शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

पाकिस्तान में आधुनिक लोकतंत्र संभव नहीं !


पाकिस्तान की वास्तविक सत्ता के प्रतिनिधि: सेनाध्यक्ष जनरल परवेज कयानी


पाकिस्तान इन दिनों एक गहरे राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। सेना और न्यायपालिका दोनों ने नागरिक शासन को अपना निशाना बना रखा है। प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी तानाशाही के मुकाबले लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन उनकी इस गुहार का केवल एक ही अर्थ है अपनी सत्ता को बचाना। लोकतंत्र केवल एक बहाना है, क्योंकि पाकिस्तान में वास्तविक अर्थों में लोकतंत्र की स्ािपना संभव ही नहीं है। अब तक पाकिस्तान में जितनी भी तथाकथित लोकतांत्रिक या नागरिक सरकारें रही हैं, वे मात्र दिखावे के लिए रही हैं, वास्तविक सत्ता तो सीधे सेना के ही हाथ में थी। आज भी स्थिति भिन्न नहीं है, लेकिन दिक्कत यह पैदा हो गयी है कि उसका यह मुल्लमा टूट गया है कि वह किसी लोकतांत्रिक देश की सेना है। अब यह जगजाहिर हो गया है कि वह वास्तव में उन जिहादी शक्तियों का ही प्रतिनिधित्व करती है, जो लोकतंत्र विरोधी हैं।

पाकिस्तान इस समय ब़डे गहरे राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसा संकट शायद उसके जन्म से अब तक पहले कभी नहीं आया था। सैनिक तख्ता पलट तो वहां के लिए आम बात है, इसलिए उसे किसी संकट में नहीं गिना जाता। उसके जीवन का सबसे ब़डा संकट १९७१ में आया था, जब पूर्वी पाकिस्तान उससे अलग हो गया था और उसकी गर्वीली सेना को भारत के हाथों अपमानित होना प़डा था, लेकिन उस समय भी पाकिस्तान में किसी राजनीतिक अराजकता का संकट नहीं था। मगर इस समय की स्थिति ब़डी अनूठी है।
पाकिस्तान के प्रशासनिक तंत्र में सेना का सदैव एक स्वतंत्र वर्चस्व रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मान्य धारणा है कि सेना को राजनीतिक नेतृत्व के अधीन रहकर उसके निर्देशानुसार काम करना चाहिए, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं रहा। वहां सदैव सेना सर्वोच्च रही और जब कभी राजनीतिक नेतृत्व जरा भी कमजोर प़डा या सेना के साथ उसका मतभेद ख़डा हुआ, तो फौरन बिना कोई विलंब किये सेना निर्वाचित राजनीतिक तंत्र को अपदस्थ करके सत्ता अपने हाथ में ले लेती रही है।
लेकिन इस बार सेना की राजनीतिक नेतृत्व के साथ भी ठनी हुई है, किंतु सेना नागरिक सत्ता का तख्तापलट करने की पहल नहीं कर रही है। सेना और नागरिक प्रशासन का इतना लंबा रग़डा इस देश में पहले कभी नहीं चला। सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कयानी के संयम पर सभी को आश्चर्य है, लेकिन लगता है वह कुछ अधिक चार्तुय का प्रदर्शन कर रहे हैं। वह जानते हैं कि उनकी सेना भले ही कितनी शक्तिशाली हो, लेकिन देश में उसकी प्रतिष्ठा गिरी हुई है। ऐबटाबाद में हुए अमेरिकी हमले में ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद उसकी क्षमता पर भी संदेह किया जाने लगा है।
अफगान युद्ध में अमेरिका का साथ देने के कारण उसकी नागरिक प्रतिष्ठा भी गिरी हुई है। देश के विपक्षी दल भी उसका समर्थन करने से दूर हैं। अमेरिका भी इस बार पाकिस्तान के राजनीतिक द्वंद्व में तटस्थ बना हुआ है। अब से पहले प्राय: हर सैनिक तख्तापलट को उसकी मौन स्वीकृति प्राप्त रहा करती थी। इसलिए जनरल कयानी ने इस बार दूसरी रणनीति अख्तियार की है। उन्होंने इस बार देश की न्यायपालिका को नागरिक प्रशासन के मुकाबले में ख़डा कर दिया है और स्वयं को लोकतंत्र का पूर्ण समर्थक सिद्ध करने का प्रयास किया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा भी है कि उनकी देश की राजनीतिक बागडोर अपने हाथ में लेने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। वह अपनी सीमाएं तथा लोकतांत्रिक शासन में अपनी भूमिका को अच्छी तरह समझते हैं।
यद्यपि इन शब्दों से यह अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि कयानी बिल्कुल लोकतंत्र के भक्त हैं और वह कभी किसी सैनिक तख्ता पलट के बारे में सोच ही नहीं सकते, क्योंकि जिस देश में किसी भी उच्चाधिकारी या राजनेता की किसी बात या किसी वायदे का कोई ठिकाना नहीं, वहां जनरल कयानी की बात पर ही भरोसा क्यों किया जाए, फिर भी उनकी बात से उनकी रणनीति का संकेत अवश्य मिलता है।
ऐबटाबाद में अमेरिकी सैनिक कार्रवाई के पहले तक पाकिस्तान की आंतरिक व्यवस्था में सब कुछ सामान्य था। सेना और नागरिक प्रशासन में पूरा तालमेल था, लेकिन इसके बाद से ही संतुलन बिग़डने लगा। इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान का पूरा शीर्ष नेतृत्व चौराहे पर नंगा हो गया। सारे नंगे एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप म़ढने लगे। अमेरिका का रुख भी बदलता नजर आने लगा। इसी बीच सलाला की सीमावर्ती चौकी पर नाटो के हेलीकॉप्टर हमले में २४ पाकिस्तानी सैनिकों की मौत ने पाक अमेरिका संबंधों को एकदम निचले धरातल पर ला दिया। राजनीतिक नेतृत्व और सेना के बीच तनाव और ब़ढा। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अपने को सर्वाधिक खतरे में अनुभव करने लगे। खबर आयी कि जरदारी साहब ने एक गुप्त संदेश भेजकर अमेरिका से गुहार की कि वह अमेरिकी सरकार तथा सेना से हर तरह का सहयोग करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते वह पाकिस्तानी सेना से उन्हें बचा ले।
उनका सीधा आरोप था कि पाकिस्तानी सेना उनका तख्ता पलट करना चाहती है। जरदारी की तरफ से अमेरिका को गुप्त ज्ञापन वाशिंगटन स्थित पाक राजदूत के माध्यम से शायद उनकी सलाह पर ही भेजा गया। इसकी पुष्टि अमेरिका के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी जनरल मुलेन ने भी की। मुलेन ने स्वीकार किया कि उन्हें ऐसा ज्ञापन मिला था, लेकिन उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इस गोपनीय संदेश (मेमो) के उजागर होने पर पाकिस्तान में जबर्दस्त हंगामा उठ ख़डा हुआ। इस मामले को ही मीडिया ने ‘मेमोगेट’ कांड की संज्ञा दी। इस ‘मेमोगेट’ कांड के सामने आने के बाद पाकिस्तान में एक नया अस्थिरता का दौर शुरू हो गया और तब से ही सैनिक तख्ता पलट की आशंका व्यक्त की जाने लगी। वाशिंगटन स्थित पाक राजदूत हक्कानी को अपना पद गंवाना प़डा, लेकिन मामला शांत होने के बजाए और उग्रतर होता गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी ‘मेमोगेट’ को नोटिस में लिया और पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने का आदेश दिया। एक तरफ उसने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी पर आरोप लगाया कि वह ईमानदार नहीं हैं। वह अपनी पार्टी के हितों को देश के संविधान से ऊपर तरजीह दे रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री को निर्देश दिया था कि वह राष्ट्रपति के पद पर विराजमान आसिफ अली जरदारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कराकर उस पर कार्रवाई शुरू करें, लेकिन गिलानी ने ऐसा कुछ नहीं किया।
यहां यह उल्लेखनीय है कि २००८ में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के साथ एक समझौते के तहत जरदारी सहित कई हजार लोगों को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त कर दिया था, किंतु पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को निरस्त कर दिया और जरदारी के खिलाफ जांच शुरू करने का सरकार को निर्देश दिया। न्यायालय ने गिलानी को यह चेतावनी भी दी कि वह उन्हें शासन करने के अयोग्य ठहराकर प्रधानमंत्री पद से हटा सकती है। वह राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री दोनों के खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम है। इसके साथ ही उसने मेमोगेट की जांच भी शुरू कर दी। सेनाध्यक्ष जनरल कयानी ने बिना सरकार को बताये या बिना उससे पूर्व अनुमति लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपना शपथ युक्त वक्तव्य पेश कर दिया।
प्रधानमंत्री गिलानी का इस पर बिफरना स्वाभाविक था। उन्होंने चीन के सरकारी मुख पत्र ‘पीपुल्स डेली’ के ऑन लाइन संस्करण को दिये गये अपने एक बयान में बताया कि सेनाध्यक्ष अशफाक परवेज कयानी तथा देश की सैन्य गुप्तचर एजेंसी आईएसआई के प्रमुख लेफ्टीनेंट जनरल शुजा पाशा ने बिना सरकार की पूर्व अनुमति लिए मेमोगेट के बारे में सर्वोच्च न्यायालय को अपना एकतरफा वक्तव्य देकर देश के संविधान का उल्लंघन किया है। इस पर जनरल कयानी ने ब़डी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी टिप्पणी है, जिसके लिए देश को बहुत गंभीर परिणाम झेलना प़ड सकता है। कयानी के इस तीखे बयान का जवाब प्रधानमंत्री गिलानी ने शब्दों से नहीं, बल्कि एक क़डी कार्रवाई से दिया।
उन्होंने कयानी के एक अत्यंत नजदीकी रहे प्रतिरक्षा सचिव (पूर्व लेफ्टीनेंट जनरल) नईम खालिफ लोधी को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया। लोधी पर ‘दुर्व्यवहार’ तथा ‘गैरकानूनी कदम उठाने’ का आरोप लगाया गया। लोधी प्रतिरक्षा विभाग में कयानी के अपने विश्वस्त आदमी थे।
उन्होंने अभी हाल में कहा था कि पाकिस्तान में सेना देश की नागरिक सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं है। इसके पहले शासन ने सेना की १११वीं ब्रिगेड के मुखिया को हटाने की कार्रवाई की। इस ब्रिगेड को पाकिस्तान में ‘तख्ता पलट ब्रिगेड’ के रूप में जाना जाता है। यह ब्रिगेड ही इस्लामाबाद व रावलपिंडी क्षेत्र की इंचार्ज है और अबसे पहले देश में जितने भी सैनिक तख्ता पलट हुए हैं, उनमें प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन तथा देश के टीवी व रेडियो जैसे संचार केंद्रों पर आधिपत्य जमाने की महती जिम्मेदारी इसी ब्रिगेड पर थी। इसलिए यदि इसे ‘तख्ता पलट ब्रिगेड’ कहा जाता है, तो इसमें काई आश्चर्य या अतिशयोक्ति की बात नहीं।
अब एक के बाद एक ताब़डत़ोड इतनी घटनाओं के बीच इस तरह की अटकलों का बाजार गर्म हो गया था कि अब कभी भी कुछ हो सकता है। यदि सेना के दूसरी पंक्ति के अधिकारियों पर राजनीतिक नेतृत्व की पक़ड मजबूत है, तो सेनाध्यक्ष कयानी व आईएसआई प्रमुख पाशा को बर्खास्त किया जा सकता है और नहीं तो कयानी और पाशा मिलकर बागडोर भी अपने हाथ में ले सकते हैं। राष्ट्रपति जरदारी एकाएक दुबई के लिए रवाना हो गये, तो इन अनुमानों को और बल मिला।
लेकिन जैसा अनुमान लगाया गया था, वैसा कुछ नहीं हुआ। प्रधानमंत्री की तरफ से इस बात का खंडन किया गया कि वे कयानी और पाशा को बर्खास्त करना चाहते हैं। कयानी ने भी संकेत दिया कि फिलहाल देश की राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में नहीं लेना चाहते। जरदारी भी मात्र एक दिन बाद ही दुबई से वापस इस्लामाबाद पहुंच गये और सारी तात्कालिक अटकलों को विराम लगा दिया।
प्रधानमंत्री गिलानी ने शुक्रवार को देश की ताजा राजनीतिक स्थिति पर विचार के लिए राष्ट्रीय असेम्बली की विशेष बैठक बुला रखी थी। इस बैठक में उन्होंने सारी ताजी स्थिति का ब्यौरा देते हुए कहा कि देश की सर्वोच्च राजनीतिक संस्था संसद को यह फैसला करना है कि वह देश में लोकतंत्र चाहती है या तानाशाही। उन्होंने कहा कि हमें देश का शासन चलाने के लिए विपक्ष का कोई सहयोग नहीं चाहिए, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा में विपक्ष की भी उतनी ही जिम्मेदारी है, जितनी की सत्ता पक्ष की। उन्होंने इस संदर्भ में सदन के सामने एक प्रस्ताव भी पेश किया, जिस पर सोमवार १६ जनवरी को मतदान होगा।
तो १६ जनवरी २०१२ को पाकिस्तान में दो महत्वपूर्ण फैसले होने वाले हैं, जिसके बाद ही देश की राजनीति का अगला चरण निर्धारित होगा। एक तो राष्ट्रीय संसद को लोकतंत्र के बारे में अपने संकल्प को व्यक्त करना है, दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय को भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के बारे में अपना फैसला देना है। सर्वोच्च न्यायालय की १७ सदस्यीय पूर्ण पीठ इस मामले में सुनवाई करके अपना फैसला देने वाली है। वह प्रधानमंत्री को न्यायालय की अवमानना का दोषी करार दे सकती है अथवा उन्हें सत्ता के अयोग्य सिद्ध कर सकती है। इसी तरह वह राष्ट्रपति जरदारी के खिलाफ आपराधिक मामले फिर से जीवित हो जाने के बाद उनकी भी पद पर बने रहने की योग्यता के बारे में वह अपना फैसला सुना सकती है।
खैर, कल इन दोनों सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाओं के निर्णय के बाद पाकिस्तान की राजनीति कौनसा रुख अख्तियार करती है, यह दीगर बात है। यह भी हो सकता है कि कोई स्पष्ट फैसला न आए और कठोर निर्णयों को टालने की कोशिश की जाए, क्योंकि इस बीच पर्दे के पीछे और आगे भी नागरिक शासन, सेना और न्यायपालिका के बीच टकराव टालने और सुलह सपाटे की भी कोशिशें चल रही हैं।
बीते शनिवार को प्रधानमंत्री गिलानी ने अपनी कैबिनेट की प्रतिरक्षा मामलों की समिति की बैठक बुला रखी थी, जिसमें प्रधानमंत्री के साथ विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार व गृहमंत्री रहमान मलिक सहित सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों व अफसरों के अतिरिक्त सेनाध्यक्ष जनरल कयानी, आईएसआई प्रमुख शुजा पाशा भी शामिल हुए। फिर भी इतना तो तय है कि पाकिस्तान अब फिर अपने पुराने संतुलन की स्थिति में नहीं आ सकता। वहां आज नहीं तो कल कुछ न कुछ उथलपुथल होनी ही है।
पाकिस्तान का सर्वोच्च न्यायालय प्राय: हमेशा ही एक कठपुतली की तरह काम करता रहा है। इस बार शायद पहली बार वह भी अपनी ताकत दिखाने पर आमादा है। यों इस बार भी उसे सेना की कठपुतली करार दिया जा सकता है, लेकिन पाकिस्तानी न्यायपालिका राष्ट्रपति मुशर्रफ के काल से ही जैसी सामाजिक व राजनीतिक सक्रियता दिखाता आ रहा है, उससे उसकी भी एक स्वतंत्र संवैधानिक पहचान बनी है। 

हां, यह देखना अवश्य रोचक है कि इस बार सर्वोच्च न्यायालय भी सेना के साथ है और दोनों ने मिलकर अपनी बंदूकें नागरिक शासन की तरफ तान रखी है, जिसके कारण नागरिक सत्ता नितांत प्रतिरक्षात्मक रुख अपनाने के लिए विवश है। शनिवार की उपर्युक्त बैठक में, तनातनी के वर्तमान दौर के बाद प्रधानमंत्री गिलानी और सेनाध्यक्ष कयानी पहली बार आमनेसामने मिले। उनके बीच वास्तव में क्या बातें हुई, यह तो ठीकठीक पता नहीं, लेकिन वर्तमान स्थिति दोनों के लिए ही बेहद चुनौतीपूर्ण बन गयी है।
यह सही है कि अब से १०१५ साल पहले की बात होती तो गिलानी के इस तरह के सीधे बयान के बाद कि सेनाध्यक्ष ने देश के संविधान का उल्लंघन किया है, अब तक तख्ता पलट हो गया होता। कोई पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष किसी प्रधानमंत्री की ऐसी टिप्पणी बर्दाश्त नहीं कर सकता था। लेकिन सेनाध्यक्ष कयानी ने संयम बरता। उन्होंने गत गुुरुवार को रावलपिंडी के सैनिक मुख्यालय पर अपने वरिष्ठ सैन्य कमांडरों के साथ बातचीत की, लेकिन उसके बाद अब तक कोई खास बयान नहीं दिया है।
शायद उनके ऊपर देश के मीडिया और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का भी दबाव है। बीते हफ्ते पाकिस्तानी मीडिया में यही सब छाया रहा और प्राय: सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने अपने संपादकीयों में अपील की कि इस बार कृपया सैनिक तख्ता पलट नहीं। पाकिस्तान के पिछले राजनीतिक इतिहास का आधे से अधिक का काल सैनिक तानाशाही के अंतर्गत गुजरा है, इसलिए मीडिया में एक तरफ से यह अपील छाई रही कि अब और नहीं। देश में लोकतंत्र को एक बेहतर मौका दिया जाना चाहिए।
लेकिन सवाल है कि क्या पाकिस्तान में वास्तव में लोकतंत्र चल सकता है? जवाब है जी नहीं। वहां लोकतंत्र का नाटक तो चल सकता है, लेकिन वास्तविक लोकतांत्रिक शासन नहीं। इस देश में जितने भी दिन लोकतंत्र रहा है, वह लोकतंत्र का नाटक ही रहा है, वास्तविक सत्ता तो उन दिनों में भी सीधे सेना के ही हाथों मेंं रही है। शायद किसी इस्लामिक देश में लोकतंत्र की गुंजाइश ही नहीं है। इस्लाम यों भी आधुनिक लोकतंत्र के खिलाफ है। जिस देश में वास्तविक आधुनिक लोकतंत्र कायम हो जाएगा, वहां इस्लाम अपनी अस्तित्व रक्षा नहीं कर पायेगा, क्योंकि आधुनिक लोकतंत्र की पहली शर्त है प्रत्येक नागरिक की वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा और उसका सम्मान। उसे किसी विश्वास के घेरे में बंधने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
किसी इस्लामी देश में यह संभव नहीं है। वहां कुछ अफवाहों को नजरंदाज किया जा सकता है, लेकिन एक अनिवार्य सामाजिक व राजनीतिक मूल्य के रूप में उसकी प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती। इसके अतिरिक्त प्रत्येक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेना नागरिक सत्ता के हाथ का औजार होती है, जिसका नागरिक आवश्यकताआें के अनुसार इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन किसी इस्लामी या तानाशाही व्यवस्था में यह नहीं चल सकता। इसलिए यह कल्पना करना आकाश कुसुम त़ोड लाने जैसा है कि पाकिस्तान में सेना नागरिक प्रशासन के अंतर्गत काम करेगी। वहां नागरिक शासन दिखावे के लिए भी तभी तक चल सकता है, जब तक वह सेना के निर्देशों के अनुसार चले। इसलिए प्रधानमंत्री गिलानी की लोकतंत्र बचाओ की अपील का इससे अधिक कोई अर्थ नहीं है कि देश में उनकी व आसिफ जरदारी की सरकार को चलने दो।
पाकिस्तान में फिर से प्रत्यक्ष सैनिक तानाशाही आ धमके, इसे रोकने का एक ही रास्ता है कि देश में तत्काल नये आम चुनाव की घोषणा की जाए। लेकिन इस तरह के चुनाव भी कितनी ही बार क्यों न करा लिये जाएं, देश की व्यवस्था ज्यों की त्यों रहेगी, उसमें कोई बदलाव नहीं आ सकता। सबसे अधिक जरूरी चीज है देश में आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना, जो वहां संभव नहीं है। फिर भी यदि किसी तरह देश की विभिन्न शक्तियों के बीच नये चुनाव कराने पर सहमति हो जाती है, तो वह देश के लिए शुभ ही होगा, क्योंकि उससे संभावित राजनीतिक अराजकता की स्थिति तो टल जाएगी। लेकिन पाकिस्तान में आज की स्थिति में यह भी कोई आसान काम नहीं। सबसे ब़डा सवाल तो यही ख़डा होगा कि जब तक चुनाव नहीं होते, देश में किसका शासन रहेगा ? क्या जनरल कयानी व देश की अन्य राजनीतिक शक्तियां यह चाहेंगी कि जरदारी और गिलानी की वर्तमान पीपीपी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) की सरकार के नेतृत्व में ही नए चुनाव हों। पाकिस्तान में नई उभरी राजनीतिक पार्टी ‘पाकिस्तान तहरीके इंसाफ’ के संस्थापक अध्यक्ष पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की नजर में वर्तमान संकट को टालने का इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं कि देश में नये चुनाव कराए जाएं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के बारे में उनका भी नजरिया साफ नहीं है।
पाकिस्तान के साथ ज़ुडी यह एक क़डवी सच्चाई है कि वह तभी तक एक देश के रूप में विद्यमान है, जब तक उस पर सेना का नियंत्रण कायम है। यदि सेना का राजनीतिक नियंत्रण हट जाए, तो उसके बिखरने में देर नहीं लगेगी। इस तथ्य को वहां के ज्यादातर राजनीतिक नेता भी समझते हैं, इसलिए वे लोकतंत्र के नाम पर अपनी सत्ता तो चाहते हैं, लेकिन व्यवस्था बदलने के खिलाफ हैं। इसलिए पाकिस्तान में आधारभूत बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं। तंत्र कोई सा रहे, लेकिन वर्चस्व सेना व जिहादियों का ही रहेगा। यह स्थिति भारत के नजरिये से वांक्षित नहीं हो सकती, लेकिन वहां अराजकता या बिखराव पैदा हो यह भी भारत के हित में नहीं है।
इसलिए हमें अपनी सीमाओं की बेहतर रखवाली करते हुए बस प्रतीक्षा करना चाहिए और देखते रहना चाहिए कि वहां आने वाले दिनों में किसकिस तरह के गुल खिलते हैं और वर्तमान तनातनी का क्या परिणाम निकलता है।