शनिवार, 14 जनवरी 2012

ईश्वरीय विधान, नैतिकता और वैज्ञानिक अनुसंधान
बंदरों की 6 अलग-अलग भू्रणें की कोशिकाओं को मिलाकर पहली बार बनाये गये बंदर। चिकित्सा क्षेत्र में इस प्रयोग की असीम संभावनाएं बतायी जा रही हैं।


वैज्ञानिक जीवन के रहस्यों के सूत्र खोजने में तेजी से आगे ब़ढ रहे हैं। प्रयोगशाला में वे एक से एक अनूठी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं। उन्होंने कृत्रिम कोशिका बना ली है, शुक्राणु बना लेने का भी दावा किया है। लक्ष्य एक ही है मनुष्य के जीवन को सुखकर बनाना, उसे रोगों से मुक्त करना और आनुवांशिक ग़डब़डयों को भी सुधार लेना। ब़ुढापा और मृत्यु को शाश्वत कहा जाता है, लेकिन दुनिया के तमाम वैज्ञानिक इसे पराजित करने की कोशिश में लगे हैं। जरा (ब़ुढापा) और मृत्यु को समाप्त शायद न किया जा सके, लेकिन उसे टाला तो जा ही सकता है। लेकिन इस अनुसंधान में भी अनेक बाधाएं हैं। कई तरह की नैतिक रुकावटें हैं। ईसाई सोच की परंपरा ने मनुष्य को एक विशिष्ट स्थान दे रखा है, सभी अन्य प्राणियों से ऊपर। इसलिए वह उसकी जन्ममृत्यु की प्राकृतिक प्रक्रिया में मनुष्य के हस्तक्षेप को ईश्वरीय विधान में हस्तक्षेप मानता है। वह मनुष्य की स्वास्थ्य रक्षा व प्राण रक्षा के उपायों की अनुमति तो देता है। इसके लिए मनुष्येतर प्राणियों के जीवन का भी उपयोग किया जा सकता है, किसी मनुष्य की प्राण रक्षा के लिए किसी दूसरे मनुष्य का उपयोग नहीं किया जा सकता, चाहे वह भ्रूण स्तर का ही क्यों न हो।







यद्यपि प्रत्यक्ष जीवन व्यवहार में हम देखते हैं कि थ़ोडे से कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों की रक्षा करने या उनकी तरहतरह की लालसा पूरी करने में हजारों लाखों लोग अपने प्राण गंवाते रहते हैं, अंगहीनता के शिकार होते हैं या बीमारियां आमंत्रित करते हैं, लेकिन चिकित्सा कार्य के लिए एक मानव प्रतिकृति (ह्यूमन क्लोन) बनाकर उसका उपयोग करने की भी वैधानिक अनुमति नहीं दी जा सकती। इसलिए वैज्ञानिक प्राय: अन्य प्राणियों पर अपने प्रयोग करते रहते हैं। नैतिकता के सवाल वहां भी उठते हैं, लेकिन उतनी तीव्रता से नहीं, जितने कि मनुष्य को लेकर किये जाने वाले प्रयोगों पर उठते हैं। यद्यपि यह सही भी है कि यदि आज किसी के स्वास्थ्य के लिए किसी गर्भस्थ भ्रूण का प्राण लेने या उसके अंगों के उपयोग की अनुमति दे दी जाए, तो कल इसका विस्तार किसी भी मनुष्य को किसी अन्य के लिए बलि देने तक हो सकता है, फिर भी जीवन के रहस्यों को समझने के लिए तो इसकी अनुमति देनी ही प़डेगी कि कोई एक साधारण सी कोशिका किसी विशिष्ट स्थिति में कैसे एक पूर्ण प्राणी में बदल जाती है। उसमें कोई विकृति कैसे आती है, बीमारियां क्यों उत्पन्न होती हैं तथा इसको रोकने या विकृत अथवा बीमार अंग को बदलने के लिए क्या किया जा सकता है। ईसाई परंपरा गर्भ समापन की अनुमति नहीं देती। अभी कुछ दिन पहले एक चर्च गर्भनिरोधक उपायों के भी खिलाफ था। ब़डे दबावों के बाद अभी वैटिकन ने गर्भ निरोधक उपायों के इस्तेमाल की अनुमति दी है, लेकिन गर्भ समापन की या गर्भस्थ भ्रूण के साथ किसी तरह के छ़ेडछ़ाड की इजाजत अभी भी नहीं है।
जबसे जेनेटिक इंजीनियरिंग का काम आगे ब़ढा है, तब से ये नैतिकता के सवाल अक्सर उठते रहते हैं कि क्या मनुष्य को जन्म मृत्यु के ईश्वरीय या प्राकृतिक विधान में हस्तक्षेप का अधिकार है ? पहली बर जब परखनली शिशु का प्रयोग किया गया, तो यह सवाल उठा, फिर जब पहली बार कृत्रिम ‘जीन’ के निर्माण की घोषणा हुई, तो भी यह सवाल उठा, फिर जब ‘एनिमल क्लोन’ पैदा करने का प्रयास सामने आया, तो भी इस सवाल को लेकर हंगामा ख़डा हुआ। ‘स्टेम सेल’ (ऐसी मास्टर कोशिका, जिससे शरीर का कोई भी अंग बन सकता है) प्राप्त करने के लिए प्रयोगशाला में भ्रूण की खेती करने की बात सामने आयी, तो भी यह सवाल पूरी तीव्रता के साथ ख़डा किया गया। अभी यह सवाल फिर ब़डी तेजी से उभर कर सामने आया, जब वैज्ञानिकों ने कई भ्रूणों की कोशिकाआें को मिलाकर एक प्राणी को जन्म देने की घोषणा की।
अभी इसी बीते हफ्ते यह घोषणा सामने आयी कि पहली बार अमेरिकी वैज्ञानिकों के एक दल ने विभिन्न भ्रूणों की कोशिकाआें को लेकर तीन बंदरों का निर्माण किया है। इन वैज्ञानिकों ने ६ भिन्न बंदरियों के गर्भस्थ भ्रूणों की कोशिकाआें को लेकर फिर उन्हें मिलाकर अन्य बंदरियों के गर्भ में स्थापित किया, जिससे तीन अनूठे बंदर पैदा हुए। इनके एक नहीं, दो नहीं, चार नहीं, १२ जैविक मांबाप है। ‘सेल’ नामक शोध पत्रिका के माध्यम से की गयी इस घोषणा में कहा गया है कि चिकित्सकीय अनुसंधान के क्षेत्र में इस उपलब्धि की असीम उपयोगिता है। वैज्ञानिक अभी तक केवल चुहियों पर इस तरह के प्रयोग करते रहे हैं। १९८४ में ब्रिटिश वैज्ञानिकों के एक दल ने बकरी और भ़ेंड के भ्रूणों को मिलाकर एक प्राणी को जन्म दिया था, जो भ़ेंड और बकरी का मिश्रण था। इस तरह के प्राणियों को गलती से उस तरह का संकर प्राणी नहीं समझ लेना चाहिए, जैसे घ़ोडे और गधे के संवरण से खच्चर पैदा होता है। खच्चर एक ही मांबाप की संतान होते हैं, जिनमें दोनों के गुण आ जाते हैं और वह मध्यवर्ती वर्ग का एक प्राणी बन जाता है। जबकि दो भिन्न भ्रूणों के संलयन से जो प्राणी जन्म लेता है, उसकी कोशिकाएं परस्पर मिलती नहीं।
वे साथसाथ मिलकर अंगों और ऊतकों (टिशूज) का निर्माण तो करती हैं, लेकिन अपना अलग अस्तित्व बनाए रखती हैं। इसलिए इस तरह के संयोग से बने प्राणी का जो अंग जिस भ्रूण की कोशिका से बनता है, उस अंग में उस भ्रूण के गुण ही रहते हैं। जैसे बकरी और भ़ेंड के दो भिन्न भ्रूणों से जो प्राणी बनाया गया उसमें भ़ेंड के भ्रूण से बने अंग भ़ेेंडों जैसे हैं और बकरी के भ्रूण से बने अंग बकरियों जैसे। उसकी देह पर भ़ेंडों के जैसे ऊन भी हैं और बकरियों के जैसे बाल भी। इस तरह से विकसित प्राणियों को ‘किमेरा’ नाम दिया गया है।
अभी इस पद्धति से जो तीन बंदर तैयार किये गये हैं, उनके नाम किमेरो, रोकू और हेक्स रखे गये हैं। उनके ऊतकों का निर्माण ६ विभिन्न भ्रूणों की कोशिकाआे से हुआ है। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि ये कोशिकाएं कभी परस्पर लीन नहीं होतीं, लेकिन वे साथसाथ रहकर ऊतकों तथा विभिन्न शरीरांगों का निर्माण करती हैं। इस प्रयोग में शामिल वैज्ञानिक सौख्रात मिताली पोव के अनुसार कई असफल प्रयोगों के बाद यह प्रयोग सफल हुआ। उन्होंने बताया कि किमेराज के माध्यम से भ्रूण में किसी विशिष्ट जीन की भूमिका तथा भ्रूण से प्राणी के पूर्ण विकास की प्रक्रिया को शायद बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
वैज्ञानिकों की सामान्य राय है कि मनुष्य की जीवन प्रक्रिया के हर अंग को चूहों और सुअरों के शरीर से ही नहीं समझा जा सकता। यदि ‘स्टेम सेल’ चिकित्सा पद्धति को प्रयोगशाला से चिकित्सालयों तक या चूहों से मनुष्यों तक पहुंचाना है, तो हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि उन्नत प्राणियों में इन आधारभूत कोशिकाआें (प्राइमेट सेल्स) की क्या भूमिका है। हमें इनका अध्ययन सीधे मनुष्य में करना होगा, मनुष्य के भ्रूणों में भी। लेकिन यहां हमें समझ लेना चाहिए कि मनुष्य का ‘किमेरा’ तैयार करने का कोई व्यावहारिक लाभ नहीं है। लेकिन भ्रूण स्तर पर उनका अध्ययन अवश्य उपयोगी है।
अभी तक हम जानते हैं कि स्टेम सेल्स की सहायता से क्षतिग्रस्त शारीरिक कोशिकाआें को दूसरी स्वस्थ उसके जैसी कोशिका से बदला जा सकता है। इससे उन रोगियों को जीवनदान मिल सकता है, जिनके रोग अब तक असाध्य समझे जाते हैं। जैसे ऱीढ की हड्‌डी में चोट पहुंचने के कारण जो लोग ‘पैरालाइज्ड’ हो जाते हैं वे फिर से सक्षम जीवन जी सकते हैं। पार्किंसन बीमारी से ग्रस्त रोगियों की मस्तिष्क की मृत कोशिकाएं पुन: सृजित की जा सकती हैं। लेकिन यह सब तभी संभव है, जब मानव भ्रूण पर भी खुले प्रयोग की सुविधा मिले।
मनुष्य निश्चय ही धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है लेकिन वह भी अपनी आधारभूत संरचना में अन्य प्राणियों जैसा ही एक प्राणी है। फर्क इतना ही है कि विकास क्रम में वह अन्य प्राणियों की अपेक्षा ऊंचे विकास स्तर पर पहुंच गया है। वह अन्य प्राणियों से भिन्न किसी संसार से नहीं आया है।
जैसेजैसे वैज्ञानिक समझ ब़ढ रही है, नईनई तकनीक का विकास हो रहा है, वैसेवैसे यह धारणा मिथ्या सिद्ध होती जा रही है कि किसी सर्वशक्तिमान परमात्मा ने मनुष्य को विशेष रूप से जन्म दिया और बाकी सृष्टि को उसके उपभोग के लिए बनाया, अथवा यह कि सृष्टि के हर प्राणी की रचना परमात्मा करता है या कि जीवन देना परमात्मा का काम है। जब तक मनुष्य को प्रकृति के रहस्यों यानी कि उसके नियमों का ज्ञान नहीं था, वह सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को किसी सर्वशक्तिमान सृष्टा या परमात्मा को जिम्मेदार मानता था। वैज्ञानिक विकास की शुरुआत ही इस धारणा को नकारने के साथ शुरू हुई। सृष्टि की हर क्रिया के पीछे प्रकृति के कुछ नियम सक्रिय हैं। जीवन भी इन नियमों और तज्जनित क्रियाआें का सहज परिणाम है। इनमें भी परिस्थितिगत भिन्नता के कारण कुछ असाधारण रचनाएं भी सामने आती रहती हैं। सृष्टि में ऐसे मनुष्यों की संख्या भी हजारों नहीं बल्कि लाखों में है, जिनमें एक साथ पुरुष और स्त्री दोनों के शरीरांग सम्मिलित हैं। ये गर्भ में ल़डकी और ल़डके के दो भिन्न भ्रूणों के मिल जाने के परिणाम है। वे अलगअलग ज़ुडवां संतान के रूप में जन्म लेते हैं, लेकिन किसी परिस्थितिवश यदि वे परस्पर लीन हो गये, तो प्राकृतिक ‘किमेरा’ की उत्पत्ति होगी।
प्रकृति में ऐसा बहुत कुछ होता रहता है, जो चमत्कारी प्रतीत होता है, लेकिन इनके कारणों की जानकारी हो जाने पर वह सहज हो जाता है। संतान ईश्वर की देन है, अब इस कथन का कोई अर्थ नहीं रह गया है। जब प्रयोगशाला में ‘स्टेम सेल’ से शुक्राणु (स्पर्म) का निर्माण हो सकता है, और इसी तरह अंडे (ओवम) का भी निर्माण हो सकता है और कृत्रिम गर्भाशय में बच्चा विकसित हो सकता है, तो फिर उसमें किसी दैवी शक्ति की भूमिका यों ही समाप्त हो जाती है। तो अगर हम किसी सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास करना ही चाहें, तो हम इस संपूर्ण सृष्टि को एक इकाई मानकर उसे परमात्मा का नाम दे सकते हैं। अन्यथा इससे परे किसी परमात्मा या उसके विधान की कोई कल्पना नहीं की जा सकती। चर्च या किसी मजहब के विश्वासों की रक्षा के लिए वैज्ञानिकों को उनके काम से रोकने का कोई औचित्य नहीं है। सृष्टि में मनुष्य श्रेष्ठ है तो अपने बुद्धिबल से और यह बुद्धिबल उसने हजारों लाखों वषा] के अध्यवसाय व प्राकृतिक संघातों से अर्जित किया है। वैज्ञानिक अपने अनुसंधानों से इस मानव जाति के विकास में ही लगे हैं। यह सही है कि इस प्रक्रिया में कुछ विनाशकारी तत्व भी जन्म ले रहे हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इनसे बचाव का साधन भी फिर उन वैज्ञानिकों के ही अगले विकास से संभव है। यह प्रक्रिया सदैव जारी रहनी है। विकास और विनाश दोनों ही अन्योन्याश्रित हैं। इनकी गति को धीमा या तेज तो शायद किया जा सकता है, किंतु उन्हें रोका नहीं जा सकता। कानूनी बंदिशें या ऱूढ नैतिकताएं मानवीय विकास यात्रा कभी न रोक सकी हैं, न रोक सकेंगी। इसलिए विकास पथ का अनुगमन करने के अलावा मनुष्यता के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है।