रविवार, 28 नवंबर 2010

सरकार व मीडिया, दोनों विश्वसनीयता के संकट में




2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला कांड को लेकर गत दो हफ्तों से संसद का कामकाज ठप है। विपक्ष की मांग है कि इसकी जांच के लिए संयुक्त संसदीय जांच समिति (जे.पी.सी.) का गठन किया जाए, लेकिन सरकार अड़ी है कि चाहे जो हो जाए, वह जे.पी.सी. का गठन नहीं करेगी। विपक्ष का कहना है कि उसे किसी सरकारी जांच संस्था पर विश्वास नहीं है, क्योंकि वे सबकी सब अपनी निष्पक्षता व विश्वसनीयता खो चुकी हैं। इसलिए वे इस पर अड़े हैं कि जब तक जे.पी.सी. का गठन नहीं होता, वे संसद नहीं चलने देंगे। इसके साथ ही एक फोन टेप भी सामने आया है, जिसने मीडिया के तमाम शीर्षस्थ नामों को विश्वसनीयता के संकट में डाल दिया है। इस टेप ने मीडिया पर प्रायः लगने वाले आरोपों को सही साबित किया है। अब किससे अपेक्षा की जाए, जो देश को इस सर्वग्रासी संकट से उबार सके।


केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार इस बात पर अड़ी हुई है कि वह 2-जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच के लिए ’संसदीय जांच समिति’ (जे.पी.सी.) का गठन नहीं करेगी। सवाल है आखिर क्यों ? यदि सरकार का दामन साफ है और जो कुछ हुआ है, वह सब नियमानुसार ही हुआ है, तो सरकार को जे.पी.सी. स्तर की जांच कराने में क्यों आपत्ति है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी.ए.जी.) की गत 16 नवंबर को संसद में पेश की गयी रिपोर्ट के अनुसार 2-जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस के वितरण में बरती गयी अनियमितताओं के कारण भारत सरकार को 1 लाख 76 हजार करोड़ का नुकसार हुआ है। यह भारत की जनता का नुकसार है, इसलिए भारत की आम जनता को यह जानने का पूरा हक है कि इस नुकसान का जिम्मेदार कौन है और जो अनियमितता बरती गयी है, उसका लाभ किसने उठाया है। इसलिए यह सरकार का प्राथमिक दायित्व बनता है कि जिस स्तर से भी संभव हो, इस मामले की पूरी जांच कराये और उसकी विश्वसनीय रिपोर्ट देश की जनता के सामने पेश करे।

वास्तव में मूल समस्या सरकार की अपनी विश्वसनीयता की है। देश की जनता का उसकी अपनी एजेंसियों पर से भरोसा उठ गया है। इसलिए जब वह सी.बी.आई. (केंद्रीय जांच ब्यूरो), इ.डी. (इंफोर्समेंट डाइरेक्टरेट या प्रवर्तन निदेशालय) या संसद की पी.ए.सी. (पब्लिक एकाउंट कमेटी या लोक लेखा समिति) से इस मामले की जांच कराने की बात करती है, तो उस पर किसी को भरोसा नहीं होता कि ये संस्थाएं ईमानदारी से जांच कर सकती हैं। सी.बी.आई. को सुप्रीम कोर्ट पहले ही फटकार लगा चुकी है कि वह सही जांच करने के बजाए व्यर्थ की झाड़ियां पीट रही है। सुप्रीम कोर्ट ने उससे पूछा है कि उसने तत्कालीन दूर संचार मंत्री ए. राजा तथा उनके विभाग के सचिव से अब तक कोई पूछताछ क्यों नहीं की। वह कहती है कि उसे इससे संबंधित दस्तावेजों के 82 हजार पृष्ठ खंगालने हैं। घोटाले से सीधे जुड़े लोगों को छोड़कर व्यर्थ के दस्तावेजों में सर खपाने का सीधा अर्थ मामले पर लीपापोती करना ही हो सकता है। प्रवर्तन निदेशालय भी वित्त मंत्रालय के अंतर्गत राजस्व विभाग से संबंधित संस्था है, जो विदेशी मुद्रा मामलों की छानबीन करती है। वैसे वह आर्थिक गुप्तचर एजेंसी के तौर पर भी काम करती है और उसके दायित्वों में आर्थिक कानूनों को लागू करवाना तथा आर्थिक अपराधों से लड़ना भी है, लेकिन उसके अब तक के इतिहास से जाहिर है कि उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है और सी.बी.आई. की तरह वह भी सरकार के हाथ का एक औजार मात्र है।

एक केंद्रीय निगरानी आयुक्त (सी.वी.सी.) का भी पद है, जिसका काम सरकारी स्तर के भ्रष्टाचारों की जांच करना और उसे रोकना है। लेकिन इस पर जिस तरह की नियुक्तियां की जा रही हैं, उससे इस पद की विश्वसनीयता भी समाप्त हो गयी है। अभी सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं सरकार के सामने यह सवाल खड़ा किया कि उसने ऐसे व्यक्ति को सी.वी.सी. के पद पर कैसे नियुक्त किया, जिस पर स्वयं भ्रष्टाचार का आरोप है। सरकार ने पिछले दिनों पी.जे. थॉमस को सी.वी.सी. नियुक्त किया, जिन पर 90 के दशक का पाम ऑयल घोटाले का एक केस चल रहा है और जिसमें उनके खिलाफ आरोप पत्र (चार्जशीट) भी दाखिल हो चुकी है। वह उस दौरान दूरसंचार विभाग में सचिव भी थे, जब 2-जी स्पेक्ट्रम का घोटाला हुआ था। अब ऐसा व्यक्ति क्या भ्रष्टाचार की निगरानी करेगा और फिर उस सरकार को कैसे विश्वसनीय माना जाए, जो ऐसे महत्वपूर्ण पद पर इस तरह के व्यक्ति को नियुक्त करती है। जाहिर है 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए केंद्र सरकार की कोई एजेंसी जे.पी.सी. का विकल्प नहीं बर सकती। पूर्ण अधिकार प्राप्त जे.पी.सी. घोटाले से संबंधित सभी रिकार्डों व अन्य दस्तावेजों को मंगा सकती है। वह प्रधानमंत्री सहित किसी भी मंत्री को तलब कर सकती है। वह मामले के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की भी जांच कर सकती है। जैसे कि वह सरकार की दूरसंचार नीति (टेलीकॉम पॉलिसी)तथा गत करीब डेढ़ दशक के सारे कार्यकलापों की जांच पड़ताल कर सकती है। जैसा कांग्रेस व डी.एम.के. नेताओं का कहना है कि 2008 में दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने लाइसेंस वितरण का जो काम किया, वह पिछली सरकार यानी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार की नीतियों के अनुसार ही किया, तो जे.पी.सी. इसकी जांच भी कर सकती है। वह 1994 में बनी सरकार की दूरसंचार नीति की खामिों तथा उसके बाद उसके उपयोग- दुरुपयोग को भी देख सकती है। सच यह है कि जे.पी.सी. ईमानदारी के साथ काम करे और अपने लिए उचित स्टाफ की नियुक्ति करे, तो वह दूध का दूध और पानी का पानी अलग कर सकती है। यदि वह प्रतिदिन बैठक करके इस काम को निपटाना चाहे, तो दो महीने में वह 2-जी स्पेक्ट्रम का सारा कच्चा चिट्ठा देश के सामने पेश कर सकती है। लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं है।

केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल का कहना है कि विपक्ष का लक्ष्य 2-जी स्पेक्ट्रम का भ्रष्टाचार उजागर करना नहीं है, बल्कि वह इस मामले में प्रधानमंत्री को घसीटना चाहती है। उसका लक्ष्य राजनीतिक है, इसलिए हम राजनीतिक स्तर पर उसका मुकाबला करेंगे। प्रधानमंत्री के उच्च पद को इस मामले में घसीटने की हम किसी कीमत पर अनुमति नहीं दे सकते। बंसल का यह भी कहना है कि अब तक 4 बार जे.पी.सी. का गठन हो चुका है, लेकिन एक ‘स्टाक स्कैम’ को छोड़कर किसी भी मामले में एकमत निर्णय नहीं आ सका। हमेशा उसका विभाजित निर्णय आया, इसलिए उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। वस्तुतः बंसल की इस बात में पूरी सच्चाई नहीं है। लोगों को पता है कि बोफोर्स तोप घोटाले को लेकर गठित की गयी जे.पी.सी. का लक्ष्य ही पूरे मामले की लीपापोती करना था, इसी कारण विपक्षी सदस्यों ने उसका बहिष्कार भी किया था, फिर भी जे.पी.सी. का गठन पूरी तरह व्यर्थ नहीं गया था। उसमें प्रस्तुत किये गये दस्तावेजों से कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिनके आधार पर ’द हिन्दू’ जैसे अखबार ने अपने स्तर पर आगे जांच बढ़ाई थी। हर्षद मेहता कांड में भी यह उपयोगी सिद्ध हुई थी। और फिर यदि यह विफल रही है, तो इसके लिए सरकार ही दोषी रही है, क्योंकि उसने समिति का पूरा सहयोग नहीं किया। बंसल द्वारा यह तर्क देने का भी कोई औचित्य नहीं है कि 2001 के तहलका मामले में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने जे.पी.सी. जांच की मांग नहीं स्वीकार की थी। भाजपा की सरकार ने कोई मांग नहीं मानी थी, इसलिए कांग्रेस की सरकार भी उस तरह की मांग को स्वीकार नहीं करेगी, यह नितांत बचकाना तर्क है। फिर 2-जी का यह मामला 2001 के तहलका मामले से कहीं अधिक गंभीर है। इसमें केवल एक मंत्री के स्तर पर हुए भ्रष्टाचार का मामला ही नहीं है, बल्कि देश के हुए 1760 अरब के भारी नुकसान का भी मामला है, जिसकी सहज ही अनदेखी नहीं की जा सकती।

ऐसी खबर है कि सरकार की तरफ से इस मामले में विपक्ष को मनाने की एक और कोशिश की जाने वाली है, जिससे इस हफ्ते संसद की बैठक का अवरोध दूर हो सके, लेकिन इसमें भी इतना तो तय है कि सरकार जे.पी.सी. के गठन के लिए तैयार नहीं होगी। वह संसद की विशेषाधिकार समिति (प्रिविलेज कमेटी) या नैतिकता समिति (एथिक्स कमेटी) द्वारा जांच कराने की बात कर रही है, लेकिन विपक्ष शायद ही उसके इस तरह के झांसे में आए। संसद की निष्क्रियता के लिए विपक्ष को नैतिक रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए कांग्रेस की तरफ से एक और कदम उठाने का प्रयास किया गया है। ’काम नहीं तो वेतन नहीं‘ के सिद्धांत पर कांग्रेस पार्टी के करीब 80 सांसदों ने घोषणा की है कि जिन तारीखों में संसद की बैठकें नहीं चल सकी हैं, उन तारीखों का दैनिक भत्ता वे नहीं लेंगे। उनका यह आरोप है कि विपक्षी नेता संसद का बहिष्कार नहीं करके संसद भवन में आकर हस्ताक्षर केवल इसलिए कर रहे हैं कि उनके 2000 रुपये दैनिक भत्ते का नुकसान न हो। सांसदों के लिए 2000 रुपये का यह दैनिक भत्ता कितना महत्वपूर्ण हो सकता है, इसका कोई भी अनुमान लगा सकता है, किंतु उन्हें इस लोभ की राजनीति में लपेटने की कोश्श् िकी जा रही है, किंतु विपक्षी इससे तनिक भी प्रभावित नहीं हैं।

इधर इस 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर एक और मामला आकाश् में धूमकेतु की तरह आ टपका है। यह है नीरा राडिया का टेप कांड। इस टेप के लपेटे में देश के कई शीर्ष व्यवसायी व राजनेता ही नहीं, कई शीर्ष पत्रकार भी आ गये हैं। कौन है यह नीरा राडिया? अभी कुछ दिन पहले तक देश के आम लोगों को इसकी भनक तक नहीं थी, लेकिन नीरा राडिया का टेप एक अलग शिगूफा बनकर खड़ा हो गया है।

नीरा राडिया केनिया में जन्मीं एक ब्रिटिश नागरिक हैं, जिसने भारत में आकर अपनी एक पब्लिक रिलेशन कंपनी कायम की है। यह कंपनी देश के करीब 50 शीर्ष औद्योगिक घरानों के लिए काम करती रही है, जिसमें टाटा उद्योग समूह व रिलायंस जैसी कंपनियां शामिल हैं। 2008-2009 में गृह मंत्रालय के निर्देश पर आयकर विभाग ने 300 दिनों तक नीरा राडिया का फोन टेप किया। इसमें 5851 फोन कॉल शामिल हैं। सी.बी.आई. ने सरकार की तरफ से यह फोन टेप भी सुप्रीम कोर्ट में पेश किया है। यद्यपि यह टेप सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया गया है, लेकिन दो पत्रिकाओं ’ओेपेन’ और ’आउट लुक’ ने अपनी वेबसाइटों पर इसे डाल दिया, जिससे ये सार्वजनिक हो गयी। अब शायद इन पत्रिकाओं ने भी इन्हें अपनी वेबसाइटों से हटा लिया है, लेकिन इनके द्वारा जो हंगामा खड़ा होना था, वह खड़ा हो चुका है।

इस टेप में राडिया की टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा, रिलायंस समूह के चेयरमैन मुकेश अंबानी सहित तमाम उद्यमियों के अलावा ए. राजा (डी.एम.के. नेता व पूर्व दूरसंचार मंत्री), कनीमोझी (राज्यसभा सदस्य व डी.एम.के. नेता करुणानिधि की पुत्री) जैसे नेताओं और बरखा दत्त (एन.डी.टी.वी. की ग्र्रुप एडिटर), वीर संघवी (हिन्दुस्तान टाइम्स के एडिटोरियल एडवाइजरी के डाइरेक्टर), प्रभू चावला (इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटर), राजदीप सरदेसाई (सी.एन.एन. आई.बी.एन. के कर्ताधर्ता), एम.के. वेणु (वरिष्ठ बिजनेस जर्नलिस्ट) आदि शामिल हैं। सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उसे करीब 82 हजार दस्तावेजों के साथ् इस राडिया टेप का भी अध्ययन विश्लेषण करना है, इसलिए उसकी जांच में समय लग सकता है, फिर भी मार्च 2011 तक वह अपनी जांच पूरी कर लेगी।

ये जो फोन टेप किये गये हैं, उनकी बातचीत से यह लगता है कि राडिया बड़े बिजनेस हाउसेस के लिए काम करती थी तथा राजनेताओं को भी मदद पहुंचाती थी और इसमें शीर्ष पत्रकारों की भी मदद लेती थी। इन वार्ताओं से ये शीर्ष पत्रकारगण पत्रकार कम सत्ता के दलाल अधिक लगते हैं। उनकी बातें पत्रकारिता कर्म से या व्यापक जनहित से जुड़ी हुई नहीं हैं। शायद यही कारण है कि उन्हें सार्वजनिक होने से रोकने के सारे उपाय किये गये हैं।

टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा ने एन.डी.टी.वी. पर शेखर गुप्ता के साथ बातचीत में इस टेप पर अपनी गहरी आपत्ति व्यक्त की है और इसे चरित्र हनन का प्रयास बताया है। रतन टाटा का कहना है कि इस टेप को ’स्मोक स्क्रीन‘ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे कि 2-जी स्पेक्ट्रम के बारे में हुए वास्तविक भ्रष्टाचार को छिपाया जा सके। उनका सुझाव है कि सरकार को एक आडीटर की नियुक्ति करके इस पूरे मामले की जांच करायी जानी चाहिए और बेसिर पैर के आधारहीन आरोप नहीं लगाने चाहिए। उनका कहना है कि बारी के बाहर किये गये आवंटन (आउट ऑफ टर्न एलोकेशन) तथा कुछ लोगों द्वारा स्पेक्ट्रम की जमाखोरी (होर्डिंग ऑफ स्पेक्ट्रम) और इस जैसी अन्य बातों की पूरी जांच करायी जानी चाहिए।

ए. राजा ने जनवरी 2008 में 9 कंपनियों को 122 टेलीकॉम लाइसेंस जारी किये। इन 9 कंपनियों को 2-जी स्पेक्ट्रम वाले जो लाइसेंस दिये गये वे 2001 में तय की गयी कीमत के आधार पर दिये गये, लेकिन इसमें वितरण नियमों का भी पालन नहीं किया गया। दूरसंचार विभाग की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत हुए सालीसिटर जनरल ने कोर्ट के सामने इस तरह का शपथ पत्र (एफिडेविट) पेश किया, जिसमें कहा गया था कि दूरसंचार विभाग ने जो कुछ किया, उसकी प्रधानमंत्री कार्यालय को न केवल जानकारी थी, बल्कि उसे उसका पूरा समर्थन भी प्राप्त था। केंद्र सरकार के लिए यह शपथ पत्र गले की फांस बन गया है, क्योंकि इसने दूरसंचार की करतूतों में प्रधानमंत्री कार्यालय को भी शामिल कर लिया है।

कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री की छवि पर कोई आंच नहीं आने देना चाहती, इसलिए वह ऐसी किसी संस्था को 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए नियुक्त नहीं करना चाहती, जो प्रधानमंत्री या उनके कार्यालय को भी अपने दायरे में खींच सके। इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से नितांत बेदाग व उज्ज्वल चरित्र के व्यक्ति हैं, लेकिन वे जिस सरकार के मुखिया हैं, वह उनकी तरह स्वच्छ नहीं है, बल्कि उनकी स्वच्छता को अपनी चादर बनाए हुए है। हो सकता है कि प्रधानमंत्री जी की प्राथमिक निष्ठा अपनी पार्टी के प्रति हो, लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर देश के प्रति उनकी बड़ी जवाबदेही बनती है। आज की स्थिति में पूरी सरकार की विश्वसनीयता दांव लगी है। प्रधानमंत्री जी को सरकार के साथ स्वयं अपनी विश्वसनीयता बहाल करने के लिए ऐसा कुछ करना चाहिए, जिस पर देश की आम जनता विश्वास कर सके।

उधर, राडिया टेप का मामला यद्यपि 2-जी स्पेक्ट्रम के साथ ही उछला है, किंतु उनकी अलग से जांच पड़ताल की जानी चाहिए। यह भी पता चलना चाहिए कि एक ब्रिटिश नागरिक इस देश में आकर 10 वर्ष के भीतर इतनी ताकतवर कैसे हो गयी कि उसने शीर्ष उद्यमियों, शीर्ष पत्रकारों और सत्ता के शक्तिशाली केंद्रों के बीच ऐसी घुसपैठ बना ली कि वह मंत्रियों की नियुक्ति तक में लॉबींग करने वाली बन गयी। बताया जाता है कि वह सिंगापुर एयरलाइंस को भारत की विमानन सेवा में स्थान दिलाने के लिए 1990 के दशक में भारत आयी और उसने रतन टाटा तथा तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री से संपर्क किया। टाटा ने सिंगापुर एयर लाइंस के साथ मिलकर भारत में निजी विमान कंपनी शुरू करने की कोशिश की। इसे भारत में विदेशी पूंजी निवेश की मंजूरी भी मिल गयी, लेकिन एयर लाइंस को अनुमति नहीं मिल सकी। यहां सिंगापुर एयर लाइन का काम तो नहीं हो पाया, लेकिन राडिया का अनंत कुमार जैसे राजनेता व रतन टाटा जैसे शीर्ष उद्यमी के साथ संपर्क रंग लाया। रतन टाटा तो उससे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे टाटा ग्रुप के कार्पोरेट कम्युनिकेशन के लिए नियुक्त कर लिया। राडिया ने 2001 में ‘वैष्णवी कार्पोरेट कम्युनिकेशंस‘ के नाम से एक पब्लिक रिलेशन फर्म की स्थापना की। पहले काफी दिनों तक यह कंपनी केवल टाटा ग्रुप के लिए काम करती थी, जिससे बहुत लोगों को भ्रम था कि यह कंपनी भी टाटा समूह की अपनी ही कंपनी है। राडिया ने धीरे-धीरे अपना संपर्क विस्तार किया। मुकेश अंबानी भी उनसे बहुत प्रभावित हुए। और अब तो उनके पास 50 से अधिक कंपनियां हैं। और उनके साथ घनिष्ठ संपर्क रखने वालों में ट्राई के पूर्व चेयरमैन प्रदीप बैजल, आर्थिक मामलों में पूर्व केंद्रीय सचिव सी.एम. वासुदेव, डी.आई.पी.पी. के पूर्व सचिव अजय दुआ, ट्राई के पूर्व सदस्य डी.पी.एस. सेठ जैसे लोगों के नाम गिनाये जाते हैं। अभी जो उनका फोन टेप सामने आया है, उसमें मीडिया जगत के 85 शीर्ष लोगों के नाम हैं। उनका मीडिया मैनेजमेंट का व्यवसाय अब करीब डेढ़ सौ करोड़ वार्षिक से उपर पहुंच चुका है।

खबर है कि प्रवर्तन निदेशालय (इंफोर्समेंट डाइरेक्टरेट) राडिया से पूछताछ कर रहा है। किंतु इतना स्पष्ट है कि प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ से उनके पूरे संपर्क जाल व कारनामें सामने नहीं आ पाएंगे। इसलिए विपक्षी नेता यदि यह मांग कर रहे हैं कि 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के साथ-साथ राडिया मामले में भी जे.पी.सी. की परिधि में लाया जाए, तो कोई गलत नहीं है।

सरकार यदि प्रधानमंत्री की छवि रक्षा करना चाहती है, तो वह यह काम उन्हें किसी भी जांच दायरे से बाहर रखकर नहीं कर सकती। 2-जी स्पेक्ट्रम कांड की जांच के लिए किसी भी कीमत पर जे.पी.सी. का गठन न होने देने की हठ करके सरकार अपनी विश्वसनीयता को और संदिग्ध ही बना रही है। इसी तरह देश के शीर्ष पत्रकार राडिया टेप को आम आदमी की नजरों से दूर करके अपनी विश्वसनीयता नष्ट कर रहे हैं। अगर ये शीर्ष पत्रकार यह समझते हैं कि राडिया के साथ उनकी बातचीत उनके मीडिया व्यवसाय के अंतर्गत थी, तो उन्हें स्वयं अक्षरशः उसे आम जनता के सामने पेश करना चाहिए और उसे स्वयं निर्णय लेने देना चाहिए कि वह बातचीत कैसी थी। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो लोकतंत्र का यह तथाकथित चौथा स्तंभ भी अपनी विश्वसनीयता खो देगा और इसकी भी गिनती सत्ता के दलाल वर्ग में की जाने लगेगी।

 
28/11/2010