रविवार, 23 अक्तूबर 2011

पाक और अमेरिका के बीच छिड़ा युद्ध

‘ऐसा नहीं हो सकता कि घ्र के पिछवाड़े पले सांप केवल दूसरों को काटे‘: संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस के दौरान पाक
में सुरक्षित आतंकवादियों पर अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की टिप्पणी

अफगानिस्तान की धरती पर अमेरिका व पाकिस्तान के परोक्ष युद्ध का दौर अब समाप्त हो चुका है। युद्धक्षेत्र अब वहां से खिसक कर पाकिस्तान की सीमा में आ गया है। अमेरिका अभी भी परदे के पीछे रहकर इसे निपटाना चाहता है, किन्तु अब वह होने वाला नहीं। इस क्षेत्र में यदि आतंकवाद को मिटाना है और शांति कायम करनी है तो अमेरिका को एकतरफा निर्णय लेना ही पड़ेगा।

अब यह तथ्य पूरी दुनिया के सामने प्रकट हो गया है कि अफगानिस्तान में अमेरिका की लड़ाई किसी और से नहीं, बल्कि सीधे पाकिस्तान से है। इसे अमेरिका और पाकिस्तान के लोग बहुत पहले से जानते हैं, लेकिन वे दोनों मिलकर अब तक दुनिया को यह बताते रहे है कि वे अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी आतंकवाद से लड़ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के इतिहास में दोस्ती और दुश्मनी का ऐसा समन्वय अन्यत्र कहीं ढूंढ़ पाना लगभग असंभव है। अब तक यह लड़ाई परोक्ष थी, लेकिन अब वह क्रमशः प्रत्यक्ष रूप लेती जा रही है।

11 सितंबर 2001 की घटना के बाद अफगानिस्तान में जो कुछ शुरू हुआ वह देखने में तो वहां की तालिबान सत्ता के साथ अमेरिका का युद्ध था, जिसमें अमेरिका के साथ पाकिस्तान भी खड़ा नजर आ रहा था। अमेरिका का कहना था कि वह अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी आतंकवाद से विश्व मानवता तथा सभ्यता की रक्षा के लिए यह युद्ध लड़ रहा है। उसने पाकिस्तान को इस युद्ध में अपना साथी बनाया। पाकिस्तान ने बहुत सोची समझी रणनीति के तहत अमेरिका का साथ देना स्वीकार किया और इसकी आर्थिक व सैनिक सहायता के रूप में भारी कीमत वसूली। पाकिस्तान ने इस युद्ध में अमेरिका का साथ देना तो स्वीकार किया, किंतु प्रत्यक्ष लड़ाई में अपने सैनिकों को भेजने से इनकार कर दिया। अफसोस कि अमेरिकी राजनीतिक नेतृत्व अफगान युद्ध शुरू होने के वर्षों बाद तक यह समझ पाने में असमर्थ रहा है कि जिन शक्तियों के खिलाफ अफगानिस्तान में वह मोर्चा खोले हुए है, वे पाकिस्तान द्वारा खड़ी की गयी उसकी ही अपनी शक्तियां हैं और इन्हें तैयार करने में उसने अमेरिकी सहायता का ही इस्तेमाल किया है।

अपने यहां एक पुरानी कहावत है कि सर्वनाश की स्थिति उत्पन्न होने पर बुद्धिमान व्यक्ति आधा छोड़कर शेष आधा बचाने की कोशिश करता है (सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धम् त्यजति पंडितः)। पाकिस्तान ने यही किया। उसने अपनी मुख्य भूमि तथा सैन्य शक्ति की रक्षा के लिए अफगानिस्तान में तैनात अपनी शक्ति का विनाश होना स्वीकार कर लिया। तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने बड़ी बुद्धिमानी से अमेरिका का साथ देने के बहाने अफगानिस्तान की तालिबान सत्ता के प्रमुख नेताओं को अमेरिकी चंगुल में पड़ने से बचा लिया। वे अफगानिस्तान से भागकर पाकिस्तानी सीमा में आ गये और पाकिस्तान सरकार ने उन्हें पूरा संरक्षण प्रदान किया।

लड़ाई मूलतः यह रही कि सोवियत सेनाओं के अफगानिस्तान से चले जाने तथा नजीबुल्ला की कठपुतली कम्युनिस्ट सरकार के पतन के बाद वहां किसका कब्जा रहे। काबुल पर तालिबान परिषद की सत्ता कायम हो जाने के बाद पाकिस्तान प्रसन्नता के शिखर पर था कि अब वह अपराजेय शक्ति का मालिक हो जाएगा और भारत को अच्छा सबक सिखा सकेगा। उसने तालिबान लड़ाकों की फौज को कश्मीर मोर्चे की तरफ लगाने की योजना भी बना ली थी, लेकिन तभी न्यूयार्क पर हमले की घटना घट गयी। अमेरिका को अफगानिस्तान पर हमले का एक ठोस बहाना मिल गया। वैसे यदि न्यूयार्क पर हमले की घटना न घटी होती, तो भी अमेरिका को अफगानिस्तान में हस्तक्षेप करना पड़ता, लेकिन तब उसका स्वरूप दूसरा होता और इराक की तरह कोई अलग बहाना ढूंढ़ना पड़ता, क्योंकि वह यह तो बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि काबुल में बैठकर कोई अमेरिकी सत्ता को चुनौती दे।

अफगानिस्तान पर कब्जे का पाकिस्तान का बहुत पुराना सपना है। पहले उसने सोचा था कि रूसियों के जाने के बाद फिर वहां उसके लिए कोई चुनौती नहीं रह जाएगी, किंतु उसका दुर्भाग्य कि ओसामा बिना लादेन की मूर्खतावश अमेरिका बीच में टपक पड़ा। इसके बाद भी पाकिस्तान ने अपना धैर्य बनाए रखा और अमेरिकी फौजों के अफगानिस्तान से विदा होने की प्रतीक्षा करता रहा।

अमेरिका ने काबुल की तालिबान सत्ता को ध्वस्त करने के बाद पाकिस्तान की इच्छा के विरुद्ध हामिद करजई को वहां की सत्ता सौंपी। इसके बाद से ही अफगानिस्तान में अमेरिका के साथ पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध प्रारंभ हो गया। अमेरिका जहां करजई को आगे करके पीछे से अपने युद्ध का संचालन कर रहा थ, वहां पाकिस्तान करजई की सत्ता पलटने वाले तालिबान गुटों को मदद कर रहा था। पहले शायद अमेरिका इस रहस्य को नहीं समझ पाया, लेकिन बाद में अमेरिकी गुप्तचर संस्थाओं ने यह प्रमाण्ति करके दिखा दिया कि अफगानिस्तान में सरकारी सेना तथा अमेरिकी फौजों से लड़ने वाले कबायली गुटों को पाकिस्तान का संरक्षण प्राप्त है। इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण यह है कि अफगानिस्तान में लड़ रहे प्रायः सभी तालिबान गुटों के प्रवक्ताओं के मोबाइल नंबर का नेश्नल कोड पाकिस्तान का है। अमेरिकी गुप्तचर संस्थाओं ने जब सप्रमाण यह सिद्ध कर दिया कि अफगानिस्तान में लड़ रहे विद्रोहियों का संचालन पाकिस्तानी सैन्य गुप्तचर संगठन आई.एस.आई. के द्वारा होता है, तब अमेरिकी नेताओं के कान खड़े हुए और उन्होंने पाकिस्कान पर दबाव डालना शुरू किया कि वह पाकिस्तानी सीमा के सुरक्षित आरामगाह में जमे जिहादियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करे। पाकिस्तानी सेना ने दिखावे के लिए यह कार्रवाई शुरू भी की। अमेरिका ने इसके लिए पाकिस्तान की सहायता राशि तीन गुना बढ़ाने की घोषणा की। वजीरिस्तान के दक्षिणी इलाके में सेना ने व्यापक कार्रवाई की और अमेरिका को दिखाया कि पाकिस्तान कितनी निष्ठा से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के साथ्रा है, लेकिन उसके बाद उसने उत्तरी वजीरिस्तान में कार्रवाई करने से साफ मना कर दिया। वास्तव में दक्षिणी वजीरिस्तान में की गयी कार्रवाई केवल दिखावे के लिए थी। वहां जमे सारे तालिबानी नेता उत्तरी वजीरिस्तान की ओर निकल गये।

अमेरिका ने इसके लिए पाकिस्तान की काफी पीठ ठोकी और उसे उत्तरी वजीरिस्तान की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, मगर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष अशरफ परवेज कयानी साहब एकदम अड़ गये कि अब इसके आगे उनकी सेना कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। बहाना यह बनाया कि उत्तरी वजीरिस्तान में कार्रवाई के लिए उसके पास न तो पर्याप्त सैन्य बल है, न आवश्यक उपकरण। अमेरिका उपकरण तो सारे देने के लिए तैयार थ, किंतु सैन्य प्रबंध तो पाकिस्तान को ही करना था। उसे कहा गया कि वह अपनी पूर्वी सीमा पर अनावश्यक रूप से तैनात सैनिकों को वहां से हटा कर अपने पश्चिमी मोर्चे की तरफ से आए। कयानी ने इससे भी इनकार कर दिया। उनका सा। कहना था कि पूर्वी सीमा पर भारतीय खतरे को देखते हुए वहां से एक भी सैनिक नहीं हटाया जा सकता।

अब यहां से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सीधी कश्मकश शुरू हो गयी है। अब अफगानिस्तान में मौजूद तालिबान शक्तियां तो इतनी कमजोर हो गयी हैं कि वे सीधे कोई बड़ी कार्रवाई नहीं कर सकती हैं। उनके नेता भी भागकर अब पाकिस्तान आ गये हैं, इसलिए मोर्चा अफगानिस्तान से खिसककर अब पाकिस्तान सीमा के भीतर आ गया है। अब पाकिस्तानी सीमा के भीतर तो पाकिस्तानी सेना को ही कार्रवाई करनी है, किंतु पाकिस्तानी सेना इससे साफ इनकार कर रही है। सेनाध्यक्ष जनरल कयानी तो साफ कह चुके हैं कि अमेरिका अपनी सहायता दे या न दे, पाकिस्तान सेना उत्तरी वजीरिस्तान में अब आगे और कोई सैनिक कार्रवाई नहीं करेगी। इसके बाद ही अमेरिका की तरफ से यह घोषणा की गयी कि पाकिस्तान साथ दे या न दे, लेकिन अमेरिका अफगानिस्तान में आतंकवादियों के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगा और यदि आवश्यक हुआ, तो पाकिस्तानी सीमा के भीतर घुसकर कार्रवाई करने में भी संकोच नहीं करेगा। वह पाकिस्तान की प्रभुसत्ता का आदर करता है, किंतु वह अमेरिका के दुश्मनों को वहां शरण लेने की इजाजत नहीं दे सकता। इसका प्रमाण उसने पाकिस्तानी सीमा में राजधानी इस्लामाबाद के निकट छिपे ओसामा बिन लादेन को मारकर दे दिया है।

ऐसी खबरें आ रही हैं कि अफगानिस्तान में स्थित अमेरिकी सैनिक अब पाकिस्तान से लगने वाली सीमा के निकट एकत्र हो रहे हैं। शायद इसी की प्रतिक्रिया में पाक सेनाध्यक्ष जनरल कयानी ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तानी सीमा में एकतरफा सैन्य कार्रवाई शुरू करने के पहले अमेरिका को भी 10 बार सोचना पड़ेगा। पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है। उसे इराक या अफगानिस्तान समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए। जनरल कयानी ने पाकिस्तानी संसद की प्रतिरक्षा मामलों की स्थाई समिति के समक्ष पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति पर रिपोर्ट देते हुए यह टिप्पणी की। इस टिप्पणी के अगले ही दिन गत गुरुवार को अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, नवनियुक्त अमेरिकी संयुक्त सेना के अध्यक्ष मार्टिन इ. डेम्पसे तथा गुप्तचर संस्था सी.आई.ए. के डायरेक्टर डेविड एच. पेट्रौस के साथ इस्लामाबाद पहुंची। इन तीनों की पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के साथ लंबी बातचीत हुई। बातचीत के दौरान पाक विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर, सेनाध्यक्ष जनरल कयानी और आई.एस.आई. के प्रमुख जनरल शुजा पाशा भी मौजूद थे। अमेरिकी मीडिया की खबरों के अनुसार अमेरिका की तरफ से पाकिस्तान को साफ कह दिया गया है कि वह अपनी सीमा में मौजूद जिहादी गुटों के सफाए की कार्रवाई शुरू करे। यदि वह नहीं करेगा, तो अमेरिका स्वयं यह कार्रवाई करेगा। ऐसी भी खबर है कि प्रधानमंत्री गिलानी ने अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह शांति का एक मौका और दे। पाक-अमेरिका संबंध केवल आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई तक सीमित नहीं है, हमें उसके आगे की भी देखना चाहिए।

अगले दिन हिना रब्बानी के साथ अपनी संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में श्रीमती क्लिंटन का लहजा बहुत कठोर नहीं था, लेकिन संदेश स्पष्ट था कि पाकिस्तानी सेना ने यदि स्वयं कार्रवाई नहीं शुरू की, तो अमेरिका इसे एकतरफा पूरा करने से पीछे नहीं रहेगा। उन्होंने एक बहुचर्चित जुमले का इस्तेमाल किया कि ‘यदि आप अपने पिछवाड़े सांप पालते हैं, तो यह न समझें कि वे केवल पड़ोसियों को या दूसरों को ही काटेंगे।‘ उनका संकेत स्पष्ट ही पाकिस्तानी सीमा में छिपे आतंकवादियों की ओर था और पाकिस्तान को यह चेतावनी भी थी कि यदि उनका सफाया नहीं किया गया, तो वे पाकिस्तान को भी डंस सकते हैं।

बात हिलेरी की बहुत सही थी, लेकिन शायद वह अभी भी ठीक-ठीक यह समझ नहीं पा रही हैं कि वे पिछवाड़े के सांप पाकिस्तानी शासकों व सेनाप्रमुखों से कुछ अलग नहीं है। वे उन्हीं से भिन्न रूप हैं । उन सांपों को मारने का मतलब है कि अपने ही हाथ पांव काट डालना। इसलिए अमेरिका कितना ही प्रोत्साहन दे, कितनी भी सहायता दे, पाकिस्तान की सरकार अपने अंगभूत इन जिहादी संगठनों का सफाया नहीं कर सकती। अब यह अमेरिका को तय करना है कि वह हक्कानी नेटवर्क व अन्य तालिबान गुटों का सफाया करने के लिए एकतरफा कार्रवाई करने के लिए तैयार है या नहीं ।

लड़ाई अफगानिस्तान से हटकर अब पाकिस्तान में आ गयी है। अब परोक्ष युद्ध की गुंजाइश नहीं रही। अब सीधा मुकाबला होना तय है। जनरल कयानी का यह कहना सही है कि पाकिस्तान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई शुरू करते समय अमेरिका को भी 10 बार सोचना पड़ेगा। भले ही उसे पाकिस्तान की परमाणु शक्ति का कोई भय न हो, लेकिन वह नहीं चाहेगा कि दुनिया की नजर में पाकिस्तान के साथ उसका सीधा मुकाबला हो। फिर भी यदि आतंकवाद का सफाया करना है और अफगानिसतान को पाकिस्तान के कब्जे में जाने से रोकना है, तो अमेरिका को यह खतरा उठाना ही पड़ेगा। पाकिस्तान के विषदंत तोड़े बिना दक्षिण एशिया के इस क्षेत्र में कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती।

2 टिप्‍पणियां:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

छल कपट से जिसकी पैदाइश हुई हो, उसका भविष्य व चरित्र और क्या हो सकता है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका यह सब नहीं जानता पर वही पुरानी कहावत है- शेर अपने दांव में तो शिकारी अपने दांव में॥

Hindi Choti ने कहा…


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