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रविवार, 4 सितंबर 2011

ये हिंदी किस 'भाषा' का नाम है? -1

लाल किले में मुगल बादशाह शाहजहां का दरबार, जहां हिन्दुस्तानियों की जुबान
हिंदी या हिंदवी से अलग ‘जुबाने उर्दुए मुअल्ला‘ ने रूपाकार ग्रहण किया।

कभी पूरे हिन्दुस्तान की लोक व्यवहार की भाषा को ‘हिंदी‘ नाम दिया गया था। तब संस्कृत भी हिंदी थी, पाली भी हिंदी थी, अवधी भी हिंदी थी, या यों कहें कि देशभर की सभी प्रकृत व संस्कृत भाषाएं हिंदी थी, लेकिन अब केवल उत्तर के कुछ प्रदेश ही हिंदी भाषी कहे जाते हैं। पूरा देश हिंदी भाषी और हिंदीतर भाषी में बंट गया है। कहने को यह ‘हिंदी‘ देश की राजभाषा है, लेकिन इसे राष्ट्र भाषा का दर्जा अब तक नहीं मिला है और यह संविधान की भाषाई अनुसूची में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ ही परिगणित है। इसी अंग्रेजी की समकक्षता भी प्राप्त नहीं है। भाषा आधारित प्रांतों की रचना ने इसे और हाशिए की ओर ठेल दिया है।
यह शीर्षक कुछ लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है। जो भाषा इस देश की संविधान स्वीकृत राजभाषा है, उसके नाम को लेकर यह सवाल उठाना कि यह किस भाषा का नाम है, सवाल उठाने वाले की अल्पज्ञता व मूर्खता ही नहीं, हिमाकत भी कही जाएगी। अब आप मुझे जो भी कहें या जो भी समझें, लेकिन यह सवाल उठाना मुझे बहुत महत्वपूर्ण लग रहा है, विशेषकर इसके ऐतिहासिक संदर्भ में। हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति व हिन्दू जाति की तरह देशव्यापी (व देश के बाहर भी) उपस्थिति के बावजूद इसकी भी कोई सुस्पष्ट पहचान या परिभाषा नहीं बतायी जा सकती।

वास्तव में इस देश के लोगों को हिंदी नाम की भाषा व हिन्दू नाम की जाति व धर्म की कोई जानकारी नहीं थी। शायद उन्हें अपने देश का नाम भी पता नहीं था। पश्चिम से यानी यूनान, अरब, फारस, मध्येशिया आदि से आये लोगों ने यहां के लोगों को बताया कि वे हिन्दू हैं, उनकी भाषा हिंदी है और उनका देश हिन्दुस्तान। इस देश की धरती, यहां के निवासियों, उनकी भाषा व धर्म को यह नाम तो बहुत पहले मिल चुका था, किंतु यह स्थापित तब हुआ, जब यहां बहुत से मुस्लिम आ गये और मुस्लिम शासन स्थापित हुआ, क्योंकि जब वे बाहर थे, तो इन्हीं नामों से यहां के लोगों को जानते-पहचानते थे। उनके आधिपत्य में रहते-रहते यहां के लोगों ने भी इसी पहचान को अंगीकार कर लिया। यहां यह जानना रोचक होगा कि देश, जाति व धर्म के रूप में तो इस शब्द की राष्ट्रीय पहचान अब भी बनी हुई है, लेकिन भाषा के स्तर पर यह सिकुड़कर केवल उत्तर के कुछ इलाकों तक ही सीमित रह गयी है और उत्तर में भी उसकी एक परजीवी (कृपया शब्दों पर जाएं, बल्कि उसके निहितार्थ को ही ग्रहण करें) की हालत बनी हुई है। यद्यपि इसको बोलने-समझने वाले पूरे देश में क्या दुनिया भर में फैले हुए हैं, लेकिन इसे उत्तर के कुछ प्रातों की ही स्वाभाविक भाषा माना जाता है और उसी को हिंदी क्षेत्र और वहां के निवासियों को ही हिंदीभाषी कहा जाता है। बाकी क्षेत्र को गैर हिंदी क्षेत्र और गैर हिंदी भाषी माना जाता है। वहां के हिंदी विद्वानों को गैर हिंदी भाषी विद्वान की संज्ञा दी जाती है। तो भाषा के स्तर पर आकर हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान की परिभाषा इस तरह सिकुड़ गयी कि उसकी ठीक-ठीक पहचान ही मुश्किल हो गयी ।

यहां एक और रोचक बात भी हुई कि देश जब स्वतंत्र हुआ तो हमने भाषा, जाति और धर्म के नाम से तो हिंदी-हिन्दू जोड़े रखा, लेकिन देश के नाम के तौर पर हिन्दुस्तान को नहीं अपनाया। उसके लिए हमने अंग्रेजों द्वारा दिया गया ‘इंडिया‘ अपना लिया।

इस सबका परिणाम यह हुआ कि देश के स्वतंत्र होने पर जब हम अपनी विविध प्रकार की पहचान समेटने की स्थिति में आए, तो हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान की सारी संगति बिगड़ चुकी थी। अब न यह देश हिन्दुस्तानल रह गया था, न यहां के निवासी हिन्दू थे और न यहां के निवासियों की भाषा हिंदी रह गयी थी। हिन्दुस्तान तो खैर गुम हो गया, जिसके पुनः आगमन की भी कोई संभावना नहीं रह गयी (शायद कोई जरूरत भी नहीं), क्योंकि यदि किसी ने लाने की कोशिश भी की, तो फौरन कुछ लोग सवाल उठायेंगे कि क्या यह देश केवल हिन्दुओं का है, इसलिए बाकी बचे हिंदु और हिन्दू। किंतु उनकी भी पहचान संकीर्ण हो गयी। यहां केवल कुछ लोग ही हिन्दू रह गये और केवल कुछ लोगों की भाषा हिंदी रह गयी। यानी पूरे देश की पहचान से इनका कोई लेना-देना नहीं बचा। जब राष्ट्र के रूप में अंग्रेजों का दिया देश हमने स्वीकार किया तो भाषा के रूप में उनकी दी हुई भाषा भी अपना ही और उनकी दी ‘बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुरंगी, बहुभाषी खिचड़ी (फ्लूरल) पहचान भी स्वीकार कर ली। इतना ही नहीं, उस पर गर्व भी करने लगे। अपनी इस नई पहचान में राष्ट्रीय एकता की भावना का कोई तत्व शेष नहीं रह गया- न भाषा, न संस्कृति, न जाति, न धर्म। किसी खिचड़ी में एकरसता कायम करनी हो, तो दो ही रास्ते रह जाते हैं या तो उसके सारे भेदों को ठुकरा दो या सबको उनकी पृथकता के साथ सम्मान भाव से स्वीकार कर लो। तो इसके लिए हमारे देश के आधुनिक मनीषियों ने धर्म के स्तर पर तो दो महान तत्वों को स्वीकार किया, एक तो ‘धर्मनिरपेक्षता‘ (सेकुलरिज्म) और दूसरा ‘सर्व धर्म समभाव‘। लेकिन इनका भी व्यवहारिक स्तर पर निर्वाह नहीं हो सका। राजनीतिक स्वार्थ व अवसरवाद ने ‘धर्मनिरपेक्षता‘ और ‘भेदभाववाद‘ को अधिक महत्व दिया। और भाषा के संदर्भ में तो इतना भी परवाह करने की जरूरत नहीं समझाी। गयी। क्षेत्रीय भाषाओं के आधार पर प्रांतों का निर्माण करके क्षेत्रीयता को संतुष्ट कर दिया गया और राष्ट्र के स्तर पर तो ‘इंडिया‘ और ‘इंग्लिश‘ स्वीकार की ही जा चुकी थी। विविध धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र के बुद्धिजीवियों व राजनेताओं ने अपनी-अपनी श्रेष्ठता प्रतिपादित करने के प्रयास में ऐसा देशव्यापी भ्रमजाल पैदा किया कि एक राजनीतिक जागीरदारी के अलावा राष्ट्र की कोई सर्वमान्य पहचान ही नहीं रह गयी।

वस्तुतः हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान परस्पर सम्बद्ध शब्द और भाव हैं। प्रारंभ में इनका धर्म (मजहब या रिलीजन) से कोई संबंध नहीं था, लेकिन अब हिन्दू शब्द तो केवल धर्म (रिलीजन) की पहचान बन गया है, वह भी एक ऐसे धर्म की, जिसकी अब तक कोई सर्वमान्य परिभाषा ही नहीं बन सकी है। इसे धर्म मानने का काम अंग्रेजों या यूरोपीय विद्वानों ने किया, बाद में उनके प्रभाव के कारण इस पहचान वाले भारतीयों ने भी उसे स्वीकार कर लिया और इसकी गौरवगाथा लिखने में लग गये। लेकिन इस विडंबना की तरफ लोगों का ध्यान प्रायः नहीं गया कि न तो इस हिन्दू का देश हिन्दुस्तान रह गया और न इस हिन्दू की भाषा हिंदी बन सकी। यह ‘हिन्दू‘ एक जाति और एक संस्कृति के रूप में भी नहीं खड़ा हो सका, इसीलिए यह मान्य अंतर्राष्ट्रीय परिभाषा के अनुसार हिन्दू राष्ट्र (हिन्दू नेशन) भी नहीं बन सका। आज जो ‘इंडिया‘ नाम का देश है, उसे विदेशी विद्वान ‘एक राष्ट्र‘ नहीं, बल्कि ‘बहुराष्ट्रीय देश‘ (मल्टीनेशन कंट्री) कहते हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह बन गयी है कि इसे जो जैसे चाहे परिभाषित कर सकता है। खैर, यह पूरा विषय बहुत विस्तृत है, जिसके ऐतिहासिक क्रम में ब्यौरेवार विवेचन की जरूरत है, किंतु यहां इस समय की चर्चा केवल भाषा पर केंद्रित है।

पुराणों तथा अन्य पारंपरिक ग्रंथों से हम जानते हैं कि हिमालय के दक्षिण का समुद्र पर्यंत भूभाग ‘भारत वर्ष‘ कहलाता था, लेकिन ज्ञात इतिहास काल में इस क्षेत्र में ऐसी कोई राजनीतिक इकाई या साम्राज्य नहीं था, जिसकी ‘भारत‘ या ‘भारत वर्ष‘ के नाम से पहचान रही हो। इसलिए इस क्षेत्र से बाहर के लोग अपनी सुविधा से इस क्षेत्र का नामकरण कर लेते थे। पश्चिमी क्षेत्र से इस भूक्षेत्र को अलग करने वाली प्राचीन पहचान ‘सिंधु‘नदी थी, इसलिए पश्चिम के लोगों ने इसके पूर्व के निवासियों को इसी नदी के नाम से पहचान दी। पर्सिया या फारसी में प्रायः ‘स‘ का उच्चारण ‘ह‘ हो जाता है। वहां महाप्राण ‘ध‘ की जगह अल्पप्राण ‘द‘ के उच्चारण की भी प्रवृत्ति देखी जाती है, इसलिए वहां ‘सिन्धु‘ या ‘हिन्दू‘ हो जाना स्वाभाविक था, जैसे संस्कृत का ‘सप्ताह‘ वहां ‘हफ्ता‘ हो गया और ‘असुर‘ का ‘अहुर‘। यूनानियों ने शायद फारस वालों से ही नाम की पहचान प्राप्त की और अपनी सुविधा से ‘हिन्दू‘ का ‘इंडु‘ या ‘इंडस‘ कर लिया। यूरोपियनों ने यूनान से ही इस देश का नाम ‘इंडिया‘ प्राप्त किया। यूनानियों की पहचान के आधार पर ही उन्होंने इस देश की भौगोलिक व सामाजिक पहचान प्राप्त की। अरबी-फारसी परंपरा से प्रभावित लोग इस देश को हिन्दुस्तान कहने लगे, तो यूनानी प्रभाव वाले पश्चिमी देश ‘इंडिया‘। तो विदेशी नजर में इस देश के दो नाम हो गये ‘इंडिया‘ और ‘हिन्दुस्तान‘ (संक्षेप में हिंद-बिल्कुल सिंध की तर्ज पर)। लेकिन आगे की विडंबना यह रही कि जब यहां विदेशियों के शासन का प्रारंभ हुआ, तो शुरुआत में जितने इलाकों पर अफगानों, तुर्कों व फारस वालों का शासन कायम हुआ, उतना ही क्षेत्र हिन्दुस्तान के नाम से चर्चित हुआ, बाकी का इलाका अलग-अलग क्षेत्रीय नामों से ही जाना जाता था। बाद में जब अंग्रेज आए, तो जितने इलाकों पर उनका कब्जा हुआ, वह ‘इंडिया‘ या ‘ब्रिटिश इंडिया‘ कहा जाने लगा और बाकी के इलाके या रियासतें अपने क्षेत्रीय नाम या वंश नाम से चलती रहीं। इस बीच राजनीतिक पहचान के रूप में भारत कहीं नहीं था। प्रारंभिक मुस्लिम काल के प्राकृत व अपभ्रंश साहित्य में प्रायः जहां भी ‘भारत‘ या ‘भारतीय‘ का इस्तेमाल हुआ है, वह गैर मुस्लिमों के अर्थ में हुआ है। जैसे ‘इह भरये‘ यानी ‘यह भारतों का‘। यदि ब्रिटिश काल के गजेटियरों को देखें, तो वहां दंतकथाओं के आधार पर संकलित इतिहास में ‘भर‘ जाति या ‘भ्रों के टीलों‘ का बहुत उल्लेख है। उस पर पूरा भरोसा करें, तो लगेगा कि कम से कम उत्तर भारत में राजस्थान से लेकर बंगाल तक शताब्दियों तक ‘भरों‘ का शासन था, जबकि अन्य इतिहास ग्रंथों या पुराने साहित्य में इनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। वास्तव में ये ‘भरों‘ नहीं, बल्कि ‘भरतों‘ या ‘भारतीयों‘ के टीले यानी उनके नगरों व किलों के ध्वंसावशेष हैं। प्रारंभिक काल में यहां आए मुस्लिम यहीं की भाषा व्यवहार में लाते थे, इसलिए उन्होंने अपना द्वारा स्थापित नगरों, किलों के अतिरिक्त जो कुछ पुराना था, उसे यहां के देशी लोगों की भाषा में ‘भरतों‘ या ‘भरों‘ का करार दे दिया है। आश्चर्य की बात है कि मध्यकाल या उत्तर मध्यकालीन इतिहास के पंडित अभी भी इतिहास की इस गुत्थी में उलझे हैं और भ्रों की पहचान में लगे हैं। यहां थोड़ा विषयांतर हो गया है, लेकिन इसका उद्देश्य यह बताना था कि हमने मध्यकालीन लोकभाषा की सम्यक पड़ताल नहीं की है। हमने ज्यादातर दरबारी कवियों की रचनाओं और मठों में सुरक्षित धार्मिक (रिलीजस) गं्रथों के आधार पर अपने भाषा इतिहास की रचना कर ली है।

यहां इतना तो स्पष्ट है कि बाहर के लोगों ने सिंधु नदी के पूर्व के सारे लोगों को हिन्दू, उनकी भाषा को हिंदी और पूरे समुद्र पर्यंत क्षेत्र को हिन्दुस्तान कहा। उन्होंने यहां के मजहब का कोई जिक्र नहीं किया। अब उनकी मूल बात मानें, तो इस देश की सारी भाषाएं हिंदी हैं। ईरान के प्रसिद्ध बादशाह नौश्ेरवां (531-579 ई.) में बजरोया नाम के एक विद्वान को ‘पंचतंत्र‘ का अनुवाद फारसी में करने के लिए भारत भेजा। ‘पंचतंत्र‘ संस्कृत का गं्रथ है, लेकिन इस अनुवाद की भूमिका में बजरोया पंचतंत्र की भाषा को ‘जबाने हिंदी‘ कहता है। इसी तरह मिनहाजुस्खी की पुस्तक ‘हबकाते नासिरी‘ में बताया गया है कि जबाने हिंदी में ‘बिहार‘ का अर्थ मदरसा होता है। यहां पालि या अप्रभंश के लिए ‘जबाने हिन्दी‘ शब्द का प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ‘अवधी‘ को हिन्दुई कहते हैं। ‘तुरकी, अरबी, हिन्दुई भाषा जेते आहि जेहिमह मारग प्रेमकर सबै सराहैं ताहि।।‘ नूर मोहम्मद (1764) में अपनी अवधी को हिंदी कहते हैं। ‘हिन्दू मग पर पांव न राखौं, का जौ बहुतै हिंदी भाखौं।‘ इन नूर मुहम्मद साहब से भी 21 वर्ष पहले गिरिधर राय (1743) ब्रजी के लिए हिंदी शब्द का प्रयोग करते हैं। ‘हिंदी मांहि फकीर के अच्छर लागैं तीन।‘ दक्कन के शेख अहमद लिखते हैं, ‘जबां हिंदी, हिंदवी, मुझसूं होर देहलवी- न जानू अरब होर अजब मसनवीं।‘

आशय यह कि बाहर से आए मुसलमान चाहे जिस भाषा क्षेत्र-तुर्की, अफगानी (पश्तो), फारसी, अरबी आदि- ये आए रहे हों, लेकिन वे यहां के बाजारों, कस्बों व शहरों की भाषा ही यहां इस्तेमाल करते थे। उसमें उनकी अपनी मातृभाषा या क्षेत्र भाषा के शब्द संभवतः मिलते गये होंगे। तो उनके आने से स्थानीय प्राकृत या अपभ्रंश भाषा में विदेशी शब्द भी मिलते गये। इसीलिए इस भाषा को ‘रेख्ता‘ (मिलीजुलीख जैसे आज हिंगलिश दिखायी देती है) भी कहा गया। उत्तर में अपनी सल्तनत कायम करने वाले मुस्लिम शासकों ने जब दक्षिण में हमले किये, तो उनके साथ अरबी-फारसी मिश्रित यह भाषा दक्षिण भी पहुंची। इस देश में निले स्तर पर जनसंपर्क की एक भाषा पहले से विद्यमान थी, जिसे व्यापारी, सैनिक, मजदूर, पर्यटक तथा साधु संत इस्तेमाल करते थे। उपरी स्तर पर व्यवहार के लिए इस्तेमाल होने वाली आम आदमी की भाषा को केवल भाषा ही कहा जाता रहा है। इसमें स्थानीय प्राकृत (स्वाभाविक रूप से विकसित क्षेत्रीय भाषा) के शब्दों के साथ संस्कृत का अपभ््रांश रूप शामिल था। प्राकृत क्षेत्रीय भाषाएं थीं, लेकिन अपभ्रंश और संस्कृत का कोई क्षेत्र विशेष नहीं था, ये राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय रूप से व्याप्त थीं। इनमें खासकर जनभाषा यानी अपभ्रंश में क्षेत्रीय भेद क्षेत्रीय प्राकृत भाषाओं की प्रकृति के अनुरूप ही हुआ है। मुसलमानों के आने से केवल यह हुआ कि इसमें फारसी, तुर्की, पश्तो और अरबी के भी कुछ शब्द मिल गये। मूलतः इसी भाषा को हिंदी या हिंदवी कहा गया है। चूंकि मुस्लिमों का दीर्घकालिक स्थाई शासन उत्तर में ही रहा और उस उत्तरी क्षेत्र का अफगानिस्तान, तुर्किस्तान व फारस से अधिक निकट संपर्क रहा, इसलिए आधुनिक हिंदी का यह नया रूप उत्तर में ज्यादे व्यापकता और गहराई से स्थापित हो सका। लेकिन प्रारंभ में यह भाषा भी हिंदी या हिंदवी ही थी और आम व्यवहार में भारतीय नागरी लिपि में ही लिखी जाती थी। बाहर से आये लोग चूंकि अपनी-अपनी क्षेत्रीय लिपियों में अभ्यस्त थे, इसलिए वे अपने निजी नोट अपनी तुर्की या फारसी लिपि में लिखते थे।

यहां यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों के इस देश में आने के कई सौ साल बाद तक भाषा में कोई मजहबी भेद नहीं पैदा हुआ था। आम बोलचाल और व्यवहार की भाषा बदल रही थी, लेकिन उसकी कोई हिन्दू मुस्लिम पहचान नहीं बन रही थी। लिपि को लेकर भी कोई झगड़ा नहीं था। इस देश में राजकाज की भाषा फारसी बन जाने के बाद भी (जो मुगल बादशाह अकबर के जमाने में हुई) उसकी पहचान मजहब के साथ नहीं जुड़ी। मुसलमान संस्कृत पढ़ते थे, हिन्दू फारसी। केंद्रीय दरबार का कामकाज फारसी में चलता था, लेकिन स्थानीय व्यवहार की भाषा हिंदी या हिंदवी ही थी। टोडर मल संस्कृत के भी पंडित थे, फारसी के भी। खुसरो की बहुभाषी रचनाओं से सभी परिचित हैं। रहीम खन खाना और बीरबल जैसे दरबारी संस्कृत और फारसी दोनों के पंडित थे, लेकिन उनके आम बोलचाल व व्यवहार की भाषा हिंदी थी। वही हिंदी, जो कबीर, रैदास और नानक जैसे संत इस्तेमाल कर रहे थे।

वस्तुतः भाषा पर मजहबी रंग चढ़ना तब शुरू हुआ, जब बादशाह शाहजहां ने दिल्ली का लालकीला बनवाकर तैयार किया (1639 ई.) और उसके आसपास शहजहांनाबाद शहर बसाया तथा राजधानी आगरा से हटाकर शहजहांनाबाद (आधुनिक दिल्ली) के लालकिले में पहुंचाया। अब तक बाहरी इस्लामी मुल्कों के विद्वान, शायरों, मजहबी नेताओं तथा राजनीतिक पंडितों का यहां आना काफी बढ़ गया था। लालकिले की शनदार इमारत बन जाने के बाद मुगल बादशाह शाहजहां की शोहरत और फैली, जिससे और बड़ी संख्या में फारसी अरबी के विद्वान वहां आने लगे। दरबार में एक नयी तरह की नफीस भाषा विकसित होने लगी, जिसमें फारसी से लिये गये। अब इस उच्च स्तरीय दरबारी भाषा को एक नया नाम दिया गया ‘जबाने उर्दूए मुअल्ला‘। इस पर इस्लामी मजहब का गहरा रंग चढ़ा हुआ था। किला जब बना, तो उसके पास बाजार की भी स्थापना होनी थी, सैनिक छावनी भी बननी थी। इस छावनी में अब फारसी व तुर्क सैनिकों की संख्या अधिक थी। उर्दू (ओर्डू) का शब्दार्थ होता है किला, अड्डा या शिविर। यह अंग्रेजी के ‘होर्ड‘ शब्द जैसा है। इस किले को उर्दू संज्ञा मिलने के बाद उसके पास के बाजार का नाम भी उर्दू बाजार पड़ गया। तो यह उर्दू किले के भीतर के सभ्य व कुलीन मुसलमानों की भाषा बनी।

यहां यह ध्यान देने की बात है कि भारत में आने के बासद यहां की भाषा को ‘हिंदी‘ नाम इन मुस्लिम हमलावरों द्वारा ही दिया गया था, लेकिन अब यह ‘हिंद‘ यानी इस देश की भाषा बन गयी थी और यहां के मूल निवासियों को हिंदी की संज्ञा मिल गयी थी। इसलिए दरबार के कुलीन मुस्लिम वर्ग को अपनी एक अलग पहचान वाली भाषा चाहिए थी। इन नये दरबारियों को यहां की भाषा पिछड़ी और कविता फूहड़ लगती थी, लेकिन उनकी आंख तब खुली की खुली रह गयी, जब दखिन के हिंदवी के शायर वली मुहम्मद (1667-1707) वर्ष 1700 में दिल्ली पहुंचे। उनकी शायरी के आगे ‘उर्दुए मुअल्ला‘ के शायर फीके लगे। उनकी ‘रेख्ता‘ व ‘हिंदवी‘ की कविता फारसी के विद्वानों को चमत्कृत करने वाली थी। उन्होंने वली को उर्दू ए मुअल्ला‘ में रचनाएं करने को कहा। वली साहब मान गये और वह उर्दू गजल के ‘बाबा आदम‘ का खिताब पाने के हकदार बन गये। इस लालकिले के दरबार से ही ‘उर्दू‘ (जबाने उर्दू ए मुअल्ला का संक्षिप्त रूप) ने अपना नया भाषाई और मजहबी रंग रूप अख्तियार करना शुरू किया। उसने पर्सियन लिपि की नश्तालिक लिखावट शैली (घसीट वाली)अख्तियार की। दक्षिण एशियायी जरूरी के अनुसार उसमें कुछ अक्षर (हर्फ) बढ़ाये गये और इस रूप में उसे हिंदी या हिंदवी से एक अलग पहचान दिलाने की कोशिश शुरू हुई। अभी तक हिंदी या हिंदवी की एक और लिपि नहीं तय थी। वह पर्सियन व तुर्की लिपि में भी लिखी जाती थी, नागरी में भी और अन्य भारतीय लिपियों में लिखी जाती थी। लेकिन अब उर्दू का नश्तालिक फारसी शैली में लिखना अनिवार्य हो गया। उर्दू का छंद विधान व वूर्य विषय भी फारसी शैली का हो गया। उर्दू के शायर अपना तखल्लुस (उपनाम या पेन नेम) रखने लगे, जो फारसी की परंपरा थी। इन्होंने अपनी उर्दू में फारसी, अरबी व तुर्की के शब्दों को बढ़ा दिया। संस्कृत के अपभं्रश शब्दों को भी लेने से परहेज किया जाने लगा।

भाषा के इस मजहबीकरण की प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी। अब हिन्दू के नाम से अभिहित भारतीयों ने अपनी अलग भाषाई पहचान के लिए ‘हिन्दू‘ शब्द से जुड़ी इस ‘हिंदी‘ को अपनी भाषा के रूप में विकसित करना शुरू किया। अब यहां दिक्कत यह पैदा हुई कि इस वर्ग का संस्कृत से नाता बहुत पहले ही टूट चुका था। वह केवल धार्मिक कर्मकांड तथा ऐतिहासिक साहित्य के अध्ययन अध्यापन तक सीमित रह गयी थी। मुस्लिमकाल में जो मिलीजुली भाषा विकसित हुइ्र और उसमें जो लौकिक साहित्य रचा गया, वह ज्यादातर फारसी लिपि में था, जो मुस्लिमों द्वारा लिखा गया था। अब भाषा के मुस्लिम मजहबीकरण की प्रतिक्रिया में जो भाषाई जागरूकता आयी, वह भला मुस्लिम रचनाकारों की रचनाओं को क्यों अपने साथ जोड़ती। उन्होंने केवल उन्हीं मुस्लिम रचनाकारों को अपने इतिहास में जोड़ा, जिन्होंने नागरीलिपि में लिखा या यहां के भक्ति आंदोलन से प्रभावित थे अथवा भारतीय इतिहास के हिन्दू कथानकों को अपना वूर्य विषय बनाया। इन्होंने उर्दू की प्रतिक्रिया में अपनी हिंदी में संस्कृत के शब्दों को अधिक संख्या में शामिल करना शुरू कर दिया। भाषा के इस मजहबी विभाजन को अंग्रेजी सत्ता ने आकर और पुष्ट किया, क्योंकि इसमें उसका दीर्घकालिक राजनीतिक हित था। (जारी)

4/09/2011

शनिवार, 7 नवंबर 2009

हिंदी पत्रकारिता के एक प्रतीक पुरुष का अवसान

प्रभाष जोशी आज की हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में नैतिकता, आदर्श तथा प्रतिबद्धता के एक प्रतीक पुरुष थे। स्वभाव से गांधीवादी लेकिन चिंतन से समाजवादी जोशी जी ने हिंदी पत्रकारिता को एक नई भाषा, एक नई शैली और एक नया तेवर देने के साथ एक नया सामाजिक आयाम भी दिया था। उनकी नैतिकता के प्रति निष्ठा व सच्चाई के प्रति दृढ़ता आज की पत्रकारिता में अत्यंत दुर्लभ है। उन्होंने पत्रकारिता केसर्वश्रेष्ठ मूल्यों को जीने की कोशिश की, उनके साथ कभी कोई समझौता नहीं किया।पत्रकारिता के साथ-साथ उनकी खेलों तथा शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि थी। क्रिकेट के साथ तो उन्हें जुनून के स्तर तक लगाव था। वह भीतर से एक अत्यंत जुनूनी खिलाड़ी थे। उन्होंने स्वयं कभी कोई खेल खेला या नहीं यह नहीं पता, लेकिन वह खेल शास्त्र के पंडित थे। खेलों का विश्लेषण वह किसी राजनीतिक विश्लेषण से कम गंभीरता से नहीं करते थे। इसी तरह शास्त्रीय संगीत के भी वह असाधारण प्रेमी थे। यात्राओं के दौरान प्राय: हर समय उनका टेप रिकार्डर साथ रहता था और साथ में रहते थे उनके प्रिय गायकों के कैसेट।प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व की एक असाधारण बात यह भी थी कि वह एक अद्ïभुत श्रोता थे। अपनी ओर से अधिक बोलना उनकी आदत में कभी नहीं था। वे किसी की भी पूरी बात ध्यान से सुनते थे और फिर जरूरी होने पर ही अपनी राय देते थे। उनका यह गुण उनकी पत्रकारिता में भी मुखर था। उन्होंने अपने स्तर पर पाठकों को अपने अखबार से जोडऩे की जितनी और जैसी कोशिश की वैसी शायद ही किसी ने कभी की हो। 1983 में उन्होंने जब जनसत्ता शुरू किया, तो उसका शायद सर्वाधिक लोकप्रिय स्तम्भ चौपाल था, जो पाठकों के पत्र का कॉलम था। शुरू में इन पत्रों का चयन व संपादन वे स्वयं करते थे।प्रभाष जी किसी राजनीतिक दल की तरफ कभी नहीं द्ब्राुके। भारतीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा के कारण प्राय: उन्हें लोग दक्षिणपंथी करार दिया करते थे, लेकिन वह इन भावनाओं की राजनीति करने वालों के साथ कभी नहीं रहे। उनकी विशिष्टता थी जीवन के प्रति एक समग्र दृष्टि। जनसत्ता में नियमित प्रकाशित होने वाला उनका साप्ताहिक स्तम्भ 'कागदकारे इसका प्रमाण रहा है। मुद्दा राजनीति का हो या समाज का, उनसे असहमत रहने वालों की कभी कमी नहीं रही, लेकिन कभी किसी ने उनकी समाज निष्ठïा या राजनीतिक ईमानदारी पर उंगली नहीं उठाई। जनसत्ता से संपादक के रूप में सेवा मुक्त होने के बाद भी वे अंत तक उसके सलाहकार संपादक बने रहे और उनका 'कागदकारेस्तम्भ प्रकाशित होता रहा, लेकिन 1995 में सेवानिवृत्ति केबाद उनके पत्रकार जीवन में एक नया आयाम जुड़ा टीवी विश्लेषक का। टीवी चैनलों पर राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक के तौर पर उन्होंने एक अलग ही पहचान बनायी। बिना किसी लाग लपेट के दो टूक टिप्पणी का उनमें साहस भी था और कौशल भी।उनका निधन भी एक अजीब क्षण में हुआ। ऐसा लगता है कि क्रिकेट का असाधारण 'पैशन ही उनकी जान का गाहक बन गया। भारत-आस्ट्रेलिया का हैदराबाद में हो रहा मैच अभी खत्म ही हुआ था कि उन्हें सीने में कुछ दर्द सा उठता महसूस हुआ और जब तक अस्पताल पहुंचते, कालचक्र ने उन्हें अपने आगोश में ले लिया था। जोशी जी अब नहीं है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता शायद अपने इस अत्यंत मनस्वी व्यक्तित्व को कभी भुला नहीं सकेगी।

बुधवार, 4 नवंबर 2009

राजनीतिक लाभ के लिए हिंदी का विरोध

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने अब राज्य विधानसभा पर भी मराठी का डंडा घुमाना शुरू कर दिया है। उन्होंने सभी नवनिर्वाचित विधायकों को धमकी दी है कि यदि उन्होंने मराठी के अलावा और किसी भाषा में सदन की सदस्यता की शपथ ली तो फिर देख लेंगे कि सदन में उपस्थित उनके 13 विधायक क्या करते हैं। उनका कहना है कि सदन में केवल मराठी भाषा का व्यवहार होना चाहिए।राज्य विधानसभा में राज्य की भाषा का व्यवहार हो, इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन औपचारिक शपथ ग्रहण तक में इसकी बाध्यता को तो कतई लोकतांत्रिक करार नहीं दिया जा सकता। राज ने सदन में हिंदी तक के प्रयोग का निषेध किया है। उन्होंने हिंदी का विशेष तौर पर उल्लेख करते हुए उपर्युक्त चेतावनी दी है। हिंदी इस देश की राष्टï्रभाषा एवं राजभाषा है। किसी भी विधानसभा या केंद्र शासित प्रदेश में उसके प्रयोग का निषेध नहीं किया जा सकता। लोग स्वेच्छया मराठी का इस्तेमाल करें, यह अच्छी बात है, किन्तु किसी को बलपूर्वक हिंदी के प्रयोग से रोकना न केवल अलोकतांत्रिक, बल्कि एक तरह का राष्टï्र विरोधी कार्य है।इसे इस देश के संविधान व राजनीतिक प्रणाली की दुर्बलता ही कहा जाएगा कि ऐसे लोगों और उनके संगठनों को राजनीतिक मान्यता मिल जाती है और वे देश की विधायिकाओं में भी पहुंच जाते हैं, जिनका लोकतंत्र की सामान्य मर्यादाओं में भी कोई विश््वास नहीं है। अभी तक जम्मू-कश्मीर ही एक ऐसा राज्य था, जहां कोई विधायक स्वेच्छया हिंदी का इस्तेमाल नहीं कर सकता और यदि वह हिंदी में बोलना चाहता है, तो उसे इसके लिए स्पीकर से पूर्वानुमति लेनी पड़ती है, लेकिन अब महाराष्टï्र भी ऐसा राज्य बन जाएगा, जिसकी विधानसभा में दादागिरी के बल पर हिंदी का निषेध रहेगा।यहां यह उल्लेखनीय है कि महाराष्टï्र में यों भी सदन के भीतर मराठी का ही बोलबाला रहता है। बहुत कम लोग हिंदी और उससे भी कम लोग अंग्रेजी बोलते हैं, लेकिन राज ने यह धमकी देकर केवल यह जाहिर करने की कोशिश की है कि वह मराठी के एकमात्र अलम्बरदार हैं, बाकी सब मराठी विरोधी। वह अपने चाचा बाल ठाकरे के मराठावाद से भी आगे निकलना चाहते हैं। पिछले दिनों उन्होंने मराठावाद का जो हिंसक प्रदर्शन किया, उसका उन्हें चुनावों में जो शानदार प्रतिशाद मिला, उससे वह अब और अधिक उत्साहित हैं। ऐसा न होता, तो वह खुलेआम एक प्रेस कांफें्रस करके राज्य के 275 विधायकों को यह धमकी देने का साहस नहीं कर सकते थे।देश में यदि भाषा आधारित क्षेत्रीयताओं के आधार पर राज्यों का गठन किया गया है, तो वहां क्षेत्रीय राजनीति का उभरना या क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का पैदा होना स्वाभाविक है। बाल ठाकरे ने इस क्षेत्रीयता की भावना को भुनाकर ही अपना राजनीतिक आधार बनाया। लेकिन आज की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर किसी क्षेत्रीय दल को राष्टï्र विरोधी गतिविधियों की अनुमति तो नहीं दी जा सकती। क्या राज्य की कांग्रेस पार्टी इसका कोई प्रतिकार करेगी।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

हिंदी केवल एक भाषा नहीं, भारतीयता की अभिव्यक्ति है



हिंदी केवल एक भाषा नहीं, भारतीयता की अभिव्यक्ति है
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--डॉ. राधेश्याम शुक्ल, सम्पादक -स्वतंत्र वार्ता


केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने सभी राज्य शिक्षा परिषदों [स्टेट एजुकेशन बोर्ड्स] से कहा है कि वे सभी स्कूलों में हिन्दी पढ़ाने की व्यवस्था करें, जिससे कि यह भाषा देश की एक आम फ़हम भाषा [लिंग्वा फ़्रैंका] बन जाए। उनका कहना था कि स्कूलों में हिंदी शिक्षण पर जोर देना चाहिए, जिससे पूरे देश के बच्चे आपस में घुल-मिल सकें और बड़े होने पर उनमें बेहत्तर एकता स्थापित हो। मातृभाषा का ज्ञान जहाँ सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ती है, वहीं हिन्दी राष्ट्रीय एकता का माध्यम है और अंग्रेज़ी से दुनिया के अन्य देशों से जुड़ सकते हैं।



उनके सुझाव थे कि अभी देश में प्रचलित करीब ४१ शिक्षा बोर्डों को समाप्त कर क्षेत्रीय आधार पर केवल चार बोर्ड [उत्तर, दक्षिण, पूर्व व पश्चिम] का गठन किया जाय, विज्ञान तथा गणित की शिक्षा में पूरे देश में एकरूपता लाई जाए, हाईस्कूल की परीक्षा वैकल्पिक कर दी जाए तथा विश्वविद्यालय के डिग्री स्तर में प्रवेश के लिए पूरे देश में केवल एक परीक्षा की व्यवस्था की जाए। इनमें उनका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण वक्तव्य हिंदी भाषा को लेकर था।



उनके स्तर पर यह कहा जाना निश्चित ही बहुत महत्त्वपुर्ण है कि यदि हिंदी देश की 'लिंग्वा फ़्रैंका' बन जाए, तो भारत दुनिया के लिए ज्ञान प्रदाता बन सकता है। आज अंग्रेज़ी पर निर्भरता ही इस बात का सबसे बड़ा कारण है कि मौलिक ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भारत पिछड़ा हुआ है और शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया के अन्य देशों, विशेषकर अंग्रेज़ी वालों की मुखापेक्षी है।



भारत कभी 'जगद्‌गुरु' [पूरी दुनिया के लिए ज्ञान का प्रदाता] माना जाता था, तो इसीलिए कि भारत की भाषा संस्कृत न केवल इस देश के पढे़-लिखे लोगों की लिंग्वा फ़्रैंका थी, बल्कि उसे अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा का भी सम्मान प्राप्त था। दक्षिण पूर्व एशिया के देशों कंबोड़िया, लाओस, वियतनाम, इंडोनेशिया [हिंदेशिया], मलेशिया [मलय], थाइलैंड [श्याम], बर्मा [म्यांमार], श्रीलंका [सिंहल] आदि से लेकर पश्चिम एशिया, तिब्बत व हिमालय से लगे तमाम मध्येशियायी क्षेत्रों तक संस्कृत का प्रसार था। इन प्रायः सारे क्षेत्रों तक संस्कृत के प्राचीन अभिलेख पाए जाते हैं। चीन व अरब देश के विद्वान भी शिक्षा प्राप्ति के लिए भारत आते थे और संस्कृत सीखकर तमाम नया ज्ञान अर्जित करते थे। उस समय संस्कृत केवल धर्म दर्शन के अध्ययन का माध्यम नहीं थी, बल्कि ज्ञान-विज्ञान जैसे चिकित्सा, अर्थशास्त्र, मौसम विज्ञान, गणित, भूगोल, रसायन शास्त्र, ज्योतिष, यंत्रविज्ञान आदि का भी माध्यम थी। हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र तक का भारत देश भले कभी एक राजनीतिक तंत्र में न रहा हो, लेकिन भाषा व संस्कृति की दृष्टि से यह प्रायः सदैव एक देश रहा है। भाषा, शिक्षा और संस्कृति को लेकर पूरे उपमहाद्वीप में कभी कोई विवाद नहीं रहा, जब तक कि अंग्रेज़ों के साथ विदेशी शिक्षा पद्धति यहाँ नहीं आई।



ज्ञान-विज्ञान के शिक्षण की भारतीय परम्परा बहुत पहले टूट चुकी थी। तकनीकी ज्ञान - गणित, ज्योतिष, रसायन, यंत्रविज्ञान, धातुविज्ञान, रत्नविज्ञान, रंगाई, बुनाई, चित्रकला, शस्त्र निर्माण, वास्तुकला, मूर्तिकला, समुद्र विज्ञान, जहाज़ निर्माण, नगर निर्माण, काष्ठकला, खनन, औषधि विज्ञान आदि के अध्ययन अध्यापन की विधिवत श्रृंखला समाप्त हो चुकी थी। तक्षशिला, विक्रमशिला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय भी समाप्त हो चुके थे, जहाँ इनकी शिक्षा भी प्राप्त होती थी। मुस्लिम आक्रांताओं का सबसे बडा़ कहर इन शिक्षा केंद्रों पर ही टूटा था। इनके टूटने के बाद उपर्युक्त ज्ञान विज्ञान केवल वंश परम्पराओं में सीमित हो गए। पिता-पुत्र परम्परा ही उपर्युक्त तकनीकी शिक्षा का माध्यम रह गया था। संस्कृत के जो स्कूल, विद्यालय या महाविद्यालय थे, वे कुछ विशिष्ट आचार्यों, मंदिरों तथा धार्मिक समुदायों से जुडे़ हुए थे और वहाँ अध्ययन के विषय केवल वेद, वेदांत, संस्कृत भाषा, साहित्य, व्याकरण, दर्शन, इतिहास, पुराण, ज्योतिष व कर्मकाण्ड तक सीमित हो गए थे। इनमें भी रूढि़ग्रस्तता इतनी बढ़ गई थी कि वे कुछ भी नया स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।



अंग्रेज़ों का राजनीतिक आधिपत्य कायम होने के पहले यहां राजकाज में उर्दू व फ़ारसी की स्थापना हो चुकी थी, इसलिए राजनीति, व्यापार, प्रशासन, शिक्षा आदि में नौकरियों के अवसर केवल उर्दू, फ़ारसी व अंग्रेज़ी में उपलब्ध थे। इसीलिए महत्वाकांक्षी व मेधावी लोगों का रुझान भी इन्हीं भाषाओं व आधुनिक यूरोपीय शिक्षा की तरफ़ था। केवल परम्परानिष्ठ ब्राह्मण परिवार ही वेद, शास्त्र, व्याकरण, दर्शन आदि के लिए संस्कृत पढ़ते थे। मैकाले ने स्वयं लिखा है कि संस्कृत पढ़ने वाले सामान्य लोग इससे परेशान थे कि इसे पढ़कर उन्हें कोई नौकरी नहीं मिल सकती। इस तरह उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी नौकरियों की भाषा बन गई थी, इसलिए शिक्षा का माध्यम भी यही भाषाएं बन गईं। इस प्रकार, केवल मध्यवर्ग का एक छोटा सा तबका, जो संस्कृत भाषा तथा पारम्पारिक भारतीय वांग्मय के सम्पर्क में था, भारत की उच्च परम्परा श्रेष्ठ भाषा ज्ञान, अध्यात्म तथा दर्शन की गौरवगाथा के अध्ययन में लगा रहा। परम्परा के प्रति उसका उत्कट मोह भारतीयता की समृद्ध परम्परा को जीवित रखने में सहायक बना। उसने संस्कृत वांग्मय् के श्रेष्ठ साहित्य को क्षेत्रीय भाषाओं में अनूदित करने या उनके आधार पर नये ग्रंथ लिखने का प्रयास किया। इससे क्षेत्रीय भाषाओं का उत्थान हुआ, उनमें सहित्य सृजन की चेतना जगी।



अंग्रेज़ी शिक्षित स्वतंत्रचेता भारतीयों ने उस माध्यम की तलाश शुरू की, जो पूरे देश में एकता का भाव, संस्कृति का गौरव और मुक्ति की चेतना भर सके। यह काम न अंग्रेज़ी से सम्भव था और न फ़ारसी से। उर्दू इस देश में ही पैदा हुई भाषा थी, लेकिन उसने अपना अलग रास्ता पकड़ लिया था। वह इस देश में पैदा तो हुई, लेकिन उसने इस देश से कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक सम्बन्ध नहीं रखा। उसके लिए यह देश एक जागीर से अधिक नहीं था। उसने लिपि भी विदेशी अपनायी और भाव तथा सांस्कृतिक प्रतीकों को भी बाहर से लिया। इसलिए देश के कोने-कोने से सभी राष्ट्रचेता विद्वानों ने संस्कृत के अपभ्रंश तथा देशी भाषाओं के मेलजोल से बनी देश के आम आदमी की संपर्क भाषा को एक राष्ट्रभाषा के रूप में ऊपर उठाने व विकसित करने का बीड़ा उठाया और उसे ही देश के राजकाज की भाषा बनाने का संकल्प लिया। उन दिनों इस भाषा को मध्य एशिया, तुर्की व फ़ारस से आए मुसलमानों ने हिन्दी, हिन्दवी या हिन्दुस्तानी नाम दे रखा था। भारत में इसे 'भाषा' के नाम से ही जाना जाता था। विद्वानों व पढे़ लिखे लोगों की देश भर में अपनी संपर्क भाषा संस्कृत थी, तो उसके समानान्तर पूरे देश में आम लोगों, सैनिकों, व्यापारियों, पर्यटकों, मज़दूरों, कारिगरों, नटनर्तकों, साधुओं, तीर्थयात्रियों आदि के परस्पर संपर्क की भाषा यही हिंदी थी। यह हिंदी किसी क्षेत्र विशेष की भाषा नहीं थी। यह पूरे देश की भाषा थी और देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने वालों द्वारा व्यहृत होती थी। मध्यकालीन संत या भक्त कवियों की जिस भाषा को 'सधुक्कड़ी' कहा गया है, वही वास्तव में हिंदी थी। इसमें उत्तर भारत की राजस्थानी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी व मैथिली से लेकर दक्षिण के मराठी, तेलुगु, कन्नड़ व तमिल तक के शब्द पाए जाते हैं। इसलिए देश के जागरूक राजनेताओं, विद्वानों तथा राष्ट्रभक्तों ने इस संस्कृतोन्मुख भारतीय जन संपर्क भाषा को देश की राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प लिया।



जब देश एक राजनीतिक इकाई नहीं था, तब इसकी सांस्कृतिक एकता व राष्ट्रीयता बरकरार थी, क्योंकि देश एक भाषा व एक संस्कृति से बंधा था, लेकिन आज राजनीतिक एकीकरण के बावजूद देश, भाषा व संस्कृति के वैविध्य में बिखरता जा रहा है। देश की एक अपनी सम्पर्क भाषा के अभाव में वे संवादहीनता की स्थिति में है, जिसके कारण उनमें क्षेत्रीय संकीर्णता पनप रही है। वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि देश की एक जनभाषा को राष्ट्रभाषा व राजभाषा के रूप में स्वीकृति एवं व्याप्ति से देश की एकता व अखंडता कितनी दृढ़ होगी व उसकी विकासगति कितनी तेज़ हो सकेगी।

सवाल केवल मुद्दे को सही परिप्रेक्ष्य में सोंचने और अपनी सोच को बदलने का है।

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स्वतंत्रवार्ता के `साप्ताहिकी 'से साभार उद्धृत सारसंक्षेप

प्रस्तुतकर्ता cmpershad पर 11:14 am
लेबल: आलेख
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7 टिप्पणियाँ:
============================== hey prabhu yeh tera path ने कहा…
आप द्वारा प्रस्तुत हिन्दी दिवस पर विचार थोडे लम्बे थे पर सटीकता के साथ उचीत लगे- बधाई।
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मै यह नही कहता हू कि हिन्दी कि स्थिति सुधरी नही है। भाषा के प्रति लोगो कि जागरुकता बडी है। हिन्दी हमारी पहचान है। मै एक ऐसे भारत की कल्पना नही करता हू, जहॉ हिन्दी सारे देश मे समान रुप बोली जाऍ, लिखी जाऍ। मगर ऍसे देश की कल्पना जरुर करता हू जहॉ हिन्दी के प्रति हीनभावना खत्म हो जाऍ। (हे प्रभू यह तेरापन्थी)
आप को हिदी दिवस पर हार्दीक शुभकामनाऍ।

पहेली - 7 का हल, श्री रतन सिंहजी शेखावतजी का परिचय

हॉ मै हिदी हू भारत माता की बिन्दी हू

हिंदी दिवस है मै दकियानूसी वाली बात नहीं करुगा

September 14, 2009 12:04 PM
====================================== udan tashtari ने कहा…
विचारणीय आलेख है.

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.

कृप्या अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य का एक नया हिन्दी चिट्ठा शुरू करवा कर इस दिवस विशेष पर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का संकल्प लिजिये.

September 14, 2009 4:07 PM
=============================== संगीता पुरी ने कहा…
आपने हिन्‍दी से जुडे महत्‍वपूर्ण विंदुओं पर सुंदर विश्‍लेषण किया .. ब्‍लाग जगत में कल से ही हिन्‍दी के प्रति सबो की जागरूकता को देखकर अच्‍छा लग रहा है .. हिन्‍दी दिवस की बधाई और शुभकामनाएं !!

September 14, 2009 5:10 PM
======================================== संजय तिवारी 'संजू' ने कहा…
आपका हिन्दी में लिखने का प्रयास आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण है. आपके इस प्रयास के लिए आप साधुवाद के हकदार हैं.

आपको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.

September 14, 2009 6:52 PM
============================================== sacchai ने कहा…
" aapko hindi divas ki subhkamnaye , bahut hi sahi farmaya hai aapne aapke lekh me ...sunder vishleshan humne aaj dekha aur padh bhi is liye hum aapke sadaiv aabhari rahenge "

----- eksacchai { aawaz }

http://eksacchai.blogspot.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

September 15, 2009 11:50 AM
===================================== शरद कोकास ने कहा…
विस्तार से यहाँ हिन्दी की महिमा जानने का अवसर प्राप्त हुआ । धन्यवाद ।

September 15, 2009 2:50 PM
================================================== ज्ञानदत्त पाण्डेय | gyandutt pandey ने कहा…
पता नहीं, विश्व की अन्य भाषायें भी अंग्रेजी से इतनी आतंकित हैं? पता नहीं अन्य जगहों पर भी राष्ट्र और संस्कृति की पहचान मर रही है?

September 16, 2009 7:49 AM