रविवार, 6 नवंबर 2011

भारत के विरुद्ध पाक-चीन गठजोड़
पाक जिहादियों की नजर में तीन दशक बाद भारत की स्थिति

भारत और अमेरिका के बढ़ते रिश्तों ने पाकिस्तान एवं चीन को और निकट ला दिया है। अब वे दोनों रणनीतिक साझीदार हैं। चीन और पाकिस्तान कतई स्वाभाविक दोस्त नहीं हो सकते। दोनों में कोई सैद्धांतिक समानता भी नहीं है। जाहिर है उनकी दोस्ती नितांत अवसरवादी तथा भारत और अमेरिका के विरोध पर आधारित है। अमेरिका से इन दोनों की कोई सीधी दुश्मनी नहीं है, लेकिन भारत का विकास इन दोनों को फूटी आंखों नहीं सुहा रहा है। इसलिए ये दोनों ही भारत को कमजोर और विखंडित करने की साजिश रचने में लगे हैं। कश्मीर को दोनों ने ही भारत को दबाने का सबसे बड़ा हथियार बना रखा है। खबर है चीन पाक अधिकृत कश्मीर में अपना एक सैनिक अड्डा कायम करने जा रहा है। यह अपने देश से बाहर किसी दूसरे देश में उसका पहला सैनिक अड्डा होगा।

भारतीय उपमहाद्वीप की यह सबसे बड़ी विडंबना है कि इस क्षेत्र के दो बड़े देश भारत और पाकिस्तान कभी एक साथ एक खेमे में नहीं रह सकते। शीत युद्धकाल में भारत ने सोवियत संघ या रूस से दोस्ती बढ़ाई थी, तो पाकिस्तान ने अमेरिका से। अब उस युग की समाप्ति के बाद जब भारत और अमेरिका निकट आ रहे हैं, तो पाकिस्तान, अमेरिका से दूर होता जा रहा है। यद्यपि अभी भी अमेरिका पाकिस्तान को छोड़ना नहीं चाहता, किंतु वह एक साथ दोनों से अपने संबंध अच्छे नहीं रख सकता। यद्यपि पाकिस्तान ने बहुत पहले अपने लिए अमेरिका का विकल्प तलाश लिया था, किंतु जब तक अमेरिका और उसके हित एक थे तथा वह अमेरिका का झंडाबरदार बना रहा, किंतु अमेरिका का झुकाव भारत की ओर बढ़ते ही उसने अपने विकल्प का दामन मजबूती से पकड़ना शुरू कर दिया। इधर अमेरिका और पाकिस्तान के हित भी आपस में टकराने लगे, तो पाकिस्तानी हुक्मरानों के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि अमेरिकी कोप से बचने के लिए वह अपने दूसरे विकल्प और अमेरिका के पक्के प्रतिस्पर्धी चीन की शरणागति प्राप्त करे। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति भी ऐसी है कि चीन बहुत पहले से इस फिराक में था कि पाकिस्तान उसकी झोली में आ जाए या पाकिस्तान में पांव फैलाने का उसे अवसर मिल जाए। वहां अमेरिका का वर्चस्व रहते तो उसके लिए यह संभव नहीं था, लेकिन यदि पाकिस्तानी हुक्मरान स्वयं अमेरिका के खिलाफ उसे अपने यहां आमंत्रित करने को तैयार हो तो फिर उसके लिए क्या पूछना।

पाकिस्तान के लिए चीन के साथ गठजोड़ सर्वाधिक सुखद है, क्योंकि चीन केवल अमेरिका का ही नहीं भारत का भी जबर्दस्त प्रतिद्वंद्वी है। वैसे अमेरिका के साथ तो उसकी केवल सम्मान की लड़ाई है, लेकिन भारत के साथ तो उसका रोज का रगड़ा है। अमेरिका इस समय दुनिया की सबसे बड़ी सामरिक व आर्थिक शक्ति है, इसलिए चीन की महत्वाकांक्षा उसे पछाड़कर स्वयं विश्व की प्रथम महाशक्ति बनना है। चीन की इस महत्वाकांक्षा में सबसे बड़ा बाधक भारत है। मान लें एशिया में भारत न होता, तो आज पूरा एशिया व अफ्रीका अकेले चीन के प्रभाव में होता और इस प्रभव क्षेत्र के बल पर वह अमेरिका को सीधे चुनौती दे सकता था। चीन का सीधे मुकाबला करने की शक्ति भारत के अलावा अन्य किसी देश में नहीं है। जनसंख्या की दृष्टि से केवल भारत चीन का मुकाबला कर सकता है। चीन जनसंख्या जहां बुढ़ापे की ओर अग्रसर है, वहां भारतीय जनसंख्या जवानी की ओर है। भारत की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी की आयु 35 वर्ष से कम है। भारत की यह जवानी 2050 तक बनी रहने वाली है। भारत में बुढ़ापे का दौर उसके बाद आएगा। चीन इस समय सामरिक क्षमता व आर्थिक विकास में भले ही भारत से आगे हो, किंतु भारत में इस समय आर्थिक विकास की क्षमता चीन के मुकाबले कहीं अधिक है। इसीलिए कहा जा रहा है कि 2013 के बाद भारतीय आर्थिक विकास की दर चीन की विकास दर को पीछे छोड़ देगी। एकदलीय तानाशाही के शासन में जकड़ा चीन अपनी क्षमता के शिखर पर है। उसके बाद ढलान का दौर आना ही है। इसलिए चीन हर तरह से भारत के विकास को, उसकी आर्थिक व सामरिक क्षमता को रोकना चाहता है, जिससे चीनी वर्चस्व लंबे समय तक बना रह सके।

पाकिस्तान का ही सपना भारत की विकास यात्रा को रोकना और संभव हो तो उसे विखंडन के दौर में पहुंचा देना है। भारत यदि अपनी एकता बनाए रखता है, तो उसके विकास रथ को रोक पाना लगभग असंभव है। इसलिए पाकिस्तान दशकों से इस रणनीति पर काम कर रहा है कि कैसे भारत को तोड़ने का उपाय किया जाए। उसके पास इसका एक ही उपाय है- सांप्रदायिक अलगाववाद को तेज करना। इसीलिए उसने कश्मीर पर अपनी पूरी शक्ति लगा रखी है। चीन और पाकिस्तान दोनों का लक्ष्य है भारत को घेर कर उसे कमजोर करना और इस प्रकार न केवल एशिया पर अपना पूर्ण प्रभुत्व कायम करना, बल्कि अमेरिका को भी उत्तरी अमेरिका से बाहर केवल पश्चिमी यूरोप तक सीमित करना। चीन और पाकिस्तान दोनों बहुत दूर की कौड़ी पर नजर गड़ाएं हैं। दोनों इस ख्याल में हैं कि मुस्लिम जगत तथा एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देश यदि एक सूत्र में बंध जाएं, तो अमेरिका और उसके साथी यूरोपीय देशें को दुनिया की चौधराहट की गद्दी से नीचे उतारा जा सकता है। चीन अभी इस प्रलोभन में बहुत गहरे फंसा हुआ है। यह तय है कि यदि कभी ऐसी स्थिति कायम भी हो गयी, तो उसके बाद पहला संघर्ष स्वयं चीन और इस्लामी विश्व के बीच खड़ा होगा। क्योंकि चीन और पाकिस्तान अथवा चीन व इस्लामी विश्व के बीच कोई स्वाभाविक या सैद्धांतिक मैत्री नहीं है। दोनों के संबंध केवल स्वार्थ के अवसरवादी संबंध हैं, इसलिए अवसर निकलते ही दोनों के बीच संघर्ष छिड़ना अनिवार्य है। चीन तब निश्चय ही अपने किये पर पश्चाताप करेगा, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी रहेगी और उसे मदद करने वाला कोई शेष नहीं रहेगा।

अफगानिस्तान के मुद्दे पर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ी तनातनी के कारण चीन को पाकिस्तान में और गहराई तक जगह बनाने का अनायास ही एक स्वर्णिम अवसर मिल गया है। पाकिस्तान स्वयं चीन को अपने क्षेत्र में सैनिक अड्डे कायम करने के लिए आमंत्रित कर रहा है। ताजा खबरों के अनुसार पाकिस्तान ने चीन से अनुरोध किया है कि वह ग्वादर /ब्लूचिस्तान/ में जो बंदरगाह तैयार कर रहा है, उसे एक नौसैनिक अड्डे की तरह विकसित करे। चीन स्वयं इसे नौसैनिक अड्डे के रूप में विकसित करने का इच्छुक है, किंतु इसके पहले वह उत्तरी पाकिस्तान के कबायली इलाके में अपना एक सैन्य शिविर कायम करना चाहता है। चीन की नजर उत्तरी पाकिस्तान के केंद्र शासित क्षेत्रों ‘फाना‘ (फेडरल एडमिनिस्टर्ड नार्दर्न एरिया) पर है। यह इलाका चीन के मुस्लिम बहुल झिनजियांग प्रांत से लगा हुआ है, जहां इस्लाम विद्रोही चीन की नाक में दम किये हुए हैं। पाकिस्तान के एक पत्रकार व लेखक अमीर मीन ने ‘एशिया टाइम्स ऑनलाइन‘ पर लिखा है कि चीन पाकिस्तानी जिहादी संगठनों का झिनजियांग प्रांत से संबंध तोड़ने के लिए इस क्षेत्र में सैनिक अड्डा कायम करना चाहता है। पाक अधिकृत कश्मीर का यह इलाका चीनी कब्जे वाले कश्मीरी इलाके से भी लगा हुआ है। इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व भी अद्वितीय है। यहां से भारत, पाकिस्तान व अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र और पश्चिमी मध्य एशिया पर नजर रखी जा सकती है। अमीर मीर ने लिखा है कि चीनी झिनजियांग प्रांत में इस समय अलकायदा पोषित दो इस्लामी संगठन ‘ईस्ट तुर्कमेनिस्तान इस्लामिक मूवमेंट‘ और ‘तुर्किस्तानी इस्लामी पार्टी‘ तेजी से सक्रिया हैं। इन्हें हथियारों तथा प्रशिक्षण की पूरी सहायता पाकिस्तान से प्राप्त होती है। इस क्षेत्र के उइगर कबीले के लोगों ने - जिन्होंने हजारों वर्ष पहले इस्लाम कुबूल कर लिया था- चीन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद कर रखा है। चीनी रक्षा मंत्री लियांग गुआंगली के अनुसार इन इस्लामी उइगर विद्रोहियों पर नियंत्रण् के लिए यह आवश्यक है कि उनका पाकिस्तान के जिहादी संगठनों के साथ संपर्क काट दिया जाए। चीन की यों भी उत्तरी पाकिस्तान के गिलगित व बल्टिस्तान क्षेत्र में विशेष रुचि है, क्योंकि ये इस क्षेत्र के सर्वाधिक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थल है। पाकिस्तान की प्राथमिकता ग्वादर को नौसैनिक अड्डे के रूप में विकसित करने की है, जबकि चीन उसके साथ ही उत्तरी पाकिस्तान में अपना सैन्य अड्डा कायम करना चाहता है।

अभी एक अमेरिकी रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन भारत को सबक सिखाने या उस पर अपनी सैनिक क्षमता का दबदबा कायम करने के लिए कारगिल की तरह का घुसपैठ कर सकता है। ‘भारत-चीन संघर्ष के बारे में विचार‘ शीर्षक इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि चीन और भारत के बीच जैसी तनातनी चल रही है, उसमें कारगिल जैसे सीमित युद्ध की प्रबल संभावना है। यह संघर्ष पूरी सीमा के किस इलाके में हो सकता है, इसके बारे में उपर्युक्त रिपोर्ट में कोई संकेत नहीं है, किंतु अनुमान है कि यह अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में अथवा पश्चिमोत्तर क्षेत्र में लद्दाख या कश्मीरी नियंत्रण् रेखा के निकट किसी क्षेत्र में हो सकता है। चीन लगातार भारत से लगी अपनी दक्षिणी सीमा पर अपना दबाव बनाए हुए है। आए दिन सीमा क्षेत्र में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबरें आती रहती हैं। स्वयं भारतीय सेनाध्यक्ष ने यह चेतावनी दी है कि सीमा के बहुत अधिक निकट के क्षेत्र में चीनी सैनिकों का जमाव बढ़ रहा है। चीन ने भारतीय सीमा के निकट परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम मिसाइलों की श्रृंखला भी स्थापित कर रखी है। सीमा के बारे में उसका रवैया अभी भी संदेहास्पद बना हुआ है। अभी इसी बीते हफ्ते दिल्ली के एक समारोह में चीनी राजदूत ने एक भारतीय पत्रकार को ‘शट अप‘ कहकर झिड़क दिया, जिसने वहां वितरित पर्चे (ब्रोशर) पर अंकित भारत के नक्शे पर आपत्ति व्यक्त की थी। इस नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश तथा लद्दाख क्षेत्र को चीनी सीमा में दिखाया गया था।

पिछले दिनों भारत-पाकिस्तान के बीच केवल एक सकारात्मक खबर मिली कि पाकिस्तान सरकार ने भी भारत को व्यापारिक क्षेत्र में सर्वाधिक वरीयता प्राप्त (मोस्टर फेवर्ड कंट्री) देश का दर्जा दे दिया। भारतीय मीडिया ने इसे मोटी सुर्खियों में छापा मानो पाकिस्तान ने भारत के प्रति उदारता की सारी सीमाएं तोड़ दी हों, जबकि इसमें ऐसा कुछ नहीं है, जो भारत के लिए विशेष हो। पाकिस्तान ने अब तक सैकड़ों देशों को सर्वोच्च वरीयता प्राप्त देश (मोस्ट फेवर्ड कंट्री) का दर्जा दे रखा है। बल्कि सच कहा जाए तो भारत के प्रति शत्रुता के कारण ही वह अब तक उसे यह दर्जा देने से कतराता रहा, जबकि भारत पाकिस्तान को एक दशक से भी पहले यह दर्जा दे चुका है। इतनी विलंबित कार्रवाई के बावजूद पाकिस्तान में इसका विरोध शुरू हो गया है और कहा जा रहा है कि अमेरिका के दबाव में आकर ही भारत को इस तरह सर्वोच्च तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिया जा रहा है। एक अमेरिकी दैनिक में भारतीय विदेश विभाग के एक अधिकारी के हवाले से जब यह खबर छपी कि पाकिस्तान भारत को दिये गये दर्जे से अब पीछे हट रहा है, तो पकिस्तानी विदेश विभाग की प्रवक्ता तहमीना जोजुआ ने इसका त्वरित खंडन अवश्य किया, लेकिन पक्के तौर पर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि यह दर्जा बरकरार रहेगा। पाकिस्तान के दो वरिष्ठ मंत्रियों गृहमंत्री रहमान मलिक तथा रक्षा मंत्री चौधरी अहमद मुख्तार ने भारत को वरीयता प्राप्त देश का दर्जा दिये जाने का यद्यपि स्वागत किया है और कहा है कि भारत के साथ व्यापार में भेदभाव को खत्म करने के लिए यह आवश्यक था, फिर भी उनका कहना है कि पाकिस्तानी संसद (नेशनल असेंबली) यदि चाहेगी, तो वह इसे वापस भी ले सकती है। पाकिस्तानी व्यवसायियों ने आम तौर पर इसका स्वागत किया है, किंतु राजनीतिक विपक्षी दलों ने तीव्र विरोध किया है। जमाते इस्लामी ने तो इसके खिलाफ आंदोलन चलाने तक की धमकी दी है। जिन पाकिस्तानी नेताओं ने व्यापारिक संबंधों को और विकसित करने के इस निर्णय का स्वागत किया है, उन्होंने भी साथ में यह टिप्पणी जोड़ना जरूरी समझा है कि इसका यह अर्थ नहीं है कि पाकिस्तान के कश्मीर संबंधी रुख में कोई बदलाव आया है या भारत के प्रति उसकी नीति बदल गयी है।

कश्मीर एक ऐसा मुद्दा है, जिसे हर भारत विरोधी शक्ति अपने पहले हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है। इसलिए चीन भी कश्मीर के सवाल पर पूरी तरह पाकिस्तान के साथ है और उसके बहाने भारत को दबाव में रखना चाहता है। चीन पाकिस्तान गठजोड़ केवल पाक को अमेरिकी दबाव से बाहर निकालने के लिए ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत और अमेरिकी सम्मिलित प्रभाव का मुकाबला करना तथा एशिया में भारत के विकास की गति पर अंकुश लगाना। अंतर्राष्ट्रीय सामरिक रणनीति में अमेरिकी समकक्षता प्राप्त करने के लिए ही चीन ने महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के सभी रणनीतिक महत्व के बिंदुओं (क पॉइंट्स) पर अपनी उपस्थिति कायम करने की योजना बनायी है, जैसे स्ट्रेट ऑफ मंडाल, स्ट्रेट ऑफ मलक्का, स्ट्रेट ऑफ हरमुज तथा स्ट्रेट ऑफ लोम्बोक पर वह अपने और नौसैनिक पोत तैनात कर रहा है। मतबल हांगकांग से लेकर ‘पोर्ट ऑफ सूडान‘ तक वह अपनी इस तरह की सैन्य श्रृंखला बना रहा है। हिन्द महासागर में भारत को घेरने के लिए वह पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार (बर्मा), श्रीलंका, केन्या तथा सोमालिया में अपने अड्डे कायम कर रहा है। पाकिस्तान में बलूचिस्तान के क्षेत्र में चीन पूरी तरह अपने खर्चे पर ग्वादर बंदरगाह का विकास कर रहा है। उसी तरह बंगलादेश में चिटगांव, म्यांमार में सित्तवे, केन्या में लामू तथा श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह का विकास कर रहा है। पूरी तरह चीनी पैसे तथा नौसैनिक अड्डे ही बनेंगे। केन्या और सोमालिया हिन्द महासागर क्षेत्र में पूर्वी अफ्रीकी देश हैं। हिन्द महासागर में चीनी प्रभव बढ़ाने में इन अड्डों का खासा योगदान है।

चीन और पाकिस्तान की भारत के बारे में बहुत स्पष्ट समझदारी है। चीन का काम है भारत को सैनिक दृष्टि से घेरना और उसके बढ़ते रणनीतिक प्रभाव पर काबू रखना और पाकिस्तान का काम है भारत को भीतर से तोड़ने में सक्षम शक्तियों की मदद करना। कश्मीरियों के साथ पश्चिम में वह कुछ सिखों को भी भड़काने में लगा है और उन्हें स्वतंत्र खालिस्तान का सपना दिखा रहा है। पाकिस्तान उत्तर पूर्व भारत के उग्रवादी संगठनों तथा माओवादी उग्रवादियों से भी संपर्क बनाए हुए हैं।

पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई.एस.आई. ऐसे सभी संगठनों से संपर्क बनाये हुए है, जो भारत विरोधी गतिविधियों में लगे हैं या उसे तोड़ने अथवा कमजोर करने का काम कर रहे हैं। पाकिस्तान के जिहादी रणनीतिकारों के अनुसार अगले दो से चार दशकों के बीच इंडिया केवल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा व महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह जायेगा। उत्तर के मुस्लिम बहुल पूरे इलाके पाकिस्तान का अंग बन जायेंगे। तमिल अलग राज्य बन जायेगा। मराठे अपने राज्य बना लेंगे। हिन्दू बहुल राजस्थान गुजरात के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक हिन्दू राज्य बना रह सकता है। इन लोगों ने इस तरह के विखंडित भारत का एक नक्शा भी जारी कर रखा है।

ज्यादातर भारतीयों को यह सब अभी भले ही असंभव लगे, लेकिन विखंडनकारी शक्तियां जिस तेजी से सक्रिय हैं और राष्ट्रवादी शक्तियां जिस तरह की उदासीनता की शिकार हैं, उसमें ऐसा कुछ भी संभव हो सकता है। चीन की योजनाओं के खिलाफ देर से ही सही, भारत सरकार में कुछ चेतना आयी है। उसने चीन से लगी सीमा की निगरानी के लिए अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए एक लाख जवानों की नई भर्ती का निर्णय लिया है। उत्तरी सीमा पर क्रूज मिसाइलों की तैनाती का अभियान शुरू किया है। नौसेना तथा वायुसेना के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देने का फैसला किया है। लेकिन ये सब बाहरी रक्षा के उपकरण है। देश का सर्वाधिक खतरा भीतरी विखंडनकारी शक्तियों से है, लेकिन उन पर नियंत्रण की कोई योजना फिलहाल सरकार के पास नहीं है। संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति देश को सांप्रदायिक, जातीय तथा क्षेत्रवादी भावनाओं को भड़काकर अपना नितांत संकीर्ण स्वार्थ सिद्ध करने में लगी है। खतरा चीन और पाकिस्तान से तो है ही, लेकिन हमारा भीतरी खतरा उससे भी अधिक गंभीर है। क्या देश के राजनेता व प्रबुद्धजन इधर कुछ ध्यान देंगे ?

3 टिप्‍पणियां:

डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee ने कहा…

पठनीय, मननीय !

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

हैदराबाद रियासत के कासिम रज़वी ने जब सरदार पटेल से कहा था कि हम हिंदुस्तानियों को हैदराबाद में घुसने नहीं देंगे तो सरदार ने शांति से कहा कि आप क्या समझते हैं, हम चुपचाप बैठे रहेंगे? इस प्रश्न ने रज़वी को भौंचक्का कर दिया था। क्या आज हमारे नेताओं में ऐसा कहने और करने का सामर्थ्य है। यदि नहीं, तो आपके द्वारा दिखाया गया चित्र भविष्यवाणी ही कही जाएगी॥

Hindi Choti ने कहा…


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