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रविवार, 4 सितंबर 2011

ये हिंदी किस 'भाषा' का नाम है? -1

लाल किले में मुगल बादशाह शाहजहां का दरबार, जहां हिन्दुस्तानियों की जुबान
हिंदी या हिंदवी से अलग ‘जुबाने उर्दुए मुअल्ला‘ ने रूपाकार ग्रहण किया।

कभी पूरे हिन्दुस्तान की लोक व्यवहार की भाषा को ‘हिंदी‘ नाम दिया गया था। तब संस्कृत भी हिंदी थी, पाली भी हिंदी थी, अवधी भी हिंदी थी, या यों कहें कि देशभर की सभी प्रकृत व संस्कृत भाषाएं हिंदी थी, लेकिन अब केवल उत्तर के कुछ प्रदेश ही हिंदी भाषी कहे जाते हैं। पूरा देश हिंदी भाषी और हिंदीतर भाषी में बंट गया है। कहने को यह ‘हिंदी‘ देश की राजभाषा है, लेकिन इसे राष्ट्र भाषा का दर्जा अब तक नहीं मिला है और यह संविधान की भाषाई अनुसूची में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ ही परिगणित है। इसी अंग्रेजी की समकक्षता भी प्राप्त नहीं है। भाषा आधारित प्रांतों की रचना ने इसे और हाशिए की ओर ठेल दिया है।
यह शीर्षक कुछ लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है। जो भाषा इस देश की संविधान स्वीकृत राजभाषा है, उसके नाम को लेकर यह सवाल उठाना कि यह किस भाषा का नाम है, सवाल उठाने वाले की अल्पज्ञता व मूर्खता ही नहीं, हिमाकत भी कही जाएगी। अब आप मुझे जो भी कहें या जो भी समझें, लेकिन यह सवाल उठाना मुझे बहुत महत्वपूर्ण लग रहा है, विशेषकर इसके ऐतिहासिक संदर्भ में। हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति व हिन्दू जाति की तरह देशव्यापी (व देश के बाहर भी) उपस्थिति के बावजूद इसकी भी कोई सुस्पष्ट पहचान या परिभाषा नहीं बतायी जा सकती।

वास्तव में इस देश के लोगों को हिंदी नाम की भाषा व हिन्दू नाम की जाति व धर्म की कोई जानकारी नहीं थी। शायद उन्हें अपने देश का नाम भी पता नहीं था। पश्चिम से यानी यूनान, अरब, फारस, मध्येशिया आदि से आये लोगों ने यहां के लोगों को बताया कि वे हिन्दू हैं, उनकी भाषा हिंदी है और उनका देश हिन्दुस्तान। इस देश की धरती, यहां के निवासियों, उनकी भाषा व धर्म को यह नाम तो बहुत पहले मिल चुका था, किंतु यह स्थापित तब हुआ, जब यहां बहुत से मुस्लिम आ गये और मुस्लिम शासन स्थापित हुआ, क्योंकि जब वे बाहर थे, तो इन्हीं नामों से यहां के लोगों को जानते-पहचानते थे। उनके आधिपत्य में रहते-रहते यहां के लोगों ने भी इसी पहचान को अंगीकार कर लिया। यहां यह जानना रोचक होगा कि देश, जाति व धर्म के रूप में तो इस शब्द की राष्ट्रीय पहचान अब भी बनी हुई है, लेकिन भाषा के स्तर पर यह सिकुड़कर केवल उत्तर के कुछ इलाकों तक ही सीमित रह गयी है और उत्तर में भी उसकी एक परजीवी (कृपया शब्दों पर जाएं, बल्कि उसके निहितार्थ को ही ग्रहण करें) की हालत बनी हुई है। यद्यपि इसको बोलने-समझने वाले पूरे देश में क्या दुनिया भर में फैले हुए हैं, लेकिन इसे उत्तर के कुछ प्रातों की ही स्वाभाविक भाषा माना जाता है और उसी को हिंदी क्षेत्र और वहां के निवासियों को ही हिंदीभाषी कहा जाता है। बाकी क्षेत्र को गैर हिंदी क्षेत्र और गैर हिंदी भाषी माना जाता है। वहां के हिंदी विद्वानों को गैर हिंदी भाषी विद्वान की संज्ञा दी जाती है। तो भाषा के स्तर पर आकर हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान की परिभाषा इस तरह सिकुड़ गयी कि उसकी ठीक-ठीक पहचान ही मुश्किल हो गयी ।

यहां एक और रोचक बात भी हुई कि देश जब स्वतंत्र हुआ तो हमने भाषा, जाति और धर्म के नाम से तो हिंदी-हिन्दू जोड़े रखा, लेकिन देश के नाम के तौर पर हिन्दुस्तान को नहीं अपनाया। उसके लिए हमने अंग्रेजों द्वारा दिया गया ‘इंडिया‘ अपना लिया।

इस सबका परिणाम यह हुआ कि देश के स्वतंत्र होने पर जब हम अपनी विविध प्रकार की पहचान समेटने की स्थिति में आए, तो हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान की सारी संगति बिगड़ चुकी थी। अब न यह देश हिन्दुस्तानल रह गया था, न यहां के निवासी हिन्दू थे और न यहां के निवासियों की भाषा हिंदी रह गयी थी। हिन्दुस्तान तो खैर गुम हो गया, जिसके पुनः आगमन की भी कोई संभावना नहीं रह गयी (शायद कोई जरूरत भी नहीं), क्योंकि यदि किसी ने लाने की कोशिश भी की, तो फौरन कुछ लोग सवाल उठायेंगे कि क्या यह देश केवल हिन्दुओं का है, इसलिए बाकी बचे हिंदु और हिन्दू। किंतु उनकी भी पहचान संकीर्ण हो गयी। यहां केवल कुछ लोग ही हिन्दू रह गये और केवल कुछ लोगों की भाषा हिंदी रह गयी। यानी पूरे देश की पहचान से इनका कोई लेना-देना नहीं बचा। जब राष्ट्र के रूप में अंग्रेजों का दिया देश हमने स्वीकार किया तो भाषा के रूप में उनकी दी हुई भाषा भी अपना ही और उनकी दी ‘बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुरंगी, बहुभाषी खिचड़ी (फ्लूरल) पहचान भी स्वीकार कर ली। इतना ही नहीं, उस पर गर्व भी करने लगे। अपनी इस नई पहचान में राष्ट्रीय एकता की भावना का कोई तत्व शेष नहीं रह गया- न भाषा, न संस्कृति, न जाति, न धर्म। किसी खिचड़ी में एकरसता कायम करनी हो, तो दो ही रास्ते रह जाते हैं या तो उसके सारे भेदों को ठुकरा दो या सबको उनकी पृथकता के साथ सम्मान भाव से स्वीकार कर लो। तो इसके लिए हमारे देश के आधुनिक मनीषियों ने धर्म के स्तर पर तो दो महान तत्वों को स्वीकार किया, एक तो ‘धर्मनिरपेक्षता‘ (सेकुलरिज्म) और दूसरा ‘सर्व धर्म समभाव‘। लेकिन इनका भी व्यवहारिक स्तर पर निर्वाह नहीं हो सका। राजनीतिक स्वार्थ व अवसरवाद ने ‘धर्मनिरपेक्षता‘ और ‘भेदभाववाद‘ को अधिक महत्व दिया। और भाषा के संदर्भ में तो इतना भी परवाह करने की जरूरत नहीं समझाी। गयी। क्षेत्रीय भाषाओं के आधार पर प्रांतों का निर्माण करके क्षेत्रीयता को संतुष्ट कर दिया गया और राष्ट्र के स्तर पर तो ‘इंडिया‘ और ‘इंग्लिश‘ स्वीकार की ही जा चुकी थी। विविध धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र के बुद्धिजीवियों व राजनेताओं ने अपनी-अपनी श्रेष्ठता प्रतिपादित करने के प्रयास में ऐसा देशव्यापी भ्रमजाल पैदा किया कि एक राजनीतिक जागीरदारी के अलावा राष्ट्र की कोई सर्वमान्य पहचान ही नहीं रह गयी।

वस्तुतः हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान परस्पर सम्बद्ध शब्द और भाव हैं। प्रारंभ में इनका धर्म (मजहब या रिलीजन) से कोई संबंध नहीं था, लेकिन अब हिन्दू शब्द तो केवल धर्म (रिलीजन) की पहचान बन गया है, वह भी एक ऐसे धर्म की, जिसकी अब तक कोई सर्वमान्य परिभाषा ही नहीं बन सकी है। इसे धर्म मानने का काम अंग्रेजों या यूरोपीय विद्वानों ने किया, बाद में उनके प्रभाव के कारण इस पहचान वाले भारतीयों ने भी उसे स्वीकार कर लिया और इसकी गौरवगाथा लिखने में लग गये। लेकिन इस विडंबना की तरफ लोगों का ध्यान प्रायः नहीं गया कि न तो इस हिन्दू का देश हिन्दुस्तान रह गया और न इस हिन्दू की भाषा हिंदी बन सकी। यह ‘हिन्दू‘ एक जाति और एक संस्कृति के रूप में भी नहीं खड़ा हो सका, इसीलिए यह मान्य अंतर्राष्ट्रीय परिभाषा के अनुसार हिन्दू राष्ट्र (हिन्दू नेशन) भी नहीं बन सका। आज जो ‘इंडिया‘ नाम का देश है, उसे विदेशी विद्वान ‘एक राष्ट्र‘ नहीं, बल्कि ‘बहुराष्ट्रीय देश‘ (मल्टीनेशन कंट्री) कहते हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह बन गयी है कि इसे जो जैसे चाहे परिभाषित कर सकता है। खैर, यह पूरा विषय बहुत विस्तृत है, जिसके ऐतिहासिक क्रम में ब्यौरेवार विवेचन की जरूरत है, किंतु यहां इस समय की चर्चा केवल भाषा पर केंद्रित है।

पुराणों तथा अन्य पारंपरिक ग्रंथों से हम जानते हैं कि हिमालय के दक्षिण का समुद्र पर्यंत भूभाग ‘भारत वर्ष‘ कहलाता था, लेकिन ज्ञात इतिहास काल में इस क्षेत्र में ऐसी कोई राजनीतिक इकाई या साम्राज्य नहीं था, जिसकी ‘भारत‘ या ‘भारत वर्ष‘ के नाम से पहचान रही हो। इसलिए इस क्षेत्र से बाहर के लोग अपनी सुविधा से इस क्षेत्र का नामकरण कर लेते थे। पश्चिमी क्षेत्र से इस भूक्षेत्र को अलग करने वाली प्राचीन पहचान ‘सिंधु‘नदी थी, इसलिए पश्चिम के लोगों ने इसके पूर्व के निवासियों को इसी नदी के नाम से पहचान दी। पर्सिया या फारसी में प्रायः ‘स‘ का उच्चारण ‘ह‘ हो जाता है। वहां महाप्राण ‘ध‘ की जगह अल्पप्राण ‘द‘ के उच्चारण की भी प्रवृत्ति देखी जाती है, इसलिए वहां ‘सिन्धु‘ या ‘हिन्दू‘ हो जाना स्वाभाविक था, जैसे संस्कृत का ‘सप्ताह‘ वहां ‘हफ्ता‘ हो गया और ‘असुर‘ का ‘अहुर‘। यूनानियों ने शायद फारस वालों से ही नाम की पहचान प्राप्त की और अपनी सुविधा से ‘हिन्दू‘ का ‘इंडु‘ या ‘इंडस‘ कर लिया। यूरोपियनों ने यूनान से ही इस देश का नाम ‘इंडिया‘ प्राप्त किया। यूनानियों की पहचान के आधार पर ही उन्होंने इस देश की भौगोलिक व सामाजिक पहचान प्राप्त की। अरबी-फारसी परंपरा से प्रभावित लोग इस देश को हिन्दुस्तान कहने लगे, तो यूनानी प्रभाव वाले पश्चिमी देश ‘इंडिया‘। तो विदेशी नजर में इस देश के दो नाम हो गये ‘इंडिया‘ और ‘हिन्दुस्तान‘ (संक्षेप में हिंद-बिल्कुल सिंध की तर्ज पर)। लेकिन आगे की विडंबना यह रही कि जब यहां विदेशियों के शासन का प्रारंभ हुआ, तो शुरुआत में जितने इलाकों पर अफगानों, तुर्कों व फारस वालों का शासन कायम हुआ, उतना ही क्षेत्र हिन्दुस्तान के नाम से चर्चित हुआ, बाकी का इलाका अलग-अलग क्षेत्रीय नामों से ही जाना जाता था। बाद में जब अंग्रेज आए, तो जितने इलाकों पर उनका कब्जा हुआ, वह ‘इंडिया‘ या ‘ब्रिटिश इंडिया‘ कहा जाने लगा और बाकी के इलाके या रियासतें अपने क्षेत्रीय नाम या वंश नाम से चलती रहीं। इस बीच राजनीतिक पहचान के रूप में भारत कहीं नहीं था। प्रारंभिक मुस्लिम काल के प्राकृत व अपभ्रंश साहित्य में प्रायः जहां भी ‘भारत‘ या ‘भारतीय‘ का इस्तेमाल हुआ है, वह गैर मुस्लिमों के अर्थ में हुआ है। जैसे ‘इह भरये‘ यानी ‘यह भारतों का‘। यदि ब्रिटिश काल के गजेटियरों को देखें, तो वहां दंतकथाओं के आधार पर संकलित इतिहास में ‘भर‘ जाति या ‘भ्रों के टीलों‘ का बहुत उल्लेख है। उस पर पूरा भरोसा करें, तो लगेगा कि कम से कम उत्तर भारत में राजस्थान से लेकर बंगाल तक शताब्दियों तक ‘भरों‘ का शासन था, जबकि अन्य इतिहास ग्रंथों या पुराने साहित्य में इनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। वास्तव में ये ‘भरों‘ नहीं, बल्कि ‘भरतों‘ या ‘भारतीयों‘ के टीले यानी उनके नगरों व किलों के ध्वंसावशेष हैं। प्रारंभिक काल में यहां आए मुस्लिम यहीं की भाषा व्यवहार में लाते थे, इसलिए उन्होंने अपना द्वारा स्थापित नगरों, किलों के अतिरिक्त जो कुछ पुराना था, उसे यहां के देशी लोगों की भाषा में ‘भरतों‘ या ‘भरों‘ का करार दे दिया है। आश्चर्य की बात है कि मध्यकाल या उत्तर मध्यकालीन इतिहास के पंडित अभी भी इतिहास की इस गुत्थी में उलझे हैं और भ्रों की पहचान में लगे हैं। यहां थोड़ा विषयांतर हो गया है, लेकिन इसका उद्देश्य यह बताना था कि हमने मध्यकालीन लोकभाषा की सम्यक पड़ताल नहीं की है। हमने ज्यादातर दरबारी कवियों की रचनाओं और मठों में सुरक्षित धार्मिक (रिलीजस) गं्रथों के आधार पर अपने भाषा इतिहास की रचना कर ली है।

यहां इतना तो स्पष्ट है कि बाहर के लोगों ने सिंधु नदी के पूर्व के सारे लोगों को हिन्दू, उनकी भाषा को हिंदी और पूरे समुद्र पर्यंत क्षेत्र को हिन्दुस्तान कहा। उन्होंने यहां के मजहब का कोई जिक्र नहीं किया। अब उनकी मूल बात मानें, तो इस देश की सारी भाषाएं हिंदी हैं। ईरान के प्रसिद्ध बादशाह नौश्ेरवां (531-579 ई.) में बजरोया नाम के एक विद्वान को ‘पंचतंत्र‘ का अनुवाद फारसी में करने के लिए भारत भेजा। ‘पंचतंत्र‘ संस्कृत का गं्रथ है, लेकिन इस अनुवाद की भूमिका में बजरोया पंचतंत्र की भाषा को ‘जबाने हिंदी‘ कहता है। इसी तरह मिनहाजुस्खी की पुस्तक ‘हबकाते नासिरी‘ में बताया गया है कि जबाने हिंदी में ‘बिहार‘ का अर्थ मदरसा होता है। यहां पालि या अप्रभंश के लिए ‘जबाने हिन्दी‘ शब्द का प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ‘अवधी‘ को हिन्दुई कहते हैं। ‘तुरकी, अरबी, हिन्दुई भाषा जेते आहि जेहिमह मारग प्रेमकर सबै सराहैं ताहि।।‘ नूर मोहम्मद (1764) में अपनी अवधी को हिंदी कहते हैं। ‘हिन्दू मग पर पांव न राखौं, का जौ बहुतै हिंदी भाखौं।‘ इन नूर मुहम्मद साहब से भी 21 वर्ष पहले गिरिधर राय (1743) ब्रजी के लिए हिंदी शब्द का प्रयोग करते हैं। ‘हिंदी मांहि फकीर के अच्छर लागैं तीन।‘ दक्कन के शेख अहमद लिखते हैं, ‘जबां हिंदी, हिंदवी, मुझसूं होर देहलवी- न जानू अरब होर अजब मसनवीं।‘

आशय यह कि बाहर से आए मुसलमान चाहे जिस भाषा क्षेत्र-तुर्की, अफगानी (पश्तो), फारसी, अरबी आदि- ये आए रहे हों, लेकिन वे यहां के बाजारों, कस्बों व शहरों की भाषा ही यहां इस्तेमाल करते थे। उसमें उनकी अपनी मातृभाषा या क्षेत्र भाषा के शब्द संभवतः मिलते गये होंगे। तो उनके आने से स्थानीय प्राकृत या अपभ्रंश भाषा में विदेशी शब्द भी मिलते गये। इसीलिए इस भाषा को ‘रेख्ता‘ (मिलीजुलीख जैसे आज हिंगलिश दिखायी देती है) भी कहा गया। उत्तर में अपनी सल्तनत कायम करने वाले मुस्लिम शासकों ने जब दक्षिण में हमले किये, तो उनके साथ अरबी-फारसी मिश्रित यह भाषा दक्षिण भी पहुंची। इस देश में निले स्तर पर जनसंपर्क की एक भाषा पहले से विद्यमान थी, जिसे व्यापारी, सैनिक, मजदूर, पर्यटक तथा साधु संत इस्तेमाल करते थे। उपरी स्तर पर व्यवहार के लिए इस्तेमाल होने वाली आम आदमी की भाषा को केवल भाषा ही कहा जाता रहा है। इसमें स्थानीय प्राकृत (स्वाभाविक रूप से विकसित क्षेत्रीय भाषा) के शब्दों के साथ संस्कृत का अपभ््रांश रूप शामिल था। प्राकृत क्षेत्रीय भाषाएं थीं, लेकिन अपभ्रंश और संस्कृत का कोई क्षेत्र विशेष नहीं था, ये राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय रूप से व्याप्त थीं। इनमें खासकर जनभाषा यानी अपभ्रंश में क्षेत्रीय भेद क्षेत्रीय प्राकृत भाषाओं की प्रकृति के अनुरूप ही हुआ है। मुसलमानों के आने से केवल यह हुआ कि इसमें फारसी, तुर्की, पश्तो और अरबी के भी कुछ शब्द मिल गये। मूलतः इसी भाषा को हिंदी या हिंदवी कहा गया है। चूंकि मुस्लिमों का दीर्घकालिक स्थाई शासन उत्तर में ही रहा और उस उत्तरी क्षेत्र का अफगानिस्तान, तुर्किस्तान व फारस से अधिक निकट संपर्क रहा, इसलिए आधुनिक हिंदी का यह नया रूप उत्तर में ज्यादे व्यापकता और गहराई से स्थापित हो सका। लेकिन प्रारंभ में यह भाषा भी हिंदी या हिंदवी ही थी और आम व्यवहार में भारतीय नागरी लिपि में ही लिखी जाती थी। बाहर से आये लोग चूंकि अपनी-अपनी क्षेत्रीय लिपियों में अभ्यस्त थे, इसलिए वे अपने निजी नोट अपनी तुर्की या फारसी लिपि में लिखते थे।

यहां यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों के इस देश में आने के कई सौ साल बाद तक भाषा में कोई मजहबी भेद नहीं पैदा हुआ था। आम बोलचाल और व्यवहार की भाषा बदल रही थी, लेकिन उसकी कोई हिन्दू मुस्लिम पहचान नहीं बन रही थी। लिपि को लेकर भी कोई झगड़ा नहीं था। इस देश में राजकाज की भाषा फारसी बन जाने के बाद भी (जो मुगल बादशाह अकबर के जमाने में हुई) उसकी पहचान मजहब के साथ नहीं जुड़ी। मुसलमान संस्कृत पढ़ते थे, हिन्दू फारसी। केंद्रीय दरबार का कामकाज फारसी में चलता था, लेकिन स्थानीय व्यवहार की भाषा हिंदी या हिंदवी ही थी। टोडर मल संस्कृत के भी पंडित थे, फारसी के भी। खुसरो की बहुभाषी रचनाओं से सभी परिचित हैं। रहीम खन खाना और बीरबल जैसे दरबारी संस्कृत और फारसी दोनों के पंडित थे, लेकिन उनके आम बोलचाल व व्यवहार की भाषा हिंदी थी। वही हिंदी, जो कबीर, रैदास और नानक जैसे संत इस्तेमाल कर रहे थे।

वस्तुतः भाषा पर मजहबी रंग चढ़ना तब शुरू हुआ, जब बादशाह शाहजहां ने दिल्ली का लालकीला बनवाकर तैयार किया (1639 ई.) और उसके आसपास शहजहांनाबाद शहर बसाया तथा राजधानी आगरा से हटाकर शहजहांनाबाद (आधुनिक दिल्ली) के लालकिले में पहुंचाया। अब तक बाहरी इस्लामी मुल्कों के विद्वान, शायरों, मजहबी नेताओं तथा राजनीतिक पंडितों का यहां आना काफी बढ़ गया था। लालकिले की शनदार इमारत बन जाने के बाद मुगल बादशाह शाहजहां की शोहरत और फैली, जिससे और बड़ी संख्या में फारसी अरबी के विद्वान वहां आने लगे। दरबार में एक नयी तरह की नफीस भाषा विकसित होने लगी, जिसमें फारसी से लिये गये। अब इस उच्च स्तरीय दरबारी भाषा को एक नया नाम दिया गया ‘जबाने उर्दूए मुअल्ला‘। इस पर इस्लामी मजहब का गहरा रंग चढ़ा हुआ था। किला जब बना, तो उसके पास बाजार की भी स्थापना होनी थी, सैनिक छावनी भी बननी थी। इस छावनी में अब फारसी व तुर्क सैनिकों की संख्या अधिक थी। उर्दू (ओर्डू) का शब्दार्थ होता है किला, अड्डा या शिविर। यह अंग्रेजी के ‘होर्ड‘ शब्द जैसा है। इस किले को उर्दू संज्ञा मिलने के बाद उसके पास के बाजार का नाम भी उर्दू बाजार पड़ गया। तो यह उर्दू किले के भीतर के सभ्य व कुलीन मुसलमानों की भाषा बनी।

यहां यह ध्यान देने की बात है कि भारत में आने के बासद यहां की भाषा को ‘हिंदी‘ नाम इन मुस्लिम हमलावरों द्वारा ही दिया गया था, लेकिन अब यह ‘हिंद‘ यानी इस देश की भाषा बन गयी थी और यहां के मूल निवासियों को हिंदी की संज्ञा मिल गयी थी। इसलिए दरबार के कुलीन मुस्लिम वर्ग को अपनी एक अलग पहचान वाली भाषा चाहिए थी। इन नये दरबारियों को यहां की भाषा पिछड़ी और कविता फूहड़ लगती थी, लेकिन उनकी आंख तब खुली की खुली रह गयी, जब दखिन के हिंदवी के शायर वली मुहम्मद (1667-1707) वर्ष 1700 में दिल्ली पहुंचे। उनकी शायरी के आगे ‘उर्दुए मुअल्ला‘ के शायर फीके लगे। उनकी ‘रेख्ता‘ व ‘हिंदवी‘ की कविता फारसी के विद्वानों को चमत्कृत करने वाली थी। उन्होंने वली को उर्दू ए मुअल्ला‘ में रचनाएं करने को कहा। वली साहब मान गये और वह उर्दू गजल के ‘बाबा आदम‘ का खिताब पाने के हकदार बन गये। इस लालकिले के दरबार से ही ‘उर्दू‘ (जबाने उर्दू ए मुअल्ला का संक्षिप्त रूप) ने अपना नया भाषाई और मजहबी रंग रूप अख्तियार करना शुरू किया। उसने पर्सियन लिपि की नश्तालिक लिखावट शैली (घसीट वाली)अख्तियार की। दक्षिण एशियायी जरूरी के अनुसार उसमें कुछ अक्षर (हर्फ) बढ़ाये गये और इस रूप में उसे हिंदी या हिंदवी से एक अलग पहचान दिलाने की कोशिश शुरू हुई। अभी तक हिंदी या हिंदवी की एक और लिपि नहीं तय थी। वह पर्सियन व तुर्की लिपि में भी लिखी जाती थी, नागरी में भी और अन्य भारतीय लिपियों में लिखी जाती थी। लेकिन अब उर्दू का नश्तालिक फारसी शैली में लिखना अनिवार्य हो गया। उर्दू का छंद विधान व वूर्य विषय भी फारसी शैली का हो गया। उर्दू के शायर अपना तखल्लुस (उपनाम या पेन नेम) रखने लगे, जो फारसी की परंपरा थी। इन्होंने अपनी उर्दू में फारसी, अरबी व तुर्की के शब्दों को बढ़ा दिया। संस्कृत के अपभं्रश शब्दों को भी लेने से परहेज किया जाने लगा।

भाषा के इस मजहबीकरण की प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी। अब हिन्दू के नाम से अभिहित भारतीयों ने अपनी अलग भाषाई पहचान के लिए ‘हिन्दू‘ शब्द से जुड़ी इस ‘हिंदी‘ को अपनी भाषा के रूप में विकसित करना शुरू किया। अब यहां दिक्कत यह पैदा हुई कि इस वर्ग का संस्कृत से नाता बहुत पहले ही टूट चुका था। वह केवल धार्मिक कर्मकांड तथा ऐतिहासिक साहित्य के अध्ययन अध्यापन तक सीमित रह गयी थी। मुस्लिमकाल में जो मिलीजुली भाषा विकसित हुइ्र और उसमें जो लौकिक साहित्य रचा गया, वह ज्यादातर फारसी लिपि में था, जो मुस्लिमों द्वारा लिखा गया था। अब भाषा के मुस्लिम मजहबीकरण की प्रतिक्रिया में जो भाषाई जागरूकता आयी, वह भला मुस्लिम रचनाकारों की रचनाओं को क्यों अपने साथ जोड़ती। उन्होंने केवल उन्हीं मुस्लिम रचनाकारों को अपने इतिहास में जोड़ा, जिन्होंने नागरीलिपि में लिखा या यहां के भक्ति आंदोलन से प्रभावित थे अथवा भारतीय इतिहास के हिन्दू कथानकों को अपना वूर्य विषय बनाया। इन्होंने उर्दू की प्रतिक्रिया में अपनी हिंदी में संस्कृत के शब्दों को अधिक संख्या में शामिल करना शुरू कर दिया। भाषा के इस मजहबी विभाजन को अंग्रेजी सत्ता ने आकर और पुष्ट किया, क्योंकि इसमें उसका दीर्घकालिक राजनीतिक हित था। (जारी)

4/09/2011

रविवार, 28 अगस्त 2011

अन्ना हजारे बनाम भारतीय लोकतंत्र



गांधीवादी नेता अन्ना हजारे ने देश में आपाद मस्तक व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ऐसी लड़ाई छेड़ रखी है, जिसमें प्रायः पूरे देश का आम आदमी उनके साथ है, किंतु देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रायः सारे कर्णधार उनके खिलाफ हैं। वास्तव में आज भारत का संविधान, भारतीय संसद और पूरा लोकतंत्र कुछ निहित स्वार्थी तत्वों का बंधक बनगया है। इन्होंने आम आदमी के अधिकारों का ठेका भी अपनी जेब में रख छोड़ा है, जिससे इनके गुट के बाहर के किसी आदमी को आम आदमी की बात उठाने का अधिकार भी नहीं रह गया है। सत्ता के दलाल बुद्धिजीवी, लेखक व पत्रकार उस आवाज को ही लोकतंत्र विरोधी, फासिस्ट व जिहादी सिद्ध करने में लगे हैं, जो इस बंधक बने लोकतंत्र को मुक्त कराने की चाहत रखता है।

अन्ना हजारे आज शायद दुनिया का सर्वाधिक चर्चित नाम है। 74 वर्षीय यह वृद्ध यौवन की अदम्य अंगड़ाई का प्रतीक बन गया है। अन्ना देश के जनजन में ऐसे व्याप्त हो गये हैं कि हर व्यक्ति अपने को अन्ना कहने लगा है। ‘मैं अन्ना हूॅं‘ छपी टोपियां और कमीजें युवाओं की ‘फैशन स्टेटमेंट‘ बन गयीं। अन्ना की रंगीन तस्वीरें किशोरियों के नाखूनों तक पर सज गयीं। ऐसी दीवानगी अब से पहले शायद ही किसी को लेकर उमड़ी हो। इस देश की हठीली संसद और अपने ही अहंकार मे डूबी जिद्दी सरकार को अन्ना की इस तूफानी लहर के आगे झुकना पड़ा। यद्यपि अभी यह नहीं कहा जा सकता है कि इसके साथ ही आम जनता जीत गयी है और भ्रष्टाचारियों की संरक्षक सरकार और राजनेताओं की फौज पराजित हो गयी है, फिर भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि उनमें पहली बार देश की आम जनता का एक खौफ पैदा हुआ है। लेकिन स्वयं अन्ना और उनके साथ खड़े युवाओं तथा देश के आम लोगों को यह समझना होगा कि देश की सत्ता पर कुंडली मारे बैठा राजनीतिक वर्ग मात्र अनशन और शांतिपूर्ण प्रतीकात्मक विरोधों से झुकने वाला नहीं है। सत्ताधारी वर्ग सत्तामद में इतने जड़ हो चुके हैं कि उन्हें अनुनय विनय की भाषा समझ में ही नहीं आती। पुरानी कहावत है कि ‘भय बिन होइ न प्रीति‘। लोगों को रामायण की उस पुराण कथा का स्मरण होगा, जब श्रीराम ने जलाधिपति समुद्र से लंका जाने का मार्ग देने की प्रार्थना करते हुए उसके तट पर तीन दिन निराहार व्रत करते गुजारे थे, लेकिन अपनी विराट सत्ता के अहंकार में डूबे समुद्र ने उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। इसके बाद राम ने अनुनय-विनय का व्रत छोड़कर जब शस्त्र शक्ति का संधान किया, तो भागा भागा आया और राम को तरीका सुझाने लगा कि वह कैसे स्वयं लंका जाने का मार्ग बना सकते हैं, जिसमें वह स्वयं भी सहायता के लिए तत्पर रहेगा। इस कथा का संदेश साफ है कि सत्ताधारी वर्ग को जब तक अपनी सत्ता जाने का भ्य नहीं उत्पन्न होता, तब तक वह किसी के भी आगे झुकने के लिए तैयार नहीं होता। अन्ना को भी इस कथा से सबक लेना चाहिए। बहुत हो गया अनशन। अब शक्ति प्रदर्शन का समय आ गया है। अन्ना को यदि अपनी मांग मनवानी है और उन्हें पूरे देश के समर्थन का विश्वास है, तो उन्हें अब संवेदना जगाने के बजाए चेतना जगाने का काम शुरू करना चाहिए। लेकिन यह काम अराजनीतिक पद्धति से नहीं हो सकता। इसके लिए राजनीति में उतरना होगा। वे स्वयं यदि कोई राजनीतिक पार्टी बनाकर यह लड़ाई नहीं लड़ सकते, तो उन्हें ऐसी राजनीतिक पार्टियों का मंच बनाना चाहिए, जो उनकी नीतियों को स्वीकार करती हों या जिनमें तथाकथित दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ने का जज्बा हो। उन्हें अब इस नाटकीय सिद्धांत की ओट नहीं लेनी चाहिए कि वे न तो किसी पार्टी के खिलाफ हैं और न वह किसी सरकार को गिराना चाहते हैं।

वह अहिंसा में विश्वास रखते हैं, यह तो निश्चय ही अच्छी बात है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यवस्था परिवर्तन के लिए हिंसा की कोई जरूरत भी नहीं है। यहां तो केवल ऐसी वैचारिक क्रांति की जरूरत है, जिसके साथ देश की आम जनता जुड़ सके। किसी अराजनीतिक क्रांति द्वारा व्यवस्था परिवर्तन का सपना कभी पूरा नहीं किया जा सकता। अन्ना को समझना चाहिए कि देश के तमाम भ्रष्ट लोगों ने प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों तरीके अपनाकर संसद, संविधान तथा न्याय व्यवस्था तीनों पर अपना कब्जा जमा रखा है। देश की वर्तमान संसद व देश का संविधान ही उनका रक्षा कवच बना हुआ है, इसलिए वह अपने इस किले में किसी को भी सेंध लगाने की कभी इजाजत नहीं देंगे।

इस देश में तमाम बुद्धिजीवी, पत्रकार व लेखक प्रायः सत्ता की दलाली में अपनी सारी मेधा खर्च करने में लगे रहते हैं। वे संविधान, कानून व परंपरा की ऐसी व्याख्या करेंगे कि नायक खलनायक और खलनायक नायक बन जाए। कांग्रेस के, विशेषकर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के एक चहेते बुद्धिजीवी व पत्रकार हैं दिलीप पडगांवकर, वह अन्ना को फासिस्ट और जिहादियों की श्रृंखला में सिद्ध करने में लगे हैं। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित अपने एक आलेख में उन्होंने अन्ना को पोप, कम्युनिस्ट कमांडरों, फासिस्ट नेताओं व जिहादी सिद्धांतकारों की पंक्ति में गिनते हुए कहा कि वह भी अपने ही विचारों को सर्वोच्च व अकाट्य समझते हैं। वे उसी सिद्धांत को मानते हैं, जिसके प्रमाण अकेले वहीं हैं। उन्होंने अन्ना के विचारों की खिल्ली उड़ाते हुए लिखा है कि वह अपनी ‘अंतरात्मा‘ की आवाज पर लक्ष्य पाना चाहते हैं। वह उसे संसद- जो जनता की इच्छाओं का प्रतिरूप है- और संविधान (जो लोकतंत्र की कसौटी है) के भी उपर मानते हैं।

मतलब यह कि क्या सही है क्या गलत यह वे ही तय करेंगे। अकेले वे ही जानते हैं कि सत्य क्या है और जनता को किस लक्ष्य तक पहुंचना है। उस लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग अकेला वही है जिसे उन्होंने तैयार किया है। दूसरे शब्दों में भ्रष्टाचार दूर करने का उनका ही एक तरीका है, जिसे वे ही लागू करने के अधिकारी हैं। अब इस तरह वह क्या कहना चाहते हैं, इसे कोई भी समझ सकता है। वह हिंसक नक्सली नेताओं और जिहादियों से अन्ना और उनके समर्थकों को अलग नहीं मानते, क्योंकि वे भी संविधान और संसद के तौर-तरीकों को नहीं मानते और अपने मन की व्यवस्था लागू करना चाहते हैं।

उन्होंने अपनी बात की पुष्टि के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर के एक वक्तव्य को भी उद्धृत किया है, जो उन्होंने संविधान सभा की बैठक में नवंबर 1949 में दिया था। उस समय तक संविधान निर्माण का कार्य पूरा हो चुका था। अंबेडकर ने उस वक्तव्य में कहा था कि यदि भारत को अपना लोकतंत्र बनाये रखना है, केवल बाहरी ढांचे के रूप में नहीं, बल्कि वास्तव में, तो इसके लिए सबसे पहले यह करना होगा कि देश को जो भी सामाजिक, आर्थिक लक्ष्य प्राप्त करने हैं, उसके लिए केवल संवैधानिक तरीके अपनाएं जाएं। इसका मतलब यह है कि अब हमें क्रांति यानी धरना-प्रदर्शन-आंदोलन आदि के तौर-तरीकों को छोड़ना होगा (वी मस्ट एबैंडन द ब्लडी मेथड्स ऑफ रिवोल्यूशन)। उन्होंने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा कि हमें नागरिक अवज्ञा (सिविल डिस ओबिडियेंस) असहयोग (नॉन कोऑपरेशन) तथा सत्याग्रह जैसे तरीकों का परित्याग करना होगा। जहां संवैधानिक तौर तरीकों के रास्ते खुले हों, वहां इनको इस्तेमाल करने का कोई औचित्य नहीं है। ये तौर तरीके और कुछ नहीं, बल्कि अराजकता पैदा करने के साधन (ग्रामर ऑफ एनार्की) हैं, इसलिए इन्हें जितनी जल्दी छोड़ दिया जाए, उतना ही अच्छा होगा। इसके आगे अम्बेडकर ने जॉन स्टुअर्ट मिल की उस चेतावनी को उद्धृत किया, जिसे उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए दिया था। मिल ने कहा था कि जो लोग लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें अपनी स्वतंत्रता किसी महापुरुष के आगे भी नहीं समर्पित करना चाहिए (चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो) और न उसे इसका अधिकार देना चाहिए कि वह उनकी संस्थाओं को उलट पलट कर दे। अम्बेडकर ने इस चेतावनी को भारत के संदर्भ में विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहा था कि भारत एक ऐसा देश है, जहां भक्ति की प्रधानता है। यहां की राजनीति में भी व्यक्ति पूजा और भक्ति मार्ग की जैसी प्रधानता व प्रभाव है, वैसा किसी अन्य देश में नहीं है। उन्होंने सावधान किया था कि अपने देश में भक्ति या व्यक्ति पूजा का ऐसा प्रभाव है कि उससे लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन हो सकता है और तानाशाही उसका स्थान ले सकती है।

अम्बेडकर के उपर्युक्त वक्तव्य से असहमति नहीं व्यक्त की जा सकती, किंतु जनाब पडगांवकर साहब इस उद्धरण का जिस संदर्भ में इस्तेमाल कर रहे हैं, वह निश्चय ही उनकी बदनीयती का परिचायक है। वह अम्बेडकर के कथन का इस्तेमाल करके अन्ना हजारे को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का विरोधी सिद्ध करना चाहते हैं। यह वही पडगांवकर साहब हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कश्मीरियों से बातचीत करके अपनी रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त कर रखा है। ये वही पडगांवकर साहब हैं, जो पाकिस्तानी आई.एस.आई. के अमेरिका स्थित एजेंट गुलाम अहमद फई के भी दोस्त हैं और भारत के प्रधानमंत्री के भी। ये कश्मीरी अलगाववादियों के आंदोलन और विरोध का तो समर्थन करते हैं और भारत सरकार को भी सलाह देते हैं कि उनकी मांगें मानी जानी चाहिए और उनके प्रति उदारता बरतनी चाहिए, लेकिन अन्ना हजारे को यह फासिस्ट और आतंकी सिद्ध करने में लगे हैं। उन्हें नेहरू परिवार की व्यक्ति पूजा का खतरा नहीं दिखयी देता, किंतु अन्ना को मिल रहे जनसमर्थन से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा नजर आ रहा है। उनके अनुसार आज तो अनशन करके जान देने की धमकी देकर अन्ना हजारे अपने विचारों का लोकपाल बिल पास करना चाहते हैं, कल कोई ‘खाप-न्याय‘ (रिवायत के नाम पर) को लागू करने के लिए कानून बनाने को कहने लगे या किसी पूजा स्थल को गिराने की बात करने लगे या पर्यावरण के नाम पर कल कारखानों व परमाणु रियेक्टरों का निर्माण रोकने के लिए अनशन करने लगे, तो क्या होगा। अब इन बातों से उनके कुतर्कों का कोई भी अनुमान लगा सकता है।

निश्चय ही किसी भी व्यक्ति या समूह को संसदीय या लोकतांत्रिक व्यवस्था के अपहरण की इजाजत नहीं दी जा सकती, लेकिन यहां अहम सवाल यह है कि इस देश के संविधान, संसद व लोकतंत्र का अपहरण किसने कर रखा है। व्यक्ति पूजा किसकी हो रही है। भक्ति मार्ग का अनुसरण सत्तारूढ़ दल कर रहा है या कोई और।

अम्बेडकर ने जो चेतावनी दी थी, वह आदर्श संसदीय स्थिति के लिए थी। आज का सच तो यह है कि देश की संसदीय व्यवस्था का अपहरण हो चुका है। आज की असली समस्या देश के संविधान, संसद तथा लोकतंत्र को अपहर्ताओं के चंगुल से मुक्त कराने की है। आज देश की सबसे बड़ी पार्टी सबसे अधिक भक्तिमार्गी है। यहां उसके एक सर्वोच्च देवता हैं, उनका परिवार है और उनके गणधर, दरबारियों का दल है। बाकी सब कीर्तनिया हैं, जो नाम जप और आरती-भोग में लगे रहते हैं और नित्य प्रसाद की आकांक्षा में मंदिर के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं।

इन पंक्तियों के आपके पास पहुंचने तक हो सकता है कि अन्ना हजारे का 12 दिनों से चला आ रहा अनशन समाप्त हो गया रहे। शायद वह संसद की अपील मान लें। वैसे भी यह अनशन अब उन्हें तोड़ ही देना चाहिए, क्योंकि इससे जनशक्ति के नवजागरण का जितना काम हो सकता था, हो गया है। अब इसके बाद उन्हें स्वस्थ होकर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई शुरू करनी चाहिए। वह लड़ाई निश्चय ही लंबी होगी, लेकिन उसके लिए अब जमीन तैयार हो चुकी है। देश में वास्तविक जनसापेक्ष लोकतंत्र की स्थापना करनी है, तो हमें नया संविधान और नई राजनीतिक प्रणाली विकसित करनी होगी। इसके लिए हमें ब्रिटिश उत्तराधिकार के बोझ से बाहर निकलकर अपनी जनकेंद्रित व्यवस्था लागू करनी होगी।

28/08/2011

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

लंदन का दंगा, दुनिया के लिए एक चेतावनी !

भयावह आगजनी
लंदन में गत 6 अगस्त को एकाएक भड़क उठा दंगा, केवल ब्रिटिश शासकों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आधुनिक लोकतांत्रिक देशों के लिए एक चेतावनी है। यह ब्रिटिश शैली की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था को भी एक चुनौती है, किंतु सेवा केवल धनी और ताकतवर समुदाय की ही करती है। इस व्यवस्था से यही संदेश मिल रहा है कि केवल कठोर परिश्रम व नियमों के अनुसार करम करके न तो समृद्धि हासिल की जा सकती है और न सम्मानित भविष्य ही सुनिश्चित किया जा सकता है। वास्तव में लोकतंत्र और विधि का शासन एक धोखे की टट्टी है, जिसकी ओट लेकर दबंग और शक्तिशाली वर्ग सारी आर्थिक शक्तियों पर कब्जा जमाए हुए हैं।

ब्रिटेन में भड़के बीते हफते के देश्व्यापी दंगों से ब्रिटेन ही नहीं, शायद पूरे यूरोप के लोग हतप्रभ हैं। शनिवार 6 अगस्त को एकाएक भड़का दंगा कैसे विकराल हो उठा, यह लोगों की समझ में नहीं आ रहा है। टीवी पर देखकर इस घटना का विश्लेषण करने वाले पंडित भी चकित हैं, क्योंकि इस घटना के कारणों को कोई तर्कसंगत व्याख्या नहीं सूझ रही है। मीडिया में आ रही सारी खबरें इस घटना से शुरू हो रही हैं कि पुलिस गोली से मारे गये युवक मार्ग दुग्गन के लिए न्याय मांगने के लिए करीब 300 लोगों की भीड़ उत्तरी लंदन के टोटनेहम पुलिस थाने पर एकत्र हुई थी। मार्ग दुग्गन क्यों मारा गया, यह ठीक-ठीक पता नहीं है, लेकिन शनिवार को उसके लिए न्याय मांगने आयी भीड़ एकाएक इतनी उग्र हो गयी कि वह सीधे तोड़फोड़, आगजनी, हिंसा व लूटपाट पर आमादा हो गयी। कुछ ही समय में यह दंगा पूरे लंदन में फैल गया और फिर देश के अन्य शहरों मैनचेस्टर, बर्मिंघम, लिवरपूल, सैलफर्ड, लैस्टरा, नाटिंघम, बुलवर हैफ्टन, ब्रिस्टल आदि में फैल गया। इन दंगाइयों में ज्यादातर किशोर शामिल थे, बाद में बड़ी उम्र वाले भी शामिल हो गये। लोग टीवी पर यह देखकर चकित थे कि बमुश्किल 10-11 साल तक के बच्चे इस आगजनी व लूट में शामिल थे। वे मकानों व दुकानों में आग लगा रहे थे। लूटने लायक हर सामान लूट रहे थे। शराब व बियर की बोतलें, गहने, बिजली के उपकरण, इलेक्ट्र्ॉनिक सामान, डिजाइनर कपड़े -जो जिसके हाथ लग रहा थ, ले के भागने या बाकी में आग लगाने में जुटा था। सड़क चलते लोगों को भी लूटने की घटनाएं हुईं। सड़क चलते हमले के शिकार ज्यादातर प्रवासी एशियायी थे। हमला करने वालों में काले, गोरे, भूरे हर तरह के लोग थे। खुदरा दुकानदार शायद सबसे ज्यादा लूटे गये। ज्यादातर लुटेरे अपना चेहरा छिपाए हुए थे, जिससे सड़कों व दुकानों में लगे सी.सी. टीवी के कैमरे व पुलिस के वीडियो कैमरों से उनकी पहचान न हो पाए।

इस सारी घटना का एक रोचक पक्ष यह भी रहा कि प्रारंभिक दौर में इस लूटपाट व आगजनी में पुलिस ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। वह मूक दर्शक बनी रही। भीड़ खुलेआम आग लगा रही थी, दुकानों को लूट रही थी, लेकिन पुलिस खड़ी थी। अव्वल तो शहर में इतनी पुलिस ही नहीं थी कि इतने व्यापक उपद्रव को रोक सके। दूसरे जहां वह थी भी, वहां वह तटस्थ दर्शक बनी रही। प्रशासन भी पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आ रहा था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। प्रधानमंत्री इस समय छुट्टी मनाने के लिए इटली गये हुए थे। अनियंत्रित दंगे की खबर सुनकर वह छुट्टी बीच में ही छोड़कर लंदन भागे। उनके आने पर अवश्य प्रशासन में हरकत नजर आई। लंदन में अतिरिक्त पुलिस फोर्स मंगाई गई। शहर की गश्त में लगी करीब 6000 पुलिस की संख्या बढ़ाकर 16,000 की गयी। तीन दिन की आगजनी व लूटपाट के बाद लंदन में तो शांति वापस आ गयी, लेकिन अन्य शहरों में यथेष्ट पुलिस बल के अभाव में यह हिंसा बुधवार तक चलती रही।

प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने दंगों पर उतरी इस भीड़ को उद्दंड अपराधियों की संज्ञा दी है और उनकी इस प्रवृत्ति के लिए उनके पालकों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने हर कीमत पर शांति व कानून व्यवस्था कायम करने का आश्वासन दिया है, तथा उन सबको उचित सजा देने की बात की है, जो इस हिंसा व उपद्रव में शामिल थे। उनके अनुसार सी.सी. टीवी कैमरों द्वारा लिये गये चित्रों का विश्लेषण किया जा रहा है तथा हमलावरों की पहचान की जा रही है। पुलिस इन वीडिया फुटेज को आम जनता के लिए भी जारी कर रहे हैं, जिससे दंगाइयों की पहचान की जा सके। दंगों के दौरान पुलिस तथा फौजदारी की अदालतें दिन रात चौबीसों घंटों काम करती रहीं। करीब साढ़े सात सौ से अधिक गिरफ्तारियां की गयीं, जिनके विरुद्ध अदालती मामले दर्ज करने की तैयारी चल रही है।

दुनिया इन दंगों व लूटपाट की बात देख सुनकर इसलिए चकित है कि उसकी नजर में ऐसी घटनाएं तो गरीब, पिछड़े, विकासशील देशों में हुआ करती है। दंगे फसाद करना और छोटी-छोटी उपभोग वस्तुओं की लूटपाट करना तो असभ्य, कुसंस्कृत और गरीब समाज के लक्षण है। ब्रिटेन तो दुनिया के समृद्धतम देशों में गिना जाता है और आधुनिक सभ्यता व संस्कृति का तो वह गुरु समझा जाता है। माना जाता है कि आधुनिक मनुष्यता के सारे आदर्श और आचरण के श्रेष्ठतम नियम वहीं से दुनिया में फैले हैं। फिर ये क्या हो गया। कहां गये सभ्यता के उंूचे संस्कार, कहां गयी औद्योगिक समृद्धि की गर्वोन्नत श्रेष्ठता! ऐसा नहीं कि इन दंगों के दौरान ब्रिटेन का उन्नत संस्कारों वाला सामाजिक चेहरा नहीं दिखायी पड़ा। दंगों की तोड़फोड़ व हिंसा की वारदातों के बीच ऐसे लोग भी घरों से बाहर आये, जो हाथों में झाड़ू व ब्रश लिए हुए थे और फौरन दुकानेां के टूटे कांच तथा सड़कों पर बिखरे मलबे को साफ करने में लग गये। नागरिक कर्तव्य तथा सामुदायिकता की भावना का ऐसा प्रदर्शन भी कम देखने को मिलता है, लेकिन पूरे ब्रिटेन में हिंसा का जैसा दृश्य देखा गया, उसे ढकने में यह सामाजिक प्रदर्शन नाकामयाब रहा। ऐसे भले लोग थोड़ी संख्या में तो हर देश व हर समाज का चारित्रिक प्रतिनिधित्व नहीं करते। प्रतिनिधित्व करने वाला तो वह वर्ग था, जो पांच दिन तक ब्रिटेन की सारी उदात्त पहचान को रौंदता रहा।

राजनीति व समाज शास्त्र के पंडित इन घटनाओं की तरह-तरह से व्याख्या कर रहे हैं। एक सर्वाधिक तर्कसंगत लगने वाली व्याख्या आर्थिक है। लगभग पूरा यूरोप पिछले कुछ वर्षों से जिस आर्थिक संकट से जूझ रहा है, यह उसका परिणाम है। मंदी के दौर में ब्रिटिश सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जनसेवाओं के मद में भारी आर्थिक कटौती की। जन कल्याणकारी योजनाओं में कटौती के कारण पिछड़े व गरीब तबके में उफन रहा असंतोष इस दंगे के रूप में फूट पड़ा। आंकड़े बताते हैं कि इस समय देश का हर पांचवां युवक बेरोजगार है। लेकिन केवल इस सिद्धांत से उपर्युक्त लूटपाट, हिंसा व आगजनी की व्याख्या नहीं हो सकती। दुकानों में लूटपाट करते जो युवक पकड़े गये हैं, उनमें सब बेरोजगार ही नहीं हैं। उनमें नियमित रोजगार वाले नौकरीपेशा शिक्षक, होटलों के शेफ तथा छोटे कर्मचारी भी हैं। एक तर्क यह दिया जा रहा है कि ब्रिटेन में बड़ी संख्या में आ बसे अफ्रीकी व एशियायी मूल के लोगों ने यह दंगा किया। पुलिस द्वारा की गयी एक युवक की हत्या से बस उन्हें एक मौका मिल गया और उन्होंने मनमाना उपद्रव शुरू कर दिया, लेकिन यह भी पूरी तरह सही नहीं है, क्योंकि टीवी पर आ रही दंगों की रिपोर्टों में साफ दिखायी दे रहा है था कि लूटपाट करने वालों में काले या भूरे लोगों के मुकाबले गोरों की संख्या ज्यादा थी। दंगे की जो रिपोर्टें मिल रही हैं, उनके अनुसार जिन खुदरा दुकानों को लूट व आगजनी का शिकार बनाया गया, उनमें ज्यादातर एशियायी मूल के लोगों की हैं। यह निश्चय ही ब्रिटिश युवकों के बीच एशियायियों की बढ़ती समृद्धि के प्रति उग्र होती ईर्ष्या का परिणाम है। उन्हें लग रहा है कि उनके रोजगार के अवसर ये बाहर से आए प्रवासी हड़प ले रहे हैं। इन दंगों में एक चौथा कारण नस्ली व मजहबी घृणा का भी देखा जा सकता है। दंगे के दौरान केवल तीन मौतों की खबर है। ये तीनों ही मुस्लिम हैं। वे तीनों अपने धार्मिक व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को दंगाइयों के हमलों से बचाने के लिए सड़क की पटरी -पेवमेंट- पर आ गये थे। तभी एक तेज रफ्तार कार उन तीनों को कुचलती निकल गयी। यह कोई अजनाने हुई दुर्घटना नहीं, बल्कि जानबूझकर की गयी हत्या थी। इसके अलावा सड़कों पर हुई लूट का शिकार भी ज्यादातर मुस्लिम प्रवासियों को बनाया गया। ’यू ट्यूब‘ पर डाले गये एक चित्र में मुहम्मद अशरफ हाजिक नामक एक छात्र को दिखाया गया है। उसे कम उम्र गोरे लड़कों ने मिलकर बुरी तरह पीटा और उसका सामान छीन लिया। उसके किसी दोस्त ने अस्पताल में पहंुंचकर उससे बात की और बातचीत का कुछ उसमा चित्र ‘यू ट्यूब‘ पर डाल दिया। इस बातचीत में हाजिक बताता है कि किस तरह कुछ कम उम्र के गोरे लड़कों ने उस पर हमला किया और किस तरह करीब 11 वर्ष के एक गोरे लड़के ने उसे चाकू मार देने की धमकी दी। अभी मात्र एक महीने पहले वह एक छात्रवृत्ति जीतकर मलेशिया से यहां पढ़ने आया था। उसका जबड़ा टूट गया है और रायल लंदन अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।

वास्तव में इस समय ब्रिटेन, अमेरिका व यूरोप के अन्य देश् ही नहीं, बल्कि दुनिया के प्रायः सभी तथाकथित सभ्य व लोकतांत्रिक देश एक भारी सैद्धांतिक विसंगति, सामाजिक विखंडन तथा नैतिक पतन के दौर से गुजर रहे हैं। इनमें भारत भी शामिल हैं। क्योंकि उसन भी पश्चिम के उन्हीं आर्थिक सामाजिक राजनीतिक व नैतिक मूल्यों को अपना रखा है, जिनकी स्थापना इन पश्चिमी देशों द्वारा की गयी है। अब पश्चिम के ये सैद्धांतिक आधार बुरी तरह बिखरने लगे हैं। सिद्धांततः लोकतंत्र, बहुसंस्कृतिवाद, धार्मिक व नस्ली समानता आदि के सिद्धांत बड़े आकर्षक तथा मनुष्यता के आदर्श प्रतीत होते हैं, लेकिन व्यवहार में धनी व ताकतवर लोग ही इस स्थिति का लाभ उठा रहे हैं। मजहबी व नस्ली फासिस्ट ताकतें विस्तार करने में लगी हैं। समाज के धनी व ताकतवर लोगों ने राजनीति सत्ता तथा आर्थिक संसाधनों पर इस तरह कब्जा कर लिया है कि बाकी का जन समुदाय मात्र उनकी दया का मोहताज बनकर रह गया है। लोकतंत्रीक व्यवस्था में यह आशा की गयी थी कि देश के आथर््िाक व औद्योबिक विकास का लाभ देश के प्रत्येक नागरिक को मिल सकेगा, शिक्षा के प्रसार व राजनीतिक व सामाजिक अवसर की समानता से मजहबी अधिनायकवाद का तंत्र टूटेगा। मानवीय समता की भावना का विस्तार होगा, आर्थिक विकास से विषमताओं का गढ़ ढहेगा, लेकिन अब देखा जा रहा है कि यह सपना भारत जैसे विकासशील देश में ही नहीं, ब्रिटेन जैसे विकसित व समृद्ध देश में भी टूट रहा है। ब्रिटेन में हुए इस दंगे ने तो वहां की सामाजिक असलियत को दुनिया के सामने उजागर कर दिया, लेकिन यूरोप के अन्य देशों तथा अमेरिका आदि की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं है। पिछली आर्थिक मंदी ने इन सभी देशों का मुलम्मा झाड़ दिया है।

लोकतंत्र केवल कहने को लोकतंत्र है। धनी और ताकतवर वर्ग आम आदमी की कीमत पर अपनी सुख-समृद्धि को बढ़ाने में लगा है। आर्थिक मंदि के दौर में घाटे शिकार बैंगों को तो अरबों डॉलर का पैकेज देकर बचाया जा रहा है, किंतु आम आदमी की कल्याण योजनाओं पर खर्च होने वाले धन में कटौती की जा रही है।ब्रिटेन के शासकों को अगले वर्ष होने जा रही ओलंपिक खेलों की अधिक चिंता है, देश के संकटग्रस्त लोगों की चिंता कम। जैसे अपने देश में राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के नाम पर अरबों रुपये की लूट चल रही थी और दिल्ली के गरीबों को उजाड़ा जा रहा था। दिल्ली सरकार गरीबों के लिए निर्धारित धन को खेलों के आयोजन पर खर्च कर रही थी।

ब्रिटेन में 6 अगस्त को भड़का यह दंगा आकस्मिक नहीं था। यह एक साल पहले से खदबदा रहा था। गत वर्ष नवंबर महीने में जब कैमरन की कंजरवेटिव सरकार ने शिक्षा व्यय में कटौती की घोषणा की थी, तो लाखों छात्र पुलिस से भिड़े थे। अभी इस वर्ष के मार्च महीने में भी करीब 5 लाख ब्रितानी सड़कों पर उतरे थे। छोटे-छोटे कई गुटों की पुलिस से मुठभेड़ भी हुई थी। आगे और भी आंदोलन हो सकते हैं, क्योंकि शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जनकल्याण की योजनाओं में की गयी कटौती के खिलाफ आक्रोश क्रमशः बढ़ रहा है। गत 6 अगस्त को पुलिस द्वारा एक युवक की हत्या निश्चय ही मात्र एक बहाना था। उसे लेकर जो दंगा भडका वह महीनों से जमा हो रहे तरह-तरह के जनाक्रोश का परिणाम था।

लोग इस पर चकित हैं कि कानून का सम्मान करने वाला शांतिप्रिय समुदाय क्यों हिंसा, लूटपाट और आगजनी पर उतर आया, लेकिन वे इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि आज का युवक व शांतिप्रिय नागरिक भी भीतर से कितने गुस्से में उबल रहा है। आम आदमी की मामूली सी लूट तो घोर अपराध जैसी दिखायी देती है। किंतु बैंकर, राजनेता, बड़े व्यवसायी तथा अन्य ताकतवर लोग देश की आम जनता को किस तरह लूट रहे हैं, यह किसी को नहीं दिखायी देता।

आज का शिक्षित युवा वर्ग साफ देख रहा है कि औद्योगिक दृष्टि से विकासशील तथा समृद्ध पश्चिम के देशों में भी केवल कठोर परिश्रम व कानून के रास्ते पर चलकर न तो समृद्धि हासिल की जा सकती है और न अपना भविष्य ही सुरक्षित किया जा सकता है। सत्ताधारी समुदाय अपनी शक्तियों का उपयोग धनी व शक्तिशाली लोगों की रक्षा में करता है, आम आदमी के लिए नहीं। पश्चिम के विफल हुए बैंकों के अधिकारी भी करोड़ों में वेतन ले रहे हैं। उनके लिए सरकार भी पैकेज देने के लिए तैयार रहती है और वह भी आम आदमी के जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं में कटौती करके। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि देश के युवकों में गैरजिम्मेदारी की संस्कृति /कल्चर ऑफ इर्रेस्पांसिबिलिटी/ बढ़ रही है। लेकिन शायद वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यह गैर जिम्मेदारी युवकों में नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक व सत्ता संस्कृति में बढ़ रही है।

अभी पिछले दिनों नार्वे में एक युवक द्वारा प्रधानमंत्री के कार्यालय के पास कार बम विस्फोट करने तथा सत्तारूढ़ लेबर पार्टी की युवा शाखा के शिविर पर अंधाधुंध गोली चलाने की घटना घटी थी, जिसमें 87 लोग मारे गये थे और कई सौ घायल हुए थे। वह अकेले एक आदमी की करतूत थी। यहां ब्रिटेन में एक साथ हजारों युवकों द्वारा आगजनी, लूटपाट तथा राजजनी जैसी वारदातें की गयीं। दोनों का चरित्र अलग-अलग हो सकता है, उद्देश्य अलग हो सकता है, किंतु एक समानता दोनों में है। दोनों ही अपनी राजनीतिक प्रणाली से असंतुष्ट हैं और उसके खिलाफ हैं।

ब्रिटेन के इस दंगे के संदर्भ में एक आम शिकायत की जा रही है कि आखिर लंदन की पुलिस इतनी तटस्थ क्यों बनी रही। पुलिस सख्ती बरतती है, तो तथाकथित मानवाधिकारवादी उसके पीछे पड़ जाते हैं। जो हालत अपने देश में है, वही ब्रिटेन में भी है। तमाम लंदनवासियों को घोर शिकायत है कि पुलिस वालों ने उनके जानमाल की रक्षा क्यों नहीं की, उन्होंने क्यों उपद्रवियों को नंगा नाच नाचने दिया, किंतु इन पुलिस वालों की पीड़ा कोई समझने के लिए तैयार नहीं है। यदि वे सख्ती बरतते हैं, तो न्यायालय उल्टे उन्हें ही सजा सुनाते हैं, मीडिया भी उनकी निंदा करता है और राजनीतिक चिंतक भी उन्हें अधिक मानवीय व्यवहार का उपदेश झाड़ते हैं। अपने यहां अभी ताजा-ताजा लोगों ने सुना होगा, जब सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि फर्जी मुठभेड़ के दोषी पाये गये पुलिस वालों को फांसी की सजा दे देनी चाहिए। कश्मीर व उत्तर पूर्व में तैनात पुलिस व सेना के जवानों पर मानवाधिकार हनन के आरोप आये दिन लगते रहते हैं और उन्हें इसकी सजा भी झेलनी पड़ती है। ब्रिटेन में पुलिस को ऐसी आलोचनाओं और सजा की स्थितियों से गुजरना पड़ता है। इस दंगे की शुरुआत करने वाले ज्यादातर कम उम्र किशोर थे, इनके विरुद्ध कठोरता बरतना तो पुलिस के लिए और महंगा पड़ सकता था। किसे अनुमान था कि दंगा इस स्तर तक फैल जायेगा, इसलिए प्रारंभिक घटनाओं को पुलिस ने यों ही जाने दिया। बाद में उसी पुलिस ने दंगे पर नियंत्रण भी कायम किया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ब्रिटेन में अब स्थई शांति कायम हो गयी है। इस तरह का दंगा भले न दोहराया जाए, लेकिन सरकारी नीतियों के खिलाफ आंदोलन-प्रदर्शन आगे भी हो सकता है। और यदि सरकार ने अपनी नीतियां न बदली तो उसका हिंसक रूप भी सामने आ सकता है।

आज प्रायः पूरी दुनिया का युवा वर्ग असंतोष का शिकार है और बेहद क्षुब्ध है, किंतु इसके लिए दोषी यह युवा वर्ग नहीं, बल्कि वह सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमें वह जी रहा है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अभी स्वयं युवा हैं और वह इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि ब्रिटेन ने जिस आधुनिक राजनीतिक प्रणाली को स्वीकार किया है, उसमें सैद्धांतिक खामियां हैं। तो जरूरत इस बात की है कि उन खामियों को दूर किया जाए। यदि वे खामियां नहीं दूर की जातीं, तो यह युवा असंतोष व हिंसा एक देशीय नहीं रह जायेगी। इसे यदि हर देश् ने अपने-अपने स्तर पर संभालने की कोशिश नहीं की, तो यह एक विश्वव्यापी समस्या बन सकती है।


 

रविवार, 7 अगस्त 2011

आधुनिक बहुसंस्कृतिवाद और बढ़ता मजहबी उन्माद

कुछ भी हो नार्वेजियन अभी भी शांति और प्रेम के पुजारी हैं।
किंतु क्या मजहबी उन्मादी इसे समझेंगे ?

नार्वे की राजधानी ओस्लो में गत 22 जुलाई शुक्रवार को एक कट्टर ईसाई युवक ऐंडर्स बेहरिंग ब्रीविक /32/ ने प्रधानमंत्री कार्यालय के निकट कार बम विस्फोट के बाद शहर के नजदीक स्थित एक द्वीप पर ग्रीष्मकालीन शिविर में एकत्र सत्तारूढ़ लेबर पार्टी की युवा शाखा के किशोरों पर अंधाधुंध गोली चलाकर कुल 86 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। उसका कहना है कि यह दिल दहलाने वाला कांड उसने यूरोप के देशों को जगाने के लिए अंजाम दिया है, जो सो रहे हैं और जिहादी इस्लामी उनकी जमीन पर अपना आधिपत्य जमाते जा रहे हैं। यह शायद पहला अवसर है, जब किसी ईसाई ने अपने ही लोगों को निशाना बनाया है। ब्रीविक का कहना है कि ये सांस्कृतिक मार्क्सवाद के अनुयायी बहुलतावादी राजनीतिक दल तथा उनकी सरकारें हमारी राष्ट्रीय संस्कृति के सबसे बड़े शत्रु हैं, क्योंकि वे उसे नष्ट करने वाली शक्तियों को बढ़ावा दे रहे हैं।

एंडर्स बेहरिंग ब्रीविक (32) इन दिनों यूरोप का ही नहीं, शायद दुनिया का सर्वाधिक चर्चित नाम है। 22 जुलाई शुक्रवार को नार्वे के शहर ओस्लो में जो कुछ हुआ, वह कल्पनातीत था। नार्वे यूरोप का शायद सर्वाधिक शांतिप्रिय देश है। यहां की पुलिस बिना हथियार के काम करती है। वहां शायद कहीं भी सुरक्षा जांच की चौकियां नहीं है। प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवेश द्वार पर भी कोई मेटल डिटेक्टर नहीं है। कहीं किसी के बैग की तलाशी नहीं। इस 22 जुलाई की घटना के बाद वहां पहुंचे यूरोपीय देशों व अमेरिका के पत्रकार भी यह देखकर चकित थे कि कहीं भी उनकी न तो तलाशी ली गयी और न उन्हें ‘मेटल डिटेक्टरों‘ से गुजरना पड़ा। कईयों ने अपने देश में आकर अपनी जो रिपोर्टें लिखीं, उसमें उन्होंने वहां की पुलिस को निकम्मा तथा देश को सर्वाधिक असुरक्षित ठहरा दिया। भला, आज ऐसे भी कोई देश चलता है। इससे भी ज्यादा आश्चर्य उन्हें तब हुआ, जब इतने बड़े हत्याकांड के बाद भी कहीं गुस्से या बदले की भावना का इजहार नहीं, कोई नारेबाजी नहीं, कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं। लोग गमगीन थे, उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन कोई भी पुलिस या सरकार को कोसता हुआ नजर नहीं आ रहा था। कोई उस युवक को फांसी चढ़ाने या मार डालने की बात नहीं कर रहा थ, जिसने प्रधानमंत्री कार्यालय के समक्ष बम विस्फोट किया तथा राजधानी ओस्लो के निकट चल रहे युवाओं के एक शिविर पर अंधधुंध गोलियों की वर्षा कर करीब 87 लोगों को मार डाला। बम विस्फोट में भी कम से कम 7 लोग मारे गये। यह सही है कि नार्वे में मौत की सजा पर प्रतिबंध है और बड़े से बड़े अपराध के लिए अधिकतम केवल 23 साल के कारावास की सजा हो सकती है,फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि इतने बड़े हत्याकांड के बाद भी उसे मौत की सजा देने की कोई मांग कहीं से नहीं उठी। नार्वे मूल के एक ब्रिटिश लेखक ने यह सवाल जरूर उठाया है कि क्या इतनी ही तटस्थता तब भी बरती जाती, यदि हमलावर एक ईसाई न होकर कोई मुस्लिम होताऋ। फिर भी नार्वे वासियों की शालीनता, सहिष्णुता तथा अत्युच्चस्तरीय मनुष्यता की प्रशंसा करनी होगी कि उसने अपनी जीवनशैली तथा सिद्धांतों को पूर्ववत् बनाये रखने का संकल्प दोहराया है। वहां के लोगों ने हिंसा की प्रतिक्रिया में प्रेम तथा खून के जवाब फूलों से देने का प्रयास किया है। इस हिंसक वारदात के जवाब में नार्वेवासियों ने पूरे ओस्लो को फूलों से पाट दिया। हर गली, चौराहे, मकान, दीवाल पर फूल ही फूल। लोगों ने ओस्लो की गलियों में ऐसी तख्तियों को लेकर प्रदर्शन किया, जिस पर प्रेम का संदेश था। तख्तियों पर ‘ओस्लो‘ की जगह ‘ओस्लव‘ लिखा हुआ था और इस शब्द के बीच में आए ‘ओ‘ को गुलाबी दिल का आकार दिया गया था। अगल-बगल में भी इसी तरह दिल के निशान बनाये गये थे। प्रधानमंत्री व लेबर पार्टी के नेता जेन्स स्टाल्टेन बर्ग ने बार-बार अपनी इस घोषणा को दोहराया कि ऐसे हमले हमारी शांत और सहिष्णु जीवनशैली को नहीं बदल सकते। हम इससे डर कर अपनी परंपरा को तोड़ नहीं सकते। निश्चय ही यह अद्भुत साहस का प्रदर्शन है, लेकिन सवाल है कि दुनिया में बढ़ रही धार्मिक या सांस्कृतिक ‘युयुत्सा‘ की भावना इस शांति और प्रेम की जीवनशैली को जीवित रहने देगी।

उस शुक्रवार की सुबह ओस्लो की जिस बिल्डिंग में बम विस्फोट हुआ, उसमें नार्वे सरकार के प्रधानमंत्री व वित्त मंत्री के कार्यालय के अलावा वहां के प्रमुख दैनिक ‘वेड्रेंस गे‘ का मुख्यालय भी था। कई अन्य मंत्रालयों व मीडिया कंपनियों के दफ्तर भी उसके आस-पास ही हैं। इस विस्फोट के कुछ समय बाद ही ओस्लो से केवल 40 कि.मी. दूर एक द्वीप ‘यूतोया‘ में गोलीबारी की खबर मिली। इस द्वीप पर सत्तारूढ़ लेबर पार्टी की ‘युवा शाखा‘ का एक शिविर चल रहा था। हमलावर ने वहां उन युवाओं पर करीब डेढ़ घंटे तक अंधाधुंध गोलियां चलायी, जिसमें कुल 87 लोग मारे गये और सैकड़ों घायल हुए। ओस्लो में हुए विस्फोट में यद्यपि मौत तो केवल 7 लोगों की हुई, लेकिन घायलों की संख्या यहां भी सौ से उपर थी।

करीब 50 लाख की आबादी वाले इस शहर में इस तरह की यह पहली घटना थी। स्वाभाविक था कि पहला अनुमान यही लगाया जाता कि यह किसी इस्लामी आतंकवादी संगठन की ही कारगुजारी है। अफगानिस्तान में ‘नाटो‘ की सेना के साथ ‘नार्वे‘ के सैनिक भी ‘अलकायदा‘ व ‘तालिबान‘ जैसे जिहादी संगठनों से लड़ रहे हैं। इसलिए संभव है किसी जिहादी संगठन ने यह हमला किया हो। नार्वे बहुत आसान ‘टार्गेट‘ था। आतंकवादी तो ऐसे निशाने ढूंढ़ते ही हैं, जहां कम से कम प्रतिरोध का सामना करना पड़े और अधिक से अधिक खून-खराबा किया जा सके। मीडिया में एक ऐसी खबर भी आ गयी कि ‘अलकायदा‘ से सम्बद्ध एक जिहादी संगठन ‘अबू सुलेमान अल नसीर‘ ने इसकी जिम्मेदारी भी ले ली है, लेकिन बाद में पता चला कि यह दावा गलत था। आखिरकार जब यह पता चला कि हमलावर युवक कट्टर ईसाई है, तो लोगों को एकाएक विश्वास ही नहीं हुआ कि उसने क्यों अपने ही लोगों पर इस तरह का नृशंस हमला किया।

नार्वे की विशेष पुलिस /जो हथियार भी रखती है/ जब यूतोया द्वीप पहुंची और हमलावर को काबू में किया, तब पता चला कि 32 वर्षीय एंडर्स बेहरिंग ब्रीविक नार्वे का ही नागरिक है और उसने बहुत सोच विचार और लंबी तैयारी के बाद यह हमला किया। उसने अकेले ही विस्फोट और गोलीबारी दोनों ही घटनाओं को अंजाम दिया। विस्फोट कराने के बाद वह नौका लेकर सीधे यूतोया द्वीप पहुंचा। नार्वे का यह बहुत ही खूबसूरत रिसोर्ट हैं, जहां लोग सप्ताहांत की छुट्टियां मनाने या मौज मस्ती के लिए पहुंचते हैं। ब्रीविक को पता था कि उस दिन वहां सत्तारूढ़ लेबर पार्टी की युवा शाखा का कैंप चल रहा है। उसने वहां पहुंचते समय नार्वे पुलिस का जैकेट पहन लिया था, जिससे कोई उस पर भूलकर भी संदेह न करे। उसके पास एक स्वचालित टेलिस्कोपिक रायफल तथा एक पिस्तौल थी। पकड़े जाने पर उसने बताया कि प्रधानमंत्री कार्यालय के पास बम रखने का काम भी उसने ही किया है।

आम तौर पर यह कहा जा रहा है कि वह कोई पागल या सिरफिरा युवक है, जिसने इस तरह की भयावह कार्रवाई कर डाली, लेकिन ऐसे भी बहुत से लोग हैं, जो यह मानते हैं कि वह न तो पागल है, न सिरफिरा। उसके साथ पूछताछ करने वाले पुलिस अधिकारी भी मानते हैं कि वह कोई विकृत मस्तिष्क का व्यक्ति नहीं है। वह गहरी सोच का एक विवेकशील व्यक्ति है। उसने जो हिंसा फैलाई है, उसे वह खुद भी अच्छा नहीं मानता। उसने इस सारी कार्रवाई पर गहरा अफसोस व्यक्त किया है, लेकिन इसके साथ ही उसका यह भी कहना है कि इसके अलावा उसके पास कोई और रास्ता भी नहीं था। वह इसे यूरोप को जगाने का शंखनाद (वेक अपकॉल) कहता है। उसका कहना है कि मुस्लिम जिहादी ताकतें यूरोप पर कब्जा करती जा रही हैं और पूरे यूरोपवासी सोए हुए हैं।

जैसी खबरें मिल रही हैं, उसके अनुसार नार्वे में दो तरह की भावनाएं उभरती दिखायी दे रही हैं। एक तो करीब 86 लोगों की मौत /जिसमें अधिकांश किशोर हैं/से दुखी और भावाकुल है। वह समझता है कि यह किसी स्वस्थ दिमाग वाले विवेकशील व्यक्ति का काम तो नहीं हो सकता। निश्चय ही यह किसी शैतानी दिमाग वाले या विवेकहीन पागल और नृशंस व्यक्ति का काम है। तो दूसरी तरफ ऐसे भी लोग हैं- जो उसे पागल नहीं समझते और अपने निजी दुःख के बावजूद उसके राजनीतिक विचारों से सहमत होते नजर आ रहे हैं। ऐसी घटनाओं का अध्ययन करने वालों की राय में भी ऐसे लोग पागल नहीं होते। वाशिंगटन में ‘जेन्स टेररिज्म एंड इंसर्जेंसी सेंटर‘ के संपादक विल हर्टले का कहना है कि आतंकी हमले करने वाले ऐसे ‘अकेले भेड़िये‘ भी पागल या कोई मनोरोगी नहीं होते, बल्कि ‘आतंकवादी‘ तो अन्य लोगों की अपेक्षा कुछ अधिक बुद्धिमान और मानसिक दृष्टि से दृढ़ व्यक्ति होते हैं। उनमें ऐसे गुण भी होते हैं, जिनके लिए वे समाज में अत्यंत सम्मानित व्यक्ति भ्ी बन सकते हैं। उदाहरण के लिए लंदन में 7/7 के बमकांड में पकड़ा गया एक व्यक्ति एक प्रशंसित सामाजिक कार्यकर्ता था, जो बच्चों के कल्याण के लिए काम करता था।

इसमें दो राय नहीं कि ब्रीविक जैसे युवक जिहादी आतंकवाद की प्रतिक्रिया में पैदा हो रहे हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि इस्लामी आतंकवादी एकतरफा पूरी दुनिया को रौंदते चले जाएं और उनकी प्रतिक्रिया में उनके जैसा ही कोई संगठन न खड़ा हो। सांस्कृतिक बहुलतावादी केसे यह सोच पा रहे हैं कि कैसे एक समुदाय हमले पर हमले करता जाएगा और बाकी समुदाय के लोग चुपचाप मार झेलते रहें और उन सरकारों और राजनीतिक दलों की भी वाहवाही करते रहेंगे, जो उन जिहादियों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई से इसलिए बचते रहते हैं कि इससे उनका बहुलतावाद का सिद्धांत टूटेगा और उनके मतदाताओं की संख्या घट जायेगी। इसलिए यह बढ़ते इस्लामी आतंकवाद को रोकने में तमाम लोकतांत्रिक, खसकर वामपंथी झुकाव वाली सरकारों की विफलता का भी परिणाम है।

ब्रीविक न तो बर्बर है न संवेदनशून्य। उसने इंटरनेट पर अपनी 15 पृष्ठों की जो डायरी पेश की है (जिसे उसका घोषणा पत्र कहा जा रहा है) उसका उल्लेख करते हुए ‘नार्वेजियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन अफेयर्स‘ के आतंकवाद विशेषज्ञ हेल्गे लुरास ने कहा है कि उसने अपनी आक्रामकता बढ़ाने के लिए ढेरों स्टोरायड की गोलियां खा रखी थी और लोगों की चीख या दया की भीख उसके कानों तक नहीं पहुंचे, इसके लिए उसने ‘इयरफोन‘ से तेज संगीत सुनने की तैयारी कर रखी थी। यह ‘मैनीफेस्टो‘ उसने ओस्लो पर हमले के कुछ घंटे पहले ही नेट पर डाला था। इसका मतलब है कि न तो वह मानसिक रोगी है, न राक्षस। अपने ‘मैनीफेस्टो‘ में वह कहता है कि उसके लिए उन लोगों को मारना कितना मुश्किल है, जिनके प्रति उसे गहरी सहानुभूति है। कोई मनोरोगी इस तरह के संघर्ष से नहीं गुजरता।

22 जुलाई का यह हमला ब्रीविक की 9 वर्षों की सोच और योजना का परिणाम है। उसने अपनी बात कहने या यूरोप को जगाने का जो तरीका अपनाया, निश्चय ही कोई भी व्यक्ति उसका समर्थन नहीं कर सकता। लेकिन जब तक कोई दहलाने वाली घटना न हो, तब तक सरकारों या राजनीतिक दलों के कानों पर कहां कोई जूं रेंगती है। ‘इक्सट्रीम राइट‘ यानी दक्षिणपंथी अतिवादियों के मामले में विशेषज्ञ समझे जाने वाले मैथ्यू फील्डमैन (यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थएन में इतिहास के प्रवक्ता) का कहना है कि इस तरह की सामूहिक हत्या करके ब्रीविक केवल दक्षिणपंथी कट्टरपंथियों के लिए जनसंपर्क का काम कर रहा है। उन्हें इसका पक्का विश्वास है कि इस तरह का हमला उसने अपने ऑनलाइन ‘मैनीफेस्टो‘ तथा ‘वीडियो‘ के प्रचार के लिए किया। उसने हमले के ठीक पहले उन्हें नेट पर डाला। यदि वह इस घटना के दो-चार हफ्ते पहले से उसे डाल देता, तो कोई उस पर ध्यान ही न देता और वह नेट के जंगल में खो जाता। उन्होंने ‘हेरल्ड‘ के साथ बातचीत में बताया कि यह ‘जिहादी इस्लामिज्म‘ का ईसाई जवाब ‘क्रुसेडिंग क्रिश्चियनिज्म‘ है।

उसका यह 1500 पेजों का ‘मैनिफेस्टो‘ ‘इधर-उधर‘ से इकट्ठा किये गये विचारों को जोड़कर तैयार किया गया है। ब्रीविक का विश्वास है कि यूरोप की वामपंथी झुकाव वाली सरकारें जिहादी इस्लामियों को यूरोप पर कब्जा करने दे रही हैं, इसलिए यदि ‘क्रिश्चियनिटी‘ को ‘इस्लाम‘ से बचाना है, तो पहले इन दुश्मनों से लोहा लेना है, जो जाने अनजाने ‘जिहादियों‘ की मदद कर रहे हैं। उसका कहना है कि ‘विचार मानव जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।‘ इसलिए हमें ‘अपनी विचार व अपनी संस्कृति‘ को बचाने के लिए अपने जीवन या प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार रहना चाहिए।‘ उसने अपने घोषणा पत्र में यह साफ संकेत दिया है कि उसने ‘यूतोया‘ द्वीप में सत्तारूढ़ लेबर पार्टी के युवाओं को क्यों मारा। उसने लिखा है, लेबर पार्टी अपनी ‘बहुसांस्कृतिक नीतियों तथा मुस्लिमों को देश में आने की खुली छूट देने के कारण स्वतः ‘मृत्युदंड‘ की अधिकारी है। यह वास्तव में यूरोप के साथ विश्वासघात है।

ब्रीविक ने प्राचीन ईसाई इतिहास लड़ाकू पात्रों को खोजकर अपने आदर्श के रूप में स्थापित किया है। मध्यकाल में मुस्लिम आधिपत्य से अपनी पवित्र भूमि छुड़ाने के लिए ईसाई लड़ाकों ने जो संगठन बनाया था, उसे ‘नाइट्स टेम्पलर‘ की संज्ञा दी गयी थी। ब्रीविक व उसके जैसे अन्य युवक अब ताजा मुस्लिम आक्रमण का मुकाबला करने के लिए उसी ‘नाइट्स टेम्पलर‘ को पुनर्जीवित कर रहे हैं।

ब्रीविक को यदि आतंकवादी कहें, तो वह एक असाधारण आतंकवादी है। आतंकवादी प्रायः समूह में काम करते हैं, लेकिन अब तक की जांच पड़ताल में पता चला है कि ब्रीविक ने अकेले ही इतने बड़े हमले की योजना बनायी, उसका सैद्धांतिक आधार तैयार किया और फिर उसे कर दिखाया। यद्यपि उसने पुलिस के समक्ष दावा किया है कि अभी भी देश में दो और ईसाई कट्टरपंथी ‘सेल‘ हैं, जिनका संबंध ब्रिटिश दक्षिण पंथी ईसाई संगठन ‘इंग्लिश डिफेंस लीग‘ के साथ संबंध है, लेकिन इनका कोई पता नहीं चल सका है। लीग ने भी इस बात से इनकार किया है। जाहिर है यह भयावह हमला अकेले उसकी ही कारस्तानी है।

अब इस हमले के बाद इतना तो मानना ही पड़ेगा कि उसने दुनिया के हर कोने में ‘जिहादी इस्लाम‘ के खिलाफ एक अनुगूंज तो पहुंचा ही दी है। उसने अपने 1500 पेजों के मैनीफेस्टों में करीब 102 पेज भारत की स्थिति पर खर्च किये हैं और यहां पैदा हो रही जिहादी चुनौतियों और हिन्दुओं की दुर्दशा का उल्लेख किया है। इस उल्लेख के आधार पर यहां इस देश के वामपंथी व वामपंथी झुकाव वाले मध्यमार्गी राजनेताओं व बुद्धिजीवियों ने उसे यहां के ‘हिन्दू कट्टरपंथियों‘ के साथ भी जोड़ने की कोशिश की है।

भारत की राजनीतिक व सामाजिक सोच भी कमोबेश यूरोप जैसी ही है। यहां भी जिहादी कट्टरवाद को बढ़ावा देने में ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद‘ की अहम भूमिका रही है। यह इसी विचारधारा का परिणाम है कि हमारे देश का गृहमंत्री ‘इस्लामी कट्टरतावाद‘ और ‘हिन्दू कट्टरतावाद‘ को एक ही तराजू पर तौल रहा है। यहां के वामपंथी राजनेता व बुद्धिजीवी ही नहीं, कांग्रेस जैसी मध्यमार्गी पार्टी के नेता भी इस्लामी कट्टरतावाद यानी अल्पसंख्यक कट्टरतावाद के मुकाबले हिन्दू कट्टरतावाद या बहुसंख्यक कट्टरतावाद को अधिक बड़ा खतरा बताते आ रहे हैं। वे यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि छिटपुट दिखायी देने वाला हिन्दू कट्टरतावाद केवल इस्लामी कट्टरतावाद की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ कट्टरतावाद है। तथाकथित हिन्दू कट्टरतावादी हो ही नहीं सकता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो दिल्ली में सेकुलर सरकार नहीं बन सकती थी। कट्टरपंथी मुसलमानों ने हिंसा के बल पर अपना मजहबी देश पाकिस्तान बना लिया, लेकिन यहां के हिन्दू बहुसंख्यकों ने हिन्दुओं को हिन्दुस्तान नहीं बनाया, बल्कि यहां एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष शासन की स्थापना की, जहां अल्पसंख्यक यानी मुसलमानों को बहुसंख्यकों यानी हिन्दुओं से भी अधिक अधिकार प्राप्त हैं। इसी तरह से यूरोप व अमेरिका के ईसाइयों ने भी मध्यकालीन ‘क्रूसेड‘ को इतिहास में ही दफन करके एक बहुलतावादी राजनीतिक व सामाजिक संस्कृति को स्वीकार किया। अब इस बहुलतावाद को तोड़ने का काम ‘जिहादी‘ कर रहे हैं ‘क्रुसेडवादी‘ नहीं। ‘क्रुसेडवाद‘ इस जिहादी आक्रामकता की प्रतिक्रिया में पैदा हो रहा है और तथाकथित सेकुलर सरकारें जिहादी आक्रामकता पर तो कोई अंकुश लगा नहीं पा रही हैं, उल्टे उसकी प्रतिक्रिया में फिर से खड़े हो रहे ‘नाइट्स टेम्पलर‘ को ‘जिहादी इस्लाम‘ से भी अधिक खतरनाक बता रहे हैं।

ब्रीविक ने पहली बार सीधे इस्लामी कट्टरतावाद पर हमला न करके उसको पोषित करने वाली राजनीतिक व्यवस्था पर हमला किया है। आज दुनिया की ‘बहुलतावादी संस्कृति‘ में विश्वास करने वाली सरकारों को समझ लेना चाहिए कि यदि उन्होंने मिलकर ‘जिहादी कट्टरवाद‘ को पराजित न किया, तो ‘नाइट्स टेम्पलर‘ के पुनरोदय को भी रोका नहीं जा सकेगा। इसका सीधा परिणाम होगा लगभग विश्वव्यापी गृहयुद्ध। ब्रीविक ने यूरोप को ही नहीं भारत को भी एक संदेश दिया हे, जिस पर यहां के सही सोच वाले राष्ट्रवादियों को ही नहीं, तथाकथित सेकुलरवादी मध्यमार्गियों को भी विचार करना चाहिए। यदि भविष्य का गृहयुद्ध बचाना है, तो जिहादी मानसिकता को पराजित करने के लिए स्वयं राज्य सत्ता (स्टेट) को आगे आना होगा। और यदि वह इसमें असफल रही, तो भवितव्य को कोई रोक नहीं सकेगा और आने वाली पीढ़ियों को मध्यकालीन संघर्षों के दौर से गुजरना पड़ेगा।

07/08/2011

रविवार, 6 दिसंबर 2009

ओबामा की अफगान नीति सफल होने वाली नहीं

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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अफगानिस्तान व पाकिस्तान के जेहादी गढ़ों को ध्वस्त करने के लिए अब से डेढ़ साल का समय निर्धारित किया है। इस काम को पूरा करके अमेरिकी सेनाएं जुलाई 2011 से वापसी का रुख कर लेंगी। ऐसा लगता है कि अफगानिस्तान से अधिक उन्हें 2012 के राष्टï्रपति चुनाव की चिंता सता रही है, तभी वह चाहते हैं कि उसके पहले ही अफ गानिस्तान का लक्ष्य पूरा कर लिया जाए और सेना घर वापसी शुरू कर दे, लेकिन सवाल है क्या उनका यह महत्वाकांक्षी सपना पूरा हो सकेगा?

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अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने बड़े लंबे चिंतन-मनन एवं विचार-विमर्श के बाद गत मंगलवार (1 दिसंबर 2009) की शाम अपनी नई पाक-अफगान नीति की घोषणा की। इस नीति को लेकर सभी चकित हैं । अमेरिकी दैनिक 'वाशिंगटन पोस्ट ने इसे ज्वार-भाटा नीति (सर्ज देन लीव पॉलिसी) कहा है। ओबामा ने घोषणा की है कि अफगानिस्तान में अलकायदा एवं तालिबान आतंकवादियों पर हमला तेज करने के लिए 30,000 और अमेरिकी सैनिक भेजे जाएंगे। उनके सहयोगी देश भी करीब 10 हजार अतिरिक्त सैनिक भेज सकते हैं। यह तो ठीक, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी घोषणा की है कि जुलाई 2011 से वहां से अमेरिकी सैनिकों की वापसी भी शुरू हो जाएगी। इस करीब डेढ़ साल के समय में उन्हें उम्मीद है कि पाकिस्तान व अफगानिस्तान सरकार के सहयोग से इन जिहादी आतंकवादियों के सभी सुरक्षित गढ़ ध्वस्त कर दिये जाएंगे तथा उन्हें अंतिम रूप से पराजित कर दिया जाएगा। इसके बाद उनके पास ऐसी कोई क्षमता नहीं रह जाएगी कि वे किसी सरकार का तख्ता पलटने की कोशिश कर सकें।
क्या कमाल की समयबद्ध योजना है। दुनिया के इतिहास में शायद ही किसी कमांडर ने किसी युद्ध के बारे में ऐसी सुनिश्चित घोषणा करने का साहस किया हो। आश्चर्य की बात है कि इस घोषणा में उस रणनीति का कोई जिक्र नहीं है, जिसके द्वारा इस युद्ध को निर्णायक अंत तक पहुंचा दिया जाएगा, बस एक तिथि है जिसके पहले सब कुछ हो जाएगा। निश्चय ही अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को सुनिश्चित वापसी के लिए यह तिथि 2012 के राष्ट्रपतीय चुनाव को ध्यान में रखकर घोषित की गयी है। अमेरिकी जनता अफगानिस्तान में लम्बे सैनिक उलद्ब्रान को लेकर बेचैन है, इसलिए वह चाहती है कि अमेरिका वहां से जल्दी से जल्दी बाहर आ जाए। ओबामा साहब के सामने इस तरह दोहरी समस्या है, एक तो अमेरिकी जनता की चिन्ता को दूर करना, दूसरे अफगानिस्तान में अमेरिका के घोषित शत्रु अलकायदा व तालिबान के गढ़ को तोडऩा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने 30 अरब डॉलर के अतिरिक्त धन की भी घोषणा कर दी है। लेकिन अहम सवाल है कि क्या ओबामा अपने इस घोषित लक्ष्य को पूरा कर पाएंगे।
युद्धनीति वह होती है, जिसकी घोषणा से शत्रु समूह में भय व चिंता फैल जाए, मगर ओबामा साहब की इस घोषणा से पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान में जश्न मनाया गया और शैंपेन की बोतलें खोली गयीं। अलकायदा और तालिबान नेता अभी तक तो यह रणनीति बना रहे थे कि अमेरिकी फौजों को कैसे वहां से भगाया जाए, लेकिन अब इस चिंता की जरूरत ही नहीं है। उन्हें तो अब जाना ही है, इसलिए यदि 18 महीने लडऩे के बजाए चुपचाप कहीं छिप के बैठ जाएं, तो भी शत्रु पराजित होकर भाग जाएगा। पाकिस्तान की सेना तो कब से उस दिन की प्रतीक्षा में है कि अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान छोड़कर वापस जाने की घोषणा करे। उनकी अमेरिका के साथ सहयोग की सबसे बड़ी रणनीति ही यही है कि आखिर कब तक अमेरिकी सैनिक यहां टिकेंगे। कब तक अमेरिकी जनता युद्ध के इस भारी खर्च को बर्दाश्त करेगी। एक न एक दिन तो उसे जाना ही होगा। तब तक केवल यह प्रयास करना है कि पाकिस्तान बचा रहे, उसकी सेना सुरक्षित रहे और उसके परमाणु अस्त्र उसके हाथ में बने रहें। यदि ये तीन बने रहे, तो अफगानिस्तान तो एक दिन उसके कब्जे में आएगा ही।
पाकिस्तान और उसके गुर्गे तालिबान इसी रणनीति के तहत अमेरिका के साथ भारत को भी वहां से भगाना चाहते हैं। क्योंकि भारत यदि वहां बना रहा, तो वह पाकिस्तान का सारा खेल बिगाड़ देगा। इसीलिए पाकिस्तान, अफगानिस्तान में ऐसी सरकार चाहता है, जो पाकिस्तान परस्त हो और भारत को एक पल वहां न ठहरने दे। तालिबान नेता पूर्व राष्ट्रपति मुल्ला उमर को उसने इसीलिए सुरक्षित बचाकर रखा है कि अमेरिका के जाने के बाद एक बार फिर वह उमर को अफगान राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठा सके। उसे उमर से बेहतर कोई दूसरा अफगान नेता नहीं मिल सकता, जो अफगानिस्तान को पाकिस्तान के विस्तार के रूप में बदल सके। पाकिस्तानी सूत्रों का यदि भरोसा करें, तो पाकिस्तानी सेना लादेन का सौदा कर सकती है। यानी अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी सुनिश्चित करने के लिए लादेन को अमेरिका के हवाले कर सकती है, किन्तु उमर को किसी भी स्थिति में अमेरिकियों के हाथ नहीं लगने देगी। अब तक यह देखा जा रहा है कि पाकिस्तान ने अलकायदा व तालिबान के दूसरी पंक्ति के बहुत से नेताओं को गिरफ्तार कर रखा है। बहुत अमेरिकी दबाव बढ़ता है, तो उनमें से किसी को उनके हवाले करके अपनी सफ लता दर्ज करा देता है।
अमेरिका की समस्या है कि उसकी गुप्तचर एजेंसी सी.आई.ए. की मुजाहिदीनों के बीच कोई घुसपैठ नहीं है। इसलिए मुजाहिदीनों के बारे में किसी भी सूचना के लिए वह पाकिस्तानी सैन्य गुप्तचर संगठन आई.एस.आई. (इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस) पर निर्भर है। आई.एस.आई. जो उन्हें बता दे, वही उनकी जानकारी। और आई.एस.आई. को इसमें कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि तालिबान के हर कदम की जानकारी उसे रहती है। और ऐसा हो भी क्यों न, तालिबान फौज का गठन करने वाली आईएसआई ही है। सी.आई.ए. किसी सूचना के लिए आईएसआई से जोर जबर्दस्ती तो कर नहीं सकती, इसलिए वह आईएसआई का उपयोग कर सके, इसके बजाए आईएसआई ही उसका उपयोग करती है।
किसी उपद्रवग्रस्त क्षेत्र में व्यवस्था स्थापित करने के लिए जब सेना भेजी जाती है, तो उसका लक्ष्य होता है पहले तो इलाके को उपद्रवियों से खाली कराना, फिर उस खाली हुए इलाके पर अपना नियंत्रण मजबूत करना और उसके बाद उसका निर्माण करना, जिससे शंतिपूर्ण शक्तियां वहां विकसित हो सकें। किन्तु ओबामा की पाक अफगान नीति में इसका घोर अभाव है। ओबामा साहब का कहना है कि पाक-अफगान सीमा अलकायदा की हिंसक कार्रवाइयों का केन्द्र है। पहले उसका गढ़ केवल अफगानिस्तान की सीमा में था, किन्तु अब वह पाकिस्तान की सीमा में भी आ गया है, इसलिए उसके खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान को शामिल करना अनिवार्य हो गया है। इसीलिए इस नीति को पाक-अफगान नीति का नाम दिया गया है। वास्तव में अलकायदा के कारण पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों देशों की सरकारें तथा जनता खतरे में है। मुजाहिदीन पाकिस्तान के परमाणु केन्द्रों पर अब से पहले तीन बार हमला कर चुके हैं। लादेन खुलेआम यह कह चुका है कि वह परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश में है। यदि इनका यह गढ़ तोड़ा न गया, तो ये परमाणु हथियार भी हासिल कर लेंगे और उसका इस्तेमाल करने में भी कतई नहीं संकोच करेंगे। ओबामा ने यह याद दिलाने की कोशिश की कि यह केवल अमेरिका की लड़ाई नहीं है। इसे यह भी नहीं समद्ब्राा जाना चाहिए कि यहां 'नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) की युद्ध क्षमता दावे पर लगी है। वास्तव में यह लड़ाई प्राय: पूरी दुनिया की है और इसके साथ नाटो के सभी सदस्य देशों की सुरक्षा भी दांव पर लगी है। इसलिए उनके देश ने यह संकल्प लिया है कि वह अलकायदा को अफगानिस्तान व पाकिस्तान दोनों ही क्षेत्रों में तोड़ देगा और अंतिम पराजय के गर्त में डाल देगा। उन्होंने कहा कि हम अफगानिस्तान में आतंकवाद के कैंसर को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए आये थे, लेकिन इस कैंसर की जड़ें अब पड़ोस के पाकिस्तानी क्षेत्र में भी फैल गयी है। इसलिए हमें ऐसी रणनीति अपनानी है, जो दोनों तरफ कारगर हो।
ओबामा के इन संकल्पों की तालिबान नेताओं द्वारा खिल्ली उड़ायी गयी है। अफगान तालिबान के एक संगठन 'इस्लामिक एमिरेट्स के द्वारा 'पश्तो में जारी एक वक्तव्य में कहा गया है कि राष्ट्रपति ओबामा आर्थिक संकट से ग्रस्त अमेरिकी जनता की इच्छा तथा मांगों की अनदेखी करके अफगानिस्तान में अपनी जोर आजमाइश करना चाहते हैं। इसी तरह शिराजुद्दीन हक्कानी उर्फ खलीफा (जिसका सुराग देने वाले के लिए 50 लाख डॉलर के इनाम की घोषणा की गयी है) ने भी ओबामा का मजाक उड़ाया है। खलीफा का हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान का सबसे ताकतवर संगठन है, जिसकी स्थापना शिराजुद्दीन के पिता मौलवी जलालुद्दीन हक्कानी ने की थी।
अफगान तालिबानों का कहना है कि अफगानिस्तान ने कभी किसी बाहरी फौज को बर्दाश्त नहीं किया है। उसने रूसियों को यहां से लड़कर भगा दिया, लेकिन अमेरिकी तो बिना लड़े ही भागने के लिए तैयार हैं। ओबामा की इस नीति के समर्थक भी यह स्वीकार करते हैं कि अमेरिका और यूरोप के एक लाख सैनिक यदि अफगानों का अब तक कुछ नहीं बिगाड़ पाए, तो 30 हजार और अमेरिकी सैनिक भी वहां पहुंचकर क्या कर लेंगे। नयी कुमक पहुंचने के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक लाख हो जाएगी और यूरोपीय सैनिकों को मिलकर यह संख्या करीब डेढ़ लाख हो जाएगी, लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं है कि ये डेढ़ लाख सैनिक वहां कोई चमत्कार कर सकेंगे।
ओबामा की नीति समर्थक यह भी मानते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबानों का युद्ध केवल मजहबी या जिहादी ही नहीं है, यह अफगानिस्तान की मुक्ति का भी युद्ध है। यदि ओबामा साहब अमेरिकी सेना को वापस बुला लेंगे, तो इससे तालिबान का आजादी का मुद्दा खत्म हो जाएगा और उनके आतंकी हमलों का कारण समाप्त हो जाएगा। यह बात सही है, लेकिन सवाल है अमेरिका अब अफगानिस्तान को खाली कर देगा, तो क्या फिर वही स्थिति नहीं पैदा हो जाएगी, जब रूसी सेनाएं चली गयीं थीं। तब क्या तालिबान करजई को उसी तरह सरेआम फांसी पर नहीं लटका देंगे, जिस तरह उन्होंने तत्कालीन शासक मोहम्मद नजीबुल्लाह को सरेआम लटका दिया था।
अमेरिका का अफगानिस्तान युद्ध उसके वियतनाम व इराक युद्धों से भिन्न है। वियतनाम में उसकी केवल सैन्य प्रतिष्ठा दांव पर थी और सवाल कम्युनिज्म को हराने का था। उत्तर वियतनाम की लड़ाई केवल स्वतंत्रता की लड़ाई थी। वस्तुत: वे अमेरिका से नहीं लड़ रहे थे, बल्कि अमेरिका उनसे लड़ रहा था। इसलिए वहां से बाहर निकल आने से अमेरिकी हितों को कोई खास क्षति नहीं पहुंचने वाली थी। वियतनाम युद्ध में कोई पड़ोसी देशों की सुरक्षा भी दांव पर नहीं थी। इराक युद्ध में अमेरिका का तेल लोभ हो सकता था, लेकिन असली मसला सद्दाम को सजा देना था, जो खुलेआम अमेरिका जैसी महाशक्ति को मुहचिढ़ाया करता था। सद्दाम मारा गया, बस अमेरिका का काम खत्म हुआ। लेकिन अफगानिस्तान ऐसा नहीं है। अफगानिस्तान में अमेरिका का कोई लोभ नहीं है। उसकी लड़ाई अब किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई है, जिसकी जड़ें केवल पाकिस्तान तक नहीं, जाने कितने और देशों तक फैली हुई हैं। यहां केवल लादेन या उमर की मौत तक भी लड़ाई सीमित नहीं है। यह जिहाद के खिलाफ या यों कहें कि अरबी इस्लामी साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध है। अमेरिका यहां से भागकर अपनी रक्षा नहीं कर सकता। तालिबान व अलकायदा को बिना अंतिम पराजय के गर्त में पहुंचाए वह वहां से हटा, तो दुनिया के किसी कोने में उसके हित सुरक्षित नहीं रह सकते। फिर इस युद्ध में जैसा कि राष्ट्रपति ओबामा ने स्वयं कहा है कि केवल अमेरिका की सुरक्षा या केवल उसके अपने हित ही दांव पर नहीं है, बल्कि उसके सारे सहयोगियों की सुरक्षा दांव पर है। और सच कहें कि यदि अफगानिस्तान में तालिबान विजयी हुए, तो तमाम लोकतांत्रिक शक्तियों पर उनका दबाव बढ़ जाएगा।
इससे जिहादी मनोबल किस तरह बढ़ेगा, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। यह एक खुला तथ्य है कि इन्हीं मुजाहिदीनों ने दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति सोवियत संघ को पराजित किया था और उसकी सेनाओं को अफगानिस्तान छोडऩे पर मजबूर कर दिया था। अब यदि ये अमेरिका जैसी महाशक्ति को भी भगाने में सफल हो जाते हैं, तो फिर ये स्वत: दिग्विजयी बन जाएंगे। इस बात को बार-बार दोहराने का आज कोई अर्थ नहीं रह गया है कि तालिबान की यह फौज अमेरिका की मदद से ही तैयार हुई थी, क्योंकि शीतयुद्ध काल के सारे समीकरण अब उलट-पुलट हो चुके हैं। अब इस इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी समस्या है कि जिहादी ताकतों से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कैसे की जाए।
सच कहा जाए, तो अफगानिस्तान में अमेरिका का कोई निजी हित दांव पर नहीं है, बल्कि उससे अधिक भारत का हित वहां दांव पर लगा हुआ है। जो युद्ध अभी अफगानिस्तान में लड़ा जा रहा है, वह वहां नहीं लड़ा गया, तो उसकी युद्धभूमि भारत बनेगा। क्योंकि तालिबान या जिहादियों के सीधे निशाने पर भारत है। लोगों को शायद ख्याल हो कि अफगानिस्तान में जब तालिबान नेता मुल्ला उमर की सरकार कायम हो गयी थी, तो तमाम तालिबान लड़ाके कश्मीर में भारतीय सीमा के निकट इकट्ठा होने लगे थे। अफगानिस्तान में अमेरिकी हमला शुरू हो जाने के कारण वे फिर यहां से अफगानिस्तान लौटे, अन्यथा उनका लक्ष्य कश्मीर के लिए भारत सरकार के खिलाफ जिहादी संघर्ष तेज करना था। अभी भारत अफगानिस्तान में उसके पुनर्निर्माण के कार्य में लगा है। वह मध्य एशिया से अफगानिस्तान होकर ईरान तक सड़क निर्माण में लगा है। शिक्षा, चिकित्सा तथा उद्योग धंधों के लिए ढांचा तैयार करने की महती जिम्मेदारी वह अपने ऊपर लिए है। इस कार्य से बहुत से उन अफगानों का भी दिल जीत रहा है, जो वहां अमेरिका की उपस्थिति से खफा हैं। लेकिन यह सब पाकिस्तान को फूटी आंखों नहीं सुहा रहा है। इसलिए अब यह भारत की जिम्मेदारी है कि वह अमेरिका को समझाये कि वह अफगानिस्तान से निकलने की जल्दबाजी न करे। उसे अपने देश की जनता को यह समझाना चाहिए कि वह अफगानिस्तान में किस तरह की लड़ाई लड़ रहा है। अभी तो वहां पुलिस, फौज या सुरक्षा का काम अमेरिका संभाले है और निर्माण का कार्य भारत। लेकिन जिस क्षण अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान को खाली किया, उसके अगले ही क्षण भारत का निर्माण कार्य भी ठप्प हो जाएगा, क्योंकि तालिबान उसे चलने नहीं देंगे। भारत वहां पर अफगानिस्तान की सरकारी फौज तैयार करने में लगा है। उसे प्रशिक्षण देने की पूरी जिम्मेदारी भारत पर है, लेकिन डेढ़ साल में वह ऐसी कोई फौज तैयार कर देगा, जो अमेरिकी फौज की जगह ले सके और तालिबान का मुकाबला कर सके। यह प्राय: असंभव ही है। तो क्या अमेरिका अफगानिस्तान को अराजगता के जंगल में छोड़कर चला जाएगा।
ऐसा कहा जा रहा है कि सेना की वापसी की घोषणा केवल अमेरिकी जनता के संतोष के लिए की गयी है, यथार्थ में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है। सेना की वापसी का कार्यक्रम तालिबान और अलकायदा के सारे गढ़ों को नेस्तनाबूद कर दिये जाने पर निर्भर है। यदि वे बने रहते हैं, तो फिर अमेरिकी सेना कैसे वापस हो सकेगी। ओबामा ने अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए पाकिस्तान व अफगानिस्तान दोनों देशों की सरकारों पर दबाव बढ़ाया है। उसने पाकिस्तान को यह चेतावनी भी दी है कि यदि वह तालिबान के सुरक्षित गढ़ों को भेदने का काम ईमानदारी से नहीं किया, तो वह स्वयं इस काम को अपने हाथ में लेगा और मानवरहित द्रोण विमानों के हमले का दायरा बढ़ जाएगा।
यहां ध्यान देने की बात है कि द्रोण विमान जंगल तथा पहाड़ी इलाकों में ही हमले कर रहे हैं। वे शहरी क्षेत्रों पर हमले नहीं कर सकते, क्योंकि उस स्थिति में बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक मारे जाएंगे और यह कोई जरूरी नहीं कि अलकायदा व तालिबान के मुखिया अब तक जंगल व पहाड़ों में ही पड़े हों। जैसी कि खबर है कि क्वैटा के पास एक पूरा कस्बा तालिबान द्वारा खरीद लिया गया है। पाकिस्तानी सेना स्वयं उसकी रखवाली कर रही है।
ओबामा साहब पाकिस्तान के प्रति अधिक उदार है। हो सकता है कि यह उदारता भी रणनीतिक हो, फिर भी जैसी कठोर भाषा उन्होंने अफगान सरकार के लिए इस्तेमाल की है, वैसी पाकिस्तान के लिए नहीं। उन्होंने अफगान राष्ट्रपति हामिद करजयी से साफ कह दिया है कि अब और 'ब्लैंक चेक` नहीं। यानी अब खुद कमर कसो और परिणाम दिखाओ। जबकि उन्होंने पाकिस्तान को अपना रणनीतिक साझीदार बनाने का प्रलोभन दिया है।
पता नहीं ओबामा साहब इस बात को समझ पाते हैं या नहीं, और यदि नहीं समझ पाते तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल है कि पूरा पाकिस्तान ही जिहादी आतंकवाद का गढ़ है। अफगानिस्तान तो उसी का विस्तार है। पाकिस्तान वस्तुत: इस्लामी जिहाद का प्रतीक है, क्योंकि इसका जन्म ही जिहादी हिंसा से हुआ है। यदि अलकायदा और तालिबान को पराजित करना है, तो उन्हें पाकिस्तान को पराजित करना होगा।
पाकिस्तान की जड़ सींचते हुए अफगानिस्तान की शाखाएं काटने से अंतर्राष्ट्रीय जिहादी आन्दोलन पराजित होने वाला नहीं है। जुलाई 2011 तक कैसी स्थिति बनेगी, कहना कठिन है, लेकिन भारत को उसके संभावित परिणामों की तैयारी अभी से शुरू कर देनी चाहिए।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

ओबामा क्यों बिछ गये यों चीन के आगे

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पिछले दिनों चार एशियायी देशों- जापान, चीन, सिंगापुर एवं द. कोरिया- की यात्रा पर थे। इस यात्रा में उनका सर्वप्रमुख पड़ाव चीन का था। बड़ी आशाएं लेकर वह चीन गये थे, लेकिन एक भी पूरी नहीं हो सकीं। चीन का सहयोग पाने के लिए वह उसके सामने बिछ गये, लेकिन चीन ने तनिक भी रियायत नहीं बरती। उलटे उसने अमेरिकी राषट्रपति को अपने एजेंडे पर नचाया। यों, ओबामा की यह पूरी यात्रा ही विफल रही, लेकिन चीन में तो उन्हें भारी कूटनीतिक पराजय का मुंह देखना पड़ा। चीन ने उनका भरपूर राजनीतिक इस्तेमाल किया और बीजिंग में उनकी उपस्थिति को यह प्रदर्शित करने में अधिक उपयोग किया कि वह बाहरी दबावों को किस तरह परे धकेल सकता है और विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति से भी अपनी बातें मनवा सकता है।
आश्चर्य होता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा चीन के आगे इस तरह बिछ गये कि वह जो कुछ कहता गया, सब मानते गये और जितना झुकाता गया, उतना झुकते गये। जापान के सम्राट अकाहितो के आगे वह कहां तक झुक गये, यह तो सभी ने देखा, लेकिन चीन में तो लगता है वह पाणिपात की ही मुद्रा में आ गये थे। फिर भी चीन उनकी किसी अदा पर नहीं पसीजा और उनकी हर उस मांग को ठुकरा दिया, जिसे मनवाने की आशा लेकर वह उसके दरबार में गये थे। ओबामा की इस यात्रा के दौरान चीन ने यह अच्छी तरह प्रदर्शित किया कि बाहरी दबावों का न केवल वह आसानी से मुकाबला कर सकता है, बल्कि विपरीत स्थितियों में भी अपनी बातें पहले मनवा सकता है।
राष्ट्रपति ओबामा एशिया की पहली लंबी यात्रा पर 13 नवंबर को सबसे पहले जापान पहुंचे, वहां से सिंगापुर, फिर सिंगापुर से चीन और वहां से दक्षिण कोरिया। इनमें से दक्षिण कोरिया तो अमेरिका की रियाया ही है, इसलिए उसे तो इस यात्रा के आकलन से बाहर ही कर देना चाहिए। अब यदि बाकी तीन देशों की यात्राओं का मूल्यांकन करें, तो यही कहना पड़ेगा कि तमाम सार्वजनिक लोकप्रियता के बावजूद ओबामा की यह यात्रा पूरी तरह विफल रही।
यों शुरुआत बहुत निराशाजनक नहीं रही। यात्रा के प्रथम चरण में ओबामा जब टोकियो पहुंचे, तो निश्चय ही उनका एक विश्व नेता की तरह स्वागत हुआ। टोकियो की सड़कों पर लोग वर्षा के बावजूद उनके स्वागत में खड़े थे और नारे लगा रहे थे। यहां वह जापान के सम्राट अकाहितो से एकदम कमर तक झुक कर (कोर्निस की मुद्रा में) मिले। जापानी संस्कृति में झकने का अर्थ सम्मान प्रकट करना होता है। जितना अधिक झुकना उतना अधिक सम्मान। तो ओबामा साहब अधिकतम सम्मान प्रदर्शित करने के लिए कमर तक झुक गये। एक बुजुर्ग राष्ट्र प्रमुख को सम्मान देना कतई अनुचित नहीं, लेकिन ओबामा साहब ने ध्यान नहीं रखा कि अकाहितो जापानी राजशाही के अवशिष्ट प्रतीक हैं, जबकि वह स्वयं दुनिया के एक सर्वाधिक शक्तिशाली लोकतंत्र के प्रधान हैं। झुकें , लेकिन झुकने की भी तो कोई सीमा होनी चाहिए। खेद की बात यह है कि इतना झुकना भी जापानी नेताओं के साथ बातचीत में कोई काम नहीं आया। 'कांतेई(जापानी ह्वाईट हाउस) में बंद दरवाजों के पीछे जब प्रधानमंत्री यूकिओ हातोयामा के साथ बातचीत शुरू हुई, तो ओबामा को पता चला कि यहां का वातावरण टोकियो की सड़कों की तरह का नहीं है। अमेरिका, जापान के फ्यूटेन्मा स्थित अपने नौसैनिक एवं वायु सैनिक अड्डे के दक्षिणी द्वीप पर स्थापित करना चाहता है, लेकिन जापान इसके लिए सहमत नहीं है। वास्तव में जापान इस पुराने अड्डे को ही बंद कराना चाहता है, क्योंकि अब यह अमेरिकी अड्डा देश में बेहद अलोकप्रिय हो चुका है। ऐसे में नये अड्डे की स्वीकृति एक मुश्किल काम है, जबकि अमेरिका के लिए यह आवश्यक है। मतभेदों की गहराई को देखते हुए दोनों पक्षों ने इस मुद्दे पर विचार के लिए एक 'कार्यदल बनाने का निर्णय लेकर फिलहाल बातचीत को टाल दिया। वस्तुत: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने जापान को उसके सैन्य अधिकार से वंचित कर दिया और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। जापान को इसका लाभ भी हुआ, क्योंकि उसे रक्षा की चिंता छोड़कर अपने आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने का पूरा मौका मिला। लेकिन इससे उसका स्वाभिमान अब तक आहत बना हुआ है, इसलिए हर जापानी चाहता है कि जापान को स्वतंत्र सैन्य विकास का अवसर मिले और अमेरिका अपनी सेना पूरी तरह से वहां से हटा ले। जापानी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका और जापान के बीच सबसे बड़ा अकेला द्विपक्षीय सवाल यही है कि शीत युद्धकालीन उनके रक्षा गठबंधन को आज के समय में कैसे प्रासंगिक बनाये रखा जाए, जबकि बढ़ती चीनी शक्ति ने इस क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बिल्कुल बिगाड़ दिया है। किन्तु दोनों ही देश इस सवाल से आंखें चुराते नजर आते हैं।
ओबामा का अगला पड़ाव सिंगापुर था, जहां 'एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग सम्मेलन (एशिया पैस्फिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन कांफ्रेंस) में शामिल होना था। इस सम्मेलन ने इस वर्ष जो सुर्खियां बटोरीं वे निश्चय ही अमेरिकी पसंद की नहीं होंगी। इस संगठन में चीन और जापान भी शामिल हैं। इन देशों ने जल्दबाजी में बुलायी गयी एक सुबह नाश्ते की बैठक में इसी बात की पुष्टि की कि 'मौसम में बदलाव के सवाल पर अगले महीने कोपेनहेगेन में जो सम्मेलन होने जा रहा है, उसके पूर्व वे अपने मतभेदों को दूर नहीं कर सकेंगे।
यहां से ओबामा बीजिंग पहुंचे। वहां भी उनका बाहर स्वागत सत्कार बहुत शानदार था। चीन सरकार ने उनके सम्मान में एक भव्य भोज का भी आयोजन किया। सब कुछ ऐसा कि ओबामा अभिभूत थे। पर चीनी नेताओं ने ओबामा की कूटनीतिक शिथिलता का पूरा फायदा उठाया और उनसे चीन की सारी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का समर्थन कराने के बावजूद एक भी अमेरिकी मांग स्वीकार नहीं की। उन्होंने केवल उसी अमेरिकी प्रस्ताव को स्वीकार किया, जो चीन के हित में था, बाकी सारे मसलों पर टका सा जवाब दे दिया।
अमेरिकी दैनिक न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि 'चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के साथ 6 घंटे की बैठक, दो भोज तथा 30 मिनट की न्यूज कांफ्रेंस के दौरान- जिसमें हू ने किसी को सवाल करने की इजाजत नहीं दी थी- राष्ट्रपति ओबामा का मुकाबला एक ऐसे तेजी से उभर रहे चीन से हुआ, जो अमेरिका को केवल नकारने में अधिक रुचि रखता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि चीन ने अमेरिकी एजेंडे में शामिल अधिकांश बातों को नकार दिया।
अमेरिकी एजेंडे में तीन प्रमुख मुद्दे थे। एक तो ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम नियंत्रण। दूसरा चीनी मुद्रा युआन का मूल्य सही करना और तीसरा मानवाधिकारों का सम्मान, जिसमें तिब्बत का मसला भी शामिल था। चीन ने इनमें से किसी भी अमेरिकी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। राष्ट्रपति हू ने ईरान पर संभावित प्रतिबंध की सार्वजनिक तौर पर कोई चर्चा नहीं की। उन्होंने चीनी मुद्रा का मूल्य ठीक करना भी स्वीकार नहीं किया। चीन जानबूद्ब्राकर अपनी मुद्रा युआन का विनिमय मूल्य उसके वास्तविक मूल्य से कम रखे है जिससे कि उसका माल विदेशों में सस्ता पड़े और निर्यात को प्रोत्साहन मिले। उसकी इस नीति के कारण अमेरिका को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है, क्योंकि चीनी माल वहां सस्ते पड़ रहे हैं और दोनों देशों का व्यापारिक संतुलन चीन की तरफ द्ब्राुका हुआ है। यानी चीन अमेरिका को निर्यात अधिक करता है आयात कम। और मानवाधिकार के सवाल पर तो चीन ने संयुक्त घोषणापत्र में डंके की चोट पर कहा है कि इस मुद्दे पर दोनों देशों में मतभेद हैं यानी वह मानवाधिकार की अमेरिकी अवधारणा को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
चीन ने ओबामा की यात्रा का ऐसा सुनियोजित एवं सूक्ष्म प्रबंध किया था कि इसमें चीनी मत की पुष्टिï हो और अमेरिकी विचार चर्चा में भी न आने पाएं। चीन ने ऐसी व्यवस्था की कि ओबामा ऐसे बयान दें जिससे चीनी नीतियों की पुष्टिï व उसके उद्देश्यों का समर्थन हो। उसने बड़ी चतुराई से ऐसा कुछ किया कि मानवाधिकार तथा चीनी मुद्रा जैसे विषयों पर कोई चर्चा न हो। कार्नेल यूनिवर्सिटी में चीन मामलों के विशेषज्ञ ईश्वर एस. प्रसाद के अनुसार चीन ने बड़े अद्भुत कौशल से सार्वजनिक चर्चा को चीनी मुद्रा नीति के दुनिया पर पड़ रहे खतरनाक प्रभाव से हटाकर अमेरिका की ढीली वित्तीय नीति तथा उसकी संरक्षणवादी प्रवृत्ति की ओर मोड़ दिया।चीन के ऐसे प्रबंध के कारण ओबामा की इस चीन यात्रा से चीन को यह प्रदर्शित करने का बेहतर अवसर मिला कि किस तरह वह बाहरी दबावों को बिना प्रयास दूर धकेल सकता है और अमेरिका का अपना एजेंडा चर्चा से बाहर रह गया।
अपनी यात्रा शुरू करते ही सबसे पहले ओबामा ने यह घोषणा की कि तिब्बत चीन का अंग है। चीन को प्रसन्न करने के लिए ही उन्होंने वाशिंगटन में तिब्बती नेता दलाई लामा से मिलने से इनकार कर दिया था। ओबामा के चीन पहुंचने पर अमेरिकी पक्ष से कहा गया कि राष्ट्रपति चीनी युवाओं से मुलाकात करना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि इस मुलाकात को टीवी पर दिखाया जाए और उसे नेट पर भी ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाए। चीन ने इसकी भी व्यवस्था कर दी। शंघाई पहुंचने पर ओबामा को युवाओं से मिलने का मौका दे दिया गया, किन्तु इसमें सामान्य छात्रों के बजाय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को प्रमुखता से पेश किया गया। सरकार ने इसे शंघाई टीवी पर प्रसारित किये जाने की भी सुविधा दे दी। ओबामा ने युवाओं को प्रभावित किया, लेकिन मानवाधिकारों व अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर बहुत संभल कर बोले। उन्होंने 'नेट पर मुक्त सूचना प्रवाह का भी समर्थन किया, लेकिन काफी सावधानी के साथ जैसे यह कहा कि हर देश की अपनी संस्कृति होती है, अपनी आवश्यकता होती है, जिसके अनुसार वह अपनी व्यवस्था कर सकता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि चीन में नेट पर जो सूचनाएं प्राप्त होती है वे सरकारी तंत्र की छनाई के बाद ही आ पाती है। ओबामा ने यह जरूर कहा कि मुक्त सूचना प्रवाह से किसी भी देश या समाज की शक्ति और बढ़ सकती है मगर उन्होंने चीनी व्यवस्था की कोई निन्दा आलोचना नहीं की। उनकी नजर अगले दो दिन की उन मुलाकातों पर अधिक थी जो चीनी नेताओं के साथ होने वाली थी।
ओबामा असल में बड़ी आशाएं लेकर चीन की इस यात्रा पर गये थे। आर्थिक मंदी के कारण संकट के दौर से गुजर रहे अमेरिका के लिए चीन एक उद्धारक देश नजर आ रहा था। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा साहूकार है और सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार भी। ऐसे में चीन की थोड़ी सी रियायत भी अमेरिका के लिए काफी मददगार सिद्ध हो सकती थी किन्तु चीन ने ओबामा की राई रत्ती नहीं सुनी।
ऐसे में सच कहा जाए तो ओबामा की इस यात्रा के दौरान अमेरिका के हाथ कुछ नया नहीं लगा। यद्यपि ओबामा सरकार के अधिकारियों का दावा है कि राष्ट्रपति महोदय जिन लक्ष्यों को लेकर यात्रा पर गये थे उन्हें पूरा कर लिया गया है, लेकिन इस दावे की पुष्टि के लिए उनके पास कोई प्रमाण नहीं है। उनके अनुसार ओबामा की चीनी नेताओं के साथ बातचीत के बाद जारी पांच सूत्रीय संयुक्त विज्ञप्ति में अनेक मसलों पर दोनों देशों ने मिलकर काम करने का संकल्प लिया है। बयान में कहा गया है कि ओबामा और हू जिंताओ आपस में नियमित रूप से बातचीत करते रहेंगे और दोनों देश एक दूसरे की रणनीतिक चिन्ताओं की ओर अधिक ध्यान देंगे। बयान में यह भी कहा गया है कि दोनों देश आर्थिक मामलों, ईरान तथा मौसम में बदलाव के मसलों पर साझीदार की तरह कार्य करेंगे।
संयुक्त वक्तव्य के इन वाक्यों को देखकर कोई भी कह सकता है कि इनमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो अमेरिका के पक्ष में हो बल्कि इसमें अमेरिका को चीन के पक्ष में द्ब्राुकाने का प्रयत्न है। कूटनीतिक विशेषज्ञ जानते हैं कि ऐसी शब्दावलियों का क्या अर्थ होता है। यहां मुख्य सवाल यह है कि चीन की नाराजगी से बचने के लिए अब ओबामा ने वाशिंगटन में दलाई लामा से मिलने से इनकार किया उस समय की स्थिति के मुकाबले क्या चीन या किसी अन्य एशियायी देश में ओबामा अपना अमेरिकी एजेंडा कुछ भी आगे बढ़ाने में सफल हुए हैं। जवाब नकारात्मक ही मिलेगा।
जापान में उनके रवैये से लगता है कि ओकीनावा में अमेरिकी सैनिक अड्डा बनाने के सवाल पर अमेरिकी रुख और नरम हुआ है। सिंगापुर के क्षेत्रीय सम्मेलन में अमेरिका की एक और सर्वोच्च प्राथमिकता वाली विदेशनीति को आघात लगा जब उन्होंने वहां स्वीकार किया कि 'वैश्विक तपन (ग्लोबल वार्मिंग) के खिलाफ लड़ाई का कोई समझोता इस वर्ष संभव नहीं है। ईरान के मसले पर अमेरिकी अधिकारी रूस के राष्ट्रपति दिमित्र ए. मेद्वेदेव को तो यह कहने के लिए तैयार कर ले गये कि 'यदि बातचीत विफल हो जाती है तो ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों के सवाल पर उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं है।लेकिन यही बात ओबामा चीन से नहीं कहला सके। जबकि यह पता है कि ईरान के विरुद्ध किसी प्रतिबंध के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के लिए चीन की पूर्वानुमति आवश्यक होगी। चीन ने इस मसले पर अमेरिका के साथ साझीदार के तौर पर काम करने की बात तो की है, लेकिन साथ ही उसने यह भी कहा है कि 'ईरान नाभिकीय विवाद को बातचीत और सलाह मशविरे से हल किया जाना चाहिए।इतना ही नहीं संयुक्त वक्तव्य में हू ने यह भी कहा है कि 'बातचीत के दौरान हमने राष्ट्र पति ओबामा के समक्ष यह स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय परिस्थितियों की अपनी भिन्नता के कारण हम दोनों के लिए यह स्वाभाविक है कि कुछ मुद्दों पर हम असहमत रहें।
'व्हाइट हाउस के कुछ अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि ईरान के मामले में हम हू जिंताओ से वह नहीं प्राप्त कर सके जो हम चाहते थे, किन्तु ओबामा का तरीका दीर्घकाल में फलदायी होगा। हम यह आशा नहीं कर रहे हैं कि वे इस मामले का नेतृत्व करेंगे या कोई धारा में बदलाव ला देंगे, हम तो केवल यह चाहते हैं कि वे अड़ंगा लगाने का काम न करें। यदि यही लक्ष्य था तो भी चीन की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं था कि वह अमेरिकी रास्ते में अड़ंगा नहीं डालेगा।
संयुक्त वक्तव्य में कुछ बातों को अनावश्यक रूप से प्रमुखता से डाला गया। जैसे कि दक्षिण एशिया के बारे में चीन को दिया गया बेहतर भूमिका निभाने का आमंत्रण। अमेरिका को अच्छी तरह मालूम है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में चीन पूरी तरह पाकिस्तान के साथ है और अफगानिस्तान के प्रति भी चीन की वही नीति है जो पाकिस्तान की है फिर ओबामा साहब को यह जरूरत क्यों पड़ी कि वह संयुक्त बयान में यह घोषित करे कि चीन और अमेरिका मिलकर दक्षिण एशियायी देशों में शांति के लिए काम करेंगे। वास्तव में चीन दक्षिण एशिया में अपनी राजनीतिक भूमिका बढ़ाना चाहता है इसलिए उसने ओबामा को इसके लिए तैयार कर लिया कि दक्षिण एशियायी मामलों यानी भारत पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के मामलों में वे मिलकर काम करेंगे।
संयुक्त वक्तव्य के इस अंश पर भारत की गहरी आपत्ति के बाद चीन व अमेरिका दोनों ने अपनी-अपनी तरफ से सफाई दी है, लेकिन सवाल है ऐसे मुद्दे को संयुक्त वक्तव्य में डाला ही क्यों गया जिस पर बाद में सफाई देनी पड़े, जबकि अमेरिका को तथा राष्ट्रपति ओबामा को यह पता है कि पाकिस्तान के मामले में भारत कितना अधिक संवेदनशील है। भारत की नीति शुरू से ही पाकिस्तान से सम्बद्ध मामले में किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप के खिलाफ है। फिर इसका क्या औचित्य था कि ओबामा साहब दक्षिण एशिया के उस देश के मामले में चीन को हस्तक्षेप करने के लिए आमंत्रित करें जिन्हें वह भविष्य के लिए अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक साद्ब्राीदार मानते हैं।
अमेरिकी अधिकारी कह रहे हैं कि भारत ने इस संयुक्त वक्तव्य में उससे कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया है जितना कि उसमें लिखा गया है। लेकिन कूटनीतिक वक्तव्यों में पंक्तियों के बीच में पढऩा कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं। भारत का यह सवाल करना कुछ बहुत नाजायज तो नहीं कि संयुक्त वक्तव्य में इन वाक्यों की जरूरत क्या थी। जाहिर है कि इसका आग्रह चीन की तरफ से किया गया होगा, जिसे अमेरिकी पक्ष ने सहजता से स्वीकार कर लिया। जाहिर है इस मामले में भी चीन के हाथों ओबामा ही पिटे। उन्होंने अनावश्यक रूप से उन बातों को भी संयुक्त वक्तव्य में शामिल होने दिया, जिसे लेकर उनका एक मित्र देश भारत व्यथित हो सकता है।
अब यदि तटस्थ दृष्टिï से मूल्यांकन करें, तो इसमें ओबामा का कोई दोष नहीं, यह उनके स्वभाव का दोष है। वह समद्ब्राते हैं कि विनम्रता तथा मधुरता से पूरी दुनिया का दिल जीता जा सकता है। उन्होंने यह सीखा कि जापान में झुकना आदर सूचक है, तो वह सम्राट अकाहितो के सामने कमर तक झुक गये। शायद उन्होंने सोचा होगा कि इससे सारे जापानी खुश हो जाएंगे। इसी तरह वह सऊदी अरब के शाह के सामने द्ब्राुके थे। वहां भी उन्होंने यही सोचा होगा कि इससे पूरा इस्लामी जगत उनका मुरीद हो जाएगा। चीन पहुंचकर भी उन्होंने वह सारी बातें की, जो चीन को अच्छी लगें और हर चीनी इच्छा को स्वीकार कर लिया। शायद यह सोचकर कि चीन वास्तव में अमेरिका का सहयोगी बन जाएगा। उन्होंने प्रशांत के दोनों तटों के इन दो महान देशों का हवाला भी दिया और उनके बीच घनिष्ठ सहयोग की बातें की, लेकिन चीनी नेता ऐसे किसी दबाव में नहीं आए। उन्हें दुनिया की पहली महाशक्ति बनना है, तो अमेरिका को पछाड़कर ही आगे बढऩा होगा, उसे साथ लेकर नहीं।
कोई भी बड़ा राजनेता जब किसी देश की यात्रा पर जाता है, तो वह पहले से इसकी पृष्ठïभूमि बना चुका रहता है कि इस यात्रा से उसे क्या उपलब्धि होगी, लेकिन ओबामा ने शायद अपनी इस यात्रा के पूर्व ऐसी कोई तैयारी नहीं की थी। उन्हें शायद अपने करिश्मों पर भरोसा था। शायद उन्हें यह नहीं पता था कि चीन ऐसे करिश्मों से प्रभावित नहीं होता।
हो सकता है, ओबामा अपनी इस यात्रा से कुछ सबक लें। चीन के आगे पूरी तरह बिछकर उन्होंने देख लिया है। निश्चय ही अब उन्हें बेहतर विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। यहां उसकी आवश्यकता नहीं है कि वह एकाएक अकड़कर खड़े हो जाएं और प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति की घोषणा कर दें, लेकिन यदि उनमें जरूरी राजनीतिक संवेदनशीलता है, तो उन्हें इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि एशिया में कौन अमेरिका का सहयोगी हो सकता है, कौन प्रतिस्पर्धी। चीन अमेरिका का आर्थिक साझीदार बन सकता है, किन्तु रणनीतिक तौर पर वह उसका प्रतिस्पर्धी ही रहेगा। इसलिए उसे चीन के साथ सहयोग का संबंध अवश्य कायम करना चाहिए, लेकिन इसके लिए यह तो जरूरी नहीं कि वह एक हीन राष्ट्र की तरह उसके सामनेझुक जाएँ । (रविवार, 22 नवंबर 2009)

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

ओबामा का 'शर्म -अल -शेख '

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की चीन यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के साथ बातचीत के बाद दोनों नेताओं की तरफ से जो संयुक्त बयान जारी हुआ, उसे लेकर भारत के कूटनीतिक अधिकारी अवाक हैं। इसमें चीन को पूरे दक्षिण एशिया, यानी भारत, पाकिस्तान व अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका निभाने के लिए आमंत्रित किया गया है। इस अवसर पर प्रेस के सामने बोलते हुए हू जिंताओ ने यद्यपि भारत या पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, किन्तु ओबामा ने स्पष्ट किया कि अमेरिका और चीन पूरे दक्षिण एशिया में स्थिर एवं शांतिपूर्ण संबंधों को कायम करने के लिए मिल कर काम करने पर सहमत हो गये हैं। वास्तव में यह भारत-पाकिस्तान व अफगानिस्तान के मामले में कूटनीतिक हस्तक्षेप करने का चीन को दिया गया खुला निमंत्रण है। आश्चर्य है कि ओबामा ने उस देश के मामले में चीन को हस्तक्षेप करने के लिए आमंत्रित किया है, जिसे वह एशियायी क्षेत्र में अपना सबसे बड़ा रणनीतिक साझीदार बताते हैं।
कहा जा रहा है कि संयुक्त वक्तव्य का प्रारूप बीजिंग स्थित उन अमेरिकी कूटनीतिक अधिकारियों ने तैयार किया है, जिनकी भारत के साथ कोई संवेदना नहीं है। ऐसा हो भी सकता है, लेकिन तब तो यह मानना पड़ेगा कि कूटनीतिक मामले में ओबामा भी अपने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की ही तरह लापरवाह हैं। मनमोहन सिंह ने शर्म-अल-शेख में जैसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के दबाव में आकर उस संयुक्त बयान को जारी करने की स्वीकृति दे दी, जो भारतीय हितों व स्वाभिमान के खिलाफ था और जिस पर देश के भीतर एक तरह का हंगामा ही खड़ा हो गयाथा । उसके बारे में भी कहा गया था कि संयुक्त बयान का प्रारूप पाकिस्तान के अधिकारी पहले से ही बनाकर लाए थे और उसे ही मामूली फेरबदल के बाद स्वीकार कर लिया गया। लगता है ऐसा ही कुछ यहां भी हुआ।
खैर, भारत को इसे लेकर बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। कूटनीतिक जगत में ऐसा कुछ होता रहता था। निश्चय ही ओबामा ने भारी चीनी दबावों के कारण संयुक्त वक्तव्य की ऐसी शब्दावली को स्वीकार किया होगा। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा ऋणदाता है। चीनी बाजार भी अमेरिका के लिए सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन यह भी तय है क़ि ओबामा साहब चीन को खुश करने का जितना भी प्रयत्न कर लें, उनके बीच कभी कोई स्वाभाविक दोस्ती नहीं पनप सकती ।
उनकी चीन यात्रा के दौरान जारी यह संयुक्त विज्ञप्ति इस बात का भी प्रमाण है कि ओबामा साहब भाषण चाहे जितना अच्छा दे लें, किन्तु वे निर्णय लेने में कमजोर हैं। उनकी निर्णय लेने की अक्षमता का ही यह परिणाम है कि अमेरिका में भी उनकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे उतरता जा रहा है। भारत के लोगों को प्रतीक्षा करनी चाहिए डॉ. मनमोहन सिंह की अमेरिका की यात्रा का और उसके बाद जारी होने वाले संयुक्त वक्तव्य का। उसके उपरांत ही निर्णय किया जा सकता है कि दक्षिण एशिया के प्रति ओबामा का वास्तविक नजरिया क्या है और इसमें भारत को कितनी और कौनसी जगह हासिल है।

बुधवार, 4 नवंबर 2009

अपने देशी आतंकवादियों से चिंतित अमेरिका

अमेरिका इस्लामी आतंकवाद के खतरे से बचने के लिए अफगानिस्तान में लंबा युद्ध लड़ रहा है, लेकिन अब वह उन अपने ही नागरिकों को लेकर चिंतित है, जो जिहादी दीक्षा लेकर आतंकवादी हमले करने के लिए तैयार हो रहे हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडले को पकड़ा गया, जो भारत और डेनमार्क में एक बड़े आतंकवादी हमले की योजना बना रहा था। वह भारत स्थित लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध था तथा इसने पाकिस्तान में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। हेडले ऐसा अकेला नहीं है। अमेरिका की संघीय गुप्तचर एजेंसी (एफ.बी.आई. यानी फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन) ने गत दो महीनों में 4 बड़े आतंकवादी षड्यंत्रों का पर्दाफाश किया और उनके सूत्रधारों को गिरफ्तार किया। ये सभी अमेरिकी नागरिक थे, लेकिन उनके अलकायदा अथवा अन्य जिहादी संगठनों से भी संबंध थे तथा उन्होंने पाकिस्तान व अफगानिस्तान में प्रशिक्षण प्राप्त किया था।अमेरिका की घरेलू सुरक्षा तथा सरकारी मामलों की कमेटी के चेयरमैन ने अपने नागरिकों के आतंकवादी बनने पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्हें सर्वाधिक आश्चर्य इस बात पर है कि अलकायदा व अन्य जिहादी संगठनों ने देश में इतनी गहरी घुसपैठ कैसे बना ली। ऐसा लगता है कि अमेरिकी सुरक्षा तंत्र अब तक इस बात को नहीं समझ सका है कि अफगानिस्तान की लड़ाई केवल किसी एक संगठन या एक देश के कुछ सिरफिरे लोगों के खिलाफ नहीं है। यह लड़ाई वहां केन्द्रीकृत केवल इसलिए हो गयी है कि वह धार्मिक राजनीतिक विचारधारा के हमलावर दस्ते का एक केंद्रीय गढ़ बन गया था अन्यथा वहां लडऩे वाले तालिबान व अलकायदा के पीछे उनकी विचारधारा वाली पूरी ग्लोबल शक्तियां कार्यरत हैं। इसलिए इस लड़ाई को जीतना है, तो पूरे वैश्विक (ग्लोबल) स्तर पर विचारधारा की लड़ाई छेडऩी पड़ेगी और जहां कहीं भी दूसरा पक्ष शस्त्र प्रयोग पर आमादा हो, वहां शस्त्रों का प्रयोग करना पड़ेगा। यह क्षेत्र अफगानिस्तान हो, पाकिस्तान हो या कोई और लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि जिहादी शक्तियों का अखाड़ा वहीं तक सीमित नहीं है। उसके दायरे में आज लगभग पूरी दुनिया है। इसलिए उसके साथ युद्ध की तैयारी भी पूरी दुनिया के स्तर पर करनी पड़ेगी।

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

2009 के नोबेल पुरस्कार विजेता

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वर्ष 2009 के नोबेल पुरस्कार विजेताओं में से कई नाम शायद आगे आने वाले वर्षों में लंबे समय तक याद किये जाते रहेंगे। भौतिकी के पुरस्कार विजेता 'द मास्टर्स ऑफ लाइटÓ तो पहले ही इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं, लेकिन मेडिसिन और रसायन के क्षेत्र में जो लोग सम्मानित किये गये हैं, उनकी उपलब्धियां भी ऐसी हैं कि उन्हें भी भुलाया नहीं जा सकेगा। गर्व की बात यह है कि इनमेें एक भारतीय नाम भी शामिल है। शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया नाम तो भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए चुना ही गया है, इसलिए वह तो भविष्य में चर्चा का विषय रहेगा ही, साहित्य के लिए चुनी गयी लेखिका भी शायद इसलिए याद की जाएगी कि कम्युनिस्ट त्रासदी का चित्रण करने के लिए नोबेल जैसा सम्मान पाने वाली शायद वह अंतिम लेखक या लेखिका होगी।

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ऑफ वर्ष 2009 के नोबेल पुरस्कारों की घोषण हो चुकी है। भौतिकी, चिकित्सा व रसायन में तीन-तीन लोगों को पुरस्कार में शमिल किया गया है। यह तीनों ही पुरस्कार निश््चय ही अपने क्षेत्र के श्रेष्ठïतम लोगों को दिये गये हैं, जिनकी खोजों ने मानवता को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया है या जिससे भविष्य में उल्लेखनीय लाभ पहुंच सकता है। साहित्य का पुरस्कार एक अल्पज्ञात जर्मन लेखिका को प्राप्त हुआ है, लेकिन उसे लेकर भी कोई विवाद नहीं है। हां, शांति का नोबेल पुरस्कार इस बार भी निश्चय ही विवाद का विषय बना है, लेकिन इस चयन के लिए उस स्वीडिश चयन समिति की सराहना की जानी चाहिए, जिसने वर्तमान की उपलब्धियों से अधिक भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर पुरस्कार के योग्य व्यक्ति का चयन किया है।भौतिकी (फिजिक्स) का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वैज्ञानिकों को 'द मास्टर्स आफ लाइटÓ की संज्ञा दी गयी है। इनमें शामिल हैं चाल्र्स कुएन काओ। शंघाई (चीन) में जन्में काओ की ही खोज का कमाल है कि आज अंतर्राष्टï्रीय संचार की गति इतनी तेज हो गयी है। स्टैंडर्ड टेली कम्युनिकेशन लेबोरेटरी (यू.के.) में कार्यरत काओ की सबसे बड़ी चिंता थ्ी कि प्रकाश को लंबी दूरी के संचार के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाए। ग्लास फाइबर रोशनी ले जा सकते हैं, यह तो पहले से पता थ, लेकिन पहले की स्थिति यह थी कि 20 मीटर जाने पर ही प्रकाश की 90 प्रतिशत क्षमता समाप्त हो जाती थी। पहले उन्होंने लक्ष्य रखा कि एक किलोमीटर तक प्रकाश को कैसे ले जाया जाए, लेकिन अब तो पूरी दुनिया का संचार इन ऑप्टिकल फाइबर केबिलों पर टिक गया है। ऑप्टिकल फाइबर इंटरनेट की तो रीढ़ है। वेब पेजज को लेना हो, ई-मेल करना हो, चैटिंग करनी हो या यू ट्ïयूब वीडियोज का आनंद लेना हो, यह सब ऑप्टिकल फाइबर के प्रकाश संचार बिना संभव नहीं था। और इन तारों से गुजरने वाली वीडियो छवियां (फोटोज) ज्यादा सीसीडी या उस जैसी डिवाइस से लैस कैमरों से आती हैं। फोटोग्राफिक फिल्में इसी कमाल के चलते इतिहास की वस्तु बन गयी हैं। मोबाइल फोन के कैमरे ही नहीं, हबल जैसे अंतरिक्ष में घूमने वाले विशाल कैमरों के शानदार चित्र भी इसी तकनीक से प्राप्त होते हैं। अंतरिक्ष यानों में लगे कैमरे भी सीसीडी आधारित ही होते हैं। आज करीब एक अरब किलोमीटर लंबी ऑप्टिकल फाइबर केबिल मानव की संचार सेवा में लगी हैं। इतनी बड़ी केबिल जिससे पूरी धरती को करीब 25 बार लपेटा जा सकता है।भौतिकी के पुरस्कार की आधी रकम अकेले काओ को दी गयी है। दसरे दो वैज्ञानिक हैं अमेरिका में जन्में और वहीं की बेल लेबोरेटरी में कार्यरत बिलियर्ड स्टर्लिंग बायल और जार्ज एलवुड स्मिथ। इन दोनों ने 'इमेजिंग सेंसरÓ सी.सी.डी. (चाज्र्ड कपल्ड डिवाइस) तैयार करने में कमाल दिखाया है। इनकी खोजों से ही यह संभव हुआ कि मोबाइल फोन में भी कैमरे आ गये। 'इलेक्ट्रॉनिक मेमोरीÓ को बेहतर बनाने तथा इलेक्ट्रॉनिक ढंग से फोटो लेने (इलेक्ट्रॉनिक कैप्चरिंग मेमोरी) में इन दोनों ने क्रांतिकारी भूमिका अदा की। पुरस्कार की आधी रकम इन दोनों में बराबर-बराबर बांटी गयी है।चिकित्सा विज्ञान (मेडिसिन एवं फिजियोलॉजी) का पुरस्कार भी तीन लोगों में बांटा गया है। ये तीनों अमेरिका में कार्यरत हैं, जिनमें दो महिलाएं हैं, जो अमेरिका में ही पैदा हुई हैं। इनमें एलेजाबेथ ब्लैकबर्न यूनिवर्सिटीकेलिफोर्निया में और कैरोल डब्लू ग्रेइडर बाल्टीमोर के जान हापकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में पढ़ाती हैं। तीसरे जैक डब्लू शेस्टाक की पैदाइश लंदन की है, लेकिन कार्यरत अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में हैं। यह रोचक है कि चिकित्सा में पहली दो महिलाओं को नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है।इनकी खोज भी बड़ी रोचक है। यह तो सभी जानते हैं कि कोशिकाएं जब विभाजित होती हैं, तो उनके गुण सूत्र (क्रोमोजोम) भी दो जोड़ों में विभाजित हो जाते हैं। लेकिन इन विभाजनों के दौरान कभी कोई गलती नहीं होती और वे खराब भी नहीं होते। इन तीनों ने यह पता लगाया कि गुण सूत्रों की प्रतिक्रति कैसे बनती है और कैसे उनसे कोई गड़बड़ी नहीं होने पाती। इन लोगों ने गुण सूत्रों के उस रसायन का पता लगाया, जो उनके विभाजन पर नजर रखता है। जैसे जूते के फीतों के सिरे पर प्लास्टिक की एक कैप लगी रहती है, जो उस सिरे को बिखरने से बचाए रखती है, वैसे ही गुण सूत्रों के सिरों पर एक रासायनिक संरचना होती है, जो पूरे गुण सूत्र पर नजर रखती है और उसके विभाजन को नियंत्रित करती है। यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है। इससे मनुष्य के वृद्ध होने के कारणों, कैंसर तथ स्टेम कोशिकाओं के बारे में और जानकारी जुटाई जा सकेगी। इससे मनुष्य के स्वस्थ दीर्घायुष्य के चिकित्सकीय उपाय किये जा सकेंगे। तीसरा रसायन का नोबेल पुरस्कार विज्ञान व मनुष्यता के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, यह भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले तीन वैज्ञानिकों में एक भारतीय नाम भी है। वेंकटरमन रामकृष्णन आज भले ही अमेरिकी नागरिक हैं, लेकिन भारत से उनके संबंध जीवित हैं। 1952 में तमिलनाडु के धार्मिक शहर चिदंबरम में जन्में रामकृष्णन ने विज्ञान में स्नातक (बी.एस.सी.) की उपाधि महाराजा सयाजीराव विश््ïवविद्यालय, बड़ौदा से प्राप्त की। अभी वह तीन वर्ष के ही थे कि तमिलनाडु से उनके पिता गुजरात के बड़ौदा में आ गये। उनके पिता सी.वी. रामकृष्णन व माता राजलक्ष्मी भी जैव वैज्ञानिक थे। वस्तुत: सी.वी. रामकृष्णन ने ही बड़ौदा की महाराज सयाजीराव यूनिवर्सिटी में 1955 में बायोकेमेस्ट्री डिपार्टमेंट की स्थापना की। इस समय सी.वी. रामकृष्णन सियेटेल में हैं, लेकिन वेंकटरमन के बड़ौदा और तमिलनाडु से संबंध अब भी बने हुए हैं। इसलिए उनकी उपलब्धि पर भारतीयों का भी गर्वित होना स्वाभाविक है। उनके साथ इस पुरस्कार में समान रूप से भागीदार दो अन्य वैज्ञानिकों में से एक अदा. इ. योनाथा इजरायल की हैं और वहीं की विजमन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस मेंजाता था। काम मुश्किल जरूर था, लेकिन इसकी राह दिखायी अदा.इ. योनाथा ने, फिर तो वेंकटरमन और स्टीट्ïज जैसे लगनशील वैज्ञानिकों ने इस कार्य को अंजाम तक पहुंचा दिया। इनतीनों कार्यरत हैं और दूसरे थामस ए. स्टीट्ïज अमेरिका के हैं और येल विश््ïवविद्यालय में कार्यरत हैं। इन तीनों ने एक ऐसे मुश्किल कार्य को कर दिखाया है, जिसे पहले प्राय: असंभव माना ने प्रकृति के एक ऐसे अज्ञात रहस्य को सुलद्ब्रााया है, जिसकी भविष्य में असीमित संभावनाएं हैं।प्रकृति में जितने जीव हैं -माइक्रोव्स, पौधे या जीव जंतु सभी 'रिबोजोमÓ पर निर्भर करते हैं। यह रिबोजोम प्रत्येक जीवित कोशिका का एक अनिवार्य एवं जटिल तत्व है। यह गुण सूत्रों पर स्थित 'जीनोंÓ में अंकित सूचनाओं (ब्लू पिं्रट) के आधार पर उन प्रोटिनों के निर्माण का कार्य करता है, जिन पर यह पूरा जीवन निर्भर है। वास्तव में यह रिबोजोम एक अत्यंत जटिल आणविक (मालिक्यूलर) मशीन है, जो सैकड़ों हजारों परमाणुओं से मिलकर बनी है। इन तीनों वैज्ञानिकों ने इस 'रिबोजोमÓ का परमाणविक मॉडल तैयार कर दिया। यानी यह बता दिया कि इसके हजारों हजार परमाणु कहां पर किस तरह स्थित है। इससे यह पता लगाने में मदद मिली की ये रिबोजोम कैसे इन असंख्य प्रोटीनों का निर्माण करते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि एंटीबायोटिक दवाइयां बैक्टीरिया की कोशिका के भीतर स्थित रिबोजोम पर ही हमला करते हैं। अब इस अध्ययन से यह भी पता चल गया कि एंटीबायोटिक कैसे काम करते हैं। इस रिबोजोम के परमाणुओं के स्थान का कैसे पता लगाया जाए, यह बड़ी समस्या थी। 1980 में योनाथा ने रिबोजोम की एक बड़ी इकाई का क्रिस्टल बनाने में सफलता प्राप्त की। इसका एक्स-रे 'स्नैपशॉटÓ लिया गया। यह रिबोजोम की गुत्थी सुलद्ब्रााने की दिशा में पहला कदम था। लेकिन दूसरा कदम उठाने में योनाथ को 20 वर्ष लग गये, जब एक एटम का चित्र लिया जा सका। वेेंकटरमन रामकृष्णन 'मेडिकल रिसर्च कौंसिल लेबोरेटरी ऑफ मालिक्यूलर बायोलॉजी, कैंब्रिजÓ (यू.के.) में कार्यरत थे। उन्होंने अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के एक पोस्ट डाक्टोरल फिलो के रूप में रिबोजोम पर काम करना शुरू किया। उन्होंने रिबोजोम की छोटी इकाईयों (स्मॉल सबयूनिट्ïस) की मैपिंग शुरू की। उन्होंने भी एक्स-रे की सघन किरणों (इंटेंस बीम ऑफ एक्स-रे) की मदद से यह काम शुरू किया। इस क्रम में उनकी एक सबसे महत्वपूर्ण खोज यह थी कि रिबोजोम जो भी प्रोटीन बनाता है, उसमें से प्रत्येक प्रोटीन केवल 20 एमीनो एसिड्ïस के विभिन्न संयोजनों द्वारा बनते हैं। इस बीच स्टीट्ïज ने यह खोज कर ली कि एक्स-रे फोटोज की व्याख्या कैसे की जाए या उसे समद्ब्राा कैसे जाए। उन्होंने यह भी पता लगा लिया कि दो एमीनो एसिड्ïस के बीच के रासयनिक संबंध कैसे बनते हैं। बस फिर क्या था। रिबोजोम का पूरा ढांचा सामने आ गया। इसके अलावा यह भी पता चला कि जीन में मौजूद सूचनाओं को पढ़कर रिबोजोम, जो प्रोटीन बनाते हैं, उसमें कोई गलती क्यों नहीं होने पाती। यदि कोई गलती होती भी है, तो वह एक लाख में कोई एक। रामकृष्णन ने इस तत्व की भी पहचान कर ली, जो इस बात पर निगरानी रखता है कि जीन में स्थित सूचनाओं को पढऩे व उसके अनुकूल प्रोटीन के निर्माण में कोई गलती न होने पाए। इस खोज की भविष्य में असीमित संभावनाएं हैं। तात्कालिक संभावना तो नई एंटीबायोटिक्स की डिजाइनिंग की है। बहुत से बैक्टीरिया कई एंटीबायोटिकों के अवरोधी बन गये हैं। उनके लिए भी नये एंटोबायोटिक तैयार हो सकते हैं। फिर जैव प्रोटीनों के निर्माण की विशाल दुनिया का यूं ही असीमित उपयोग हो सकता है।साहित्य का नोबेल पुरस्कार इस वर्ष रोमानिया की कम्युनिस्ट तानाशाही में जन्मीं जर्मन लेखिका हेर्ता मुलर को दिया गया है। रोमानिया के शासक निकोलई सिजेस्क्यू के दौर में वहां अल्पसंख्यक जर्मन समुदाय की क्या हालत थी, उनकी जिंदगी कितनी मुश्किलों से भरी थी, इसका अत्यंत सजीव चित्रण हेर्ता मुलर ने अपने साहित्य में किया है। स्वीडिश एकेडमी के स्थाई सचिव पीटर इंग्लैंड ने मुलर के अत्यंत संवेदनशील काव्य एवं उन्मुक्त गद्य की सराहना करते हुए कहा है कि लेखिका ने तत्कालीन रोमानिया में पिसते अल्पसंख्यक समुदाय के जीवन की विडंबनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।इस बार शांति पुरस्कार को लेकर सर्वाधिक विवाद खड़ा हुआ। स्व्यं वह व्यक्ति भी हैरान था, जिसे यह पुरस्कार मिला। अमेरिकी राष्टï्रपति बराक हुसैन ओबामा को उनके सेक्रेटरी ने सुबह के 6 बजे जगाकर यह सूचना दी कि उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है। वह यह सूचना पाकर चकित हो गये। बाद में उन्होंने मीडिया के सामने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मैं अपने को इस पुरस्कार के योग्य नहीं मानता। मेरी उनके साथ कोई बराबरी नहीं है, जिन्हें अपसे पहले यह पुरस्कार मिला है। फिर भी मैं यह सम्मान स्वीकार करता हूं। लोग यह पूछ रहे हैं कि ओबामा ने आखिर किया क्या है, जिसके लिए उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। अभी उनको अमेरिका का राष्टï्रपति पद संभाले भी मुश््िकल से दस महीने हुए हैं। उन्होंने बातें अवश्य अब तक बहुत की हैं, लेकिन उनकी उपलब्धि क्या है । बात किसी हद तक सही है, लेकिन पुरस्कार की चयन समिति के दृष्टिïकोण को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। अपने दस महीने के कार्यकाल में ओबामा ने जो संभावनाएं जगायी हैं, वे किन्हीं उपलब्धियों से कम नहीं हैं। ओबामा दूसरे अश््वेत अमेरिकी हैं, जिन्हें शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पहला नाम मार्टिन लूथर किंग जूनियर का, जिन्हें 1964 में 35 वर्ष की आयु में यह सम्मान दिया गया था। एक अश््वेत पूरे अमेरिका की श््वेत आबादी के दिलों पर कब्जा करके उनका समर्थन प्राप्त कर ले, यह अपने आप में एक उपलब्धि है। फिर ओबामा ने राष्टï्रपति पद संभालते ही सबसे पहले विश््व की मुस्लिम आबादी के साथ अमेरिका के मैत्रीपूर्ण संबंधों की शुरुआत की और यह संदेह दूर करने की कोशिश की कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष कोई इस्लाम के खिलाफ घोषित संघर्ष नहीं है। उन्होंने सत्ता हासिल करते ही इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की घोषणा की। पूर्व राष्टï्रपति बुश द्वारा यूरोप में मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली स्थापित करने की घोषणा के कारण रूस के साथ जो तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी थी, ओबामा ने उसे शांति किया और मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली कायम करने का निर्णय रद्द कर दिया। उन्होंने ईरान के साथ भी वार्ता की पहल की और उस पर मंडरा रहे अमेरिकी हमले के खतरों को दूर किया और ओबामा की सबसे अधिक प्रशंसनीय पहल जो थी, वह यह कि उन्होंने पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण का आह्वान किया। वह पहले अमेरिकी राष््ट्रपति हैं, जिन्होंने दुनिया को पूरी तरह परमाणु अस्त्रों से मुक्त करने का विचार सामने रखा है। यद्यपि यह सभी जानते हैं कि यह कार्य इतना आसान नहीं है, लेकिन अब तक पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण में सबसे बड़ी बाधा अमेरिका को ही माना जाता था, लेकिन अब अमेरिका ही इसका प्रस्ताव कर रहा है। वास्तव में विश््व के प्रति अमेरिकी दृष्टिïकोण विश््व शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ओबामा की अभी कोई उपलब्धि सामने नहीं है, लेकिन उनके शांतिपरक विचारों के कारण भविष्य की संभावनाएं बहुत अधिक हैं। यह नोबेल शांति पुरस्कार अब उनके ऊपर एक नैतिक दबाव का भी काम करेगा। उन्हें अपने को इसके अनुकूल सिद्ध करना होगा। संभव है इसके साये में वह शांति के लिए और बेहतर कार्य कर सकें।कुल मिलाकर इस वर्ष के सारे नोबेल पुरस्कार मानवता के श्रेष्ठïतम हित में दिये गये हैं। पुरस्कार हर वर्ष दिये जाते हैं और अपने-अपने क्षेत्र की श्रेष्ठïतम उपलब्धियों के लिए दिये जाते हैं। किंतु इस बार के सारे पुरस्कार ऐसे हैं, जिनका प्रत्यक्ष लाभ देखा जा सकता है।