसका उद्देश्य भी अराकान के सीमांत जिले मायू को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाना था| जिन्ना से संपर्क के दो महीने के बाद अकयाब (आज का सितवे जो अराकान प्रांत की राजधानी है) में ‘नार्थ अराकान मुस्लिम लीग' की स्थापना हुई| इसने मायू को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल किये जाने की मॉंग की| बर्मा सरकार ने मायू को स्वतंत्र राज्य बनाने या उसे पाकिस्तान में शामिल करने से इनकार कर दिया| इस पर उत्तरी अराकान के मुजाहिदों ने बर्मा सरकार के खिलाफ जिहाद की घोषणा कर दी| मायू क्षेत्र के दोनों प्रमुख शहरों ब्रथीडौंग एवं मौंगडाऊ में अब्दुल कासिम के नेतृत्व में हत्या, बलात्कार एवं आगजनी का ताण्डव शुरू हो गया और कुछ ही दिनों में उन्होंने इन दोनों शहरों को गैरमुस्लिम अराकानों से खाली करा लिया| यह कुछ वैसा ही कार्य रहा जैसे कश्मीर घाटी के जिहादियों ने पूरे घाटी क्षेत्र को कश्मीरी पंडितों से खाली करा लिया| १९४९ में तो बर्मा सरकार का नियंत्रण केवल अकयाब शहर तक सीमित रह गया, बाकी पूरे अराकान पर मुजाहिदों का कब्जा हो गया| यहॉं लाकर हजारों बंगाली मुस्लिम बसाए गए| अवैध प्रवेश से यहॉं मुस्लिम आबादी काफी बढ़ गई| आखिरकार बर्मा सरकार ने इस इलाके में सीधी सैनिक कार्रवाई शुरू की जिसके कारण जिहादियों ने भागकर जंगलों में शरण ली|
यह उल्लेखनीय है कि अराकानी बौद्ध मठों के भिक्षु अब तक अपनी शान्ति बनाए रहे| मुजाहिदों के खिलाफ पहली बार उन्होंने बड़ी संख्या में एकत्रित होकर रंगून (अब यांगून) में भूख हड़ताल शुरू की| सरकार ने उन्हें सुरक्षा का पूरा आश्‍वासन दिया और जिहादियों का जंगलों में भी पीछा किया| अंततः सभी जिहादियों ने हथियार डाल दिए| ४ जुलाई १९६१ को शायद अंतिम सशस्त्र जिहादी जत्थे ने बर्मी सेना के सामने आत्मसमर्पण किया| इसके बाद बचे खुचे जिहादी बँगलादेश से लगी सीमा पर चावल की तस्करी आदि के धंधों में लग गए|
१९७१ में पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की पराजय तथा बँगलादेश के उदय के बाद बचे खुचे जिहादियों में फिर नई सुगबुगाहट पैदा हुई| १९७२ में जिहादी नेता जफ्फार ने ‘रोहिंग्या लिबरेशन पार्टी' (आर.एल.पी.) बनाई और बिखरे जिहादियों को इकट्ठा करना शुरू किया| हथियार बँगलादेश से मिल गए| बँगलादेश  बनने के बाद वहॉं के जिहादी नेतागण इधर-उधर भागे तो वे अपने हथियार बर्मी जिहादियों के पास छोड़ गए| जफ्फार स्वयं इस पार्टी के अध्यक्ष बने, अब्दुल लतीफ नामक एक जिहादी को उपाध्यक्ष तथा सैनिक मामलों का प्रभारी नियुक्त किया तथा रंगून विश्‍वविद्यालय के एक ग्रेजुएट मोहम्मद जफर हबीब को सेक्रेटरी बनाया| १९७४ तक इस संगठन की सदस्य संख्या बढ़कर ५०० तक हो गई| लेकिन यह पार्टी अपने उद्देश्यों में विफल रही| बर्मी सेना की कार्रवाई के आगे पार्टी बिखर गई और इसके नेता जफ्फार बँगलादेश भाग गए|
इसकी विफलता पर भी सेके्रेटरी मोहम्मद जफर हबीब ने हार नहीं मानी और १९७४ में ही उन्होंने ७० छापामारों के साथ रोहिंग्या पैट्रियाटिक फ्रंट का गठन किया| इस फ्रंट का अध्यक्ष पद उन्होंने स्वयं सँभाला और उपाध्यक्ष के पद पर रंगून में शिक्षित एक वकील नूरुल इस्लाम को उपाध्यक्ष नियुक्त किया| मेडिसिन के एक डॉक्टर मो. यूनुस को इसका सी.ई.ओ. बनाया|
मार्च १९७८ में बर्मा की राष्ट्रपति ने विन सरकार ने मुस्लिमों की अवैध घुसपैठ रोकने की कार्रवाई शुरू की| इसे ‘आपरेशन किंग ड्रैगन' नाम दिया गया| यद्यपि यह जफर हबीब के लिए अच्छा अवसर था| उन्होंने अपने फ्रंट में काफी भर्ती भी की किन्तु बर्मी सेना के आगे यह फ्रंट कोई प्रभावी भूमिका नहीं अदा कर सका| फ्रंट के सी.ई.ओ. रहे मोहम्मद यूनुस ने ‘रोहिंग्या सोलिडेरिटी आर्गनाइजेशन'(आर.एस.ओ.)बनाया और उपाध्यक्ष रहे नूरुल इस्लाम ने ‘अराकान रोहिंग्या इस्लामिक फ्रंट' (ए.आर.आई.एफ) का गठन किया| इनकी मदद के लिए पूरा इस्लामी जगत सामने आया| इनमें बँगलादेश एवं पाकिस्तान के सभी इस्लामी संगठन, अफगानिस्तान का ‘हिजबे इस्लामी' (गुलबुद्दीन हिकमतयार गुट) भारत के जम्मू कश्मीर में सक्रिय हिजबुल मुजाहिदीन, इंडियन मुजाहिदीन, मलेशिया के ‘अंकातन बेलिया इस्लाम सा मलेशिया ( ए.बी.आई.एम) तथा ‘इस्लामिक यूथ आर्गनाइजेशन आफ मलेशिया मुख्य रूप से शामिल हैं|
पाकिस्तानी सैनिक गुप्तचर संगठन आई.एस.आई. रोहिंग्या जवानों को पाकिस्तान ले जाकर उन्हें उच्च स्तरीय सैनिक तथा गुरिल्ला युद्धशैली का प्रशिक्षण प्रदान करने का काम कर रही है|
बौद्धों का उग्र प्रतिरोध
दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले म्यॉंमार में नई बात यह हुई है कि अब वहॉं बौद्ध भिक्षु संगठन भी जिहादियों के मुकाबले उठ खड़े हुए हैं| वर्ष १९६१ में बर्मा (म्यॉंमार) को बौद्ध देश घोषित किया गया| इसके साथ ही बौद्ध मठों तथा भिक्षु संगठनों को सत्ता के संरक्षण का विशेषाधिकार भी प्राप्त हो गया| दुनिया के किसी गैर मुस्लिम देश में अब तक किसी क्षेत्रीय मजहबी संगठन ने जिहादियों के खिलाफ हथियार उठाने और उनके संगठित विरोध का कदम नहीं उठाया है लेकिन म्यॉंमार के एक बौद्ध भिक्षु ने शांति की परिभाषा बदल दी है| अब वहॉं राखिने बौद्धों और रोहिंग्या मुस्लिमों के बीच सीधा मुकाबला है| राखिने, अराकान का ही नया नाम है| अराकान प्रांत ही अब राखिने स्टेट के नाम से जाना जाता है|
गत वर्ष (२०१२) में भड़का दंगा २८ मई को एक राखिने बौद्ध स्त्री मा थिडा हत्वे के साथ हुए बलात्कार और उसकी हत्या के बाद भड़का था| बौद्धों ने इस हत्या एवं बलात्कार का बदला ३ जून को एक बस से उतार कर १० रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या करके लिया| स्वाभाविक था-  इसके बाद जबर्दस्त दंगा भड़का जिसमें ८० मौतें हुई, करीब ९० हजार बेघर हुए| इनमें अधिकांश रोहिंग्या मुसलमान थे क्योंकि इस दंगे में बौद्धों का पलड़ा भारी था| थोड़े ही दिन बाद अक्टूबर में फिर दंगा भड़का जिसमें १०० के लगभग लोग मरे, ४६०० घर जलाए गए और करीब २२ हजार लोगों को घर छोड़कर भागना पड़ा| मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जून से अक्टूबर तक राखिने प्रांत में हुए दंगे में करीब एक लाख रोहिंग्या मुसलमान बेघर हो गए और ४० की मौत हुई| बौद्धों ने एक मदरसे पर भी हमला किया, जिसकी व्यापक निंदा हुई|
बीते साल जून से अक्टूबर तक म्यॉंमार में तनावपूर्ण शांति रही, किंतु २०१३ के मार्च महीने में फिर दंगे भड़क उठे| हिंसा की शुरुआत २० मार्च को मिक्तिला के एक बंगाली मुस्लिम ज्वेलर की दुकान से हुई| दुकान में सोने की एक हेयरपिन को लेकर दुकान मालिक तथा ग्राहक बौद्ध दंपति में झगड़ा हो गया और दुकान मालिक उसकी पत्नी तथा उसके दो नौकरों ने मिलकर दंपति की पिटाई कर दी| इससे पैदा हुआ तनाव उस समय एकदम भड़क उठा, जब छः मुस्लिम युवकों ने २० मार्च की शाम साइकिल पर जाते एक बौद्ध भिक्षु को मस्जिद में खींच लिया और उसे पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया|
बौद्धों ने इसका संगठित बदला लेने की योजना बनाई| २५ मार्च को मिक्तिला में मुस्लिम घरों तथा मस्जिदों को निशाना बनाया गया| यह दंगा पास के कई कस्बों तक फैल गया| इसके बाद २० अप्रैल को फिर दंगा भड़का, जिसमें करीब ४०० सशस्त्र बौद्धों ने ओक्कबामा में करीब १०० मुस्लिम घरों तथा दुकानों में आग लगा दी, जिसमें २ लोग मारे गए और करीब एक दर्जन घायल हुए| २१ मई को ७ मुस्लिमों को अशांति पैदा करने के आरोप में २ से २८ साल तक की सजा हुई, जिसमें उपर्युक्त ज्वेलरी शॉप का मालिक तथा भिक्षु को जिंदा जलाने वाले युवक शामिल थे| २९ मई को चीन से लगे शान स्टेट के सीमावर्ती कस्बे लाशिनों में दंगा भड़क उठा| मीडिया खबरों के अनुसार यहॉं भी एक युवा बौद्ध महिला को पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिए जाने के बाद लाठी डंडों तथा पत्थरों से लैस बौद्धों ने मुस्लिमों पर हल्ला बोल दिया| रोचक यह है कि इस दंगे में करीब ४०० मुस्लिमों ने एक बौद्ध मठ में छिपकर अपनी जान बचाई, जबकि हमलावरों में ज्यादातर बौद्ध ही थे|
इसके बाद से अब प्राय: पूरी दुनिया में बौद्धों और मुस्लिमों में भारी तनातनी पैदा हो गई है| अभी ५ अप्रैल २०१३ को इंडोनेशिया में ‘इमीग्रेशन डिटेंशन कैम्पफ (देश में अवैध रूप से प्रवेश करने वालों को जहॉं हिरासत में लेकर रखा जाता है) में रखे गये बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों में झगड़ा हो गया जिसमें १८ बौद्ध मारे गये और १५ रोहिंग्या घायल हुए| बताया जाता है कि कैम्प में रोहिंग्या  मुसलमानों ने संगठित रूप से हमला करके बौद्धों की हत्या की जबकि दूसरे पक्ष का आरोप है कि एक बर्मी बौद्ध ने रोहिंग्या औरत के साथ बलात्कार किया जिससे वहॉं देगा भड़क उठा|
म्यॉंमार के बौद्धों के इस नये तेवर से पूरी दुनिया में खलबली मच गई है| दुनिया भर के अखबारों में उनकी निंदा में लेख छापे जा रहे हैं| कुछ बौद्धों ने भी उनकी आलोचना की है कि बुद्ध की शिक्षा किसी के भी विरुद्ध हिंसा के प्रयोग की अनुमति नहीं देती| बौद्ध भिक्षुओं को शांति और समभाव का
आचरण करना चाहिए| किंतु म्यॉंमार के अधिकांश बौद्ध आत्मरक्षा के लिए अब जिहादियों का तौर-तरीका अपनाने में भी कोई संकोच नहीं कर रहे हैं|
म्यॉंमार के सारे बौद्ध भिक्षु भले स्वयं हथियार उठाने की स्थिति में न हों, लेकिन वे यू विराथु के पूरी तरह साथ हैं| मुस्लिम आक्रामता से अपनी शांति की रक्षा के लिए इसके अतिरिक्त और किया भी क्या जा सकता है? ‘टाइम' के आलेख पर भी आम प्रतिक्रिया यही है कि आखिर उसने कभी बर्मी मुस्लिमों के अत्याचार और हिंसा को अपनी आवरण कथा क्यों नहीं बनाया? विराथु का स्वयं भी कहना है कि वह न तो घृणा फैलाने में विश्‍वास रखते हैं और न हिंसा के समर्थक हैं, लेकिन हम कब तक मौन रहकर सारी हिंसा और अत्याचार को झेलते रह सकते हैं? इसलिए वह अब पूरे देश में घूम घूम कर भिक्षुओं तथा सामान्यजनों को उपदेश दे रहे हैं कि यदि हम आज कमजोर पड़े, तो यह देश मुस्लिम हो जाएगा|
४६ वर्षीय विराथु न्यू मैसोइन बौद्ध मठ के मुखिया हैं| उनके वहॉं पर ६० शिष्य हैं और मठ में रहने वाले करीब २५०० भिक्षुओं पर उनका प्रभाव है| उनका एक ही संदेश है- ‘अब यह शांत रहने का समय नहीं है|'
विराथु बौद्ध राष्ट्रवादी आंदोलन ९६९ के अध्यात्मिक नेता हैं| २००३ में मुस्लिमों के विरुद्ध घृणा के प्रचार के आरोप में उन्हें २५ वर्ष की जेल की सजा दे दी गई थी, लेकिन २०१० में सरकार ने जब सभी राजकीय बंदियों के लिए आम माफी की घोषणा की, तो वह भी रिहा कर दिए गए| रिहा होने के बाद उन्होंने अपना अभियान तेज कर दिया|
टाइम में छपी रिपोर्ट की लेखिका हन्नाह बीच ने म्यॉंमार के रंगून के बाद दूसरे सबसे बड़े शहर मांडले के बौद्ध मठ मे यू विराथु के उपदेश से अपने आलेख की शुरुआत की है| उन्होंने लिखा है कि नीचे दृष्टि किए हुए जब वह अपना प्रवचन दे रहे होते हैं, तो प्रस्तर प्रतिमा की तरह स्थिर नजर आते हैं, चेहरे पर भी कोई उत्तेजना नजर नहीं आती| जो कोई बर्मी भाषा न समझता हो, उसे लगेगा कि वह कोई गंभीर आध्यात्मिक उपदेश दे रहे हैं, लेकिन वह अपने हर उपदेश में केवल मुस्लिमों के विरुद्ध बौद्धों के संगठित होने और हिंसा का जवाब हिंसा से देने में संकोच न करने का उपदेश देते हैं|
अब सवाल है कि भारत इस कट्टरपंथी इस्लाम का मुकाबला करने के लिए क्या करे? यहॉं न कोई व्यक्ति है, न संगठन है और न सरकार, जो इस हिंसक चुनौती का सामना करने के लिए आगे बढ़कर बीड़ा उठाने का साहस कर सके|
९६९ ः बौद्ध राष्ट्रवादी आंदोलन
९६९ बर्मा (म्यॉंमार) के राष्ट्रवादी गुटों का संगठन है| ये तीन अंक बौद्ध त्रिरत्नों के प्रतीक हैं| प्रथम ९ भगवान बुद्ध की ९ विशेषताओं का प्रतीक है, तो दूसरा ६ बौद्ध धर्म की ६ विशेषताओं की ओर संकेत करता है और अंतिम ९ बौद्ध संघ की ८ विशेषताओं का द्योतक है| वास्तव में यह राखिने मूल निवासियों द्वारा खड़ा किया आत्मरक्षात्मक संगठन है, जो रोहिंग्या मुसलमानों के हमलों से राखिने स्टेट (पूर्व अराकान क्षेत्र) के मूल निवासियों के रक्षार्थ  बनाया गया है| बौद्ध भिक्षु आसिन विराथु इसके सर्वोच्च संरक्षक या नेता हैं|
१९६८ में मांडले के निकट एक ग्राम में पैदा हुए विराथु १६ वर्ष की आयु में स्कूल छोड़कर बौद्ध भिक्षु बन गए| २००१ में वह ९६९ आंदोलन में शामिल हो गए| सितंबर २०१२ में विराथु ने राष्ट्रपति थीन शीन की उस विवादास्पद योजना के समर्थन में एक रैली निकाली, जिसमें उन्होंने बंगालियों (रोहिंग्या मुसलमानों) को किसी अन्य देश में भेजने का कार्यक्रम तय किया था| इसके एक महीने बाद ही राखिने स्टेट में और हिंसा भड़क उठी| विराथु का दावा है कि राखिने में भड़की हिंसा के परिणाम स्वरूप ही मिक्तिला शहर में दंगा भड़का| इसी ५ मार्च को बर्मी बौद्ध भिक्षु शिन थाबिता को मिक्तिला में मुस्लिमों ने बुरी तरह पीटा और जिंदा जला दिया| इसके बाद भड़के दंगे में मस्जिदों, दुकानों और घरों पर हमले शुरू हो गए| आगजनी, लूट और मारपीट में १४ लोग मारे गए, जो ज्यादातर मुस्लिम थे| विराथु का कहना है कि आप करुणा और प्यार से कितने भी भरे क्यों न हों, लेकिन आप किसी पागल कुत्ते के बगल तो नहीं सो सकते|
म्यॉंमार सरकार पर दबाव
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा है कि म्यॉंमार को अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों की तकलीफों को समझना चाहिए और देश की नागरिकता प्रदान करने की उनकी मॉंग माननी चाहिए| पिछले दिनों इस्लामी देशों के प्रतिनिधियों ने महासचिव से अपील की थी कि वह म्यॉंमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को रुकवाएँ|
म्यॉंमार के शासक रोहिंग्या मुसलमानों को वहॉं का मूल निवासी नहीं मानते| उनके अनुसार ब्रिटिश शासन के दौरान उन्हें बंगाल (अब बँगलादेश) से यहॉं लाया गया| इस्लामी सहयोग संगठन के संयुक्त राष्ट्र संघ स्थित प्रतिनिधियों ने महासचिव के साथ संघ के बड़े देशों अमेरिका, रूस, चीन तथा यूरो संघ से भी अपील की है कि वे म्यॉंमार सरकार पर दबाव डालें, जिससे रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहा रहा अत्याचार रोका जा सके|
आज का बौद्ध धर्म पूरी तरह अहिंसक नहीं
भगवान बुद्ध स्वयं भले शांति और अहिंसा के प्रतीक रहे हों, किंतु आज का बौद्ध समाज उनकी तरह शांति और अहिंसा का उपासक नहीं है| महायान बौद्ध मत के चीनी संस्करण के ग्रंथों महा परिव्वान सुत्त, उपाय कौशल सुत्त तथा कालचक्र तंत्र ने बाकायदे आत्मरक्षार्थ तथा पापाचार के नाश के लिए हिंसा का सैद्धांतिक समर्थन किया गया है| तिब्बती, थाई, बर्मी तथा सिंहली बौद्धों को भी हिंसा से परहेज नहीं है| तिब्बत के धर्मगुरु दलाई भले पूर्ण अहिंसा के समर्थक हों, लेकिन आज का बौद्ध समुदाय हिंसा का जवाब देने के लिए हिंसा के इस्तेमाल को गलत नहीं माानता|
जापान के बौद्धों ने रूस के विरुद्ध युद्ध तथा द्वितीय विश्‍व युद्ध में भी सरकार के साथ युद्ध में भाग लिया था| यहॉं योद्धा भिक्षु (वारियर मंक) आवश्यकता पड़ने पर हिंसा के लिए भी तैयार रहते थे| श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुओं ने तमिलों के साथ संघर्ष में सरकार का पूरा साथ दिया| म्यॉंमार के प्रभाव में अभी इस वर्ष १३ मार्च को श्रीलंका के बौद्धों ने मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार करने की अपील जारी किया और कहा कि मुस्लिम दुकानों से सामान न खरीदें| कोलंबों में अभी हाल में एक मुस्लिम द्वारा संचालित रिटेल चेन (खुदरा किराना दुकानों की श्रृंखला) पर हमला किया गया, जिसमें बौद्ध भिक्षु भी शामिल थे| म्यॉंमार के बौद्ध तो बाकायदे हथियारबंद संघर्ष में लगे हुए हैं|