गुरुवार, 15 जुलाई 2010


स्वामी विद्यारण्य और महाराजा कृष्णदेवराय


आंध्र प्रदेश सरकार एक वर्ष देर से ही सही, लेकिन इस वर्ष वियजनगर साम्राज्य के सबसे यशस्वी शासक कृष्णदेव राय के शासन की पांचवी शताब्दी का उत्सव सप्ताह मना रही है, जिसका उद्घाटन राष्ट्र्पति प्रतिभा पाटिल ने किया है। विजयनगर साम्राज्य का स्मरण केवल दक्षिण के एक वैभव संपन्न साम्राज्य का ही स्मरण नहीं है, बल्कि यह दक्षिण की एक सांस्कृतिक व राजनीतिक चेतना का भी स्मरण है, जिसे एक संत स्वामी विद्यारण्य ने जागृत किया था। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य देश के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करना था, जिस पर उन दिनों लगातार हमले शुरू हो गये थे। और जिन लोगों ने इसे नष्ट किया, उनका भी लक्ष्य साम्राज्य विस्तार नहीं, बल्कि भारतीयता के इस सांस्कृतिक गढ़ को नष्ट करना था। क्या आज हम इस उस चेतना के पुनरुद्धार का संकल्प ले सकते हैं, जिसे स्वामी विद्यारण्य ने जगाया था।



भारतीय इतिहास के मध्यकाल में दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य को लगभग वैसी ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी, जैसी कि प्राचीनकाल में मगध, उज्जैनी या थाणेश्वर के साम्राज्य को प्राप्त थी। इस साम्राज्य के सबसे यशस्वी सम्राट कृष्णदेवराय की ख्याति उत्तर के चंदत्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, हर्षवर्धन व महाराजा भोज से कम नहीं है। निश्चय ही कृष्णदेवराय ने इस साम्राज्य को वैभव व कीर्ति के शिख्र तक पहुंचाया, लेकिन इसकी स्थापना का श्रेय एक संत को जाता है, जिनका नाम है- स्वामी विद्यारण्य, जिन्हें सामान्यतया भुलाया जा चुका है।

बाह्य आक्रमणों से जब भी भारतीय संस्कृति व धर्म (जिसे आज हिन्दू संस्कृति या धर्म कहा जाता है) पर खतरा पैदा हुआ और यहां की राजनीतिक शक्ति उन खतरों का मुकाबला करने में कमजोर दिखयी दी, तो ऐसे विद्वान संत राजनीति को संगठित करने के लिए आगे आए, जिनका राजसत्ता की शक्ति या सुखोपभोग में कोई आकर्षण नहीं था। उत्तर भारत में जब बौद्ध मत के प्रभाव से मगध का मौर्य शासन नितांत कायर और वीर्यहीन हो गया था, तब महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि सामने आए थे और उन्होंने मगध के सेनापति पुष्यमित्र शुंग को माध्यम बनाकर हमलावरों से देश और उसकी संस्कृति की रक्षा की थी। यवन आक्रांता मिनेंडर मथुरा और साकेत को रौंदता हुआ पाटलिपुत्र के सिर पर आ पहुंचा था। साकेत के निकट ही सरयू नदी के उत्तरी तट के निवासी आचार्य पतंजली ने अपने शिष्य पुष्यमित्र शुंग को ललकारा, जो मगध साम्राज्य का सेनापति था। उसने यवन आक्रांता का मुकाबला करने के प्रति उदासीन अपने राजा का सिर सेना की परेड के समय काट दिया और और सत्ता अपने हाथ में लेकर यवन आक्रांता का मुकाबला किया और उसे भारत की पश्चिमी सीमा पर स्थित सियालकोट के परे भगाकर दम लिया।

विद्यारण्य की तुलना में यदि मध्यकाल में दूसरा कोई नाम लिया जा सकता है, तो वह समर्थ गुरु रामदास का है, जिन्होंने शिवाजी महाराज को माध्यम बनाकर इस्लामी साम्राज्य का मुकाबला किया। यह उनका ही प्रताप था कि पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) तक मराठों ने अंग्रेजों को इस देश पर अपना वर्चस्व कायम करने से रोके रखा।

स्वामी विद्यारण्य का जन्म 11 अप्रैल 1296 को तुंगभद्रा नदी के तटवर्ती किसी गांव में हुआ था। उनके पिता मायानाचार्युलू उस समय के वेद के प्रकांड विद्वान थे। मां श्रीमती देवी भी विदुषी थी। इन्हीं विद्यारण्य के भाई ाचार्य सायण ने चारों वेदों का वह प्रतिष्ठित भाष्य या टीका की थी, जिसे ‘सायणभाष्य’ के नाम से जाना जाता है। यह सायण भाष्य न लिखा गया होता, तो हम आज वेदों से अपरिचित ही रह जाते और पश्चिम के विद्वान भी वेदों का रहस्य न खोल पाते। विद्यारण्य का बचपन का नाम माधवार्य था। विद्यारण्य का नाम तो 1331 में उन्होंने तब धारण किया, जब उन्होंने संन्यास ग्रहण किया।

13वीं शताब्दी उत्तर के लिए ही नहीं, दक्षिण भारत के लिए भी घटनाओं से भरी थी। पहले खिलजी और फिर तुगलक आक्रमणकारियों ने दक्षिण में मदुरै तक की हिन्दी रियासतों को नष्ट कर दिया था, खिलजियों के हमले तक दक्षिण की रियासतें सुरक्षित थीं और अच्छे से फल-फूल रही थीं। लेकिन दिल्ली के सुलतानों की दक्षिण की समृद्धि पर गहरी नजर थी। दक्षिण की रियासतें समुद्री व्यापार से अकूत धन अर्जित कर रही थी। इसलिए उनकी समृद्धि दिल्ली के सुलतानों के आंख की किरकिरी थी। इन सुलतानों के अत्याचार से उत्तर तो त्राहि-त्राहि कर ही रहा था, लेकिन उन्होंने दक्षिण में भी त्राहि-त्राहि मचा दी। धर्मांतरण, लूट, दमन, हत्या, बलात्कार का बोलबाला था। मंदिर ध्वस्त किये जा रहे थे और धार्मिक स्थल रौंदे जा रहे थे। पुराने ग्रंथों तथा शिक्षा केंद्रों को नष्ट किया जा रहा था। वरंगल का काकतीय साम्राज्य, देवगिरि का सेउना यादव की रियासत, मदुरै का पांडियन राज्य तथा कंपिली के जम्बुकेश्वर का राज्य, ये सभी केवल 1336 तक खिलजियों और तुगलकों से पराजित हो चुके थे। केवल होयसल का एक हिन्दू राज्य बचा रह गया था।

ये सारी कहानी तो इतिहास प्रसिद्ध है, इसलिए यहां उसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं। आवश्यकता केवल यह देखने की है कि किन स्थितियों में स्वामी विद्यारण्य राजनीतिक संगठनकर्ता के रूप में सामने आते हैं और वे कौन से मूल्य थे, जिनको लेकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई और उस परंपरा में कृष्णदेवराय ने उन मूल्यों को किस शिखर तक पहुंचाया।

वरंगल का काकतीय साम्राज्य कई शताब्दियों से भारतीय संस्कृति और कला का एक समृद्ध केंद्र बना हुआ था। उत्तर से हो रहे लगातार कई हमलों के बाद मुहम्मद बिन तुगलक की सेनाओं ने 1323 में इसे ध्वस्त कर दिया। काकतीय वंश के तत्कालीन बहादुर राजा प्रतापरूद्र युद्ध हार गये। तुगलक की सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। कहा जाता है कि जब उन्हें बंदी बनाकर दिल्ली ले जाया जा रहा था, तभी रास्ते में गोदावरी में कूदकर उन्होंने आत्महत्या कर ली। साम्राज्य बिखर गया। कंपिली राय (जम्बूकेश्वर) को भी तुगलक की सेना का मुकाबला करना पड़ा। वह भी युद्ध भूमि में मारा गया। उसके दो मंत्री हरिहर और बुक्काराय (दोनों भाई थे) को गिरफ्तार कर लिया गया। इन्हें भी कैद करके दिल्ली ले जाया गया। वहां इन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। शायद उन्होंने किसी रणनीति के तहत इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। दिल्लीपति ने उन्हें दक्षिण के विजित राज्यों का गवर्नर बनाकर भेजा।

हरिहर और बुक्काराय मुस्लिम बनकर जब वापस लौटे तो उनकी मुलाकात स्वामी विद्यारण्य से हो गयी। दोनों ही भाई बहादुर और दृढ़ प्रतिज्ञ थे। उन्होंने जान बचाने के लिए इस्लाम जरूर स्वीकार कर लिया था, लेकिन भीतर उनका अपमानित हिंदू बैठा हुआ था। विद्यारण्य के उपदेशों से उनमें नई चेतना का संचार हुआ। उन्होंने इन दोनों भाईयों को अपनी भारतीय संस्कृति व धर्म की रक्षा के लिए एक हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की प्रेरण दी।

विद्यारण्य स्वामी ने इस नये साम्राज्य के केंद्रीय स्थल का चुनाव भी कर लिया था। कहा जाता है कि जहां पर विजयनगर (आज की हंपी) की स्थापना हुई उस भूमि पर भ्रमण करते हुए विद्यारण्य ने देखा कि कुछ खरगोश कुत्तों को खेदड़ रहे हैं। कुत्ते भाग रहे हैं और खरगोश पीछा कर रहे हैं। यह असंभव दिखने वाला दृश्य था। विद्यारण्य को लगा कि तुंगभद्रा की तटवर्ती इस भूमि में कुछ विशेष ही तेज है, जो ताकतवर शत्रुओं को भी मार भगाने की क्षमता रखती है। हरिहर और बुक्कराय, विद्यारण्य स्वामी के पूर्ण अनुमत हो गये। इस बीच दिल्ली की सल्तनत खुद कमजोर हो गयी और दक्षिण पर उसका नियंत्रण नहीं रहा। हरिहर और बुक्काराय तो ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में ही थे। उन्होंने इस्लाम धर्म का बाना उतार फैंका और हिन्दू साम्राज्य की स्थापना के प्रयत्न में लग गये। कहा जाता है कि नये नगर के लिए खुदाई करते हुए विद्यारण्य को जमीन में गड़ा एक बड़ा खजाना मिल गया, जिसे साम्राज्य निर्माण के प्रारंभिक व्यय के लिए काम में लाया गया। 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई। तब से करीब 300 वर्षों तक इस साम्राज्य ने उत्तर के मुस्लिम आक्रमणों से दक्षिण की रक्षा की। बलात धर्म परिवर्तन को रोका और हिन्दू धर्म-संस्कृति की रक्षा की।

ऊपर जिक्र हो चुका है कि खिलजियों और तुगलकों के हमले से केवल होयसाल रियासत को छोड़कर सारे हिन्दू राज्य नष्ट हो गये थे, किंतु 1343 में मदुरै के सुल्तान के साथ युद्ध में होयसाल राजा वीर वल्लाल प्रथम की म्रत्यु के बाद हव राज्य भी कमजोर हो गया। किंतु इसका लाभ यह हुआ कि हरिहर और बुक्काराय ने हमला करके उसे विजयनगर साम्राज्य में मिला लिया। इसके बाद तुंगभद्रा से लेकर दक्षिण का पूरा क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत आ गया। इस सफलता को रेखांकित करते हुए हरिहर (प्रथम) ने ‘पूर्व पश्चिम समुद्राधीश्वर’ की उपाधि धारण की। हरिहर की शायद किसी दुर्घटना में मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी बने बुक्काराय (प्रथम) ने अपना दिग्विजयी अभियान चलाया। उन्होंने अरकाट के राजा को हराकर उनका राज्य विजयनगर में मिला लिया। फिर उन्होंने कोंडा विडू के रेड्डी वंश के राजा को हराया। मदुरै के सुल्तान को अंतिम शिकस्त दी। पश्चिम में गोवा के क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया। अब तुंगभद्रा और कृष्णा नदी के बीच का पूरा दोअरबा क्षेत्र भी विजयनगर साम्राज्य में आ गया। अब तक राजधानी तुंगभद्रा नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित अनेगोडी नामक स्थान पर थी, लेकिन अब उसे तुंगभद्रा के दक्षिण की तरफ विजयनगर लाया गया और उसे राजधानी का दर्जा दिया गया।

बुक्काराय प्रथम के बाद उनके दूसरे पुत्र हरिहर (द्वितीय) ने और पराक्रम का प्रदर्शन किया और दक्षिण भारत का जो और भी इलाका बचा था, उसे अपने साम्राज्य में मिलाकर दक्षिण में विजयनगर का एकछत्र साम्राज्य स्थापित किया। उनके बाद आने वाले शासक देवराय (प्रथम) ने उड़ीसा के गजपति राजा को हराया। उन्होंने राजधानी की किलेबंदी करायी तथा राज्य में खेती व उद्योग व्यापार के विकास पर ध्यान दिया। उन्होंने सिंचाई की व्यवस्था करनी शुरू की। उनके उत्तराधिकारी देवराय (द्वितीय) 1424 में गद्दी पर बैठे। उन्होंने लंका और बर्मा (आज के म्यांमार) के कुछ हस्से को भी अपने अधिकार में ले लिया।

इतने विस्तार के बाद 15वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में साम्राज्य फिर कमजोर पड़ा। लेकिन संयोग से उस पर कोई हमला करने वाला नहीं था। देवराय द्वितीय के निर्बल उत्तराधिकारी को हटाकर उसके एक सेनापति सुलुवा देवराय ने 1485 में विजयनगर की सत्ता अपने अधिकार में कर ली। उनके बाद एक दूसरे सेनानायक तुलुवा नरसा नायक ने 1491 में विजयनगर की बागडोर अपने हाथ में ली। यह ऐसा समय था, जब साम्राज्य में इधर-उधर विद्रोही सिर उठा रहे थे। इन्हीं तुलवा नरसा नायक के बेटे थे कृष्णदेवराय। कृष्णदेवराय में बहादुरी और विद्वता का अद्भुत संगम था। उन्होंने परंपरा से प्राप्त विद्यारण्य स्वामी की सारी शिक्षाओं को ही आत्मसात नहीं किया था, बल्कि उन्होंने देश के प्राचीन शास्त्रों का भी अच्छा अध्ययन किया था। उन्हें साम्राज्य को सुदृढ़ करने में करीब दो दशकों तक संघर्ष करना पड़ा। इस लंबे संघर्ष के बाद 24 जुलाई 1509 को उनका राज्याभिषेक हुआ।

कृष्णदेवराय करीब 19 वर्षों तक गद्दी पर बैठे। 1529 में एक आकस्मिक बीमारी में उनका निधन हो गया। उनके शासन के इस 19-20 वर्ष के काल को विजयनगर साम्राज्य का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। अफसोस की बात है कि उनके उत्तराधिकारियों में कोई ऐसा सबल शासक नहीं हो सका, जो उनकी परंपरा को आगे बढ़ा सके। अशोक महान की तरह उनका भी राजवंश धीरे-धीरे कमजोर होकर लुप्त हो गया। कृष्णदेवराय के बेटे अच्युत राय 1530 में गद्दी पर बैठा। उसके बाद 1542 में सदाशिवराय राजा बने। लेकिन वह केवल औपचारिक राजा थे। वास्तविक सत्ता आलिया राम के हाथ में थी। राम राय एक बहादुर सेनापति था, लेकिन राज्य पर चारों तरफ से गिद्द दृष्टि लगाए नवाबों व सुल्तानों का सामूहिक मुकाबला करने की शायद उसमें सामथ्र्य नहीं थी।

विजयनगर साम्राज्य आसपास की सारी मुस्लिम रियासतों को अखर रहा था। अंत में बीजापुर, बीदर, गोलकोंडा तथा अहमदनगर के मुस्लिम शासकों ने एक साथ विजयनगर पर आक्रमण कर दिया। केवल एक बिरार की मुस्लिम रियासत थी, जिसने शायद इस हमले में भाग नहीं लिया। राम राय ने इस संयुक्त मुस्लिम आक्रमण में विजयनगर की सेना का नेतृत्व किया। ताल्लिकोटा में घमासान युद्ध हुआ, जिसमें वियजनगर की सेना पराजित हुई। राम राय को पकड़कर तत्काल मार डाला गया। उधर विजयनगर के वास्तविक राजा सदाशिव राय जितना संभव हुआ, उतनी धन संपत्ति समेटकर भाग खड़ा हुआ। कई इतिहासकारों के अनुसार विजयनगर का वास्तविक शासक सदाशिवराय भले ही विलासी तथा कायर रहा हो, लेकिन न तो विजयनगर की सेना इतनी कमजोर थी और न राम राय का नेतृत्व कि विजयनगर पराजित हो जाता। विजयनगर की सेना उस समय दक्षिण की अजेय सेना मानी जाती थी। लेकिन हिन्दू राजाओं की उदारता अक्सर उनके लिए घातक बन जाती थी। ताल्लिकोटा के युद्ध में भी यही हुआ। विजयनगर की सेना जीतने ही वाली थी कि उसके मुस्लिम कमांडर अपने-अपने सैनिक जत्थे लेकर हमलावर सेना के साथ जा मिले। इससे युद्ध का नजारा ही बदल गया। सेनापति राम राय कुछ सोच पाते तब तक उन्हें पकड़ लिया गया। 25 दिसंबर 1564 विजयनगर के पतन की तिथि बन गयी। सदाशिव राय का शाही परिवार तब तक भागकर पेनुकोंडा पहुंच गया था। राम राय के मारे जाते ही विजयनगर की सेना तितर-बितर हो गयी। मुस्लिम सेना ने विजयनगर पर कब्जा कर लिया। उसके बाद वैभव, कला तथा विद्वता की इस ऐतिहासिक नगरी में लूट, हत्या और ध्वंस का जो तांडव शुरू हुआ, उसकी नादिरशाह की दिल्ली लूट व कत्लेआम से ही तुलना की जा सकती है। हत्या, बलात्कार तथा ध्वंस का ऐसा नग्ननृत्य तो शायद नादिरशाही में भी न हुआ हो।

बीजापुर, बीदर, गोलकोंडा तथा अहमदनगर की सेना करीब 5 महीने उस नगर में रही। इस अवधि में उसने इस वैभवशाली नगर की ईंट से ईंट बजा दी। गं्रथागारों व शिक्षा केंद्रों को आग की भेंट चढ़ा दिया गया। मंदिरों व मूर्तियों पर लगातार हथौड़े बरसते रहे। हमलावरों का एकमात्र लक्ष्य था विजयनगर का ध्वंस व उसकी लूट। शायद साम्राज्य हथियाना उनका प्रथम लक्ष्य नहीं था। ऊपर बताया गया कि राज परिवार पेनुकोंडा (वर्तमान अनंतपुर जिले में स्थित) भाग गया था। वहां उसने अपनी राजधानी बनायी। बाद में वहां से हटकर चंद्रगिरि (जो चित्तूर जिले में है) को राजधानी बनाया। वहां शाय किसी ने उनका पीछा नहीं किया इसलिए कहने को विजयनगर साम्राज्य करीब 80 वर्ष और चला। अदूरदर्शी तथा कायर राजाओं के कारण 1646 में यह पूरी तरह इतिहास के कालचक्र में दफन हो गया। इस वंश के अंतिम राजा रंगराय (तृतीय) थे, जिनकी शायद 1680 में मौत हुई।

1564 या कहें कि 1646 में जो साम्राज्यकाल के गाल में दफन हुआ, तो फिर उसकी सुध लेने वाला कोई सामने नहीं आया। शताब्दियों में शहर का खंडहर भी धूल में ढक गया। भला हो अंग्रेजों के शासनकाल में बेल्लारी (कर्नाटक) में नियुक्त उस जिला कलेक्टर राबर्ट सेवेल का, जिसने इस साम्राज्य के अवशेषों की खोज की और एक किताब लिखी ‘द फारगाटेन इम्पायर’ (एक विस्मृत साम्राज्य), जिससे इस वैभवपूर्ण साम्राज्य का परिचय बाद की पीढ़ियों को मिल सका। कृष्णदेवराय की कीर्तिगाथा भी इससे उजागर हुई। लेकिन स्वामी विद्यारण्य अभी भी धार्मिक परंपरा के दार्शनिक संतों के बाहर अपना कोई परिचय नहीं रखते।

विद्यारण्य ने हरिहर प्रथम के समय से राजाओं की करीब तीन पीढ़ियों का राजनीतिक व सांस्कृतिक निर्देशन किया। 1372 में करीब 76 वर्ष की आयु में उन्होंने राजनीति से सेवानिवृत्ति ली और श्रृंगेरी वापस पहुंच गये और उसके पीठाधीश्वर बने। इसके करीब 14 वर्ष बाद 1386 में उनका स्वर्गवास हो गया। लेकिन जीवनभर वह भारत देश, समाज व संस्कृति के संरक्षण की चिंता करते रहे। उन्होंने अद्वैत दर्शन से संबंधित ग्रंथों के साथ सामाजिक महत्व के ग्रंथों का भी प्र्रणयन किया। अपनी पुस्तक ‘प्रायश्चित सुधानिधि’ में उन्होंने हिन्दुओं के पतन के कारणों की भी अपने ढंग से व्याख्या की है। उन्होंने हिन्दुओं की विलासिता को उनके पतन का सबसे बड़ा कारण बताया। नियंत्रणहीन विलासिता का इस्लामी जीवन हिन्दुओं को बहुत आकर्षित कर रहा था। नाचने गाने वाली दुश्चरित्र स्त्रियों व मुस्लिम वेश्याओं के संग का उन्होंने कठोरता से निषेध किया है।

विद्यारण्य की प्रारंभिक शिक्षा तो उनके पिता के सान्निध्य में ही हुई थी, लेकिन आगे की शिक्षा के लिए वह कांची कामकोटि पीठ के आचार्य विद्यातीर्थ के पास गये थे। इन स्वामी विद्यातीर्थ ने विद्यारण्य को मुस्लिम आक्रमण से देश की संस्कृति और समाज की रक्षा हेतु नियुक्त किया था। विद्यारण्य ने गुरु का आदेश पाकर पूरा जीवन उसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु समर्पित कर दिया। उनके स्वप्न ने महाराजा कृष्ण्देवराय के काल में मूर्तरूप अवश्य प्राप्त किया, लेकिन उसके बाद काल के निर्मम हाथों उसका भी अंत हो गया। लेकिन आधुनिक भारत के निर्माण मे विद्यारण्य और कृष्णदेवराय से आज भी प्रेरणा ली जा सकती है।

आश्चर्य की बात यह है कि हम आज उन्हें याद भी नहीं करना चाहते। कृष्णदेवराय के राज्याभिषेक के 500 वर्ष 2009 में ही पूरे हो गये थे, तब किसी ने उन्हें याद नहीं किया। राज्याभिषेक का 500वां वर्ष बीत गया। यत्र तत्र कुछ लेख अवश्य छपे, लेकिन राजकीय स्तर पर वह विस्तारण के गर्त में ही खोए रहे। जाने कैसे आंध्र प्रदेश सरकार को 501वें वर्ष में उनकी याद आ गयी। देर से ही सही, लेकिन इस स्मरण की सराहना की जानी चाहिए। मगर सवाल है कि क्या आज की सरकार या आज के राजनीतिक दल कृष्णदेवराय की नीतियों व सिद्धांतों का अनुकरण करेंगे। उनके दरबार के नवरत्नों में केवल तेनाली रामकृष्ण ही याद किये जाते हैं, वह भी बीरबल की तरह एक चतुर विदूषक के रूप में, जो अन्य दरबारियों को छकाकर अपनी प्रतिष्ठा कायत करता है।

कृष्णदेवराय का साम्राज्य कटक व गोवा से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक व्याप्त था, लेकिन उनके राजकाज की भाषा नागरी लिपि वाली संस्कृत थी। उन्होंने कन्नड़, तेलुगु व तमिल का भी सम्मान किया। तेलुगु के तो वह अच्छे विद्वान थे। किंतु उनके साम्राज्य में कहीं कोई भाषा या लिपि का विवाद नहीं था। उनके समय के तमाम ताम्रपत्र अभिलेख नागरी लिपि में हैं। उनके स्वर्ण सिक्कों पर मुख भाग पर बालकृष्ण, गणेश या दुर्गा की मूर्तियां हैं और पृष्ठ भाग पर नागरी लिपि में उनका नाम ‘श्री प्रताप कृष्ण्राय’ अंकित है। कम मूल्य के तांबे के केवल कुछ सिक्कों पर कन्नड़ में उनका संक्षिप्त नाम (कृष्ण) लिखा गया है। तांबे के ही अधिक वजन के सिक्कों पर नागरी लिपि का प्रयोग है। जाहिर है उनके शासनकाल में पूरे दक्षिण भारत में श्रीलंका तक नागरी लिपि प्रचलित थी। वह स्वयं किसी खास धर्म के अनुयायी नहीं थे। उन्हें भगवान वेंकटेश या विष्णु का भक्त कहा जा सकता है, क्योंकि उनके राज्य के प्रतीक चिह्नों में शंख चक्र शामिल है, लेकिन उनके साम्राज्य में सभी धर्म दर्शन के अनुयायियों का सम्मान था।

उनकी सोच वैश्विक थी। पुर्तगाली यात्रियों डोमिंगो पायस, फर्नाओ नुनीज तथा निकोलो द कोंठी के विवरणों के अनुसार विजयनगर एक अंतर्राष्ट्रीय शहर था, जहां तमाम देशें व धर्मों के लोग देखे जा सकते थे। समृद्धि का वर्णन तो यों किया गया है कि मूल्यवान रत्न हीरे, मोती, माणिक्य सड़क किनारे ढेरी लगाकर बेचे जाते थे। राजा ने पुर्तगालियों की तकनीकी सहायता लेकर अपने राज्य की सिंचाई सुविध में सुधार किया था। उन्होंने प्रत्येक गांव में एक मंदिर और एक तालाब बनवाने की योजना लागू की थी। इत्यादि।

निश्चय ही कृष्णदेवराय तथा उनके साम्राज्य व नीतियों की प्रशंसा में कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं, लेकिन आज हमें उन तत्वों पर अधिक ध्यान देना चाहिए कि उनके साम्राज्य निर्माण की मूल प्रेरणा क्या थी। उनके साम्राज्य की सामाजिक एकता का मूल मंत्र क्या था। वह कौनसी शक्ति थी कि कृष्णदेवराय अपने जीवनकाल में किसी युद्ध में पराजित नहीं हुए। वह अपराजेय बने रहे, लेकिन उनके तिरोहित होते ही साम्राज्य बिखरने लगा। सच कहा जाए, तो आज हमें कृष्णदेवराय से भी अधिक विद्यारण्य जैसे समाजचेता स्वामियों की जरूरत है, जो देश की राजनीति को सही दिशा दे सकें। लेकिन हमारी शासन नीति तो विचारों की नहीं, केवल मूर्तियों की पूजा में विश्वास रखती है। कृष्णदेवरायों के स्मरण से तो कोई खतरा नहीं, लेकिन विद्यारण्यों का स्मरण तो उनके लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है, जो संस्कृति को दफन करके केवल अर्थ नीति के सहारे शासन चलाना चाहते हैं। (11-7-2010)