शनिवार, 5 जून 2010

संकट में घिरा रोमन कैथोलिक साम्राज्य

दुनिया को रोमन कैथोलिक साम्राज्य आज जैसे संकट में घिरा है, वैसा पहले शायद कभी नहीं था। बच्चों के साथ यौन दुराचार के आरोपों में वैटिकन के महामहिम पोप बेनेडिक्ट 16वें को भी अपने घेरे में ले लिया है। उनके उुपर पद छोड़ने तक का दबाव बढ़ रहा है। पोप बेनेडिक्ट पर सीधा आरोप है कि उन्होंने बच्चों के साथ यौन दुराचार करने वाले पादरियों को सजा दिलाने की जगह उन्हें संरक्षण प्रदान किया। शताब्दियों से लोग सब कुछ देखते, सुनते तथा सहते हुए चुप रहे, लेकिन अब लोग चुप रहने के लिए तैयार नहीं हैं। वे खुलकर बाहर आ रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं। पोप के पास शिकायती चिट्ठियों का अंबार लग गया है, जिसमें से बहुत सी स्वयं उनके खिलाफ हैं। क्या पोप अब इस सद्धर्म में सुधार की कोई पहल करेंगे या उसे अपने पुराने पापों के बोझ तले निष्प्राण होते जाने देंगे।



रोमन कैथोलिक चर्च इस समय लगभग पूरी दुनिया में बच्चों और स्त्रियों के यौन उत्पीड़न के आरोपों से घिरा हुआ है। पोप बेनेडिक्ट 16वें से खुलेआम इन सारे आरोपों की जिम्मेदारी अपने उुपर लेने और पद छोड़ने की मांग की जा रही है। कई देशों में यह मांग उठ रही है कि ईसाई साधु (प्रीस्ट्स) साध्वियों (नन्स) के आचरण नियमों में से ब्रह्मचर्य (सेलीबेसी) का नियम हटाया जाए। स्वयं इटली की 40 औरतों ने पोप को खुला पत्र लिखा है कि ‘सेलीबेसी’ का सिद्धांत हटाया जाए। ये वे औरतें हैं, जिनका रोमन कैथोलिक चर्च के किसी न किसी प्रीस्ट-पादरी से प्रेम संबंध है। इन स्त्रियों ने पत्र में लिखा है कि पादरियों को भी प्रम करने या प्रेम पाने या शारीरिक सुख उठाने की इच्छा होती है। कई देशों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि ‘सेलीबेसी’ कोई ईश्वरीय या ‘डिवाइन’ सिद्धांत नहीं है। यह मानव निर्मित नियम है, इसलिए यह बदला जा सकता है। अभी पिछले महीने जर्मनी में की गयी एक जांच में 250 लोगों ने शिकायत की है कि बचपन में चर्च के किसी न किसी ‘पादरी’ ने उनके साथ जोर-जबर्दस्ती से शारीरिक संबंध बनाया। पोप बेनेडिक्ट के पास तो पूरी दुनिया के देशों से आए ऐसे पत्रों का अंबार लगा है।

वर्तमान पापे बेनेडिक्ट पर तो यह भी आरोप है कि जब वह जर्मनी में कार्डिनल थे, तो उन्होंने पादरियों द्वारा बच्चों और स्त्रियों के साथ किये गये व्यभिचार को छिपाने की कोशिश की। यदि उनके पास कोई शिकायत पहुंचती, तो वे ज्यादा से ज्यादा संबंधित पादरी को उस चर्च से हटाकर किसी और चर्च में भेज देते थे। कई बार उन्होंने स्वयं ऐसे अपराधियों को अपने पास बुलाकर संरक्षण दिया। वास्तव में जबसे चर्चों की स्थापना हुई है, तभी से वे यौन अपराधों के केंद्र बने हुए हैं, लेकिन वहां की ऐसी शिकायतों को हमेशा बाहर आने से रोका गया। ईसाई धर्म संघ को कोई क्षति न पहुंचे, इसके लिए किसी धर्म गुरु-पादरी या प्रीस्ट को कभी कोई सजा नहीं दी गयी। यहां तक कि उसकी सार्वजनिक निंदा से भी बचा गया। लेकिन ईसा के दो हजार वर्ष बाद इस 21वीं सदी में अब लोग चुप रहने को तैयार नहीं है। कल के यौन शोषण के शिकार बच्चे अब बड़े ही नहीं, प्रौढ़ावस्था को प्राप्त कर चुके हैं। अब उन्होंने अपने सारे कटु अनुभवों को सार्वजनिक करने का बीड़ा उठाया है। कई एक ने तो पूरे विस्तार से सारे सूक्ष्म विवरण के साथ अपनी कहानी पेश की है। पुरुषों-स्त्रियों सबने संकोच त्यागकर चर्च के काले कारनामों को उजागर करना शुरू कर दिया है। इस नैथ्तक भ्रष्टाचार की कहानी कहने के लिए कई ‘प्रीस्ट’ भी सामने आ रहे हैं। एक ऐसे ईसाई साधु ने लिखा है- ‘कैथोलिज्म के पास एक बड़ा शानदार फार्मूला है। इसकी शुरुआत इस बात से होती है कि मूलतः हम सब पापी (सिनर्स) हैं, इसलिए हमें पाप मुक्त होने या अच्छा बनने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए और यदि हम ऐसा नहीं कर पाते, तो हमारे पस एक ओर आसान रास्ता है- पश्चाताप का। हम पश्चाताप करके अपने को पवित्र कर सकते हैं। प्रभु ईसा तो हमारे पापों को क्षमा करने के लिए ही सूली पर चढ़ गये थे। फिर हमें क्या करना। हम तो किसी ‘प्रीस्ट’ के सामने अपने पापों को स्वीकार करके भी पाप मुक्त हो सकते हैं।

वैटिकन ने दुनियाभर की चर्चों में तमाम धर्मगुरुओं, पादरियों व अन्य धर्माधिकारियों द्वारा किये गये सारे पापाचारों, अपराधों, उत्पीड़न व अन्याय की माफी के लिए वर्ष 2000 में एक विशााल क्षमा दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें पूर्व पोप जॉन पॉल द्वितीय भी शामिल हुए थे। इसके आयोजनकर्ता कार्डिनल जोसेफ रैटजिंगर ही थे, जो वर्तमान समय में पोप की गद्दी पर हैं। 12 मार्च 2000 को आयोजित इस क्षमा दिवस समारोह में पिछली तमाम शताब्दियों में चर्च द्वारा स्त्रियों, बच्चों, अल्पसंख्यकों आदि के प्रति किये गये अपराधों के लिए क्षमा मांग ली गयीं। इस तरह उन्होंने चर्च को दो हजार साल के इतिहास की सारी गंदगी से मुक्ति दिलाकर उसे पवित्र किया।

इधर जब जर्मनी में तथा अन्य देशों में बच्चों के साथ व्यभिचार के असंख्य मामले सामने आये, तो फिर कुछ लोगों ने एक और क्षमा दिवस (द डे आफ पारडन) का आयोजन करने की सलाह दी, किंतु उसे नहीं स्वीकार किया गया। समझा गया कि ऐसा करने से चर्च पर ऐसे व्यभिचार का स्थाई दाग लग जाएगा। पादरियों द्वारा किये जा रहे व्यभिचारों की शिकायत करने वाले भी अब इस ‘धार्मिक ढोंग’ को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उनकी मांग है कि इसके लिए दोषी धर्माधिकारियों के खिलाफ वर्तमान कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई की जाए। दुनिया के करीब सवा अरब रोमन कैथोलिक इस स्थिति से बेहद क्षुब्ध हैं और व्यवस्था में आमूल-चूल सुधार करना चाहते हैं।

वास्तव में ‘सेलीबेसी’ या ‘ब्रह्मचर्य’ को दुनिया में जहां कहीं भी किसी भी धर्म का आधारभूत सिद्धांत बनाया गया, वहां मठ या चर्च के भीतर यौन अपराध बढ़े ओर स्वभावतः उनका शिकार छोटे बच्चे-बच्चियों को होना पड़ा। दुनिया के कई धर्मों में ब्रह्मचर्य या सेलीबेसी को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दियाग या है। ईसाई धर्म के अलावा जैन, बौद्ध तथा वैरागी वैष्णव व साधु समाज में भी स्त्री संग को पूरी तरह वर्जित किया गया। ईसाई मत में तो औरत पाप की खान है। वह पुरुष को गुमराह करके पाप की तरफ ले जाती है। पाप की ऐसी कल्पना जैन, बौद्ध, वैष्णव आदि धर्मों में नहीं थी, फिर भी निर्वाण, मोक्ष या मुक्ति के लिए ब्रह्मचर्य को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया । जैन और बौद्ध धर्मों में सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिहग्रह (संग्रह न करना) तथा ब्रह्मचर्य (स्त्री संग से दूर रहना), ये पांच पवित्र, साध्नामय जीवन के आधारभूत अंग हैं। इसलिए इन धर्मों के आदि आचार्यों ने पहले तो कोशिश की कि स्त्रियों को उससे दूर रखा जाए, लेकिन आत्यंतिक दृष्टि से यह किसी के लिए संभव नहीं हो सका।

भगवान बुद्ध ने जब अपने पहले ‘धर्म संघ’ की स्थापना की, तो उन्होंने उसमें स्त्री का प्रवेश वर्जित रखा। लेकिन जब स्त्रियों के ऐसे सवालों का जवाब देना उनके लिए मुश्किल हो गया कि क्या स्त्रियां निर्वाण या मोक्ष की अधिकारिणी नहीं हैं। क्या धर्म की संपदा केवल पुरुषों के लिए है। क्या स्त्रियां पुरुषों से कुछ हीन हैं कि उन्हें इस लाभ से वंचित किया जा रहा है । भगवान बुद्ध पहले तो चुप रहकर इन सवालों को टालते रहे, लेकिन जब उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने उनके सामने यही सवाल रखा और धर्म संघ में अपने प्रवेश की इच्छा व्यक्त की, तो बुद्ध के सामने इसे टालने का कोई मार्ग नहीं रह गया। जन्म के समय ही मां का निधन हो जाने के कारण मौसी गौतमी ने ही उनका पालन-पोषण किया था, उन्हें बड़ा किया था। उनकी बात टालना उनके वश में नहीं था। इसलिए उनके आग्रह पर सिर झुकाते हुए उन्होंने बड़े अनमने भाव से स्त्रियों को भी संघ में प्रवेश की अनुमति दे दी। लेकिन इसके साथ ही बुद्ध ने कहा कि अब इस धर्म संघ की आयु आधी रह गयी है। उन्होंने पहले घोषित किया था कि उनका धर्म संघ एक हजार वर्ष तक चलेगा, किंतु स्त्रियों को प्रवेश की अनुमति देने के बाद कहा कि अब इसकी आयु केवल 500 वर्ष रह गयी है।

यद्यपि उन्होंने संघ में स्त्री-पुरुषों को साथ नहीं रखा। पुरुषों का अलग संघ था और स्त्रियों का अलग। दोनों सर्वथा अलग-अलग रहकर धर्म साधना करते थे। लेकिन केवल कुछ गज जमीन या एक दीवाल की दूरी उन्हें कब तक अलग रख सकती थी। बौद्ध गं्रथों के अध्येता जानते हैं कि इससे बौद्ध भिक्षु-भिक्षुओं के बीच किस तरह का भ्रष्टाचार फैला। थेरी गाथाएं इसकी प्रमाण् हैं। और अंततः यही बौद्ध धर्म वामाचार की पतनशीलता तक जा पहुंचा। इस स्थिति से जैन धर्म भी अपने को बचा नहीं सका। धर्म की प्रतिष्ठा रक्षा के लिए इन धर्मों के अनुयायी ऐसी घटनाओं को दबाने-छिपाने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। रोमन कैथोलिक ईसाई भी हजारों वर्षों से आखिर इसे छिपाते ही तो आ रहे थे। लेकिन अब उन्होंने साहस करके इस कदाचार का सफाया करने का ही निर्णय ले लिया है।

वास्तव में ‘सेलीबेसी’ या ‘ब्रह्मचर्य’ एक प्रकृति विरोधी कार्य है। अपनी प्राचीन भारतीय परंपरा में भी ‘ब्रह्मचर्य’ का जिक्र आता है, लेकिन उसका अर्थ केवल ‘सेलीबेसी’ नहीं है। यदि आजकल यह इसी अर्थ में रुढ़ हो गया है, लेकिन मूलतः ‘ब्रह्मचर्य’ मनुष्य जीवन के एक आश्रम का नाम था, जो विद्याध्ययन काल के आचार व नियमों से सम्बद्ध था। ब्रह्म का शब्दार्थ है ज्ञान। ‘ब्रह्मचर्य’ का अर्थ हुआ ज्ञान का आचार या आचरण। इसलिए विद्याध्ययनकाल की जीवनशैली या चर्या को ‘ब्रह्मचर्य’ कहा गया। विद्याध्ययन में व्यवधान न पैदा हो, इसलिए इस काल में स्त्री सहवास करना, नाच रंग में शामिल होना, श्रृंगार करना, बहुविध स्वाद वाला भोजन करना आदि वर्जित था। ज्ञानर्जान या विद्याध्ययन काल बीतते ही ‘ब्रह्मचर्य’ काल समाप्त हो जाता था और फिर व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने और उसके सारे सुखों का उपभोग करने का पुनः अधिकारी हो जाता था। उस समय यदि कोई गृहस्थ भी अल्पकाल के लिए ही सही किसी विद्याध्ययन के लिए जाना चाहता था, तो उसे उस काल में ‘ब्रह्मचर्य’ का पालन करना होता था।

भारतीय समाज चिंतकों ने आश्रम व्यवस्था उसी विचार के साथ तैयार की थी कि व्यक्ति पहले विद्याध्ययन द्वारा जीवन के लिए सारे कौशल अर्जित करे। फिर धर्मानुकूल अर्थोपार्जन करते हुए जीवन के सारे सुखों -जिनमें यौन सुख भी शामिल था- का उपभोग करने के उपरांत फिर विरत होकर अपने को समाज सेवा के लिए अर्पित कर दे। और जब शरीर असक्त हो जाए, जीवन की सक्रियता क्षीण हो जाए, तो वह अपने मन और चित्त को मृत्यु की तैयारी की तरफ मोड़ दे और मुमुक्षु या संन्यासी की जीवनचर्या अपना ले। उसने कैशोर्य या युवावस्था में भिक्षु, संन्यासी या मुनि बनने की कभी सलाह नहीं दी। लेकिन मुक्ति या निर्वाण पाने के लिए उतावले कुछ आचार्यों ने किशोरों या नव युवक-युवतियों को भी संन्यास की दीक्षा देना शुरू किया। भगवान बुद्ध ने भी यही किया। उन्होंने युवा कुमार व कुमारियों को दीक्षा देनी शुरू कर दी। वे धर्म संघ के सदस्य बन गये। वैश्य कुमार अनाथपिडक अभी अविवाहित युवा ही था, जब वह भिक्षु बन गया। कोशा जैसी युवा राजनर्तकी व स्थूलभद्र जैसे अविवाहित क्षत्रिय कुमार जैन भिक्षु बन गये।

ईसाई धर्म में यह सब और व्यापक स्तर पर हुआ। करीब 2000 वर्षों तक यह सब चलता आया, लेकिन अब विद्रोह की स्थिति खड़ी हो गयी है और पोप बेनेडिक्ट 16वें के लिए धर्म के नैतिक आधार की ही नहीं, अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करना भी कठिन हो रहा है। पिछले दिनों पोप बेनेडिक्ट के वरिष्ठ सलाहकार तथा वियना के आर्कबिशप कार्डिनल क्रिस्टोफ स्कोन्बर्न ने सलाह दी कि ‘सेक्स एब्यूज’ को खत्म करने के लिए ‘सेलीबेसी’ के सिद्धांत को ईसाई आचार संहिता से हटा दिया जाए, तो शायद पापे की उन्हें फटकार पड़ी और उन्होंने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया। लेकिन समस्या यह है कि ‘सेक्स एब्यूज’ की यह समस्या खत्म कैसे हो।

वैटिकन के एक अधिकारी तथा ‘स्पेनिश प्रीस्ट’ ने अपना एक संस्मरण सुनाते हुए बताया कि वह अमेरिका की एक सड़क से गुजर रहा था, तो उसे देखकर बगल की गाड़ी से एक व्यक्ति ‘पोर्को’ -सुअर- कहकर चिल्लाया। अब वह क्या करे। मीडिया में रोमन कैथोलिक चर्चा के पादरियों के कारनामों का जैसा प्रचार हुआ है, उसमें अब कोई ‘प्रीस्ट’ किसी बच्चे को गले से नहीं लगा सकता। ‘सेक्स एब्यूज’ के विवाद ने पूरे रोमन कैथोलिक चर्च को चारों तरफ से इस तरह घेर लिया है कि उसके किसी धर्म गुरु के पास कहीं सिर उठाने के लिए जगह नहीं बची है। इस अपराध ने चर्च के तमाम अच्छे कामों को भी ढक लिया है। चर्च तमाम अस्पताल, स्कूल, अनाथालय व सेवाश्रम चला रहे हैं, जिनसे करोड़ों लोगों को लाभ पहुंच रहा है। लेकिन इस अकेले ‘सेक्स एब्यूज’ ने पूरे चर्च साम्राज्य पर कालिख पोत दी है। मीडिया के प्रचार से प्रभावित बच्चे तो अब किसी पादरी के नजदीक जाने से डरते हैंं। वैटिकन के कई अधिकारियों ने अमेरिकी समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स को इसके लिए सर्वाधिक दोषी ठहराया है, क्योंकि उसने ही सबसे पहले रोमन कैथोलिक धर्म गुरुओं के पापमय यौनाचारों का खुलासा किया था और उन पुरुष-स्त्रियों की अपनी शिकायतों को छापा था, जो अपनी कहानी लेकर प्रेस के सामने आयी और इसके बाद तो दुनिया भर के प्रेस में ये कहानियां धड़ा-धड़ छपने लगीं। पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने उन पादरियों की तरफ से स्वयं क्षमायाचना की, जिन्होंने बच्चों को व्याभिचार का शिकार बनाया, लेकिन इस क्षमायाचना से भी मामला शांत नहीं हो पा रहा है।

बहुत से लोग आश्चर्य कर रहे हैं कि आखिर ज्यादातर बच्चे ही इसके शिकार क्यों हो रहे हैं। लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। चाहत तो स्त्री की ही रहती है, लेकिन वांक्षित स्त्री की उपलब्धता मुश्किल है। वहां गर्भाधान का खतरा है, किसी के देख लेने का खतरा है, किसी आश्रम में स्त्री की उपस्थिति ही शक पैदा करती है। स्त्री ब्लैकमेल कर सकती है और फिर वह पाप की ओर ले जाने वाली तो है ही। ऐसे में किशोर लड़कों को शिकार बनाना सर्वाधिक सुरक्षित रहता है। यह तो केवल ईसाई जगत की कहानी है। थाईलैंड, जापान, बर्मा, चीन आदि के बौद्ध साधुओं की स्थिति भी कुछ अधिक भिन्न नहीं है। बस उनके मीडिया में आने की देर है। वैसे अनेक उपन्यासों व क्षेत्रीय कहानियों में उनके तरह-तरह के विवरण यदा-कदा आते रहते हैं, लेकिन अभी उनके संस्थानों पर पीड़ित अनुयायियों द्वारा वैसा हमला नहीं शुरू हुआ है, जैसा कि रोमन कैथोलिक चर्च पर शुरू हो चुका है।

वैसे सच कहा जाए, तो इस तरह के सारे धर्म व मजहब काल बाह्य हो गये हैं। वे अपने सेवा व शिक्षा प्रकल्पों द्वारा अपनी उपयोगिता बनाए हुए हैं, अन्यथा सिद्धांततः उनकी सारी उपादेयता समाप्त हो चुकी है। लेकिन संकट यही है कि संगठित धर्म भी आज एक उद्योग बन गया है, जसका राजनीति व व्यापार में भी अच्छा खासा दखल है। असंख्य लोगों का निहित स्वार्थ उसके साथ जुड़ा हुआ है। फिर भी अब समय आ गया है कि इन धार्मिक संस्थानों और संगठनों के स्वरूप और उनकी उपादेयता पर पुनर्विचार किया जाए। वास्तव में पाप और मुक्ति की मिथ्या धारणाओं से दुनिया को मुक्त कराना आधुनिक युग का सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए।

पिछले गुरुवार को जर्मन की ईसाई स्कूलों में ‘सेक्स एब्यूज’ की जो जांच रिपोर्ट जारी हुई है, उसने पूरी दुनिया के रोमन कैथोलिक साम्राज्य को हिला दिया है। रिपोर्ट छोटी सी है, लेकिन उसका प्रभाव बहुत व्यापक है। जांच करने वाली महिला उर्सुला राउए ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि दशकों से ऐसे अत्याचार हो रहे हैं और चर्च के सारे अधिकारियों को सब कुछ पता है, फिर भी उन्होंने अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। उर्सुला ने यह जांच हाल के एक-दो दशकों की है, जिसमें ईसाई स्कूलों के करीब 205 छात्र अपनी कहानी के साथ सामने आए हैं। उर्सुला के अनुसार यह संख्या बड़ी हो सकती है, लेकिन स्थिति की जानकारी के लिए यह कम नहीं है। चर्च के अधिकारियों का केवल यही कहना है कि उन्हें क्षमा कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने वास्तव में चर्च या ईसाई पंथ की प्रतिष्ठा रक्षा के लिए ऐसी सारी घटनाओं को नजरंदाज करना या उन्हें दबाना ही ठीक समझा। वैटिकन के उच्चाधिकारी भी तक यही करते आए हैं।

लेकिन सवाल है कि कब तक यह सब कुछ क्षमा किया जाता रहेगा। जो गलत है, उसे गलत की तरह स्वीकार करने का साहस कब तक आ पाएगा। वैज्ञानिक विकास और शिक्षा के प्रसार के वर्तमान दौर में मिथ्या विश्वासों पर आधारित कोई धर्म नहीं चल सकता। अच्छा हो कि वैटिकन के रोमन कैथोलिक सम्राट धर्मगुरु पोप ही नहीं, अन्य धर्मों के शीर्ष धर्माचार्य भी अपने पंथों की आचार संहिता और व्यवहारिक  स्थिति का पुनरावलोकन करें और उनमें युगानुरूप परिवर्तन लाने का प्रयत्न करें।