सोमवार, 2 अगस्त 2010

आध्यात्मिक गुरुओं की सामाजिक भूमिका का प्रश्न

आध्यात्मिक गुरुओं की सामाजिक भूमिका का प्रश्न





वाल्मीकि, व्यास प्रभुति गुरुओं एवं आचार्यों की पूरी परंपरा -तुलसी पर्यंत- सामाजिक उद्देश्यों के प्रति समर्पित रही है, किंतु आज अपवादों को छोड़कर प्रायः सारे धार्मिक गुरु एवं आचार्य केवल आध्यात्मिक साधना का ही उपदेश देते हैं और स्वयं सत्य की साधना से अधिक निजी सुविधा और वैभव की साधना में निमग्न रहते हैं। धर्माचार्यों की परंपरा में केवल जैन परंपरा ऐसी रह गयी है, जिसके साधु-साध्वी अभी धन संजय से विरत हैं, किंतु सुविधा तथा वैभव भोग की प्रवृत्ति उनमें भी बढ़ती जा रही है। ऐसे में क्या उपयोगिता रह गयी है उन परंपराओं के निर्वाह की, जो हजारों वर्षों से मात्र एक रुढ़ि निर्वाह के रूप में चली आ रही है।



वर्षाऋतु के प्रारंभ के साथ ही संन्यासियों, जैन संतों तथा साधक साधु साध्वियों का चातुर्मास व्रत पारंभ हो गया है। सनामन धर्मावलंबीजन आषढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से चातुर्मास का का प्रारंभ करते हैं। जैन समाज की विवध शाखाओं के संत व साध्वीवृंद अलग-अलग तिथियों से अपना चातुर्मास प्रारंभ करते हैं। सामान्यतया आषाढ़ मास की पूर्णिमा इसकी सर्वाधिक मान्य तिथि है, जब चातुर्मास साधना व व्रत का काल शुरू हुआ माना जाता है। यह पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा के रूप में भी मनायी जाती है। माना जाता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास, जिन्हें कृष्ण द्वैपायन व्यास के नाम से भी जाना जाता है -संपूर्ण भारतीय संस्कृति के अधिष्ठाता आचार्य। अपने युग के संपूर्ण भाषा निबद्ध ज्ञान का संकलन, विभाजन और संपादन का अद्भुत कार्य उनके द्वारा किया गया। वेदों के संपादन के अतिरिक्त उन्होंने महाभारत जैसे विराट इतिहास ग्रंथ तथा ‘ब्रह्मसूत्र’ जैसे दर्शन ग्रंथ की भी रचना की। 18 पुराणगंरथों की रचना श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है। ऐसे महान आचार्य की जन्मतिथि को यदि सभी गुरुओं एवं आचार्यों की स्मृतितिथि के रूप में मनाया जाने लगे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। उनकी जन्मतिथि की ठीक-ठीक जानकारी किसी को हो, यह तो असंभव ही है, इसलिए यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि चातुर्मास के प्रारंभ की पूर्णिमा को ही प्रतीक रूप में उनकी जन्मतिथि स्वीकार कर लिया गया। वर्षाकालीन साधना पर्व के प्रारंभ में महान आचार्य वेदव्यास के प्रति श्रद्धा अर्पित करना स्वभावतः प्रत्येक भारतीय का प्रमुख कर्तव्य है।

चातुर्मास आजकल केवल जैन समाज के साथ जुड़ा रह गया है। थोड़े से कुछ संन्यासी भी वर्षाकाल के इन चार महीनों में अपनी यात्राएं रोक देते हैं तथा किसी एक ही स्थान पर रहकर साध्ना व सदुपदेश करते हुए अपना समय व्यतीत करते हैं। अन्यथा बाकी समुदायों के लिए इसका कोई विशेष अर्थ नहीं रह गया है। फिर भी चातुर्मास की यह परंपरा बहुत पुरानी है। शायद वैदिक काल में भी यह प्रचलित थी। वास्तव में यह ऋतु पर्व है। इसलिए वैदिक गं्रथों में तीन ‘चातुर्मासों’ का वर्णन आता है, जो तीन प्रमुख ऋतुओं से संबद्ध है। पहला चातुर्मास फाल्गुन अथवा चैत्र से प्रारंभ माना जाता था और यह ‘वैश्वदेव’ (विश्वदेवता) के लिए समर्पित था। यह बसंतकालीन चातुर्मास था। दूसरा वर्षाकालीन चातुर्मास आषाढ़ पूर्णिमा -या आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी- से प्रारंभ होता था। इसे ‘वरुण प्रघास’ कहते थे। यह शायद वरुण (जल) और घास (जो खाया जाए अर्थात अन्न) को समर्पित था, इसलिए इसे ‘वरुण प्रघास’ कहते थे। वर्षा के काल आकाश से जल की झड़ी लग जाती थी, तो धरती से असंख्य अंकुर फूट पड़ते थे, जिससे पूरी धरती वनस्पतियों और तृण -घास- से भर जाती थी। कार्तिक पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाले शारदीय या हेमंत चातुर्मास को ‘साकमेघ’ की संज्ञा दी गयी थी। इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या था, यह स्पष्ट नहीं है, किंतु शायद यह भी शरदकालीन कृषि से संबद्ध था।

प्राचीन गं्रथों के अनुसार आषाढ़ की पूर्णिमा, एकादशी या द्वादशी को जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है, तब चातुर्मास व्रत का प्रारंभ होता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि चातुर्मास व्रत का प्रारंभ चाहे जिस तिथि को हो, किंतु उसका समापन कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जहां देवशयनी या हरिशयनी (देवताओं की सोने की) की एकादशी के नाम से जाना जाता है, वहीं कार्तिक शुक्लपक्ष की एकादशी को ‘देवोत्थानी’ (देवताओं के जागने की) कहा गया है। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी को सभी देवतागण सो जाते हैं और फिर चाह महीने बाद देवोत्थानी एकादशी को जगते हैं। देवताओं का शयनकाल मानकर ही इन चार महीनों में कोई शुभ कार्य विवाहादिक नहीं किया जाता है। लेकिन वास्तव में यह देवशयनी ओर देवोत्थानी एकादशी वर्षा के ऋतुकाल की एक कविकल्पना मात्र है। सूर्य वैदिक ऋषियों में सबसे बड़े देवता थेे। उनकी ही गति से धरती का सारा जीवन संचालित होता था। विष्णु और हरि आदि नाम ‘सूर्य’ के ही पर्याय हैं। वर्षाकाल में अधिकांश समय सूर्यदेवता अधिकतर बादलों में छिपे रहते हैं, इसलिए वैदिककालीन किसी कवि ने कह दिया कि वर्षा के इन चार महीनों में हरि (सूर्यदेव) सो जाते हैं। धरती पर उनकी उूष्मा व प्रकाश का पहुंचना कम हो जाता है। फिर जब वर्षाकाल समाप्त हो जाता है, तो वह जागृत हो जाते हैं। वस्तुतः ये व्रत-त्यौहार व परंपराएं जिन दिनों की हैं, उन दिनों वर्षाकाल में कहीं इधर-उधर जाना सचमुच बहुत कठिन और खतरे से भरा था। धरती पर सर्वत्र नव वनस्पतियों के उग जाने से मार्ग खो जाते थे। छोटे-छोटे नदी नालों में बहने वाला पानी भी रास्तों को छिन्न-भिन्न कर देता था। सर्पादिक जंतुओं का भी खतरा बढ़ जाता था। इसलिए सुरक्षा व सुविधा के लिए यह आवश्यक हो जाता था कि निरंतर भ्रमण करने वाले साधु, संत, संन्यासी, परिव्राजक व्यापारी आदि वर्षाकाल बितान के लिए कहीं किसी ग्राम, नगर आदि में ठहर जाते थे, जहां आहार का कष्ट न हो और सुरक्षित वातावरण में कालयापन किया जा सके।

विकास के इस युग में इस सबकी अब कोई आवश्यकता नहीं रह गयी है, फिर भी कुछ लोग हजारों वर्ष पूर्व मजबूरी में अपनायी गयी प्रथाओं का आज भी निर्वाह करते आ रहे हैं। जैन समाज के लिए तो ये चार महीने अद्भुत उत्साह व उत्सव के दिन होते हैं। साधु, साध्वियों एवं आर्चिकाओं के प्रभाव में तमाम श्रावक, श्राविकाएं या उपासक-उपासिकाएं भी तरह-तरह के कठिन व्रत, जप, अनुष्ठान आदि का आयोजन करते हैं। बहुत से साधु, संत एवं मुनिगण अपनी आत्मिक साधना के साथ अपने अनुयायियों के चरित्र निर्माण, व्यसन मुक्ति तथा परंपरा पालन हेतु उपदेशों की श्रृखला चलाते हैं। इनसे समाज को लाभ भी होता है, किंतु परंपरा में बंधे साधु संत परंपराओं की सीमा में ही अपने उपदेश देते हैं। वे आज की सामाजिक व राष्ट्रीय समस्याओं से टकराने का खतरा नहीं मोल लेते।

महर्षि व्यास ने अपने युग की समस्याओं से टकराने की कोशिश की थी। उन्होंने दर्शन, धर्म, राजनीति व सामाजिक आचार जैसे प्रायः सभी महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर एक आदर्श स्थापित करने की कोशिश की।

भगवद्गीता जैसा दार्शनिक गं्रथ उनके महान ऐतिहासिक महाकाव्य का एक अंश मात्र है, जिसमें उन्होंने कर्म की श्रेष्ठता का प्रतिपादन का है। यद्यपि बाद के अनेक दार्शनिक आचार्यों ने अपने मत की स्थापना के लिए अपने विचारों वाले बहुत से श्लोक उसमें डाल दिये, जिससे वह एक अत्यंत जटिल गं्रथ बन गया, अन्यथा उसमें कर्म की श्रेष्ठता का जैसा प्रतिपादन किया गया है, अन्यथा कहीं भी दुर्लभ है। आज की जाति-वर्ण संबंधी समस्याएं व्यास के अपने युग में भी थीं, किंतु व्यास ने तार्किक ढंग से उनका निराकरण करने की कोशिश की। यह जरूरी नहीं कि उनके समाधान आज भी इस्तेमाल में लाएं जाएं, लेकिन उनकी प्रगतिशीलता से तो आज भी प्रेरणा ली जा सकती है। महाभारत में कृष्ण के मुख से उन्होंने कहलवाया है कि अब तक समाज में रक्त मिश्रण इतना हो चुका है कि वंश पंरपरा के हिसाब से किसी का वर्ण निर्धारण नहीं किया जा सकता। वर्ण का निर्धारण अब केवल गुण और कर्म के आधार पर ही हो सकता है। वहां कृष्ण का वचन है- ‘चातुर्वूयम् मयाकृत्यम् गुण कर्म विभागशः’ अर्थात समाज का चार वर्णों में विभाजन मैंने गुण (स्वभाव) व कर्म के आधार पर किया है। यानी जन्म से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह छोटा सा उल्लेख मात्र एक उदाहरण के लिए किया गया है। उद्देश्य यह कहना है कि आज के आचार्यों को भी परंपरा का अंधानुकरण करने के बजाए समाज की तात्कालिक आवश्यकताओं को देखते हुए उसके समक्ष उत्पन्न चुनौतियों के निराकरण का उपाय ढूंढ़ना चाहिए। जो पुराना है, वह अच्छा भी हो, यह जरूरी नहीं (कालिदास के शब्दों में) पुराणमित्येव न साधु सर्वम- और इसी तरह जो नया है, वह सब बुरा ही हो, यह भी जरूरी नहीं।

हमारे देश की यह एक गंभीर समस्या रही है कि हमारे यहां व्यास-वाल्मीकि की परंपरा वाले आचार्यों से भिन्न आचार्यों ने लौकिक जीवन पर पारलौकिक जीवन को इस तरह थोप दिया कि पूरा लौकिक जीवन ही निरर्थक हो गया। आध्यात्मिक जीवन और उसके साथ जुड़े आचार का महत्व इतना अधिक बढ़ गया कि उससे भिन्न जीवनशैली वाले निंदित एवं हीन कोटी में आ गये। यह सही है कि यहां ऐसे भी आचार्य हुए और ऐसी दार्शनिक शाखाएं भी विकसित हुईं, जिन्होंने शूद्र (अशिक्षित या संस्कारहीन) को उच्च आध्यात्मिक जीवन एवं मोक्ष से वंचित कर दिया। पूर्व मीमांसा स्कूल को इस मामले में अग्रणी कह सकते हैं, जिसने शूद्रों के लिए वेदाध्ययन व यज्ञ संपादन वर्जित कर दिया, लेकिन उस शाखा के प्रारंभिक काल में भी ऐसे आचार्य हुए, जैसे महर्षि बादीर, जिन्होंने यह मत प्रतिपादित किया कि शूद्र भी वेदाध्ययन कर सकते हैं और यज्ञ भी संपादित कर सकते हैं। महाभारत के रचयिता व्यास ने तमाम रूढ़िवादी आचार्यों के विचारों का खंडन करते हुए अपने ग्रंथ में स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया। विदुर पारंपरिक ब्रह्मविद्याविद थे। कृष्ण ने दुर्योधन का राजकीय आतिथ्य छोड़कर विदुर के घर जाकर भोजन करना श्रेयस्कर समझा था। महाभारत के ही वन पर्व में धर्मव्याध की कहानी हाती है, जो शूद्र था, किंतु ब्रह्मविद्या का ज्ञाता था। वैदिक काल में भी रथकार को वैदिक अग्नि प्रतिष्ठापित करने की अनुमति दी गयी थी। भागवतपुराण तो यहां तक कहता है कि जन्म से चांडाल, लेकिन विष्णु भक्त वैष्णव उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ हैं, जो जन्म से तो ब्राह्मण है, किंतु विष्णु भक्त या आचारवान नहीं है।

भारतीय परंपरा का मूल प्रेरक तत्व यह है कि गलत रूढ़ियों का खंडन करने वाला कोई न कोई आचार्य उसी मूलधारा से पैदा होकर आगे आया, जिसने प्रगतिशीलता का मार्ग दिखाया। वैदिक यज्ञों की हिंसा और संकीर्ण स्वार्थ के लिए उनके प्रतिपादन के विरुद्ध उन यज्ञवादियों में से ही कोई उठ खड़ा हुआ। अफसोस की बात यह है कि हमारे देश की गुरु परंपरा में वह गतिशीलता नहीं रह गयी है, जो प्राचीनकाल के आचार्यों में थी। निर्वाण, अर्हतपद, मोक्ष या मुक्ति की आकांक्षा पालने का आज कोई औचित्य नहीं रह गया है, लेकिन विभिन्न पंथों के गुरु या आचार्य अभी भी देश की आम जनता को उसी में भरमाए हुए हैं।

आज के भारत को यदि उदाहरण के रूप में लें, तो यहां धर्म (रिलीज)- और भाषा की भी जाति बन गयी है। जातियां चूंकि राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने का साधन बन गयीं हैं, इसलिए जातिवाद खत्म होने के बजाए और और बढ़ रहा है और संघर्ष की जो स्थितियां मध्यपूर्व में विभिन्न धर्मों (रिलीजन) के कारण पेदा हुई थी (और आज भी चल रही हैं) वे इस देश में जाति के नाम पर पनप रही हैं। मनुष्यमात्र की यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जब वह एक समाज के तौर पर संगठित होता है, तो वह अपनी एक पहचान बनाना चाहता है। अपने देश में इस पहचान के लिए दो प्राकृतिक आधार चुने गये, एक जन्म का दूसरे व्यवसाय का। जन्म के आधार पर जाति बनी और व्यवसाय चयन के आधार पर वर्ण। देश की राजनीतिक व्यवस्था में जातियों को अपना आचार व्यवहार तय करने की पूरी स्वतंत्रता प्राप्त थी, इसलिए व्यवसाय और जन्म के आधार पर जातियों के संगठन बन गये। धर्म शास्त्रकारों ने चयनित व्यवसाय के आधार पर वर्णों के धर्म तो निर्धारित किये, जातियों के नहीं। जातियां अपनी व्यवस्था तय करने के लिए स्वतंत्र थीं। बस उन्हें वर्णधर्मों के उल्लंघन का अधिकार नहीं था। इस जातीय संगठन निर्माण की सुविधा ने इस देश में धार्मिक पहचान वाला कोई समाज नहीं बनने दिया। धार्मिक (रिलीजन) आचार्य अपने धार्मिक विश्वासों का प्रचार करते थे, लोग सुनते थे। जिन्हें जो पसंद आता था, उसका पालन करते थे, किंतु अपने सामाजिक व राजनीतिक जीवन के लिए अपने जातीय समुदाय के नियमों का ही अनुसरण करते थे। इसलिए यत्रतत्र कुछ गुरुओं के चेलों के बीच कहीं छोटा-मोटा संघर्ष भले हुआ हो, लेकिन अनुयायियों के समूह के बीच कभी कोई धार्मिक (मजहबी) संघर्ष नहीं हुआ। यह इस देश में जाति प्रथा का सबसे बड़ा वरदान था कि क्रुसेड व जिहादी जैसी कोई अवधारणा इस देश में नहीं पनप सकी। जाति समूहों की स्वतंत्रता के कारण इस देश में लोकतंत्र या गणतंत्र की भावना भी मजबूत हुई। हर जाति समूह अपने आप में लोकतांत्रिक समूहों को मिलाकर एक गांव बनता था। राजा केवल उन्हें सुरक्षा और न्याय की गारंटी देता था। किसी प्राकृतिक आपदा के समय उसे सुरक्षा और सहायता प्रदान करना भी राजा का कर्तव्य होता था। बाकी अन्य किसी मामले में लोगों के आपसी जीवन में राजा या राजनीति का कोई हस्तक्षेप नहीं रहता था। इस देश में ऐसी व्यवस्था कम से कम गुप्त युग तक तो जारी ही थी, जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कहा जाता है। कालिदास गुप्त युग की ही विभूति थे। उनके शाकुंतलम् नाटक के अंत में जब राजा दुश्यंत की मुलाकात मतंग ऋषि के आश्रम में अपने बेटे भरत से होती है, तो ऋषि, दुश्यंत को उनके पुत्र भरत को सौंपते हुए आशीर्वाद देते हैं कि वे लाखों लोकतंत्रों के अधिपति बने । इस आशीर्वाद से ही स्पष्ट है कि उस काल में राजा और राजनीति की सीमा तथा भूमिका क्या थी। आधुनिक युग के पिछले करीब 200 वर्षों के इतिहास पर नजर डालें, तो देश के पतन का दायित्व इस देश के अन्य दुर्गुणों पर अधिक जाएगा, जातिवाद पर कम। उदाहरण के लिए दक्षिण भारत के ही इतिहास का एक नमूना लें। 1818 में जब अंगे्रजों ने दक्षिण भारत पर अपना अधिकार जमाया, उस समय यह पूरा क्षेत्र करीब 600 छोटी बड़ी रियासतों में विभक्त था। इनमें से बमुश्किल एक दर्जन पर ब्राह्मणों का आधिपत्य रहा होगा। बाकी क्षत्रियों तथा अन्य जातियों के हाथ में थी। जो कुछ व्यापार वाणिज्य था, वह भी भाटियों, बनियों, मारवाड़ियों, जैनों और लिंगायतों के हाथ में था। ये सभी अवसरवादी और सुविधाभोगी थे। धार्मिक (रिलीजन) आचायों का तब भी उन पर प्रभाव था, लेकिन उन्होंने स्वातंत्र्य की कोई पे्ररणा नहीं दी। स्वतंत्रता की अलग जगाने के लिए तिलक जैसे ब्राह्मण को फिर महाभारत की गीता का सहारा लेना पड़ा।

आज के धार्मिक आचार्य भी सुविधा भोगी हो गये हैं। वे सदाचार, शांति, अहिंसा और सहिष्णुता का उपदेश तो देते हैं, किंतु अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष व प्राणाहुति का कोई उपदेश नहीं देते। आश्चर्य होता है उन दिगंबर जैनाचार्यों को देखकर जो सजी धजी पालकियों में बैठकर अपना जुलूस निकलवाते हैं, घड़ों दूध से अपने पैर धुलवाते हैं, स्त्री समूहों से पादवंदना कराते हैं। इसी तरह जगद्गुरु उपाधिकारी शंकराचार्य, रामानुजाचार्य आदि पीठाधीश्वर सोने चांदी के सिंहासनों पर बैठकर चांदी के पात्रों में भोजन करते हैं। सोने चांदी के तारों से बनाये गये छत्र धारण करते हैं और त्याग तपस्या का उपदेश देते हैं। क्या आदि शंकराचार्य या आदि रामानुजाचार्य का जीवन भी ऐसा ही वैभव विलासपूर्ण रहा होगा। क्या महावीर स्वामी ने ऐसी ही सजी पालकियों में बैठकर कभी नगर भ्रमण किया होगा। सवाल है, क्या अर्थ रह गया है आज की चातुर्मास साधना, गुरुपूर्णिमा या गुरुपूजा का। क्या आज के तमाम संप्रदायाचार्यों, गुरुओं तथा पीठाधीश्वरों को आज के भारत देश व समाज की कोई चिंता है? क्या उन्हें अहसास भी है उन चुनौतियों का जो आज देश के सामने खड़ी हैं? भारत के एक राष्ट्र् का स्वरूप लिए 6 दशक से अधिक हो गये हैं, लेकिन इस देश् के धर्मगुरु अभी भी हजार साल पहले के सामंती युग में जी रहे हैं, जब राष्ट्र् की कोई कल्पना नहीं थी। और यदि कोई राष्ट्र्ीय संदर्भ में सोचता भी है, तो वह उन चुनौतियों से टकराना नहीं चाहता, जो राष्ट्र् के सामने सबसे बड़ा ख्तरा बनकर खड़ी हैं।

वैयक्तिक विकास तथा आत्मिक शांति के लिए आध्यात्मिकता उपयोगी हो सकती है, लेकिन देश की राष्ट्र्ीय एकता, अस्मिता और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए राजनीति व समाज नीति पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, आज इसीलिए व्यास, वाल्मीकि, तुलसी, विद्यारण्य स्वामी, स्वामी रामदास जैसे गुरुओं की आवश्यकता है। आज के गुरु उनके जैसे नहीं बन सकते, तो उनका अनुकरण तो कर ही सकते हैं। आज के समय में गुरु पूर्णिमाएं तभी सार्थक हो सकती हैं, जब आज के गुरु पहले स्वयं अपने को रुढ़ियों से मुक्त करें, फिर देश और समाज को भी गर्हित रुढ़ियों से बाहर निकालकर से प्रगतिशील मानवता के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सके। (25-7-2010)