बुधवार, 4 नवंबर 2009

राजनीतिक लाभ के लिए हिंदी का विरोध

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने अब राज्य विधानसभा पर भी मराठी का डंडा घुमाना शुरू कर दिया है। उन्होंने सभी नवनिर्वाचित विधायकों को धमकी दी है कि यदि उन्होंने मराठी के अलावा और किसी भाषा में सदन की सदस्यता की शपथ ली तो फिर देख लेंगे कि सदन में उपस्थित उनके 13 विधायक क्या करते हैं। उनका कहना है कि सदन में केवल मराठी भाषा का व्यवहार होना चाहिए।राज्य विधानसभा में राज्य की भाषा का व्यवहार हो, इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन औपचारिक शपथ ग्रहण तक में इसकी बाध्यता को तो कतई लोकतांत्रिक करार नहीं दिया जा सकता। राज ने सदन में हिंदी तक के प्रयोग का निषेध किया है। उन्होंने हिंदी का विशेष तौर पर उल्लेख करते हुए उपर्युक्त चेतावनी दी है। हिंदी इस देश की राष्टï्रभाषा एवं राजभाषा है। किसी भी विधानसभा या केंद्र शासित प्रदेश में उसके प्रयोग का निषेध नहीं किया जा सकता। लोग स्वेच्छया मराठी का इस्तेमाल करें, यह अच्छी बात है, किन्तु किसी को बलपूर्वक हिंदी के प्रयोग से रोकना न केवल अलोकतांत्रिक, बल्कि एक तरह का राष्टï्र विरोधी कार्य है।इसे इस देश के संविधान व राजनीतिक प्रणाली की दुर्बलता ही कहा जाएगा कि ऐसे लोगों और उनके संगठनों को राजनीतिक मान्यता मिल जाती है और वे देश की विधायिकाओं में भी पहुंच जाते हैं, जिनका लोकतंत्र की सामान्य मर्यादाओं में भी कोई विश््वास नहीं है। अभी तक जम्मू-कश्मीर ही एक ऐसा राज्य था, जहां कोई विधायक स्वेच्छया हिंदी का इस्तेमाल नहीं कर सकता और यदि वह हिंदी में बोलना चाहता है, तो उसे इसके लिए स्पीकर से पूर्वानुमति लेनी पड़ती है, लेकिन अब महाराष्टï्र भी ऐसा राज्य बन जाएगा, जिसकी विधानसभा में दादागिरी के बल पर हिंदी का निषेध रहेगा।यहां यह उल्लेखनीय है कि महाराष्टï्र में यों भी सदन के भीतर मराठी का ही बोलबाला रहता है। बहुत कम लोग हिंदी और उससे भी कम लोग अंग्रेजी बोलते हैं, लेकिन राज ने यह धमकी देकर केवल यह जाहिर करने की कोशिश की है कि वह मराठी के एकमात्र अलम्बरदार हैं, बाकी सब मराठी विरोधी। वह अपने चाचा बाल ठाकरे के मराठावाद से भी आगे निकलना चाहते हैं। पिछले दिनों उन्होंने मराठावाद का जो हिंसक प्रदर्शन किया, उसका उन्हें चुनावों में जो शानदार प्रतिशाद मिला, उससे वह अब और अधिक उत्साहित हैं। ऐसा न होता, तो वह खुलेआम एक प्रेस कांफें्रस करके राज्य के 275 विधायकों को यह धमकी देने का साहस नहीं कर सकते थे।देश में यदि भाषा आधारित क्षेत्रीयताओं के आधार पर राज्यों का गठन किया गया है, तो वहां क्षेत्रीय राजनीति का उभरना या क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का पैदा होना स्वाभाविक है। बाल ठाकरे ने इस क्षेत्रीयता की भावना को भुनाकर ही अपना राजनीतिक आधार बनाया। लेकिन आज की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर किसी क्षेत्रीय दल को राष्टï्र विरोधी गतिविधियों की अनुमति तो नहीं दी जा सकती। क्या राज्य की कांग्रेस पार्टी इसका कोई प्रतिकार करेगी।

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

कश्मीर पर क्या कोई

सार्थक वार्ता संभव है?

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यह कहना सही है कि किसी भी समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता, लेकिन सवाल है कि कश्मीर जैसे मुद्दे पर क्या पाकिस्तान अथवा कश्मीरी अलगाववादियों के साथ कोई सार्थक बातचीत हो सकती है। अब तक के अनुभवोंं का निष्कर्ष केवल यह है कि इनके साथ वार्ता का केवल नाटक हो सकता है, जिससे दुनिया को बता सकें कि हम कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रयत्नशील हैं और फि र एक-दूसरे पर आरोप लगा सकें कि उनकी हठधर्मी के कारण वार्ता में कोई प्रगति नहीं हो पा रही है। हम मूल समस्या को बाजू रखकर परस्पर संबंध सुधारने का भी कई बार प्रयास कर चुके हैं, लेकिन उसमें भी कोई सफलता नहीं मिल सकी, क्योंकि पाकिस्तान तो संबंध सुधारना ही नहीं चाहता और भारत अपनी ओर से एकतरफा प्रयास करता रहता है।
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प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तथा गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा कश्मीर समस्या के समाधान हेतु बिना शर्त वार्ता की नई पेशकश ने राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर एक नई चर्चा शुरू कर दी है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने गत 13 अक्टूबर को श्रीनगर में कहा कि 'कश्मीर का इतिहास और भूगोल दोनों अनूठे व अद्वितीय है, इसलिए उसे एक अनूठे या अलग ढंग के समाधान की जरूरत है।उन्होंने यह भी कहा कि 'इस समस्या का जो भी समाधान हो वह राज्य के विस्तृत बहुमत को स्वीकार्य होना चाहिए... इस समस्या के राजनीति आयाम को हल करने के लिए नई दिल्ली सभी तरह की विचारधारा वाले लोगों से बातचीत करेगी। इसके बाद जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह घाटी में पहले रेलमार्ग का उद्घाटन करने के लिए वहां गये, तो अपनी दो दिन की यात्रा के समापन के अवसर पर गुरुवार 29 अक्टूबर को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में श्रीनगर में कहा कि जम्मू कश्मीर समस्या का समाधान ढूंढऩे की प्रक्रिया अब एक नये अध्याय में पहुंच गई है और आशा व्यक्त की कि उनके बातचीत के प्रस्ताव का उचित जवाब सामने आएगा। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार ने वायदा किया था कि वह सभी समस्याओं का शांतिपूर्ण समाधान हासिल करने का प्रयास करेगी। 'मैं समद्ब्राता हूं कि राज्य की शांति प्रक्रिया में एक नया अध्याय शुरू होने वाला है और हम लोग उसका पहला पन्ना पलट रहे हैं। हम समस्या के बाहरी और भीतरी दोनों आयामों का समाधान करेंगे। अनंतनाग में अनंतनाग काजीगुंड रेलमार्ग का उदघाटन करते हुए उन्होंने अलगाववादियों को बिना शर्त वार्ता की मेज पर आने का निमंत्रण दिया था। अपने उस प्रस्ताव को दोहराते हुए उन्होंने कहा हम प्रत्येक गुट के साथ गंभीर बातचीत करना चाहते हैं बस उनसे अपेक्षा यही है कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें । इसके पूर्व उस दिन सुबह सीमा सुरक्षा बल, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस, भारत तिब्बतन सीमा पुलिस तथा जम्मू कश्मीर पुलिस को संबोधित करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने की ज्यादा जिम्मेदारी पुलिस पर होनी चाहिए। उनका आशय साफ था कि राज्य में अर्धसैनिक बलों की भूमिका कम या समाप्त होनी चाहिए।चिदंबरम ने इसके पूर्व यह भी कहा था कि कश्मीर समस्या पर पर्दे के पीछे अनौपचारिक बातचीत चल रही है। अब उस गुप्त वार्ता के दौर के बाद खुली वार्ता के इस निमंत्रण से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि संबंधित गुटों के साथ बातचीत की कोई आधारभूमि तैयार हो गई है। लेकिन अब सवाल है कि क्या है वह आधारभूमि जिसके चलते इस तरह की खुली वार्ता का निमंत्रण दिया जा रहा है।यदि यह सब सरकार की कश्मीर संबंधी कूटनीतिक कवायद का हिस्सा है, तब तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि वास्तव में पर्दे के पीछे कोई सहमति की शिला तैयार हो रही है तो यह स्वभावत: पूरे देश की जिज्ञासा का विषय है कि आखिर किन आधारों पर मनमोहन सरकार कश्मीर समस्या का समाधान निकालने जा रही है।कश्मीर समस्या पर इतना कुछ लिखा जा चुका है और इतना सब बोला जा चुका है कि लिखे और बोले शब्दों का एक जंगल खड़ा हो गया है। कश्मीर समस्या पर भारत सरकार के अपने ही बदलते रुख के कारण और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। सवाल है कि कश्मीर के अलगाववादियों से भारत सरकार कौनसा समद्ब्राौता करना चाहती है। कश्मीरी अलगाववादियों का केवल एक एजेंडा है- भारत से अलगाव। और इस अलगाव का कारण भी और कुछ नहीं मात्र मजहब है।भारत सरकार कश्मीर के मामले में इतना कुछ खो चुकी है कि उसके पास खोने के लिए और बचा ही कुछ नहीं है। कश्मीर के महाराजा हरीसिंह ने जिस कश्मीर राज्य का विलय भारतीय संघ में किया उसका आधे से भी कम इलाका भारत के पास रह गया है। पाकिस्तान ने 1947 में हमला करके एक बड़े हिस्से को अपने कब्जे में कर लिया। जो हिस्सा कब्जे में लिया उसके एक छोटे हिस्से को 'आजाद कश्मीरÓ की संज्ञा दी और वहां राष्टï्रपति और प्रधानमंत्री की नियुक्ति करके दिखावा किया कि वह कश्मीर पर कब्जा नहीं करना चाहता, बल्कि उसे आजाद कराना चाहता है। और करकोरम पर्वत श्रृंखलावाले बड़े क्षेत्र (नक्शे में देखें) को केन्द्रीय शासन के अंतर्गत रख लिया । इसके ही एक टुकड़े को जिसे 'सक्षम घाटी के नाम से जाना जाता है, उसने चीन को दोस्ती के एवज में भेंट कर दिया। लद्दाख से जुड़े अक्साईचिन क्षेत्र को 1962 के युद्ध में चीन ने अपने कब्जे में कर लिया। अब भारत के पास जम्मू कश्मीर घाटी का करीब दो तिहाई और लद्दाख का क्षेत्र रह गया है। अंतर्राष्टï्रीय नक्शों में यह क्षेत्र भी भारतीय सीमा में नहीं दिखाया जाता।अभी दुनिया के पत्रकारों का एक दल, जिनमें भारतीय पत्रकार भी शामिल थे, चीन गया तो उन्हें चीन की कुछ प्रचार सामग्री दी गई, जिसमें चीन के दक्षिणी सीमावर्ती देशों में भारत, नेपाल, म्यांमार, जम्मू कश्मीर और पाकिस्तान का नाम गिनाया गया था। उसमें यह भी लिखा गया था कि इन सीमावर्ती देशों में म्यांमार, भारत, नेपाल, पाकिस्तान में संप्रभु सरकारें हैं, किन्तु जम्मू कश्मीर विवादग्रस्त है और वहां बाहरी फौजों का जमाव है। यहां यह ध्यान देने की बात है कि नक्शे में स्वतंत्र जम्मू कश्मीर के नाम से जिस राष्ट्र का जिक्र किया गया है वह भारतीय सीमा में शामिल जम्मू कश्मीर का ही क्षेत्र है। पाक अधिकृत कश्मीर का उसमें जिक्र नहीं है। उसे तो चीन ने पाकिस्तान का अंग मान लिया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के कब्जे में उतना ही कश्मीर नहीं है जिसे 'आजाद कश्मीर कहा जाता है, बल्कि उससे कहीं बड़ा उसका उत्तरी भाग है, जिसका कभी जिक्र तक नहीं होता। शायद इसलिए भी नहीं कि इस क्षेत्र में (गिलगिट-बाल्टिस्तान) में अमेरिका ने एक सैनिक अड्डïा बना रखा है।जम्मू कश्मीर की समस्या के जटिलतर होते जाने का एक सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि भारत सरकार ने हमेशा इस मसले को पर्दे में छिपाकर रखा। सच कहा जाए तो कश्मीर समस्या की जड़ भारत के उस स्वतंत्रता कानून (इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट) में ही पड़ गई थी, जिसे ब्रिटिश संसद ने 15 जुलाई 1947 को पारित किया था और जिस पर 18 जुलाई 1947 को महारानी की मुहर लगी थी। इस कानून के द्वारा ही भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य का विभाजन करके भारत और पाकिस्तान का निर्माण किया गया था। इस कानून के अनुच्छेद 7 (बी) के अंतर्गत भारत की सभी देशी रियासतों को ब्रिटिश सरकार के साथ हुई संधियों व समद्ब्राौतों से मुक्त कर दिया गया था। इसमें कश्मीर के महाराजा हरीसिंह के साथ ब्रिटिश सरकार का जो विशिष्टï समद्ब्राौता था, वह भी रद्द हो गया। इसके आधार पर यह भी कहा जाने लगा कि अब हरीसिंह का जम्मू कश्मीर पर शासन का अधिकार नहीं रहा।यह सभी को पता है कि जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया, तो उसके दबाव में हरीसिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय का निर्णय लिया और उसके बाद भारतीय फौजें कश्मीर में पाकिस्तानियों के मुकाबले के लिए उतरीं। यहां यह उल्लेखनीय है कि हरीसिंह ने उसी तरीके से भारत संघ में अपनी रियासत का विलय किया, जिस तरह अन्य देश की पांच सौ से अधिक रियासतों ने किया था, किन्तु हरीसिंह के हस्ताक्षरित दस्तावेज पर भारत के गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने लिखा कि 'जम्मू कश्मीर का भारत में यह विलय अस्थाई होगा और युद्ध समाप्ति के बाद जम्मू व कश्मीर की जनता के द्वारा पुष्टि के बाद ही इसे अंतिम माना जाएगा।सवाल उठता है कि ऐसी टिप्पणी माउंटबेटन ने क्यों लिखी। पं. नेहरू ने इसका विरोध क्यों नहीं किया। जम्मू-कश्मीर केवल एक रियासत या सामान्य जमीन का टुकड़ा भर नहीं था । उसका देश की सुरक्षा की दृष्टि से सामरिक महत्व भी था । लेकिन हमारे शासकों ने इस महत्व को नहीं समद्ब्राा। माउंटबेटन ने जो नोट लिखा था, उसके अनुसार पूरे जम्मू कश्मीर की जनता (यानी पाक अधिकृत कश्मीर सहित) द्वारा विलय की पुष्टिï की जानी थी, लेकिन युद्ध समाप्ति के बाद भी यह कभी संभव नहीं हो सका। माउंटबेटन की सलाह पर अनावश्यक रूप से नेहरू इस मसले को सुरक्षा परिषद में ले गये। सुरक्षा परिषद ने तुरंत युद्धविराम लागू करने और विलय के प्रश्न को तय करने के लिए पूरे कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का निर्देश दिया। यह भी संभव नहीं हो सका, क्योंकि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले क्षेत्र से सेना हटाने पर राजी नहीं हुआ। और सेना के हटे बिना जनमत संग्रह नहीं हो सकता था।यह कितना हास्यास्पद था कि कश्मीर की संविधान सभा, भारत की संविधान सभा से अलग बनी। इस संविधान को भारतीय संविधान की धारा 370 द्वारा मान्यता दी गई। कश्मीरी संविधान के अंतर्गत पाक अधिकृत कश्मीर के लिए विधानसभा में 25 सीटें निर्धारित हैं, जो अब तक खाली चली आ रही हैं। इस धारा 370 का ही प्रभाव है कि भारत की राष्ट्र भाषा या राजभाषा हिन्दी जम्मू कश्मीर में राजभाषा नहीं बन सकती। राज्य विधानसभा का कोई सदस्य अध्यक्ष (स्पीकर) से पूर्व अनुमति लिए बिना सदन में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता। कश्मीर की यह विशेष स्थिति क्यों बनायी गयी, इसका कोई तर्कसंगत जवाब किसी के पास नहीं है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के वार्ता के इस प्रस्ताव पर कश्मीर के अलगाववादी संगठनों की तरफ से जो प्रतिक्रियाएं हुई हैं वे भी ध्यातव्य है। प्राय: सभी ने वार्ता के इस प्रस्ताव का स्वागत किया है। पर्दे के पीछे वार्ता की कोशिश में लगे लोग इससे बहुत प्रसन्न हैं। उनका कहना है कि इस बार गृहमंत्री व पधानमंत्री दोनों की भाषा व श्ब्दावली अलग है। अलगाववादी गुटों के प्रमुख संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता मीर वायज उमर फारुक ने वार्ता का स्वागत करते हुए कहा है कि 'भारत, पाकिस्तान और कश्मीर की समस्या बातचीत के अलावा और किसी तरह से हल नहीं हो सकती। और भारत व पाकिस्तान की सरकारें यदि किसी समझौते तक पहुंचती हैं, तो इससे कश्मीरी जनता का ही नहीं उनकी अपनी जनता का भी फायदा होगा।क्या निहितार्थ है इस टिप्पणी के। मीरवायज साहब पहले से ही कश्मीर को भारत से अलग मान रहे हैं। बातचीत के द्वारा वे केवल यह चाहते हैं कि भारत उनको अलग देश के रूप में स्वीकार कर ले। कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अब तक तरह-तरह के कई फार्मूले आ चुके हैं। उसमें सबसे अधिक व्यावहारिक फैसला यह था कि वर्तमान नियंत्रण रेखा को ही भारत-पाकिस्तान के बीच की अंतर्राष्ट्रीय रेखा मान लिया जाए। 1971 के युद्ध के बाद हुए शिमला समझौते में भारत-पाक के बीच इसी फार्मूले पर सहमति बनी थी, लेकिन तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान वापस पहुंचने के बाद मुकर गये, क्योंकि उन्हें तो बंगलादेश के अलग हो जाने का बदला लेना था। भारत के नियंत्रण वाला कश्मीरी भू-भाग जब तक भारत के कब्जे से बाहर नहीं निकलता, तब तक पाकिस्तान को चैन कहां।इतना तो तय है कि किसी भी बातचीत से न तो चीन के कब्जे वाला 'आक्साईचिन भारत को वापस मिलने वाला है और न पाकिस्तान के कब्जे वाला 'गिलित बाल्टिक क्षेत्र व तथाकथित आजाद कश्मीर का क्षेत्र उसे मिलने वाला है। अमेरिका भी उसे पाकिस्तान से नहीं दिला सकता। फिर हमें बातचीत से क्या मिलने वाला है। बातचीत के माध्यम से हम कश्मीरी अलगाववादियों को थोड़ी और रियायत देकर या कश्मीर की स्वायत्तता का दायरा बढ़ाकर थोड़ी शांति खरीदना चाहते हैं। लेकिन इस तरह शांति मिलने वाली नहीं है। अलगाववादी तात्कालिक तौर पर थोड़ी उपलब्धि से संतुष्ट हो सकते हैं, क्योंकि वे कश्मीर की पूर्ण आजादी की तरफ कुछ कदम तो आगे बढ़े, लेकिन उसके बाद वे फिर आन्दोलन शुरू करेंगे। इस मामले में सच्चाई तो यह है कि यदि भारत पूरे जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र कर दे या उसे पाकिस्तान को सौंप दे, तो भी शंति कायम होने वाली नहींं है। क्योंकि लड़ाई जमीन की नहीं मजहब की है। यह मजहब का ही तकाजा है कि लीबिया के राष्टï्रपति कनेल गद्दाफी संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की दुनिया से अपील करते हैं। सऊदी अरब के प्रिंस तुर्क अल फैजल अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से अपील करते हैं कि वह भारत पर दबाव डालकर कश्मीर को स्वतंत्र कराये। यह मजहब का ही दबाव है कि इस्लामी देशों के संगठन (ओ.आई.सी.) ने कश्मीर को स्वतंत्रता दिलाने का प्रस्ताव पास किया, इसके लिए अपने इस्लामी दूत की घोषणा की, जो भारत मेंं मुस्लिम हितोंं की देखरेख करेगा।भारत सरकार से सबसे बड़ी शिकायत है कि अपने देश की जनता को भी कश्मीर के मामले मेंं विश्वास में नहीं ले रही है। आखिर उसकी दृष्टिï मेंं कश्मीर समद्ब्राौते का आधार क्या है। हम कश्मीर को पहले ही अपने से बहुत दूर कर चुके हैं। अब आगे और क्या करना चाहते हैं।प्रधानमंत्री की तरफ से वार्ता का प्रस्ताव आते ही 'हुर्रियत कांफ्रेंस तथा 'जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंटÓ के गुटोंं द्वारा यह मांग उठने लगी कि वार्ता के पहले जम्मू कश्मीर से सेना हटाई जाए। भारत सरकार ने 29 अक्टूबर को राज्य से 15000 सैनिकोंं को हटाने निर्णय लिया। यह उपर्युक्त अलगाववादी संगठनोंं को वार्ता के लिए आकर्षित करने के लिए किया गया।आखिर भारत सरकार सीधे-सीधे यह क्यों नहींं कहती कि वे हिंसा और अलगाववाद का रास्ता छोडऩे का वायदा करें, तो दिल्ली सरकार एक रात मेंं अपनी सारी फौज राज्य के भीतरी इलाकोंं से हटा लेगी। हम कश्मीर को पूर्ण स्वायत्तता देने के लिए तैयार हैं, लेकिन क्या वे भारतीय संविधान के अंतर्गत काम करने के लिए राजी हैं? यदि ऐसा नहींं है तो किसी भी तरह की वार्ता से क्या लाभ। 'जम्मू कश्मीर कौंसिल ऑफ ह्यïूमन राइटÓ के महासचिव डॉ. सैयद नजीर गिलानी ने पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वह कश्मीर के बारे मेंं यथास्थिति पर अटका न रहे, बल्कि चीन का रवैया अपनाए, यानी कश्मीर को एक अलग राष्ट्र मानकर व्यवहार करे, जिस तरह चीन कर रहा है।भारत सरकार बात करे। बात करने से किसी को एतराज नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री जी देश को कम से कम यह तो बताएं कि जम्मू कश्मीर के बारे में वह कौनसा नया अध्याय है, जिसका वह पन्ना पलटने जा रहे हैं। परस्पर विश्वास कायम करने के प्रयासों (कांफिडेंस बिल्डिंग मेजर) के तहत अब तक भारत ने कश्मीर में अपनी संवैधानिक तथा प्रशासनिक स्थिति को कमजोर किया है। क्या कहीं इस नये प्रयास से हम कश्मीर के पूर्ण अलगाव की नई शुरुआत तो नहीं करने जा रहे हैं ? सावधान रहें, कश्मीर का मसला केवल कश्मीर का नहीं है, वह पूरे भारत राष्ट्र से जुड़ा है। कश्मीर के साथ भारत की सांस्कृ तिक अस्मिता का ही नहीं सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा हुआ है।

2009 के नोबेल पुरस्कार विजेता

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वर्ष 2009 के नोबेल पुरस्कार विजेताओं में से कई नाम शायद आगे आने वाले वर्षों में लंबे समय तक याद किये जाते रहेंगे। भौतिकी के पुरस्कार विजेता 'द मास्टर्स ऑफ लाइटÓ तो पहले ही इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं, लेकिन मेडिसिन और रसायन के क्षेत्र में जो लोग सम्मानित किये गये हैं, उनकी उपलब्धियां भी ऐसी हैं कि उन्हें भी भुलाया नहीं जा सकेगा। गर्व की बात यह है कि इनमेें एक भारतीय नाम भी शामिल है। शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया नाम तो भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए चुना ही गया है, इसलिए वह तो भविष्य में चर्चा का विषय रहेगा ही, साहित्य के लिए चुनी गयी लेखिका भी शायद इसलिए याद की जाएगी कि कम्युनिस्ट त्रासदी का चित्रण करने के लिए नोबेल जैसा सम्मान पाने वाली शायद वह अंतिम लेखक या लेखिका होगी।

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ऑफ वर्ष 2009 के नोबेल पुरस्कारों की घोषण हो चुकी है। भौतिकी, चिकित्सा व रसायन में तीन-तीन लोगों को पुरस्कार में शमिल किया गया है। यह तीनों ही पुरस्कार निश््चय ही अपने क्षेत्र के श्रेष्ठïतम लोगों को दिये गये हैं, जिनकी खोजों ने मानवता को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया है या जिससे भविष्य में उल्लेखनीय लाभ पहुंच सकता है। साहित्य का पुरस्कार एक अल्पज्ञात जर्मन लेखिका को प्राप्त हुआ है, लेकिन उसे लेकर भी कोई विवाद नहीं है। हां, शांति का नोबेल पुरस्कार इस बार भी निश्चय ही विवाद का विषय बना है, लेकिन इस चयन के लिए उस स्वीडिश चयन समिति की सराहना की जानी चाहिए, जिसने वर्तमान की उपलब्धियों से अधिक भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर पुरस्कार के योग्य व्यक्ति का चयन किया है।भौतिकी (फिजिक्स) का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वैज्ञानिकों को 'द मास्टर्स आफ लाइटÓ की संज्ञा दी गयी है। इनमें शामिल हैं चाल्र्स कुएन काओ। शंघाई (चीन) में जन्में काओ की ही खोज का कमाल है कि आज अंतर्राष्टï्रीय संचार की गति इतनी तेज हो गयी है। स्टैंडर्ड टेली कम्युनिकेशन लेबोरेटरी (यू.के.) में कार्यरत काओ की सबसे बड़ी चिंता थ्ी कि प्रकाश को लंबी दूरी के संचार के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाए। ग्लास फाइबर रोशनी ले जा सकते हैं, यह तो पहले से पता थ, लेकिन पहले की स्थिति यह थी कि 20 मीटर जाने पर ही प्रकाश की 90 प्रतिशत क्षमता समाप्त हो जाती थी। पहले उन्होंने लक्ष्य रखा कि एक किलोमीटर तक प्रकाश को कैसे ले जाया जाए, लेकिन अब तो पूरी दुनिया का संचार इन ऑप्टिकल फाइबर केबिलों पर टिक गया है। ऑप्टिकल फाइबर इंटरनेट की तो रीढ़ है। वेब पेजज को लेना हो, ई-मेल करना हो, चैटिंग करनी हो या यू ट्ïयूब वीडियोज का आनंद लेना हो, यह सब ऑप्टिकल फाइबर के प्रकाश संचार बिना संभव नहीं था। और इन तारों से गुजरने वाली वीडियो छवियां (फोटोज) ज्यादा सीसीडी या उस जैसी डिवाइस से लैस कैमरों से आती हैं। फोटोग्राफिक फिल्में इसी कमाल के चलते इतिहास की वस्तु बन गयी हैं। मोबाइल फोन के कैमरे ही नहीं, हबल जैसे अंतरिक्ष में घूमने वाले विशाल कैमरों के शानदार चित्र भी इसी तकनीक से प्राप्त होते हैं। अंतरिक्ष यानों में लगे कैमरे भी सीसीडी आधारित ही होते हैं। आज करीब एक अरब किलोमीटर लंबी ऑप्टिकल फाइबर केबिल मानव की संचार सेवा में लगी हैं। इतनी बड़ी केबिल जिससे पूरी धरती को करीब 25 बार लपेटा जा सकता है।भौतिकी के पुरस्कार की आधी रकम अकेले काओ को दी गयी है। दसरे दो वैज्ञानिक हैं अमेरिका में जन्में और वहीं की बेल लेबोरेटरी में कार्यरत बिलियर्ड स्टर्लिंग बायल और जार्ज एलवुड स्मिथ। इन दोनों ने 'इमेजिंग सेंसरÓ सी.सी.डी. (चाज्र्ड कपल्ड डिवाइस) तैयार करने में कमाल दिखाया है। इनकी खोजों से ही यह संभव हुआ कि मोबाइल फोन में भी कैमरे आ गये। 'इलेक्ट्रॉनिक मेमोरीÓ को बेहतर बनाने तथा इलेक्ट्रॉनिक ढंग से फोटो लेने (इलेक्ट्रॉनिक कैप्चरिंग मेमोरी) में इन दोनों ने क्रांतिकारी भूमिका अदा की। पुरस्कार की आधी रकम इन दोनों में बराबर-बराबर बांटी गयी है।चिकित्सा विज्ञान (मेडिसिन एवं फिजियोलॉजी) का पुरस्कार भी तीन लोगों में बांटा गया है। ये तीनों अमेरिका में कार्यरत हैं, जिनमें दो महिलाएं हैं, जो अमेरिका में ही पैदा हुई हैं। इनमें एलेजाबेथ ब्लैकबर्न यूनिवर्सिटीकेलिफोर्निया में और कैरोल डब्लू ग्रेइडर बाल्टीमोर के जान हापकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में पढ़ाती हैं। तीसरे जैक डब्लू शेस्टाक की पैदाइश लंदन की है, लेकिन कार्यरत अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में हैं। यह रोचक है कि चिकित्सा में पहली दो महिलाओं को नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है।इनकी खोज भी बड़ी रोचक है। यह तो सभी जानते हैं कि कोशिकाएं जब विभाजित होती हैं, तो उनके गुण सूत्र (क्रोमोजोम) भी दो जोड़ों में विभाजित हो जाते हैं। लेकिन इन विभाजनों के दौरान कभी कोई गलती नहीं होती और वे खराब भी नहीं होते। इन तीनों ने यह पता लगाया कि गुण सूत्रों की प्रतिक्रति कैसे बनती है और कैसे उनसे कोई गड़बड़ी नहीं होने पाती। इन लोगों ने गुण सूत्रों के उस रसायन का पता लगाया, जो उनके विभाजन पर नजर रखता है। जैसे जूते के फीतों के सिरे पर प्लास्टिक की एक कैप लगी रहती है, जो उस सिरे को बिखरने से बचाए रखती है, वैसे ही गुण सूत्रों के सिरों पर एक रासायनिक संरचना होती है, जो पूरे गुण सूत्र पर नजर रखती है और उसके विभाजन को नियंत्रित करती है। यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है। इससे मनुष्य के वृद्ध होने के कारणों, कैंसर तथ स्टेम कोशिकाओं के बारे में और जानकारी जुटाई जा सकेगी। इससे मनुष्य के स्वस्थ दीर्घायुष्य के चिकित्सकीय उपाय किये जा सकेंगे। तीसरा रसायन का नोबेल पुरस्कार विज्ञान व मनुष्यता के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, यह भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले तीन वैज्ञानिकों में एक भारतीय नाम भी है। वेंकटरमन रामकृष्णन आज भले ही अमेरिकी नागरिक हैं, लेकिन भारत से उनके संबंध जीवित हैं। 1952 में तमिलनाडु के धार्मिक शहर चिदंबरम में जन्में रामकृष्णन ने विज्ञान में स्नातक (बी.एस.सी.) की उपाधि महाराजा सयाजीराव विश््ïवविद्यालय, बड़ौदा से प्राप्त की। अभी वह तीन वर्ष के ही थे कि तमिलनाडु से उनके पिता गुजरात के बड़ौदा में आ गये। उनके पिता सी.वी. रामकृष्णन व माता राजलक्ष्मी भी जैव वैज्ञानिक थे। वस्तुत: सी.वी. रामकृष्णन ने ही बड़ौदा की महाराज सयाजीराव यूनिवर्सिटी में 1955 में बायोकेमेस्ट्री डिपार्टमेंट की स्थापना की। इस समय सी.वी. रामकृष्णन सियेटेल में हैं, लेकिन वेंकटरमन के बड़ौदा और तमिलनाडु से संबंध अब भी बने हुए हैं। इसलिए उनकी उपलब्धि पर भारतीयों का भी गर्वित होना स्वाभाविक है। उनके साथ इस पुरस्कार में समान रूप से भागीदार दो अन्य वैज्ञानिकों में से एक अदा. इ. योनाथा इजरायल की हैं और वहीं की विजमन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस मेंजाता था। काम मुश्किल जरूर था, लेकिन इसकी राह दिखायी अदा.इ. योनाथा ने, फिर तो वेंकटरमन और स्टीट्ïज जैसे लगनशील वैज्ञानिकों ने इस कार्य को अंजाम तक पहुंचा दिया। इनतीनों कार्यरत हैं और दूसरे थामस ए. स्टीट्ïज अमेरिका के हैं और येल विश््ïवविद्यालय में कार्यरत हैं। इन तीनों ने एक ऐसे मुश्किल कार्य को कर दिखाया है, जिसे पहले प्राय: असंभव माना ने प्रकृति के एक ऐसे अज्ञात रहस्य को सुलद्ब्रााया है, जिसकी भविष्य में असीमित संभावनाएं हैं।प्रकृति में जितने जीव हैं -माइक्रोव्स, पौधे या जीव जंतु सभी 'रिबोजोमÓ पर निर्भर करते हैं। यह रिबोजोम प्रत्येक जीवित कोशिका का एक अनिवार्य एवं जटिल तत्व है। यह गुण सूत्रों पर स्थित 'जीनोंÓ में अंकित सूचनाओं (ब्लू पिं्रट) के आधार पर उन प्रोटिनों के निर्माण का कार्य करता है, जिन पर यह पूरा जीवन निर्भर है। वास्तव में यह रिबोजोम एक अत्यंत जटिल आणविक (मालिक्यूलर) मशीन है, जो सैकड़ों हजारों परमाणुओं से मिलकर बनी है। इन तीनों वैज्ञानिकों ने इस 'रिबोजोमÓ का परमाणविक मॉडल तैयार कर दिया। यानी यह बता दिया कि इसके हजारों हजार परमाणु कहां पर किस तरह स्थित है। इससे यह पता लगाने में मदद मिली की ये रिबोजोम कैसे इन असंख्य प्रोटीनों का निर्माण करते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि एंटीबायोटिक दवाइयां बैक्टीरिया की कोशिका के भीतर स्थित रिबोजोम पर ही हमला करते हैं। अब इस अध्ययन से यह भी पता चल गया कि एंटीबायोटिक कैसे काम करते हैं। इस रिबोजोम के परमाणुओं के स्थान का कैसे पता लगाया जाए, यह बड़ी समस्या थी। 1980 में योनाथा ने रिबोजोम की एक बड़ी इकाई का क्रिस्टल बनाने में सफलता प्राप्त की। इसका एक्स-रे 'स्नैपशॉटÓ लिया गया। यह रिबोजोम की गुत्थी सुलद्ब्रााने की दिशा में पहला कदम था। लेकिन दूसरा कदम उठाने में योनाथ को 20 वर्ष लग गये, जब एक एटम का चित्र लिया जा सका। वेेंकटरमन रामकृष्णन 'मेडिकल रिसर्च कौंसिल लेबोरेटरी ऑफ मालिक्यूलर बायोलॉजी, कैंब्रिजÓ (यू.के.) में कार्यरत थे। उन्होंने अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के एक पोस्ट डाक्टोरल फिलो के रूप में रिबोजोम पर काम करना शुरू किया। उन्होंने रिबोजोम की छोटी इकाईयों (स्मॉल सबयूनिट्ïस) की मैपिंग शुरू की। उन्होंने भी एक्स-रे की सघन किरणों (इंटेंस बीम ऑफ एक्स-रे) की मदद से यह काम शुरू किया। इस क्रम में उनकी एक सबसे महत्वपूर्ण खोज यह थी कि रिबोजोम जो भी प्रोटीन बनाता है, उसमें से प्रत्येक प्रोटीन केवल 20 एमीनो एसिड्ïस के विभिन्न संयोजनों द्वारा बनते हैं। इस बीच स्टीट्ïज ने यह खोज कर ली कि एक्स-रे फोटोज की व्याख्या कैसे की जाए या उसे समद्ब्राा कैसे जाए। उन्होंने यह भी पता लगा लिया कि दो एमीनो एसिड्ïस के बीच के रासयनिक संबंध कैसे बनते हैं। बस फिर क्या था। रिबोजोम का पूरा ढांचा सामने आ गया। इसके अलावा यह भी पता चला कि जीन में मौजूद सूचनाओं को पढ़कर रिबोजोम, जो प्रोटीन बनाते हैं, उसमें कोई गलती क्यों नहीं होने पाती। यदि कोई गलती होती भी है, तो वह एक लाख में कोई एक। रामकृष्णन ने इस तत्व की भी पहचान कर ली, जो इस बात पर निगरानी रखता है कि जीन में स्थित सूचनाओं को पढऩे व उसके अनुकूल प्रोटीन के निर्माण में कोई गलती न होने पाए। इस खोज की भविष्य में असीमित संभावनाएं हैं। तात्कालिक संभावना तो नई एंटीबायोटिक्स की डिजाइनिंग की है। बहुत से बैक्टीरिया कई एंटीबायोटिकों के अवरोधी बन गये हैं। उनके लिए भी नये एंटोबायोटिक तैयार हो सकते हैं। फिर जैव प्रोटीनों के निर्माण की विशाल दुनिया का यूं ही असीमित उपयोग हो सकता है।साहित्य का नोबेल पुरस्कार इस वर्ष रोमानिया की कम्युनिस्ट तानाशाही में जन्मीं जर्मन लेखिका हेर्ता मुलर को दिया गया है। रोमानिया के शासक निकोलई सिजेस्क्यू के दौर में वहां अल्पसंख्यक जर्मन समुदाय की क्या हालत थी, उनकी जिंदगी कितनी मुश्किलों से भरी थी, इसका अत्यंत सजीव चित्रण हेर्ता मुलर ने अपने साहित्य में किया है। स्वीडिश एकेडमी के स्थाई सचिव पीटर इंग्लैंड ने मुलर के अत्यंत संवेदनशील काव्य एवं उन्मुक्त गद्य की सराहना करते हुए कहा है कि लेखिका ने तत्कालीन रोमानिया में पिसते अल्पसंख्यक समुदाय के जीवन की विडंबनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।इस बार शांति पुरस्कार को लेकर सर्वाधिक विवाद खड़ा हुआ। स्व्यं वह व्यक्ति भी हैरान था, जिसे यह पुरस्कार मिला। अमेरिकी राष्टï्रपति बराक हुसैन ओबामा को उनके सेक्रेटरी ने सुबह के 6 बजे जगाकर यह सूचना दी कि उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है। वह यह सूचना पाकर चकित हो गये। बाद में उन्होंने मीडिया के सामने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मैं अपने को इस पुरस्कार के योग्य नहीं मानता। मेरी उनके साथ कोई बराबरी नहीं है, जिन्हें अपसे पहले यह पुरस्कार मिला है। फिर भी मैं यह सम्मान स्वीकार करता हूं। लोग यह पूछ रहे हैं कि ओबामा ने आखिर किया क्या है, जिसके लिए उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। अभी उनको अमेरिका का राष्टï्रपति पद संभाले भी मुश््िकल से दस महीने हुए हैं। उन्होंने बातें अवश्य अब तक बहुत की हैं, लेकिन उनकी उपलब्धि क्या है । बात किसी हद तक सही है, लेकिन पुरस्कार की चयन समिति के दृष्टिïकोण को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। अपने दस महीने के कार्यकाल में ओबामा ने जो संभावनाएं जगायी हैं, वे किन्हीं उपलब्धियों से कम नहीं हैं। ओबामा दूसरे अश््वेत अमेरिकी हैं, जिन्हें शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पहला नाम मार्टिन लूथर किंग जूनियर का, जिन्हें 1964 में 35 वर्ष की आयु में यह सम्मान दिया गया था। एक अश््वेत पूरे अमेरिका की श््वेत आबादी के दिलों पर कब्जा करके उनका समर्थन प्राप्त कर ले, यह अपने आप में एक उपलब्धि है। फिर ओबामा ने राष्टï्रपति पद संभालते ही सबसे पहले विश््व की मुस्लिम आबादी के साथ अमेरिका के मैत्रीपूर्ण संबंधों की शुरुआत की और यह संदेह दूर करने की कोशिश की कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष कोई इस्लाम के खिलाफ घोषित संघर्ष नहीं है। उन्होंने सत्ता हासिल करते ही इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की घोषणा की। पूर्व राष्टï्रपति बुश द्वारा यूरोप में मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली स्थापित करने की घोषणा के कारण रूस के साथ जो तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी थी, ओबामा ने उसे शांति किया और मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली कायम करने का निर्णय रद्द कर दिया। उन्होंने ईरान के साथ भी वार्ता की पहल की और उस पर मंडरा रहे अमेरिकी हमले के खतरों को दूर किया और ओबामा की सबसे अधिक प्रशंसनीय पहल जो थी, वह यह कि उन्होंने पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण का आह्वान किया। वह पहले अमेरिकी राष््ट्रपति हैं, जिन्होंने दुनिया को पूरी तरह परमाणु अस्त्रों से मुक्त करने का विचार सामने रखा है। यद्यपि यह सभी जानते हैं कि यह कार्य इतना आसान नहीं है, लेकिन अब तक पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण में सबसे बड़ी बाधा अमेरिका को ही माना जाता था, लेकिन अब अमेरिका ही इसका प्रस्ताव कर रहा है। वास्तव में विश््व के प्रति अमेरिकी दृष्टिïकोण विश््व शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ओबामा की अभी कोई उपलब्धि सामने नहीं है, लेकिन उनके शांतिपरक विचारों के कारण भविष्य की संभावनाएं बहुत अधिक हैं। यह नोबेल शांति पुरस्कार अब उनके ऊपर एक नैतिक दबाव का भी काम करेगा। उन्हें अपने को इसके अनुकूल सिद्ध करना होगा। संभव है इसके साये में वह शांति के लिए और बेहतर कार्य कर सकें।कुल मिलाकर इस वर्ष के सारे नोबेल पुरस्कार मानवता के श्रेष्ठïतम हित में दिये गये हैं। पुरस्कार हर वर्ष दिये जाते हैं और अपने-अपने क्षेत्र की श्रेष्ठïतम उपलब्धियों के लिए दिये जाते हैं। किंतु इस बार के सारे पुरस्कार ऐसे हैं, जिनका प्रत्यक्ष लाभ देखा जा सकता है।