मंगलवार, 20 जुलाई 2010

bharat-pak

भारत-पाक के बीच शांति का दिवास्वप्न




वर्तमान नीतियों और परिस्थितियों के बीच भारत-पाकिस्तान की समस्या का कोई समाधान नहीं है। दोनों के बीच कोई शांति वार्ता कभी सफल नहीं होने वाली नहीं, क्योंकि पाकिस्तान शांति चाहता ही नहीं। उसके लिए तो वार्ता कक्ष भी एक तरह की युद्ध भूमि ही है। वह शांति नहीं, बल्कि भारत की पराजय व अपनी जीत चाहता है। वह हर उस मौके की तलाश में रहता है, जब वह भारत को नीचा दिखा सके। वह एक तरह की हीनग्रंथि का शिकार है, जिससे वह कभी निजात नहीं पा सकता। वास्तव में वह जो युद्धों में नहीं हासिल कर सका, उसे आतंकवादी घुसपैठ व वार्ताओं की कूटनीति से हासिल करना चाहता है। अभी इस्लामाबाद में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई वार्ता के बाद जो कटुता सामने आयी, वह इस बात का प्रमाण है कि इस तरह की वार्ताओं से कोई समस्या हल नहीं हो सकती।





पाकिस्तान के विदेश मंत्री मखदूम शाह महमूद कुरैशी के 16 जुलाई के वक्तव्य से भारत सरकार के तमाम नेता और अफसर तिलमिला रहे होंगे, लेकिन वे अभी भी इससे कोई सबक लेने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत के विदेशमंत्री एस.एम. कृष्णा साहब उन्हें पहले ही भारत आने का न्यौता दे आए हैं और इस वर्षांत तक वह नई दिल्ली आकर भी वही कुछ दोहराएंगे, जो उन्होंने 16 जुलाई को इस्लामाबाद में आयोजित अपनी प्रेस क्रांफ्रेंस में कहा है। हमारे नेता और अफसर अभी यही कह रहे हैं कि कृष्णा की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान हुई बातचीत काफी सार्थक रही है और हम आगे यह सिलसिला जारी रखेंगे।

बहुत से लोगों ने इस 16 जुलाई के साथ 9 वर्ष पूर्व 2001 की इस 16 जुलाई का स्मरण किया है, जब पाकिस्तान के राष्ट्र्पति परवेज मुशर्रफ साहब भारत आये थे। आगरा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कई दौर की बातचीत के बाद, उनके हठवश जब बातचीत का कोई परिणाम नहीं निकाला, तो उन्होंने प्रेस को बुलाकर अपनी भड़ास निकाली और भारतीय नेताओं को बुरा भला कहते हुए अपनी औपचारिक यात्रा की अवधि पूरी होने के पहले ही बिना भारतीय नेताओं की परवाह किये अपने विशेष विमान से इस्लामाबाद रवाना हो गये। हमारे देश के नेताओं ने इसके बावजूद मुशर्रफ साहब के साथ वार्ताओं का क्रम बनाए रखा और उनसे सीमा समस्या, आतंकवाद व कश्मीर समस्या के समाधन की आशा बनाए रखी।

पता नहीं हमारे देश के नेताओं को यह सीधी सी बात कब समझ में आयेगी कि भारत-पाकिस्तान का विवाद कोई मात्र दो पड़ोसी देशें का विवाद नहीं है। उसके मसले दो पड़ोसियों के सिद्धांत से हल नहीं हो सकते। इसी तरह कश्मीर समस्या भी किसी क्षेत्रीय असंतोष की समस्या नहीं है। यह हिन्दू विरोधी मुस्लिम साम्राज्यविस्तार की समस्या है।

आज तमाम पत्रकार, नेता व बुद्धिजीवी यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर क्यों पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने गुरुवार को भारत के गृहसचिव जी.के. पिल्लै की तुलना लश्कर-ए-तैयबा के अध्यक्ष हाफिज सईद से की, फिर अगले दिन शुक्रवार को उन्होंने भारत के विदेशमंत्री का मजाक उड़ाया। क्या इस तरह किन्ही दो पड़ोसी देशों के बीच कोई बातचीत चल सकती है। वास्तव में पाकिस्तान स्वय यह बातचीत आगे नहीं बढ़ाना चाहता, लेकिन बातचीत रोकने या वापस लेने का ठीकरा वह भारत के सिर फोड़ना चाहता है। लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि पाकिस्तान वार्ता शुरू करने की लगातार मांग करता रहा है, वही उसके शुरू होने पर उसे भंग करने पर आमादा है।

वास्तव में पाकिस्तान के लिए वार्ता की मेज भी किसी युद्ध भूमि से कम नहीं होती। हमेशा उसकी एकमात्र मंशा भारत को नीचा दिखाने या से पराजित करने की रहती है। वह जो काम सीमा पर सैनिक कार्रवाई द्वारा अथवा सीमा पार जिहादी घुसपैठियों द्वारा नहीं करा पा रहा है, उसे वह वार्ता की मेज पर संपन्न करा लेना चाहता है। वास्तव में दोनों के बीच वार्ताओं के मुद्दे पर ही कोई सहमति नहीं है। भारत के लिए बातचीत का मुख्य मुद्दा है आतंकवाद, तो पाकिस्तान के लिए मुख्य मुद्दा है कश्मीर। फिर भी दोनों ही समग्र बातचीत का नाटक कर रहे हैं। यह ‘समग्र वार्ता’ एक कूटनीतिक शब्दावली है, जिसका भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए अलग-अलग अर्थ है। अंतर्राष्ट्र्ीय दबाव के कारण दोनों देश आपसी मसले निपटाने के लिए युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए उसी दबाववश् बातचीत करना चाहते हैं। पाकिस्तान तो युद्ध का विकल्प छोड़ चुका है, क्योंकि वह तीन-तीन बार मंुह की खाने के बाद समझ गया है कि युद्ध करके भारत से पार नहीं पाया जा सकता। दूसरा विकल्प उसने आतंकवाद का चुना, जिस पर वह अभी भी कायम है, लेकिन अमेरिका दबाव वश उसे इस आतंकवाद पर कुछ न कुछ दिखावे के लिए ही सही अंकुश लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। भारत आतंकवाद से पीड़ित देश है, लेकिन इसका जवाब वह अपनी सैनिक शक्ति से नहीं दे सकता, क्योंकि उसे उूपर भी अमेरिका व चीन जैसे देशों का दबाव है कि वह पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की सैनिक कार्रवाई का दुस्साहस न करे। अब इसके बाद भारत क्या करे। बातचीत के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बाच है और बातचीत की मेज पर जब वह आतंकवाद का मसला उठाना चाहता है, तो पाकिस्तान की कोशिश वह मेज ही पलट देने की होती है। क्योंकि पाकिस्तान आतंकवाद के मसले पर कोई बातचीत करना ही नहीं चाहता। आतंकवाद भारत के प्रति उसकी राष्ट्र्ीय नीति का मुख्य अंग है, फिर वह उस पर भारत से कोई समझौता कैसे कर सकता है। इसलिए उसका तर्क रहता है कि पहले आप कश्मीर पर बातचीत कीजिए। हम आतंकवाद के मसले पर भी बातचीत करने के लिए तैयार है, पर पहले कश्मीर का मसला तय हो जाए, फिर आतंकवाद का भी मसला देख लेंगे। इधर भारत है, जो कश्मीर पर कोई बातचीत नहीं करना चाहता, इसलिए वह कहता है कि ठहरिए हम कश्मीर पर भी बातचीत करने के लिए तैयार हैं, लेकिन पहले आतंकवाद से राहत मिले तो। वह चाहता है कि पाकिस्तान पहले आतंकवाद रोकने का वचन दे और उसे पूरा करने के लिए ठोस कार्रवाई करे, फिर कश्मीर पर भी बात की जा सकती है। जाहिर है जब दोनों देशों की प्राथमिकताएं बिल्कुल भिन्न है, तो उनके बीच कोई बातचीत भला कैसे हो सकती है।

15 जुलाई को इस्लामाबाद में निर्धारित इस बातचीत में भी यही हुआ। कई दौर की मैराथन बातचीत हुई। खुलेआम सबके सामने, फिर अलग कमरे में और फिर अकेले-अकेले रहकर भी बातें हुई। इतनी बातें कि दोनों की निर्धारित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस 6 घंटे देर से शुरू हो सकी, फिर भी दोनों का आपसी गतिरोध टूट नहीं सका। टूटता भी कैसे न एस.एम. कृष्णा, जनाब एस.एम. कुरैशी की बात मान सकते थे और न कुरैशी साहब एस.एम. कृष्णा की। संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में दोनों ने यथा संभव सहज दिखने की कोशिा की, लेकिन थोड़ी ही देर में दोंनों का नकाब उखड़ गया। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाते और सफाई देते नजर आए। इस दौर में एस.एम. कुरैशी ने भारत के गृहसचिव जी.के. पिल्लै की लश्कर-ए-तैयबा के अध्यक्ष हाफिज सईद से तुलना कर डाली। जाने क्यों एस.एम. कृष्णा ने उसकी इस बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी को नजरअंदाज कर गये। उन्हें इसका तत्काल जवाब देना चाहिए था, लेकिन वह चूक गये। बाद में दिल्ली पहुचकर उन्होंने इस पर बहुत सारी सफाई दी, लेकिन मौके पर जवाब न दे पाने का क्षोभ पूरे देश को साल रहा है। पे्रस के साथ बातचीत में भारत की विदेश सचिव निरूपमा राव ने इसकी सफाई देते हुए कहा कि पत्रकारों के सवालों के बौछारों के बीच हो सकता है कि विदेशमंत्री उसे नजरंदाज कर गये हों, अथवा हो सकता है कि शालीनतावश उन्होंने उस अवसर को और अधिक कटु होने से बचाने के लिए उस पर कोई जवाब न दिया हो, लेकिन उन्होंने इस तुलना पर अपनी सहमति व्यक्त की हो, यह तो संभव ही नहीं है। निश्चय ही इसमें दो राय नहीं कि कृष्णा, कुरैशी की उस तुलना से सहमत नहीं हो सकते, किंतु मौके पर जवाब न दे सकने की चूक उनके लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए भारी पड़ी। और इसके बाद अगले दिन, अभी शायद भारत के विदेशमंत्री की वापसी उड़ान पाकिस्तान से रवाना भी नहीं हुई थी कि कुरैशी साहब ने अखबार वालों को बुलाकर जो बयान दिया, वह बेहद आपत्तिजनक था, जिस पर भारत के पूर्व विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा की टिप्पणी थी कि कुरैशी किसी भी तरह किसी देश के विदेशमंत्री होने लायक नहीं है।

उन्होंने सबसे पहले तो एस.एम. कृष्णा की अधिकारिक क्षमता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा किया। उनका संकेत था कि उन्हें बातचीत के पूरे अधिकार देकर इस्लामाबाद नहीं भेजा गया। कुरैशी ने कहा कि उन्होंने पूरे दिन की बातचीत में एक बार भी टेलीफोन नहीं उठाया, जबकि भारतीय अधिकारी बार-बार वार्ता कक्ष से बाहर जाते रहे और फोन करते रहे। कृष्णा को भी बार-बार फोन पर दिल्ली से निर्देश मिल रहे थे। मैंने पूरे अधिकार के साथ पाकिस्तान की टीम का नेतृत्व किया, जबकि कृष्णा साहब शायद बातचीत की पूरी तैयारी के साथ नहीं आए थे। उनका यह भी कहना था कि पाकिस्तान हर तरह की बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन वह वार्ता सार्थक होनी चाहिए। लेकिन साथ में यह आग्रह भी था कि पाकिस्तानी जनता तथा कश्मीरियों को जम्मू-कश्मीर की स्थिति से कतई अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसके पहले संयुक्त पे्रस कांफ्रेंस में भी इस बात को कहा था कि भारत यदि कश्मीर में अपनी सेना भेजता है, तो उसका प्रभाव पाकिस्तान पर पड़ता है।

कुरैशी के इस वक्तव्य से भारत के नेता व अधिकारी भौचक थे। दिल्ली पहुंचते ही कृष्णा ने इसकी सफाई दी कि 15 जुलाई को उन्होंने बातचीत के दौरान फोन पर किसी से कोई बात नहीं की। मुझे दिल्ली से कोई निर्देश लेने की आवश्यकता नहीं थी। मेरे सामने सब कुछ स्पष्ट था। कहीं कोई भ्रम की स्थिति नहीं थी। इस बारे में पाक विदेशमंत्री जो कुछ कह रहे हैं, वह झूठ बोल रहे हैं। वार्ता के दौरान उग्रता व चिड़चिड़ेपन (एक्रिमनी)का भी उनका आरोप गलत है। यदि किसी तरह की रुक्षता व चिड़चिड़ेपन का प्रदर्शन हुआ, तो वह पाकिस्तानी प्रतिनिधियों की तरफ से ही हुआ। कृष्ण ने जी.के. पिल्लै की तुलना हाफिज सईद से किये जाने पर भी अपनी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी तुलना पर सहमति व्यक्त करने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता। पिल्लै ने तो केवल एक तथ्य का हवाला दिया है, जिसके दस्तावेजी सुबूत हैं। पिल्लै ने यही तो कहा कि पाकिस्तानी मूल का जिहादी अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली ने इसकी पुष्टि की कि 26@11 का मुंबई हमला पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आई.एस.आई. द्वारा कराया गया। आई.एस.आई. ने ही हमले की योजना बनाने वाले लश्कर-ए-तैयबा के अधिकारियों को 25 लाख रुपये नाव खरीदने के लिए दिया था, जिस पर सवार होकर हमलावर आतंकवादी मुंबई पहुंचे थे। यह बयान हेडली ने भारत की राष्ट्र्ीय जांच एजेंसी के अधिकारियों के समक्ष तब दिया, जब वहां अमेरिकी संघीय जांच एजेंसी एफ.बी.आई. के अधिकारी तथा हेडली के अपने वकील भी उपस्थित थे। इस बयान पर पिल्लै की तुलना उस जिहादी सरगना हाफिज सईद से कैसे की जा सकती है, जो आए दिन भारत के खिलाफ खूनी जंग छेड़ने तथा उसके पांच टुकड़े करने की बातें करता रहता है। कुरैशी ने पिल्लै की तुलना सईद से करते हुए कहा था कि ऐसे वक्तव्य देते हुए कैसे आश की जा सकती है कि भारत-पाक संबंध सुधरेंगे तथा वे आगे बढ़ेंगे। कुरैशी का यह भी कहना था कि बातचीत के प्रति भारत का रुख गंभीर नहीं है। थिम्पू (भूटान)में ‘सार्क’ (दक्षिण एशियायी क्षेत्रीय सहयोग संगठन)शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच जो सहमति हुई थी, यह उसके विरुद्ध है। पाकिस्तान निश्चय ही हर मसले पर बातचीत के लिए तैयार है, किंतु वह किसी जल्दबाजी में नहीं है। भारत यदि अपनी चिंताओं पर पाकिस्तान से मदद चाहता है, तो उसे पाकिस्तान की चिंताओं पर भी गौर करना चाहिए। इसके लिए भारत को खुले दिन से बात करनी होगी। यह कैसे हो सकता है कि हम भारत की चिंताओं के प्रति ध्यान केंद्रित करें, लेकिन भारत हमारी चिंताओं की तरफ कोई ध्यान न दे।

यह तो रही इस वार्ता की कहानी। अब कल्पना करें कि यदि वार्ता का दौर आगे बढ़ता है और नवंबर में जनाब कुरैशी भरत तशरीफ लाते हैं, तो वार्ता कहां से आगे बढ़ेगी और उसका क्या परिणाम होगा। साफ जाहिर है कि इस वार्ता श्रंृखला का कभी कोई परिणाम नहीं निकलने वाला है। पाकिस्तान और भारत दोनों ही चाहते हैं कि समस्याओं के समाधान के लिए समयबद्ध कार्यक्रम निर्धारित हों। लेकिन फिर वही समस्या। पाकिस्तान का कहना है कि आतंकवाद पर नियंत्रण के बारे में वह कोई समय सीमा निर्धारित नहीं कर सकता, क्योंकि वह स्वयं आतंकवादी हिंसा से पीड़ित है। दूसरी तरफ भारत कश्मीर के मामले में कोई समय सीमा तय करने के लिए तैयार नहीं है। तो इसका अर्थ है कि वार्ता यदि चलती है तो केवल एक अर्थहीन मुलाकातों की श्रंृखला होगी। पाकिस्तान का बार-बार कहना है कि वह केवल फोटो खिंचवाने के लिए वार्ताओं का आयोजन नहीं चाहता, लेकिन वर्तमान गतिरोध की स्थिति में कोई वार्ता फोटो खिंचवाने और फिर आगे मिलते रहने के वायदे के अलावा और कोई निर्णय ले भी नहीं सकती।

आप सवाल कर सकते हैं कि फिर क्या हो सकता है। जवाब है कि कुछ नहीं हो सकता। जब तक पाकिस्तान का अस्तित्व है, तब तक भारत-पाकिस्तान का संघर्ष भी चलता रहेगा और तब तक कश्मीर की समस्या भी बनी रहेगी। और जैसा कि वीर संघवी ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने कॉलम में लिखा है कि हो सकता है कि पाकिस्तान के न रहने पर भी यह समस्या बनी रहे। यह जरूरी नहीं कि पाकिस्तान के बिखर जाने से यह समस्या हल हो जाएगी। हां पाकिस्तान के बिखर जाने से उसका संगठित खतरा अवश्य कम हो जाएगा। इस देश के बहुत सारे लोग इस निष्कर्ष से सहमत नहीं होंगे, लेकिन यदि वे सहमति नहीं होते हैं, तो इसका केवल एक ही कारण है कि वे समस्या को ठीक से समझ नहीं रहे हैं। अपने देश का एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ पाकिस्तानी मीडिया के साथ मिलकर ‘अमन’ का एक अभियान चला रहा है। अपने देश के बहुत से प्रतिष्ठित पत्रकार तथा बुद्धिजीवी समझते हैं कि भारत-पाक समस्या अंग्रेज साम्राज्यवादियों की देन है और आज के राजनीतिक नेता अपने निहित स्वार्थवश उस द्वेष द्वंद्व को बनाए हुए हैं, इसलिए यदि देनों देशों के नागरिकों के बीच मेलजोल बढ़े, तो यह समस्या अपने आप हल हो जाएगी। दोनों देश आखिर पहले एक ही तो थे। वे परस्पर भाई-भाई हैं। राजनीतिक बाधाएं दूर हो जाएं, तो वे फिर भाई-भाई की तरह रह सकते हैं। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि भारत तो एक था ही, अगर भाई-भाई साथ रहना चाहते, तो अंग्रज भला उन्हें कैसे अलग कर सकते थे। पाकिस्तान का निर्माण अंग्रेजों के माध्यम से जरूर हुआ, लेकिन उसके निर्माता अंगे्रज नहीं थे। हिन्दुओं से मुसलमानों के मजहबी विरोध के कारण पाकिस्तान का जन्म हुआ है और वह भी मुसलमानों ने हिंसा के जोर पर हासिल किया था। इतिहास साक्षी है और इसके अगणित दस्तावेजी सबूत हैं कि मुस्लिमों की हिंसा से भयभीत कांग्रेस के नेताओं ने देश को गृहयुद्ध से बचाने के लिए पाकिस्तान का निर्माण स्वीकार किया। ‘हंस के लिया है पाकिस्तान- लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान’ यह नारा किसी अंग्रेज ने नहीं सिखाया था। इसका मतलब यह हुआ कि जब तक मुलसमानों की मजहबी अलगाववादी सोच में बदलाव नहीं आता, इस समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता। लेकिन इस्लाम की तमाम शक्तियां इस बदलाव को रोकने में लगी हैं। पाकिस्तान उन कट्टरपंथी शक्तियों का संगठित मूर्तमान स्वरूप है। उसकी सर्वग्रासी राजनीतिक आकांक्षा कश्मीर की भूमि प्राप्त करके भी शांत होने वाली नहीं है। भारत-पाकिस्तान की सीमा समस्या या कश्मीर की समस्या यदि मात्र जमीन की समस्या होती, तो उसका समाधान आसान था। कश्मीर का एक बहुत आसान समाधान था कि वर्तमान नियंत्रण रेखा को ही अंतर्राष्ट्र्ीय रेखा मान लिया जाए। इंदिरा गांधी ने शिमला में जब जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ द्विपक्षीय समझौता किया था, तो दोनों नेताओं के बीच इसी बिंदु पर सहमति बनी थी। किंतु भुट्टो के आग्रह पर इसे समझौते की शब्दावली में शामिल नहीं किया गया। भुट्टो ने इंदिरा गांधी को धोख दिया। वह पाकिस्तान पहुंचकर अपने वायदे से मुकर गये।

अब वर्तमान स्थिति में न तो पाक अधिकृत कश्मीर भारत को मिलना है- भले ही अपने नक्शे में वह उसे भारत का अंग दिखाता रहे- और न भारत के कब्जे वाला कश्मीर पाकिस्तान को, क्योंकि भारत उसे अभिन्न अंग मानता है और देश की किसी सरकार या यहां के किसी राजनेता में यह साहस नहीं कि वह भारतीय कश्मीरी भू भाग को पाकिस्तान के हवाले कर दे। दोनों कश्मीरों को मिलाकर अलग कश्मीर राज्य बनने की भी कोई संभावना नहीं है। जो लोग कश्मीर की स्वायत्तता की बात करते हैं, वे केवल एक धोखे की शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, जिसके सहारे अंतर्राष्ट्र्ीय जनमत तैयार करके कश्मीर को भारत से अलग किया जा सके, फिर उससे अलग होने के बाद तो वह पाकिस्तान का हिस्सा बन ही जाएगा।

तो फिर रास्ता क्या है ? रास्ता केवल एक है। यदि भारत सरकार के किसी शीर्षनेता में साहस हो तो वह आगे बढ़े और वर्तमान नियंत्रण् रेखा को अंतर्राष्ट्र्ीय सीमा घोषित करने की पहल करे। इसके लिए अंतर्राष्ट्र्ीय जनमत तैयार करना भी बहुत मुश्किल नहीं होगा। इसके बाद भारतीय नियंत्रण वाले कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करके उसे किसी भी अन्य सामान्य भारतीय राज्य का दर्जा प्रदान करे। कश्मीर से जिन गैर मुस्लिमों को बाहर भागने पर मजबूर कर दिया गया, उन्हें पुनः बसाने का यत्न करें। और जिहादी कट्टरपंथी विचारधारा के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष का अभियान शुरू करें। मजहबी तुष्टीकरण का (चाहे वह कोई मजहब हो)पूरी तरह निषेध करके शुद्ध लोकतांत्रिक मूल्यों का अनुपालन करे। और इसके विरुद्ध कोई आवाज उठती है, तो उसे कठोरता से कुचलने का उपक्रम करे। और यदि यह सब नहीं हो सकता, तो हमें अनंतकालीन संघर्ष व आतंकवादी हिंसा झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। वर्तमान स्थिति में वर्तमान नीतियों के तहत न भारत-पाक समस्या का कोई समाधान है, न कश्मीर समस्या का।(18-7-2010)