मंगलवार, 10 मई 2011

लादेन के बाद भी कुछ नहीं बदलेगा

लादेन की हत्या पर भड़का आक्रोश : अमेरिकी झंडा जलाते हुए पाकिस्तानी

कुख्यात अंतर्राष्ट्रीय जिहादी नेता ओसामा बिन लादेन मार डाला गया। करीब 10 वर्षों की लंबी तलाश के बाद अमेरिकी सेना ने उसका ठिकाना ढूंढ़़ निकाला और केवल 40 मिनट की कार्रवाई में उसकी क्रूर कथा का अंत कर दिया। इस पर अमेरिका में जश्न मनाया गया। राष्ट्रपति ओबामा की लोकप्रियता का घटता ग्राफ एकाएक बढ़ गया। क्योंकि अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 को न्यूयार्क व वाशिंगटन पर हुए हमले का बदला ले लिया। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि अब अंतर्राष्ट्रीय जिहादी आतंकवाद का खतरा मिट गया। इससे पाक-अमेरिकी संबंधों में भी कोई बदलाव नहीं आने जा रहा है। इससे केवल इतना हुआ है कि पाकिस्तान सरकार के झूठ का सारा मुलम्मा झड़ गया है। वह चौराहे पर नंगा हो गया है। अब इसके बाद भी यदि कोई उसके चरित्र को न पहचान सके तो या तो उसे अंधा कहा जाएगा या वज्रमूर्ख।

कहने को पाकिस्तान भी भारी किरकिरी हुई है। एक रात के अंधेरे में, उसकी राजधानी की नाक के नीचे अमेरिकी सेना का एक कमांडो दस्ता आ धमका और मात्र 40 मिनट में अपनी कार्रवाई करके निकल गया, लेकिन उसकी परमाणु शक्ति सम्पन्न सेना को इसकी भनक भी नहीं लग पाई। कार्रवाई भी ऐसी कि जिसने पाकिस्तानी नेताओं को सरे बाजार नंगा खड़ा कर दिया। एक रहस्य जिसे उसने करीब 10 वर्षों से अपने कलेजे से लगाकर छिपा रखा था, न केवल दुनिया के सामने उजागर हो गया, बल्कि उसका खात्मा भी हो गया। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाल लिया जाना चाहिए कि इस घटना से पाकिस्तान कुछ बहुत ज्यादा शर्मिंदा होगा और अपना रास्ता या तौर-तरीका बदलने की कोई कोशिश करेगा। किरकिरी जरूर हुई, लेकिन बस थोड़ी देर की। दो-चार दिन में ही वह फिर अपनी पुरानी स्थिति में लौट आया है।

इस पहली मई रविवार की रात अमेरिकी नौ सैनिक कमांडो ने 4 हेलीकाप्टरों में राजधानी इस्लामाबाद से मात्र 60 कि. मी. उत्तर स्थित एबटाबाद के सैनिक छावनी क्षेत्र में पाकिस्तान की प्रतिष्ठित सैन्य अकादमी से बमुश्किल दो फर्लांग दूर एक मकान पर हमला किया। इस मकान में कुख्यात अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी जिहादी संगठन अलकायदा का संस्थापक ओसामा बिन लादेन छिपकर रह रहा था। अमेरिका पिछले 10 वषों से उसकी खोज में था, क्योंकि वह उसे 11 सितंबर 2001 में न्यूयार्क तथा वाशिंगटन में हुए हमले का मुख्य अपराधी मानता था। ओसामा के लिए ही अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और वहां मुल्ला उमर के नेतृत्व में गठित तालिबान सरकार को पराजित कर हामिद करजइ्र के नेतृत्व में एक नई सरकार स्थापित की। यह युद्ध अभी भी चल रहा है और उसके करीब एक लाख सैनिक वहां फंसे हुए हैं। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को ध्वस्त करने के बाद भी अमेरिका को ओसामा हासिल नहीं हो सका। पाकिस्तानल इस युद्ध में भी अमेरिका का साथ दे रहा था, लेकिन वह भीतर-भीतर तालिबान नेताओं से भी मिला हुआ था। पाकिस्तान ने न केवल लादेन व मुल्ला उमर को बल्कि अन्य तमाम अलकायदा व तालिबान नेताओं को बचा लिया और अपने देश की दुर्गम पहाड़ियों में छिपा दिया।

अमेरिका तब से लादेन की खोज के लिए पाकिस्तान की मनुहार करने में लगा है। उसने पाकिस्तान को मुंहमांगी दौलत व हथियार उपलब्ध कराया। गत 10 वर्षों में वह पाकिसतान को करीब 20 अरब डॉलर की सहायता दे चुका है। लेकिन पाकिस्तान अब तक उसे चकमा देता ही आ रहा है। उसने अरबों डॉलर पाने के लिए अलकायदा के कुछ बड़े नेताओं को पकड़कर अमेरिका के हवाले अवश्य किया, लेकिन लादेन को छिपाए रखा। उदाहरण के लिए उसने अलकायदा के एक शीर्ष कमांडर खालिद शेख मोहम्मद को- जिसे 9/11 के हमले का मुख्य सूत्रधार माना जाता है, जल्दी ही अमेरिका के हवाले कर दिया। अफगानिस्तान में स्थित अलकायदा व तालिबान के नेताओं को चूंकि पाकिस्तान ने ही अमेरिकी सेना के चंगुल में जाने से बचाया व छिपाया था, इसलिए उसकी सेना व उसके गुप्तचर संगठन के अफसरों को उन सारे लोगों के बारे में पूरी जानकारी थी, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी अमेरिका के समक्ष लगातार यह नाटक करते रहे कि वे उनकी खोज में लगे हैं। अमेरिका यदि उन्हें हथियारों और धन की पूरी सहायता करे तो वे उन्हें खोज निकाल सकते हैं।

अमेरिका ने पहले तो पाकिस्तानी अधिकारियों पर पूरा विश्वास किया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें यह संदेह होने लगा कि पाकिस्तानी दोहरा खेल खेल रहे हैं इसलिए उसने अपने गुप्तचर तंत्र को तेज किया और अफगानिस्तान से लगे पाकिस्तान के उन इलाकों पर अपने मानव रहित ‘ड्रोन’ विमानों के हमले तेज किये। लादेन के बचाव में पाकिस्तानी अधिकारियों ने ऐसी खबरें उड़ाना शुरू कर दिया कि बीमार लादेन की मौत हो चुकी है, लेकिन अमेरिका ने इन खबरों पर विश्वास नहीं किया व पाकिस्तान को भी उसकी खोज के अभियान पर लगाए रखा और स्वयं अपनी कोशिश भी जारी रखी। अंत में उसके गुप्तचर सूत्रों ने जब पक्के तौर पर यह पता लगा लिया कि लादेन उत्तरी वजीरिस्तान की बीहड़ पहाड़ियों में नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सैन्य आकदमी के साये तले एक विशाल भवन में छिपा हुआ है तो उसने अपनी स्वतंत्र कार्रवाई की योजना बनाई और गत रविवार को उसने ओसामा को तो मार गिराया। पाकिस्तान सरकार इस अमेरिकी कार्रवाई से हतप्रभ थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इस पर अब वह क्या करे या क्या बोले। उसके नेताओं के तहत-तरह के परस्पर विरोधी बयान आ रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने घोषणा की कि पाकिस्तान सरकार के सहयोग से उन्होंने यह कार्रवाई सम्पन्न की। उनका यह एक कूटनीतिक बयान था जिससे कोई यह आरोप न लगाए कि अमेरिकी सेना ने पाकिस्तानी प्रभुसत्ता का उल्लंघन करके उसके भीतरी इलाके में कोई गुप्त हमला किया। पाकिस्तान इस दुविधा में था कि वह इस बयान का समर्थन करे या विरोध। पहले तो उसने एक बार इसका श्रेय स्वयं लेने की कोशिश की। असल में न वे यह खुलकर कह पा रहे थे कि अमेरिका का सहयोग करके उन्होंने ही लादेन को मरवाया और न यह कि उनकी बिना जानकारी के अमेरिकी सैनिक भीतर आ गये और लादेन को मार कर उसकी लाश भी लेकर निकल गये। पहली स्थिति में उसे तीव्र आंतरिक विरोध का भय था और दूसरी स्थिति में यह स्वीकार करना था कि पाकिस्तानी सेना निहायत निकम्मी है कि चार-चार विदेशी हेलीकाप्टर उसकी राजधानी के पास तक आकर कार्रवाई करके निकल गये और उसे पता तक नहीं चला। मगर तीव्र आंतरिक विरोध को देखते हुए अंततः उसने दूसरा विकल्प स्वीकार किया। अमेरिकी सेना के आगे अपनी सेना की अक्षमता स्वीकार करना इसके मुकाबले आसान था कि ओसामा को मरवाने में उसका भी सहयोग था।

सैनिक उच्चाधिकारियों वे आईएसआई प्रमुख की बैठक के बाद उच्चस्तरीय राजनीतिक विचार-विमर्श में तय पाया गया कि राष्ट्रीय प्रभुसत्ता रक्षा की कसमें खाते हुए अमेरिका को चेतावनी देते हुए बयान जारी किये जाए जिससे लोगों का गुस्सा शांत करते हुए अपनी प्रतिष्ठा भी बचाई जाए। यद्यपि यह किसी के लिए विश्वास करना कठिन है कि ओसामा का एबटाबाद में रहना पाकिस्तान की सरकार को बिलकुल पता नहीं था फिर भी सरकार यही बताने में लगी है कि उसे इसकी कोई जानकारी नहीं है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति दोनों ने अपने बयानों में कहा है कि लादेन के जहां-जहां भी रहने का अनुमान था वहां उसे खोजा गया, लेकिन वह नहीं मिला।

अमेरिका को चेतावनी देने वाला बयान देने के लिए विदेश सचिव सलमान बशीर सामने आए। उन्होंने लगे हाथ भारत को भी धमकी दे डाली कि यदि उसने भी अमेरिका की तरह कोई कार्रवाई करने का दुस्साहस किया तो इस क्षेत्र में तबाही मच जाएगी। उन्होंने बिना नाम लिए भारत के सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह तथा वायुसेना प्रमुख पी.वी. नाइक के वक्तव्यों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि मैं अपने इस क्षेत्र में भी बड़ी-बड़ी डींगे सुन रहा हूं, लेकिन मैं आगाह करना चाहता हूं कि यदि ऐसा कोई दुस्साहस किया गया तो उसके अत्यंत गंभीर परिणाम होंगे। इन दोनों सेना नायकों ने अपने वक्तव्यों में कहा था कि भारत भी उस तरह की कार्रवाई करने में सक्षम है जैसा कि अमेरिका ने किया है।

यद्यपि हमारे सेना नायकों की टिप्पणी तकनीकी दृष्टि से सही हो सकती है, लेकिन सच्चाई यही है कि पाकिस्तान के भीतर अमेरिका की तरह की कार्रवाई करना हमारी क्षमता के बाहर है। पाकिस्तान की अमेरिका को दी गई चेतावनी सिर्फ एक नाटक है, जो वास्तव में अमेरिका को सुनाने के लिए नहीं, बल्कि पाकिस्तानी जनता को सुनाने के लिये किया गया है, जबकि भारत के प्रति उसका स्तर नितांत भिन्न किस्म का है। उसका लक्ष्य अपनी जनता को सुनाने के साथ-साथ भारत को भी वास्तविक धमकी देना है कि वह किसी तरह की गलत फहमी न पाले। भारत अमेरिका नहीं है। न सैन्य शक्ति में न धन शक्ति में। पाकिस्तान पर अमेरिका का जैसा दबाव है वैसा भरत का कभी नहीं हो सकता। अमेरिका से पाकिस्तान को लगातार अरबों डॉलर की सैनिक असैनिक सहायता मिल रही है। सच्चाई यह है कि पूरी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था अमेरिकी सहायता पर टिकी है। अमेरिका व यूरोपीय देशों की सहायता न मिले तो पाकिस्तानी सेना को वेतन मिलना भी कठिन हो जाए। अमेरिका उससे अपनी सहायता का हाथ् खींच ले तो पाकिस्तान की पूरी रीढ़ चरमरा जाएगी। लेकिन पाकिस्तान की धोखाधड़ी तथा दोहरापन उजागर हो जाने के बाद भी अमेरिका उसे छोड़ नहीं सकता। वह जरूरत पड़ने पर उसके भीतर घ्ुसकर हमला भी करेगा मगर सहायता भी जारी रखेगा। उसी तरह पाकिस्तान भी चेतावनी जो भी दे, लेकिन वह अमेरिका से संबंध तोड़ने का साहस नहीं कर सकता।

सलमान बशीर की इस धमकी का अमेरिका पर रंच मात्र भी असर नहीं है कि एबटाबाद जैसी कोई कार्रवाई दुबारा हुई तो पाकिस्तान उसे बर्दाश्त नहीं करेगा। वह अपनी प्रभुसत्ता की हर कीमत पर रक्षा करेगा और यदि उसे भंग करने की कोशिश की गई तो उसके गंभीर परिणाम होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने साफ कहा है कि यदि जरूरत पड़ी तो आगे भी अमेरिका पाकिस्तान में ऐसी कार्रवाई कर सकता है। सलमान बशीर की चेतावनी के अगले ही दिन अमेरिकी ‘ड्रोन‘ विमानों ने उत्तरी वजीरिस्तान में हमले किये। जिसमें कई आतंकवादी मारे गये।

असल में केवल लादेन के मारे जाने से अमेरिका का काम पूरा नहीं हुआ है। लादेन उसके मुख्य निशाने पर था, तो केवल इसलिए कि वह 9/11 के हमलों के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार था। लादेन को मार कर उसने 9/11 का बदला ले लिया है, लेकिन आतंकवाद के विरुद्ध उसका अभियान अभी शेष है। लादेन के बाद अब अमेरिका की अगली खोज ‘मुल्ला उमर‘ की है। मुल्ला उमर कोई लादेन से कम खतरनाक नहीं है। अफगानिस्तान में तालिबान फौजों का मुखिया वही था। उसने ही काबुल में लादेन को भी शरण दे रखी थी। राष्ट्रपति के पद पर आसीन उमर ने लादेन की रक्षा के लिए अपनी नव अर्जित अफगानिस्तान की सत्ता की बाजी लगा दी थी। यह मुल्ला उमर भी कहीं पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है। पाकिस्तानी सेना व आई.एस.आई. ने उसे भी संरक्षण दे रखा है। लादेन के आवास जैसी कोई व्यवस्था उसके लिए भी कहीं की गई होगी।

अमेरिका को उमर के बाद अन्य अलकायदा व तालिबान नेताओं को भी खोज निकालना है जो पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं। निश्चय ही पाकिस्तानी अधिकारियों से उनका पता ठिकाना उगलवाना मुश्किल होगा इसलिए पाकिस्तान चाहे या न चाहे लेकिन उसकी धरती पर अमेरिकी गुप्तचरों का जाल अपना काम जारी रखेगा। पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल परवेज अशरफ कयानी ने कहा है कि पाकिस्तान स्थित अमेरिकी सैनिकों को गुप्तचरों की संख्या कम की जाएगी। इस पर अमेरिका ने बड़ी सख्त टिप्पणी की है और कहा है कि पाकिस्तान में अमेरिकी सैनिक अधिकारी रहें या न रहें यह पाकिस्तान को तय करना है अमेरिका को नहीं। इसके बाद अब पाकिस्तानी अधिकारियों की बोलती बंद है। पाकिस्तान के लिए फिलहाल यह नामुमकिन है कि वह अमेरिका को पूरी तरह अपने यहां से निकाल बाहर करे।

जाहिर है, सब कुछ के बावजूद अमेरिका के साथ पाकिस्तान के संबंध पहले की तरह चलते रहें। जैसे पाकिस्तान कुछ भी करे फिर भी अमेरिका उसे नहीं छोड़ सकता उसी तरह अमेरिका कुछ भी करे पाकिस्तान उसे नहीं छोड़ सकता। इसलिए लादेन के पाकिस्तान के भीतर मारे जाने से भी अमेरिका व पाक संबंधों में कोई बदलाव आने वाला नहीं है।

अब यदि भारत के संदर्भ में इस घटना को देखें तो भी यथास्थिति में बदलाव का कहीं कोई संकेत नहीं है। शायद वर्तमान राजनीतिक स्थिति में कोई बदलाव हो भी नहीं सकता। भरत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि लादेन की मौत से दोनों देशों के बीच शुरू हुई वार्ता श्रृंखला पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। भरतीय नेताओं ने सलमान बशीर की धमकी को भी नजरंअदाज कर दिया है। पाकिस्तान की किसी भी सरकार की आधारभूमि यदि डगमगाती नजर आती है तो वह भारत को धमकी देने का फार्मूला आजमाने लगती है, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि भारत के लिए अब सुरक्षा के खतरे और बढ़ गये हैं। पाकिस्तान की सरकार अपनी आंतरिक स्थिति संभालने के लिए अब अपने जिहादी संगठनों को और छूट देगी।

भारत के पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं है कि वह अपनी आंतरिक व बाह्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करे। यहां के लोगों को यह सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए कि भारत अमेरिका की तरह की कोई जवाबी कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है। अमेरिका की 26/11 के जिम्मेदार जिहादियों से बदला लेने के लिए उस तरह की कार्रवाई की अनुमति नहीं दे सकता जैसा 9/11 का बदला लेने के लिए उसने खुद की है। वह भारत को संयम बरतने की सलाह देगा और भारत उसे मानने के लिए मजबूर होगा, क्योंकि उसके पास और कोई वैकल्पिक कार्रवाई करने का साहस नहीं है।

यहां के रणनीतिकार अभी भी इस तरह की टिप्पणी करते हैं कि पाकिस्तान दाउद जैसे अपराधियों को भारत के हवाले करने के आग्रह का जवाब इसलिए नहीं देता कि दोनों देशों के बीच ‘परस्पर कानूनी सहयोग संधि' (म्युचुअल लीगल असिस्टेंट ट्रीटी) पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। ऐसे भोले लोगों को कौन बताए कि यदि इस संधि पर हस्ताक्षर हुए होते तो क्या पाकिस्तान मुम्बई बम धमाकों के दोषी दाउद को भारत के हवाले कर देता या 26/11 के मुम्बई हमले के जिम्मेदार हाफिज मुहम्मद सईद पर भारत को कानूनी कार्रवाई की अनुमति दे देता।

आश्चर्य है कि अभी भी यहां लोग इस सच्चाई को नहीं समझ पा रहे हैं कि इस्लामी आतंकवाद पाकिस्तान की सरकारी युद्ध नीति का हिस्सा है। पाकिस्तानी जिहादी संगठन पाकिस्तानी रक्ष तंत्र यानी उसकी सेना के ही एक अंग हैं। आई.एस.आई. के पूर्व प्रमुख लेफ्टीनेंट जनरल असद दुर्रानी ने आतंकवाद को एक तरह की युद्ध तकनीक कहा था। वह राज्य (यानी सरकार) का एक नीतिगत हथियार है। फिर यह कैसे संभव है कि पाकिस्तान सरकार अपने ही रक्षातंत्र के खिलाफ भारत को किसी तरह का सहयोग दे। पाकिस्तान में विविध जिहादी संगठनों का निर्माण ही तब किया गया था जब पाकिस्तानी सेना भारत के खिलाफ किसी तरह की सफलता प्राप्त करने में विफल हो गई थी। इसका लक्ष्य ही यह था कि इनके इस्तेमाल द्वारा भारत को निरंतर आहत करके कमजोर किया जाए। भारत, पाकिस्तान की इस युद्ध तकनीक का मुकाबला करने की अब तक कोई युक्ति नहीं खोज पाया है।

भारत के विरुद्ध इस्तेमाल के लिए तैयार की गई इस जिहादी सेना में संयोगवश अलकायदा और तालिबान की दो शक्तियां और शामिल हो गई। अलकायदा का गठन मूलतः अमेरिका को सबक सिखाने के लिए किया गया था और तालिबान का गठन अफगानिस्तान से रूसी फौजों को भगाने के लिए। तालिबान का गठन भी पाकिस्तान में हुआ और संयोगवश अलकायदा का मुखिया भी वहीं शरण लेने आ गया। इस तरह सारी आतंकवादी शक्तियां अब पाकिस्तान में एकत्र हो गई हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में चूंकि भारत-अमेरिका के निकट आ गया है इसलिए सारी आतंकवादी शक्तियां संयुक्त रूप से भारत और अमेरिका के खिलाफ हो गई है।

लश्करे तैयबा का गठन मूलतः केवल भारत के खिलाफ कार्रवाई के लिए हुआ था, लेकिन अब वह भी अलकायदा की तरह का वैश्विक रूप धारण कर रहा है। अब लश्करे तैयबा भारत के साथ् ही आस्ट्रेलिया, यू.एस. व यूरोप पर भी हमले की योजना बना रहा है। इधर के महीनों में उसके जो लोग गिरफ्तार हुए हैं उनसे इसकी पूरी कहानी सामने आ रही है। पड़ताल में कई ऐसे नये तथ्य सामने आए हैं। हेडली के साथ आई.एस.आई. और लश्कर के गठजोड़ का तो अब पूरा प्रमाण मिल चुका है। आई.एस.आई. अफसर रिटायर्ड मेजर अब्दुल रहमान हेडली के साथ मिलकर काम कर रहे थे। इनका संबंध इलियास कश्मीरी नाम के उस आतंकवादी के साथ भी है जो अलकायदा से जुड़ा है और ब्रिगेड 313 के प्रमुख के रूप में जाना जाता है। बताया जाता है इलिया कश्मीरी भी भारत पर हमले की फिराक में था। आशय यह कि पाकिस्तान में केन्द्रित हुई आतंकवादियों की फौज से सर्वाधिक खतरा भारत को है। अमेरिका तो इनसे काफी दूर है, भारत तो बगल में ही है। अमेरिका में कोई कार्रवाई करना मुश्किल भी है, लेकिन भारत में तो यह काफी आसान है। इसलिए अब भारत को अधिक सतर्क हो जाना चाहिए।

8/05/2011


3 टिप्‍पणियां:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

राजनीति के भस्मासुर उन्हीं को अंत में जला देते है जिनसे उनको वर्दान मिला था। भिंदरानवाले से लेकर बिन लादेन की आग में उन्हीं के आक़ा जलेंगे:(

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

गहन विश्लेषण ...... हालात की सटीक रूपरेखा लिए आलेख ...आभार

Hindi Choti ने कहा…


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