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गुरुवार, 18 अगस्त 2011
रविवार, 7 अगस्त 2011
सोमवार, 29 मार्च 2010
रविवार, 6 दिसंबर 2009
ओबामा की अफगान नीति सफल होने वाली नहीं
क्या कमाल की समयबद्ध योजना है। दुनिया के इतिहास में शायद ही किसी कमांडर ने किसी युद्ध के बारे में ऐसी सुनिश्चित घोषणा करने का साहस किया हो। आश्चर्य की बात है कि इस घोषणा में उस रणनीति का कोई जिक्र नहीं है, जिसके द्वारा इस युद्ध को निर्णायक अंत तक पहुंचा दिया जाएगा, बस एक तिथि है जिसके पहले सब कुछ हो जाएगा। निश्चय ही अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को सुनिश्चित वापसी के लिए यह तिथि 2012 के राष्ट्रपतीय चुनाव को ध्यान में रखकर घोषित की गयी है। अमेरिकी जनता अफगानिस्तान में लम्बे सैनिक उलद्ब्रान को लेकर बेचैन है, इसलिए वह चाहती है कि अमेरिका वहां से जल्दी से जल्दी बाहर आ जाए। ओबामा साहब के सामने इस तरह दोहरी समस्या है, एक तो अमेरिकी जनता की चिन्ता को दूर करना, दूसरे अफगानिस्तान में अमेरिका के घोषित शत्रु अलकायदा व तालिबान के गढ़ को तोडऩा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने 30 अरब डॉलर के अतिरिक्त धन की भी घोषणा कर दी है। लेकिन अहम सवाल है कि क्या ओबामा अपने इस घोषित लक्ष्य को पूरा कर पाएंगे।
युद्धनीति वह होती है, जिसकी घोषणा से शत्रु समूह में भय व चिंता फैल जाए, मगर ओबामा साहब की इस घोषणा से पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान में जश्न मनाया गया और शैंपेन की बोतलें खोली गयीं। अलकायदा और तालिबान नेता अभी तक तो यह रणनीति बना रहे थे कि अमेरिकी फौजों को कैसे वहां से भगाया जाए, लेकिन अब इस चिंता की जरूरत ही नहीं है। उन्हें तो अब जाना ही है, इसलिए यदि 18 महीने लडऩे के बजाए चुपचाप कहीं छिप के बैठ जाएं, तो भी शत्रु पराजित होकर भाग जाएगा। पाकिस्तान की सेना तो कब से उस दिन की प्रतीक्षा में है कि अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान छोड़कर वापस जाने की घोषणा करे। उनकी अमेरिका के साथ सहयोग की सबसे बड़ी रणनीति ही यही है कि आखिर कब तक अमेरिकी सैनिक यहां टिकेंगे। कब तक अमेरिकी जनता युद्ध के इस भारी खर्च को बर्दाश्त करेगी। एक न एक दिन तो उसे जाना ही होगा। तब तक केवल यह प्रयास करना है कि पाकिस्तान बचा रहे, उसकी सेना सुरक्षित रहे और उसके परमाणु अस्त्र उसके हाथ में बने रहें। यदि ये तीन बने रहे, तो अफगानिस्तान तो एक दिन उसके कब्जे में आएगा ही।
पाकिस्तान और उसके गुर्गे तालिबान इसी रणनीति के तहत अमेरिका के साथ भारत को भी वहां से भगाना चाहते हैं। क्योंकि भारत यदि वहां बना रहा, तो वह पाकिस्तान का सारा खेल बिगाड़ देगा। इसीलिए पाकिस्तान, अफगानिस्तान में ऐसी सरकार चाहता है, जो पाकिस्तान परस्त हो और भारत को एक पल वहां न ठहरने दे। तालिबान नेता पूर्व राष्ट्रपति मुल्ला उमर को उसने इसीलिए सुरक्षित बचाकर रखा है कि अमेरिका के जाने के बाद एक बार फिर वह उमर को अफगान राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठा सके। उसे उमर से बेहतर कोई दूसरा अफगान नेता नहीं मिल सकता, जो अफगानिस्तान को पाकिस्तान के विस्तार के रूप में बदल सके। पाकिस्तानी सूत्रों का यदि भरोसा करें, तो पाकिस्तानी सेना लादेन का सौदा कर सकती है। यानी अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी सुनिश्चित करने के लिए लादेन को अमेरिका के हवाले कर सकती है, किन्तु उमर को किसी भी स्थिति में अमेरिकियों के हाथ नहीं लगने देगी। अब तक यह देखा जा रहा है कि पाकिस्तान ने अलकायदा व तालिबान के दूसरी पंक्ति के बहुत से नेताओं को गिरफ्तार कर रखा है। बहुत अमेरिकी दबाव बढ़ता है, तो उनमें से किसी को उनके हवाले करके अपनी सफ लता दर्ज करा देता है।
अमेरिका की समस्या है कि उसकी गुप्तचर एजेंसी सी.आई.ए. की मुजाहिदीनों के बीच कोई घुसपैठ नहीं है। इसलिए मुजाहिदीनों के बारे में किसी भी सूचना के लिए वह पाकिस्तानी सैन्य गुप्तचर संगठन आई.एस.आई. (इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस) पर निर्भर है। आई.एस.आई. जो उन्हें बता दे, वही उनकी जानकारी। और आई.एस.आई. को इसमें कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि तालिबान के हर कदम की जानकारी उसे रहती है। और ऐसा हो भी क्यों न, तालिबान फौज का गठन करने वाली आईएसआई ही है। सी.आई.ए. किसी सूचना के लिए आईएसआई से जोर जबर्दस्ती तो कर नहीं सकती, इसलिए वह आईएसआई का उपयोग कर सके, इसके बजाए आईएसआई ही उसका उपयोग करती है।
किसी उपद्रवग्रस्त क्षेत्र में व्यवस्था स्थापित करने के लिए जब सेना भेजी जाती है, तो उसका लक्ष्य होता है पहले तो इलाके को उपद्रवियों से खाली कराना, फिर उस खाली हुए इलाके पर अपना नियंत्रण मजबूत करना और उसके बाद उसका निर्माण करना, जिससे शंतिपूर्ण शक्तियां वहां विकसित हो सकें। किन्तु ओबामा की पाक अफगान नीति में इसका घोर अभाव है। ओबामा साहब का कहना है कि पाक-अफगान सीमा अलकायदा की हिंसक कार्रवाइयों का केन्द्र है। पहले उसका गढ़ केवल अफगानिस्तान की सीमा में था, किन्तु अब वह पाकिस्तान की सीमा में भी आ गया है, इसलिए उसके खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान को शामिल करना अनिवार्य हो गया है। इसीलिए इस नीति को पाक-अफगान नीति का नाम दिया गया है। वास्तव में अलकायदा के कारण पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों देशों की सरकारें तथा जनता खतरे में है। मुजाहिदीन पाकिस्तान के परमाणु केन्द्रों पर अब से पहले तीन बार हमला कर चुके हैं। लादेन खुलेआम यह कह चुका है कि वह परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश में है। यदि इनका यह गढ़ तोड़ा न गया, तो ये परमाणु हथियार भी हासिल कर लेंगे और उसका इस्तेमाल करने में भी कतई नहीं संकोच करेंगे। ओबामा ने यह याद दिलाने की कोशिश की कि यह केवल अमेरिका की लड़ाई नहीं है। इसे यह भी नहीं समद्ब्राा जाना चाहिए कि यहां 'नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) की युद्ध क्षमता दावे पर लगी है। वास्तव में यह लड़ाई प्राय: पूरी दुनिया की है और इसके साथ नाटो के सभी सदस्य देशों की सुरक्षा भी दांव पर लगी है। इसलिए उनके देश ने यह संकल्प लिया है कि वह अलकायदा को अफगानिस्तान व पाकिस्तान दोनों ही क्षेत्रों में तोड़ देगा और अंतिम पराजय के गर्त में डाल देगा। उन्होंने कहा कि हम अफगानिस्तान में आतंकवाद के कैंसर को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए आये थे, लेकिन इस कैंसर की जड़ें अब पड़ोस के पाकिस्तानी क्षेत्र में भी फैल गयी है। इसलिए हमें ऐसी रणनीति अपनानी है, जो दोनों तरफ कारगर हो।
ओबामा के इन संकल्पों की तालिबान नेताओं द्वारा खिल्ली उड़ायी गयी है। अफगान तालिबान के एक संगठन 'इस्लामिक एमिरेट्स के द्वारा 'पश्तो में जारी एक वक्तव्य में कहा गया है कि राष्ट्रपति ओबामा आर्थिक संकट से ग्रस्त अमेरिकी जनता की इच्छा तथा मांगों की अनदेखी करके अफगानिस्तान में अपनी जोर आजमाइश करना चाहते हैं। इसी तरह शिराजुद्दीन हक्कानी उर्फ खलीफा (जिसका सुराग देने वाले के लिए 50 लाख डॉलर के इनाम की घोषणा की गयी है) ने भी ओबामा का मजाक उड़ाया है। खलीफा का हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान का सबसे ताकतवर संगठन है, जिसकी स्थापना शिराजुद्दीन के पिता मौलवी जलालुद्दीन हक्कानी ने की थी।
अफगान तालिबानों का कहना है कि अफगानिस्तान ने कभी किसी बाहरी फौज को बर्दाश्त नहीं किया है। उसने रूसियों को यहां से लड़कर भगा दिया, लेकिन अमेरिकी तो बिना लड़े ही भागने के लिए तैयार हैं। ओबामा की इस नीति के समर्थक भी यह स्वीकार करते हैं कि अमेरिका और यूरोप के एक लाख सैनिक यदि अफगानों का अब तक कुछ नहीं बिगाड़ पाए, तो 30 हजार और अमेरिकी सैनिक भी वहां पहुंचकर क्या कर लेंगे। नयी कुमक पहुंचने के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक लाख हो जाएगी और यूरोपीय सैनिकों को मिलकर यह संख्या करीब डेढ़ लाख हो जाएगी, लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं है कि ये डेढ़ लाख सैनिक वहां कोई चमत्कार कर सकेंगे।
ओबामा की नीति समर्थक यह भी मानते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबानों का युद्ध केवल मजहबी या जिहादी ही नहीं है, यह अफगानिस्तान की मुक्ति का भी युद्ध है। यदि ओबामा साहब अमेरिकी सेना को वापस बुला लेंगे, तो इससे तालिबान का आजादी का मुद्दा खत्म हो जाएगा और उनके आतंकी हमलों का कारण समाप्त हो जाएगा। यह बात सही है, लेकिन सवाल है अमेरिका अब अफगानिस्तान को खाली कर देगा, तो क्या फिर वही स्थिति नहीं पैदा हो जाएगी, जब रूसी सेनाएं चली गयीं थीं। तब क्या तालिबान करजई को उसी तरह सरेआम फांसी पर नहीं लटका देंगे, जिस तरह उन्होंने तत्कालीन शासक मोहम्मद नजीबुल्लाह को सरेआम लटका दिया था।
अमेरिका का अफगानिस्तान युद्ध उसके वियतनाम व इराक युद्धों से भिन्न है। वियतनाम में उसकी केवल सैन्य प्रतिष्ठा दांव पर थी और सवाल कम्युनिज्म को हराने का था। उत्तर वियतनाम की लड़ाई केवल स्वतंत्रता की लड़ाई थी। वस्तुत: वे अमेरिका से नहीं लड़ रहे थे, बल्कि अमेरिका उनसे लड़ रहा था। इसलिए वहां से बाहर निकल आने से अमेरिकी हितों को कोई खास क्षति नहीं पहुंचने वाली थी। वियतनाम युद्ध में कोई पड़ोसी देशों की सुरक्षा भी दांव पर नहीं थी। इराक युद्ध में अमेरिका का तेल लोभ हो सकता था, लेकिन असली मसला सद्दाम को सजा देना था, जो खुलेआम अमेरिका जैसी महाशक्ति को मुहचिढ़ाया करता था। सद्दाम मारा गया, बस अमेरिका का काम खत्म हुआ। लेकिन अफगानिस्तान ऐसा नहीं है। अफगानिस्तान में अमेरिका का कोई लोभ नहीं है। उसकी लड़ाई अब किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई है, जिसकी जड़ें केवल पाकिस्तान तक नहीं, जाने कितने और देशों तक फैली हुई हैं। यहां केवल लादेन या उमर की मौत तक भी लड़ाई सीमित नहीं है। यह जिहाद के खिलाफ या यों कहें कि अरबी इस्लामी साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध है। अमेरिका यहां से भागकर अपनी रक्षा नहीं कर सकता। तालिबान व अलकायदा को बिना अंतिम पराजय के गर्त में पहुंचाए वह वहां से हटा, तो दुनिया के किसी कोने में उसके हित सुरक्षित नहीं रह सकते। फिर इस युद्ध में जैसा कि राष्ट्रपति ओबामा ने स्वयं कहा है कि केवल अमेरिका की सुरक्षा या केवल उसके अपने हित ही दांव पर नहीं है, बल्कि उसके सारे सहयोगियों की सुरक्षा दांव पर है। और सच कहें कि यदि अफगानिस्तान में तालिबान विजयी हुए, तो तमाम लोकतांत्रिक शक्तियों पर उनका दबाव बढ़ जाएगा।
इससे जिहादी मनोबल किस तरह बढ़ेगा, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। यह एक खुला तथ्य है कि इन्हीं मुजाहिदीनों ने दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति सोवियत संघ को पराजित किया था और उसकी सेनाओं को अफगानिस्तान छोडऩे पर मजबूर कर दिया था। अब यदि ये अमेरिका जैसी महाशक्ति को भी भगाने में सफल हो जाते हैं, तो फिर ये स्वत: दिग्विजयी बन जाएंगे। इस बात को बार-बार दोहराने का आज कोई अर्थ नहीं रह गया है कि तालिबान की यह फौज अमेरिका की मदद से ही तैयार हुई थी, क्योंकि शीतयुद्ध काल के सारे समीकरण अब उलट-पुलट हो चुके हैं। अब इस इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी समस्या है कि जिहादी ताकतों से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कैसे की जाए।
सच कहा जाए, तो अफगानिस्तान में अमेरिका का कोई निजी हित दांव पर नहीं है, बल्कि उससे अधिक भारत का हित वहां दांव पर लगा हुआ है। जो युद्ध अभी अफगानिस्तान में लड़ा जा रहा है, वह वहां नहीं लड़ा गया, तो उसकी युद्धभूमि भारत बनेगा। क्योंकि तालिबान या जिहादियों के सीधे निशाने पर भारत है। लोगों को शायद ख्याल हो कि अफगानिस्तान में जब तालिबान नेता मुल्ला उमर की सरकार कायम हो गयी थी, तो तमाम तालिबान लड़ाके कश्मीर में भारतीय सीमा के निकट इकट्ठा होने लगे थे। अफगानिस्तान में अमेरिकी हमला शुरू हो जाने के कारण वे फिर यहां से अफगानिस्तान लौटे, अन्यथा उनका लक्ष्य कश्मीर के लिए भारत सरकार के खिलाफ जिहादी संघर्ष तेज करना था। अभी भारत अफगानिस्तान में उसके पुनर्निर्माण के कार्य में लगा है। वह मध्य एशिया से अफगानिस्तान होकर ईरान तक सड़क निर्माण में लगा है। शिक्षा, चिकित्सा तथा उद्योग धंधों के लिए ढांचा तैयार करने की महती जिम्मेदारी वह अपने ऊपर लिए है। इस कार्य से बहुत से उन अफगानों का भी दिल जीत रहा है, जो वहां अमेरिका की उपस्थिति से खफा हैं। लेकिन यह सब पाकिस्तान को फूटी आंखों नहीं सुहा रहा है। इसलिए अब यह भारत की जिम्मेदारी है कि वह अमेरिका को समझाये कि वह अफगानिस्तान से निकलने की जल्दबाजी न करे। उसे अपने देश की जनता को यह समझाना चाहिए कि वह अफगानिस्तान में किस तरह की लड़ाई लड़ रहा है। अभी तो वहां पुलिस, फौज या सुरक्षा का काम अमेरिका संभाले है और निर्माण का कार्य भारत। लेकिन जिस क्षण अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान को खाली किया, उसके अगले ही क्षण भारत का निर्माण कार्य भी ठप्प हो जाएगा, क्योंकि तालिबान उसे चलने नहीं देंगे। भारत वहां पर अफगानिस्तान की सरकारी फौज तैयार करने में लगा है। उसे प्रशिक्षण देने की पूरी जिम्मेदारी भारत पर है, लेकिन डेढ़ साल में वह ऐसी कोई फौज तैयार कर देगा, जो अमेरिकी फौज की जगह ले सके और तालिबान का मुकाबला कर सके। यह प्राय: असंभव ही है। तो क्या अमेरिका अफगानिस्तान को अराजगता के जंगल में छोड़कर चला जाएगा।
ऐसा कहा जा रहा है कि सेना की वापसी की घोषणा केवल अमेरिकी जनता के संतोष के लिए की गयी है, यथार्थ में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है। सेना की वापसी का कार्यक्रम तालिबान और अलकायदा के सारे गढ़ों को नेस्तनाबूद कर दिये जाने पर निर्भर है। यदि वे बने रहते हैं, तो फिर अमेरिकी सेना कैसे वापस हो सकेगी। ओबामा ने अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए पाकिस्तान व अफगानिस्तान दोनों देशों की सरकारों पर दबाव बढ़ाया है। उसने पाकिस्तान को यह चेतावनी भी दी है कि यदि वह तालिबान के सुरक्षित गढ़ों को भेदने का काम ईमानदारी से नहीं किया, तो वह स्वयं इस काम को अपने हाथ में लेगा और मानवरहित द्रोण विमानों के हमले का दायरा बढ़ जाएगा।
यहां ध्यान देने की बात है कि द्रोण विमान जंगल तथा पहाड़ी इलाकों में ही हमले कर रहे हैं। वे शहरी क्षेत्रों पर हमले नहीं कर सकते, क्योंकि उस स्थिति में बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक मारे जाएंगे और यह कोई जरूरी नहीं कि अलकायदा व तालिबान के मुखिया अब तक जंगल व पहाड़ों में ही पड़े हों। जैसी कि खबर है कि क्वैटा के पास एक पूरा कस्बा तालिबान द्वारा खरीद लिया गया है। पाकिस्तानी सेना स्वयं उसकी रखवाली कर रही है।
ओबामा साहब पाकिस्तान के प्रति अधिक उदार है। हो सकता है कि यह उदारता भी रणनीतिक हो, फिर भी जैसी कठोर भाषा उन्होंने अफगान सरकार के लिए इस्तेमाल की है, वैसी पाकिस्तान के लिए नहीं। उन्होंने अफगान राष्ट्रपति हामिद करजयी से साफ कह दिया है कि अब और 'ब्लैंक चेक` नहीं। यानी अब खुद कमर कसो और परिणाम दिखाओ। जबकि उन्होंने पाकिस्तान को अपना रणनीतिक साझीदार बनाने का प्रलोभन दिया है।
पता नहीं ओबामा साहब इस बात को समझ पाते हैं या नहीं, और यदि नहीं समझ पाते तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल है कि पूरा पाकिस्तान ही जिहादी आतंकवाद का गढ़ है। अफगानिस्तान तो उसी का विस्तार है। पाकिस्तान वस्तुत: इस्लामी जिहाद का प्रतीक है, क्योंकि इसका जन्म ही जिहादी हिंसा से हुआ है। यदि अलकायदा और तालिबान को पराजित करना है, तो उन्हें पाकिस्तान को पराजित करना होगा।
पाकिस्तान की जड़ सींचते हुए अफगानिस्तान की शाखाएं काटने से अंतर्राष्ट्रीय जिहादी आन्दोलन पराजित होने वाला नहीं है। जुलाई 2011 तक कैसी स्थिति बनेगी, कहना कठिन है, लेकिन भारत को उसके संभावित परिणामों की तैयारी अभी से शुरू कर देनी चाहिए।
सोमवार, 23 नवंबर 2009
ओबामा क्यों बिछ गये यों चीन के आगे
आश्चर्य होता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा चीन के आगे इस तरह बिछ गये कि वह जो कुछ कहता गया, सब मानते गये और जितना झुकाता गया, उतना झुकते गये। जापान के सम्राट अकाहितो के आगे वह कहां तक झुक गये, यह तो सभी ने देखा, लेकिन चीन में तो लगता है वह पाणिपात की ही मुद्रा में आ गये थे। फिर भी चीन उनकी किसी अदा पर नहीं पसीजा और उनकी हर उस मांग को ठुकरा दिया, जिसे मनवाने की आशा लेकर वह उसके दरबार में गये थे। ओबामा की इस यात्रा के दौरान चीन ने यह अच्छी तरह प्रदर्शित किया कि बाहरी दबावों का न केवल वह आसानी से मुकाबला कर सकता है, बल्कि विपरीत स्थितियों में भी अपनी बातें पहले मनवा सकता है।
राष्ट्रपति ओबामा एशिया की पहली लंबी यात्रा पर 13 नवंबर को सबसे पहले जापान पहुंचे, वहां से सिंगापुर, फिर सिंगापुर से चीन और वहां से दक्षिण कोरिया। इनमें से दक्षिण कोरिया तो अमेरिका की रियाया ही है, इसलिए उसे तो इस यात्रा के आकलन से बाहर ही कर देना चाहिए। अब यदि बाकी तीन देशों की यात्राओं का मूल्यांकन करें, तो यही कहना पड़ेगा कि तमाम सार्वजनिक लोकप्रियता के बावजूद ओबामा की यह यात्रा पूरी तरह विफल रही।
यों शुरुआत बहुत निराशाजनक नहीं रही। यात्रा के प्रथम चरण में ओबामा जब टोकियो पहुंचे, तो निश्चय ही उनका एक विश्व नेता की तरह स्वागत हुआ। टोकियो की सड़कों पर लोग वर्षा के बावजूद उनके स्वागत में खड़े थे और नारे लगा रहे थे। यहां वह जापान के सम्राट अकाहितो से एकदम कमर तक झुक कर (कोर्निस की मुद्रा में) मिले। जापानी संस्कृति में झकने का अर्थ सम्मान प्रकट करना होता है। जितना अधिक झुकना उतना अधिक सम्मान। तो ओबामा साहब अधिकतम सम्मान प्रदर्शित करने के लिए कमर तक झुक गये। एक बुजुर्ग राष्ट्र प्रमुख को सम्मान देना कतई अनुचित नहीं, लेकिन ओबामा साहब ने ध्यान नहीं रखा कि अकाहितो जापानी राजशाही के अवशिष्ट प्रतीक हैं, जबकि वह स्वयं दुनिया के एक सर्वाधिक शक्तिशाली लोकतंत्र के प्रधान हैं। झुकें , लेकिन झुकने की भी तो कोई सीमा होनी चाहिए। खेद की बात यह है कि इतना झुकना भी जापानी नेताओं के साथ बातचीत में कोई काम नहीं आया। 'कांतेई(जापानी ह्वाईट हाउस) में बंद दरवाजों के पीछे जब प्रधानमंत्री यूकिओ हातोयामा के साथ बातचीत शुरू हुई, तो ओबामा को पता चला कि यहां का वातावरण टोकियो की सड़कों की तरह का नहीं है। अमेरिका, जापान के फ्यूटेन्मा स्थित अपने नौसैनिक एवं वायु सैनिक अड्डे के दक्षिणी द्वीप पर स्थापित करना चाहता है, लेकिन जापान इसके लिए सहमत नहीं है। वास्तव में जापान इस पुराने अड्डे को ही बंद कराना चाहता है, क्योंकि अब यह अमेरिकी अड्डा देश में बेहद अलोकप्रिय हो चुका है। ऐसे में नये अड्डे की स्वीकृति एक मुश्किल काम है, जबकि अमेरिका के लिए यह आवश्यक है। मतभेदों की गहराई को देखते हुए दोनों पक्षों ने इस मुद्दे पर विचार के लिए एक 'कार्यदल बनाने का निर्णय लेकर फिलहाल बातचीत को टाल दिया। वस्तुत: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने जापान को उसके सैन्य अधिकार से वंचित कर दिया और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। जापान को इसका लाभ भी हुआ, क्योंकि उसे रक्षा की चिंता छोड़कर अपने आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने का पूरा मौका मिला। लेकिन इससे उसका स्वाभिमान अब तक आहत बना हुआ है, इसलिए हर जापानी चाहता है कि जापान को स्वतंत्र सैन्य विकास का अवसर मिले और अमेरिका अपनी सेना पूरी तरह से वहां से हटा ले। जापानी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका और जापान के बीच सबसे बड़ा अकेला द्विपक्षीय सवाल यही है कि शीत युद्धकालीन उनके रक्षा गठबंधन को आज के समय में कैसे प्रासंगिक बनाये रखा जाए, जबकि बढ़ती चीनी शक्ति ने इस क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बिल्कुल बिगाड़ दिया है। किन्तु दोनों ही देश इस सवाल से आंखें चुराते नजर आते हैं।
ओबामा का अगला पड़ाव सिंगापुर था, जहां 'एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग सम्मेलन (एशिया पैस्फिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन कांफ्रेंस) में शामिल होना था। इस सम्मेलन ने इस वर्ष जो सुर्खियां बटोरीं वे निश्चय ही अमेरिकी पसंद की नहीं होंगी। इस संगठन में चीन और जापान भी शामिल हैं। इन देशों ने जल्दबाजी में बुलायी गयी एक सुबह नाश्ते की बैठक में इसी बात की पुष्टि की कि 'मौसम में बदलाव के सवाल पर अगले महीने कोपेनहेगेन में जो सम्मेलन होने जा रहा है, उसके पूर्व वे अपने मतभेदों को दूर नहीं कर सकेंगे।
यहां से ओबामा बीजिंग पहुंचे। वहां भी उनका बाहर स्वागत सत्कार बहुत शानदार था। चीन सरकार ने उनके सम्मान में एक भव्य भोज का भी आयोजन किया। सब कुछ ऐसा कि ओबामा अभिभूत थे। पर चीनी नेताओं ने ओबामा की कूटनीतिक शिथिलता का पूरा फायदा उठाया और उनसे चीन की सारी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का समर्थन कराने के बावजूद एक भी अमेरिकी मांग स्वीकार नहीं की। उन्होंने केवल उसी अमेरिकी प्रस्ताव को स्वीकार किया, जो चीन के हित में था, बाकी सारे मसलों पर टका सा जवाब दे दिया।
अमेरिकी दैनिक न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि 'चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के साथ 6 घंटे की बैठक, दो भोज तथा 30 मिनट की न्यूज कांफ्रेंस के दौरान- जिसमें हू ने किसी को सवाल करने की इजाजत नहीं दी थी- राष्ट्रपति ओबामा का मुकाबला एक ऐसे तेजी से उभर रहे चीन से हुआ, जो अमेरिका को केवल नकारने में अधिक रुचि रखता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि चीन ने अमेरिकी एजेंडे में शामिल अधिकांश बातों को नकार दिया।
अमेरिकी एजेंडे में तीन प्रमुख मुद्दे थे। एक तो ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम नियंत्रण। दूसरा चीनी मुद्रा युआन का मूल्य सही करना और तीसरा मानवाधिकारों का सम्मान, जिसमें तिब्बत का मसला भी शामिल था। चीन ने इनमें से किसी भी अमेरिकी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। राष्ट्रपति हू ने ईरान पर संभावित प्रतिबंध की सार्वजनिक तौर पर कोई चर्चा नहीं की। उन्होंने चीनी मुद्रा का मूल्य ठीक करना भी स्वीकार नहीं किया। चीन जानबूद्ब्राकर अपनी मुद्रा युआन का विनिमय मूल्य उसके वास्तविक मूल्य से कम रखे है जिससे कि उसका माल विदेशों में सस्ता पड़े और निर्यात को प्रोत्साहन मिले। उसकी इस नीति के कारण अमेरिका को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है, क्योंकि चीनी माल वहां सस्ते पड़ रहे हैं और दोनों देशों का व्यापारिक संतुलन चीन की तरफ द्ब्राुका हुआ है। यानी चीन अमेरिका को निर्यात अधिक करता है आयात कम। और मानवाधिकार के सवाल पर तो चीन ने संयुक्त घोषणापत्र में डंके की चोट पर कहा है कि इस मुद्दे पर दोनों देशों में मतभेद हैं यानी वह मानवाधिकार की अमेरिकी अवधारणा को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
चीन ने ओबामा की यात्रा का ऐसा सुनियोजित एवं सूक्ष्म प्रबंध किया था कि इसमें चीनी मत की पुष्टिï हो और अमेरिकी विचार चर्चा में भी न आने पाएं। चीन ने ऐसी व्यवस्था की कि ओबामा ऐसे बयान दें जिससे चीनी नीतियों की पुष्टिï व उसके उद्देश्यों का समर्थन हो। उसने बड़ी चतुराई से ऐसा कुछ किया कि मानवाधिकार तथा चीनी मुद्रा जैसे विषयों पर कोई चर्चा न हो। कार्नेल यूनिवर्सिटी में चीन मामलों के विशेषज्ञ ईश्वर एस. प्रसाद के अनुसार चीन ने बड़े अद्भुत कौशल से सार्वजनिक चर्चा को चीनी मुद्रा नीति के दुनिया पर पड़ रहे खतरनाक प्रभाव से हटाकर अमेरिका की ढीली वित्तीय नीति तथा उसकी संरक्षणवादी प्रवृत्ति की ओर मोड़ दिया।चीन के ऐसे प्रबंध के कारण ओबामा की इस चीन यात्रा से चीन को यह प्रदर्शित करने का बेहतर अवसर मिला कि किस तरह वह बाहरी दबावों को बिना प्रयास दूर धकेल सकता है और अमेरिका का अपना एजेंडा चर्चा से बाहर रह गया।
अपनी यात्रा शुरू करते ही सबसे पहले ओबामा ने यह घोषणा की कि तिब्बत चीन का अंग है। चीन को प्रसन्न करने के लिए ही उन्होंने वाशिंगटन में तिब्बती नेता दलाई लामा से मिलने से इनकार कर दिया था। ओबामा के चीन पहुंचने पर अमेरिकी पक्ष से कहा गया कि राष्ट्रपति चीनी युवाओं से मुलाकात करना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि इस मुलाकात को टीवी पर दिखाया जाए और उसे नेट पर भी ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाए। चीन ने इसकी भी व्यवस्था कर दी। शंघाई पहुंचने पर ओबामा को युवाओं से मिलने का मौका दे दिया गया, किन्तु इसमें सामान्य छात्रों के बजाय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को प्रमुखता से पेश किया गया। सरकार ने इसे शंघाई टीवी पर प्रसारित किये जाने की भी सुविधा दे दी। ओबामा ने युवाओं को प्रभावित किया, लेकिन मानवाधिकारों व अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर बहुत संभल कर बोले। उन्होंने 'नेट पर मुक्त सूचना प्रवाह का भी समर्थन किया, लेकिन काफी सावधानी के साथ जैसे यह कहा कि हर देश की अपनी संस्कृति होती है, अपनी आवश्यकता होती है, जिसके अनुसार वह अपनी व्यवस्था कर सकता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि चीन में नेट पर जो सूचनाएं प्राप्त होती है वे सरकारी तंत्र की छनाई के बाद ही आ पाती है। ओबामा ने यह जरूर कहा कि मुक्त सूचना प्रवाह से किसी भी देश या समाज की शक्ति और बढ़ सकती है मगर उन्होंने चीनी व्यवस्था की कोई निन्दा आलोचना नहीं की। उनकी नजर अगले दो दिन की उन मुलाकातों पर अधिक थी जो चीनी नेताओं के साथ होने वाली थी।
ओबामा असल में बड़ी आशाएं लेकर चीन की इस यात्रा पर गये थे। आर्थिक मंदी के कारण संकट के दौर से गुजर रहे अमेरिका के लिए चीन एक उद्धारक देश नजर आ रहा था। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा साहूकार है और सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार भी। ऐसे में चीन की थोड़ी सी रियायत भी अमेरिका के लिए काफी मददगार सिद्ध हो सकती थी किन्तु चीन ने ओबामा की राई रत्ती नहीं सुनी।
ऐसे में सच कहा जाए तो ओबामा की इस यात्रा के दौरान अमेरिका के हाथ कुछ नया नहीं लगा। यद्यपि ओबामा सरकार के अधिकारियों का दावा है कि राष्ट्रपति महोदय जिन लक्ष्यों को लेकर यात्रा पर गये थे उन्हें पूरा कर लिया गया है, लेकिन इस दावे की पुष्टि के लिए उनके पास कोई प्रमाण नहीं है। उनके अनुसार ओबामा की चीनी नेताओं के साथ बातचीत के बाद जारी पांच सूत्रीय संयुक्त विज्ञप्ति में अनेक मसलों पर दोनों देशों ने मिलकर काम करने का संकल्प लिया है। बयान में कहा गया है कि ओबामा और हू जिंताओ आपस में नियमित रूप से बातचीत करते रहेंगे और दोनों देश एक दूसरे की रणनीतिक चिन्ताओं की ओर अधिक ध्यान देंगे। बयान में यह भी कहा गया है कि दोनों देश आर्थिक मामलों, ईरान तथा मौसम में बदलाव के मसलों पर साझीदार की तरह कार्य करेंगे।
संयुक्त वक्तव्य के इन वाक्यों को देखकर कोई भी कह सकता है कि इनमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो अमेरिका के पक्ष में हो बल्कि इसमें अमेरिका को चीन के पक्ष में द्ब्राुकाने का प्रयत्न है। कूटनीतिक विशेषज्ञ जानते हैं कि ऐसी शब्दावलियों का क्या अर्थ होता है। यहां मुख्य सवाल यह है कि चीन की नाराजगी से बचने के लिए अब ओबामा ने वाशिंगटन में दलाई लामा से मिलने से इनकार किया उस समय की स्थिति के मुकाबले क्या चीन या किसी अन्य एशियायी देश में ओबामा अपना अमेरिकी एजेंडा कुछ भी आगे बढ़ाने में सफल हुए हैं। जवाब नकारात्मक ही मिलेगा।
जापान में उनके रवैये से लगता है कि ओकीनावा में अमेरिकी सैनिक अड्डा बनाने के सवाल पर अमेरिकी रुख और नरम हुआ है। सिंगापुर के क्षेत्रीय सम्मेलन में अमेरिका की एक और सर्वोच्च प्राथमिकता वाली विदेशनीति को आघात लगा जब उन्होंने वहां स्वीकार किया कि 'वैश्विक तपन (ग्लोबल वार्मिंग) के खिलाफ लड़ाई का कोई समझोता इस वर्ष संभव नहीं है। ईरान के मसले पर अमेरिकी अधिकारी रूस के राष्ट्रपति दिमित्र ए. मेद्वेदेव को तो यह कहने के लिए तैयार कर ले गये कि 'यदि बातचीत विफल हो जाती है तो ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों के सवाल पर उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं है।लेकिन यही बात ओबामा चीन से नहीं कहला सके। जबकि यह पता है कि ईरान के विरुद्ध किसी प्रतिबंध के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के लिए चीन की पूर्वानुमति आवश्यक होगी। चीन ने इस मसले पर अमेरिका के साथ साझीदार के तौर पर काम करने की बात तो की है, लेकिन साथ ही उसने यह भी कहा है कि 'ईरान नाभिकीय विवाद को बातचीत और सलाह मशविरे से हल किया जाना चाहिए।इतना ही नहीं संयुक्त वक्तव्य में हू ने यह भी कहा है कि 'बातचीत के दौरान हमने राष्ट्र पति ओबामा के समक्ष यह स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय परिस्थितियों की अपनी भिन्नता के कारण हम दोनों के लिए यह स्वाभाविक है कि कुछ मुद्दों पर हम असहमत रहें।
'व्हाइट हाउस के कुछ अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि ईरान के मामले में हम हू जिंताओ से वह नहीं प्राप्त कर सके जो हम चाहते थे, किन्तु ओबामा का तरीका दीर्घकाल में फलदायी होगा। हम यह आशा नहीं कर रहे हैं कि वे इस मामले का नेतृत्व करेंगे या कोई धारा में बदलाव ला देंगे, हम तो केवल यह चाहते हैं कि वे अड़ंगा लगाने का काम न करें। यदि यही लक्ष्य था तो भी चीन की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं था कि वह अमेरिकी रास्ते में अड़ंगा नहीं डालेगा।
संयुक्त वक्तव्य में कुछ बातों को अनावश्यक रूप से प्रमुखता से डाला गया। जैसे कि दक्षिण एशिया के बारे में चीन को दिया गया बेहतर भूमिका निभाने का आमंत्रण। अमेरिका को अच्छी तरह मालूम है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में चीन पूरी तरह पाकिस्तान के साथ है और अफगानिस्तान के प्रति भी चीन की वही नीति है जो पाकिस्तान की है फिर ओबामा साहब को यह जरूरत क्यों पड़ी कि वह संयुक्त बयान में यह घोषित करे कि चीन और अमेरिका मिलकर दक्षिण एशियायी देशों में शांति के लिए काम करेंगे। वास्तव में चीन दक्षिण एशिया में अपनी राजनीतिक भूमिका बढ़ाना चाहता है इसलिए उसने ओबामा को इसके लिए तैयार कर लिया कि दक्षिण एशियायी मामलों यानी भारत पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के मामलों में वे मिलकर काम करेंगे।
संयुक्त वक्तव्य के इस अंश पर भारत की गहरी आपत्ति के बाद चीन व अमेरिका दोनों ने अपनी-अपनी तरफ से सफाई दी है, लेकिन सवाल है ऐसे मुद्दे को संयुक्त वक्तव्य में डाला ही क्यों गया जिस पर बाद में सफाई देनी पड़े, जबकि अमेरिका को तथा राष्ट्रपति ओबामा को यह पता है कि पाकिस्तान के मामले में भारत कितना अधिक संवेदनशील है। भारत की नीति शुरू से ही पाकिस्तान से सम्बद्ध मामले में किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप के खिलाफ है। फिर इसका क्या औचित्य था कि ओबामा साहब दक्षिण एशिया के उस देश के मामले में चीन को हस्तक्षेप करने के लिए आमंत्रित करें जिन्हें वह भविष्य के लिए अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक साद्ब्राीदार मानते हैं।
अमेरिकी अधिकारी कह रहे हैं कि भारत ने इस संयुक्त वक्तव्य में उससे कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया है जितना कि उसमें लिखा गया है। लेकिन कूटनीतिक वक्तव्यों में पंक्तियों के बीच में पढऩा कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं। भारत का यह सवाल करना कुछ बहुत नाजायज तो नहीं कि संयुक्त वक्तव्य में इन वाक्यों की जरूरत क्या थी। जाहिर है कि इसका आग्रह चीन की तरफ से किया गया होगा, जिसे अमेरिकी पक्ष ने सहजता से स्वीकार कर लिया। जाहिर है इस मामले में भी चीन के हाथों ओबामा ही पिटे। उन्होंने अनावश्यक रूप से उन बातों को भी संयुक्त वक्तव्य में शामिल होने दिया, जिसे लेकर उनका एक मित्र देश भारत व्यथित हो सकता है।
अब यदि तटस्थ दृष्टिï से मूल्यांकन करें, तो इसमें ओबामा का कोई दोष नहीं, यह उनके स्वभाव का दोष है। वह समद्ब्राते हैं कि विनम्रता तथा मधुरता से पूरी दुनिया का दिल जीता जा सकता है। उन्होंने यह सीखा कि जापान में झुकना आदर सूचक है, तो वह सम्राट अकाहितो के सामने कमर तक झुक गये। शायद उन्होंने सोचा होगा कि इससे सारे जापानी खुश हो जाएंगे। इसी तरह वह सऊदी अरब के शाह के सामने द्ब्राुके थे। वहां भी उन्होंने यही सोचा होगा कि इससे पूरा इस्लामी जगत उनका मुरीद हो जाएगा। चीन पहुंचकर भी उन्होंने वह सारी बातें की, जो चीन को अच्छी लगें और हर चीनी इच्छा को स्वीकार कर लिया। शायद यह सोचकर कि चीन वास्तव में अमेरिका का सहयोगी बन जाएगा। उन्होंने प्रशांत के दोनों तटों के इन दो महान देशों का हवाला भी दिया और उनके बीच घनिष्ठ सहयोग की बातें की, लेकिन चीनी नेता ऐसे किसी दबाव में नहीं आए। उन्हें दुनिया की पहली महाशक्ति बनना है, तो अमेरिका को पछाड़कर ही आगे बढऩा होगा, उसे साथ लेकर नहीं।
कोई भी बड़ा राजनेता जब किसी देश की यात्रा पर जाता है, तो वह पहले से इसकी पृष्ठïभूमि बना चुका रहता है कि इस यात्रा से उसे क्या उपलब्धि होगी, लेकिन ओबामा ने शायद अपनी इस यात्रा के पूर्व ऐसी कोई तैयारी नहीं की थी। उन्हें शायद अपने करिश्मों पर भरोसा था। शायद उन्हें यह नहीं पता था कि चीन ऐसे करिश्मों से प्रभावित नहीं होता।
हो सकता है, ओबामा अपनी इस यात्रा से कुछ सबक लें। चीन के आगे पूरी तरह बिछकर उन्होंने देख लिया है। निश्चय ही अब उन्हें बेहतर विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। यहां उसकी आवश्यकता नहीं है कि वह एकाएक अकड़कर खड़े हो जाएं और प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति की घोषणा कर दें, लेकिन यदि उनमें जरूरी राजनीतिक संवेदनशीलता है, तो उन्हें इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि एशिया में कौन अमेरिका का सहयोगी हो सकता है, कौन प्रतिस्पर्धी। चीन अमेरिका का आर्थिक साझीदार बन सकता है, किन्तु रणनीतिक तौर पर वह उसका प्रतिस्पर्धी ही रहेगा। इसलिए उसे चीन के साथ सहयोग का संबंध अवश्य कायम करना चाहिए, लेकिन इसके लिए यह तो जरूरी नहीं कि वह एक हीन राष्ट्र की तरह उसके सामनेझुक जाएँ । (रविवार, 22 नवंबर 2009)
गुरुवार, 19 नवंबर 2009
ओबामा का 'शर्म -अल -शेख '
कहा जा रहा है कि संयुक्त वक्तव्य का प्रारूप बीजिंग स्थित उन अमेरिकी कूटनीतिक अधिकारियों ने तैयार किया है, जिनकी भारत के साथ कोई संवेदना नहीं है। ऐसा हो भी सकता है, लेकिन तब तो यह मानना पड़ेगा कि कूटनीतिक मामले में ओबामा भी अपने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की ही तरह लापरवाह हैं। मनमोहन सिंह ने शर्म-अल-शेख में जैसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के दबाव में आकर उस संयुक्त बयान को जारी करने की स्वीकृति दे दी, जो भारतीय हितों व स्वाभिमान के खिलाफ था और जिस पर देश के भीतर एक तरह का हंगामा ही खड़ा हो गयाथा । उसके बारे में भी कहा गया था कि संयुक्त बयान का प्रारूप पाकिस्तान के अधिकारी पहले से ही बनाकर लाए थे और उसे ही मामूली फेरबदल के बाद स्वीकार कर लिया गया। लगता है ऐसा ही कुछ यहां भी हुआ।
खैर, भारत को इसे लेकर बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। कूटनीतिक जगत में ऐसा कुछ होता रहता था। निश्चय ही ओबामा ने भारी चीनी दबावों के कारण संयुक्त वक्तव्य की ऐसी शब्दावली को स्वीकार किया होगा। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा ऋणदाता है। चीनी बाजार भी अमेरिका के लिए सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन यह भी तय है क़ि ओबामा साहब चीन को खुश करने का जितना भी प्रयत्न कर लें, उनके बीच कभी कोई स्वाभाविक दोस्ती नहीं पनप सकती ।
उनकी चीन यात्रा के दौरान जारी यह संयुक्त विज्ञप्ति इस बात का भी प्रमाण है कि ओबामा साहब भाषण चाहे जितना अच्छा दे लें, किन्तु वे निर्णय लेने में कमजोर हैं। उनकी निर्णय लेने की अक्षमता का ही यह परिणाम है कि अमेरिका में भी उनकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे उतरता जा रहा है। भारत के लोगों को प्रतीक्षा करनी चाहिए डॉ. मनमोहन सिंह की अमेरिका की यात्रा का और उसके बाद जारी होने वाले संयुक्त वक्तव्य का। उसके उपरांत ही निर्णय किया जा सकता है कि दक्षिण एशिया के प्रति ओबामा का वास्तविक नजरिया क्या है और इसमें भारत को कितनी और कौनसी जगह हासिल है।
बुधवार, 4 नवंबर 2009
अपने देशी आतंकवादियों से चिंतित अमेरिका
मंगलवार, 3 नवंबर 2009
2009 के नोबेल पुरस्कार विजेता
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वर्ष 2009 के नोबेल पुरस्कार विजेताओं में से कई नाम शायद आगे आने वाले वर्षों में लंबे समय तक याद किये जाते रहेंगे। भौतिकी के पुरस्कार विजेता 'द मास्टर्स ऑफ लाइटÓ तो पहले ही इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं, लेकिन मेडिसिन और रसायन के क्षेत्र में जो लोग सम्मानित किये गये हैं, उनकी उपलब्धियां भी ऐसी हैं कि उन्हें भी भुलाया नहीं जा सकेगा। गर्व की बात यह है कि इनमेें एक भारतीय नाम भी शामिल है। शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया नाम तो भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए चुना ही गया है, इसलिए वह तो भविष्य में चर्चा का विषय रहेगा ही, साहित्य के लिए चुनी गयी लेखिका भी शायद इसलिए याद की जाएगी कि कम्युनिस्ट त्रासदी का चित्रण करने के लिए नोबेल जैसा सम्मान पाने वाली शायद वह अंतिम लेखक या लेखिका होगी।
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ऑफ वर्ष 2009 के नोबेल पुरस्कारों की घोषण हो चुकी है। भौतिकी, चिकित्सा व रसायन में तीन-तीन लोगों को पुरस्कार में शमिल किया गया है। यह तीनों ही पुरस्कार निश््चय ही अपने क्षेत्र के श्रेष्ठïतम लोगों को दिये गये हैं, जिनकी खोजों ने मानवता को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया है या जिससे भविष्य में उल्लेखनीय लाभ पहुंच सकता है। साहित्य का पुरस्कार एक अल्पज्ञात जर्मन लेखिका को प्राप्त हुआ है, लेकिन उसे लेकर भी कोई विवाद नहीं है। हां, शांति का नोबेल पुरस्कार इस बार भी निश्चय ही विवाद का विषय बना है, लेकिन इस चयन के लिए उस स्वीडिश चयन समिति की सराहना की जानी चाहिए, जिसने वर्तमान की उपलब्धियों से अधिक भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर पुरस्कार के योग्य व्यक्ति का चयन किया है।भौतिकी (फिजिक्स) का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वैज्ञानिकों को 'द मास्टर्स आफ लाइटÓ की संज्ञा दी गयी है। इनमें शामिल हैं चाल्र्स कुएन काओ। शंघाई (चीन) में जन्में काओ की ही खोज का कमाल है कि आज अंतर्राष्टï्रीय संचार की गति इतनी तेज हो गयी है। स्टैंडर्ड टेली कम्युनिकेशन लेबोरेटरी (यू.के.) में कार्यरत काओ की सबसे बड़ी चिंता थ्ी कि प्रकाश को लंबी दूरी के संचार के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाए। ग्लास फाइबर रोशनी ले जा सकते हैं, यह तो पहले से पता थ, लेकिन पहले की स्थिति यह थी कि 20 मीटर जाने पर ही प्रकाश की 90 प्रतिशत क्षमता समाप्त हो जाती थी। पहले उन्होंने लक्ष्य रखा कि एक किलोमीटर तक प्रकाश को कैसे ले जाया जाए, लेकिन अब तो पूरी दुनिया का संचार इन ऑप्टिकल फाइबर केबिलों पर टिक गया है। ऑप्टिकल फाइबर इंटरनेट की तो रीढ़ है। वेब पेजज को लेना हो, ई-मेल करना हो, चैटिंग करनी हो या यू ट्ïयूब वीडियोज का आनंद लेना हो, यह सब ऑप्टिकल फाइबर के प्रकाश संचार बिना संभव नहीं था। और इन तारों से गुजरने वाली वीडियो छवियां (फोटोज) ज्यादा सीसीडी या उस जैसी डिवाइस से लैस कैमरों से आती हैं। फोटोग्राफिक फिल्में इसी कमाल के चलते इतिहास की वस्तु बन गयी हैं। मोबाइल फोन के कैमरे ही नहीं, हबल जैसे अंतरिक्ष में घूमने वाले विशाल कैमरों के शानदार चित्र भी इसी तकनीक से प्राप्त होते हैं। अंतरिक्ष यानों में लगे कैमरे भी सीसीडी आधारित ही होते हैं। आज करीब एक अरब किलोमीटर लंबी ऑप्टिकल फाइबर केबिल मानव की संचार सेवा में लगी हैं। इतनी बड़ी केबिल जिससे पूरी धरती को करीब 25 बार लपेटा जा सकता है।भौतिकी के पुरस्कार की आधी रकम अकेले काओ को दी गयी है। दसरे दो वैज्ञानिक हैं अमेरिका में जन्में और वहीं की बेल लेबोरेटरी में कार्यरत बिलियर्ड स्टर्लिंग बायल और जार्ज एलवुड स्मिथ। इन दोनों ने 'इमेजिंग सेंसरÓ सी.सी.डी. (चाज्र्ड कपल्ड डिवाइस) तैयार करने में कमाल दिखाया है। इनकी खोजों से ही यह संभव हुआ कि मोबाइल फोन में भी कैमरे आ गये। 'इलेक्ट्रॉनिक मेमोरीÓ को बेहतर बनाने तथा इलेक्ट्रॉनिक ढंग से फोटो लेने (इलेक्ट्रॉनिक कैप्चरिंग मेमोरी) में इन दोनों ने क्रांतिकारी भूमिका अदा की। पुरस्कार की आधी रकम इन दोनों में बराबर-बराबर बांटी गयी है।चिकित्सा विज्ञान (मेडिसिन एवं फिजियोलॉजी) का पुरस्कार भी तीन लोगों में बांटा गया है। ये तीनों अमेरिका में कार्यरत हैं, जिनमें दो महिलाएं हैं, जो अमेरिका में ही पैदा हुई हैं। इनमें एलेजाबेथ ब्लैकबर्न यूनिवर्सिटीकेलिफोर्निया में और कैरोल डब्लू ग्रेइडर बाल्टीमोर के जान हापकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में पढ़ाती हैं। तीसरे जैक डब्लू शेस्टाक की पैदाइश लंदन की है, लेकिन कार्यरत अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में हैं। यह रोचक है कि चिकित्सा में पहली दो महिलाओं को नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है।इनकी खोज भी बड़ी रोचक है। यह तो सभी जानते हैं कि कोशिकाएं जब विभाजित होती हैं, तो उनके गुण सूत्र (क्रोमोजोम) भी दो जोड़ों में विभाजित हो जाते हैं। लेकिन इन विभाजनों के दौरान कभी कोई गलती नहीं होती और वे खराब भी नहीं होते। इन तीनों ने यह पता लगाया कि गुण सूत्रों की प्रतिक्रति कैसे बनती है और कैसे उनसे कोई गड़बड़ी नहीं होने पाती। इन लोगों ने गुण सूत्रों के उस रसायन का पता लगाया, जो उनके विभाजन पर नजर रखता है। जैसे जूते के फीतों के सिरे पर प्लास्टिक की एक कैप लगी रहती है, जो उस सिरे को बिखरने से बचाए रखती है, वैसे ही गुण सूत्रों के सिरों पर एक रासायनिक संरचना होती है, जो पूरे गुण सूत्र पर नजर रखती है और उसके विभाजन को नियंत्रित करती है। यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है। इससे मनुष्य के वृद्ध होने के कारणों, कैंसर तथ स्टेम कोशिकाओं के बारे में और जानकारी जुटाई जा सकेगी। इससे मनुष्य के स्वस्थ दीर्घायुष्य के चिकित्सकीय उपाय किये जा सकेंगे। तीसरा रसायन का नोबेल पुरस्कार विज्ञान व मनुष्यता के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, यह भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले तीन वैज्ञानिकों में एक भारतीय नाम भी है। वेंकटरमन रामकृष्णन आज भले ही अमेरिकी नागरिक हैं, लेकिन भारत से उनके संबंध जीवित हैं। 1952 में तमिलनाडु के धार्मिक शहर चिदंबरम में जन्में रामकृष्णन ने विज्ञान में स्नातक (बी.एस.सी.) की उपाधि महाराजा सयाजीराव विश््ïवविद्यालय, बड़ौदा से प्राप्त की। अभी वह तीन वर्ष के ही थे कि तमिलनाडु से उनके पिता गुजरात के बड़ौदा में आ गये। उनके पिता सी.वी. रामकृष्णन व माता राजलक्ष्मी भी जैव वैज्ञानिक थे। वस्तुत: सी.वी. रामकृष्णन ने ही बड़ौदा की महाराज सयाजीराव यूनिवर्सिटी में 1955 में बायोकेमेस्ट्री डिपार्टमेंट की स्थापना की। इस समय सी.वी. रामकृष्णन सियेटेल में हैं, लेकिन वेंकटरमन के बड़ौदा और तमिलनाडु से संबंध अब भी बने हुए हैं। इसलिए उनकी उपलब्धि पर भारतीयों का भी गर्वित होना स्वाभाविक है। उनके साथ इस पुरस्कार में समान रूप से भागीदार दो अन्य वैज्ञानिकों में से एक अदा. इ. योनाथा इजरायल की हैं और वहीं की विजमन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस मेंजाता था। काम मुश्किल जरूर था, लेकिन इसकी राह दिखायी अदा.इ. योनाथा ने, फिर तो वेंकटरमन और स्टीट्ïज जैसे लगनशील वैज्ञानिकों ने इस कार्य को अंजाम तक पहुंचा दिया। इनतीनों कार्यरत हैं और दूसरे थामस ए. स्टीट्ïज अमेरिका के हैं और येल विश््ïवविद्यालय में कार्यरत हैं। इन तीनों ने एक ऐसे मुश्किल कार्य को कर दिखाया है, जिसे पहले प्राय: असंभव माना ने प्रकृति के एक ऐसे अज्ञात रहस्य को सुलद्ब्रााया है, जिसकी भविष्य में असीमित संभावनाएं हैं।प्रकृति में जितने जीव हैं -माइक्रोव्स, पौधे या जीव जंतु सभी 'रिबोजोमÓ पर निर्भर करते हैं। यह रिबोजोम प्रत्येक जीवित कोशिका का एक अनिवार्य एवं जटिल तत्व है। यह गुण सूत्रों पर स्थित 'जीनोंÓ में अंकित सूचनाओं (ब्लू पिं्रट) के आधार पर उन प्रोटिनों के निर्माण का कार्य करता है, जिन पर यह पूरा जीवन निर्भर है। वास्तव में यह रिबोजोम एक अत्यंत जटिल आणविक (मालिक्यूलर) मशीन है, जो सैकड़ों हजारों परमाणुओं से मिलकर बनी है। इन तीनों वैज्ञानिकों ने इस 'रिबोजोमÓ का परमाणविक मॉडल तैयार कर दिया। यानी यह बता दिया कि इसके हजारों हजार परमाणु कहां पर किस तरह स्थित है। इससे यह पता लगाने में मदद मिली की ये रिबोजोम कैसे इन असंख्य प्रोटीनों का निर्माण करते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि एंटीबायोटिक दवाइयां बैक्टीरिया की कोशिका के भीतर स्थित रिबोजोम पर ही हमला करते हैं। अब इस अध्ययन से यह भी पता चल गया कि एंटीबायोटिक कैसे काम करते हैं। इस रिबोजोम के परमाणुओं के स्थान का कैसे पता लगाया जाए, यह बड़ी समस्या थी। 1980 में योनाथा ने रिबोजोम की एक बड़ी इकाई का क्रिस्टल बनाने में सफलता प्राप्त की। इसका एक्स-रे 'स्नैपशॉटÓ लिया गया। यह रिबोजोम की गुत्थी सुलद्ब्रााने की दिशा में पहला कदम था। लेकिन दूसरा कदम उठाने में योनाथ को 20 वर्ष लग गये, जब एक एटम का चित्र लिया जा सका। वेेंकटरमन रामकृष्णन 'मेडिकल रिसर्च कौंसिल लेबोरेटरी ऑफ मालिक्यूलर बायोलॉजी, कैंब्रिजÓ (यू.के.) में कार्यरत थे। उन्होंने अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के एक पोस्ट डाक्टोरल फिलो के रूप में रिबोजोम पर काम करना शुरू किया। उन्होंने रिबोजोम की छोटी इकाईयों (स्मॉल सबयूनिट्ïस) की मैपिंग शुरू की। उन्होंने भी एक्स-रे की सघन किरणों (इंटेंस बीम ऑफ एक्स-रे) की मदद से यह काम शुरू किया। इस क्रम में उनकी एक सबसे महत्वपूर्ण खोज यह थी कि रिबोजोम जो भी प्रोटीन बनाता है, उसमें से प्रत्येक प्रोटीन केवल 20 एमीनो एसिड्ïस के विभिन्न संयोजनों द्वारा बनते हैं। इस बीच स्टीट्ïज ने यह खोज कर ली कि एक्स-रे फोटोज की व्याख्या कैसे की जाए या उसे समद्ब्राा कैसे जाए। उन्होंने यह भी पता लगा लिया कि दो एमीनो एसिड्ïस के बीच के रासयनिक संबंध कैसे बनते हैं। बस फिर क्या था। रिबोजोम का पूरा ढांचा सामने आ गया। इसके अलावा यह भी पता चला कि जीन में मौजूद सूचनाओं को पढ़कर रिबोजोम, जो प्रोटीन बनाते हैं, उसमें कोई गलती क्यों नहीं होने पाती। यदि कोई गलती होती भी है, तो वह एक लाख में कोई एक। रामकृष्णन ने इस तत्व की भी पहचान कर ली, जो इस बात पर निगरानी रखता है कि जीन में स्थित सूचनाओं को पढऩे व उसके अनुकूल प्रोटीन के निर्माण में कोई गलती न होने पाए। इस खोज की भविष्य में असीमित संभावनाएं हैं। तात्कालिक संभावना तो नई एंटीबायोटिक्स की डिजाइनिंग की है। बहुत से बैक्टीरिया कई एंटीबायोटिकों के अवरोधी बन गये हैं। उनके लिए भी नये एंटोबायोटिक तैयार हो सकते हैं। फिर जैव प्रोटीनों के निर्माण की विशाल दुनिया का यूं ही असीमित उपयोग हो सकता है।साहित्य का नोबेल पुरस्कार इस वर्ष रोमानिया की कम्युनिस्ट तानाशाही में जन्मीं जर्मन लेखिका हेर्ता मुलर को दिया गया है। रोमानिया के शासक निकोलई सिजेस्क्यू के दौर में वहां अल्पसंख्यक जर्मन समुदाय की क्या हालत थी, उनकी जिंदगी कितनी मुश्किलों से भरी थी, इसका अत्यंत सजीव चित्रण हेर्ता मुलर ने अपने साहित्य में किया है। स्वीडिश एकेडमी के स्थाई सचिव पीटर इंग्लैंड ने मुलर के अत्यंत संवेदनशील काव्य एवं उन्मुक्त गद्य की सराहना करते हुए कहा है कि लेखिका ने तत्कालीन रोमानिया में पिसते अल्पसंख्यक समुदाय के जीवन की विडंबनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।इस बार शांति पुरस्कार को लेकर सर्वाधिक विवाद खड़ा हुआ। स्व्यं वह व्यक्ति भी हैरान था, जिसे यह पुरस्कार मिला। अमेरिकी राष्टï्रपति बराक हुसैन ओबामा को उनके सेक्रेटरी ने सुबह के 6 बजे जगाकर यह सूचना दी कि उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है। वह यह सूचना पाकर चकित हो गये। बाद में उन्होंने मीडिया के सामने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मैं अपने को इस पुरस्कार के योग्य नहीं मानता। मेरी उनके साथ कोई बराबरी नहीं है, जिन्हें अपसे पहले यह पुरस्कार मिला है। फिर भी मैं यह सम्मान स्वीकार करता हूं। लोग यह पूछ रहे हैं कि ओबामा ने आखिर किया क्या है, जिसके लिए उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। अभी उनको अमेरिका का राष्टï्रपति पद संभाले भी मुश््िकल से दस महीने हुए हैं। उन्होंने बातें अवश्य अब तक बहुत की हैं, लेकिन उनकी उपलब्धि क्या है । बात किसी हद तक सही है, लेकिन पुरस्कार की चयन समिति के दृष्टिïकोण को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। अपने दस महीने के कार्यकाल में ओबामा ने जो संभावनाएं जगायी हैं, वे किन्हीं उपलब्धियों से कम नहीं हैं। ओबामा दूसरे अश््वेत अमेरिकी हैं, जिन्हें शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पहला नाम मार्टिन लूथर किंग जूनियर का, जिन्हें 1964 में 35 वर्ष की आयु में यह सम्मान दिया गया था। एक अश््वेत पूरे अमेरिका की श््वेत आबादी के दिलों पर कब्जा करके उनका समर्थन प्राप्त कर ले, यह अपने आप में एक उपलब्धि है। फिर ओबामा ने राष्टï्रपति पद संभालते ही सबसे पहले विश््व की मुस्लिम आबादी के साथ अमेरिका के मैत्रीपूर्ण संबंधों की शुरुआत की और यह संदेह दूर करने की कोशिश की कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष कोई इस्लाम के खिलाफ घोषित संघर्ष नहीं है। उन्होंने सत्ता हासिल करते ही इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की घोषणा की। पूर्व राष्टï्रपति बुश द्वारा यूरोप में मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली स्थापित करने की घोषणा के कारण रूस के साथ जो तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी थी, ओबामा ने उसे शांति किया और मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली कायम करने का निर्णय रद्द कर दिया। उन्होंने ईरान के साथ भी वार्ता की पहल की और उस पर मंडरा रहे अमेरिकी हमले के खतरों को दूर किया और ओबामा की सबसे अधिक प्रशंसनीय पहल जो थी, वह यह कि उन्होंने पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण का आह्वान किया। वह पहले अमेरिकी राष््ट्रपति हैं, जिन्होंने दुनिया को पूरी तरह परमाणु अस्त्रों से मुक्त करने का विचार सामने रखा है। यद्यपि यह सभी जानते हैं कि यह कार्य इतना आसान नहीं है, लेकिन अब तक पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण में सबसे बड़ी बाधा अमेरिका को ही माना जाता था, लेकिन अब अमेरिका ही इसका प्रस्ताव कर रहा है। वास्तव में विश््व के प्रति अमेरिकी दृष्टिïकोण विश््व शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ओबामा की अभी कोई उपलब्धि सामने नहीं है, लेकिन उनके शांतिपरक विचारों के कारण भविष्य की संभावनाएं बहुत अधिक हैं। यह नोबेल शांति पुरस्कार अब उनके ऊपर एक नैतिक दबाव का भी काम करेगा। उन्हें अपने को इसके अनुकूल सिद्ध करना होगा। संभव है इसके साये में वह शांति के लिए और बेहतर कार्य कर सकें।कुल मिलाकर इस वर्ष के सारे नोबेल पुरस्कार मानवता के श्रेष्ठïतम हित में दिये गये हैं। पुरस्कार हर वर्ष दिये जाते हैं और अपने-अपने क्षेत्र की श्रेष्ठïतम उपलब्धियों के लिए दिये जाते हैं। किंतु इस बार के सारे पुरस्कार ऐसे हैं, जिनका प्रत्यक्ष लाभ देखा जा सकता है।

