बुधवार, 26 जून 2013

वर्ष का श्रेष्ठतम मास - कार्तिक
 
भारतीय वर्ष गणना (संवत्सर) का आठवॉं महीना ‘कार्तिक’ वर्ष का सर्वाधिक पवित्र तथा महत्वपूर्ण महीना माना गया है| यह चातुर्मास की समाप्ति तथा नए सक्रिय आर्थिक वर्ष के प्रारंभ का महीना तो है ही, साथ ही यह उपासना, उत्सव तथा आध्यात्मिक साधना का भी महीना है| यह लौकिक तथा पारलौकिक दोनों दृष्टियों से वर्ष का सबसे अनूठा महीना माना जाता है|
प्राचीन विश्‍वासों के अनुसाार यह सब पापों से मुक्ति दिलाने वाला महीना है| भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि महीनों में कार्तिक मास मैं स्वयं हूँ, यानी भगवान कृष्ण ने भी इसकी श्रेष्ठता पर मुहर लगाई| वैष्णव एवं शैव दोनों ही धर्मोपासना विधियों ने इसके महत्व को स्वीकार किया है, विष्णु को यह मास इतना प्रिय है कि इस अवधि में अल्प उपासना करने वालों को भी वह सारे सांसारिक सुख एवं मोक्ष प्रदान करते हैें|
कार्तिक के महीने में दीपदान का विशेष महत्व है| दीप प्रकाश का स्रोत तथा ज्ञान का प्रतीक है| इसलिए जहॉं सामान्यजन प्रतीकात्मक रूप से दीपदान करते हैं, वहीं विद्वत्जन इस महीने में ज्ञान वितरण का कार्य करते हैं| अभी भी अयोध्या, प्रयाग तथा काशी जैसे तीर्थस्थलों में कल्पवास (तीर्थस्थल पर एक महीने का निवास, पवित्र नदियों में स्नान तथा इतिहास, पुराण एवं धर्मशास्त्रों आदि का अध्ययन, श्रवण करते हुए समय बिताना) करते हैं, तो विद्वत्जन ऐसे समय में वहॉं पहुँचकर अपनी ज्ञान संपदा का वितरण करते हैं|
इस महीने में दान का विशेष महत्व है, लेकिन सभी दानों में ‘दीपदान’ एवं ‘ज्ञानदान’ का विशेष महत्व है| लोग इस महीने के पूरे तीसों दिन तुलसी के बिरवे के निकट दीप जलाते हैं, नदियों-सरोवरों में दीप प्रवाह करते हैं, आकाश दीप जलाते हैं तथा घर के उन कोनों में भी प्रकाश करते हैं, जहॉं प्रायः अंधेरा रहता है|
पद्म पुराण में वर्णित ‘कार्तिक’ माहात्म्य के अनुसार भगवान विष्णु का पहला अवतार यानी ङ्गमत्स्यावतारफ इसी काल में हुआ था| कथा है कि शंख नामक असुर (शंखासुर) ने वेदों का अपहरण करके सागर तल में छिपा दिया था| भगवान विष्णु ने वेदों का (ज्ञान का) उद्धार करने के लिए मत्स्यावतार धारण किया और शंखासुर का वध करके वेदों को मुक्त कराया| पुराण के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार ग्रहण किया था| इसलिए इस एकादशी को ‘हरिबोधिनी एकादशी’ भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन उन्होंने वेदों का उद्धार करके बोध यानी ज्ञान की पुनर्स्थापना की थी| कार्तिक मास में दामोदर विष्णु की प्रधानता के कारण इसे दामोदर मास भी कहते हैं|
इस महीने के अंतिम पॉंच दिन सर्वाधिक  महत्वपूर्ण माने जाते हैं| इन्हें ‘भीष्म पंचक’ या ‘विष्णु पंचक’ के नाम से भी जाना जाता है| वैष्णव भक्तों का विश्‍वास है कि इन पॉंच दिनों के व्रत, उपवास, जप उपासना से पूरे महीने की उपासना का फल प्राप्त हो जाता है| चैतन्य महाप्रभु के अनुसार कार्तिक सर्वाधिक पवित्र मास है और इसके शुक्ल पक्ष की एकादशी सर्वाधिक महत्वपूर्ण तिथि, यह तो सभी जानते हैं किंतु इस मास के अंतिम पॉँच दिनों का अपार महत्व कम लोग जानते हैं| कुुरुवंशी पितामह भीष्म ने शरशय्या पर पड़े हुए अपनी मृत्यु की तैयारी के पूर्व इन्हीं पॉंच दिनों में पांडवों को राजनीति, समाजविज्ञान एवं अध्यात्म का उपदेश दिया था और कार्तिक मास के ज्ञानदान महोत्सव को पूर्णता प्रदान की थी|
इस वर्ष २०१२ में कार्तिक मास का प्रारंभ ३० अक्टूबर से हुआ और २८ नवंबर को यह समाप्त हो रहा है| महीने की शुरुआत में करवाचौथ का महत्वपूर्ण व्रत पड़ता है| उसके बाद अहोई अष्टमी आती है| करवाचौथ जहॉं पति की दीर्घायु कामना का व्रत है, वहॉं अहोई अष्टमी संतति रक्षा तथा उनके कल्याण के लिए है| इसके बाद दीपावली का पंचदिवसीय उत्सव आता है, जो धनतेरस से लेकर भैयादूज तक चलता है| इसके बाद सूर्योपासना का पर्व छठ पूजा, आमला की नवमी (इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा की जाती है| अयोध्या में इस दिन इस तीर्थ नगर की चौदह कोसी - करीब ४२ कि.मी. की - परिक्रमा होती है, जिसमें लाखों लोग शामिल होते हैं), प्रबोधिनी एकादशी, भीष्म पंचक एवं तुलसी विवाहोत्सव का पर्व आता है और अंत होता है पूर्णिमा के स्नान से| पूर्णिमा वेदव्यास की पूजा का दिन है, जो संपूर्ण पारंपरिक भारतीय ज्ञान के प्रतीक हैं| इस दिन संत गुरु नानकदेव की जयंती भी मनाई जाती है| और इसके साथ ज्ञान, ध्यान, प्रकाश, ऐश्‍वर्य, स्वास्थ्य, जप, तप एवं आराधना-उपासना का माह कार्तिक समाप्त होता है|