शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

साहित्यिक आयोजनों पर भी राजनीति की छाया


सलमान रश्दी : बिना आए ही छा गये पूरे साहित्यिक मेले पर


यद्यपि आजकल ऐसे किसी साहित्यिकसांस्कृतिक आयोजन की कल्पना करना कठिन है, जिसके भीतर या बाहर कोई राजनीति न हो, फिर भी जयपुर का इस वर्ष का साहित्यिक मेला तो सीधे चुनावी राजनीति की छाया तले हो रहा है। भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रश्दी को इस आयोजन में केवल इसलिए आने से रोकने का प्रयास किया गया कि इसका प्रभाव उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति पर प़ड सकता था।  विवादास्पद पुस्तक ‘द सैटनिक वर्सेज’ के लेखक रश्दी इस विवाद के बाद भी दो बार भारत आ चुके हैं। २००७ में तो वह जयपुर के इस साहित्यिक मेले में ही भाग लेने आए थे। मगर तब कहीं कोई आपत्ति नहीं ख़डी हुई। फिर इस बार ऐसा क्या है कि दारुल उलूम देवबंद के मुखिया मौलाना नोमानी कह रहे हैं कि रश्दी को भारत आने से रोका जाए और राजस्थान के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि रश्दी यदि आए, तो राज्य में कानून व व्यवस्था का संकट ख़डा हो सकता है।



भारतीय मूल के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ब्रिटिश लेखक सलमान रश्दी जयपुर के सातवें साहित्य मेले में शामिल हों या नहीं, लेकिन उनकी भारत यात्रा को लेकर देश के मुस्लिम कट्‌टरपंथियों द्वारा ख़डा किया गया विवाद और उस पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया ने प्राय: पूरी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा को गिराया है।
जयपुर का यह साहित्यिक मेला एशिया का अपने ढंग का सबसे ब़डा आयोजन है, जिसमें दुनिया भर के सैक़डों प्रतिष्ठित साहित्यकार व चिंतक भाग लेते हैं और हजारों की संख्या में दर्शक व श्रोता एकत्र होते हैं। भारतीय तथा दक्षिण एशियायी साहित्य व सोच के साथ विश्व साहित्य व सोच की साझेदारी का यह उत्सव अपने ढंग का अनूठा है।
इस उत्सव का महत्व इसलिए भी है कि यह एक ऐसे देश में आयोजित होता है, जहां मुक्त चिंतन तथा स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए पूरा अवकाश है, लेकिन अफसोस कि इस पर भी संकीर्णता, चुनावी राजनीति तथा तुष्टीकरण की सरकारी नीति अपनी काली छाया डालने में सफल हो गयी।
सलमान रश्दी दुनिया के बहुचर्चित व ख्यातिलब्ध साहित्यकार अवश्य है, लेकिन वे किन्हीं श्रेष्ठ साहित्यकारों में नहीं गिने जाते। सामान्य स्थिति में उनके आने न आने से इस साहित्यिक उत्सव पर कोई प्रभाव नहीं प़डने वाला था, लेकिन जिन कारणों से और जिस तरह से इस समारोह में उनका आना रोका गया, वह अवश्य ही अत्यंत गहरा प्रभाव डालने वाला है।
सलमान रश्दी अपने ‘मिडनाइट चिल्ड्रेन’ उपन्यास के लिए ‘बुकर प्राइज’ से सम्मानित हुए, लेकिन १९८८ में प्रकाशित अपने उपन्यास ‘द सैटनिक वर्सेज’ के लिए उन्हें पूरी दुनिया के मुस्लिम समुदाय के बीच निंदा का पात्र बनना प़डा। यह बात अलग है कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति में उनके इस विवादास्पद उपन्यास की भूमिका अधिक है। भारत में भी इस पर अब तक प्रतिबंध लगा हुआ है। इस उपन्यास के प्रकाशन के लगभग तुरंत बाद ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह खोमेनी ने उनकी मौत का फतवा जारी कर दिया। रश्दी को गुप्तवास में जाना प़डा।
ब्रिटिश सरकार ने उनकी सुरक्षा का विशेष प्रबंध किया। किसी तरह उनकी जान बची रही। १९९८ में ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी ने फतवे में कुछ ढील दी। उन्होंने उसे वापस तो नहीं लिया, लेकिन इतना जरूर कह दिया कि वह इसे कार्यान्वित करने पर जोर नहीं देंगे। इसके बाद रश्दी फिर सार्वजनिक जीवन में सामने आए और सामान्य जीवन जीना शुरू किया। अपने उपन्यास पर प्रतिबंध के बावजूद वह तबसे दो बार भारत की यात्रा पर भी आ चुके हैं।
पहली बार सन्‌ २००० में और फिर २००७ में। २००७ में तो वह इस जयपुर के साहित्यिक मेले में ही भाग लेने के लिए आए थे, लेकिन तब उनकी यात्रा का कोई विरोध नहीं हुआ। २००० की यात्रा के दौरान भी किसी ने उनके भारत आने पर सवाल नहीं उठाया। इसलिए कोई भी आश्चर्य कर सकता है कि फिर इस २०१२ के आयोजन में उनके भारत आने का विरोध क्यों किया गया और क्यों सरकार ने बिना कोई न नुकुर किये कट्‌टरपंथियों की इच्छा का सम्मान करना अपना कर्तव्य मान लिया।
२०१२ की खास बात यह है कि इस समय देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश जैसा राज्य भी है, जो जनसंख्या व राजनीतिक प्रभाव दोनों ही दृष्टियों से देश का सबसे ब़डा राज्य है और यहां मुस्लिम वोटों का खास महत्व है। राज्य के १८ प्रतिशत मुस्लिम कम से कम एक चौथाई विधानसभा सीटों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। अन्यत्र भी उनका प्रभाव नगूय नहीं कहा जा सकता। इसलिए भारतीय जनता पार्टी को छ़ोड कर प्राय: सारे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल मुस्लिम वोटों के लिए उनकी मनुहार में लगे रहते हैं। यों भारतीय जनता पार्टी भी मुस्लिम वोटों के लिए कम लालायित नहीं रहती, लेकिन वह करे क्या, देश का मुस्लिम समुदाय किसी भी तरह उस पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है।
इस राजनीति का ही चक्कर है कि देश के सर्वोच्च इस्लामिक प्रतिष्ठान दारुल उलूम देवबंद के मुखिया मौलाना अब्दुल कासिम नोमानी ने केंद्र के सामने यह मांग पेश कर दी कि सलमान रश्दी को भारत में प्रवेश न करने दिया जाए। उन्होंने मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया है, इसलिए उनका भारत आने का वीजा रद्‌द किया जाए और उन्हें जयपुर के साहित्य समागम में शामिल होने से रोका जाए।
इस मांग से सरकार सकते में आ गयी, लेकिन उसमें यह साहस नहीं है कि वह मौलाना नोमानी साहब से पूछे कि यदि सन्‌ २००० तथा २००७ में रश्दी के आने से भारतीय मुसलमानों को कोई तकलीफ नहीं हुई, तो अब ऐसा क्या हो गया कि उनकी यात्रा का विरोध किया जा रहा है। केंद्रीय विधि मंत्री तथा अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद ने केवल इतना कहा कि सरकार किसी कानून के तहत रश्दी को भारत आने से नहीं रोक सकती।
उन्हें भारत आने के लिए किसी वीजा की जरूरत नहीं, क्योंकि वह भारतीय मूल के हैं, इसलिए वीजा देने या रद्‌द करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। लेकिन मौलाना नोमानी इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनके अतिरिक्त कई अन्य मुस्लिम संगठनों तथा नेताओं ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया।
राजस्थान के अनेक मुस्लिम संगठनों ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से संपर्क किया और उन पर दबाव डाला कि यदि कांग्रेस मुस्लिम समुदाय का विश्वास हासिल करना चाहती है, तो उसे रश्दी को भारत आने से रोकना चाहिए।
अब इस संदर्भ में खबर है कि मुख्यमंत्री गहलोत ने इस मसले को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम से मुलाकात की और उनके सामने कानूनव्यवस्था बनाए रखने की समस्या पेश की। वास्तव में यह कानून व्यवस्था की समस्या उठाना कांग्रेस की अपनी कूटनीति का हिस्सा है। जब यह सवाल पैदा हुआ कि सलमान रश्दी को किस आधार पर जयपुर आने से रोका जाए, तो इसके अलावा कोई चारा नजर नहीं आया कि उनके आने से कानून व्यवस्था बिग़डने का मसला उठाया जाए और इसके आधार पर स्वयं रश्दी पर इस तरह का अनौपचारिक दबाव डाला जाए कि वे नाहक इस मेले का वातावरण खराब न करें और स्वयं भारत आने का अपना इरादा रद्‌द कर दें। इससे सरकार का काम भी बन जाएगा और उसके साथसाथ आयोजकों की भी इज्जत बच जाएगी।
आयोजक अंतिम क्षण तक यह कहते रहे कि उन्होंने रश्दी का आमंत्रण रद्द नहीं किया है। पत्रकारों को उन्होंने बताया कि वे यह तो नहीं कह सकते कि रश्दी आएंगे या नहीं, लेकिन उनका आमंत्रण रद्‌द नहीं किया गया है और रश्दी ने स्वयं इस बात की पुष्टि की है कि वह इस मेले में शामिल होंगे और इसके लिए उन्हें भारत सरकार से वीजा लेने की कोई जरूरत नहीं है।
आयोजकों ने केवल इतना स्वीकार किया कि रश्दी का २० जनवरी का उद्‌घाटन का कार्यक्रम टाल दिया गया है, क्योंकि राज्य के मुस्लिम संगठनों ने उस दिन मेला परिसर के समक्ष विरोध प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है। वास्तव में सरकार की तरह आयोजक भी अपना दोहरा चरित्र निभा रहे हैं, एक तरफ वे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी, सेकुलरिज्म तथा लेखकीय अधिकार के सम्मान की बात करते हैं, दूसरी तरफ वे देश के कट्‌टरपंथी संगठनों को भी संतुष्ट रखना चाहते हैं, इसलिए वे रश्दी का आमंत्रण रद्‌द करने से भी बच रहे हैं और सरकार के साथ इस कोशिश में भी लगे हैं कि रश्दी न आएं। उधर देश का, विशेषकर उत्तर प्रदेश का मुस्लिम तबका कांग्रेस की परीक्षा लेने में लगा है कि वह कहां तक झुक सकती है।
केंद्र में सत्ताऱूढ कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल गांधी की प्रतिष्ठा इस बार के उत्तर प्रदेश के चुनाव में पूरी तरह दांव पर लगी है। यद्यपि पार्टी के वरिष्ठ नेता बारबार यह साफ करते रहते हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणामों को किसी भी तरह २०१४ के आम चुनाव के संकेतक के तौर पर नहीं देखना चाहिए।
इसकी सफलता विफलता पार्टी के भविष्य से ज़ोडना उचित नहीं होगा। फिर भी राहुल गांधी ने जिस तरह अपनी पूरी शक्ति उत्तर प्रदेश में लगा रखी है, उससे मतदाताओं पर उनके प्रभाव का आकलन अवश्य किया जाएगा। राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश में पूरा दांव ही मुस्लिम वोट बैंक पर टिका हुआ है। वह जानते हैं कि दलित मायावती का साथ छ़ोडकर उनके साथ आने वाला नहीं । पिछ़डा वर्ग भी विभिन्न दलों के बीच बंटे रहने के लिए बाध्य है।
यही दशा सवर्ण जातियों की भी है। केवल मुस्लिम वर्ग ऐसा है, जो थोक में यदि कांग्रेस के पक्ष में आ जाए, तो कांग्रेस का भाग्य परिवर्तन हो सकता है। इसलिए राहुल गांधी मुस्लिम वर्ग की प्राय: हर मांग मानने के लिए तैयार हैं। उन्होंने मकतबों, मदरसों के लिए केंद्रीय सहायता ब़ढाने के साथ उन्हें केद्रीय कानूनों से बाहर रखने का भी आश्वासन दिया है। नौकरियों व शिक्षा में पिछ़डे मुस्लिमों को स़ाढे चार प्रतिशत आरक्षण दिलाने का भी वायदा किया है, जिसे उनकी पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री सलमान खुर्शीद ने ९ प्रतिशत तक ब़ढाने का भी आश्वासन दे दिया है।
इसके बावजूद भी अभी यह नहीं कहा जा सकता कि मुस्लिम समुदाय थोक में कांग्रेस को वोट देने के लिए तैयार हो जायेगा। आरक्षण का वायदा कुछ बहुत कारगर होने वाला नहीं। पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनावों में मुसलमानों को १० प्रतिशत आरक्षण देने का वायदा किया था, लेकिन मुसलमान उससे कतई प्रभावित नहीं हुए। मुसलमानों का एक ब़डा तबका अभी भी बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले को लेकर कांग्रेस से नाराज है। वह समझता है कि केंद्र में स्थित तत्कालीन कांग्रेस की सरकार के सहयोग के बिना वह मस्जिद नहीं गिर सकती थी।
उसे यह भी शिकायत है कि बाद में आने वाली केंद्र की कांग्रेस सरकारें भी ध्वंस के दोषियों को ठीक से सजा दिलाने में असफल रही हैं। केंद्र सरकार इसका भी यथासंभव इलाज करने में लगी है। उसने लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, बाल ठाकरे आदि के विरुद्ध बाबरी मामले में आपराधिक षडयंत्र (क्रिमिनल कांस्पिरेसी) के जिन आरोपों को रायबरेली की विशेष अदालत में रद्‌द कर दिया था तथा जिसकी हाईकोर्ट ने भी पुष्टि कर दी थी, उसे सीबीआई ने फिर से खोलने के लिए सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। वास्तव में केंद्र की कांग्रेस सरकार इस तरह यह सिद्ध करने में लगी है कि वह दोषियों को पूरी सजा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।
अब मौलाना नोमानी ने कांग्रेस की इसी निष्ठा की जांच के लिए रश्दी का मसला फिर से उछाला। कांग्रेस इस परीक्षा में भी विफल नहीं होना चाहती, इसलिए उसने गहलोत द्वारा कानून व्यवस्था का मामला उठवाया और उसके बहाने रश्दी पर दबाव बनाने की कोशिश की कि वह स्वत: भारत आने का कार्यक्रम रद्‌द कर दें, जिससे सरकार को किसी मोर्चे पर क्षति न उठानी प़डे।
मुस्लिम भावनाओं का भी सम्मान हो जाए और उसकी प्रगतिशीलता और सेकुलरवाद पर भी कोई आंच न आने पाए। और शायद वह यह कर दिखाने में सफल हो गयी है। अब यह बात दूसरी है कि उत्तर प्रदेश में उसे इसका कोई प्रतिदान मिलता है या नहीं।