मंगलवार, 3 नवंबर 2009

कश्मीर पर क्या कोई

सार्थक वार्ता संभव है?

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यह कहना सही है कि किसी भी समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता, लेकिन सवाल है कि कश्मीर जैसे मुद्दे पर क्या पाकिस्तान अथवा कश्मीरी अलगाववादियों के साथ कोई सार्थक बातचीत हो सकती है। अब तक के अनुभवोंं का निष्कर्ष केवल यह है कि इनके साथ वार्ता का केवल नाटक हो सकता है, जिससे दुनिया को बता सकें कि हम कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रयत्नशील हैं और फि र एक-दूसरे पर आरोप लगा सकें कि उनकी हठधर्मी के कारण वार्ता में कोई प्रगति नहीं हो पा रही है। हम मूल समस्या को बाजू रखकर परस्पर संबंध सुधारने का भी कई बार प्रयास कर चुके हैं, लेकिन उसमें भी कोई सफलता नहीं मिल सकी, क्योंकि पाकिस्तान तो संबंध सुधारना ही नहीं चाहता और भारत अपनी ओर से एकतरफा प्रयास करता रहता है।
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प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तथा गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा कश्मीर समस्या के समाधान हेतु बिना शर्त वार्ता की नई पेशकश ने राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर एक नई चर्चा शुरू कर दी है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने गत 13 अक्टूबर को श्रीनगर में कहा कि 'कश्मीर का इतिहास और भूगोल दोनों अनूठे व अद्वितीय है, इसलिए उसे एक अनूठे या अलग ढंग के समाधान की जरूरत है।उन्होंने यह भी कहा कि 'इस समस्या का जो भी समाधान हो वह राज्य के विस्तृत बहुमत को स्वीकार्य होना चाहिए... इस समस्या के राजनीति आयाम को हल करने के लिए नई दिल्ली सभी तरह की विचारधारा वाले लोगों से बातचीत करेगी। इसके बाद जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह घाटी में पहले रेलमार्ग का उद्घाटन करने के लिए वहां गये, तो अपनी दो दिन की यात्रा के समापन के अवसर पर गुरुवार 29 अक्टूबर को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में श्रीनगर में कहा कि जम्मू कश्मीर समस्या का समाधान ढूंढऩे की प्रक्रिया अब एक नये अध्याय में पहुंच गई है और आशा व्यक्त की कि उनके बातचीत के प्रस्ताव का उचित जवाब सामने आएगा। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार ने वायदा किया था कि वह सभी समस्याओं का शांतिपूर्ण समाधान हासिल करने का प्रयास करेगी। 'मैं समद्ब्राता हूं कि राज्य की शांति प्रक्रिया में एक नया अध्याय शुरू होने वाला है और हम लोग उसका पहला पन्ना पलट रहे हैं। हम समस्या के बाहरी और भीतरी दोनों आयामों का समाधान करेंगे। अनंतनाग में अनंतनाग काजीगुंड रेलमार्ग का उदघाटन करते हुए उन्होंने अलगाववादियों को बिना शर्त वार्ता की मेज पर आने का निमंत्रण दिया था। अपने उस प्रस्ताव को दोहराते हुए उन्होंने कहा हम प्रत्येक गुट के साथ गंभीर बातचीत करना चाहते हैं बस उनसे अपेक्षा यही है कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें । इसके पूर्व उस दिन सुबह सीमा सुरक्षा बल, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस, भारत तिब्बतन सीमा पुलिस तथा जम्मू कश्मीर पुलिस को संबोधित करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने की ज्यादा जिम्मेदारी पुलिस पर होनी चाहिए। उनका आशय साफ था कि राज्य में अर्धसैनिक बलों की भूमिका कम या समाप्त होनी चाहिए।चिदंबरम ने इसके पूर्व यह भी कहा था कि कश्मीर समस्या पर पर्दे के पीछे अनौपचारिक बातचीत चल रही है। अब उस गुप्त वार्ता के दौर के बाद खुली वार्ता के इस निमंत्रण से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि संबंधित गुटों के साथ बातचीत की कोई आधारभूमि तैयार हो गई है। लेकिन अब सवाल है कि क्या है वह आधारभूमि जिसके चलते इस तरह की खुली वार्ता का निमंत्रण दिया जा रहा है।यदि यह सब सरकार की कश्मीर संबंधी कूटनीतिक कवायद का हिस्सा है, तब तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि वास्तव में पर्दे के पीछे कोई सहमति की शिला तैयार हो रही है तो यह स्वभावत: पूरे देश की जिज्ञासा का विषय है कि आखिर किन आधारों पर मनमोहन सरकार कश्मीर समस्या का समाधान निकालने जा रही है।कश्मीर समस्या पर इतना कुछ लिखा जा चुका है और इतना सब बोला जा चुका है कि लिखे और बोले शब्दों का एक जंगल खड़ा हो गया है। कश्मीर समस्या पर भारत सरकार के अपने ही बदलते रुख के कारण और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। सवाल है कि कश्मीर के अलगाववादियों से भारत सरकार कौनसा समद्ब्राौता करना चाहती है। कश्मीरी अलगाववादियों का केवल एक एजेंडा है- भारत से अलगाव। और इस अलगाव का कारण भी और कुछ नहीं मात्र मजहब है।भारत सरकार कश्मीर के मामले में इतना कुछ खो चुकी है कि उसके पास खोने के लिए और बचा ही कुछ नहीं है। कश्मीर के महाराजा हरीसिंह ने जिस कश्मीर राज्य का विलय भारतीय संघ में किया उसका आधे से भी कम इलाका भारत के पास रह गया है। पाकिस्तान ने 1947 में हमला करके एक बड़े हिस्से को अपने कब्जे में कर लिया। जो हिस्सा कब्जे में लिया उसके एक छोटे हिस्से को 'आजाद कश्मीरÓ की संज्ञा दी और वहां राष्टï्रपति और प्रधानमंत्री की नियुक्ति करके दिखावा किया कि वह कश्मीर पर कब्जा नहीं करना चाहता, बल्कि उसे आजाद कराना चाहता है। और करकोरम पर्वत श्रृंखलावाले बड़े क्षेत्र (नक्शे में देखें) को केन्द्रीय शासन के अंतर्गत रख लिया । इसके ही एक टुकड़े को जिसे 'सक्षम घाटी के नाम से जाना जाता है, उसने चीन को दोस्ती के एवज में भेंट कर दिया। लद्दाख से जुड़े अक्साईचिन क्षेत्र को 1962 के युद्ध में चीन ने अपने कब्जे में कर लिया। अब भारत के पास जम्मू कश्मीर घाटी का करीब दो तिहाई और लद्दाख का क्षेत्र रह गया है। अंतर्राष्टï्रीय नक्शों में यह क्षेत्र भी भारतीय सीमा में नहीं दिखाया जाता।अभी दुनिया के पत्रकारों का एक दल, जिनमें भारतीय पत्रकार भी शामिल थे, चीन गया तो उन्हें चीन की कुछ प्रचार सामग्री दी गई, जिसमें चीन के दक्षिणी सीमावर्ती देशों में भारत, नेपाल, म्यांमार, जम्मू कश्मीर और पाकिस्तान का नाम गिनाया गया था। उसमें यह भी लिखा गया था कि इन सीमावर्ती देशों में म्यांमार, भारत, नेपाल, पाकिस्तान में संप्रभु सरकारें हैं, किन्तु जम्मू कश्मीर विवादग्रस्त है और वहां बाहरी फौजों का जमाव है। यहां यह ध्यान देने की बात है कि नक्शे में स्वतंत्र जम्मू कश्मीर के नाम से जिस राष्ट्र का जिक्र किया गया है वह भारतीय सीमा में शामिल जम्मू कश्मीर का ही क्षेत्र है। पाक अधिकृत कश्मीर का उसमें जिक्र नहीं है। उसे तो चीन ने पाकिस्तान का अंग मान लिया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के कब्जे में उतना ही कश्मीर नहीं है जिसे 'आजाद कश्मीर कहा जाता है, बल्कि उससे कहीं बड़ा उसका उत्तरी भाग है, जिसका कभी जिक्र तक नहीं होता। शायद इसलिए भी नहीं कि इस क्षेत्र में (गिलगिट-बाल्टिस्तान) में अमेरिका ने एक सैनिक अड्डïा बना रखा है।जम्मू कश्मीर की समस्या के जटिलतर होते जाने का एक सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि भारत सरकार ने हमेशा इस मसले को पर्दे में छिपाकर रखा। सच कहा जाए तो कश्मीर समस्या की जड़ भारत के उस स्वतंत्रता कानून (इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट) में ही पड़ गई थी, जिसे ब्रिटिश संसद ने 15 जुलाई 1947 को पारित किया था और जिस पर 18 जुलाई 1947 को महारानी की मुहर लगी थी। इस कानून के द्वारा ही भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य का विभाजन करके भारत और पाकिस्तान का निर्माण किया गया था। इस कानून के अनुच्छेद 7 (बी) के अंतर्गत भारत की सभी देशी रियासतों को ब्रिटिश सरकार के साथ हुई संधियों व समद्ब्राौतों से मुक्त कर दिया गया था। इसमें कश्मीर के महाराजा हरीसिंह के साथ ब्रिटिश सरकार का जो विशिष्टï समद्ब्राौता था, वह भी रद्द हो गया। इसके आधार पर यह भी कहा जाने लगा कि अब हरीसिंह का जम्मू कश्मीर पर शासन का अधिकार नहीं रहा।यह सभी को पता है कि जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया, तो उसके दबाव में हरीसिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय का निर्णय लिया और उसके बाद भारतीय फौजें कश्मीर में पाकिस्तानियों के मुकाबले के लिए उतरीं। यहां यह उल्लेखनीय है कि हरीसिंह ने उसी तरीके से भारत संघ में अपनी रियासत का विलय किया, जिस तरह अन्य देश की पांच सौ से अधिक रियासतों ने किया था, किन्तु हरीसिंह के हस्ताक्षरित दस्तावेज पर भारत के गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने लिखा कि 'जम्मू कश्मीर का भारत में यह विलय अस्थाई होगा और युद्ध समाप्ति के बाद जम्मू व कश्मीर की जनता के द्वारा पुष्टि के बाद ही इसे अंतिम माना जाएगा।सवाल उठता है कि ऐसी टिप्पणी माउंटबेटन ने क्यों लिखी। पं. नेहरू ने इसका विरोध क्यों नहीं किया। जम्मू-कश्मीर केवल एक रियासत या सामान्य जमीन का टुकड़ा भर नहीं था । उसका देश की सुरक्षा की दृष्टि से सामरिक महत्व भी था । लेकिन हमारे शासकों ने इस महत्व को नहीं समद्ब्राा। माउंटबेटन ने जो नोट लिखा था, उसके अनुसार पूरे जम्मू कश्मीर की जनता (यानी पाक अधिकृत कश्मीर सहित) द्वारा विलय की पुष्टिï की जानी थी, लेकिन युद्ध समाप्ति के बाद भी यह कभी संभव नहीं हो सका। माउंटबेटन की सलाह पर अनावश्यक रूप से नेहरू इस मसले को सुरक्षा परिषद में ले गये। सुरक्षा परिषद ने तुरंत युद्धविराम लागू करने और विलय के प्रश्न को तय करने के लिए पूरे कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का निर्देश दिया। यह भी संभव नहीं हो सका, क्योंकि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले क्षेत्र से सेना हटाने पर राजी नहीं हुआ। और सेना के हटे बिना जनमत संग्रह नहीं हो सकता था।यह कितना हास्यास्पद था कि कश्मीर की संविधान सभा, भारत की संविधान सभा से अलग बनी। इस संविधान को भारतीय संविधान की धारा 370 द्वारा मान्यता दी गई। कश्मीरी संविधान के अंतर्गत पाक अधिकृत कश्मीर के लिए विधानसभा में 25 सीटें निर्धारित हैं, जो अब तक खाली चली आ रही हैं। इस धारा 370 का ही प्रभाव है कि भारत की राष्ट्र भाषा या राजभाषा हिन्दी जम्मू कश्मीर में राजभाषा नहीं बन सकती। राज्य विधानसभा का कोई सदस्य अध्यक्ष (स्पीकर) से पूर्व अनुमति लिए बिना सदन में हिंदी में अपना वक्तव्य नहीं दे सकता। कश्मीर की यह विशेष स्थिति क्यों बनायी गयी, इसका कोई तर्कसंगत जवाब किसी के पास नहीं है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के वार्ता के इस प्रस्ताव पर कश्मीर के अलगाववादी संगठनों की तरफ से जो प्रतिक्रियाएं हुई हैं वे भी ध्यातव्य है। प्राय: सभी ने वार्ता के इस प्रस्ताव का स्वागत किया है। पर्दे के पीछे वार्ता की कोशिश में लगे लोग इससे बहुत प्रसन्न हैं। उनका कहना है कि इस बार गृहमंत्री व पधानमंत्री दोनों की भाषा व श्ब्दावली अलग है। अलगाववादी गुटों के प्रमुख संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता मीर वायज उमर फारुक ने वार्ता का स्वागत करते हुए कहा है कि 'भारत, पाकिस्तान और कश्मीर की समस्या बातचीत के अलावा और किसी तरह से हल नहीं हो सकती। और भारत व पाकिस्तान की सरकारें यदि किसी समझौते तक पहुंचती हैं, तो इससे कश्मीरी जनता का ही नहीं उनकी अपनी जनता का भी फायदा होगा।क्या निहितार्थ है इस टिप्पणी के। मीरवायज साहब पहले से ही कश्मीर को भारत से अलग मान रहे हैं। बातचीत के द्वारा वे केवल यह चाहते हैं कि भारत उनको अलग देश के रूप में स्वीकार कर ले। कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अब तक तरह-तरह के कई फार्मूले आ चुके हैं। उसमें सबसे अधिक व्यावहारिक फैसला यह था कि वर्तमान नियंत्रण रेखा को ही भारत-पाकिस्तान के बीच की अंतर्राष्ट्रीय रेखा मान लिया जाए। 1971 के युद्ध के बाद हुए शिमला समझौते में भारत-पाक के बीच इसी फार्मूले पर सहमति बनी थी, लेकिन तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान वापस पहुंचने के बाद मुकर गये, क्योंकि उन्हें तो बंगलादेश के अलग हो जाने का बदला लेना था। भारत के नियंत्रण वाला कश्मीरी भू-भाग जब तक भारत के कब्जे से बाहर नहीं निकलता, तब तक पाकिस्तान को चैन कहां।इतना तो तय है कि किसी भी बातचीत से न तो चीन के कब्जे वाला 'आक्साईचिन भारत को वापस मिलने वाला है और न पाकिस्तान के कब्जे वाला 'गिलित बाल्टिक क्षेत्र व तथाकथित आजाद कश्मीर का क्षेत्र उसे मिलने वाला है। अमेरिका भी उसे पाकिस्तान से नहीं दिला सकता। फिर हमें बातचीत से क्या मिलने वाला है। बातचीत के माध्यम से हम कश्मीरी अलगाववादियों को थोड़ी और रियायत देकर या कश्मीर की स्वायत्तता का दायरा बढ़ाकर थोड़ी शांति खरीदना चाहते हैं। लेकिन इस तरह शांति मिलने वाली नहीं है। अलगाववादी तात्कालिक तौर पर थोड़ी उपलब्धि से संतुष्ट हो सकते हैं, क्योंकि वे कश्मीर की पूर्ण आजादी की तरफ कुछ कदम तो आगे बढ़े, लेकिन उसके बाद वे फिर आन्दोलन शुरू करेंगे। इस मामले में सच्चाई तो यह है कि यदि भारत पूरे जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र कर दे या उसे पाकिस्तान को सौंप दे, तो भी शंति कायम होने वाली नहींं है। क्योंकि लड़ाई जमीन की नहीं मजहब की है। यह मजहब का ही तकाजा है कि लीबिया के राष्टï्रपति कनेल गद्दाफी संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की दुनिया से अपील करते हैं। सऊदी अरब के प्रिंस तुर्क अल फैजल अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से अपील करते हैं कि वह भारत पर दबाव डालकर कश्मीर को स्वतंत्र कराये। यह मजहब का ही दबाव है कि इस्लामी देशों के संगठन (ओ.आई.सी.) ने कश्मीर को स्वतंत्रता दिलाने का प्रस्ताव पास किया, इसके लिए अपने इस्लामी दूत की घोषणा की, जो भारत मेंं मुस्लिम हितोंं की देखरेख करेगा।भारत सरकार से सबसे बड़ी शिकायत है कि अपने देश की जनता को भी कश्मीर के मामले मेंं विश्वास में नहीं ले रही है। आखिर उसकी दृष्टिï मेंं कश्मीर समद्ब्राौते का आधार क्या है। हम कश्मीर को पहले ही अपने से बहुत दूर कर चुके हैं। अब आगे और क्या करना चाहते हैं।प्रधानमंत्री की तरफ से वार्ता का प्रस्ताव आते ही 'हुर्रियत कांफ्रेंस तथा 'जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंटÓ के गुटोंं द्वारा यह मांग उठने लगी कि वार्ता के पहले जम्मू कश्मीर से सेना हटाई जाए। भारत सरकार ने 29 अक्टूबर को राज्य से 15000 सैनिकोंं को हटाने निर्णय लिया। यह उपर्युक्त अलगाववादी संगठनोंं को वार्ता के लिए आकर्षित करने के लिए किया गया।आखिर भारत सरकार सीधे-सीधे यह क्यों नहींं कहती कि वे हिंसा और अलगाववाद का रास्ता छोडऩे का वायदा करें, तो दिल्ली सरकार एक रात मेंं अपनी सारी फौज राज्य के भीतरी इलाकोंं से हटा लेगी। हम कश्मीर को पूर्ण स्वायत्तता देने के लिए तैयार हैं, लेकिन क्या वे भारतीय संविधान के अंतर्गत काम करने के लिए राजी हैं? यदि ऐसा नहींं है तो किसी भी तरह की वार्ता से क्या लाभ। 'जम्मू कश्मीर कौंसिल ऑफ ह्यïूमन राइटÓ के महासचिव डॉ. सैयद नजीर गिलानी ने पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वह कश्मीर के बारे मेंं यथास्थिति पर अटका न रहे, बल्कि चीन का रवैया अपनाए, यानी कश्मीर को एक अलग राष्ट्र मानकर व्यवहार करे, जिस तरह चीन कर रहा है।भारत सरकार बात करे। बात करने से किसी को एतराज नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री जी देश को कम से कम यह तो बताएं कि जम्मू कश्मीर के बारे में वह कौनसा नया अध्याय है, जिसका वह पन्ना पलटने जा रहे हैं। परस्पर विश्वास कायम करने के प्रयासों (कांफिडेंस बिल्डिंग मेजर) के तहत अब तक भारत ने कश्मीर में अपनी संवैधानिक तथा प्रशासनिक स्थिति को कमजोर किया है। क्या कहीं इस नये प्रयास से हम कश्मीर के पूर्ण अलगाव की नई शुरुआत तो नहीं करने जा रहे हैं ? सावधान रहें, कश्मीर का मसला केवल कश्मीर का नहीं है, वह पूरे भारत राष्ट्र से जुड़ा है। कश्मीर के साथ भारत की सांस्कृ तिक अस्मिता का ही नहीं सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा हुआ है।

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