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बुधवार, 23 जून 2010

लोग केवल एंडर्सन के पीछे क्यों पड़े हैं ?




भोपाल गैस दुर्घटना के दायित्व से एंडर्सन को मुक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे इसका मुख्य दोषी भी करार नहीं दिया जा सकता। मुख्य दोषी यदि कोई है, तो वह यूनियन कार्बाइड की भारतीय इकाई के अध्यक्ष केशव महेंद्र और मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, जिनकी आपराधिक लापरवाही से यह दुर्घटना हुई। लेकिन प्रायः सारे लोग एंडर्सन के पीछे पड़े हैं, क्योंकि वह विदेशी है और उसकी ओट में सारे देशी लोगों के पाप छिपाए जा सकते हैं। एंडर्सन को वापस भेजना नहीं उसे गिरफ्तार किया जाना गलत कदम था। दुर्घटना के बाद भारत आना उसकी कोई बाध्यता नहीं थी। वह संवेदना व सहानुभूतिवश यहां आया था, लेकिन गिरफ्तारी ने सारा मामला ही बदल दिया। वर्तमान कानूनी दायरे में एंडर्सन को भारत वापस बुलाना लगभग असंभव है, इसलिए बेहतर है कि भारत सरकार, राहत, पुनर्वास, चिकित्सा, पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान दे और मुआवजे की राशि को यथार्थपरक बनाए, जिससे पीड़ितों को शांति मिले, क्योंकि अब 25 साल बाद दोषियों को उचित सजा दिलाना उसके वश का काम नहीं।





बुरा जो देखन मैं चला बुरा न दीखा कोय
जो घट सौधों आपना तो मुझसा बुरा न कोय

कबीरदास की यह वाणी तो संतवाणी है, जो अध्यात्मिक यथार्थ की ओर संकेत करती हैं, किंतु अपने देश की राजनीतिक स्थिति पर यदि दृष्टि डाली जाए, तो वह भी कमोबेश हमें ऐसी ही नजर आएगी। अपने देश की यह प्रवृत्ति बहुत पुरानी है कि अपना दोष मढ़ने के लिए किसी दूसरे का गला या सिर ढूंढ़ लिया जाए। अपने देश की सांप्रदायिकता की समस्या हो, जातिवाद की समस्या हो, सांस्कृतिक पतन की समस्या हो, हम इस सबके लिए विदेशियों को खासतौर से अंग्रेजों, यूरोपियनों व अमेरिकियों को आसानी से जिम्मेदार ठहरा देते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी सब दूध के धोए, पवित्र देव पुरुष हैं और सारे पाप की खान हम स्वयं हैं, लेकिन सच यही है कि विदेशियों ने केवल हमारे दोषों व दुर्बलताओं का लाभ उठाया। उन्होंने हमें ईमानदार से बेईमान व वीर से कायर नहीं बनाया, बल्कि हमारे भीतर जो बेईमानी व कायरता थी, उसका अपने लिए इस्तेमाल किया। यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन के भोपाल कारखाने और दिसंबर 1984 में हुई उसकी दुर्घटना तथा उसके बाद की अब तक की त्रासदी की कहानी भी यही है। 1984 से आज तक हम अमेरिकी बहुराष्ट्र्ीय कंपनी यू.सी.सी.(यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन, अमेरिका)के पूर्व अध्यक्ष व मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडर्सन के पीछे पड़े हैं, लेकिन हमारी अपनी सरकारों, अपने राजनेताओं, अपने अफसरों व अपने न्यायाधीशों के अपराधों की तरफ हमारी कोई नजर नहीं है। यह कहने का मतलब भी एंडर्सन का बचाव करना या उसे निर्दोष साबित करना नहीं, बल्कि यह बताना है कि हमारे अपने लोग उसके मुकाबले कहीं अधिक दोषी हैं।

7 जून 2010 को भोपाल के मुख्य न्यायिक अधिकारी की अदालत से दुर्घटना के 25 लंबे वर्षों बाद सुनाये गये फैसले के बाद से रहस्यों की रोज एक न एक नई परत खुलती जा रही है। अब सारी कवायद अपने-अपने राजनीतिक बचाव की चल रही है। भला हो उस अदालत व कानून का, जिसने दोषियों को इतनी कम सजा सुनाई कि लगभग पूरा देश गुस्से से भड़क उठा। जिस दुर्घटना में 20 से 25 हजार तक लोग मारे गये और करीब 6 लाख उत्पीड़ित हुए, उसके दोषियों को मात्र दो साल के कारावास की सजा और उस पर भी तत्काल जमानत। किसी को एक मिनट के लिए भी जेल जाने की नौबत नहीं। अदालत में मात्र एक-दो घंटे की पेशी और फिर अपने क्लब या गोल्फ के मैदान में जाकर मौज मनाने की फुरसत।

7 जून के फैसले के बाद जब प्रायः पूरे देश के मीडिया में हंगामा खड़ा हुआ, तो पहले तो एक दूसरे पर दोषारोपण का दौर चला, फिर जब ऐसा लगा कि इससे भड़की आग की सारी आंच केंद्र सरकार व कांग्रेस पार्टी की तरफ आ रही है, तो उसके बचाव के विशेष प्रबंध किये जाने लगे। केंद्र सरकार ने सारे मामले के एकमुश्त निपटारे के लिए 9 सदस्यों की एक मंत्रिमंडलीय समिति गठित की, जिसके अध्यक्ष गृहमंत्री पी. चिदंबरम बनाए गये। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मंत्रियों के इस समूह को आदेश दिया कि वह फौरन अपनी बैठकें शुरू करें और 10 दिन के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करे, जिससे इस मामले में तत्काल कार्रवाई शुरू की जा सके। बीते शुक्रवार को इस दल की पहली बैठक हुई। तय हुआ कि इसकी रोज बैठक होगी और 4 दिन के अंदर यानी 10 दिन की अवधि पूरी होने के 2 दिन पहले ही सोमवार तक उसकी रिपोर्ट दे दी जाएगी।

शुक्रवार को यह बैठक अभी शुरू ही होने वाली थी कि उसके पहले ही योजना आयोग ने भोपाल गैस पीड़ितों की सहायता के लिए 982 करोड़ रुपये की विशेष धनराशि जारी करने की घोषणा की। यह राशि इस मामले पर विचार के लिए गठित मंत्रिसमूह की संस्तुति के बाद राज्य सरकार को दी जाएगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश की राज्य सरकार ने भोपाल गैस पीड़ितों के सहायतार्थ एक ‘एक्शन प्लान’ 2008 में योजना आयोग के समक्ष पेश किया था, लेकिन आयोग ने उस समय उसे रद्द कर दिया था और कहा थ कि यह प्रस्ताव तर्कसंगत नहीं है, इसलिए इसके लिए कोई धन आवंटित नहीं किया जा सकता, मगर अब फटाफट उसी ‘एक्शन प्लान’ के अनुसार 982 करोड़ की धनराशि दिये जाने की घोषणा कर दी गयी। एक्शन प्लान में राज्य सरकार ने कहा था कि इस दुर्घटना में 16,000 लोग मरे हैं, 5000 से अधिक औरतें विधवा हुई हैं, लाखें बीमार हैं, इसलिए उनकी चिकित्सकीय, आर्थिक, सामाजिक तथा पर्यावरणीय सहायता के लिए बड़ी धनराशि की जरूरत है। यह प्रस्ताव शायद इसलिए भी रद्द कर दिया गया कि राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वार पेश किया गया था। धन केंद्र सरकार देती और उसका श्रेय राज्य सरकार को मिलता, इसलिए प्रस्ताव ही रद्द कर दिया गया।

मंत्रियों के समूह की पहले दिन बैठक में शामिल मंत्रियों की भावनाओं को पढ़ने वाली अखबारी रिपोर्टों में कहा गया है कि प्रायः सभी मंत्रियों की एक ही चिंता थी कि ‘कुछ तो करना ही पड़ेगा और वह भी जल्दी।’ चिदंबरम ने बैठक के बाद पत्रकारों को बताया कि ‘हम लोग पीड़ितों के प्रति अत्यंत सहानुभूतिपूर्वक अधिकतम जो कुछ संभव हो सकेगा वह करेंगे। पूरे मुद्दे को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा गया है। एक तो कानूनी मुद्दा है, जिसके अंतर्गत यह देखा जाएगा कि क्या इस आपराधिक मामले को फिर से खोला जा सकता है और क्या यूनियन कार्बाइड के पूर्व अध्यक्ष एंडर्सन को भारत लाया जा सकता है। दूसरा हिस्सा मुआवजे एवं पर्यावरण की साफ-सफाई से संबंधित है। इसके अंतर्गत मुआवजे की राशि बढ़ाने के अलावा विशैले कचरे की सफाई, भूगर्भ जल का परिशोधन तथा दूषित हुए इलाके में शुद्ध पेयजल की आपूर्ति आदि का मामला है। इसके लिए कानून, स्वास्थ्य, रसायन व पर्यावरण मंत्री तथ उनके विभाग रातदिन श्रम करने में लगे हैं।

विधि मंत्रालय ने एक विस्तृत नोट तैयार किया है, जिसमें मंत्रिसमूह को सलाह दी गयी है कि दोषियों की सजा बढ़ाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक ‘क्यायेरेटिव पिटीशन’ (संशोधन याचिका) दायर की जाए तथा इस कानूनी संभावना का भी पता लगाया जाए कि क्या एंडर्सन को वापस बुलाया जा सकता है। स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भी इस बीच अपने स्वास्थ्य अधिकारियों की कई बैठकें की तथा आई.सी.एम.आर. (इंडियन कौंसिल आॅफ मंडिकल रिसर्च) के वैज्ञानिकों के साथ भी मुलाकातें की। वह अब व्यक्तिगत रूप से यह जानकारी हासिल करने में गे हैं कि ‘मिथाइल आइसो सायनाइट’ (मिक) जैसी विशैली गैस का अब तक क्या प्रभाव पड़ा है, विशेषकर बच्चों और गर्भवती स्त्रियों को इससे क्या नुकसान पहुंचा है। भोपाल में कैंसर के रोगियों की संख्या वृद्धि में इसकी क्या भूमिका है तथा पीड़ितों का इलाज करने वाले अस्पतालों की वर्तमान स्थिति क्या है। मंत्रिसमूह की इस बैठक में रसायन एवं उर्वरक विभाग के सचिव विजय चटर्जी ने दुर्घटना के बाद से अब तक की विस्तृत जानकारी दी। अब तक सारी कानूनी कार्रवाई, मुआवजा साफ-सफाई तथा चिकित्सा के मोर्चे पर अब तक जो कुछ हुआ, वह सारी जानकारी उन्होंने दी, क्योंकि मूलतः इस दुर्घटना का सारा मामला उनके विभाग से ही संबंधित था। उन्होंने यह भी बताया कि कचरा हटो का दायित्व ‘डाउ’ कंपनी पर डालने के लिए जबलपुर की हाईकोर्ट पीठ में मामला चल रहा है। करीब 350 मीट्र्कि टन का यह कचरा अंकलेश्वर (गुजरात) भेजा जाने वाला था, लेकिन गुजरात ने इसकी अनुमति नहीं दी। जब रामविलास पासवान केंद्र में रसायन व उर्वरक मंत्री थे, तो उन्होंने यह कचरा हटाने के लिए डाउ कंपनी से 100 करोड़ रुपये की मांग की थी। तो न तो उसने पैसे दिये न कचरा हटा और कचरा हटाने के दायित्व का विवाद हाईकोर्ट में लटका हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि दुर्घटना के कारण प्रदूषित पर्यावरण के सुधार के लिए सीएसआईआर (केंद्रीय वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान संस्थान) शोधकार्य कर रहा है, जिसकी रिपोर्ट इसी महीने आने वाली है।

9 मंत्रियों के समूह (गृहमंत्री पी. दिंबरम, वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, विधि मंत्री वीरप्पा मोइली, भूतल परिवहन मंत्री कमलनाथ, स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद, शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी, रसायन एवं उर्वरक मंत्री एम.के. अलागेरी, पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश, पर्यटन मंत्री कुमारी शैलजा, इसके अलावा अतिरिक्त म.प्र. के राहत व पुनर्वास मंत्री बाबूलाल गौर स्थाई आमंत्रित सदस्य हैं) की इस बैठक में इन मंत्रियों के अलावा मंत्रिमंडलीय सचिव (कैबिनेट सेक्रेटरी) के.एम. चंद्रशेखर, गृहसचिव जी.के. पिल्लइ तथा विदेशा सचिव निरूपमा राव भी भग ले रही हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस मंत्रिमंडलीय समूह में शामिल पी. चिदंबरम व कमलनाथ ने 2006-07 में जब वे क्रमशः वित्त व वाणिज्य मंत्री थे, राय दी थी कि भोपाल गैस दुर्घटना से दूषित हुए इलाके से कचरा हटाने तथ उस स्थल को विषैले प्रभाव से शुद्धि के लिए एक ट्र्स्ट (साइड रेमिडिएशन ट्र्स्ट) बनाया जाए, जिसमें भारतीय कार्पोरेट क्षेत्र की कंपनियां अंशदान करें और उस धन से सफाई का कार्य किया जाए। तब वे न तो इसकी जिम्मेदारी ‘डाउ’ कंपनी पर भी डालने के लिए तैयार नहीं थे, जिसने यू.सी.सी. को खरीद लिया है। उनके ऐसे सुझावों के कारण न तो कोई कंपनी इस काम के लिए आगे आयी और न सरकार ने ही यह काम अपने हाथ में लिया। ‘डाउ’ कंपनी का कहना है कि उसका भोपाल में कभी कोई कारोबार नहीं था, इसलिए वह इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। इसके अतिरिक्त भारत सरकार ने स्वयं उसे यह क्लीन चिट दी है कि यू.सी.आई.एल. (यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड) भोपाल की दुर्घटना का कोई दायित्व उसके उपर नहीं है। ‘डाउ’ के वकील तथा कांग्रेस के वर्तमान प्रवक्ता अभिषेक मनु संघवी ने भी उस समय कंपनी को यही सलाह दी थी कि भोपाल में साफ-सफाई का कोई दायित्व जब यू.सी.सी. पर ही नहीं था, तो वह उसके उपर कैसे आ सकता है। भारत सरकार ने 1989 में यू.सी.सी. से 47 करोड़ डॉलर में अंतिम समझौता कर लिया था। सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से यह समझौता हुआ था, जिसमें यू.सी.सी. को सारे दायित्वों से मुक्त कर दिया गया था और केंद्र सरकार ने उसके विरुद्ध दायर सारे दीवानी (सिविल) व फौजदारी (क्रिमिनल) मामले वापस ले लिये थे। इसके अंतर्गत कारखाना स्थल का कचरा हटाये बिना उसे वह जमीन हस्तांतरित करने का अधिकार भी दे दिया गया था।

दिसंबर 1984 की दुर्घटना के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की तरफ से देश की प्रसिद्ध न्यायिक सेवा कंपनी ‘जे.बी. दादाचांदी एंड कं.’ की सेवाएं ली थीं। इस कंपनी के नानी पालखीवाला, फालीनारीमम व अनिल दीवान जैसे देश के शीर्ष वकीलों की सेवाएं प्राप्त की थी। भारत सरकार के पूर्व एटार्नी जनरल सोली सोराब जी का अकेला ऐसा नाम है, जो इस लड़ाई में यूनियन कार्बाइड की तरफ से खड़े होने से इनकार कर दिया। कंपनी ने जब सोली सोराब जी से संपर्क किया, तो उन्होंने साफ कह दिया कि इस मामले में पीड़ितों को कानूनी सहायता की अधिक जरूरत है, वह उनके खिलाफ अमेरिकी कंपनी के पक्ष में अदालत में नहीं खड़े हो सकते।

इस कांड में 1984 के बाद जितने आंदोलन व विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उसमें सर्वोच्च खलनायक के रूप में एंडर्सन का नाम ही सबसे उपर है। 20 से 25 हजार तक की मौतों का जिम्मेदार अकेले उसे ही ठहराया जाता रहा है। अब तक शायद ही कोई ऐसा पोस्टर दिखायी दिया हो, जिस पर यू.सी.आई.एल. के अध्यक्ष केशव महेंद्र का फोटो छपा हो। प्रायः पूरे देश की चिंता है कि वह अमेरिकी यहां से कैसे भाग निकला। इसकी जांच कराने की मांग पर अधिक जोर है कि उसे देश से भगाने में किसने मदद की। कोई इसकी जांच कराने की मांग नहीं कर रहा है कि यू.सी.सी. को भोपाल में शहर के बीच कारखाना लगाने का लाइसेंस कैसे मिला। इस कारखाने की डिजाइन दोषपूर्ण थी और सुरक्षा के पर्याप्त साधन नहीं थे, तो इसे उत्पादन की अनुमति कैसे मिली। और दुर्घटना हुई तो उसके प्रत्यक्ष जिम्मेदार अधिकारियों को छोड़कर लोग केवल एंडर्सन के पीछे भागते क्यों नजर आए?

अब पता चल रहा है कि इस कारखाने की स्थापना का लाइसेंस इंदिरा गांधी के शासन में आपातकाल के दौरान दिया गया। इस मामले में कोर्ट में दायर की गयी सी.बी.आई. की एक एफिडेविड (शपथपत्र) के अनुसार यू.सी.सी. ने 1 जनवरी 1970 में 5000 टन कीटनाशक बनाने की क्षमता वाला कारखाना स्थापित करने के लिए लाइसेंस दिये जाने का आवेदन पत्र केंद्र सरकार के उद्योग मंत्रालय -जो उस समय औद्योगिक विकास मंत्रालय कहा जाता था- के समक्ष प्रस्तुत किया। यह आवेदन 5 साल तक पड़ा रहा। तत्कालीन उद्योग विकास मंत्रालय के अधिकारी व संबंधित मंत्री यह लाइसेंस देने के पक्ष में नहीं थे। अतः 31 अक्टूबर 1975 को यह लाइसेंस मिल गया। लाइसेंस कैसे और किसके सहयोग से मिला, वस्तुतः यह भी एक जांच का विषय है। इस शपथ पत्र में यह भी जिक्र है कि उस समय के एक अंतर्राष्ट्र्ीय पर्यावरण रक्षक संगठन ‘टाक्सिक वॉच एलायंस’ ने कहा था कि भारत में आपातकाल न लगता, तो भोपाल में गैस कांड भी न होता। इस संगठन के एक सदस्य गोपाल कृष्ण ने भी कहा है कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि यह लाइसेंस कैसे मिला। औद्योगिक विकास मंत्रालय के तत्कालीन उपनिदेशक आर.के. शाही (जो बाद में योजना आयोग के उपसलाहकार बने) के अनुसार लगभग पूरा विभाग यह लाइसेंस देने के खिलाफ था। वास्तव में यह भी जांच का विषय है कि यू.सी.सी. को भोपाल में इस कारखाने को लगाने के लिए इतनी बड़ी सरकारी जमीन कैसे दी गयी। लाइसेंस के आवेदन में यह साफ लिखा गया था कि कीटनाशक का निर्माण के लिए मिथाइल आइसोसायनाइट (मिक) गैस का इस्तेमाल किया जाएगा। क्या इसके भयानक विषैलेपन का अहसास किसी को नहीं था? यहां यह भी उल्लेखनीय है कि केंद्रीय वैज्ञानिकों का दल जब यूसीसी के वर्जीमियां प्लांट को देखने के लिए गया, तो उसे प्लांट के भीतर जाने की अनुमति नहीं दी गयी।

आश्चर्य है कि देश के तमाम लोग अन्य सारी बातों को छोड़कर इस बात के पीछे पड़े हैं कि एंडर्सन 1984 में जब भारत आया, तो उसे बाहर क्यों जाने दिया गया। वास्तव में एंडर्सन की तो इसके लिए प्रशंसा की जानी चाहिए थी कि इस भयावह दुर्घटना की खबर पाकर स्थिति का स्वयं आकलन करने के लिए उसने भारत आने का निश्चय किया। उस समय देश में आम चुनाव होने वाले थे और राजनीतिक माहौल गर्म था, इसलिए एंडर्सन ने पहले से अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करना जरूरी समझा। जैसी खबरें मिल रही हैं, उसके अनुसार उसने भारत स्थित अपने दूतावास से संपर्क किया। उस समय दूतावास के उपप्रधान गार्डन स्ट्र्ीब ने इस बारे में भारत सरकार से संपर्क किया। उसने विदेश सचिव से संपर्क किया होगा। चूंकि मामला गृहमंत्रालय से संबद्ध था, इसलिए विदेश विभाग ने गृहविभाग से संपर्क किया गया। उस समय गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव थे जो बाद में प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री उस समय चुनाव प्रचार के सिलसिले में राजधानी से बाहर थे। एंडर्सन को देश में सुरक्षा की गारंटी देने के लिए गृहमंत्री स्वयं सक्षम थे, लेकिन उन्होंने इस बारे में प्रधानमंत्री से संपर्क न किया हो यह कम ही संभव है। केंद्र सरकार की सुरक्षा की गारंटी पाकर एंडर्सन भोपाल पहुंचे। वह दुर्घटनास्थल पर जाने की तैयारी में थे। भोपाल के कलक्टर मोती सिंह ने स्वयं कहा है कि जब वह हवाई अड्डे पहुंचे, तो एंडर्सन हाथ में गैस मास्क लिये टहल रहे थे।

एंडर्सन को सपने में भी यह आशंका नहीं रही होगी कि वहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। भोपाल में दुर्घटना के बाद पुलिस में जो एफ.आई.आर. दर्ज हुई थी, उसमें एंडर्सन का भी नाम था, इसलिए पुलिस अधीक्षक ने उन्हें कैद में ले लिया। एंडर्सन ने केंद्र सरकारक को संपर्क किया होगा। निश्चय ही इस पर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को केंद्र से निर्देश मिला होगा कि एंडर्सन को पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दी गयी है, इसलिए जैसे भी हो, उन्हें फौरन दिल्ली वापस भेजो। एंडर्सन ने दिल्ली में गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव से तथा राष्ट्र्पति जैल सिंह से मुलाकात की। उन्होंने तत्कालीन विदेश सचिव महाराज कृष्ण रसगोत्रा से भी मुलाकात की। शायद धन्यवाद देने के लिए उन्होंने ये मुलाकातें की।

गार्डन स्ट्र्ीव ने अपने एक बयान में इस बात की पुष्टि की है कि केंद्र सरकार के निर्देश पर एंडर्सन भोपाल से सुरक्षित दिल्ली वापस लाए गये और वहां से उन्हें न्यूयार्क भेजा गया।

तत्कालीन विदेश सचिव रसगोत्रा ने भी सी.एन.एन. आईबीएन न्यूज चैनल पर करण थापर के साथ एक साक्षत्कार में स्वीकार किया कि केंद्र के निर्देश पर उन्हें गिरफ्तारी से मुक्त कराकर वापस भेजा गया। उनकी राय में यह आवश्यक था। यदि ऐसा न किया जाता, तो उसके लिए केंद्र सरकार पर अंतर्राष्ट्र्ीय स्तर पर विश्वास हनन का आरोप लगता।

यहां यह ध्यान देने की बात है कि दुर्घटना के बाद एंडर्सन का भारत आना आवश्यक नहीं था। संवेदना व सहानुभूतवश वह यहां आया था। राहत व मुआवजे के लिए उसकी मदद ली जानी चाहिए थी। रसगोत्रा के अनुसार भी एंडर्सन दुर्घटना का उत्तर दायित्व महसूस करके ही यहां आया था और पीड़ितों की अधिकतम सहायता करना चाहता था। अब यदि दुर्घटना के अपराध की जिम्मेदारी ही तय करनी हो, तो उसकी सर्वाधिक जिम्मेदारी यू.सी.आई.एल. के अध्यक्ष व अन्य अधिकारियों पर जाती है। एंडर्सन पर नहीं। उसके लिए मध्य प्रदेश की सरकार व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जिम्मेदार ठहराये जा सकते हैं, जिन्होंने असुरक्षा की शिकायतों पर स्वयं कारखाने का दौरा करके यहा प्रमाण-पत्र दिया कि वहां कोई समस्या नहीं है, बल्कि सब कुछ ठीक-ठाक है। अर्जुन सिंह ने तो एंडर्सन से भी अधिक गैरजिम्मेदारी दिखायी। एंडर्सन अमेरिका से चलकर भोपाल पहुंचा, लेकिन अर्जुन सिंह दुर्घटना की सुबह अपने चुरहट महल में रहने चले गये कि कहीं गैस का कोई प्रभाव उन तक न पहुंच पाए।

वास्तव में केंद्र सरकार की गलती यह नहीं है कि उसने एंडर्सन को वापस भेजा, बल्कि गलती यह है कि आज के केंद्रीय नेताओं में इसे स्वीकार करने का साहस नहीं है, क्योंकि पूरे देश की यह मानसिकता है कि यदि किसी मामले में कोई विदेशी हाथ लग जाए, तो उसकी ओट में अपने सारे पाप छिपा लो। अर्जुन सिंह ने भी लंबे मौन के बाद अब अपनी जबान खोल दी है। उनका साफ कहना है कि एंडर्सन को दिल्ली भेजवाने से उनका कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने विस्तार से तो कुछ नहीं बताया, लेकिन शनिवार को उन्होंने एंडर्सन के मामले से अपनी गर्दन छुड़ाकर उसे केंद्र के उूपर डाल दिया।

अब इसका निपटारा 10 सदस्यीय ‘मंत्री समूह’ को करना है। एंडर्सन का मामला राज्य सरकार के सिर थोपने की केंद्रीय नेताओं की कोशिश नाकाम हो गयी है। देश का कोई एक व्यक्ति भी यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि बिना केंद्र की अनुमति के एंडर्सन देश के बाहर जा सकता है। इसलिए मंत्रिसमूह को अब एंडर्सन का मसला भी हल करना है। अपने नेताओं, अफसरों तथा केशव महेंद्र जैसे भारतीय उद्यमियों का बचाव करने के लिए एंडर्सन को ‘स्केप गोट’ बनाना आवश्यक है। देश भर से यह मांग उठ रही है कि भोपाल गैस मामले को दुबारा खोला जाए और ताजा आंकड़ों के आधार पर नया आरोप पत्र दायर किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय तथा प्रधानमंत्री के पास ऐसे अनुरोध वाले करीब 76 हजार पुत्र पहुंचे हैं और आते भी जा रहे हैं। देश के 69 सांसदों ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस मामले में अदालती कार्रवाई दुबारा शुरू करने को कहा है।

इस मामले में अब केंद्र और मध्य प्रदेश की राज्य सरकार के बीच प्रतिस्पर्धा है। मध्य प्रदेश सरकार भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में ‘क्योरेटिव’ याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है। केंद्रीय विधि मंत्रालय ने भी मंत्रियों के समूह को ऐसी ही याचिका दायर करने की सलाह दी है।

खैर, अब अधिक देर नहीं है। 10 सदस्यीय मंत्रिसमूह कल सोमवार या मंगलवार तक अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को दे देगा, जिसमें राहत, पुनर्वास व मुआवजे बढ़ाने की संस्तुतियों के साथ कुछ कानूनी संस्तुतियां भी होंगी, जिसमें एंडर्सन को भारत बुलाने की संभावनाएं तलाशने की बात भी होगी। जैसे भी हो देश भर में भड़के असंतोष को शांत करने की कोशिश की जाएगी। भोपाल गैस त्रासदी के असली दोषी देश के भीतर हैं, बाहर नहीं। मुश्किल यही है कि इन भीतरवालों को कोई सजा नहीं मिल पाएगी। लेकिन इस सारे हंगामें का लाभ गैस पीड़ितों को अवश्य मिलेगा। कम से कम उनके राहत और पुनर्वास का प्रबंध बेहतर हो जाएगाअ और संभवतः मुआवजा राश् िभी कुछ हजार से बढ़कर एक-दो लाख हो जाए।(20.6.2010)

यह राजनीति और न्याय की त्रासदी

भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल से अधिक गुजर गये हैं। एक ऐसी त्रासदी जिसकी कल्पना से भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन इन 25 वर्षों में इसे लेकर जो राजनीतिक व न्यायिक प्रक्रिया का खेल खेला गया, वह और भी अधिक त्रासद है। इतना बड़ा अपराध, जिसमें 22 हजार से अधिक लोग मारे गये और 6 लाख से अधिक पीड़ित हुए, उसके लिए किसी को एक घंटे की भी सजा नहीं। कहने को 7 लोगों को 2-2 वर्ष के कारावास की सजा दी गयी, लेकिन कोई एक मिनट के लिए भी जेल नहीं गया। तमाम लोग एंडर्सन के पीछे पड़े हैं, लेकिन भोपाल कांड के असली अपराधी तो इस देश के ही हैं। और एंडर्सन को भी न्याय की पहुंच से दूर पहुंचाने वाले भी इस देश के ही लोग हैं। आखिर उनके लिए सजा का कौनसा प्रावधान है।





अब से करीब 26 वर्ष पूर्व भोपाल मेंे एक भयावह औद्योगिक दुर्घटना हुई थी (जो पूरी दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है) जिसमें 22000 से अधिक लोग (अधिकृत आंकड़ा 15134) मारे गये थे और करीब 6 लाख लोग प्रभावित हुए थे, यानी विभिन्न स्तर की विकलांग जिंदगी जीने के लिए मजबूर हुए थे। इनमें भी तब से हर दिन औसतन एक व्यक्ति की उस दुर्घटना के प्रभाव से मौत हो रही है।

2-3 दिसंबर 1984 की रात मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के शहरी इलाके में स्थित ‘यूनियन कार्बाइड इंडिया लि. (यूसीआईएल)’ के कीटनाशक कारखाने का अत्यंत विषैली गैस ‘मिथाइल आइसो साइनेट’ (मिक) से भरा टैंक फट गया था और इस घातक गैस ने शहर के एक बड़े भाग को अपनी चपेट में ले लिया था। पहले ही दिन 4000 से अधिक लोग मारे गये और फिर तो मौतों का सिलसिला चल निकला, जिसके आंकड़े 22 हजार की संख्या भी पार कर गये।

यह ऐसी दुर्घटना थी कि पूरा देश दहल उठा। उस समय केंद्र और राज्य दोनों ही स्थानों पर कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। केंद्र में राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और राज्य में ठाकुर अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री। देश में उपचुनाव होने वाले थे। प्रधानमंत्री राजीव गांधी चुनाव प्रचार अभियान पर थे। वह प्रचार अभियान बीच में छोड़कर भोपाल आए और पीड़ितों से मिले। 3 दिसंबर को नगर के हनुमान गंज पुलिस स्टेश्न पर घटना की प्राथमिक रिपोर्ट पुलिस ने दर्ज की, जिसमें यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडर्सन सहित 14 लोगों के उूपर आरोप दर्ज किया गया। कुछ ही दिनों के भीतर इस पूरे कांड की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सी.बी.आई.न) को सौंप दी गयी। दुर्घटना की खबर पाकर स्थिति का जायजा लेने के लिए यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन (यू.सी.सी.) के अध्यक्ष वारेन एंडर्सन 7 दिसंबर को प्रातः भोपाल पहुंच। वह दुर्घटना स्थल पर जाकर स्थिति का जायजा लेना चाहते थे, किंतु भोपाल के जिलाधिकारी (कलक्टर) मोती सिंह और पुलिस अधीक्षक ने हवाई अड्डे पर पहुंचकर उन्हें सूचित किया कि उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। उनके साथ यूसीआईएल के अध्यक्ष केशव महेंद्र तथा उपाध्यक्ष विजय प्रकाश गोखले भी थे। उन तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन तीनों के नाम एफ.आई.आर. में थे। उन्हें गिरफ्तार करके किसी सरकारी कार्यालय में नहीं, बल्कि यूनियन कार्बाइड के अतिथि गृह (गेस्टहाउस) में ले जाया गया। बताया जाता है कि एंडर्सन के कमरे में टेलीफोन था, जिससे उन्होंने अपने संपर्क वाले उच्चाधिकारियों को संपर्क किया। किसे संपर्क किया, यह नहीं मालूम, लेकिन उसके बाद फौरन उनकी रिहाई की प्रक्रिया शुरू हो गयी और उन्हें ससम्मान वापस दिल्ली भेजने का प्रबंध किया जाने लगा। उन तीनों को वहीं फटाफट गेस्टहाउस में ही जमानत हो गयी और एंडर्सन को राज्य सरकार के विशेष विमान से अपराह्न दिल्ली के लिए रवाना कर दिया गया। उनसे कहा गया कि उनका यहां रहना ठीक नहीं है, इसलिए वे फौरन निकल जाएं। एंडर्सन दिल्ली पहुंचने के शायद तुरंत बाद न्यूयार्क के लिए रवाना हो गये। उनके साथ उस विशेष विमान में कोई और गया या नहीं, इसकी सही-सही जानकारी नहीं है। केशव महेंद्र और विजय प्रकाश गोखले की आगे की कहानी का भी पता नहीं है।

अब सबसे अहम सवाल यह उठता है कि इतनी भयावह दुर्घटना के जिम्मेदार अधिकारियों को इस तरह गिरफ्तार करने के बाद क्यों छोड़ दिया गया ? और छोड़ ही नहीं दिया गया, उन्हें राज्य सरकार के किसी विशेष राजकीय अतिथि की तरह राज्य सरकार के विमान से दिल्ली भेजा गया और कभी वापस न लौटने के लिए न्यूयार्क रवाना करा दिया गया। यह सब कैसे हुआ ? किसके आदेश से हुआ? वह कौन व्यक्ति है, जिसे अपने देश के हजारों पीड़ित नागरिकों के बजाए उसकी सुरक्षा की चिंता अधिक थी, जो इन हजारों लोगों की मौता और लाखों लोगों की असीमित पीड़ा का उत्तरदायी था?

हनुमानगंज पुलिस थाने के प्रभारी सुरेंद्र सिंह के अनुसार दुर्घटना के बाद उसके जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध भारतीय दंड विधान संहिता (आई.पी.सी.) की धारा 304 (ए), 120 (बी) 278, 284, 426 व 429 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया था। इनमें से 304 (ए) गैरजमानती है। यानी इसकी जमानत पुलिस नहीं ले सकती। खबर है कि एंडर्सन व महेंद्र को जमानत दिलाने के लिए एफ.आई.आर. में से 304 (ए) को हटवा दिया गया -बाद में आगे चलकर सी.बी.आई. ने एंडर्सन, महेंद्र और गोखले पर 304 (प्प्) लगाने की संस्तुति की थी, किंतु उस समय सर्वोच्च न्यायालय ने से 304 (ए) में बदल दिया था। 304 (प्प्) में यदि मुकदमा चलता, तो अपराध सिद्ध होने पर अभियुक्तों को अधिकतम 1 0 वर्ष कैद की सजा हो सकती थी, किंतु 304 (ए) में अधिकतम केवल 2 साल की सजा तथा 1 लाख जुर्माना करने का प्रावधान है और उसमें भी दोषी को तत्काल जमानत भी मिल सकती है। मतलब यह कि दो साल के कारावास की सजा मिल भी जाए, तो अभियुक्त को जेल न जाना पड़े और फौरन मामूली मुचलके पर जमानत मिल जाए। गत 7 जून को वही हुआ कि भोपाल के सत्र न्यायाधीश ने जिन 7 लोगों को 2-2 साल की कैद की सजा सुनाई, उन सबको तत्काल जमानत भी दे दी और वे सजा सुनकर आराम से अपने अपने घर चले गये। कोई भी पूछ सकता है कि किसके आदेश पर यह सारी कार्रवाई हुई। भोपाल के जिलाधिकारी मोती सिंह का कहना है कि उन्हें राज्य के मुख्य सचिव ब्रह्मस्वरूप से निर्देश प्राप्त हुआ थ कि एंडर्सन की तत्काल रिहाई का इंतजाम करके उन्हें वापस भेजना है। उनके ही निर्देश पर पुलिस ने आगे की कार्रवाई की और पुलिस अधीक्षक स्वराजपुरी ने पुलिस के स्तर की सारी व्यवस्था की। मुख्य सचिव ब्रह्मस्वरूप का निधन हो चुका है। इसलिए उनसे किसी बात की पुष्टि नहीं हो सकती, किंतु ब्रह्मस्वरूप के परिवार के लोग मोती सिंह के बयान से बहुत आहत हैं। ब्रह्मस्वरूप के एक संबंधी डॉ. रामस्वरूप का कहना है कि मोती सिंह राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खास आदमी हैं, इसलिए वह अर्जुन ंिसंह को बचाने के लिए सारे आरोप उस व्यक्ति पर मढ़ रहे हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं है। यदि ब्रह्मस्वरूप ने कोई निर्देश दिया भी होगा, तो वह मुख्यमंत्री अर्जुन ंिसंह के कहने पर ही दिया होगा। एंडर्सन की रिहाई और उन्हें विशेष विमान से बाहर भेजने का कार्य बिना मुख्यमंत्री की अनुमति या बिना उनके निर्देश के नहीं हो सकता। कम से कम राज्य सरकार का विमान तो मुख्यमंत्री की अनुमति के बिना एंडर्सन को लेकर नहीं जा सकता था। उस विशेष विमान के पायलट के अनुसार उस विमान से एंडर्सन दिल्ली ले जाने का संदेश मुख्यमंत्री आवास से आया था। अब इस प्रकरण पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह चुप्पी साधे हुए हैं। उनका कहना है कि वे उचित समय आने पर ही इस बारे में अपना मुंह खोेलेंगे। वास्तव में यहां लाख टके का सवाल यह उठाया जा रहा है कि यूनियन कार्बाइट कार्पोरेशन (अमेरिका) के अध्यक्ष एंडर्सन को गिरफ्तारी से छुड़ाकर देश से बाहर पहुंचाने का काम किसके निर्देश पर हुआ। राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के निर्देश पर या प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निर्देश पर। क्योंकि केवल मुख्य सचिव, जिला अधिकारी या पुलिस अधीक्षक के स्तर पर यह सब नहीं हो सकता। इतना बड़ा कार्य राज्य सरकार का कोई अफसर बिना मुख्यमंत्री के आदेश के नहीं कर सकता। अब प्रश्न है कि यह फैसला क्या अर्जुन सिंह का अपना था या उन्होंने केंद्र सरकार के निर्देश पर यह सब किया। यदि केंद्र सरकार के निर्देश पर एंडर्सन को बाहर भेजने का इंतजाम किया गया, तो इसका पूरा दायित्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सिर जाता है, लेकिन यह सवाल भी कुछ कम गंभीर नहीं है कि क्या मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह या कोई भी दूसरा मुख्यमंत्री ऐसा निर्णय ले सकता है। एंडर्सन एक   अंतर्राष्ट्रीय कम्पनी  का अध्यक्ष था, कोई मध्य प्रदेश का उद्योगपति नहीं। एक अंतर्राष्ट््रीय हैसियत वाले ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तारी से छुड़ाकर देश के बाहर भेजने का काम कोई मुख्यमंत्री भी बिना केंद्र को सूचित किये या बिना उसकी अनुमति लिए नहीं कर सकता। फिर मान लिया जाए कि अर्जुन सिंह ने अपने स्तर पर ही यह सारी कार्रवाई की तो सवाल है कि फिर इस बारे में केंद्र सरकार ने उनसे कोई जवाब क्यों नहीं तलब किया। ऐसा तो नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री सहित किसी केंद्रीय मंत्री को इस गैस दुर्घटना की भयावहता की कोई जानकारी ही न रही हो। फिर केंद्र सरकार इस घटना की ऐसी अनदेखी कैसे कर सकती है।

राजीव गांधी के तत्कालीन प्रधान सचिव रहे पी.सी. एलेक्जेंडर का वक्तव्य इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। एलेेक्जेंडर ने बताया है कि 10 दिसंबर को प्रधानमंत्री के आवास पर बुलायी गयी मंत्रिमंडल की रजानीतिक मामलों की समिति (सी.सी.पी.ए.) की बैठक में भोपाल गैस त्रासदी के राजनीतिक प्रभावों पर विचार किया गया, किंतु इसमें एंडर्सन का कोई जिक्र नहीं आया। उनके वक्तव्य की सबसे खास बात है कि इस बैठक में अर्जुन सिंह भी शामिल थे। केंद्रीय कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की कमेटी की बैठक में कभी कोई मुख्यमंत्री नहीं बुलाया जाता। उसकी उपस्थिति का कोई औचित्य भी नहीं है, किंतु अर्जुन सिंह वहां उपस्थित थे। उनके अनुसार जब वह इस महत्वपूर्ण बैठक के लिए पहुंचे अर्जुन सिंह उसके पहले वहां उपस्थित थे और बैठक के उपरांत उनके जाने के बाद भी वे राजीव गांधी के ही पास थे।

ऐसा समझा जाता है कि राजीव गांधी ने अमेरिकी दबाव में आकर एंडर्सन की रिहाई की व्यवस्था की और इसके लिए मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को कहा, लेकिन राजनीतिक तौर पर दबाव की इस बात कोई सरकार स्वीकार नहीं कर सकती। लेकिन यहां सबसे बड़ी समस्या है कि केंद्र की राजीव गांधी की सरकार खुद भी यह स्वीकार नहीं कर सकती थी कि उसने एंडर्सन को रिहा कराकर बाहर भेजवाया। सच्चाई आइने की तरह साफ होने के बावजूद इस सार्वजनिक तौर स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए स्वयं अर्जुन सिंह ने उस समय पत्रकारों के समक्ष कहा कि उन्हें एंडर्सन को रिहा करने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से कोई निर्देश नहीं दिया गया। 9 दिसंबर 1984 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार अर्जुन सिंह ने इस बात से साफ इनकार किया कि उन्हें एंडर्सन को छोड़ने के लिए केंद्र सरकार से कोई आदेश मिला था, लेकिन उन्होंने यह जरूर स्पष्ट किया कि एंडर्सन को पकड़ने और छोड़े जाने की जानकारी प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दे दी गयी थी। उन्होंने एंडर्सन को क्यों रिहा कराया और क्यों उसे देश छोड़ने की इजाजत दी, इसके जवाब में उनका कहना था कि पुलिस को लगा कि गैस कांड की जांच के लिए एंडर्सन का यहां रहना जरूरी नहीं है, इसलिए उसे जाने दिया गया। तत्कालीन गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने भी इस बात की सफाई दी कि एंडर्सन की रिहाई के लिए अमेरिका से कोई दबाव था।

अमेरिका दबाव का मुद्दा नये सिरे से अभी कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह के एक बयान से उठ खड़ा हुआ। अपनी पत्नी के इलाज के लिए अमेरिका गये दिग्विजय सिंह ने वहीं से एक वक्तव्य देते हुए तत्कालीन राज्य सरकार का कोई दोष नहीं है। दिग्विजय सिंह उस समय अर्जुन सिंह के मंत्रिमंडल में मंत्री थे और अर्जुन सिंह उनके राजनीतिक गुरु भी समझे जाते हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस मामले में अमेरिकी दबाव हो सकता है। उन्होंने वास्तव में अर्जुन सिंह और राजीव गांधी दोनों का एक साथ बचाव करने की कोशिश की और यह बताना चाहा कि तत्कालीन सरकार को अमेरिकी दबाव में यह निर्णय लेना पड़ा। लेकिन उनका यह बयान रजानीतिक दृष्टि से उल्टा पड़ गया। इसका अर्थ हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अमेरिकी दबाव में आकर राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह एंडर्सन को छोड़ दे और देश के बाहर जाने दे। इससे एंडर्सन के खिलाफ कानूनी मसले को कमजोर करने का आरोप भी उनके ऊपर आ जाता है। इसलिए फौरन दिग्विजय सिंह पर दबाव पड़ा कि वह अपना बयान बदलें। तो उन्हों ने  सारी जिम्मेदारी अपने गुरु अर्जुन सिंह  पर डालते हुए कहा कि उस समय उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था और चुनाव अभियान में शामिल थे, इसलिए उन्हें ठीक-ठीक इसकी कोई जानकारी नहीं कि एंडर्सन की रिहाई कैसे हुई। निश्चय ही इसकी पूरी जानकारी अर्जुन सिंह के पास है और वे ही इसका खुलासा कर सकते हैं। कांग्रेस की प्रवक्ता जयंती नटराजन का कहना है कि वे एक ही बात विश्वासपूर्वक कह सकती हैं कि एंडर्सन की रिहाई में तत्कालीन केंद्र सरकार का कतई कोई हाथ नहीं था। वास्तव में इस समय कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता व तमाम वरिष्ठ नेता राजीव गांधी के बचाव में उतर आए हैं। इस मसले पर गत शुक्रवार की शाम केंद्र सरकार की कोर कमेटी की बैठक हुई। इसमें क्या चर्चा हुई, यह तो पता नहीं, किंतु बाहर जो दिखायी दे रहा है, उसके अनुसार एंडर्सन की फरारी की पूरी जिम्मेदारी अकेले अर्जुन सिंह पर डाली जा रही है। अर्जुन सिंह पार्टी के विशेष रूप से गांधी परिवार के सर्वाधिक वफादार सेवकों में गिने जाते हैं। उन्होंने 1984 में तो राजीव गांधी का साफ बचाव किया था, किंतु इस समय चुप्पी साधे हुए हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है। सारे नेता यही चाहते हैं कि अर्जुन सिंह सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर  लेते हुए बयान दें, लेकिन यदि वे ऐसा करते हैं, तो जीवन के अवासान काल में उन्हें भोपाल के गैस पीड़ितों की गहरी निंदा का सामना करना पड़ेगा। राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने भी उन्हें पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वे सारे मामले का खुलासा करें।

खैर, यह तो एक मुद्दा हुआ कि भोपाल गैस त्रासदी के जिम्मेदारी लोगों के बचाव में राजनीतिक नेताओं, सरकारों व अधिकारियों की किस तरह की भूमिका रही। बातें बहुत साफ हैं। सभी लोग खुले ढंग से अपने निष्कर्ष निकाल सकते हैं और राजनीति के वास्तविक चरित्र का अनुभव भी कर सकते हैं। किंतु इस प्रकरण में इस देश के न्यायपालिका की भूमिका भी अत्यंत संदिग्ध रही है। और आरोपों के दायरे से देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को भी बाहर नहीं रखा जा सकता।

एंडर्सन की रिहाई का निर्देश भले ही तत्कालीन केंद्र सरकार से मिला हो, लेकिन अर्जुन ंिसंह इस मामले में पूरी तरह निर्दोष करार नहीं दिये जा सकते, बल्कि ईमानदारी से सारे प्रकरण की समीक्षा की जाए, तो एंडर्सन से अधिक बड़े अपराधी भारत के लोग नजर आते हैं। अब तो अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी.आई.ए. के वे पेपर भी सामने आ गये, जिसमें यह स्पष्ट संकेत हैं कि तत्कालीन केंद्र सरकार ने एंडर्सन को बाहर निकलने में मदद की। इसलिए इस प्रकरण पर आगे की बहस छोड़ ही देनी चाहिए, लेकिन अर्जुन सिंह सरकार इस आरोप से तो अपने को मुक्त नहीं कर सकती कि उसकी लापरवाही और गैर जिम्मेदारीपूर्ण रवैये के कारण यह भयावह दुर्घटना हुई। स्वयं यूनियन कार्बाइट के जांच दल ने आकर कारखाने का निरीक्षण किया था और जांच रिपोर्ट दी थी कि वहां सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी की जा रही है। विषैली गैस को ठंडा करने के ‘कूलिंग प्लांट’ बंद पड़े हैं। कर्मचारियों की यूनियनों की तरफ से भी शिकायतें की गयी थीं। 2-3 दिसंबर 84 की रात से पहले भी कारखाने में गैस के रिसाव से छोटी-मोटी कई दुर्घटनाएं हो चुकी थीं, जिसमें कई श्रमिक मारे भी गये थे। लेकिन अुर्जन सिंह ने इस दुर्घटना के कुछ दिन पहले ही राज्य विधानसभा में कहा था कि उन्होंने स्वयं कारखाने का निरीक्षण किया है और वहां सब कुछ ठीक-ठाक है। कोई समस्या नहीं है। इस पूरे प्रकरण के दो स्पष्ट पक्ष हैं। एक तो है वह आपराधिक लापरवाही, जो कारखाने की स्थापना व उसके रख-रखाव में बरती गयी। इसके जिम्मेदार लोग ही वास्तव में उस भयावह दुर्घटना के जिम्मेदार हैं, जिसमें 22000 से अधिक लोग मारे गये। उनकी इस आपराधिक लापरवाही के लिए सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए, जिससे कि फिर कोई उद्यमी या अधिकारी ऐसी लापरवाही न बरते। दुसरा पक्ष है इस दुर्घटना से प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने का। उनके इलाज व क्षतिपूर्ति स्वरूप मुआवजा दिलाने का। लेकिन इन दोनों ही मामलों में राजनेताओं, सरकारों तथा सर्वोच्च न्यायालय तक ने घोर संवेदनशून्यता का परिचय दिया है।

दुर्घटना के दो महीने बाद ही भारत सरकार की तरफ से एक अमेरिकी अदालत में यूनियन कार्बाइड के खिलाफ 3.3 अरब डॉलर का मुआवजा देने का दावा ठोका गया। अमेरिकी अदालत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई भारत में ही होनी चाहिए, क्योंकि घटना भारत की है और दुर्घटना की शिकार कंपनी भी भारत की है। उसके सभी अधिकारी भारतीय हैं और यू.सी.सी. का इतना दायित्व है कि उसमें उसके 50 प्रतिशत से कुछ अधिक के शेयर हैं। मामला भारतीय अदालत में आ गया। दिसंबर 1987 में एंडर्सन और अन्य आरोपियों के खिलाफ सी.बी.आई. ने अपना आरोप पत्र पेश किया। उसके खिलाफ कार्बाइड की तरफ से सर्वोच्च अदालत में अपील की गयी।

सी.बी.आई. ने जो आरोप पत्र पेश किया था, उसमें एंडर्सन तथा अन्य आरोपियों के खिलाफ आई.पी.सी. की अन्य धाराओं के साथ 304 (2) भी लगाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमदी ने जाने क्यों 304 (2) को रद्द करके उसे 304 (ए) करने की सलाह दी। उनका कहना था कि 304 (2) न्यायालय के समक्ष प्रमाणित नहीं होगा।

न्यायाधीश अहमदी आज यह कह रहे हैं कि इस देश के पास ऐसी औद्योगिक दुर्घटनाओं से निपटने के लिए कानून ही नहीं है। उस समय सीबीआई द्वारा एकत्र प्रमाणों के आधार पर उन्होंने उपर्युक्त सलाह दी थी। सवाल है कि उस समय न्यायाधीश अहमदी ने सरकार को यह सलाह क्यों नहीं दी कि वह इस कांड के लिए नये कानून बनाए और उसके अंतर्गत सुनवाई हो। आश्चर्य है कि उन्होंने उपलब्ध कानून को भी और नरम करने का काम किया।

इसके बाद की घटना और रोचक है। अहमदी ने यू.सी.सी. और भारत सरकार के बीच मुआवजे की रकम के बारे में भी एक समझौता कराया। यह समझौता अदालत के बाहर हुआ। और समझौता होने के साथ ही भारत सरकार ने यू.सी.सी. के खिलाफ सारे मामले वापस ले लिये। यह समझौता मात्र 47 कराड़ डॉलर का हुआ। मात्र 3000 मृतक के लिए 75000 रुपये और पीड़ित के लिए 25000 रुपये मात्र थी।

अमेरिकी अदालत में जहां 330 करोड़ डॉलर के मुआवजे का दावा किया गया था और भारत में वह मात्र 47 करोड़ पर तय हो गया। यह समझौता कराने में न्यायाधीश अहमदी की प्रमुख भूमिका थी। भोपाल में यूनियन कार्बाइड द्वारा एक सर्वसुविधा संपन्न 500 बिस्तरों वाला अस्पताल बनावाया गया। कहा गया कि इसमें गैस पीड़ितों की निःशुल्क चिकित्सा होगी। लेकिन यहां अब गैस पीड़ितों को कोई पूछने वाला नहीं है। इस अस्पताल के मुख्य कक्ष में आज भी एक बड़ा चित्र लगा हुआ है, जो बरबस लोगों का ध्यान आकृष्ट करता है- वह चित्र है भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमी का। सेवानिवृत्ति के बाद यू.सी.सी. ने उन्हें इसका मैनेजिंग ट्र्स्टी (प्रबंध न्यासी) बना दिया। उनकी सहायता के लिए अमेरिका की तरफ से उन्हें एक और पुरस्कार मिला। अमेरिकी सहयोग से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय   न्यायालय (इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस) में स्थान मिल गया। अहमदी साहब इस समय देश में अल्पसंख्यकों के कानूनी अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।

गत 7 जून को भोपाल के सत्र न्यायाधीश ने 25 वर्षों बाद जो फैसला दिया, उससे पूरे देश का चैंकना स्वाभाविक था। जिन अधिकारियों की घोर लापरवाहीवश इतना बड़ा हादसा हुआ, उन्हें इतनी कम सजा। यह कोई न्याय है या न्याय का मजाक ? लेकिन इस तरह से चैंकने वाले केवल आम लोग हैं, जिन्हें न अदालतों के नाटक की जानकारी है, न राजनेताओं के मायाजाल की। सरकारों तथा कानून के जानकारों को तो पहले से पता था कि इस मामले में किसी को कोई वास्तविक सजा नहीं होनी है। दो साल के कैद की सजा भी एक कागजी कर्मकांड है। लेकिन फैसले की घोषणा के बाद मीडिया में जो हंगामा मचा, तो अब सारी सरकारें बचाव मुद्रा में आ गयी हैं। आलोचनाओं से बचने के लिए केंद्र सरकार ने 10 सदस्यीय मंत्रिमंडलीय समिति बनायी है, तो मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने कानूनी विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरी समिति। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि वे अभियुक्तों की सजा बढ़वाने के लिए अपील करेंगे, जबकि उन्हें पता ही नहीं है कि इस मामले में न तो वे कोई अपील कर सकते हैं, न किसी की सजा बढ़ सकती है, क्योंकि कानून की सीमा में अधिकतम सजा दी जा चुकी है। और जिस मामले में जांच करके मामला दर्ज कराने वाली सीबीआई जैसी कोई केंद्रीय संस्था हो, उसमें अपील का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है, राज्य सरकार को नहीं।

केंद्र सरकार भी कह रही है कि वह एंडर्सन को भारत में प्रत्यर्पण कराकर फिर मुकदमा चला सकती है। अमेरिका के साथ भारत की प्रत्यर्पण संधि है। अमेरिकी सरकार ने भी कहा है कि यदि भारत कोई इस तरह का अनुरोध करता है, तो वह इस पर विचार करने के लिए तैयार है। लेकिन अव्वल तो यह होने वाला नहीं, दूसरे हो भी जाए, तो उससे होगा क्या? हमारे पास इसके लिए जरूरी कानून तो अभी भी नहीं है। और कानून बन भी जाए, तो क्या देश का राजनीतिक चरित्र बदल जाएगा ? क्या वह आगे विदेशी दबावों में नहीं आएगा ? क्या तब यहां के न्यायालय आम आदमी के पक्षधर बन जाएंगे ? 90 वर्षीय एंडर्सन निश्चय ही अमेरिका में बैठा हंस रहा होगा भारत की सरकारों, यहां के राजनेताओं और न्यायालयों पर। लेकिन क्या यहां किसी को उसकी हंसी सुनाई दे रही है। (13-6-2010)

रविवार, 3 जनवरी 2010

देश की संघीय राजनीति का स्वरूप बदलने की जरूरत

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भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक संघीय लोकतांत्रिक ढांचा तो स्वीकार किया, किंतु देश में आज तक कोई स्वस्थ संघीय लोकतांत्रिक संस्कृति नहीं विकसित हो सकी। देश में जगह-जगह उठ रही पृथक राज्यों की मांग इसी अभाव का परिणाम है। तेलंगाना समस्या भी इसका अपवाद नहीं। भाषा आधारित राज्य विभाजन के कारण यह देश एक भाषाई राष्ट्रीयताओं का संघ बन गया, जिनमें सहयोग के बजाए प्रतिद्वंद्विता अधिक विकसित हुई। इतना ही नहीं, एक राज्य के भीतर भी भिन्न राष्ट्रीयताएँ और उनके द्वंद्व खड़े होने लगे। अब इसका अंतिम समाधान तभी हो सकता है, जब संघ की प्रचलित अवधारणा बदली जाए तथा राज्यों को एक सांस्कृतिक राजनीतिक इकाई मानने के बजाए मात्र एक प्रशासनिक इकाई माना जाए।

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जब कोई नया साल आता है, तो समझा यही जाता है कि पुराना साल अवसाद के सारे क्षणों को अपने साथ समेटकर ले जाएगा और नया साल सूरज की नई किरणों के साथ आशा का नया उपहार लेकर आएगा। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं लग रहा है। कालचक्र अखंड है, इस बार का वर्ष परिवर्तन इसका पूरा अहसास करा रहा है। जैसा पिछला साल लगभग वैसा ही अगला साल। पिछले साल के बारे में यही कहा जा सकता है कि वह जितना बुरा हो सकता था, उतना बुरा नहीं रहा। अब अगले साल के लिए भी यही कामना की जा सकती है कि इसे लेकर जितनी बुरी आशंकाएं हैं, उतना बुरा यह न हो।
2010 एक नया साल ही नहीं, एक नये दशाब्द (डेकेड) की शुरुआत भी है। आज की दुनिया जितनी तेजी से बदल रही है, उसमें 10 साल की अवधि कुछ कम नहीं होती। फिर भी सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिï से यदि देखें, तो पिछले और अगले दशक में कोई खास फर्क रहने वाला नहीं है। दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बना आतंकवाद नये वर्ष में क्या नये दशक में भी निपट पाएगा, इसकी कोई उम्मीद दिखायी नहीं देती। दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से बाहर भी निकल आएगी, तो आम आदमी के जीवन में कोई खास परिवर्तन होने वाला नहीं है। विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में अवश्य नये कीर्तिमान स्थापित हो सकते हैं, लेकिन सामान्य जिंदगी लगभग वहीं रहने वाली है।
अपने देश व अपने प्रदेश पर यदि नजर डालें, तो 2010 वास्तव में 2009 का विस्तार ही लगता है। तेलंगाना इस समय देश की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या बना हुआ है। बीते साल के अंतिम महीने में तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन की घोषणा के साथ शुरू हुए आंदोलन का नया दौर केंद्र और राज्य दोनों को उलझाए हुए है। कहा जा सकता है कि केवल एक व्यक्ति की भूख हड़ताल ने पूरी राष्ट्रीय राजनीति को पंगु बना दिया है। सवाल है कि ऐसा क्यों ? क्यों राज्य से लेकर केंद्र तक के सारे नेता निरुपाय नजर आ रहे हैं? उत्तर बहुत मुश्किल नहीं है, लेकिन उसे कोई स्वीकार नहीं करना चाहता। सच्चाई यह है कि प्रखर व न्यायनिष्ठï नेतृत्व का अभाव सारी समस्या की जाड़ है।
कहने को इस देश में संघीय शैली का लोकतंत्र है, किंतु वास्तविकता यह है कि यहां अब तक किसी तरह की संघीय संस्कृति का विकास नहीं हो सका है। भाषा पर आधारित राज्यों के गठन के निर्णय ने देश में अनेक भाषाई द्वीप बना दिये, जो परस्पर सहयोग की जगह प्रतिद्वंद्विता के मार्ग पर चल रहे हैं। प्राचीनकाल के भारतीय राजतंत्रों के बारे में कहा जाता था कि राजा असंख्य गणतंत्रों का मात्र रक्षक व नियामक है, लेकिन आज लोकतंत्रों की शासन शैली भी संकीर्ण सामंती शैली में बदल गयी है। इससे प्राय: हर क्षेत्र में राष्ट्रीयता की भावना क्षीण हो रही है। धरती पुत्र (सन ऑफ सायल) के विशेषाधिकार तथा मुल्की-गैर मुल्की (नेटिविज्म) की भावनाएं बढ़ती जा रही हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र, धर्म (रिलीजन) आदि की संकीर्णताएं लोकतंत्र को ही ग्रसने पर आमादा हैं।
सिद्धांतत: लोकतंत्र और न्याय का अविभाज्य संबंध है। न्याय पर आधारित लोकतंत्र ही वास्तविक लोकतंत्र होता है। किसी के संख्या बल, शस्त्र बल या बाहुबल से विधि सम्मत शासन और न्याय की रक्षा करना किसी भी तंत्र का मूल आधार है। राज्य की कल्पना ही इसीलिए की गयी कि मत्स्य न्याय या जंगल के कानून को रोका जाए तथा ऐसी न्यायिक व्यवस्था कायम की जाए, जिसमें शेर-बकरी दोनों एक घाट पर पानी पी सकें, यानी कमजोर व्यक्ति के भी अधिकारों और हितों की रक्षा हो सके और प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग का सबको समान अधिकार मिल सके । विकासक्रम में अन्य तंत्रों की जगह लोकतंत्र को इसीलिए श्रेष्ठïता प्रदान की गयी है कि शासन तंत्र किसी एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा या अहमन्यता का शिकार न हो सके। जन समुदाय स्वयं न्याय की रक्षा कर सके। लेकिन आज लोकतंत्र फिर भीड़तंत्र की ओर बढ़ चला है। धरना, आंदोलन, हिंसा व तोडफ़ोड़ द्वारा अपनी बात मनवाने की प्रवृत्ति कतई लोकतांत्रिक नहीं कही जा सकती, लेकिन यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यद्यपि ऐसा करने वालों की इस शिकायत की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि यदि लोकतांत्रिक तरीकों से कोई बात सुनी ही नहीं जाती, तो क्या किया जाए। यदि सत्ता पर कुंडली बांधकर बैठा हुआ निहित स्वार्थी समुदाय सारी मर्यादाएं तोड़कर केवल अपनी असीमित स्वार्थ सिद्धि में लग जाए, तो क्या किया जाए।
भारतीय संघीय व्यवस्था में इसीलिए एक मजबूत केंद्र की व्यवस्था की गयी कि वह प्रत्येक राज्य की राजनीतिक व प्रशासनिक गतिविधियों पर नजर रखे और जहां जरूरी हो, वहां हस्तक्षेप करे। लेकिन यदि केंद्र भी उन्हीं विकृतियों का शिकार हो जाए, तो सामान्य स्थिति में उसका कोई इलाज नहीं रह जाता।
तेलंगाना समस्या मूलत: सामाजिक न्याय की समस्या है, जो अब राजनीतिक समस्या बन गयी है। और यह राजनीतिक समस्या भी अब दलीय स्वार्थ की समस्या में बदल गयी है। कोई भी राजनीतिक दल इस आधार पर अपना रुख नहीं तय कर रहा है कि क्या उचित है, क्या अनुचित अथवा क्या होना चाहिए, क्या नहीं, बल्कि वह यह देख रहा है कि किस स्थिति में उसे अधिक राजनीतिक लाभ हो सकता है, किस स्थिति में कम। क्षेत्र हित या राष्टï्रहित उनके लिए कोई कसौटी नहीं, इसलिए वे अपनी नीति केवल इस आधार पर तय कर रहे हैं कि उन्हें सर्वाधिक राजनीतिक लाभ किस अवस्था में मिल सकता है।इस मामले में ताजा स्थिति यह है केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने इसी 5 जनवरी (2010) को राज्य के आठ राजनीतिक दलों के नेताओं की दिल्ली में बैठक बुलायी है। सभी दलों से दो-दो प्रतिनिधि को भेजने के लिए कहा गया है। राज्य के मुख्यमंत्री आमंत्रित किये गये हैं। चिदंबरम साहब एक तरफ तो यह कह रहे हैं कि इस बैठक में पृथक तेलंगाना राज्य के गठन का 'रोडमैपतैयार किया जाएगा, दूसरी तरफ अगली ही सांस में वे यह भी कहते हैं कि इस बारे में अंतिम फैसला इस सर्वदलीय बैठक के बाद लिया जाएगा।
राज्य के इन आठों दलों की राजनीतिक स्थिति स्पष्ट है। टी.आर.एस. (तेलंगाना राष्ट्र समिति), भा.ज.पा. (भारतीय जनता पार्टी) और सी.पी.आई. (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) स्पष्टï रूप से पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थक हैं।
इनके अतिरिक्त कांग्रेस, तेलुगु देशम पार्टी, प्रजा राज्यम पार्टियां क्षेत्रीय आधार पर दो फाड़ हैं और उनके शीर्ष नेताओं का रवैया ढुलमुल है। इन पार्टियों के तेलंगाना क्षेत्र के नेता पृथक तेलंगाना के समर्थक हैं, तो शेष राज्य के नेता राज्य के वर्तमान स्वरूप को बनाए रखना चाहते हैं। एम.आई.एम. (मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन) अपना कार्ड अभी अपने आस्तीन में छिपाए हैं। उसका फिलहाल न तेलंगाना से कुछ लेना-देना है, न 'समेक्य आंध्रा' से, हां उसका हैदराबाद से जरूर गहरा लेना-देना है। इसलिए वह अपना कोई फैसला जाहिर करने के पहले यह देखना चाहती है कि हैदराबाद के बारे में क्या निर्णय होता है। यद्यपि पृथक तेलंगाना बनने पर शायद सर्वाधिक राजनीतिक लाभ उसे ही हो, लेकिन वह अभी पूरी तरह अपनी तटस्थता बनाए हुए है। स्पष्टï रूप से विभाजन के खिलाफ केवल एक पार्टी है माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, लेकिन उसके भी एक नेता सीताराम येचुरी अभी कुछ दिन पहले ऐसा बयान दे चुके हैं कि तेलंगाना को अलग राज्य बनाया जा सकता है।
कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अभी अपना कोई भी रुख व्यक्त करने से कतरा रहा है। वह राज्य का विभाजन करने या न करने का फैसला अन्य राजनीतिक दलों के सिर मढऩा चाहता है। इसलिए अन्य दल भी पहले उसे घेरने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। तेलुगु देशम पार्टी व भाजपा जैसे विपक्षी दल 5 जनवरी की बैठक में कांग्रेस पर दबाव डालेंगे कि पहले वह अपना रुख स्पष्टï करे। जाहिर है, इस तरह की रस्साकशी के बीच इस बैठक में शायद ही कोई फैसला हो सके। किसी दूसरी बैठक पर सहमति के साथ यह बैठक खत्म हो सकती है।
रोचक बात यह है कि विपक्षी दलों की तो यह पूर्व धारणा है ही कि इस बैठक में कोई फैसला नहीं होने जा रहा है, स्वयं कांग्रेस के नेतागण भी इससे बहुत आशान्वित नहीं है। उसके तेलंगाना व आंध्र दोनों क्षेत्रों के नेता केवल इस तैयारी में लगे हैं कि उनकी राय के विरुद्ध कोई फैसला न होने पाए।
राज्य के वक्फ मामलों में मंत्री जी. वेंकट रेड्डïी ने अभी कहा है कि सोनिया गांधी ने कभी तेलंगाना को अलग राज्य बनाने पर हामी नहीं भरी। वह राज्य विभाजन के सख्त विरोधी हैं। इसके लिए उनकी गृहमंत्री पी. चिदंबरम से भी गहरी नाराजगी है। उनका कहना है कि चिदंबरम कौन होते हैं फैसला करने वाले। तेलंगाना के लिए 'रोडमैप' बनाने का बयान भी उनका अपना है, कोई कांग्रेस का बयान नहीं।
यह सही है कि तेलंगाना का रायता फैलाने का काम चिदंबरम साहब ने ही किया है। निर्णय भले ही हाईकमान की कोर कमेटी का हो, लेकिन मोर्चे पर तो वही खड़े हैं। राज्य के मुख्यमंत्री रोशय्या ने तो अपना कुल भार केंद्र पर डाल दिया, इसलिए केंद्र ने अब चिदंबरम को बीच की दीवार बनाया है। अभी उन्हें शायद लगता है कि वह तेलंगाना की मांग को दबा ले जाएंगे। इसके लिए उन्होंने एक अलोकतांत्रिक प्रशासनिक तरीका भी अपनाया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल पूर्व पुलिस अधिकारी ई.एस.एल. नरसिंहन को आंध्र प्रदेश का अस्थाई राज्यपाल बनवाकर यही कोशिश की है कि उनके माध्यम से शायद तेलंगाना के विद्रोहियों पर काबू पाया जा सकता है। गृहमंत्रालय के निर्देश पर ही नरसिंहन साहब ने राज्यपाल के अतिरिक्त मुख्यमंत्री को बताए राज्य के मंत्रियों व अफसरों को बुलाकर बात कर रहे हैंऔर निर्देश भी दे रहे हैं। तेलंगाना क्षेत्र के प्राय: सारे प्रमुख नेता अब तक उनसे मिल चुके हैं।
5 जनवरी के पहले वह अपनी रिपोर्ट लेकर दिल्ली पहुंचने वाले हैं। तेलंगाना क्षेत्र का जो भी नेता अब तक उनसे मिला है वह कुछ खिन्न होकर ही वापस आया है। वह तेलंगाना समस्या को कोई राजनीतिक समस्या न मानक शायद केवल कानून व्यवस्था की समस्या समद्ब्रा रहे हैं। खबर है कि उन्होंने उस्मानिया विश्व विद्यालय के कुलपति को इसके लिए डांट पिलाई कि उन्होंने पुलिस को कैंपस में अंदर जाने से क्यों रोका। 'वह कौन होते हैं पुलिस को रोकने वाले।' यह बात अलग है कि राज्यपाल पदेन राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं, लेकिन विश्व विद्यालय के मामलों में कुलपति को लगभग पूर्ण स्वायत्तता होती है। लेकिन पुलिस अफसर राज्यपाल ने उन्हें हड़का लिया।
केंद्र सरकार विशेषकर चिदंबरम साहब को यह समद्ब्राना चाहिए कि तेलंगाना समस्या सामाजिक न्याय से जुड़ी एक राजनीतिक समस्या है इसे पुलिसिया तौर तरीकों से नहीं निपटाया जा सकता।
सही बात यह है कि बड़े राज्यों के विभाजन तथा नये राज्यों के निर्माण पर केन्द्र सरकार को अपना रुख स्पष्टï करना चाहिए। उसे यह बात दृढ़ता से कहनी चाहिए कि प्रांत भले ही भाषाई आधार पर बंटे हों, किंतु वहां बसने वाले नागरिक भारत देश के नागरिक हैं। मुल्की-गैरमुल्की (नेटिविज्म) तथा धरतीपुत्र (सन आफ सायल) की धारणाएं यहां देश के भीतर नहीं चल सकतीं। हां किसी क्षेत्र या वर्ग के साथ यदि कोई अन्याय हुआ है तो उसे तत्काल दूर किया जाएगा। राज्य केवल प्रशासनिक इकाइयां हैं ये किसी जाति, नस्ल या भाषावालों की जागीर नहीं। आज की दुनिया में एक भाषाई, एक नस्ली या किसी एक विशिष्टï संस्कृति वाले राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लोकतंत्र का तकाजा है कि हर क्षेत्र यानी हर राज्य में हर भाषा, हर नस्ल एवं हर संस्कृति के लोगों को बसने, जीविका अर्जित करने तथा राजनीतिक भागीदारी करने का अधिकार है। क्या चिदंबरम साहब, साहसपूर्वक ऐसी कोई घोषणा कभी कर सकेंगे?

(3, जनवरी 2010)

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

क्या 'हिन्दू शब्द भारत के लिए समस्या नहीं बन गया है?

आज हम 'हिन्दू शब्द की कितनी ही उदात्त व्याख्या क्यों न कर लें, लेकिन व्यवहार में यह एक संकीर्ण धार्मिक समुदाय का प्रतीक बन गया है। राजनीति में हिन्दू राष्ट्रवाद पूरी तरह पराजित हो चुका है। सामाजिक स्तर पर भी यह भारत के अनेक धार्मिक समुदायों में से केवल एक रह गया है। कहने को इसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय माना जाताहै, लेकिन वास्तव में कहीं इसकी ठोस पहचान नहीं रह गयी है। सर्वोच्च न्यायालय तक की राय में हिन्दू, हिन्दुत्व या हिन्दू धर्म की कोई परिभाषा नहीं हो सकती, लेकिन हमारे संविधान में यह एक रिलीजन के रूप में दर्ज है। रिलीजन के रूप में परिभाषित होने के कारण भारत जैसा परम्परा से ही सेकुलर राष्ट्र उसके साथ अपनी पहचान नहीं जोडऩा चाहता। सवाल है तो फिर हम विदेशियों द्वारा दिये गये इस शब्द को क्यों अपने गले में लटकाए हुए हैं ? हम क्यों नहीं इसे तोड़कर फेंक देते और भारत व भारती की अपनी पुरानी पहचान वापस ले आते।


हिन्दू धर्म को सामान्यतया दुनिया का सबसे पुराना धर्म कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि दुनिया में ईसाई व इस्लाम के बाद हिन्दू धर्म को मानने वालों की संख्या सबसे अधिक है। लेकिन क्या वास्तव में हिन्दू धर्म नाम का कोई धर्म है? दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे डॉ. डी.एन. डबरा का कहना है कि 'हिन्दू धर्म दुनिया का सबसे नया धर्म है। हो सकता है कि कुछ धर्म इससे भी नये हों, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि हिन्दू धर्म दुनिया के नवीनतम धर्मों में से एक है। यह एक ऐसा धर्म है, जिसे अंग्रेजों ने पैदा किया। डी.एन. डबरा साहब की यह बात बहुत हद तक सही है, क्योंकि 19वीं श्ताब्दी के पहले 'हिन्दू शब्द कभी भी धर्म के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ। यद्यपि यह शब्द 12वीं, 13वीं शताब्दी में भारत आ चुका था, लेकिन 19वीं शताब्दी के पहले तक यह भारत भूमि के निवासियों का द्योतक था। इस शब्द का व्यापक प्रयोग दिल्ली में सल्तनत काल की शुरुआत से शुरू होता है, लेकिन यह केवल बाहर से आये मुसलमानों से भिन्न देशी निवासियों की पहचान के लिए प्रयुक्त होता था। कश्मीरी तथा दक्षिण भारत के साहित्य में यह १३२३ ई. से मिलने लगता है। 14वीं शताब्दी के विजयनगर के शासकों को 'हिन्दूराय सुरतरण यानी 'हिन्दू राजाओं में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, लेकिन यहां हिन्दू राजा से आशय देशी राजा था। उनका मुकाबला बीजापुर के सुल्तान से रहता था। सुल्तान का अर्थ था विदेशी मुस्लिम राजा। 17वीं शताब्दी की तेलुगु रचना 'रायवचकमु' में विदेशी मुस्लिम शासकों को क्रूर व अन्यायी बताते हुए निंदा की गयी है। 1455ई. में कवि पद्मनाभ ने जालेर के चौहानों की प्रशस्ति में एक ग्रंथ लिखा 'कन्हदड़े प्रबंध', इसमें राजा को हिन्दू कहकर प्रशंसा की गयी है, लेकिन यह प्रशंसा देशी राजा के लिए है, हिन्दू धर्मानुयायी के लिए नहीं। महाराण प्रताप के प्रशस्तिकारों ने उस समय उन्हें 'हिन्दू कुल कमल दिवाकर कहा है, किन्तु यहां भी यह हिन्दू, भारतीयता का पर्याय है। शिवाजी के शासन को 'हिन्दवी स्वराज्य'कहा जाता था किन्तुलेकिन उसका अर्थ भी 'स्वदेशी शासन' था, कोई हिन्दू धर्म का शासन नहीं।
डी.एन. डबरा साहब ने ही बताया है कि अंग्रेजों ने भारत में जब मतगणना की शुरुआत की, तो उनके सामने इस देश की जनसंख्या के वर्गीकरण की समस्या आयी। यहां असंख्य जाति व समुदाय थे। धार्मिक संप्रदायों की भी कमी न थी। तो जनगणना अधिकारियों ने सारे गैर मुस्लिम समुदायों का एक वर्ग बना दिया और उसे हिन्दू नाम दे दिया। यह मुस्लिमों द्वारा पहले से तय की गयी विभाजन लाइन को आगे बढ़ाने जैसा था, लेकिन यहां भी धर्मांतरित मुसलमानों को लेकर एक समस्या थी। उनके लिए 'हिन्दू-मोहम्मडन (मुस्लिम हिन्दू) शब्द का प्रयोग किया गया। यह प्रयोग करीब 1911 की जनगणना तक चला।
धीरे-धीरे यह शब्द भारतीय हिन्दुओं के लिए रूढ़ हो गया और यहां के मूल निवासी भारतीयों ने अपने इस नये नाम को स्वीकार भी कर लिया। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ देश में जो राष्ट्रीय आंदोलन तथा समाज सुधार आंदोलन शुरू हुए, उन्होंने भी इस हिन्दू शब्द को अंगीकार कर लिया। अंग्रेजों ने वास्तव में इस देश को अत्यंत पिछड़ा सिद्ध करने के लिए अपने ज्ञान, विज्ञान व सामाजिक, राजनीतिक व दार्शनिक चिंतन की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए एक व्यापक अभियान चलाया। इसके मुकाबले में भारतीय राष्ट्रवादियों ने प्राचीन भारतीय साहित्य दर्शन व चिंतन को आगे लाने का प्रयत्न शुरू किया और उसे हिन्दू धर्म, दर्शन, अध्यात्म आदि की संज्ञा दी। इस बीच तमाम यूरोपीय विद्वानों ने भारत के प्राचीन वैदिक व संस्कृत साहित्य-वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य आदि के अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किये। उन्होंने भारत की सारी पुरानी उपासनाओं, यज्ञों, आदि को हिन्दू धर्म की संज्ञा दे दी। भारतीय चिंतकों ने अपने देश की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए पश्चिम के धर्मों ईसाई व इस्लाम के मुकाबले भारतीय यानी हिन्दुओं के धर्म चिंतन की श्रेष्ठता का गुणगान शुरू किया। इस तरह सारी भारतीय चिंतन धारा को हिन्दू धर्म दर्शन की संज्ञा मिल गयी।
अंग्रेजों को वास्तव में इससे कोई लेना-देना नहीं था क़ि भारतीय यानी हिन्दू चिंतन कितना श्रेष्ठ है। उन्हें तो केवल इसमें रुचि थी कि इसे धर्म के रूप में कैसे इस्लाम के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है। हिन्दू श्रेष्ठता के अहंकार में हिंदू (भारतीय) चिंतक भी उस जाल में फंसते गये। प्रारंभिक 20वीं शताब्दी में पहले भारतीय सुधारक राजा राममोहन राय थे, जो इस जाल में फंसे। फिर तो आगे श्रृंखला बढ़ती ही गयी। आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती किसी अंग्रेजी शिक्षा की देन नहीं थे, लेकिन अंग्रेजो द्वारा स्थापित हिन्दूवाद के जाल के वह भी शिकार हुए। उन्होंने ईसाई व मुस्लिम धर्मों की तरह ही तथाकथित हिन्दू धर्म की कड़ी निंदा की और वेद को केंद्र में रखकर आर्यसमाज के रूप में एक नये हिन्दूवाद की स्थापना की। विवेकानंद व महर्षि अरविंद जैसे महापुरुष भी उससे मुक्त नहीं रह सके। विवेकानंद की शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी में हुई थी। वे पश्चिमी चिंतन व विचारों से अच्छी तरह परिचित थे। रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आने के बाद उनके अंदर भारतीय राष्ट्रवाद की ज्योति जगी। उन्होंने वास्वत में आधुनिक काल में हिन्दू अध्यात्म की आधारशिला रखने का काम किया। उन्होंने वेदांत दर्शन व गीता दर्शन के कर्मवाद के साथ योग को भी शामिल करके एक व्यावहारिक वेदांत (प्रैक्टिकल वेदांत) की शिक्षा दी । 11 सिंतबर 1893 को शिकागो में उनका उड़बोधन वास्तव में हिन्दू धर्म संवलित राष्ट्रवाद की स्थापना का उदघोष था। उन्होंने पाश्चात्य भौतिकवादी दर्शन के मुकाबले भारत के आध्यात्मिक एवं सर्वसमावेशी दर्शन को हिन्दू धर्म-दर्शन के रूप में स्थापित करने का प्रयत्न किया। सर्वधर्म समभाव की अवधारणा सबसे पहले उन्होंने ही दुनिया के सामने प्रस्तुत की, जिसे महात्मा गांधी व राधाकृष्णन ने भी अपनाया और आगे बढ़ाया।
यह सब भारतीय राष्ट्रवादी या नवजागरणवादी कर रहे थे, लेकिन उधर अंग्रेज महाप्रभु अपनी नीतियां चल रहे थे। 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कलकत्ता विश्वविद्यालय में इतिहास के दो विभाग शुरू किये गये। एक प्राचीन भारतीय इतिहास के लिए और दूसरा इस्लामी इतिहास के लिए। प्राचीन भारतीय इतिहास हिन्दू युग कहा गया और उसके बाद मध्यकालीन इतिहास को मुस्लिम युग। इससे एक हिन्दू इतिहास दृष्टि बनी और एक मुस्लिम इतिहास दृष्टि । इसने बाद के स्वातंत्र्य आंदोलन को भी प्रभावित किया।
भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत करने वालों में पहला नाम श्यामजी कृष्ण वर्मा का आता है, जो मूलत: आर्य समाज के अनुयायी थे। 1905 में उन्होंने लंदन में 'इंडिया हाउस' की स्थापना की। कहा जाता है कि इस 'इंडिया हाउस' की स्थापना के प्रेरणास्रोत विनायक दामोदर सावरकर थे। वही सावरकर जिन्होंने पहली बार हिन्दू राष्ट्रवाद को परिभाषित करने की कोशिश की और बाद में 1915 में भारत में 'अखिल भारतीय हिन्दू महासभा'के नाम से पहली राजनीतिक पार्टी की स्थापना की। श्यामजी कृष्ण वर्मा ने 'इंडियन सोसियोलाजी' नाम से एक पत्रिका शुरू की थी और वह सशस्त्र संघर्ष के द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति की कल्पना कर रहे थे। इस देश में हिन्दू या हिन्दुत्व को राजनीति का आधार बनाने का पहला प्रयोग सावरकर ने ही किया। लेकिन उनका यह प्रयास मुस्लिम राजनीति की प्रतिक्रिया स्वरूप सामने आया, अन्यथा उनका भी धर्म से कोई वास्ता नहीं था, उनकी चिंता राष्ट्र की थी।
आज इस देश् में सच कहें तो मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा दोनों की राजनीति विफल हो चुकी है, लेकिन यह विडंबना ही है कि देश की राजनीति अभी भी हिन्दू-मुस्लिम विवादों में उलझी है। इसका एकमात्र कारण है कि 'हिन्दू' नाम का एक मिथ्या धर्म खड़ा कर दिया गया। अब तक हिन्दू या हिन्दुत्व की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं हो सकी है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में भी कह दिया गया है कि इसकी कोई ठोस परिभाषा नहीं हो सकती। फिर भी हमारे संविधन में हिन्दू एक उसी तरह के धर्म के रूप में अंकित है, जैसे इस्लाम और ईसाइयत। सर्वोच्च न्यायालय सहित सभी चिंतक व सिद्धांतकार कहते हैं कि यह अनेक धर्र्मों की सम्मिलित परंपरा है, एक जीवनशैली है, तो फिर इसे इस्लाम, ईसाई आदि के समकक्ष एक धर्म (रिलीजन) की तरह क्यों परिगणित किया जाता है ।
अनेक विचारक मानते हैं कि यह 'हिन्दू 'शब्द ही सारी समस्या की जड़ है। यदि इस शब्द से मुक्ति मिल जाए, तो अनेक समस्याओं का त्वरित समाधान हो जाए। हिन्दूवादी इस कल्पना से भी आहत हो सकते हैं। आज हिन्दू नाम छोड़ दें, तो भारत की धार्मिक व सांस्कृतिक पहचान क्या रह जाएगी? हम अपने इतिहास को किस नाम से याद करेंगे ?
यह समस्या देखने-सुनने में निश्चय ही गंभीर लगती है, लेकिन उतनी गंभीर नहीं है, जितनी प्रतीत होती है। यदि हममें इतना साहस हो कि हम विदेशियों द्वारा दिया गया अपनी जातीय व धार्मिक पहचान का लबादा उतार सकें, तो समस्या आसान हो जाएगी। 'हिन्दू' शब्द के परित्याग से हमारे वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य आदि तो हमसे नहीं छिन जाएंगे, लेकिन हमारी भेदभावपूर्ण संकीर्ण पहचान अवश्य दूर हो जाएगी। इसके बाद हमें धर्म (रिलीजन) के परे रहकर राजनीति करना आसान हो जाएगा।
आज 'हिन्दू' शब्द को लेकर मूल समस्या राजनीति की पैदा हो गयी है। हिन्दू पालिटी या हिन्दू राजनीति तब चल सकती थी, जब मुस्लिम विदेशी थे। आज जब मुस्लिम विदेशी नहीं रहे, भले ही उनकी धार्मिक आस्था के केंद्र देश की सीमाओं के बाहर हैं, तो फिर हिन्दू राजनीति कैसे चल सकती है या हिन्दू राष्ट्र कैसे कायम हो सकता है। इसी तरह हम इस देश में मुस्लिम राजनीति भी नहीं चलने दे सकते और न इस्लामी राष्ट्र कायम करने की कल्पना को चरितार्थ होने दे सकते हैं। यह तभी हो सकता है, जब राजनीति से रिलीजन की पहचान पूरी तरह समाप्त हो जाए। देश जब तक इस अल्पसंख्यक बहुसंख्यकवाद से बाहर नहीं निकलता, तब तक देश में न तो स्वस्थ राजनीति चल सकती है और न सामाजिक शांति कायम हो सकती है।
इसका सबसे अच्छा तरीका है कि हम अपनी पुरानी ऐतिहासिक व सेकुलर पहचानको वापस लाएं। हमने अपने देश को 'भारत' नाम दिया था। भा -रत अर्थात् ' प्रकाश में रत' यानी ज्ञान की आराधना में रत। भारत की संस्कृति 'भारती' की संज्ञा सहज ही प्राप्त कर सकती है। इस भारत के संपूर्ण निवासियों के संपर्क की भाषा को भी 'भारती' की संज्ञा दे सकते हैं। यदि हम 'भारती' को भारतीय संस्कृति मान लें, तो यहां की सारी चिंतन परंपराएं उसमें शामिल हो जाएंगी, उसमें अच्छी भी होंगी, बुरी भी होंगी। समाज अपने विवेक से बुरी परंपराओं का दमन व श्रेष्ठ का उत्थान कर सकता है। यह संस्कृति अंध-आस्था के बजाए विवेक पर केंद्रित होगी। उसकी अपनी आस्था विवेक, गतिशीलता, न्याय तथा सार्वभौम सुख व आनंद में निहित होगी।
इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि भारतीय धर्म संस्कृति के लिए 'हिन्दू' शब्द के उदय के पूर्ण अंग्रेजी में 'इंडियन पगान' शब्द का इस्तेमाल किया जाता था। वस्तुत: ईसाई विद्वान ईसाई धर्म के बाहर के सारे अन्य धर्मों में विश्वासों के लिए 'पगान' शब्द का इस्तेमाल करते थे। इसका आशय था पिछड़ा, नीच, गर्हित, जंगली, निंदनीय विश्वास एवं आस्थाएं। इनको समाप्त करके उनके स्थान पर ईसाई धर्म की स्थापना करना वे अपना कर्तव्य समझते थे। यह नया शब्द 'हिन्दू' मिल जाने के बाद भी भारत के धर्मों के आस्थाओं के प्रति उनकी सामान्य अवधारणा बदली नहीं है।
साम्राज्यवादी गुलामी की जंजीरों से मुक्त होने वाला भारत पहला सबसे बड़ा देश था। तीसरी दुनिया के तमाम देश उसके बाद मुक्त हुए। भारत को चाहिए था कि वह अन्य सभी नवमुक्त देशों को एक नई राह दिखाता, लेकिन जो देश स्वयं अपने लिए कोई राह नहीं ढूंढ़ सका, वह दूसरों को क्या राह दिखाता है। इसलिए जब कोई यह कहता है कि 15 अगस्त 1947 को केवल सत्ता हस्तांतरण का कार्य पूरा हुआ था, देश को स्वतंत्रता नहीं मिली थी, तो चाहकर भी इसका खंडन करना मुश्किल होता है। हमने एक कठपुतले की तरह वह सब स्वीकार कर लिया, जो अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने हमारे ऊपर थोपा था।
हमें उन्होंने अपनी पसंद का एक नाम ही नहीं दिया, बल्कि हमारे देशा का भूगोल, भाषा, राजनीति, शासन, शिक्षा व चिंतनशैली भी इस तरह निर्धारित कर दी कि हम उसे शिरोधार्य कर अभी भी गर्व का अनुभव करते चले जा रहे हैं। अंग्रेजों के इस अद्भुत सामर्थ्य की निश्चय ही दाद देनी पड़ेगी कि भारतीयता के एकांत आग्रही राजनीतिक दल व राजनेता भी उनके ही बनाए हिन्दुत्व के खांचे में बैठकर अपनी राष्ट्रीयता की लड़ाई लड़ रहे हैं।
आज की हिन्दू अवधारणा यह बन गयी है कि वेदों में, कर्मवाद में, पुनर्जन्म में अवतारवाद में मूर्तिपूजा में विशवास करे वह हिन्दू है। इसके साथ यह भी जोड़ दिया जाता है कि वह उदार, सहिष्णु तथा करुणामूर्ति। इन सारी विशेषताओं में बंधा हिन्दू इनका प्रतिकार भी नहीं कर सकता। सर्वधर्म-समभाव की धारणा ने गलत तथा अतार्किक व अवैज्ञानिक सिद्धांतों के विरोध से भी उसे रोक दिया है।
अपने देश में वेदों व ईश्वर को प्रमाण मानने की कोई सर्वमान्य परंपरा कभी नहीं रही। ईश्वर हमेशा विवाद का विषय रहा। पारंपरिक दर्शन की 6 शाखाओं में से केवल एक ईश्वर व वेद को प्रमाण मानती है। ये दर्शन व विज्ञान की बातें मुक्त चिंतन के क्षेत्र की बातें हैं, जिसमें कोई अंतिम वाक्य कभी नहीं कहा जा सकता। भारत उन्मुक्त चिंतन का क्षेत्र रहा है। यहां राजनीति धार्मिक विश्वासों से संचालित नहीं होती थी, न किसी धार्मिक विश्वास विशेष वाले को राजनीति में कोई विशेष स्थान प्राप्त था। राजनीति प्राकृतिक न्याय से संचालित होती थी।
आजकल हिन्दू धर्म को सनातन धर्म कहने की परंपरा चल पड़ी है। लेकिन सनातन धर्म तो नैतिकता व सदाचार के वे नियम हैं, जो सार्वभौम हैं, वे किसी धर्म विशेष की पहचान नहीं है, लेकिन प्राय: सभी धर्म उनका समर्थन करते हैं। इस शब्द 'सनातन धर्म' का पहला प्रयोग संभवत: बौद्धों ने किया है। वे सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, आदि को सनातन धर्म (एष धम्मो सनंतनो) कहते हैं। इसके विरुद्ध कुछ भी हो, उसे धर्म नहीं कहा जाता। लेकिन दुनिया के तमाम धर्म यहीं तक सीमित नहीं रहते। वे इसमें व्यापार व राजनीति को भी शामिल कर लेते हैं। दिक्कतें वहां पैदा होती हैं जब हम धर्म के नाम पर न्याय का पथ छोड़कर दूसरों पर आधिपत्य कायम करने की कोशिश में लग जाते हैं। आज दुनिया में इस्लामी आतंकवाद इसी मजहबी राजनीति या साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का परिणाम है। भारतीय चिंतन परंपरा में जो कुछ गर्व करने लायक है, वह रिलीजन नहीं सामाजिक चिंतन है। रिलीजन तो यहां का भी दुनिया के अन्य रिलीजनों से कुछ भिन्न नहीं है, लेकिन यहां के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व आध्यात्मिक चिंतन अवश्य ऐसा है, जैसा दुनिया में और कहीं उपलब्ध नहीं है। पश्चिम जिस भौतिकवाद, विज्ञानवाद व मानववाद तक 16वीं शताब्दी में पहुंचा, वहां तक भारत अब से ढाई हजार साल से पहले ही पहुंच चुका था। पश्चिम में मनुष्य को केंद्र में रखकर सोचने की प्रवृत्ति मध्यकाल में शुरू हुई, जबकि भारत में आदिम चिंतनकाल से यही प्रवृत्ति चली आ रही है। यहां मध्यकाल में अवश्य कुछ संप्रदायों में ईश्वर को प्राप्त करना मनुष्य का लक्ष्य बन गया अन्यथा सभी चिंतनधाराएं मानव हित ही नहीं प्राणिमात्र के हित के बारे में ही सोचती रहीं।
वास्तव में आज सबसे बड़ी जरूरत है मिथ्या अवधाराणाओं से बाहर निकलने और भारत की मूल पहचान को पुन: आत्मसात करने की। हमें मानववादी, न्यायवादी, विज्ञानवादी समाज और राजनीति की स्थापना का प्रयास करना चाहिए और जो भी शक्ति इसके विरुद्ध आती हो, उसका खडग़हस्त होकर विरोध करना चाहिए। इसमें किसी तरह के मजहबी साम्राज्यवाद को कोई जगह नहीं मिल सकती। लेकिन यदि आज हम वास्तव में भारत के विश्वमानव वाद को दुनिया में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, तो हमें उस दायरे से बाहर निकलना होगा, जो हमें संकीर्णता में कैद करता है। हमने आज हिन्दू की व्याख्या को चाहे जितना उदात्त, महान या सार्वभौम क्यों न बना दिया हो, लेकिन वह तमाम अन्य धर्मों व समुदायों से हमें अलग करने के लिए दिया गया नाम है। हम इस नाम से दुनिया के अन्य धर्मों या समुदायों को अपने साथ नहीं जोड़ सकते। हमारे अवसरवादी समझौते हो सकते हैं, लेकिन हम उन्हें आत्मसात नहीं कर सकते। यदि हमको सभी को आत्मसात करना है, तो हमें अपना दायरा बढ़ाना होगा। संयोग से हमारे अपने ही प्राचीन सामाजिक व राजनीतिक चिंतन का दायरा इतना बड़ा है, जिसमें दुनिया के सारे दर्शन, चिंतन, विचारधाराएं न केवल शामिल हो सकती हैं, बल्कि विकास भी कर सकती हैं, शर्त केवल यही है कि वे न्याय, विवेक व वैयक्तिक मानवीय स्वतंत्रता के विरुद्ध न हों। इसका एक ही चारा है कि हम फिर से भारत व भारती को अपनाएं और अपनी सोच को पुन: सार्वभौम मानववाद से जोड़ें। 28-6-2009

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

क्षेत्रवादी राजनीति में फंसा आंध्र प्रदेश

केंद्र सरकार ने पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा तो कर दी, लेकिन यह घोषणा होते ही राज्य की राजनीति में क्षेत्रीयता का ऐसा ज्वार उठ खड़ा हुआ कि 48 घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री को घोषणा करनी पड़ी कि जल्दबाजी में कुछ नहीं किया जाएगा और आगे का कदम सबकी सहमति से उठाया जाएगा। लेकिन इससे कोई भी आश्वस्त नहीं है, हां इससे यह आशंका जरूर उठ खड़ी हुई है कि सरकार घोषणा करके भी अपना अगला कदम अनिश्चितकाल के लिए टाल सकती है। राज्य का हर हिस्सा आंदोलित है, लेकिन केंद्रीय नेता कूटनीतिक शब्दावली से इस आंदोलन की आग को शांत करना चाहते हैं। चिंता की बात यह है कि इस समय राज्य में क्षेत्रीयता की राजनीति दलीय राजनीति के ऊपर हावी हो गयी है। लोग पार्टी का दायरा तोड़कर क्षेत्रीयता के दायरे में संगठित हो रहे हैं।


तेलंगाना के भाग्य का निर्णय प्राय: केन्द्र सरकार के हाथों ही होता आया है, चाहे वह उसकी इच्छाओं के विरुद्ध रहा हो, या समर्थन में। 1956 में तेलंगाना क्षेत्र (पूर्व निजाम स्टेट) को आंध्र में शामिल करने का निर्णय भी केन्द्र सरकार ने ही लिया था और आज 2009 में उसे अलग करने का निर्णय भी केन्द्र सरकार ने ही लिया है। तब भी केन्द्र में कांग्रेस की ही सरकार थी और आज भी उसी की सरकार है। तब कांग्रेस के सर्वोच्च नेता व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे तो आज भी केन्द्रीय सत्ता की मुख्यनियंता उनकी दौहित्रवधू सोनिया गांधी है।
केन्द्र सरकार ने उस समय तेलंगाना क्षेत्र के लोगों की सहमति प्राप्त किये बिना (या यों कहें कि उनकी आशंकाओं और विरोधों के बावजूद) इस क्षेत्र को आंध्र प्रदेश का अंग बना दिया था । आज करीब 55 वर्षों बाद उसने फिर बिना किसी से पूछे इस प्रदेश को आंध्र से अलग करने का निर्णय लिया है। यह बात अलग है कि इस तरह उसने मात्र अपनी गलती सुधारी है। विलय के समय उसने तेलंगाना वालों से उनकी सहमति नहीं ली तो आज अलग करते समय उसने आंध्र के लोगों से उनकी सलाह नहीं ली। तो इसमें नया क्या हो गया? बल्कि उस समय तो पंडित नेहरू की सरकार ने फजल अली के नेतृत्व में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट की अवहेलना करके तेलंगाना को आंध्र में शामिल करने का निर्णय लिया था। फजल अली ने तो अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा था कि तेलंगाना के लोग आंध्र में मिलने के लिए तैयार नहीं हैं। उनको बहुत सी आशंकाएं हैं। इसलिए उसे अभी आंध्र में शामिल नहीं किया जा सकता। फिर भी उन्होंने विलय का रास्ता खुला छोड़ा था और सलाह दी थी कि 1961 के चुनाव में तेलंगाना विधानसभा के गठन के बाद यदि सदन के दो तिहाई विधायक अपने राज्य का विलय आंध्र में करने का निर्णय लें तो ऐसा हो सकता है, लेकिन केंद्र सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को दरकिनार करके एक तरह से जबर्दस्ती तेलंगाना के क्षेत्र को आंध्र प्रदेश का अंग बना लिया। क्षुब्ध तेलंगानावासियों को संतुष्टï करने के लिए एक सभ्य समद्ब्राौता (जेटिलमेंस एग्रीमेंट) तैयार किया गया, जिसमें तेलंगाना क्षेत्र को अलग राज्य जैसी ही सुविधाएं व अधिकार देने का वचन दिया गया, जिसका कभी पालन नहीं हुआ। इसके विपरीत आज का निर्णय तो राज्य की प्राय: सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की आम राय के अनुसार लिया गया है। यह बात दूसरी है कि निर्णय के बाद ये सारी पार्टियां अपनी राय से पलट गयीं हैं।
वास्तव में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब मद्रास प्रांत का विभाजन हुआ और आंध्रा अलग हुआ, तभी से आंध्र प्रदेश के ताकतवर नेताओं की नजर तेलंगाना क्षेत्र और निजाम की राजधानी हैदराबाद व उसकी संपत्ति पर लगी हुई थी । वे अपने राज्य का आकार भी बढ़ाना चाहते थे जिससे कि उनकी ताकत और बढ़ जाए। आज भी मूल द्ब्रागड़ा हैदराबाद शहर को लेकर है, जो पहले निजाम की और आज आंध्र प्रदेश की राजधानी है। तेलंगाना को अलग करने के केन्द्र सरकार के निर्णय का विरोध करते हुए आंध्र प्रदेश के नेतागण कह रहे हैं कि उनकी वहां जो संपत्तियां हैं, जो वहां निवेश किया गया है, उसे वे कैसे छोड़ सकते हैं। उन्हें शायद इसका स्मरण नहीं कि जिस समय तेलंगाना का आंध्र प्रदेश में विलय किया गया था उस समय पूरा तेलंगाना क्षेत्र शिक्षा व विकास की दृष्टिï से पिछड़ा अवश्य था, लेकिन उसका कुल राजस्व (सरकारी आमदनी) आंध्र के राजस्व से कहीं अधिक था। निजाम की अकूत संपदा भी विलय के साथ आंध्र के नेताओं के ही हाथ लगी। तेलंगाना की खनिज व जल संपदा आंध्र क्षेत्र के अधिक काम आई, जिससे उनकी समृद्धि बढ़ी। फिर आज यदि तेलंगाना के वंचित लोगों के हित में 1956 का फैसला उलटा जा रहा है तो इससे उनका दर्द इतना क्यों बढ़ गया है।
फिर ऐसा भी तो नहीं कि तेलंगाना अलग राज्य बन जाएगा तो यहां से आंध्र या रायलसीमा के लोग निकाल बाहर किये जाएंगे। विभाजन का आधार क्षेत्रीय है कोई जातीय तो नहीं। यदि निजाम के राज्य में यहां देश के तमाम राज्यों से आए लाखों लोग रह सकते हैं, उद्योग व्यवसाय कर सकते हैं, संपत्तियां खरीद सकते हैं तो आंध्र या रायलसीमा के लोग यहां यह सब क्यों नहीं कर सकते। हां उन इलाकों के भूमाफियाओं, बिल्डरों व बड़े ठेकेदारों का नुकसान अवश्य हो सकता है, लेकिन मुट्ठी भर ऐसे लोगों की रक्षा के लिए करोड़ों तेलंगानावासियों को कोई बंधक बनाकर तो नहीं रख जा सकता।
राज्य के विभाजन के विरुद्ध एक तर्क और दिया जा रहा है कि इस विभाजन से भाषायी एकता टूटेगी। भाषा आधारित राज्यों का गठन इसलिए किया गया था कि एक भाषाभाषी समुदाय एक राज्य क्षेत्र में रहें। अब यदि तेलुगु भाषा के आधार पर गठित एक राज्य को तोड़कर दो तेलुगु भाषी राज्य बनाए जाते हैं तो यह राज्यों के पुनर्गठन की मूल अवधारणा के विरुद्ध कार्य होगा। वस्तुत: यह कोई तर्क नहीं, बल्कि एक मिथ्या तर्काभास है। वास्तव में भाषा आधारित राज्य का गठन किया जाना ही एक बहुत बड़ी राजनीतिक व सामाजिक भूल थी। आज के जमाने में कोई क्षेत्र, राज्य या देश एक भाषा-भाषी नहीं हो सकता। वह किसी एक पारंपरिक संस्कृति का अनुयायी भी नहीं हो सकता। उद्योग, व्यवसाय तथा सेवाओं के लिये प्राय: हर क्षेत्र के लोग अन्य क्षेत्रों में आते-जाते तथा बसते रहे हैं और आते-जाते तथा बसते रहेंगे। यह भाषायी राजनीतिक अस्मिता भी यूरोपीय महाप्रभुओं की देन है जिसके कारण हम आज इतने विभाजित व संकीर्ण मानसिकता वाले हो गये हैं। इसलिए एक भाषा के एक से अधिक राज्यों का होना कोई निन्दनीय बात नहीं।
यह बात सही है कि पृथक तेलंगाना राज्य बनना अभी भी आसान नहीं है। तेलंगाना के लोग यदि यह समद्ब्राते हों कि अब उन्हें कुछ नहीं करना है, अब तो जो कुछ करना है वह केन्द्र सरकार को ही करना है। उसने वायदा किया है तो उसे पूरा करने की जिम्मेदारी भी उसी की है। अपना काम तो केवल जश्न मनाना रह गया है। तो यह उनकी भारी भूल होगी। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि केन्द्र सरकार की तरफ से बुधवार की मध्यरात्रि जो घोषणा की गई थी उसका मूल उद्देश्य अलग तेलंगाना राज्य बनाना नहीं, बल्कि तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चन्द्रशेखर राव के आमरण अनशन से भड़के छात्र आंदोलन को शांत करना था। यद्यपि अभी भी यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि केन्द्र ने आखिर कैसे एक मध्यरात्रि को इतने बड़े निर्णय की घोषण कर दी। आखिर उस पर क्या दबाव था। राज्य की राजनीतिक स्थिति की केन्द्र को जानकारी न हो ऐसी बात भी नहीं। केन्द्रीय नेता यह अच्छी तरह जानते हैं कि तेलंगाना के प्रश्न पर राज्य की तमाम पार्टियां जो भी बोलती रही हैं वह सच नहीं है। पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थन में दिये गये सारे बयान मिथ्या थे, जो तेलंगाना क्षेत्र के लोगों का समर्थन प्राप्त करने के राजनीतिक उद्देश्य से दिये गये थे। सभी जानते थे कि तेलंगाना के बारे में केन्द्र सरकार जल्दी कोई फैसला नहीं लेने वाली इसलिए तेलंगाना क्षेत्र को क्यों अकेले टी.आर.एस. की झोली में जाने दिया जाए। क्यों न उसके प्रति बराबर की सहानुभूति जताकर उसका समर्थन अपने लिये भी जुटा लिया जाए।
कांग्रेस ने इसीलिए इस तरह का बयान दिया कि वह तेलंगाना के विरुद्ध नहीं है, लेकिन फैसला केन्द्र सरकार को या पार्टी हाईकमान को करना है। वह इसके लिए तैयार हो जाए तो उन्हें यानी राज्य के नेताओं को कोई आपत्ति नहीं। इसे देखते हुए तेलुगु देशम पार्टी ने भी पृथक तेलंगाना के समर्थन की घोषणा कर दी। और इन दोनों की प्रतिस्पर्धा में आई मेगास्टार चिरंजीवी की पार्टी प्रजा राज्यम भी भला क्यों पीछे रहती, उसने भी तेलंगाना राज्य के समर्थन की घोषणा कर दी। राज्य कांग्रेस को यह रणनीति अपनाने की सलाह केन्द्र के नेताओं ने ही दी थी इसलिए राज्य के नेतागण आश्वस्त थे कि तेलंगाना क्षेत्र के लोग कितना भी हाथ पांव मारे, लेकिन केन्द्र कोई निर्णय लेने वाला नहीं। किन्तु चन्द्रशेखर राव के अनशन के कारण भड़के छात्र आंदोलन ने मामला एकाएक गड़बड़ कर दिया।
चन्द्रशेखर राव के लिए भी अपनी डूबती राजनीति को बचाने के लिए कुछ करना आवश्यक हो गया था। लोकसभा, विधानसभा व अभी हाल में सम्पन्न व्रहत्तर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में अपनी गिरती साख से वह बेचैन हो गये और फिर से अपनी लोकप्रियता बढ़ाने व जनसमर्थन समेटने के लिए उन्होंने आमरण अनशन की घोषणा कर दी। सरकार ने यह योजना विफल करने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सरकार को इसका कतई भरोसा नहीं था कि राव का अनशन दो चार दिन भी चल सकेगा। वह कोई महात्मा गांधी या पोट्टी श्रीरामुलु तो हैं नहीं। वह अच्छी जिंदगी व खान-पान के अभ्यस्त हैं। मरना वह कतई चाहेंगे नहीं इएलिए यह अनशन चल ही नहीं सकता। हुआ भी ऐसा ही। अगले ही दिन उनकी जूस पीकर अनशन तोडऩे की तस्वीर मीडिया में फैल गई। इससे आंदोलनकारी छात्र और भड़क गये। उन्होंने राव को धोखेबाज व नाटकबाज करार देते हुए उनका पुतला फूंकना शुरू कर दिया। ऐसी स्थिति में उनके लिए पुन: अनशन जारी रखने की घोषणा करना अनिवार्य हो गया। अन्यथा तेलंगाना की पूरी राजनीति ही उनके हाथ से निकल जाती। डॉक्टर उन्हें शिरामाध्यम से पोषण पहुंचा रहे थे। ऊपर से पानी वह ले ही रहे थे। इससे उनके प्राणों के लिए कोई तात्कालिक खतरा नहीं था, फिर भी उनके रोगजर्जर शरीर (वह बीपी व शुगर के मरीज हैं साथ ही अत्यधिक मद्यसेवन से उनका लिवर भी काफी खराब हो चुका है) को देखते हुए कोई भी इस दृष्टिï से आशंका मुक्त नहीं था। अनशन जब 10 दिनों तक लगातार जारी रहा और अनशन तोड़वाने की राज्य सरकार की सारी कोशिशें विफल हो गयीं, तो सत्तारुढ़ पार्टी के केंद्रीय नेताओं को चिंता होने लगी। प्राय: पूरे तेलंंगाना क्षेत्र में गांव-गांव तक भड़क उठे तेलंगाना आंदोलन के दृश्य लगातार टी.वी. पर देखे जा रहे थे।
कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं को दिल्ली में जो खबरें मिल रही थीं उसके अनुसार इस आंदोलन को इतना उग्र रूप देने में अपनी ही पार्टी के उन लोगों का बड़ा हाथ था, जो वर्तमान रोशैया सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं। उन्हें यह भी आशंका थी कि नक्सली संगठन भी इस आंदोलन में कूद सकते हैं। 10 दिसंबर को 'विधानसभा चलो के आह्वान को लेकर भारी अंदेशा था। इसमें कुछ भी हो सकता है। साथ में यह भय भी था कि कहीं इस बीच चंद्रशेखर राव की जान को कुछ हो गया तो स्थिति एकदम काबू से बाहर हो जाएगी। रोशैया विरोधी ताकतों का खेल सफल न होने पाए इसके लिए भारी जल्दबाजी में 10 दिसंबर की सुबह होने के बहुत पहले मध्यरात्रि में ही तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की मांग स्वीकार कर ली गयी। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने मीडिया के सामने आकर संक्षिप्त सा बयान दिया कि पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण की प्रक्रिया शीघ्र ही शुरू की जाएगी। इसके लिए राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया जाएगा। इसलिए अब चंद्रशेखर राव को अपना अनशन तोड़ देना चाहिए और छात्रों को भी अपना आंदोलन वापस ले लेना चाहिए। सरकार के पास इस तरह के एकतरफा निर्णय की घोषणा के लिए पर्याप्त राजनीतिक आधार भी था, क्योंकि अभी कुछ दिन पहले ही मुख्यमंत्री रोशैया द्वारा बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक में प्राय: सभी प्रमुख पार्टियों ने पृथक तेलंगाना का समर्थन किया था। अब केंद्र को और कोई सहमति जुटाने की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उसने फटाफट तेलंगाना राज्य निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा कर दी।
यह घोषणा निश्चय ही सभी के लिए चौंकाने वाली थी। टीआरएस के लोगों को भी इतनी जल्दी ऐसी घोषणा की आशा नहीं थी। घोषणा होते ही टीआरएस सहित तेलंगाना क्षेत्र के सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता-सांसद, विधायक आदि नाच उठे और आंध्र व रायलसीमा के नेतागण अवाक रह गये। लेकिन स्तब्धता जल्दी ही टूटी और उन्होंने घोषणा का विरोध करना शुरू कर दिया। स्वयं कांग्रेस पार्टी के अपने विधायकों व सांसदों ने विरोध का द्ब्रांडा बुलंद कर दिया और केंद्र पर आरोप लगाना शुरू कर दिया कि उसने बिना राज्य के विभिन्न अंचलों के लोगों की राय लिए एकतरफा तौर पर यह फैसला ले लिया है, जो उन्हें मान्य नहीं है। वे यह भी भूल गये कि अभी तक वे स्वयं ही तो कह रहे थे कि वे तेलंगाना के खिलाफ नहीं हैं और इस बारे में पार्टी हाईकमान यानी सोनिया गांधी जो भी निर्णय लेंगी, वह उन्हें मान्य होगा। अब जब सोनिया गांधी ने निर्णय ले लिया और उसकी घोषणा हो गयी, तो फिर क्यों वे इसका विरोध कर रहे हैं। इस पर इन क्षेत्रों के कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि उन्हें क्या पता था कि वह वास्तव में कोई इस तरह का फैसला ले लेने वाली हैं। उन्हें तो पार्टी के राजनीतिक हित के लिए केवल ऐसी बात कहते रहने के लिए कहा गया था।
घोषणा के बाद 10 तारीख की सुबह होते-होते इस मसले पर सारी पार्टी लाइन टूट गयी। राजनीति ने नितांत क्षेत्रीय रूप ग्रहण कर लिया। तेलंगाना क्षेत्र के सारे नेता एक साथ और आंध्र तथा रायलसीमा के सारे नेता एक साथ। एक वर्ग जश्न मनाने में लगा है, तो दूसरा विरोध करने में। आंध्र व रायलसीमा क्षेत्र के विधायकों का इस्तीफे देने का तांता लग गया। ताजा खबरों के अनुसार इन दोनों क्षेत्रों के कुल 175 विधायकों में से अब तक करीब 135विधायक व 5 सांसद इस्तीफ दे चुके हैं। इन सबकी मांग है कि 9-10 की मध्यरात्रि को की गयी घोषणा वापस ली जाए और आंध्र को वर्तमान 'समेक्य आंध्र के रूप में बनाये रखा जाए। राज्य दका प्राय: हर वर्ग क्षेत्रीय आधार पर बंट गया है। उनके बीच की राजनीतिक विभाजक रेखा क्षीण हो गई है और क्षेत्रीयता की रेखा गरही हो गई है। राजधानी हैदराबाद में तो इसको बिल्कुल साफ-साफ देखा जा सकता है। राज्यकर्मचारी हों, अफसर हों, पुलिस हों, शिक्षक हों, छात्र हों, वकील हों या व्यवसायी प्राय: सबके बीच क्षेत्रीयता की विभाजक रेखा खिंच गई है। हाईकोर्ट के वकीलों में तो 11 दिसंबर की सुबह बाकायदे भिडंत हो गई। आंध्र व रायलसीमा के वकीलों ने अदालत परिसर में 'समेक्य आंध्र का नारा लगाते हुए प्रदर्शन किया और मांग की कि हाई कोर्ट की सारी अदालतें बंद की जाएं। इस पर तेलंगाना के वकीलों ने विरोध किया। फिर 'जय तेलंगाना व 'जय समेक्य आंध्र की मुकाबले की नारेबाजी शुरू हो गई। अदालतें अपने आप ठप हो गयीं। इसी दौरान पता चला कि वकीलों के ही एक समूह ने राजठाकरे की 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की तर्ज पर 'एक तेलंगाना नव निर्माण सेना का गठन कर लिया है। उनका कहना है कि अब तक हमने बहुत नरमी बरती, लेकिन अब हम भी कठोर रुख अपनाएंगे।
अब केन्द्र सरकार इस दूसरी आग को ठंडा करने की कोशिश में है। वह पृथक तेलंगाना की घोषणा अब वापस तो ले नहीं सकती इसलिए आंध्र व रायलसीमा क्षेत्र को शांत करने का एक ही उपाय है कि नये राज्य निर्माण के मसले को अनिश्चितकाल के लिए अधर में लटका दिया जाए। गृहमंत्री की घोषणा के 48 घंटे के अंदर ही यह घोषणा हो गई कि अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण का प्रस्ताव राज्य विधानसभा के चालू सत्र में पेश नहीं किया जाएगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी रायलसीमा व आंध्र क्षेत्र के सांसदों को आश्वस्त किया कि नये राज्य निर्माण् के लिए कोई जल्दबाजी नहीं की जाएगी। सबकी राय से सबके हितों का ध्यान रखते हुए ही आगे कोई कदम बढ़ाया जाएगा। कांग्रेस के एक वरिष्ठï नेता ने इससे एक कदम और आगे बढ़कर यह कहा कि 'हम लोग आम राजनीतिक सहमति के आधार पर तेलंगाना राज्य निर्माण के पक्ष में थे। लेकिन ऐसे निर्णय एकतरफा नहीं लिये जा सकते। हमने जब निर्णय लिया तो राज्य की प्राय: सभी प्रमुख पार्टियां एकमत थीं, लेकिन अब जबकि टीडीपी पीछे हट गई है तो राजनीतिक सहमति कहां है? इसलिए अभी हम मामले को टाल देना चाहते हैं।निश्चय ही कांग्रेस अब मसले को टालने के मूड में हैं। लेकिन अब राज्य में क्षेत्रीयता की जो आग भड़क उठी है वह आसानी से शांत होने वाली नहीं। आंध्र व रायलसीमा के आंदोलनकारी चाहते हैं कि गृहमंत्री दुबारा बयान दें तभी स्थिति सामान्य हो सकती है। उनका सीधा आरोप है कि वर्तमान अशांति के लिए गृहमंत्री दुबारा बयान दें तभी स्थिति सामान्य हो सकती है। उनका सीधा आरोप है कि वर्तमान अशांति के लिए गृहमंत्री चिदंबरम सीधे जिम्मेदार हैं। उनके गृह सचिव जी.के. पिल्लइ ने शुक्रवार को एक बयान देकर और आग में घी डाल दिया। उन्होंने कहा कि पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और हैदराबाद इस नये राज्य की राजधानी होगी। रोचक है कि जिस समय प्रधानमंत्री क्षुब्ध सांसदों को यह समझा रहे थे कि जल्दबाजी में कुछ नहीं किया जाएगा (नथिंग विल बी डन इन हेस्ट) उसी समय गृहसचिव का बयान था कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और राजधानी का मसला भी तय हो चुका है। बाद में यद्यपि वह अपने बयान में पलट गये और कहा कि अभी राजधानी के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है। उन्होंने यह बात केवल इस समद्ब्रा के आधार पर कह दी थी कि यदि तेलंगाना राज्य बनेगा तो हैदराबाद स्वाभाविक रूप से उसकी राजधानी बनेगा। अब भले ही वह अपने बयान से पलट गये हों, लेकिन उनके कथन से इतना तो स्पष्टï हो ही गया है कि दिल्ली में बैठे ब्यूरोक्रेट्स की नजर में हैदराबाद ही तेलंगाना की स्वाभाविक राजधानी है।
राज्य की राजनीति में क्षेत्रीयता को लेकर एक अजीब उथल-पुथल मची है। चतुर्दिक ऊहापोह व्याप्त है। रायलसीमा और आंध्र की पहली मांग यही है कि राज्य का विभाजन न हो लेकिन यदि केन्द्र इस पर आमादा है तो आगे की क्या रणनीति हो सकती है, इस पर भी विचार किया जा रहा है। रायलसीमा व आंध्र के लोगों का, विभाजन की स्थिति में पहला दबाव यह है कि हैदराबाद को तेलंगाना को न दिया जाए। उसे केन्द्र शासित क्षेत्र बना दिया जाए। यदि ऐसा हो जाए तो शहर हैदराबाद से जुड़े उनके सारे हित सुरक्षित रह सकते हैं। लेकिन तेलंगाना के लोग क्या इसे स्वीकार करेंगे? तो अगला विकल्प क्या हो सकता है। रायलसीमा के लोगों की मांग है कि उस स्थिति में उन्हें भी अलग राज्य का दर्जा दिया जाए और नेल्लूर तथा प्रकाशम जिले को उनके साथ जोड़ा जाए। राज्य में इस समय 22 जिले हैं जिनमें से 9 तेलंगाना क्षेत्र में आते हैं, 4 रायलसीमा में और शेष आंध्र क्षेत्र में। मद्रास प्रांत से जब आंध्र को अलग किया गया था तो कर्नूल उसकी राजधानी बनी थी, जो रायलसीमा क्षेत्र में है। लेकिन तेलंगाना के साथ विलय के बाद यह राजधानी उनसे छिन गई और हैदराबाद नई राजधानी बन गई। अब रायलसीमा के लोग तिरुपति को अपनी राजधानी बना सकते हैं, लेकिन उन्हें पृथक राज्य बनने के लिए आंध्र क्षेत्र का नेल्लूर और प्रकाशम जिला जरूर चाहिए। उधर आंध्र क्षेत्र में भी इसकी बहस शुरू हो गई है कि यदि राज्य का विभाजन हो ही गया तो उनकी राजधानी कहां स्थापित होगी।
खैर, यह सारा मुद्दा और विवाद तो अभी लम्बे समय तक चलता रहेगा, परंतु गृहमंत्री की पृथक तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा से देश के अन्य क्षेत्रीय आंदोलनों में भी नई जान आ गई है। लेकिन सवाल है इस विभाजन की श्रृंखला का अंत कहां है। यह दावा मिथ्या है कि छोटे राज्य प्रशाशन की दृष्टि से सुविधाजनक होते हैं या इससे उनके विकास की गति तेज होती है। फिर भी यदि लगातार विभाजन की मांगें उठ रही हैं, तो उनके उठने के दो मुख्य कारण हैं। एक तो क्षेत्रीय नेताओं की बढ़ती महत्वाकांक्षा दूसरी सत्ता के वर्चस्वधारी लोगों द्वारा किसी क्षेत्र विशेष की उपेक्षा या उसका शोषण। जाहिर है कि राजनीतिक व्यवस्था में आंतरिक लोकतंत्र तथा न्याय का अभाव इस तरह की मांगों को भड़काने के मुख्य कारण है। इसलिए राजनीतिक व्यवस्था में इस विभाजन प्रक्रिया को यदि रोकना है तो राजनीतिक व्यवस्था या दलों के बीच आंतरिक लोकतंत्र तथा प्रशासन में सम्यक न्याय की स्थापना करनी होगी। यदि यह नहीं होगा तो ये विभाजन की श्रृंखला और नीचे तक फैलती ही जाएंगी। आंध्र प्रदेश में भी यदि तेलंगाना के साथ न्याय किया गया होता और 'जेंटिलमेन एग्रीमेंट को ईमानदारी से लागू किया गया होता तो आज विभाजन की यह नौबत न आती। परंतु अब बात जहां तक बढ़ चुकी है, उसमें इस राज्य के विभाजन को अनंतकाल के लिए नहीं टाला जा सकता। आज नहीं तो कल, विभाजन के दौर से इसे गुजरना ही पड़ेगा फिर भले इसके एक के दो टुकड़े हों या तीन।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट और अयोध्या का सच

6 दिसंबर 1992 को तथाकथित बाबरी मस्जिद के ध्वंस के कारणों, परिस्थितियों तथा जिम्मेदारियों का पता लगाने के लिए गठित लिब्रहान जांच आयोग की रिपोर्ट सबके सामने आ चुकी है। लेकिन सवाल है कि क्या यही कुल सच है, अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का, और उसके ध्वंस के कारणों का। क्या यह सच नहीं है कि 6 दिसंबर की यह घटना शताब्दियों की प्रशासनिक और न्यायिक विफलता का परिणाम थी। देश की यह समस्या तो तब की है,जब संघ, भाजपा व विहिप की पैदाइश भी नहीं हुई थी। यह तो आज की राजनीति है कि इसे 22 दिसंबर 1949 या 6 दिसंबर 1992 की घटनाओं में सीमित कर दिया गया है। वस्तुत: यह समस्या 1528 की है, जो अब तक चली आ रही है। आखिर इसके समाधान की कब तक और प्रतीक्षा करनी होगी।


तथाकथित बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाए जाने के कारणों की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय लिब्रहान जांच आयोग ने करीब साढ़े छ: करोड़ रुपये खर्च करके 16 वर्ष 6 महीने 14 दिन बाद अपनी रिपोर्ट गत 30 जून 2009 को सरकार को सौंपी। करीब 1024 पृष्ठ की इस विशाल रिपोर्ट में केवल एक व्यक्ति को छोड़कर और सभी को दोषी ठहरा दिया गया। व्यक्तिगत रूप से 68 लोगों को दोषी करार दिया गया है, किन्तु किसी के खिलाफ किसी दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश नहीं है। केंद्र सरकार ने चुपचाप इस रिपोर्ट को दबाकर रख था। विपक्ष की भी इसमें कोई खास रुचि नहीं थी, इसलिए किसी ने भी इसे संसद के पटल पर रखने के लिए जोर नहीं दिया। सरकार के पास यों भी ऐसी रिपोर्ट पेश करने के लिए कम से कम 6 महीने का समय था, इसलिए वह भी दिसंबर तक तो निश्चिन्त ही थी। लेकिन एक दिन सुबह (23 नवंबर 2009) एक अंग्रेजी दैनिक ने रिपोर्ट लीक कर दी। यह रिपोर्ट किसके द्वारा लीक करायी गयी, यह अब तक रहस्य बना हुआ है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने इसे खुद लीक कराया, लेकिन यह बात विश्वसनीय नहीं लगती, क्योंकि उसे लीक कराने की क्या जरूरत थी, वह इसे सीधे सदन में पेश कर सकती थी। उसने इससे अब तक सदन में पेश नहीं किया था, तो शायद इसीलिए कि वह खुद भी इस पर चर्चा या बहस से बचना चाहती थी। सरकारी सूत्रों की माने, तो वह इसे संसद के वर्तमान सत्र के अंतिम दो दिन में पेश करना चाहती थी, मगर रिपोर्ट लीक हो जाने से उसे मजबूरन अगले दिन यानी 24 नवंबर को उसे सदन में पेश करना पड़ा।
सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मोहिन्दर सिंह लिब्रहान के नेतृत्व में यह जांच आयोग मस्जिद ढहने की घटना (6 दिसंबर 1992) के मात्र 10 दिन बाद 16 दिसंबर को गठित किया गया था। कांग्रेसी नेतृत्व की तत्कालीन केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने इसके गठन की घोषणा की थी। आयोग को यह पता लगाना था कि मस्जिद किन परिस्थितियों में ढहायी गयी और कौन इसके जिम्मेदार हैं। लिब्रहान साहब ने अपने नियोक्ता का पूरा ध्यान रखा। उन्होंने प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव को हर तरह के आरोप व दोष से मुक्त कर दिया है, बाकी भारतीय जनता पार्टी व संघ परिवार के नीचे से ऊपर तक सारे नेताओं को दोषी करार दिया है। उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह उनके केंद्रीय निशाने पर हैं, बाकी प्रशासन व पुलिस किसी को माफ नहीं किया है। भविष्य में ऐसी कोई घटना फिर न दोहरायी जाए इसके लिए जस्टिस लिब्रहान ने 65 सिफारिशें की हैं। इनमें कई ऐसी सिफारिशें हैं, जिन पर सरकार को सौ बार विचार करना पड़ेगा। जैसे सांप्रदायिकता व जातिवाद से पुलिस व अफसरशाही यानी प्रशासन को दूर रखने की उनकी सिफारिश सरकार की आरक्षण योजना को ध्वस्त कर सकती है। उनकी यह भी सिफारिश है कि जो लोग लाभ के पदों पर कार्यरत हैं, उन्हें धार्मिक संगठनों, चैरिटी व ट्रस्टों का सदस्य बनने की अनुमति न दी जाए। यही नहीं वह यह भी चाहते हैं कि यदि धार्मिक कार्ड इस्तेमाल करके कोई पार्टी चुनाव जीतकर आती है, तो उसे सत्ता संभालने से रोकने के उपाय किये जाएं।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भाजपा, संघ परिवार एवं कल्याण सिंह की सरकार पर पूरा गुस्सा निकाला है। इसमें उन्होंने किसी को माफ नहीं किया है। हां थोड़ा वर्गीकरण अवश्य किया है, जैसे कि कल्याण सिंह, उमा भारती, गोविंदाचार्य आदि को 'रेडिकल्स में गिना है, तो भाजपा के तीन शीर्ष नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी एवं मुरली मनोहर जोशी को छद्म उदारवादी (श्यूडो माडरेट) यानी ऐसा व्यक्ति बताया है, जो सिर्फ देखने सुनने में उदारवादी है या यों कहें कि उन्होंने उदारवाद का चोला पहन रखा है, वैसे हैं वे भी 'रेडिकल ही। उनका यह भी कहना है कि बाबरी मस्जिद को योजनाबद्ध ढंग से गिराया गया। इसे गिराने की सोची-समझी साजिश थी। यह कोई आकस्मिक आक्रोश या उत्तेजना का परिणाम नहीं था। यह साजिश वास्तव में किसने रची और किसने इसे कार्यान्वित किया, यह ठीक-ठीक जानकारी लिब्रहान के पास नहीं है। लेकिन उन्होंने भाजपा व संघ परिवार के शीर्ष नेताओं तक को इसके लिए इसलिए जिम्मेदार ठहराया कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन्हें इसकी जानकारी न रही हो। सच्चाई यह है कि इसके बारे में लिब्रहान साहब ऐसी कोई जानकारी खोजकर नहीं ला सके, जो नई हो या जिसके बारे में आम जनता को पहले से कोई जानकारी न हो।
मोटे तौर पर यह सभी जानते हैं कि जिन्होंने बाबरी मस्जिद के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, यह नारा दिया कि 'मंदिर वहीं बनाएंगे यानी उसी जगह पर, जिस जगह पर वह मस्जिद खड़ी है, वहीं नये मंदिर का निर्माण करेंगे, जिन्होंने कार सेवा शुरू की तथा जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए देशभर से शिलाएं एकत्रित की, अयोध्या में मंदिर निर्माण कार्यशाला खोली, वे ही मस्जिद ढहाने के भी जिम्मेदार हैं। यदि वे इस घटना के बाद प्रतिवर्ष उस दिन देशभर में शौर्यदिवस मनाते हैं, तो वे इस बात की ही पुष्टि करते हैं कि वे इसके जिम्मेदार हैं। इसलिए यदि लिब्रहान साहब अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नीचे तक भाजपा व संघ परिवार को इसका स्थूलतया दोषी मानते हैं, तो कुछ भी गलत नहीं करते। विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल भी यह मानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी भी राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन के अंग थे। इसके लिए लखनऊ में वह गिरफ्तार भी हुए थे। लेकिन यहां सवाल है कि क्या यही पता लगाने के लिए उन्होंने करीब 17 वर्षों का लंबा समय लिया।
अपनी इस रिपोर्ट में उन्होंने केवल एक बात सही कही है, जो आम आदमी की अवधारणा के खिलाफ है और उसे चकित करने वाली है। वह है इस मामले में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव को पूरी तरह दोषमुक्त करार दे देना। इसमें दो राय नहीं कि बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने में उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी, लेकिन उनकी मूक स्वीकृति अवश्य थी। क्योंकि इतना तय है कि यदि वह न चाहते, तो मस्जिद का ढांचा नहीं गिर सकता था। सच कहा जाए, तो उन्होंने बड़ी चतुराई से बाबरी मस्जिद को अपनी राजनीति का मुहरा बना लिया था। वास्तव में उन्होंने इस मंदिर आंदोलन के खिलाफ भाजपा को ही इस्तेमाल करने की चाल चली। इस चाल में उन्हें अपने दोनों हाथों में राजनीतिक लाभ के लड्ïडू नजर आ रहे थे और आत्मिक तृप्ति का अलग से लाभ मिलने की भी संभावना थी।
उन्होंने उत्तर प्रदेश राज्य की भाजपा सरकार के कंधे पर मस्जिद रक्षा का भार स्थापित किया। संवैधानिक नियमों में बंधी सरकार यह नहीं कह सकती थी कि वह मस्जिद के ढांचे की सुरक्षा नहीं कर सकती। इसलिए उसने राष्टï्रीय एकता परिषद की बैठक में भी यह वचन दिया और अदालत को भी इसका आश्वासन दिया। लेकिन इसके साथ ही वह राम मंदिर आंदोलन व कारसेवा को भी रोकने में असमर्थ थी, क्योंकि जिस राम मंदिर आंदोलन की लहरों ने उसे सत्ता तक पहुंचाया था, वह अब उसी ज्वार को रोकने का साधन कैसे बन सकती थी। उसे इन लहरों के साथ बहना ही था। नरसिंह राव साहब ने कल्याण सिंह को हर तरह की मदद का आश्वासन दिया। यह भी कहा कि जितनी केंद्रीय पुलिस की जरूरत हो, वह देने के लिए तैयार हैं। लेकिन मस्जिद की रखवाली उन्हें ही करनी पड़ेगी। राव साहब की यह चाल भाजपा की सरकार के लिए एक शिकंजा थी। ऐसा नहीं हो सकता कि मस्जिद को ढहाने की कोई साजिश हो और उसकी भनक केंद्र को बिल्कुल न हो। लेकिन राव साहब जानते थे कि बिना कठोर बल प्रयोग, यानी बिना रक्तपात के अब इसे रोका नहीं जा सकता। कल्याण सिंह यदि मस्जिद को बचाने का वचन निभाएंगे, तो उन्हें कारसेवकों पर लाठी डंडे ही नहीं गोली भी चलानी पड़ेगी। और यदि वे यह नहीं करेंगे, तो मस्जिद का ढहना तय है। राव साहब की दृष्टिï में ये दोनों स्थितियां उनकी पार्टी के हित में थीं। यदि कल्याण सिंह गोली चलवाएंगे, तो मस्जिद भले बच जाए, लेकिन भाजपा का पूरा जनाधार ध्वस्त हो जाएगा और यदि उन्होंने कुछ न किया और मस्जिद गिरने दी, तो फिर केंद्र सरकार हरकत में आएगी और मस्जिद के साथ भाजपा की सरकारों को ध्वस्त करके वहां के शासन अपने हाथ में ले लेगी।
इसमें दो राय नहीं कि राव साहब यदि चाहते तो मस्जिद का बाल भी बांका नहीं हो सकता था। वह विवादित परिसद को केंद्र के अधिकार में लेकर उसके चारों तरफ अर्धसैनिक बलों का पहरा लगवा सकते थे। यह काम बिना राज्य सरकार को बर्खास्त किये भी हो सकता था, लेकिन उस स्थिति में कांग्रेस को देशव्यापी हिन्दू आक्रोश का सामना करना पड़ता, जिसका निश्चय ही उसे भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ता। इसलिए उन्होंने एक तीर से तीन शिकार करने की कोशिश की और बदनामी द्ब्रोलकर भी न केवल भाजपा को धूलिसात किया, बल्कि कांग्रेस पार्टी का भी बचाव किया। यह बात दूसरी है कि उनकी इस राजनीति से देश का मुस्लिम समुदाय बिदक गया और उन्हें भी बाबरी मस्जिद ध्वंस के लिए कल्याण सिंह से कम जिम्मेदार नहीं माना। किन्तु लिब्रहान साहब ने नरसिंह राव को इस मामले में पूरी तरह निर्दोष करार दिया है। उनका तर्क है कि चूंकि उनके पास उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की तरफ से कोई रिपोर्ट नहीं थी, इसलिए उनके हाथ-पांव बंधे थे, क्योंकि इस तरह की रिपोर्ट के बिना वह कोई कार्रवाई नहीं कर सकते थे। अब यह बात अलग है कि कोई भी व्यक्ति इसे अत्यंत बचकाना तर्क ही कहेगा। प्रधानमंत्री राज्यपाल से जैसी चाहते वैसी रिपोर्ट मंगवा सकते थे। फैजाबाद (जिसके अंतर्गत अयोध्या आता है) से प्रकाशित हिंदी दैनिक के संपादक शीतला सिंह ने अपने लेखों में लिखा है कि 6 दिसंबर के दिन वह लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क में थे। अयोध्या की मिनट-मिनट की खबर वहां पहुंच रही थी, फिर भी प्रधानमंत्री कार्यालय तब तक हरकत में नहीं आया, जब तक कि मस्जिद पूरी तरह भूमिसात नहीं हो गयी। केंद्रीय सुरक्षा बल तथा केंद्र से भेजी गयी 'रैपिड एक्शन फोर्स की बटालियनें दो दिन पहले से घटना स्थल से मात्र 8 कि.मी. दूरी पर तैनात थीं। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का इस्तीफा दिन के साढ़े तीन बजे ही पहुंच गया था, लेकिन उन्हें बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लागू करने की कार्रवाई रात 8.30 पर हुई। शीतला सिंह की रिपोर्ट पर यदि विश््वास करें, तो मस्जिद ढहने के बाद उस विवादित स्थल पर अस्थाई राम मंदिर के निर्माण की सारी कार्रवाई राष्टï्रपति शासनकाल में और केंद्रीय बलों के घेरे में हुई।
कोई भी जांच आयोग या न्यायालय अपना फैसला कानूनों के तकनीकी दायरे के भीतर साक्ष्यों के आधार पर देता है। इसमें उसकी मानवीय सीमाएं भी होती हैं। फिर ऐसे जांच आयोगों के गठन वस्तुत: राजनीतिक आधार पर होते हैं और बहुधा उनका निश्चित राजनीतिक लक्ष्य भी होता है। लिब्रहान आयोग भी इसका अपवाद नहीं। इसके आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी है, लेकिन सरकार को राजनीतिक कार्रवाइयां करने का प्रचुर अवसर दिया गया है।
अब यदि पूरे प्रकरण पर तटस्थ ढंग से विचार करें, तो देखेंगे कि राममंदिर का यह आंदोलन छेडऩे वाला भले ही कोई एक पार्टी, एक संगठन या एक सांगठनिक परिवार रहा हो या भले ही इसका लाभ किसी एक पार्टी ने उठाया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें लोग पार्टियों की सीमा तोड़कर शामिल हुए थे। सांस्कृतिक दृष्टिï से देश का हर संवेदनशील नागरिक इस आंदोलन के साथ था। राजनीतिक दृङ्क्षष्टï से जो भाजपा के विरोधी थे, वे भी अंतर्मन से इस मुद्दे पर उसके साथ थे। मस्जिद ढहने पर केवल संघियों व भाजपाइयों ने ही नहीं कांग्रेसियों व कम्युनिस्टों में से भी तमाम लोगों ने हर्ष मनाया था। वे बयान कुछ और देते थे, लेकिन भावनात्मक स्तर पर वे इसे ढहाने वालों के साथ थे। उन्हें अफसोस था तो केवल यह कि इसे ढहाने वाले सीधे सामने आकर यह क्यों नहीं कहते कि हां हमने ढहाया है। भाजपा को या आडवाणी को इसकी सजा नहीं मिली है कि वे मंदिर नहीं बनवा सके। उन्हें सजा मिली है कि वे उनमें यह साहस नहीं है कि वे कह सकें कि उन्हें इसकी प्रसन्नता है, क्योंकि वे चाहते थे कि यह ढह जाए। यहां के नेताओं का दोहरापन यहां की राजनीति का सबसे बड़ा रोगा है। वे चाहते कुछ हैं, करते कुछ हैं और कहते कुछ और हैं। आखिर वे साहसपूर्वक संसद में व जनता के बीच यह क्यों नहीं कहते कि राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद का विवाद कोई 1992 या 1949 का नहीं, बल्कि 1528 का है।
राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर की लड़ाई न तो संघ परिवार ने शुरू की है और न भारतीय जनता पार्टी ने। इन्होंने तो केवल इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की है। इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कांग्रेस ने भी की, लेकिन उसने ऐसे साहस का प्रदर्शन नहीं किया कि वह भाजपा व संघ को इस मामले में पीछे छोड़ सके। राजीव गांधी ने जब अयोध्या में मस्जिद के मुख्य द्वार के सामने बमुश्किल 20 गज की दूरी पर मंदिर का शिलान्यास कराया तथा चुनाव प्रचार की अपनी शुरुआत अयोध्या से 'रामराज्य लाने के नारे के साथ की, तो उनका लक्ष्य स्पष्टï था, किन्तु कांग्रेस का इतिहास हमेश मुस्लिमों की तरफ झुका रहा है। लेकिन इससे इतना तो प्रमाणित होता ही है कि कांग्रेस का बहुसंख्यक कार्यकर्ता वर्ग मंदिर के पक्ष में था और वह चाहता था कि राम मंदिर निर्माण का लाभ विपक्ष के खाते में जाने के बजाए कांग्रेस के खातेे में आए।
बहुत से लोगों को शायद यह न पता हो कि तथाकथित बाबरी मस्जिद एक दिन भी विवादमुक्त नहीं रही। 1528 में वहां स्थित मंदिर को ढहाने के बाद (अब इसके पुरातात्विक साक्ष्य भी प्राप्त हो चुके हैं), जब मस्जिद का निर्माण शुरू हुआ, तभी से स्थानीय लोगों ने उसका विरोध शुरू कर दिया था। आज भले उन संघर्षों का कोई क्रमबद्ध-दस्तावेजी प्रामाणिक इतिहास न उपलब्ध् हो, लेकिन लोककथाओं में वह इतिहास जीवित है और पारिस्थितिक साक्ष्य उसकी पुष्टि करते हैं। अब तक बहुत बार यह सारी कहानी दुहरायी जा चुकी है, लेकिन याद ताजा करने के लिए इनका संक्षिप्त उल्लेख किया जा सकता है।
कहा जाता है कि इस विवादित स्थल के लिए लगातार चल रहे खूनी संघर्ष को टालने के लिए बादशाह अकबर ने मस्जिद परिसर के भीतर ही हिन्दुओं को एक चबूतरे पर राम की पूजा करने की अनुमति दे दी। पूरी दुनिया के इतिहास में यह अनूठा उदाहरण है, जब मस्जिद परिसर में मूर्ति पूजा की अनुमति मिली हो। यह हिन्दुओं को शांत करने का एक अस्थाई उपाय था, लनेकिन यह अस्वाभाविक व्यवस्था थी। इस्लाम जो मूर्ति पूजा का कट्टर विरोधी है, उसके साथ यह व्यवस्था शांतिपूर्वक तो नहीं चल सकती थी, फिर भी यह व्यवस्था लगातार ब्रिटिश काल तक चलती रही। कम से कम ब्रिटिश दस्तावेजों में इसका रिकार्ड है। 1905 के 'फैजाबाद के गजेटियर के अनुसार 1855 तक हिन्दू तथा मुस्लिम एक ही भवन (यहां मस्जिद नाम का उल्लेख नहीं है, लेकिन भवन से आशय बाबरी मस्जिद ही है) में अपनी-अपनी पूजा किया करते थे, लेकिन विद्रोह (1857) के बाद मस्जिद के आंगन में मुख्य भवन के सामने एक दीवाल खड़ी कर दी गयी, जिसके भीतर हिन्दुओं को आने से रोक दिया गया। वे (हिन्दू) इस दीवाल के बाहर एक चबूतरे पर अपनी पूजा किया करते थे। 1857 से 1949 तक यही व्यवस्था चलती रही, लेकिन बीच में हिन्दू चुप नहीं बैठे रहे। 1883 में रघुबर दास नाम से एक साधु ने उस चबूतरे पर एक मंदिर बनाने का प्रयास किया, क्योंकि चबूतरे पर भी किसी स्थाई निर्माण का निषेध था। हिन्दू केवल एक घास-फूस की झोपड़ी -वह भी बमुश्किल तीन फिट ऊंची- रखकर पूजा किया करते थे। उन्होंने (रघुबर दास) डिप्टी कमिश्नर के यहां दरखास्त दी, लेकिन 19 जनवरी 1885 को डिप्टी कमिश्नर ने उनकी याचना रद्द कर दी। फिर जिला जज के यहां दरखास्त दी। उन्होंने भी मौका मुआयना करने के बाद मंदिर की अनुमति देने से इंकार कर दिया। उस समय जिला जज थे जे.इ.ए. चांबियार। उन्होंने 17 मार्च 1886 के अपने फैसले में कहा कि चबूतरे पर मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। फिर 25 मई 1886 को अवध प्रांत के जुडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग की अदालत में अपील की गयी। वह अपील भी खारिज हो गयी।
कानूनी तौर पर यद्यपि हिन्दुओं की कोई याचिका स्वीकार नहीं की गयी, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनका कोई दावा ही नहीं बनता था। बाबा रघुबर दास की याचिका रद्द करते हुए जिला जज ने अपने फैसले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी, 'मैंने देखा कि सम्राट बाबर द्वारा बनवायी गयी मस्जिद अयोध्या नगर के किनारे स्थित है... यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि यह मस्जिद ऐसी जगह पर बनायी गयी है, जो हिन्दुओं के लिए अत्यंत पवित्र एवं महत्वपूर्ण है, लेकिन चूंकि यह घटना 358 साल पहले की है, इसलिए इसके लिए बहुत देर हो चुकी है कि पीडि़त पक्ष की शिकायत दूर करके कोई राहत दी जा सके। ऐसे में जो कुछ किया जा सकता है, वह केवल यही है कि दोनों पक्षों के बीच यथास्थिति बनाए रखी जाए। ऐसे मामले में -जैसा की यह है- कोई नया कदम उठाने से लाभ के बजाए हानि अधिक हो सकती है और व्यवस्था बिगड़ सकती है।
जब कोई कानूनी प्रयास सफल नहीं हुआ, तो लोगों ने कानून का दरवाजा खटखटाने से तौबा कर लिया। तब तक कांग्रेस का गठन हो गया था। लोगों ने आजादी के आंदोलन की ओर ध्यान देना शुरू किया। यह माना गया कि अब देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद ही हिन्दुओं को राम जन्मभूमि पर अपना अधिकार मिल सकेगा। इस बीच अयोध्या में एक-दो दंगे हुए। दंगे प्राय: रामनवमी के अवसर पर हुए, जब संयोग से बकरीद भी उसी समय पड़ी और अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर ने मुसलमानों को गाय की कुरबानी करने की अनुमति दे दी। ऐसा एक दंगा 1912 में हुआ, लेकिन वह जल्दी नियंत्रित हो गया। 1934 में एक बड़ा दंगा हो गया, जिसमें हिन्दुओं ने बाबरी मस्जिद पर भी हमला कर दिया और उसके एक गुम्बद को ढहा दिया। अंग्रेज सरकार ने हमलावरों पर कड़ी कार्रवाई की और पूरी अयोध्या पर दंडात्मक कर (प्यूनिटिव टैक्स) लगा दिया। इससे एकत्रित धन से गुम्बर की मरम्मत करायी गयी।
इसके बाद अयोध्या के लोग देश की स्वतंत्रता की प्रतीक्षा करने लगे। 15 अगस्त 1947 को देश के विभाजन के साथ स्वतंत्रता भी हासिल हुई। मुसलमानों का अलग पाकिस्तान बन गया। अब इन्हें लगा कि अब तो राम जन्मभूमि परिसर पर उनका अधिकार हो ही जाएगा, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ, तो बेचैन अयोध्यावासियों ने इसके लिए सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। उन्होंने पूरी अयोध्या में अखंड रामचरितमानस का पाठ शुरू किया। वह महीनों चलता रहा, फिर भी प्रशासन नहीं चता तो रामचरण दास नाम के एक साधु ने बम से मस्जिद को उड़ा देने की योजना बनायी। लेकिन बम बनाते समय ही विस्फोट हो गया और वे अंधे हो गये। योजना विफल हो गयी। फिर कुछ उत्साही साधुओं ने 22 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि में मस्जिद में घुसकर वहां बालरूप राम की मूर्ति स्थापित कर दी और उस मस्जिद के भवन को ही मंदिर बना दिया।
यह खबर आग की तरह शहर में फैल गयी। सूचना प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू तक पहुंची। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को आदेश दिया मूर्तियां तत्काल हटा दी जाएं। पंत जी ने राज्य के मुख्य सचिव भगवान सहाय और आई.जी. पुलिस (उस समय आई.जी. ही प्रदेश की पुलिस का सर्वोच्च अफसर हुआ करता था), वी.एन. लाहिड़ी को निर्देश दिया। उन्होंने फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर के.के. नैयर को यह फरमान सुनाया कि पंडित नेहरू तथा पं. पंत का आदेश है कि मूर्तियां फौरन हटा दी जाएं, मगर के.के. नैयर ने आदेश मानने से इंकार कर दिया और जवाब भेजा कि इस समय पूरी अयोध्या आंदोलित है और यदि ऐसे समय में मूर्तियां हटाने की कोशिश की गयी, तो भारी खून-खराबा हो सकता है। तो इसके विकल्प स्वरूप परिसर को पुलिस घेरे में ले लिया गया और यथास्थिति बनाये रखने का निर्देश दिया गया। 16 जनवरी 1950 को अयोध्या केएक नागरिक गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज के पास याचिका दी कि उन्हें वहां निर्बाध पूजा व दर्शन का अधिकार दिया जाए। ऐसी ही एक याचिका रामचंद परमहंस द्वारा दायर की गयी। तबसे इन मुकदमों का दूसरा दौर शुरू हुआ।
विश्व हिन्दू परिषद ने तो 1984 में इस मसले में हाथ डाला। यहां उसकी पृष्ठभूमि देना संभव नहीं है, लेकिन यह सच्चाई है कि इसके पहले विश्व हिन्दू परिषद, भाजपा या संघ का इस माले में कोई संबंध नहीं था। सारी लड़ाई स्थानीय लोग ही लड़ रहे थे।
इधर की दोनों पक्षों की स्थिति से सभी वाकिफ हैं, लेकिन एक तथ्य बहुत कम चर्चा में आ पाता है, वह यह है कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद हाईकोर्ट के आदेश पर उस जमीन का पुरातात्विक उत्खनन भी हो चुका है, जिस पर उपर्युक्त मस्जिद खड़ी थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) विभाग द्वारा कराये गये इस उत्खनन में यह असंदिग्ध रूप से प्रमाणित हो चुका है कि वहां पर ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी का बना एक भव्य मंदिर खड़ा था, जिसे तोड़कर यह मस्जिद बनी थी। यही नहीं, उपुर्यक्त मंदिर की सतह के नीचे भी एक फर्श मिली है, जिससे यह संकेत मिलता है कि इस मंदिर के पहले भी वहां कोई मंदिर था, जिसके कालक्रम में ढह जाने के कारण गहड़वाल नरेश गोविंदचंद्र ने इस मंदिर का निर्माण कराया था, लेकिन मुस्लिम पक्ष इस पुरातात्विक प्रमाण को भी मानने के लिए तैयार नहीं है।
अब इस पृष्ठभूमि में 6 दिसंबर 1992 की घटना पर विचार करें। लिब्रहान साहब कहते हैं कि पुलिस और सुरक्षा बल के जवान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। लोग मस्जिद ढहाते रहे। प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी सब कल्याण सिंह के षडï्ïयंत्र में शामिल थे। जैसा कि शीतला सिंह ने लिखा है, यह सच है कि राम जन्मस्थल पर मस्जिद ढहने के बाद जो अस्थाई मंदिर बना, वह राष्ट्रपति शासन काल में यानी नरसिंह राव साहब के शासन में और केंद्रीय सुरक्षा बलों के घेरे में उनकी देख-रेख में हुआ है। सुरक्षा बल या प्रशासन में शामिल होने मात्र से कोई व्यक्ति एकाएक अपने पूरे इतिहास व संस्कृति से अपने को अलग नहीं कर सकता। शताब्दियों का अपमान धोने का यदि अवसर मिले, तो कौन संवेदनशील चेतन व्यक्ति चूकना चाहेगा।
जब न्याय के दरवाजे बंद हो जाएं, तो किसी व्यक्ति या समुदाय के पास कानून हाथ में लेने या हिंसा पर उतारू होने के अलावा और रास्ता ही क्या बचता है। 1528 से लेकर 1992 तक की अनवरत प्रतीक्षा फिर भी न्याय के मंदिरों और प्रशासन के शीर्ष मंचों से कोई फैसला नहीं, कोई न्याय नहीं। कैसी विडंबना कि अकबर का फैसला ही आगे भी जारी रख गया। न अंग्रेजों ने बदला, न स्वतंत्र भारत की सरकार ने। देश हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर बट गया। पाकिस्तान अलग हो गया। फिर भी राम जन्मभूमि पर हिन्दुओं को अधिकार नहीं मिल सका। ऐसे में इस देश से किस प्रतिक्रिया की आशा की जा रही थी। लिब्रहान साहब कोई भी रिपोर्ट दें, लेकिन इस देश के इतिहास, संस्कृति तथा राष्ट्रीय चेतना से जुड़े हर व्यक्ति के लिए इस मस्जिद के ढहाए जाने की जिम्मेदारी बाबर से लेकर 1992 तक की देश की सारी राष्ट्रीय सरकारों और न्यायालयों के ऊपर जाती है। आहत समुदाय आखिर कब तक सरकारों और न्यायालयों की प्रतीक्षा करे। अफसोस की बात यह है कि इसका श्रेय उन कायर संगठनों और नेताओं को दिया जा रहा है, जिनमें यह स्वीकार करने का साहस नहीं है कि उन्होंने यह किया। जो इस पर अफसोस व्यक्त कर रहे हैं, इन्हें माफ कर दिया जाना चाहिए। असल में कभी-कभी लगता है कि आज के युग में न्याय भी राजनीति का गुलाम हो गया है या शायद राजकीय न्याय, हमेशा ही राजनीति का गुलाम रहा है। कम से कम राम जन्मभूमि व बाबरी मस्जिद प्रकरण से तो यही प्रमाणित होता है।