गुरुवार, 26 मई 2011

पाकिस्तान अब चीन की गोद में


पाकिस्तान-चीन गठबंधन के नये युग की शुरुआत : यूसुफ रजा गिलानी के साथ वेन जियाबाओ

पाकिस्तान ने वर्ष 2011 को चीन के साथ मैत्री के वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की है। चीन के साथ कूटनीतिक संबंध के 60 साल पूरे होने के अवसर पर इस घोषणा के साथ उसने 20 रुपये का एक स्मारक सिक्का भी जारी किया है। चीन के साथ पाकिस्तान की अंतरंगता कोई नई नहीं है, लेकिन गत 2 मई की एबटाबाद की घटना के बाद उसने खुल्लम-खुल्ला चीन को ही अपना प्रथम संरक्षक घोषिक कर दिया है और अमेरिकी ताप से बचने के लिए चीनी छतरी हासिल कर ली है। अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण धोखेबाज पाकिस्तान भी अमेरिका के लिए कम उपयोगी नहीं है, इसलिए अमेरिका उसका परित्याग तो नहीं करने जा रहा है, लेकिन उसके साथ आत्मीयता व भरोसे का वह संबंध टूट चुका है जो एक दशक पहले तक बना हुआ था, इसलिए पाकिस्तान ने फौरन वाशिंगटन का विकल्प बीजिंग में तलाश लिया और अपनी सुरक्षा उसके हवाले कर दी।

पाकिस्तान के कूटनीतिक कौशल का भी कोई जवाब नहीं। विश्व की दो प्रतिस्पर्धी महाशक्तियों अमेरिका और चीन का एक साथ जेसा दोहन वह कर रहा है वैसा किसी अन्य के लिए संभव नहीं है। पाकिस्तान का दोगलापन किसी से छिपा हो ऐसा नहीं है, लेकिन उसकी रणनीतिक उपयोगिता के सभी कायल हैं। 1947 में जब यह भारत से अलग हुआ था तो शायद ही किसी ने सोचा हो कि यह देश आगे चलकर दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण हो जाएगा कि अमेरिका और चीन जेसी महाशक्तियां उसे अपने-अपने प्रभावक्षेत्र में रखने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे।

विश्व आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में पाकिस्तान अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों को लगातार धोखा देता आ रहा है, लेकिन ये देश सब कुछ जानते हुए भी उसके लिए अपना खजाना खोले हुए हैं। केवल पिछले 10 वर्षों में अकेले अमेरिका उसे करीब 20 अरब डॉलर की सैनिक व असैनिक सहायता दे चुका है। आगे भी उसका न्यूनतम सहयोग पाने के लिए भी अमेरिका करीब डेढ़ अबर डॉलर प्रतिवर्ष देते रहने के लिए तैयार है। गत 2 मई को एबटाबाद में हुई अमेरिकी सैनिक कार्रवाई ने पाकिस्तान के चेहरे पर पड़ी धोखे की सारी नकाबों को एक साथ उखाड़ दिया। पाकिस्तान पूरी दुनिया के सामने ही नहीं अपने देश की आम जनता के बीच भी इस तरह नंगा हो गया कि उसे अपनी इज्जत ढकना मुश्किल हो गया। एक तरफ तो पूरी दुनिया यह जान गई कि पाकिस्तान के हुक्मरान विश्व आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग के नाम पर दुनिया को खासतौर पर अमेरिका को अब तक धोखा देते आ रहे थे। अमेरिका अपने जिस दुश्मन की खोज के लिए पाकिस्तान के अरबों डॉलर की सहायता दे रहा था खुद पाकिस्तान ने ही उसे छिपा रखा था। दूसरी तरफ अमेरिका ने एकाएक हमला करके जिस तरह पाकिस्तानी सैनिक छावनी में उसकी नाक के नीचे अलकायदा नेता ओसामा बिन लादेन को मार डाला और उसका शव लेकर बाहर निकल गया उससे पाकिस्तानी सेना की भी नाक कट गई। अब या तो वह अमेरिकियों के साथ मिली थी या फिर वह घोर निकम्मी है। इस्लामी विश्व की सबसे ताकतवर सेना का दावा करने वाली पाकिस्तानी सेना को बाहरी सैनिक हमले की भनक तक नहीं लग सकी और हमलावर अपनी कार्रवाई करके बाहर निकल गया।

निश्चय ही 2 मई की इस घटना के बाद अमेरिका के साथ पाकिस्तान के संबंधों में गंभीर तनाव की स्थिति पैदा हो गई। अमेरिका के समक्ष पाकिस्तान के लिए इस सवाल का जवाब देना लगभग असंभव हो गया कि लादेन किस तरह पाकिस्तानी राजधानी के इतने पास एक विशाल भवन में इस तरह आराम से रह रहा था और उसे इसकी भनक तक क्यों नहीं थी? अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा पर इसके लिए दबाव पड़ना शुरू हो गया है कि ऐसे धोखेबाज देश के साथ संबंध तोड़ लिए जाए और उसे दी जाने वाली विराट सहायता बंद कर दी जाए। स्वयं उनकी पार्टी के पांच सिनेटरों ने पत्र लिखकर कहा है कि पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता बंद की जाए या उसमें भारी कटौती की जाए। यद्यपि अमेरिकी सरकार अभी भी सहायता जारी रखने का रास्ता बनाए हुए है। उसका कहना है कि अभी तक हमारे पास इस बात का पक्का सबूत नहीं है कि पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं को इस बात की जानकारी दी थी कि लादेन राजधानी के निकट ही इस तरह गुप्त रूप से रह रहा है। लेकिन एबटाबाद की घटना के बाद पाकिस्तान के नेताओं के समक्ष अच्छी तरह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका के साथ् अब उसके स्वाभाविक संबंध बने नहीं रह सकते। अब जो भी संबंध होंगे वे परस्पर स्वार्थ साधन पर निर्भर होंगे। उनमें न कोई आत्मीयता होगी न विश्वास 2 मई की घटना इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका को पाकिस्तान का न कोई भरोसा रह गया है न विश्वास/सहायता अभी जारी रह सकती है, लेकिन उसके भी भविष्य के बारे में आश्वस्त नहीं रहा जा सकता, इसलिए पाकिस्तान ने फौरन अमेरिका के प्रतिद्वन्द्वी चीन का दामन जा पकड़ा। चीन तो ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में ही था। उसने दिल खोलकर उसका स्वागत किया और अपना सुरक्षा कवच पहनाकर उसे निर्भय रहने का वरदान भी दे दिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की चीन यात्रा पूर्व निर्धारित थी। लेकिन 2 मई की घटना ने इस यात्रा को एक ऐतिहासिक परिवर्तन की यात्रा बना दिया। चीन और पाकिस्तान वस्तुतः दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। दोनों ही इस अवसर का स्मरणीय बनाने में लगे थे। वे आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को और प्रगाढ़ बनाने की तैयारी में थे। जैसे इस अवसर पर चीन ने अपने सबसे बड़े बैंक आई.सी.बी.सी. (इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक ऑफ चाइना) की दो शाखाएं पाकिस्तान में खोलीं जिनका राष्ट्रपति जरदारी ने शुक्रवार को उद्घाटन किया। पाकिस्तान ने इस अवसर पर 20 रुपये का विशेष स्मारक सिक्का जारी किया। दोनों देशों ने 2 वर्ष के भीतर वर्तमान 9 अरब डॉलर के वार्षिक व्यापार को 15 अरब डॉलर तक पहुंचाने का संकल्प लिया। मगर 2 मई की घटना ने इन बातों को पीछे छोड़कर दोनों देशों के बीच के रणनीतिक संबंधों को सबसे आगे ला दिया। गिलानी की 4 दिन की चीन यात्रा के दौरान सैनिक महत्व के कइ्र रणनीतिक फैसलों पर हस्ताक्षर हुए। सबसे बड़ा समझौता तो यही रहा कि चीन ने 50 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू सैनिक विमान जे. एफ-17 थंडरजेट फौरन पाकिस्तान भेजने का फैसला लिया। पहले ये विमान एक वर्ष की अवधि में दिये जाने वाले थे, लेकिन अब अगले महीने तक ये सभी विमान पाकिस्तान पहुंच जाएंगे। कहने को यह विमान पाकिस्तान व चीन ने संयुक्त रूप से विकसित किया है, लेकिन यह चीन द्वारा विकसित आधुनिक विमान है जो पाकिस्तान के पुराने हो रहे लड़ाकू डॉलर के हैं। चीन अगामी 14 अगस्त को पाकिस्तान के लिए एक संचार उपग्रह भी अंतरिक्ष में छोड़ने जा रहा है। 2 वर्ष पूर्व 2009 में चीन ने पाकिस्तानी नौ सेना के लिए 4 एफ-22 पी फ्रिगेट दिया था। आगे वह पाकिस्तान के लिए कुछ पनडुब्बियां तैयार कर रहा है। गिलानी के साथ बातचीत करते हुए चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने पाकिस्तान की सेना को पूरी तरह सक्षम बनाने का आश्वासन दिया है। ऐसी खबरें पहले से मिल रही हैं कि चीन पाकिस्तान को सीमित क्षमता वाले परमाणु अस्त्र निर्माण की तकनीक दे रहा है। पाकिस्तान इस समय रिकार्ड तेजी के साथ अपने परमाणु अस्त्रों का भंडार बढ़ाने में लगा है। एक आकलन के अनुसार वह इस समय दुनिया में सर्वाधिक तीव्र गति से अपने परमाणु भंडार बढ़ा रहा है। चीन ने उसे जो दो नये रियेक्टर दिये हैं उनसे उसकी अस्त्र निर्माण क्षमता और बढ़ने वाली है। इस मामले में चिंता की बात यह है कि पाकिस्तान के परमाणु शस्त्र निर्माण कार्यक्रम पर अंकुश लगाने की कोई व्यवस्था नहीं है। उसके ज्यादातर परमाणु शस्त्र यूरेनियम आधारित है। यूरेनियम उसके यहां स्वयं उपलब्ध है और उसे अस्त्र निर्माण स्तर की शुद्धता प्रदान करने वाला संयत्र भी उसके पास है। इसलिए वह तेजी से ऐसा संवर्धित यूरेनियम भंडार बनाने में लगा है जिसका हथियार में इस्तेमाल हो सकता है। फिर भी यूरेनियम की मात्रा सीमित है। लेकिन चीन जो चौथा रियेक्टर स्थापित कर रहा है उससे पाकिस्तान प्लूटोनियम निर्माण में भी सक्षम हो जएगा इसलिए वह और तेजी से अपने परमाणु अस्त्रों की संख्या बढ़ा सकता है।

खबर है कि चीन ने अमेरिका को साफ चेतावनी दी है कि वह पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से दूर रहे। ‘द न्यूज डेली‘ में प्रकाशित एक खबर के अनुसार चीन ने अमेरिका से कहा है कि यदि पाकिस्तान पर कोई हमला किया जाता है तो उसे चीन पर हुआ हमला माना जाएगा। ‘द न्यूज डेली‘ ने कूटनीतिक सूत्रों के हवाले से बताया है कि यह चेतावनी गत सप्ताह वाशिंगटन में चीन-अमेरिका रणनीतिक व आर्थिक मामलों पर हुई बातचीत के दौरान चीनी विदेश मंत्री द्वारा दी गई। चीन ने यों खुले आम अमेरिका से कहा है कि वह पाकिस्तान की संप्रभुता एवं एकता का सम्मान करे। चीनी प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को पूरा आश्वासन दिया है कि चीन पाकिस्तान की रक्षा व सहायता के लिए कुछ भी करने से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने पूरा भरोसा दिलाया है कि अमेरिका पाकिस्तान की संप्रभुता को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता।

यद्यपि अमेरिका ने इन सारी चेतावनियों और आश्वासनों की कोई परवाह न करते हुए यह साफ कहा है कि अलकायदा के किसी व्यक्ति को पकड़ने के लिए अमेरिका कहीं भी हमला कर सकता है। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने सी.बी.एस. न्यूज चैनल पर एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि हम पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि अलकायदा के किसी व्यक्ति के बारे में कोई गुप्त जानकारी मिलती है तो या तो वह देश उसे पकड़े नहीं तो हम उसे पकड़ लेंगे। हिलेरी ने वस्तुतः बिना नाम लिए पाक प्रधानमंत्री द्वारा बीजिंग में की गई टिप्पणी का खंडन किया है। गिलानी ने वहां पहुंचने पर कहा था कि अमेरिका ने आश्वासन दिया है कि भविष्य में पाक में कोई एकपक्षीय कार्रवाई नहीं होगी। अगर उच्च प्राथमिकता वाले किसी लक्षित व्यक्ति का पता चलता है या कोई नई सूचना प्राप्त होती है तो उसे साझा किया जाएगा और उस पर संयुक्त कार्रवाई होगी। हिलेरी के वक्तव्य में निश्चय ही ऐसी कोई बात नहीं है। जाहिर है गिलानी न दुनिया के सामने अपनी नाक बचाने के लिए अमेरिका के बारे में वहां एक झूठा वक्तव्य दिया। यद्यपि यह सही है कि अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही अपने आपसी संबंधों को टूटने से बचाने की कोशिश में भी लगे हैं, लेकिन उनके संबंध टूटने के कगार पर जा पहुंचे हैं यह भी जगजाहिर हो चुका है।

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने 2 मई की घटना के बाद अमेरिकी आर्थिक मदद से शुरू की जाने वाली 6 योजनाओं के लिए हुए करार को रद्द कर दिया है। इन करारों के अंतर्गत पंजाब की स्वास्थ्य शिक्षा सफाई से जुड़ी उपर्युक्त परियोजनाओं के लिए अगले 3 वर्षों में 20 अलब रुपये की सहायता मिलने वाली थी। पंजाब प्रांत पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और वहां पर पाकिस्तान मुस्लिम लीग /नवाज गुट/ की सरकार है। उसने सारी अमेरिकी सहायता का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। पाकिस्तान लम्बे अरसे से अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की इस्लामाबाद यात्रा की प्रतीक्षा कर रहा है, किन्तु नई परिस्थितियों में निकट भविष्या में न केवल ओबामा की यात्रा की कोई संभावना है, बल्कि विदेशमंत्री हिलेरी की यात्रा का कार्यक्रम भी खटाई में पड़ गया है। उपर्युक्त साक्षात्कार में उन्होंने साफ कहा कि उनकी पाकिस्तान यात्रा एबटाबाद से जुड़े प्रश्नों पर पाकिस्तान द्वारा दिये जाने वाले जवाबों पर निर्भर है। पाकिस्तान अब तक कोई भी जवाब देने से बचता रहा है। शायद चीन से गठबंधन मजबूत करने के बाद अब वह कोई जवाब देने की स्थिति में हो।

यद्यपि अभी भी यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि पाकिस्तान व अमेरिका के संबंध अब टूटने ही वाले है अथवा चीन पाकिस्तान के लिए अमेरिका के साथ सीधे मैदान में उतर सकता है। फिर भी इतना तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान का जो भरोसा कभी वाशिंगटन के साथ जुड़ा था वह अब बीजिंग के साथ जुड़ गया है। वैसे वाशिंगटन स्थित एक पाकिस्तानी बुद्धिजीवी शुजा नवाज का कहना है कि वाशिंगटन के साथ इस्लामाबाद के रिश्ते अभी भी इतने नहीं बिगड़े हैं जितना बाहर से लग रहा है। अगर रिश्ता इतना ही बिगड़ गया होता तो पाकिस्तानी सरकार चमन और खैवर में अफगानिस्तान के लिए जाने वाली अमेरिकी सप्लाई को रोक देते। शुजा नवाज वाशिंगटन में ‘अटलांटिक कौंसिल‘ नामक एक संस्था की दक्षिण एशिया इकाई के अध्यक्ष हैं। उनके अनुसार अमेरिका और पाकिस्तान के बीच मियां-बीवी जैसे संबंध हैं जिसमें झगड़े तो अक्सर होते हैं, लेकिन अभी तलाक की नौबत नहीं आई है। शुजा नवाज की बात किसी हद तक सही है, लेकिन मियां-बीवी के बीच का यह मामला अब केवल आपसी झगड़े तक नहीं रह गया है। मियां से बेजार हुई बीवी अब जार के साथ खुले आम रिश्ता जोड़ने में लगी है। शायद घरेलू मामलों में इतने पर तलाक की नौबत आ सकती हे, लेकिन राजनीति में तो चालाक मियां, बेवफा बीवी को भी तब तक तलाक नहीं देता जब तक उसकी उपयोगिता बनी रहती है।

पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति ने उसकी कीमत बढ़ा रखी है। अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी कार्रवाई पूरी करने के लिए पाकिस्तान की अनिवार्य आवश्यकता है। इसी तरह चीन को सरल मार्ग से खाड़ी क्षेत्र तथा यूरोप पहुंचने के लिए पाकिस्तान की आवश्यकता है। पाकिस्तान की जरूरत तो भारत को भी है क्योंकि पश्चिम और मध्य एशिया का सरल मार्ग पाकिस्तान होकर ही जाता है। लेकिन भारत के साथ तो उसका ‘अहि-नकुल‘ (सांप-नेवले का) संबंध है जो शायद ही कभी सुधर सके इसलिए भारत तो पाकिस्तान का उपयोग करने की स्थिति में नहीं है, परंतु चीन और अमेरिका दोनों के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता बनी हुई है। यह उपयोगिता तत्व ही ऐसा है कि पाकिस्तान सारा भरोसा व विश्वास खोने के बावजूद अमेरिका से संबंध बनाए रख सकता है। लेकिन चीन-पाकिस्तान संबंधों की प्रगाढ़ता ने भारत की चिंता अवश्य बढ़ा दी है।

इस समग्र परिप्रेक्ष्य में अगर देखें तो एबटाबाद की घटना ने पाकिस्तान को चीन की तरफ सरकने को मजबूर कर दिया है वहीं अमेरिका और भारत के लिए भी अब केवल एक ही विकल्प छोड़ा है कि वे परस्पर अपने रणनीतिक संबंध और मजबूत करें। आज की दुनिया साफ-साफ दो हिस्सों में बंटती नजर आ रही है। एक तरफ लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करने वाले देश हैं तो दूसरी तरफ इस्लामी व कम्युनिस्ट तानाशाही वाले देश। कम्युनिस्ट तानाशाही का फिलहाल एक ही केन्द्र रह गया है वह है चीन वहां कम्युनिस्ट भले न रह गया हो लेकिन उसके नाम की तानाशाही अवश्य विद्यमान है। और अब तानाशाही के साथ इस्लामी तानाशाहियों के गठजोड़ की श्रृंखला बननी शुरू हो गई है। लोकतांत्रिक विश्व के लिए भविष्य की सबसे गंभीर चुनौती इसी श्रृंखला की तरफ से आने वाली है। इसलिए उसके मुकाबले के लिए आवश्यक है कि लोकतांत्रिक देश अपने आपसी संबंध व सहयोग के सूत्र और मजबूत करें। क्या भारत और अमेरिका के राजनीतिक चिंतक व रणनीतिकार इस दिशा में कुछ कर सकेंगे या कोई संयुक्त कदम आगे बढ़ा सकेंगे।



4 टिप्‍पणियां:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

पाकिस्तान एक चरित्रहीन देश माना जा चुका है। जो उसे मदद देगा अपने आतंकी मनसूबे पूरे करने में वह उनकी की गोद में बैठने तैयार होगा। चीन तो चाणक्य की उस नीति पर चल रहा है कि शत्रु का शत्रु अपना मित्र!

निंजा नियाज़ी ने कहा…

अपना मुँह बंद!अपने देश कोई और अधिक ....हम चीजें हैं जो आप देखना चाहते हैं न

निंजा नियाज़ी ने कहा…

आप हमारे उद्योग को नष्ट कर दिया! हमारे 60% बजट भारतीय नीतियों के कारण रक्षा पर खर्च ...अपने मन चांग ....
हम दोनों 21 वीं सदी में हैं!

Hindi Choti ने कहा…


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