शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

अभिव्यक्ति की आजादी और कश्मीरी आंदोलन का यथार्थ



अभिव्यक्ति की आजादी के आंदोलन की शुरुआत सामंती तानाशाही एवं मजहबी वर्चस्व का जाल तोड़ने के लिए हुई थी। किंतु कश्मीर का यह आंदोलन उलटी दिशा में जाने वाला आंदोलन है। यह लोकतांत्रिक आजादी से फिर मजहबी तानाशाही की तरफ ले जाने का अभियान है। यह केवल राजनीति का नहीं, मजहबी राजनीति का आंदोलन है। देश और दुनिया के मानवतावादी व लोकतांत्रिक स्वतंत्रतावादी शक्तियों को कश्मीर के इस यथार्थ को अच्छी तरह समझना चाहिए। वर्तमान आंदोलन कोई नया आंदोलन नहीं है, वह 1940 के दशक में छिड़े अलगाववादी हिंसक आंदोलन का ही एक अंग है, जो देश के विभाजन के बाद भी अभी तक पूरा नहीं हुआ है। अफसोस है कि आज के कई ख्यातिलब्ध बुद्धिजीवी, लेखक-लेखिकाएं अपने संकीर्ण स्वार्थवश ऐसे प्रतिगामी आंदोलनों का साथ दे रहे हैं और भारत पर उपनिवेशवादी होने का आरोप लगा रहे हैं।



जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री, नेशनल कांफ्रेंस के नेता व वर्तमान समय में केंद्रीय गैर पारंपरिक उर्जा मंत्री फारुख अब्दुल्ला यों तो कश्मीर के उसी राजनीतिक परिवार के सदस्य हैं, जिसने कश्मीर के भारत के साथ पूर्ण एकीकरण में सदैव बाधा डाली, फिर भी उन्होंने कश्मीर के बारे में उल-जलूल बयान देने वालों पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और कहा है कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के नाम पर इस देश में लोगों को कुछ ज्यादा ही आजादी (टू मच फ्रीडम) मिली हुई, जिसे इस राष्ट्र् को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को आधुनिक लोकतंत्र के प्रमुख आधारों में गिना जाता है, लेकिन अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का अर्थ कुछ भी बोलने-लिखने-करने की स्वतंत्रता नहीं है।

लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की भी एक मर्यादा सीमा होती है। दुनिया के किसी भी देश में अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता -एब्सोल्यूड फ्रीडम- नहीं है। अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता तो किसी असभ्य आदिम समुदाय में ही हो सकती है, जब अभी परिवार और समाज की अवधारणा भी नहीं बन सकी थी, क्योंकि परिवार व समाज की अवधारणा बनते ही व्यक्ति के सामाजिक आचरण व अभिव्यक्ति की सीमाएं खड़ी हो गयी होंगी। सभ्यता एवं राजनीति के विकास तथा राष्ट्र्ीयता की अवधारणाओं ने इस सीमा को क्रमशः दृढ़तर करने का ही काम किया। आज दुनिया के किसी भी देश में अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है। निश्चय ही लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का अधिकार सीमित होता है, अब यदि स्वतंत्रता की अवधारणा ही सीमाओं में बंधी है, तो अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का अधिकार भी सीमित ही रहेगा।

अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के अधिकार व सीमाओं को समझने के लिए हमें यह समझना  पड़ेगा कि किन परिस्थितियों  में इनकी आवश्यकता अनुभव हुई तथा इनका उद्देश्य क्या था। पश्चिम में इसकी अवधारणा राजशाही या सामंती शासन व्यवस्था तथा चर्च के असीमित वर्चस्व के विरुद्ध उत्पन्न हुई। राजशाही में राजा के खिलाफ तंत्र आवाज उठाना, उसकी या उसके शासन तंत्र की आलोचना करना अपराध था। इसी तरह चर्च के निर्देर्शों के विरुद्ध जबान खोलना भी अपराध था, इसलिए पश्चिमी दुनिया में जब लोकतंत्र की हवा चली, तो उसके साथ अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के आंदोलन की लहर भी सामने आयी। इसका मूल लक्ष्य था कि किसी भी नागरिक को राजा व चर्च के आचरण, उसके सिद्धांतों, निर्देशों तथा शासनशैली की आलोचना करने तथा उसके प्रति अपने विचारों व सिद्धांतों को सामने रखने का अधिकार हो। मिल्टन का कहना था कि ‘हमें अन्य दूसरी सारी आजादियों के उपर अपनी अंतरात्मा या अपनी इच्छा के अनुसार जानने, बोलने तथा स्वतंत्रतापूर्वक तर्क करने का अधिकार दो।’ (गिव मी लिबर्टी टु नो, टु अटर एंड टु आर्गू फ्रीली एकार्डिंग टफ कंसाइंस एबव आॅल लिबर्टीज)। मिल्टन ने यह मार्मिक अपील तब की थी, जब फ्रांस में छपाई पर राष्ट्र्ीय स्तर पर नियंत्रण लगा हुआ था। लोगों को शायद ध्यान न हो कि छपाई मशीनों का पहला हमला चर्च के एकाधिकार पर ही हुआ था। छपाई मशीनों के कारण लोगों के मुक्त विचार आसानी से अन्य लोगों के बीच पहुंचने लगे। इससे तानाशाही राजतंत्र व चर्च का भयभीत होना स्वाभाविक था। 16वीं शताब्दी के मध्य फ्रांस की सरकार ने प्रेस पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया। यहां तक कि 1546 में एक छापाखाना मालिक एतिनो डोलेट को खंभे में बांधकर जला दिया गया। प्रेस से सबसे बड़ा खतरा सामंती तानाशाही व धार्मिक अधिनायकवाद के विरुद्ध विद्रोह भड़कने का था। लेकिन दमन से अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का आंदोलन और भड़का। जॉन मिल्टन (1608-74) के बाद अंग्रेज दार्शनिक जॉन लाक (1632-1704) सामने आये। उनके मानव मुक्ति के विचारों ने व्यापक प्रभाव डाला। और फिर इस श्रंृखला में सामने आये जॉन स्टुअर्ट मिल -1806-1873-। उन्होंने व्यक्ति स्वातंत्र्य को राजनीतिक मान्यता दिलाने का अथक प्रयास किया। यह उनका ही प्रभाव था कि अमेरिकी संविधान में पहला संशोधन किया गया, जिसमें कहा गया कि ‘कांग्रेस ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगी, जो अभिव्यक्ति स्वतंत्रता या प्रेस के अधिकारों को सीमित करे‘। जॉन मिल पश्चिम के दार्शनिकंों में शायद पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने भारतीय चिंतकों की तरह कहा कि सत्य स्थिर नहीं होता, वह युगानुरूप परिवर्तित होता रहता है (ट्र्ूथ इज नाट स्टेबल आर फिक्स्ड, बट इवाल्व्स विद टाइम)। यह कथन वास्तव में चर्च और बाइबिल के वर्चस्व पर सीधा हमला था। मिल ने तर्कों से यह सिद्ध किया कि ऐसा बहुत कुछ है, जिसे हम पहले सच समझते थे, लेकिन वे बाद में झूठे या गलत निकले। इसलिए पुराने विचारों को चुनौती देने वाले नये विचारों को आने से कभी नहीं रोका जाना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि ‘गहरे पैठे निर्णीत विचारों’ (डीप स्लंब्र आॅफ अडिसाइडेड ओपीनियन) को रोकने के लिए खुली बहस का अवसर मिलना आवश्यक है।

यह अभिव्यक्ति स्वतंत्रता या प्रेस की आजादी के अग्रणी समर्थकों का जिक्र करने का आशय यह है कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता वैयक्तिक आजादी या मानवीय आजादी की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। और किसी शासन तंत्र को उस पर अंकुश लगाने का कोई अधिकार नहीं है। कम से कम लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो उसकी सुरक्षा हर हालत में होनी चाहिए। लेकिन कश्मीर के अलगाववादी आॅल पार्टी हुर्रियत कांफ्रे्रंस के नेता अली शााह गिलानी या उनकी समर्थक तथाकथित जनवादी लेखक-लेखिका वरवर राव, गौतम नवलरवा व अरुंधति राय आदि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के उस अधिकार के हकदार नहीं है, क्योंकि ये न तो मनुष्य की वैयक्तिक स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हैं और न मानवीय मूल्यों की रक्षा का ही कोई संघर्ष कर रहे हैं। ये एक लोकतांत्रिक देश को तोड़ने और उसकी शांतिपूर्ण व्यवस्था को भंग करने के अपने षड्यंत्र को आजादी और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की रामनामी ओढ़ाने को प्रयत्न कर रहे हैं। भारत की केंद्रीय सरकार को भी अपनी वोट बैंक राजनीति के चलते कश्मीर की पूरी राजनीति को इस्लामी राजनीति के नजरिये से ही देखने की आदत पड़ चुकी है। पूर्व राजनयिक जी. पार्थसारथी ने अपने एक आलेख में लिखा है कि यह कैसी विडंबना है कि उस कश्मीर में आज आजादी के नारे गूंज रहे हैं, जो करीब 700 वर्षों तक मंगोलों, अफगानों, मुगलों, सिखों, डोगरा शासन की गुलामी में जीने के बाद भारत की आजादी के साथ आजादी की हवा में सांस लेते हुए अब अपनी इस आजादी को गुलामी की संज्ञा दे रहा है, क्योंकि वह कश्मीर में इस्लामी या शरियत का शासन कायम करना चाहता है। कश्मीरी इस्लामी नेता आज झूठ बोलने में पारंगत हो चुके हैं। आश्चर्य होता है, जब कश्मीर घाटी के वे लोग सेकुलर कश्मीरियत की बात करते हैं, जिन्होंेने पाकिस्तान प्रेरित की बात करते हैं, जिन्होंने पाकिस्तान प्रेरित जिहादियों की खुली मदद करके वहां से करीब 4 लाख कश्मीरी पंडितों को अपना घर बार छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया। आॅल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के अपने घोषणा पत्र में साफ शब्दों में लिखा गया है कि उसका लक्ष्य ‘इस्लामी मूल्यों पर आधारित एक समाज रचना करना’ तथा ‘मुस्लिम बहुल राज्य’ की स्थापना करना है। हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी ने कभी इस बात को छिपाया भी नहीं कि वह कश्मीर में शरियत का शासन स्थापित करना चाहते हैं। पिछले माह दिल्ली में हुई सेमीनार में भी गिलानी ने यह स्पष्ट किया कि उनके आजाद कश्मीर में शरिया का शासन होगा, लेकिन उसमें गैर मुस्लिमों को अपने मजहब के हिसाब से जीवन जीने की आजादी होगी। उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया था कि अभी तो पूरे कश्मीर में मद्यनिषेध लागू है, लेकिन इस्लामी शासन वाले कश्मीर में उन सबको खुलकर शराब पीने की छूट होगी, जिनका मजहब इसकी इजाजत देता है।

जाहिर है गिलानी जम्मू-कश्मीर के लिए किस तरह की आजादी चाहते हैं। वह आजादी के नाम पर जम्मू-कश्मीर को इस्लामी शरिया की गुलामी में जकड़ना चाहते हैं और आजादी एवं अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की अलंबरदार बनी अरुंधति जैसी लेखिका और जनमुक्ति आंदोलन के सूत्रधार कहे जाने वाले वरवर राव जैसे लेखक उनके स्वर में स्वर मिलाते हुए उनके बगलगीर बने हुए हैं। कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले हुर्रियत नेता पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की आजादी की बात कभी नहीं करते। अभी आप कह सकते हैं कि पाकिस्तान ने खुद इस इलाके को आजाद कश्मीर का नाम दे रखा है। लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि उस इलाके का केवल नाम आजाद है। और फिर मान लें कश्मीर का वह हिस्सा आजाद है, परंतु गिलगिल और बल्टिस्तान के बारे में उनकी क्या राय है, यह उन्होंने कभी नहीं बताया। पश्चिमोत्तर कश्मीर का वह इलाका तो सीधे इस्लामाबाद के शासन में है। फिर जम्मू-कश्मीर के उस 20 प्रतिशत हिस्से के बारे में उनका क्या कहना है, जो चीन के कब्जे में है। कुछ इलाके पर चीन ने सीधे कब्जा कर लिया है और कराकोरेम का कुछ इलाका पाकिस्तान ने उसे उपहार में दे दिया है। पाकिस्तान का आजाद कश्मीर कितना आजाद है, इसका पता हमें स्पष्ट रूप से पाक अधिकृत कश्मीर के उस संविधान से मिल सकता है, जो 1974 में बना था। इसमें साफ लिखा हुआ है कि ‘पाक अधिकृत कश्मीर का संविधान ऐसे किसी भी राजनीतिक गतिविधि का निषेध करता है, जो इस सिद्धांत के विरुद्ध है कि जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है।’ अभी कुछ वर्ष पूर्व यूरोपीय संसद ने (24 मई 2007 को) को एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि गिलगिल-बाल्टिस्तान में तो किसी भी तरह का लोकतंत्र उपलब्ध नहीं है और तथाकथित आजाद कश्मीर में भी किसी को किसी तरह की राजनीतिक आजादी नहीं है। यहां देश भर के लोगों को शायद यह न पता हो कि आॅल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस में शामिल प्रायः सभी बड़े घटक दलों का किसी न किसी आतंकवादी या जिहादी संगठन से संबंध है। मीर वायज उमर फारुख उदारवादी हुर्रियत नेता समझे जाते हैं, किंतु उन्हें उल उमर मुजाहिदीन जैसे जिहादी संगठन का समर्थन प्राप्त है। सैयद अली शाह गिलानी, हिजबुल मुजाहिदीन के कंधे पर सवार हैं, यह प्रायः सबको पता है। पाकिस्तान के सैनिक मुख्यालय रावलपिंडी में बैठे सैनिक अफसर हुर्रियत कांफ्रेंस का संचालन करते हैं। पाकिस्तान में सत्ता के समीकरण बदलते हैं, तो कश्मीरी संगठनों का ढांचा बदल जाता है। पाकिस्तान के राष्ट्र्पति परवेज मुशर्रफ की सैयद अली शाह गिलानी के नेता काजी हुसैन अहमद से तनातनी शुरू हो गयी थी, तो उन्होंने मीरवायज उमर फारुक को हुर्रियत का नेता बनवा दिया। इस पर गिलानी ने अलग होकर अपना अलग गुट खड़ा कर लिया। मुशर्रफ के हटते ही मीरवायज का असर कम हो गया। अब पाक सेनाध्यक्ष का जमाते इस्लामी के नेताओं से फिर संंबंध अच्छा हो गया, तो कश्मीर में गिलानी सर्वशक्तिमान हो गये। भारत सरकार द्वारा कश्मीर समस्रूा का समाधान खेजने के लिए नियुक्त वार्ताकार कश्मीर में जिन लोगों से बातचीत कर रहे हैं, उनमें से कोई भी कश्मीर की राजनीति में कोई महत्व नहीं रखता। हुर्रियत का कोई नेता उनसे बातचीत के लिए तैयार ही नहीं है, लेकिन यदि वे तैयार भी होते, तो उनसे बातचीत का कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि वे सबकी सब कठपुतलियां हैं, जिनका सूत्रधार कहीं इस्लामाबाद व रावलपिंडी में बैठा हैै।

भारतीय संविधान के अंतर्गत चुनाव लड़कर सत्ता हासिल करने वाली कश्मीरी पार्टियां भी भारत या भारत के संविधान के प्रति ईमानदार नहीं है। फारुख अब्दुल्ला आज यह भले ही कह रहे हों कि भारत मे बोलने की आजादी कुछ अधिक ही मिली हुई है, लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि उनके पिता शेख अब्दुल्ला ने ही कश्मीर को इस्लामी राज्य बनाने का सपना देखा था और आज उनके बेटे उमर अब्दुल्ला भी धड़ल्ले से कह रहे हैं कि कश्मीर ने भारत से कुछ शर्तों के साथ जुड़ना स्वीकार किया था, उसका कभी भारत के साथ विलय नहीं हुआ था। आज वे यह कह रहे हैं कि कश्मीर को 1953 के पूर्व की स्थिति चाहिए। आखिर क्यों ?

असल में जबसे कश्मीर घाटी में अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कांफ्रंेस पार्टी की प्रतिद्वंद्वी पार्टी के रूप में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी -पी.डी.पी.- सामने आयी, तबसे उन दोनों ने अलगाववादी कश्मीरियों का समर्थन पाने के लिए पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी नेताओं का स्वर अलापना शुरू कर दिया है। अब 1953 के पूर्व की स्थिति बहाल करने की बात दोनों करने लगे हैं। अरुंधति राय तो खैर उसके भी कई कदम आगे की बातें करने लगी हैं, लेकिन यदि 1953 के पूर्व की स्थिति बहाल कर दी जाए, तो उसका अर्थ होगा देश के किसी हिस्से का कोई व्यक्ति यदि जम्मू-कश्मीर जाना चाहेगा, तो उसे वहां का परमिट लेना पड़ेगा। सुप्रीमकोर्ट, चुनाव आयोग तथा आडीटर व कंट्र्ोलर जनरल का जम्मू-कश्मीर पर कोई प्रभाव नहीं रह जाएगा। यही नहीं, तब देश के अन्य भागों से आने वाले मान पर जम्मू-कश्मीर की सरकार टैक्स लगा सकेगी।

ये सब तो वे बातें हैं, जिसे किसी हद तक स्वीकार करने लिए हमारे देश की सरकार भी तैयार है। जनमत के भारी विरोध का डर न हो, तो इसे अब तक लागू कर दिया गया होता। लेकिन सरकार की नरमी का फायदा उठाकर अब कश्मीर अलगाववादी नेता पूर्ण स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं। यह सभी जानते हैं कि कश्मीर स्वतंत्र नहीं रह सकता। स्वतंत्रता की बात करना तो विश्व जनमत का समर्थन प्राप्त करने का एक बहाना है। भारत से आजादी मिले, फिर तो वे पाकिस्तान के साथ मिलने के लिए यों ही स्वतंत्र हो जाएंगे और ऐसा न भी हो तो पाकिस्तानी सेना एक दिन में उसे पाकिस्तान का हिस्सा बना देगी और अमेरिका और चीन जैसे देश उसका समर्थन भी कर देंगे।

वास्तव में इस देश को तथा दुनिया को कश्मीर आंदोलन के मूल चरित्र को समझने की जरूरत है। यह वास्तव में इस्लामी विस्तारवाद की लड़ाई है। यह 1947 में भारत के विभाजन की लड़ाई का अवशिष्टांश् है। यह न कश्मीरियत की लड़ाई है, न कश्मीर की आजादी की, यह इस्लामी सम्राज्यवाद की लड़ाई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर की 45 प्रतिश्त से अधिक आबादी कश्मीरी नहीं है, जिसमें डोगरा, पंजाबी, पहाड़ी, गुज्जर, बकरवाल, बौद्ध, शिया आदि शामिल हैं। जम्मू और लद्दाख के लोग कतई जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग नहीं होने देना चाहते। घाटी के भी 4 लाख हिन्दू पंडित बाहर न भगा दिये गये होते, तो पूरी घाटी को भी अलगाववादी नहीं कहा जा सकता था। फिर वह कौनसा कश्मीरी वर्ग है, जो भारत से आजादी चाहता है। वह है वहाबी आंदोलन से प्रभावित सुन्नी मुसलमानों का वह समुदाय, जिसने अपनी निष्ठा पाकिस्तान के हाथ बेंच रखी है। उनकी आजादी की आवाज वस्तुतः पूरे जम्मू-कश्मीर को शरिया का गुलाम बनाने की आवाज है। ऐसी आजादी के नारे को अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की आजादी के पवित्र वस्त्र से नहीं ढका जा सकता। अरुंंधति राय गुलामी की आवाज का समर्थन कर रही है। वह अपने मामूली स्वार्थों के लिए पूरे जम्मू-कश्मीर की आजादी को पाकिस्तानी सैनिक व मजहबी तानाशाही का गुलाम बनाने वाली आवाज के साथ अपनी आवाज मिला रही हैं।

भारत सरकार ने अरुंधति राय के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई न करने का निर्णय लेकर यों बुद्धिमानी का निर्णय किया है, लेकिन उसकी पूरी कश्मीर नीति बेहद कमजोर और कायरतापूर्ण है। उसे साफ घोषणा करनी चाहिए कि कश्मीर को इस्लामी साम्राज्य की मजहबी तानाशाही की गोद में नहीं जाने दिया जा सकता। इस मोर्चे पर अब देश के आम नागरिकों तथा बुद्धिजीवियों को आगे आने की जरूरत है। उन्हें आजादी लोकतंत्र व मानवाधिकारों की ओर लेकर इन सबकी सामूहिक हत्या करने वालों के षडयंत्र का पर्दाफाश करना चाहिए। कश्मीर को लेकर देश ही नहीं, पूरी दुनिया में चल रहे कुप्रचार के जाल को तोड़ने की जरूरत है। और इससे भी ज्यादा जरूरी है अरुंधति राय जैसी निहित स्वार्थी बुद्धिजीवियों की बौद्धिक जालसाजियों का पर्दाफाश करना।

अभिव्यक्ति स्वतंत्रता मानवीय स्वतंत्रता के उद्घोष  का आंदोलन है। यह आंदोलन है सामंती तानाशाही व मजहब की गुलामी से मुक्ति का। लेकिन यदि कोई आंदोलन किसी एक भू क्षेत्र की पूरी जनसंख्या को पुनः मजहबी गुलामी के दौर में ले जाना चाहता हो, तो मनुष्यता का तकाजा है कि उसका जी जान से विरोध किया जाए और वैयक्तिक आजादी व विचारों की वास्तविक आजादी के लिए हर  तरह के संघर्ष एवं बलिदान का संकल्या लिया जाए। (7.11.2010)

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

कश्मीरी आंदोलन को देशव्यापी बनाने की साजिश




कश्मीरी अलगाववादी आंदोलन को अब राज्य की सीमा के बाहर राष्ट्रव्यापी आंदोलन बनाने का एक संगठित प्रयास शुरू हो गया है। पिछले दिनों दारूल उलूम देवबंद में कश्मीर मसले पर विचार के लिए पहली बार जमीयत-ए-उलेमाए हिन्द की बैठक हुई, जिसमें कई प्रस्ताव पारित किये गये। उसके बाद गत गुरुवार को नई दिल्ली में भरत की केंद्रीय सत्ता की ठीक नाम के नीचे कश्मीरी अलगाववादियों ने एक सेमीनार आयोजित किया, जिसमें माओवादी व खालिस्तान समर्थक बुद्धिजीवियों ने भी भाग लिया। सेमीनार में शामिल अरुंधती राय जैसी वामपंथी लेखिका ने तो कश्मीरी आंदोलन का समर्थन करते हुए भारत को उपनिवेशवादी देश तक कह डाला।



स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रायः तुरंत बाद कश्मीर पर हुए पाकिस्तान के पहले हमले के बाद 4 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी ने अपनी शाम की प्रार्थना सभा में बोलते हुए कहा था कि आओ हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें ऐसी शक्ति दे कि या तो हम (भारत और पाकिस्तान या हिन्दू और मुसलमान) एक दूसरे के साथ मैत्रीपूर्वक रहना सीख लें और यदि हमें लड़ना ही है, तो एक बार आर-पार की लड़ाई कर लें। यह बात मूर्खतापूर्ण लग सकती है, लेकिन देर-सबेर इससे हममें शुद्धता आ जाएगी (लेट अस प्रे टू गॉड इज टु ग्रांट दैट वी मे आइदर लर्न टु लिव इन एमिटी विद ईच अदर आॅर इफ वी मस्ट फाइट टू लेट अस फाइट टु द वेरी एंड दैट मे बी फॉली बट सूनर आॅर लेटर इट विल प्योरीफाई अस)।

गांधीजी की अन्य तमाम सलाहों की तरह यह सलाह भी व्यर्थ गयी। हम आज तक न तो मैत्रीपूर्वक साथ रहना सीख सके और न आर-पार की लड़ाई लड़ने का साहस ही जुटा सके। हमने तिलमिल मरने या भूसे की आग में सुलगते रहने का रास्ता अख्तियार किया है। हम सच्चाई को स्वीकार करने से डरते हैं, क्योंकि हम किसी भी तरह का नुकसान उठाने से डरते हैं और कम से कम अपनी जान तो खतरे में कतई नहीं डालना चाहते। गांधी जी ने यदि आज वही बात कही होती, जो 4 जनवरी 1948 में कही थी तो शायद उन पर भड़काउ भाषण देने के लिए मुकदमा कायम हो जाता। अखबारों में सुर्खियां छपती कि अहिंसा का तथाकथित पुजारी अब युद्ध की और वह भी आर-पार के युद्ध की बात करने लगा है।

भारत और पाकिस्तान आज शायद आर-पार की लड़ाई लड़ने की स्थिति में भी नहीं रह गये हैं। 1948 में जब वे लड़ सकते थे, तब नहीं लड़े, आज वे लड़ नहीं सकते, क्योंकि उन्हें परमाणु अस्त्रों का डर है। दोनों ही देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं। इसलिए छिटपुट युद्ध तो चल सकते हैं, लेकिन आर-पार की लड़ाई की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत यों भी अपनी युद्ध नीति में फिसड्डी है। उसकी सारी सुरक्षा तैयारी प्रतिरक्षात्मक है। उसने अब तक दुश्मन को मात देने के लिए अपनी कोई मौलिक रणनीति तक ईजाद नहीं की है। दुश्मन अपने हमले का तरीका बदलता है, तो हम अपनी प्रतिरक्षात्मक तकनीक बदलने की कोशिश में लग जाते हैं। हम किसी जवाबी कार्रवाई के लिए कभी नहीं सोचते। हमें शायद अपनी विशालता और संख्या बल का अधिक भरोसा है। दुश्मन कितनों को मारेगा? वह कितनों को ही मार डाले, कितना भी विनाश कर ले, हम तब भी बचे रहेंगे। हम अहिंसा के पुजारी हैं। हम शेर हैं, लेकिन शिकार न करने में शेर हैं। हमारा राष्ट्र चिह्न बौद्ध धर्म के प्रतीकों में से चुना गया है। चारों दिशाओं में मुंह करके पीठ सटाए बैठे सिंह के पांव तले घोड़े और बैल दौड़ रहे हैं। ये आराम फरमा रहे सिंह शाक्य सिंह (तथागत बुद्ध) के प्रतीक हैं। इन्होंने हिंसा का त्याग कर दिया है। ये अब धर्म चक्र के संरक्षक हैं।

लेकिन आज नहीं तो कल शायद इस देश को वह आर-पार की लड़ाई लड़नी ही पड़ेगी, जिसका संकेत महात्मा जी ने अब से 6 दशक पहले किया था। कश्मीर का विवाद अब बिल्कुल एक नये मोड़ पर आ गया है। अब वह सीमावर्ती क्षेत्र के केवल एक राज्य का मसला नहीं रह गया है। उसे अब एक राष्ट्रीय विवाद का रूप देने की कोशिश शुरू हो गयी हैै। कश्मीर अब केवल भारत-पाकिस्तान के बीच का विवाद नहीं रह गया है। अब यह कश्मीरी मुस्लिमों का भारत सरकार के खिलाफ युद्ध का रूप ले चुका है, जिसमें पाकिस्तान कश्मीरी मुसलमानों के अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी की भूमिका निभा रहा है। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि इस देश की सारी राष्ट्रविरोधी ताकतें मुस्लिम अलगाववादी ताकतों के साथ एकजुट हो गई हैं। बीते गुरुवार राजधानी दिल्ली के राजनीतिक सत्ताकेन्द्र के ठीक नाक के नीचे स्थित एल.टी.जी. (लिटिल थियेटर ग्रुप) आॅडिटोरियम में जो कुछ हुआ और जो कुछ देखा सुना गया वह देश के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक है। कला और संस्कृति के आयोजनों के लिए प्रसिद्ध इस सभागार में देश के विभाजन की आवाजें बुलंद की गईं। ’राजनीतिक कैदियों की आजादी के लिए समिति की ओर से इस सभाकक्ष में एक सेमीनार का आयोजन किया गया था जो कश्मीरी अलगाववाद पर केन्द्रित था। विषय था ’कश्मीर ः आजादी ही एक मात्र रास्ता है’ (कश्मीर ः आजादी द ओनली वे)। इसमें कश्मीरी अलगाववाद के समर्थक बुद्धिजीवियों के अलावा माओवादी तथा खालिस्थानवादी बुद्धिजीवी भी शामिल थे। कट्टरपंथी कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता अलीशाह गिलानी इस सेमीनार के मुख्य वक्ता थे। सेमीनार का संचालन कर रहे थे संसद पर हुए आतंकवादी हमले के मुख्य सूत्रधार समझे जाने वाले जामिया मिलिया के प्रोफेसर एस.ए.आर. गिलानी। प्रोफेसर गिलानी यद्यपि अदालत से रिहा हो गये थे, लेकिन उनके अलगाववादी उग्र विचारों से दिल्ली का शायद ही कोई बुद्धिजीवी अपरिचित हो। इस सेमीनार में उपस्थित प्रमुख लोगों में माओवादियों के समर्थन कवि वरवर राव, लेखिका अरुंधती राय, प्रो. अब्दुर्रहमान, प्रो. सुजाता राव, डॉ. शेख शौकत हुसैन, नजीब बुखारी तथा डॉ. एन. वेनु आदि के नाम गिनाये जा सकते हैं। दिल्ली के शैक्षिक संस्थानों में पढ़ रहे या पढ़ा रहे कश्मीरियों के अतिरिक्त उनके समर्थक छात्र व अध्यापक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

ऐसे सेमीनार में हुर्रियत नेता गिलानी क्या बोलेंगे इसका तो सभी को अनुमान था, लेकिन अरुंधती राय के वक्तव्य ने तो सबको चकित कर दिया। उन्होंने कश्मीर के अलगाववादी आन्दोलन को जनान्दोलन बताया और मंच से घोषणा की कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा। उन्होंने तो भारत को ‘उपनिवेशवादी देश’ तक कह डाला। उन्हें यह कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि भारत ने कश्मीर के सेना की ताकत पर अपना उपनिवेश बना रखा है। उन्होंने कश्मीर, नागालैंड तथा नक्सली आन्दोलन को जनान्दोलन की संज्ञा देते हुए कहा कि इन आन्दोलनकारियों की आवाज देश के अधिक से अधिक लोगों तक जानी चाहिए। उन्होंने यद्यपि विश्व हिन्दू परिषद को भी एक जनान्दोलन बताया, लेकिन साथ ही यह कहा कि विश्व हिन्दू परिषद का यह हिन्दू आन्दोलन ’सबके लिए न्याय के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, जबकि ये अलगाववादी आन्दोलन सबके लिए समान न्याय के सिद्धांत पर आधारित है।’

जैसा कि सेमीनार का विषय था गिलानी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आजादी ही कश्मीर समस्या के समाधान का एक मात्र रास्ता है। कश्मीर कोई भारत का आन्तरिक मामला नहीं है। वह एक अंतर्राष्ट्रीय मामला है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय ताकतों को भी इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। उनकी अमेरिका व ब्रिटेन से खासतौर पर अपील थी कि वे कश्मीर के मामले में भारत सरकार पर दबाव डाले कि वह कश्मीरी क्षेत्र से अपना नाजायज कब्जा तुरंत हटा ले। उन्होंने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए केन्द्र सरकार की बातचीत की कोशिशों को व्यर्थ की कवायद करार दिया। अभी भारत सरकार की ओर से जो तीन वार्ताकार नियुक्त किये गये हैं उनके बारे में गिलानी का कहना था कि यह भारत सरकार की केवल समय काटने की चाल है। उन्होंने कश्मीरियों से आग्रह किया कि वे इस वार्ताकार दल का बहिष्कार करें क्योंकि इनसे कुछ होने जाने वाला नहीं है। उनका कहना था कि अब तक वार्ता की जितनी भी कोशिशें की गईं वे सभी विफल हुई क्योंकि भारत सरकार इस समस्या का कोई समाधान करना ही नहीं चाहती। वह वार्ताकारों के नामपर कश्मीरियों को व्यर्थ में उलझाए रखना चाहती है।

गिलानी ने अपने आजाद कश्मीर राष्ट्र की एक रूप रेखा भी प्रस्तुत की। उनका कहना था कि आजाद कश्मीर एक सेकुलर राष्ट्र होगा, जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों की भी रक्षा की जाएगी। अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के उदाहरण स्वरूप उन्होंने बताया कि मुसलमानों के लिए तो राज्य में पूर्ण मद्यनिषेध रहेगा, किंतु जिनके मजहब में शराब पीने की अनुमति है, उन्हें शराब पीने की आजादी रहेगी। यदि कोई कट्टरपंथी मुस्लिम किसी अल्पसंख्यक की शराब की बोतल तोड़ देता है, तो या तो उस व्यक्ति से उसका हर्जाना दिलवाया जाएगा या फिर सरकार उस नुकसान की भरपायी करेगी। गिलानी का कहना था कि घाटी ही नहीं, जम्मू और लद्दाख के लोगों को भी भारत से आजादी चाहिए। इस सेमीनार में यह रोचक दृश्य था कि माओवादी वामपंथियों ने भी कश्मीरी अलगाववादियों के साथ् अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया। माओवाद के समर्थक कवि वरवर राव मंच पर सैयद गिलानी के ठीक बगल में विराजमान थे।

सभाकक्ष में अंदर व बाहर श्रोताओं-दर्शकों के बीच उपस्थित कुछ राष्ट्रवादी युवकों ने गिलानी तथा अरुंधती राय आदि के राष्ट्रविरोधी वक्तव्यों पर घेर आपत्ति जतायी। उन्होंने अलगाववादियों के विरुद्ध ’भारत माता की जय’, ’वंदेमातरम’, ’राष्ट्र एकता जिंदाबाद’ आदि के नारे लगाये, तो उनके जवाब में वहां उपस्थित अलगववादी समूह के युवकों ने ’वी वांट फ्रीडम’, ’गो इंडिया गो’, ’कौन करेगा तर्जुमानी-सैयद अली शाह गिलानी’ आदि नारे लगाये। सेमीनार आयोजकों के विरुद्ध हल्ला-गुल्ला बढ़ते देख पुलिस फौरन हरकत में आयी। उसने भारतीय एकता के नारे लगाते तथा भारतीय ध्वज लहराते युवकों को वहां से बलपूर्वक घसीटकर बाहर किया। सभाकक्ष के भीतर तथा बाहर करीब 40 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया।

इस सेमीनार पर देश के प्रायः सभी राजनीतिक दलों ने चुप्पी सी साध रखी है। केवल भारतीय जनता पार्टी ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि उसने ठीक अपनी नाक के नीचे अलगाववादियों को राष्ट्रद्रोही वक्तव्य देने का अवसर दिया है। उनका कहना था कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर राष्ट्रद्रोह या राष्ट्र के विभाजन की आवाज उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

गृहमंत्री पी. चिदंबरम का इस पर जवाब है कि दिल्ली की पुलिस सेमीनार में दिये गये वक्तव्यों का विश्लेषण कर रही है, यदि उसमें कोई ऐसा तत्व पाया गया, जो कानूनी दृष्टि से राष्ट्रद्रोह के अंतर्गत आता हो, तो ऐसा वक्तव्य देने वालों के खिलाफ अवश्य कार्रवाही होगी। सवाल है कि क्या गृहमंत्री को पता नहीं था कि इस सेमीनार में क्या होने जा रहा है। क्या यह कश्मीर की अशांति को पूरे देश में फैलाने की साजिश का अंग नहीं है। लोकतंत्र की सीमाओं को आखिर कहां तक खींचा जा सकता है।

भारत सरकार के नेतागण इसे स्वीकार करें या नहीं, लेकिन यह एक कड़वा सच है कि कश्मीर के मामले में क्रमशः भारत सरकार की स्थिति कमजोर पड़ती जा रही है। अमेरिका यदि आज खुलकर कश्मीर के मामले में पाकिस्तान का समर्थन नहीं कर रहा है, तो यह उसकी आर्थिक व राजनीतिक मजबूरी है, अन्यथा उसके अनेक नेता व अधिकारी अभी भी पाकिस्तानी पक्ष का समर्थन करते आ रहे हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता फिलिप क्राउले ने अभी कहा है कि यू.एस. यह मानता है कि कश्मीर एक परम मुद्दा (अल्टीमेट इशू) है, लेकिन उसे भारत-पाक को ही हल करना है। अभी बीते सप्ताह में ही वाशिंगटन में चल रही अमेरिका-पाकिस्तान रणनीतिक वार्ता के दूसरे दौर में अपना उद्घाटन वक्तव्य देते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा कि राष्ट्रपति ओबामा ने कश्मीर मुद्दे के समाधान का महत्व समझा है। इसका उन्होंने पहले वायदा भी किया था कि वह कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अपना विशेष दूत नियुक्त करेंगे। कुरैशी ने यह वक्तव्य अमेरिका मामले में कोई मध्यस्थता नहीं करेगा, जबकि अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन उनकी बगल में ही बैठी हुई थीं। कुरैशी का कहना था कि दक्षिण एशिया की शांति और स्थिरता में यू.एस. और पाक दोनों के साझा हित हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश कश्मीर की हाल की घटनाओं के कारण् इसके लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। इस रण्नीतिक बैठक में ही अमेरिका ने पाकिस्तान को दो अरब डॉलर की सैनिक साजो सामान की सहायता देने की घोषणा की।

यहां यह उल्लेखनीय है कि कश्मीर के बारे में पाकिस्तान ने अब एक नई नीति अख्तियार की है, जो आतंकवादी हमलों के आगे की है। आतंकवादी हमले तो अपनी जगह जारी ही रहेंगे, जिसे अब खुद भारतीय सुवक अंजाम देंगे। दूसरे कश्मीर के आंदोलनकारी अब हथियार छोड़कर आंदोलन के मैदान में उतरेंगे, तीसरे कश्मीर के आंदोलन को पूरे भरत के मुस्लिम समुदाय के साथ् जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। कश्मीरी युवकों द्वारा पथराव की रणनीति इस बदली नीति का ही अंग है। ये पथराव करने वाले युवक न तो बेरोजगार हैं, न गरीब हैं और न किराये के हैं। घटी में पुुलिस आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का हो अध्ययन किया गया है, उसके अनुसार उनमें कोई गरीब या बेरोजगार नहीं है। प्रायः सभी शिक्षित, अच्छे खाते-पीते परिवारों के, नौकरीपेशा या निजी रोजगार संपन्न परिवारों के हैं। कम से कम 70 प्रतिशत तो ऐसे हैं, जो किसी भी तरह किसी अभवग्रस्त वातावरण से नहीं आये हैं।

पथराव वस्तुतः उनके अहिंसक विरोध का माध्यम बन गया है। इसीलिए गिलानी कह रहे हैं कि ताजा आंदोलन में उनके पथराव से तो सुरक्षाबलों का कोई जवान नहीं मरा, जबकि उनकी गोलियों से 110 से अध्कि कश्मीरी युवक मारे जा चुके हैं। जब तक कश्मीरी आंदोलन हथियारबंद था, तब तक तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार का अवसर देना कठिन था, लेकिन अब आसानी से उसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आंदोलन से जोड़ा जा सकता है। पिछले दिनों दारूल उलूम देवबंद में जमायत-ए-उलेमाए हिन्द का कश्मीर के मसले को लेकर एक सम्मेलन हुआ। किसी भारतीय मुस्लिम मजहबी संगठन का कश्मीर को लेकर आयोजित यह शायद पहला सम्मेलन था, जिसमें यद्यपि कश्मीर समस्या का समाधान भारतीय संविधान के दायरे में तलाश करने की बात की गयी, लेकिन सम्मेलन का अधिक जोर इस बात पर था कि भारत का मुसलमान कश्मीर के प्रति इतना उदासीन क्यों है। यह सही है कि कश्मीरी मुसलमानों के प्रति पूरी सहानुभूति तथा उसे विशेष अधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रति पूर्ण समर्थन के बावजूद वह उसके देशमें कोई आवाज नहीं उठा रहा था। शायद उसने यह समझ रखा था कि पड़ोसी पाकिस्तान के नेता तथा कश्मीरी युवक स्वयं इसे निपट लेंगे। लेकिन अब बढ़ते अमेरिकी दबाव के आगे पाकिस्तान के हाथ पांव काफी कुछ बंध गये हैं, इसलिए अब समय आ गया है कि कश्मीरी अलगाववाद के समर्थन में देश के भीतर एक मुखर वातावरण बने। देवबंद में जमीयत उलेमाए हिन्द का सम्मेलन और दिल्ली में आयोजित सेमीनार इसी अभियान के अंग हैं।

पता नहीं भारत सरकार के नेतागण इसे समझ पा रहे हैं या नहीं अथवा समझ बूझकर भी उस तरफ से आंखें बंद किये हुए हैं, लेकिन यह सच्चाई है कि पाकिस्तान की नई रणनीति कश्मीरी अलगाववाद को देशव्यापी मुस्लिम संवेदना से जोड़ना है। पाकिस्तान के नेता हो या कश्मीरी अलगाववादी संगठनों के नेता, वे यह अच्छी तरह से स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी समस्या आर्थिक नहीं राजनीतिक है। उन्हें आर्थिक पैकेज और रोजगार के अवसर नहीं चाहिए। भारत सरकार यहां भी प्रतिरक्षात्मक भूमिका ही निभा रही है। वह पैकेज घोषित कर रही है, वार्ताकार नियुक्त कर रही है और आंदोलनकारी युवकों को गुमराह युवकों की संज्ञा दे रही है। वह साफ-साफ यह कहने का साहस नहीं कर पा रही है कि मजहब के आधार पर कश्मीर को भारत से अलग नहीं किया जा सकता। कश्मीर केवल मुसलमानों का नहीं है। भारत ने मजहब के आधार पर देश का एक विभाजन स्वीकार कर लिया, लेकिन अब दूसरा कतई स्वीकार नहीं करेगी। वह गांधी जी की तरह यह कहने की स्थिति में नहीं है कि भले इसके लिए हमें कोई आर-पार की लड़ाई ही क्यों न लड़नी पड़े। लेकिन हमारे देश की सरकारों में यह ताकत तभी पैदा हो सकती है, जब वे मजहब की राजनीति से अपने को उपर उठा सकें। देवबंद में हुई उलेमाओं की बैठक और नई दिल्ली में हुई सेमीनार भरत के क्षितिज पर उभरे भविष्य की चेतावनी के अभिलेख हैं। इन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। यदि अभी भी शुतुरमुर्गी नीति अपनायी गयी, तो देश का केवल एक विभाजन ही नहीं, विखंडन की एक श्रृंखला शुरू हो जाएगी, जिसे रोकना फिर शायद किसी के वश में न रह जाए। (24-10-2010)



बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

विजयदशमी के संदर्भ में
सार्वभौम मानवीय आदर्शों के प्रतीक पुरुष हैं श्रीराम



भगवान श्रीराम इस धरती पर पैदा हुए या नहीं या कब पैदा हुए, यह सब हम नहीं जानते। कोई इतिहासकार भी नहीं जानता। लेकिन उनकी ऐतिहासिकता प्रमाणित करने के लिए क्या इतना काफी नहीं कि प्राचीन विश्व साहित्य का कम से कम आधे से अधिक भाग केवल राम या रामकथा पर आधारित है? क्या आदिकवि वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक के रामकथा गायकों पर अकारण अविश्वास करने का कोई औचित्य है। फिर ऐतिहासिक राम जैसे भी रहे हों, वे हुए हों या न हुए हों, इससे हमें लेना-देना ही क्या है। हम तो वाल्मीकि के राम को या उनसे भी अधिक तुलसीदास के राम को जानते हैं, जिनका धरती पर जन्म संपूर्ण मनुष्यता की या संपूर्ण मानवीय आचरण के आदर्शों की रक्षा के लिए हुआ। वह भारत के सार्वभौम मानवीय संस्कृति के एक आदर्श प्रतीक हैं। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम या देशी-विदेशी में विभक्त नहीं किया जा सकता। तो फिर इसे स्वीकार करने में इस देश की सरकारों, राजनेताओं, बुद्धिजीवियों तथा धर्माधिकारियों को आखिर क्यों आपत्ति है।


तमाम अन्य वार्षिक पर्वों-त्यौहारों की तरह दशहरा भी हर वर्ष आता रहता है। इस बार भी आया है। आज नवरात्रि पर्यंत पूजित दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन हो जाएगा। शाम को रावण के पुतले जलाएं जाएंगे और असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और अधर्म पर धर्म के विजय स्वरूप राम के विजय की एक बार और घोषणा हो जाएगी। लेकिन यह पारंपरिक भारत की कथा है, आधुनिक भारत यानी 'इंडिया'  के लिए यह हिन्दुओं का एक पुराना नाटकीय उत्सव है, जो हिन्दू 'माइथलॉजी' से जुड़ा है और हिन्दू आस्थ वाले लोग इसे हर साल मनाते हैं। राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री इस अवसर पर उसी तरह बधाई संदेश जारी कर देते हैं, जिस तरह ईद या क्रिसमस पर जारी किया करते हैं। कल तक जो एक राष्ट्रीय, सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना जागृत करने वाला समारोह था, वह आज एक धर्म विशेष (हिन्दू) का एक वार्षिक नाट्योत्सव बनकर रह गया है।

राम और रामकथा को लेकर इस देश में आम लोगों, बुद्धिजीवियों, राजनेताओं तथा न्यायविदों की कैसी-कैसी और क्या-क्या धारणाएं हैं, उसको जानने समझने का एक बहुत अच्छा माध्यम है अयोध्या का राम जन्मभूमि व बाबरी मस्जिद विवाद। एक विवाद को लेकर इस देश् में जितना कुछ लिखा या कहा गया है या जितने लेख व पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, उतनी शायद ही किसी दूसरे विषय को लेकर प्रकाशित हुई हों। न्यायालय में चलने वाला तो यह देश् का सबसे लंबा विवाद है ही।

अभी करीब 6 दशकों की लंबी प्रतीक्षा के बाद इस मामले में उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट का एक फैसला सामने आया। करीब पांच सौ वर्षपुराने विवाद में आया यह पहला न्यायिक फैसला है। इस फैसले में यद्यपि बहुत सी विसंगतियां भी हैं   लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से प्रमाणित की गयी है कि अयोध्या का विवादित स्थल राम जन्मभूमि के रूप में जाना जाता था। वहां पर एक मंदिर थ, जिसके कस्बे के उपर 1528 में एक मस्जिद का निर्माण कराया गया। चूंकि मस्जिद के निर्माण के पूर्व वहां एक मंदिर थ, इसलिए उस पर हिन्दुओं का अधिकार है। अब इसका क्या प्रमाण है कि वह स्थान राम का जन्मस्थान ही था, इसके लिए न्यायपीठ के तीनों न्यायाधीशों ने हिन्दुओं के पारंपरिक विश्वास को ही प्रमाण माना है और कहा कि मस्जिद निर्माण के पूर्व अज्ञात काल से हिन्दू उसे राम का जन्म स्थान मानते आए हैं, इसलिए उसे राम का जन्म स्थान ही माना जाना चाहिए और उस पर हिन्दुओं का अधिकार स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि राम को हिन्दू ही अपना भगवान मानते हैं। आश्चर्य है कि यह फैसला आने के बाद न्यायालय में पूर्ण आस्था का दावा करने वाले तथा न्यायिक फैसले की खिल्ली उड़ा रहे हैं और न्यायाधीशों पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने तथ्यों व प्रमाणों की अनदेखी करके विश्वास के आधार पर फैसला दिया है। न्यायालय, न्याय के नियमों, कानूनों व सबूतों के आधार पर काम करता है, विश्वास के आधार पर नहीं। देश कानून के सहारे चलेगा, विश्वास के सहारे नहीं। मुस्लिम पक्ष एवं वामपंथी बुद्धिजीवी, पत्रकार एवं इतिहासकार न्यायाधीशें पर यह भी आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने इतिहास के तथ्यों की भी अनदेखी की है। उन्होंने 1949 व 1992 में किये गये अपराधों की तरफ से भी आंखें बंद रखी हैं। वे किसी 'टाइटिल सूट'  (मालिकाना हक निर्धारित करने वाले मुकदम) का फैसला पारंपरिक विश्वासों के आधार पर नहीं कर सकते। सत्ताधरी वर्ग के लोग चुप हैं। लोग चाहे आपस में लड़ लें या न्यायालय में लड़ लें, जब तक उनके अपने राजनीतिक हितों के लिए कोई समस्या नहीं खड़ी होती, तब तक वे क्यों जबान खोलें। अभी तो बीच में सर्वोच्च न्यायालय की एक दीवार खड़ी है। जब यह मसला उसे भी पार करके आगे आएगा, तब देखा जाएगा। देश के तमाम बुद्धिजीवी, पत्रकार व इतिहासकार जब यों ही उसका काम करने लगे हों, तो उसे नाहक अभी बीच में पड़ने की क्या जरूरत।

अब इन बुद्धिजीवियों को कौन समझाए कि इस देश में जिस संविधान, जिस लोकतंत्र और जिस न्याय परंपरा को स्वीकार किया गया है, उसमें 'फेथ' या विश्वास को ही सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यदि ऐसा न होता, तो राजनीति और समाज व्यवस्था का प्रधान तत्व धर्म (रिलीजन) न बनता। यहां 'रिलीजन' या 'फेथ' का जितना सम्मान है, उतना और किसी चीज का नहीं। कहने को यह व्यवस्था 'सेकुलर' (धर्मनिरपेक्ष) है, लेकिन व्यवहार में यह 'सर्वधर्मवादी' यानी सभी धर्मों व विश्वासों के आगे सिर झुकाने वाली है, फिर वह धर्म या विश्वास चाहे गलत हो या सही। किसी भी 'धर्म' या उसके विश्वास पर उंगली उठाना कानूनन अपराध् है। समाज और राजनीति में ही नहीं, कानून और न्याय में भी ‘धर्म‘ और ‘विश्वास‘ (फेथ) को प्रमुखता दे दी गयी है। इसलिए यदि किसी को सत्ता, राजनीति व न्याय व्यवस्था का लाभ उठाना है, तो उसके लिए ‘धर्म‘ और ‘विश्वास‘ का रास्ता सबसे आसान बना दिया गया है। और यहां का बुद्धिजीवी समाज अपनी सुविधानुसार कभी उसका समर्थन करता है, तो कभी आलोचना। और दोनों के लिए ही उसके पास यथेष्ठ तर्क होते हैं। अयोध्या की समस्या वस्तुतः राजनीतिक है, धार्मिक नहीं, लेकिन राजनीतिक स्तर पर समाधान न हो पाने के कारण उसे धार्मिक रूप देना पड़ा, क्योंकि देश् की वर्तमान व्यवस्था राजनीति व समाज से अधिक धर्म से डरती है, उसके आगे झुकती है। न्याय व्यवस्था भी इतिहास व संस्कृति को कम महत्व देती है, धर्म को अधिक। यह एक ऐतिहासिक व पुरातात्विक सत्य है कि मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं ने यहां के अधिकांश मंदिरों को तोड़ा और उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण कराया। यत्र-तत्र जहां भी मूर्तियां दिखायी पड़ीं, उन्हें अंग-भंग किया। किसी भी देश या जाति को रौंदने का सबसे आसान तरीका होता है उसकी संस्कृति व उसके विश्वास को रौंदना। भारत में हजारों वर्षों तक यही होता रहा। आक्रमणकर्ताओं ने अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम करने के लिए तलवार के साथ अपने रिलीजन का भी इस्तेमाल किया।

पारंपरिक भारतीय समाज 'जिसे आज हिन्दू कहा जाता है' 1528 से अब तक यदि अयोध्या की राम जन्मभूमि के लिए लड़ता आ रहा है, तो उसका लक्ष्य न तो धर्म है न कोई जमीन का टुकड़ा, वह वास्तव में अपना वह सांस्कृतिक सम्मान वापस पाना चाहता है, जिसे एक विदेशी हमलावर ने पांच सौ साल पहले रौंद डाला था। मसला शुद्ध राजनीतिक है। भारत का पारंपरिक समाज वस्तुतः आज तक अपनी सांस्कृतिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर सका है। इस्लामी शसन के बाद अंग्रेजी शासन आ गया और जब इन दोनों से स्वतंत्रता पाने का अवसर आया तो भी उसे अपनी सांस्कृतिक स्वतंत्रता हासिल नहीं हो सकी। वह आज भी उसके लिए तड़प रहा है।

वास्तव में भारतीय दार्शनिक परंपरा विश्वास (फेथ) पर नहीं तर्क पर आधारित रही है, फिर भी उसे विदेशियों से अपना अधिकार पाने के लिए विश्वास को अपना हथियार बनाना पड़ा। इस्लामी काल में भारतीय राजे-रजवाड़े अयोध्या के राम मंदिर के लिए लड़ रहे थे, तो उसके लिए उन्हें किसी तर्क का सहारा लेने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि तब कोई उसका तर्क सुनने वाला नहीं था। उसके हमले सीधे उस राम मंदिर स्थल पर कब्जे के लिए हो रहे थे। अंग्रेजों के शासनकाल में स्थिति बदल गयी। राजे-रजवाड़े या तो लड़-भिड़कर हार गये या अंग्रेजों के भक्त बन गये। तब अंग्रेजों के सामने आम भारतीयों ने अपने विश्वास को लेकर फरियाद शुरू की और लगातार अपने पिछले संघर्ष का हवाला दिया। मुस्लिम भी उनके सामने अपने विश्वास की दुहाई दे रहे थे और हिन्दू भी। तो अंग्रेजों ने मस्जिद परिसर के बीच एक दीवार खड़ी करके बाहरी हिस्से में हिन्दुओं को पूजा करने का अधिकार दे दिया। वे एक चबूतरा बनाकर वहां पूजा करने लगे। कहा जाता है कि अंग्रेजों के जमाने में उनके डर से शेर-बकरी दोनों एक घाट पर पानी पीते थे, तो यही हाल अयोध्या के हिन्दू-मुसलमानों का रहा। यहां से आगे के इतिहास की कहानी प्रायः सबको पता है, इसलिए विस्तार में जाने की जरूरत नहीं, लेकिन मुख्य कथ्य यह है कि हिन्दुओं ने केवल अपना सांस्कृतिक सम्मान वापस पाने के लिए विश्वास का सहारा लिया। क्या आज के हिन्दू को पता नहीं है कि वास्तव में भगवान राम कहां पैदा हुए थ्े, उस जमीन की पहचान का कोई अर्थ नहीं है। उसे यह भी पता है कि उसका धर्म किसी एक मंदिर या एक जमीन के टुकड़े पर नहीं टिका है। मंदिर के स्थान पर मस्जिद बन जाने से कोई हिन्दू धर्म नहीं नष्ट हुआ जा रहा है। वहां शौचालय बन जाए, तो भी धर्म को कोई क्षति नहीं पहुंचने जा रही है, लेकिन उससे हिन्दू समाज का सामूहिक स्वाभिमान जरूर आहत होगा। बाबर के या औरंगजेब के हमलों में अयोध्या, काशी या मथुरा के राम, शिव व कृष्ण मंदिरों के ध्वस्त कर दिये जाने से राम, कृष्ण या शिव का कुछ नहीं बिगड़ गया, लेकिन भरतीय समाज जब उन्हें अपने वर्तमान स्वरूप में देखता है, तो उसका चित्त अवश्य आहत होता है।

इन स्थलों का राजनीतिक आधार पर फैसला कर दिया जाना चाहिए था। इनके लिए कोई प्रमाण ढूंढ़ने की जरूरत नहीं थी। उपर्युक्त स्थलों पर खड़ी इमारतें स्वयं अपने इतिहास की प्रमाण थी। जरूरत केवल इस बात की थी कि उनके सत्य को स्वीकार किया जाता। भारतीय समाज ने स्वातंत्र्य आंदोलन काल में स्वतंत्रता के संघर्ष पर ध्यान केंद्रित किया। 1857 में बाबरी मस्जिद परिसर के बंटवारे और उसके बाहरी आंगन में राम की मूर्ति पूजा के लिए चबूतरे की स्थापना के बाद हिन्दू पूरे समय शांत रहा। उसने कोई हिंसक कार्रवाई नहीं की। 1885 में निर्मोही अखाड़े की तरफ से कानूनी स्तर पर मांग की गयी कि उसे चबूतरे पर एक पक्का मंदिर बनाने की इजाजत दे दी जाए (क्योंकि वहां केवल घास-फूस की टट्टी लगाकर- जो 5 फुट से अधिक उंची न हो- मूर्ति पूजा की इजाजत मिली थी), लेकिन शसन ने इस मांग को अस्वीकृत कर दिया। हिन्दू फिर चुप हो गये। शायद वे देश के स्वतंत्र होने की प्रतीक्षा में लग गये। उन्होंने मस्जिद पर अधिकार करने या घास फूस की छोटी-सी झोपड़ी (जिसमें सीधे खड़ा भी नहीं हुआ जा सकता था) को पक्का करने की भी कोशिश नहीं की। 1912 और 1936 में अयोध्या में जो दंगे हुए, वे भी मस्जिद पर कब्जे के लिए नहीं हुए, बल्कि रामनवमी के अवसर पर पड़ी बकरीद के अवसर पर वहां के डिप्टी कमिश्नर द्वारा मुसलमानों को गाय की कुर्बानी देने की इजाजत के विरोध में हुए। हां उसमें हमले का निशाना मस्जिद जरूर बनी। लेकिन इसकी सजा पूरी अयोध्या के हिन्दुओं को मिली। उनसे दंडात्मक कर वसूल कर मस्जिद के क्षतिग्रस्त गुम्बदों की मरम्मत करायी गयी।

हिन्दू समाज ने 15 अगस्त 1947 तक प्रतीक्षा की। मजहब के नाम पर देश बंटवारा हो गया। इसके बाद तो उसे पूरा भरोसा था कि अब तो उसका पुराना मंदिर स्थल अवश्य मिल जाएगा। लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब उसका धैर्य जवाब देने लगा। अयोध्या के हिन्दुओं ने एक नितांत शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया। मस्जिद में जाने वाले मुस्लिम मबूतरे वाले मंदिर के सामने से जूता पहनकर निकलते थे। तो सबसे पहले इसके खिलाफ आंदोलन श्ुरू हुआ। प्रशासन ने इस पर जूते बाहर उतारे जाने की व्यवस्था की। इसके बाद शासन का ध्यान आकृष्ट करने के लिए अयोध्या के साधु संत व गृहस्थ सबने सामूहिक रामचरित मानस पाठ का आयोजन श्ुरू किया। इस शांतिपूर्ण आंदोलन को किसी ने नोटिस नहीं किया। निर्मोही अखाड़े के रामचरण दास नाम के एक साधु ने मस्जिद को बम से उड़ा देने की योजना बनायी, लेकिन वह बम बनाते समय ही फट गया, जिससे न केवल वह योजना विफल हो गयी, बल्कि वह साध्ु भी अंधे हो गये। प्रशासन ने इसके बाद भी इस विवाद की ओर कोई ध्यान नहीं दिया, तो एक रात (22/23 दिसंबर 1949) को कुछ लोगों ने मिलकर राम की छोटी सी प्रतिमा मस्जिद के बीच वाले गुम्बद के नीचे स्थापित कर दी। मध्यरात्रि में वहां घंटा, घड़ियाल व शंख बजने लगे। -भये प्रगट कृपाला- की स्तुति होने लगी। कहा गया कि वहां मध्य रात्रि में 'रामलला' (बाल रूप भगवान राम) स्वयं प्रगट हो गये।

आखिर ऐसा क्यों करना पड़ा ? कारण स्पष्ट था। सरकार किसी तर्क, किसी इतिहास, किसी सांस्कृतिक भवना को मानने के लिए तैयार नहीं थी, किंतु आस्था के आगे झुकने को मजबूर थी। हिन्दू जानता है कि इस तरह कहीं मूर्तियां प्रकट नहीं होतीं। हिन्दू परंपरा स्वयं यह कहती आ रही हैं कि राम के बाद उनकी अयोध्या अब तक जाने कितनी बार उजड़ चुकी है। अयोध्या की पुनर्स्थापना की उसकी कहानी भी यही बताती है कि उसे नहीं पता था कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहां पैदा हुए थे, अयोध्या कहां थी। वह राजा विक्रमादित्य को इसका श्रेय देती है कि उन्होंने अयोध्या की खोज की और वहां 'शारंगिन विष्णु' (क्योंकि उस समय धनुर्धारी राम को विष्णु का अवतार माना जाता था) का मंदिर बनवाया। जाहिर है कि वह मंदिर स्थल भगवान राम के जन्म स्थान का माद्ध प्रतीक था, लेकिन हजारों साल पहले जो प्रतीक स्थापित हुआ था, उसका यदि आज भी सम्मान किया जाए, तो उसमें गलत क्या है।

1949 की इस घटना के बाद के सारे प्रशासनिक पत्राचार इसके प्रमाण हैं कि स्वतंत्र भारत की भी केंद्र व राज्य की सरकार जो इतिहास व जातीय स्वाभिमान के तर्क को नकारती आ रही थी- वह आस्था के दांव के आगे झुक गयी। उसने स्वयं वहां जबरिया चोरी से रात्रि में स्थापित प्रतिमा की पूजा अर्चना की व्यवस्था की और पूरे स्थल की सुरक्षा का भी प्रबंध किया। 1949 में जो कुछ हुआ वह कोई राजनीतिक षड्यंत्र नहीं था। वह शताब्दियों से आहत और पराजित हिन्दू मानस की एक अहिंसक प्रतिक्रिया थी। शासन को इधर ध्यान देना चाहिए था, लेकिन उसने इसकी उपेक्षा की, जिसकी स्वाभाविक परिणति दिसंबर 1992 में हुई। वह कभी न कभी होनी ही थी। संयोगवश वह 1992 में हो गयी।

अभी कुछ दिन पहले ही कानून व इतिहास के पंडित ए.जी. नूरानी द्वारा संपादित एक किताब 'बाबरी मस्जिद' प्रकाशित हुई। इसमें इस विवाद से जुड़ी घटनाओं तथा दस्तावेजों का बड़ा ही ब्यौरेवार संकलन दिया गया है। उनके निष्कर्षों को छोड़ दें, तो तथ्यों का इतना विस्तृत संकलन अन्यत्र दुर्लभ है। इसके अनुसार 1949 में मस्जिद में मूर्ति स्थापित किये जाने की घटना के बाद प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल, गवर्नर जनरल सी. राजगोपालचारी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत तथ अपने नजदीकी दोस्त के.जी. मशरूवाला सहित कई लोगों को लिखे अपने पत्र में इस घटना पर अपना गहरा क्षोभ व्यक्त किया था। दिसंबर 29, 1949 को पंत के नाम भेजे गये अपने एक टेलीग्राम में उन्होंने उसे एक 'खतरनाक उदाहरण' (डेंजरस इक्जाम्पल) बताया था, जिसके बड़े बुरे परिणाम (बैड कांसिक्वेंस ) होंगे। 5 मार्च 1950 को मशरूवाला को लिखे गये पत्र में नेहरू ने स्वीकार किया कि फैजाबाद जिले के अधिकारियों ने ठीक व्यवहार नहीं किया (मिस बिहैव्ड)। उन्होंने आगे यह भी लिखा कि यद्यपि पं. पंत ने बाद में कई अवसरों पर इस घटना की निंदा की, लेकिन उन्होंने इस पर कोई पक्की कार्रवाई करने से परहेज किया (हि रिफ्रेंड फ्राम टेकिंग डेफिनिट एक्शन)। 17 अप्रैल 1950 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम लिखे गये अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने लिखा कि -उत्तर प्रदेश मेरे लिए एक विदेशी भूमि होता जा रहा है। मैं देख रहा हूं कि जो लोग कभी कांग्रेस के स्तंभ थे, उनके भी दिलो

'दिमाग पर सांप्रदायिकता हावी होती जा रही है। यह पैरालिसस जैसा रोग है, जो फैलता जा रहा है, लेकिन (विडंबना यह है कि) रोगी इसे महसूस भी नहीं कर पा रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि कारण जो भी हों, या हो सकता है मात्र राजनीतिक कारणों से हम लोग इस बीमारी के प्रति बहुत अधिक नरमी बरत रहे हैं।'
कांग्रेस में वास्तव में सभी नेहरू नहीं थे। अयोध्या में मस्जिद के भीतर मूर्ति स्थापित किये जाने की खबर जब नेहरू को मिली, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि उसे वहां से हटाकर बाहर फेंक दिया जाए। उन्होंने गोविंद वल्लभ पंत को इसके लिए कहा भी और लिखा भी। पंत जी ने नेहरू के निर्देशों के अनुपालन में फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर को उस तरह का पत्र भी लिखा। जवाब में डिप्टी कमिश्नर के.के. नैयर ने भी पत्र लिखकर अपनी असमर्थता व्यक्त की। उन्होंने हिन्दू भावनाओं का हवाला देते हुए यथास्थिति बनाये रखने का समर्थन किया। पंत जी ने भी उसे मान लिया। केंद्रीय गृहमंत्री पटेल ने भी पंत को पत्र लिखा। मतलब यह कि कागजी खानापूरी हर स्तर पर हुई, किंतु मूर्ति हटाने की कार्रवाई किसी ने नहीं की। नेहरू खुद तो आकर उसे हटा नहीं सकते थे। इससे स्पष्ट है कि भले ही उस घटना के लिए अयोध्या के कुछ साधुओं और डिप्टी कमिश्नर के.के. नैयर को दोषी ठहरा दिया जाए, लेकिन सच्चाई यह थी कि कांग्रेस में भी नेहरू के अलावा और कोई नहीं था, जो मूर्ति हटाने का समर्थन करता।

इससे क्या अर्थ निकलता है ? क्या वे सब किसी राजनीतिक षड्यंत्र में शामिल थे? जी नहीं। के.के. नैयर के बाद में जनसंघ में शामिल हो जाने मात्र से यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि यह जनसंघ का षड्यंत्र था। यह वह व्यापक हिन्दू मानसिकता थी, जो मस्जिद पर खुद जाकर कब्जा करने का साहस तो नहीं कर सकती थी, लेकिन जैसे भी यदि किसी समूहने यह साहस कर दिखाया, तो फिर यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में स्थानीय ही नहीं, दिल्ली तक के प्रशासनिक नेता खड़े हो गये।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में तो न्यायमूर्ति अग्रवाल ने यहां तक लिखा है कि -इस मामले के फैसले में उपर्युक्त मूर्तिस्थापना की कोई कानूनी प्रासंगिता नहीं है। क्योंकि भगवान राम की 'जन्मभूमि' स्वयं में एक 'पूजाई प्रतिमा' (डीटी) के रूप में सारे न्यायिक अधिकारों से संपन्न है, क्योंकि हिन्दू विश्वास के अनुसार अज्ञातकाल से अनवरत निर्बाध उस स्थल पर पूजा होती आ रही है।'

यह इस देश की न्यायिक व्यवस्था का परिणाम है कि न्याय चाहने वाले व्यक्ति को कानूनी जरूरतें पूरी करने के लिए अनिवार्यतः झूठ बोलना पड़ता है। जिस देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला के 'मित्र' (नेक्स्ट फ्रेंड) के रूप में याचिका दायर की, उन्होंने देश के कानून का इस्तेमाल करने के लिए ही अपने को इस तरह प्रस्तुत किया। हाईकोर्ट में उनकी याचिका और उनके तर्क सर्वाधिक भारी पड़े, जिसके आधार पर रामलला को विवादित स्थल का एकमात्र केंद्रीय अधिकारी माना गया।

यहां कहने का आशय यह है कि उपलब्ध कानून के सहारे न्यायालय से न्याय प्राप्त करने के लिए इस तरह के झूठ और विश्वास का सहारा लेना पड़ता है। अब इस पर न्यायालय पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह एक राजनीतिक मसले को विश्वास का जामा पहनाकर फैसला लिख रहा है।

सच्चाई यह है कि अपवादों को छोड़कर यह पूरा देश दोहरे चरित्र वाला बन गया है और दोहरा जीवन जी रहा है। इसके लिए उसे मजबूर किया है इस देश् के संविधान व इस देश के कानून व इस देश की राजनीतिक व्यवस्था ने, जो केवल कहने को सेकुलर है, अन्यथा पूरी तरह धर्माश्रयी (रिलीजन पर आधारित) बन गयी।

आज जरूरत वास्तव में इस बात की थी कि इस मामले में सरकार स्वयं सामने आती और सभी धार्मिक (रिलीजन) व सांप्रदायिक पक्षकारों को अलग करके यह घोषित करती कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम भारत ही नहीं, पूरे सभ्य संसार के सर्वाधिक सम्मानित इतिहास पुरुष हैं। यदि वह कल्पित पुरुष हैं, तो भी उनके जैसा दूसरा चरित्र दुनिया में कोई नहीं। विश्व साहित्य में रामकथा जैसी व्यापकता दूसरे किसी मानवीय, दैवी या कल्पित पात्र को नहीं मिल सकती है। राम भरतीय संस्कृति के मूर्तमान स्वरूप हैं। उन्हें बाहर करके भरतीय संस्कृति का कोई मूल्य ही शेष नहीं बचता। ऐसे व्यक्तित्व को यदि सरकार भारत के राष्ट्र पुरुष के रूप में स्वीकार कर ले, तो इसमें दोष क्या है। राम किसी सांप्रदायिक नेता का तो नाम नहीं। वह तो पूरे विश्व की मनुष्यता के आदर्श पुरुष हो सकते हैं। इसलिए अयोध्या की विवादित भूमि जो इस समय सरकार के ही कब्जे में है, उस पर राम का ऐसा स्मारक बनवाती, जो किसी धर्म संप्रदाय के लिए वर्जित क्षेत्र न होता। राम के नाम पर होने वाली राजनीति यदि बंद करनी है, तो राम का सार्वभैमीकरण कर लिया जाना चाहिए और अयोध्या में उनका स्मारक बनाने का काम स्वयं अपने हाथ में ले लेना चाहिए।

हर वर्ष दशहरा या विजयदशमी को असत्यपर सत्य, अन्याय पर न्याय व अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है, क्या इस बार यह संकल्प नहीं लिया जा सकता कि इस दशहरा के पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट का जो फैसला आया है, उसके परिप्रेक्ष्य में संकीर्ण सांप्रदायिकता व दलीय स्वाथर्् को पराजित करके अयोध्या में एक सार्वभौम श्रीराम स्मारक का निर्माण किया जाए, जो पूरी विश्व मानवता के लिए आदर्श और भविष्य का पथप्रदर्शक हो।


17/10/2010