रविवार, 10 अक्टूबर 2010

अधिनायकवाद विरोधी स्वर को मिला नोबेल पुरस्कार


                                                             लिऊ जियाबो अपनी पत्नी के साथ

इस बार नोबल का साहित्य व शांति पुरस्कार प्राप्त करने वालों में एक विशिष्ट समानता है कि दोनों ही मूलतः लेखक हैं। दोनों ही मानवाधिकारवादी हैं तथा दोनों स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए समर्पित हैं। पेरू (द. अमेरिका)  के स्पेनिश साहित्यकार मैरियो वेरगास लोसा स्पेनिश भाषी दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त साहित्यकार हैं। वह वैयक्तिक स्वतंत्रता के सबसे बड़े पक्षधरों में गिने जाते हैं। साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वह पहले पेरूवासी हैं। उधर शांति का नोबेल पुरस्कार चीन के विद्रोही लेखक व राजनीतिक कार्यकर्ता लियू जियाबो को प्राप्त हुआ है, जो इस समय चीन की जेल में कैद हैं। उनका अपराध है कि वह चीनी अधिनायकवाद के विरुद्ध लोकतंत्रवादी आंदोलन चला रहे हैं और वह उस 'नागरिक घोषणा पत्र 2008' के सह लेखक हैं, जो चीन में मानवीय स्वतंत्रता व लोकतंत्र का आह्वान करने वाला सर्वाधिक चर्चित दस्तावेज है।

नोबेल साहित्य व शांति पुरस्कारों के चयन को लेकर प्रायः कुछ न कुछ विवाद खड़ा होता रहा है, लेकिन इस बार पेरू के प्रतिष्ठित लेखक मैरियो वरगास लोसा के नाम की साहित्य के पुरस्कार के लिए घोषणा हुई, तो पूरी दुनिया में एक स्वर से स्वागत किया गया । शांति के पुरस्कार के लिए चीन के मानवाधिकारवादी विद्रोही नेता लियू जियाबो के नाम की घोषणा का भी पूरे विश्व में स्वागत किया गया। हां, इस घोषणा से स्वयं चीन जरूर आग बबूला हो उठा और इसके लिए न केवल नार्वे की उन नोबेल चयन समिति को खरी खोटी सुनायी, बल्कि नार्वे सरकार को भी धमकी दी कि इससे दोनों देशों के संबंध खराब हो सकते हैं। चीन के विदेश विभाग ने अपनी अत्यंत तीखी प्रतिक्रिया में कहा कि यह नोबेल पुरस्कार और उसी भावना का अपमान है। यह एक ऐसे अपराधी को दिया गया है, जिसे चीन के न्याय विभाग ने चीनी कानून के उल्लंघन का दोषी पाया है और उसे 11 वर्ष के कैद की सजा दी है।
यहां उल्लेखनीय है कि मैरियो लोसा और लियू जियाबो को यद्यपि अलग-अलग उपलब्धियों के लिए नोबेल सम्मान के लिए चुना गया है, लेकिन मूलतः दोनों ही लेखक हैं और दोनों ही मानवाधिकारों के सम्मान के लिए राजनीतिक परिवर्तनों के पक्षधर हैं। यह बात अलग है कि लोसा को जहां उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियों के लिए सराहा गया है, वहीं लियू को सीधे संघर्ष के लिए।
74 वर्षीय लोसा एक महान कथाकार ही नहीं, निबंधकार, नाटककार, पत्रकार और सांस्कृतिक टिप्पणीकार भी हैं। उनके 30 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। वह इन उपन्यासों की कथावस्तु के अलावा अपने अनूठे शिल्प के लिए भी प्रसिद्ध हैं। उन्हें दैवी प्रतिभा संपन्न कथाकार माना जाता है। समकालीन राजनीति व समाज उनके लेखन के मुख्य विषय हैं। वह ऐसे जनपक्षकार बुद्धिजीवी हैं, जो यह मानते हैं कि रोजमर्रा के महत्वपूर्ण मुद्दों से लेखक का अनिवार्यतः सरोकार होना चाहिए। उन्हें एक अत्यंत मुखर राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में भी जाना जाता है। राजनीतिक बदलाव की आकांक्षावश एक बार उन्होंने पेरू के राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा था। वह थोड़े मतों से हार गये थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी और लेखन पर ही अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। देश या समाज की राजनीति व संस्कृति को आकार देने में कलम की शक्ति के प्रति उनमें दृढ़ विश्वास है। यह विश्वास ही उनके लेखन की मूल अंतर्धारा है। नोबेल पुरस्कार के उनके प्रशस्ति पत्र में साफ लिखा गया है कि उन्हें यह सम्मान -सत्ता के ढांचे की संरचना तथा वैयक्तिक प्रतिरोध, विरोध और पराजय के उनके तीखे बिम्बों- के लिए दिया जा रहा है।
यह पेरू के लिए साहित्य का पहला नोबेल पुरस्कार है, लेकिन सच यह है कि लोसा ने पेरू को वैश्विक सम्मान दिलाया है। वह अपने को राष्ट्रीय सीमाओं के परे एक विश्व नागरिक मानते हैं। उनकी राजनीतिक विचारधारा में यद्यपि बदलाव आता रहा। वह वामपंथी से धीरे-धीरे दक्षिण-मध्यमार्गी बन गये, लेकिन उनका यह विश्वास कभी नहीं बदला कि किसी भी राष्ट्रीय या समाज के जीवन में कहानी एवं साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है और इसके बिना कोई भी विवेकशील मेधा $क्रिटिकल माइंड$ जो ऐतिहासिक परिवर्तनों का वास्तविक इंजिन तथा स्वतंत्रता की सर्वोत्तम संरक्षिका होती है, अपनी कोई सार्थक भूमिका नहीं अदा कर सकती। कहानी कहना या कहानी लिखना स्थूलतया केवल अपने समाज और दुनिया से जुड़ने का माध्यम है, किंतु लोसा की चिंताएं बहुत ठोस और वास्तविक हैं। उनकी कथाशैली की बुनावट भले ही जटिल हो तथा उसमें दर्शन का भी पुट हो, लेकिन वे हमेशा समकालीन विषयों व चिंताओं को ही अपने लेखन में उठाते हैं। उन्होंने बाद में पेरू छोड़ दिया। उनका कहना था कि उनके लिए सभ्यता का यदि कोई मूल आधार है, तो यही कि वह विश्व नागरिक बनें। उनके इस कथन का यह आशय नहीं था कि वह पेरू से निराश थे, लेकिन एक अत्यंत संवेदनश्ील तथा जागरूक लेखक के तौर पर उनकी आधारभूत कल्पना यही थी कि मनुष्य मनुष्य के बीच भेद की रेखाएं न हों, उनके बीच कोई राजनीतिक या राष्ट्रीय सीमा रेखा भी न हो। उनका यह सोचना अति आदर्शवादी कहा जा सकता है, लेकिन सभी उच्चतर मानवीय मेधाओं ने सदैव ऐसी ही कल्पना की है। भारत का यह प्रसिद्ध वाक्य तो सबको पता ही है कि -सीमाएं छोटे लोगों की सोच का हिस्सा होती हैं। यह मेरा है, वह तेरा है, यह अल्पबुद्धि वालों की या संकीर्ण चित्तवालों की सोच है। उदार चरित वाले लोगों के लिए तो यह संपूर्ण संसार ही उसका अपना है, उसका परिवार है (अयं निजः परोवेत्ति गणना लघु चेतसाम्। उदार चरितानाम् तु वसुधैव कुटुम्बकम) । लोसा की सोच भी इससे भिन्न नहीं है। उन्होंने मनुष्यता के इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साहित्य सृजन को अपना साधन बनाया है।
पुरस्कार की घोषणा के बाद अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में पहले तो उन्होंने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि उन्हें यह सम्मान मिला है, फिर छूटते ही उन्होंने कहा कि इससे न उनके जीवन में कोई फर्क पड़ने वाला है, न लेखन में। वह इससे प्रसन्न हैं, लेकिन यह सम्मान उनकी जिंदगी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी लेखक को नोबेल पुरस्कार के बारे में नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि यह उसके लेखन के लिए बुरा है।
लोसा स्पेनिश भाषी दुनिया के सर्वाधिक ख्याति प्राप्त लेखक हैं। कई वर्षों से उनका नाम नोबेल पुरस्कारों की चर्चा में रहा है, लेकिन अनेक राजनीतिक कारणों से वह उपर नीचे होता रहा। दक्षिण् अमेरिका की बौद्धिक विचारधारा ज्यादातर वामपंथी हैं। इस महाद्वीप के पिछले नोबेल पुरस्कार विजेता $कोलंबिया$ गैबरील गार्सिया मार्खेज (1982) वामपंथी बुद्धिजीवियों में अत्यधिक लोकप्रिय है। लोसा कभी उनके घनिष्ठ मित्रों में थ्े, लेकिन लोसा की राजनीतिक विचारधारा बदली तो दोनों विपरीत ध्रुवों की तरह दूर हो गये और 1976 की एक घटना तो अब तक लोग याद करते हैं, जब मेक्सिको शहर के एक सभागार में लोसा ने मार्खेज के मुह पर मुक्का जड़ दिया था और एक फोटोग्राफर ने इस घटना को न केवल दुनियाभर में फैला दिया, बल्कि उस क्षण को अमिट कर दिया। आज तक यह ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया था कि लोसा की यह प्रतिक्रिया राजनीतिक कारणों से थी या पारिवारिक।
उनके कुछ मित्रों के अनुसार लोसा की उनकी पत्नी से अनबन चल रही थी। मार्खेज ने उनकी पत्नी को सांत्वना देने के लिए उनका पक्ष लिया था, जिस पर लोसा गुस्से में थे और मेक्सिको में उस समय जब मार्खेज उन्हें गले लगाने के लिए आगे बढ़े, तो उन्होंने मुक्का जड़ दिया। जबकि दूसरे कुछ लोगों के अनुसार इस हमले का कारण् राजनीतिक था। मुक्का चलाते समय लोसा ने मार्खेज जो कास्त्रो का चमचा कहा था। कास्त्रो क्यूबा की वामपंथी क्रांति के प्रणेता व वहां के राष्ट्रपति थे। कास्त्रो अभी भी दुनिया में वामपंथी विचारधारा के प्रतीक पुरुष माने जाते हैं, जबकि अब उनकी भी विचारधारा बदल चुकी है और जबसे उन्होंने अपने भाई को क्यूबा की सत्ता सौंपी है, तबसे वह पूंजीवादी सुधारवाद के समर्थक बन गये हैं।
खैर, यह सब आज उनके नोबेल सम्मान के संदर्भ में प्रासंगिक नहीं है, फिर भी नोबेल पुरस्कार चयन समिति की दृष्टि उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की तरफ न रही हो, यह नहीं माना जा सकता। पिछले तमाम वर्षों के साहित्य के नोबेल पुरस्कार रचनाकारों की राजनीतिक विचारधारा को केंद्र में रखकर दिये गये हैं। कारण जो हों, लेकिन राजनीति के परे विशुद्ध साहित्यिक मूल्यों या कला को केंद्र में रखकर इधर शायद ही कोई पुरस्कार दिया गया हो। नोबेल के साहित्य व शांति के पुरस्कार इसीलिए विवाद के विषय भी बनते रहे हैं कि उनके चयन में राजनीतिक दृष्टि की प्रधानता रहती आयी है।
सामान्यतया यह माना जाता है कि साहित्य व शांति के नोबेल पुरस्कार पश्चिमी विचारधारा के प्रचार व पुष्टि के लिए दिये जाते रहे हैं। बीच-बीच में आने वाले अपवादों को छोड़ दें तो यह बहुत कुछ सच भी प्रतीत होता है। इस बार के पुरस्कारों पर ही ध्यान दें, तो यह बात बहुत मुखर है कि पुरस्कार के लिए पात्रों का चयन पश्चिमी लोकतंत्र, स्वतंत्रता तथा मानवाधिकार के मूल्यों के समर्थन में दिये गये हैं। लोसा पहले भले ही मार्क्सवादी रहे हों, लेकिन इस समय वह लोकतंत्र, खुले बाजारवाद तथा अंतर्राष्ट्रीयतावाद के समर्थक हैं। शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चीन के उस विद्रोही नेता को चुना गया है, जो चीनी अधिनायकवादी एकदलीय शासन के विरोध में विद्रोह का झंडा उठाए हुए हैं। मानवाधिकार, स्वतंत्रता, लोकतंत्र आदि निश्चय ही मनुष्यता के उच्चतम मूल्य हैं, जिनकी रक्षा तथा प्रसार का यत्न हर स्तर पर किया जाना चाहिए, लेकिन कई पश्चिमी देश इनका इस्तेमाल राजनीतिक अस्त्र के रूप में भी करते हैैं। चीनी शासन इसीलिए बौखलाया हुआ है, क्योंकि 54 वर्षीय लियू जियाबो को शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित करने के निर्णय को वह अनेक देश की राजनीतिक व्यवस्था में हस्तक्षेप मानता है।
लियू जियाबो को शांति का नोबेल पुरस्कार दिये जाने पर चीन का सवाल है कि एक विद्रोही को शांति का पुरस्कार दिये जाने का क्या औचित्य है, इसका जवाब नोबेल चयन समिति ने जियाबो के प्रशस्ति पत्र में पहले से शामिल कर रखा है। उसका कहना है कि मानवाधिकार व शांति का बहुत ही गहरा संबंध है। नार्वेजियन नोबेल कमेटी का यह अत्यंत दीर्घकालिक विश्वास है कि मानवाधिकारों की रक्षा से ही विश्व शांति सुनिश्चित की जा सकती है। इन पुरस्कारों के संस्थापक अल्फेर्ड नोबेल का भी यह विश्वास था कि राष्ट्रों के बीच भ्रातृत्व की यह पूर्व र्श्त है कि वे मानवाधिकारों का समान तथा उनकी सुरक्षा करें। यह सही भी है कि जहां मानवाधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे, वहां स्थाई शांति कभी कायम नहीं हो सकती। इस तरह का सवाल पिछले वर्ष उस समय भी उठा था, जब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को नोबेल के शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। कहा गया थ कि जो देश अभी भी दो देशों- इराक और अफगानिस्तान- में हिंसक युद्ध चला रहा है, उसके राष्ट्रपति को शांति का पुरस्कार कैसे दिया जा सकता है। उस समय भी यही तर्क दिया गया था कि बराक ओबामा इराक में शांति स्थापित करने के लिए वहां से अमेरिकी सेना की वापसी कर रहे हैं और अफगानिस्तान में चल रहे आतंकवाद के खिलाफ युद्ध वस्तुतः शांति के लिए लड़ा जा रहा युद्ध ही है।
लियू जियाबो थियानमेन चौक के उस छात्र विद्रोह में भी शामिल थे, जिसे चीनी शासन ने निर्दयता से रौंद दिया था। वह तबसे कई बार जेल में रहे, लेकिन उन्होंने अपना मानवाधिकारवादी आंदोलन छोड़ना स्वीकार नहीं किया। 2008 में उन्होंने लोकतंत्रवादी शक्तियों के लिए एक -नागरिक घोषणा पत्र- का निर्माण किया। 'नागरिक घोषणा पत्र-2008' शीर्षक के इस दस्तावेज के प्रकाशन के बाद दिसंबर 2008 में लियू को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया। उनके खिलाफ चीनी कानूनों के उल्लंघन का क्या-क्या आरोप लगाया गया, इसकी कोई खुली जानकारी दुनिया को नहीं है, लेकिन यह पता है कि तथाकथित न्यायालय ने उन्हें यह घोषणा पत्र तैयार करने के लिए 11 वर्ष के कैद की सजा सुना दी।
अभी ताजा खबर है कि चीनी पुलिस ने बीजिंग में रह रही उनकी पत्नी लियू जिया को भ्ी उनके घर से हटा दिया है। उनके पति को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, यह खबर जब उन्हें दी गयी, तो उन्होंने फोन पर बताया कि चीनी पुलिस उनके घर के चारों तरफ लगी हुई है। हो सकता है उन्हें भी उनके पति के पास भेजने की तैयारी हो। वैसे अभी तो ठीक-ठीक यह भी नहीं कहा जा सकता कि जियाबो को यह जानकारी भी है या नहीं कि उनके नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
खैर, जो भी हो, इस बार इन दोनों ही पुरस्कारों के चयन के लिए नोबेल चयन समिति की सराहना की जानी चाहिए। इसमें पश्चिम की राजनीति भी हो तो कोई हर्ज नहीं। स्वतंत्रता, लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपनी कलम चलाने या अपना जीवन दांव पर लगाने वालों का सम्मान होना चाहिए। चीन आज आर्थिक व सैनिक विकास के क्षेत्र में कितना भी आगे क्यों न बढ़ गया हो, लेकिन मानवीय स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र का तो उसने गला ही घोंट रखा है। एकदलीय अधिनायकवाद आज भले ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति हो, लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है, जो आज नहीं तो कल उसे पतन की ओर अवश्य ले जाएगी।
 
10-10-2010

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

अयोध्या-3



अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का न्यायिक फैसला गत 30 सितंबर को आ गया। निश्चय ही यह प्रसन्नता की बात है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की त्रिसदस्यीय न्यायपीठ ने एक स्वर से विवादित स्थल को राम जन्मभूमि माना है और उस पर अधिकार जताने वाले सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया है। लेकिन तीन में से दो न्यायाधीशों ने शायद सभी पक्षों को संतुष्ट करने के लिहाज से विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटकर एक हिस्सा रामलला को, एक निर्र्मोही अखाड़े को और एक सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने के लिए कहा है। जमीन का यह फैसला नितांत अनौचित्यपूर्ण है। कम से कम सुन्नी वक्फ बोर्ड का तो उस जमीन में किसी तरह कोई हक नहीं बनता। निर्मोही अखाड़ा और रामलला का दावा भी अलग करने का कोई औचित्य नहीं है। इसे निश्चय ही सुधारने की जरूरत है। या तो संबंधित पार्टियां स्वयं यह कार्य कर लें या सर्वोच्च न्यायालय की मदद हासिल करें।






अयोध्या विवाद का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया है। फैसले के बाद हिंसा व अशांति की जो आशंका थी, वह भी टल गयी है। प्रायः पूरे देश ने इस अत्यंत संवेदनशील मसले पर असाधारण संयम का परिचय दिया। कुछ छोटे क्षेत्रीय दलों को छोड़कर प्रायः सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने फैसले का स्वागत किया है। यदि कोई सर्वाधिक दुःखी है, तो वे हैं कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी लेखक, पत्रकार व इतिहासकार, क्योंकि न्यायालय का फैसला उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है। उनसे यह बात नहीं निगली जा रही है कि कैसे हाईकोर्ट के तीनों जजों ने एकमत से उस स्थल को राम का जन्मस्थल मान लिया, जहां पर तथाकथित बाबरी मस्जिद खड़ी थी। उन्होंने सारे ऐतिहासिक तथ्यों तथा कानूनी नुक्तों की अनदेखी करके इस तरह का फैसला दे दिया। वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर कह रही हैं कि न्यायालय का फैसला न्यायिक नहीं, राजनीतिक है। न्यायाधीशों ने इतिहास की अनदेखी की है और आस्था का भरोसा किया है। ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ के पूर्व संपादक व जाने माने स्तम्भ लेखक दिलीप पदगांवकर भी इस फैसले से थापर की तरह क्षुब्ध हैं। उनका भी कहना है कि न्यायाधीशों ने तथ्यों की और कानून के प्रावधानों की उपेक्षा की है। इस समुदाय के विद्वानों की नाराजगी सर्वाधिक इस बात को लेकर है कि उन्होंने राम को एक व्यक्ति मान लिया है और उनका जन्मस्थल स्वीकार कर लिया है और उनके नाम जमीन का बंटवारा भी कर दिया है।

राजनीतिक दलों में समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने तो मुस्लिम पक्षकारों से भी आगे बढ़कर अपना शोक व्यक्त किया है। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर अपनी गहरी नाखुशी जाहिर करते हुए कहा है कि इससे देश का मुस्लिम समुदाय सर्वाधिक मायूस है और अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उन्होंने तो पूरे देश व न्यायपालिका को चेतावनी देते हुए कह डाला कि यह फैसला देा के लिए संविधान के लिए और स्वयं न्यायपालिका के लिए अच्छा संकेत नहीं है और आगे चलकर इस निर्णय से काफी गहरे संकट पैदा हो सकते हैं। बिहार के राष्ट्र्ीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव ने व लोकजनशक्ति पार्टी के राम विलास पासवान ने भी मुलायम सिंह के स्वर में स्वर मिलाने की कोशिश की है।

देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने पहले तो इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन अब इनमें से कांग्रेस अपने को काफी असहज महसूस कर रही है। ऐसी अफवाह चल पड़ी है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला कांग्रेस के प्रयासों से ही आ सका है। यदि केंद्र सरकार यानी कांग्रेस पार्टी की तरफ से हरी झंडी न मिलती, तो इस तहर का फैसला नहीं आ सकता था। इस तर्क को प्रस्तुत करने वालों का कहना है कि अयोध्या में विवादित मस्जिद के सामने राम मंदिर का शिलान्यास कराने का काम कांग्रेस ने किया, मस्जिद में लगा ताला खुलवाने का काम कांग्रेस ने किया। दिसंबर 1992 में यदि केंद्र में स्थित पी.वी. नरसिंह राव वाली कांग्रेस सरकार की मदद न मिलती, तो बाबरी मस्जिद कतई नहीं गिरायी जा सकती थी। और अब मंदिर के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला आया है, तो इसके पीछे भी कांग्रेस का हाथ है।

इस तरह की चर्चा से कांग्रेस जन चिंतित हैं। उन्हें बिहार में इससे नुकसान होने की उम्मीद दिखायी दे रही है। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान इसलिए मुस्लिम पक्ष में सर्वाधिक शोकाकुल चेहरा प्रदर्शित कर रहे हैं, जिससे कांग्रेस की तरफ मुड़ते मुस्लिम वोट बैंक को फिर अपनी ओर आकर्षित किया जा सके। कांग्रेस के नीतिकार अब मंदिर मस्जिद मामले में अपने को भाजपा से अलग दिखाने की रणनीति बनाने में लगे हैं। गृहमंत्री पी. चिदंबरम कह रहे हैं कि गत बृहस्पतिवार के उच्च न्यायालय के फैसले से 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद ढहाये जाने का अपराध हल्का नहीं हो जाता। दोनों मामले अलग हैं। मस्जिद को गिराने का काम एक गंभीर अपराध है, जिसकी अलग से सुनवाई हो रही है, जिसमें वह चाहते हैं कि अपराधियों को कठोर सजा मिले। उस मामले को इस फैसले से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। विवादित मंस्जिद मंदिर तोड़कर बनी थी या मंदिर के मलबे पर बनवायी गयी थी, इससे उसे तोड़ने का अपराध हल्का नहीं हो जाता।

कांग्रेस की दिक्कत यह है कि न तो वह इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का विरोध कर सकती है ओर न वह उसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जा सकती है, क्योंकि वह इस मामले में केाई पार्टी नहीं थी और फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अधिकार उसी को है, जो मामले में किसी भी तरह पार्टी हो। इसलिए अब वह फिर अदालत के बाहर किसी समझौते की संभावना तलाश रही है। अदालत के बाहर कोई समझौता हो जाए, इसके लिए तो सभी उत्सुक हैं, लेकिन यह समझौता सभी केवल अपने पक्ष में चाहते हैं। कांग्रेस चाहती है कि कोई ऐसा रास्ता निकल आए, जिससे हिन्दू व मुसलमानों में से कोई नाराज न हो। हिन्दू पक्ष तथा भाजपा के लोग चाहते हैं कि मुस्लिम समुदाय अयोध्या विवाद में अपने अधिकारों का दावा छोड़ दे और मंदिर बनाने में मदद करे। मुस्लिम पक्ष चाहते हैं कि बाबरी मस्जिद स्थल उन्हें मिल जाए, बाकी सारी जमीन जो चाहे ले जाए। जाहिर है कि किसी भी समझौते में ये सारी बातें एक साथ नहीं हो सकतीं। तो मामला सर्वोच्च न्यायालय में अवश्य जाएगा। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय इस पूरे मामले को उलट दे, इसकी संभवना लगभग शून्य है। वह जमीन के बंटवारे के बारे में अपनी कोई अलग राय दे सकता है। लेकिन उससे मुस्लिम पक्ष संतुष्ट हो जाए, यह नहीं हो सकता है। वास्तव में हर पक्ष को संतुष्ट करने का जो फार्मूला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनाया है, उससे बेहतर शायद ही कोई दूसरा फार्मूला निकल सके, लेकिन जो भी पक्ष इतिहास को पूरी तरह नकारने पर आमादा है, वह इससे संतुष्ट नहीं हो सकता।

इसमें दो राय नहीं कि इलाहाबाद कोर्ट की लखनउ बेंच का यह फैसला न्यायिक कम राजनीतिक अधिक है। यदि इसमें राजनीतिक तुष्टीकरण का तत्व भी न समाया होता, तो जमीन के तीन टुकड़े करके तीन पक्षों को देने का फैसला कतई सामने नहीं आता। विवाद का मूल कुछ व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि दो समुदायों के बीच था, जिसमें से कोई एक गलत था। अब न्याय का असली तकाजा तो यही था कि जिस पक्ष का दावा भी न्यायसंगत ठहरता, उसके पक्ष में फैसला दे दिया जाता। लेकिन इस ‘टाइटिल सूट’ में तीन व्यक्तियों या संस्थाओं के पक्ष में फैसला देकर तीनों को जमीन का एक-एक टुकड़ा देने की बात की गयी है।

यह शायद भारतीय न्यायिक इतिहास का पहला अवसर है, जब सुनवाई कर रही पीठ के तीनों न्यायाधीशों ने अपना फैसला अलग-अलग पढ़ा। तीनों जजों द्वारा दिया गया कुल फैसला 8189 पृष्ठों का है। इसमें सबसे बड़ा 5238 पृष्ठ का फैसला न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल का है। दूसरे न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा ने अपना फैसला 2666 पृष्ठों में दिया है। सबसे छोटा फैसला न्यायमूर्ति सिबगत उल्ला खान का है, जो 285 पृष्ठों का है। तीनों ने अपने-अपने फैसले का सारांश पढ़कर सुनाया।

इनमें से दो टूक और स्पष्ट फैसला धर्मवीर शर्मा का था। उन्होंने पुरातात्विक तत्व तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर माना कि विवादित स्थल पर पहले मंदिर था, जिसे तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया गया। मस्जिद का यह निर्माण भी इस्लामी नियमों के विरुद्ध किया गया। इसलिए यह निर्माण भी अवैध था। उन्होंने स्पष्ट रूप से इस स्थल को भगवान राम के जन्मस्थल या उस पर बने मंदिर का स्थल माना, इसलिए पूरी विवादित जमीन को हिन्दुओं के पक्ष में देने का फैसला दिया। उन्होंने सुन्नी वक्फ बोर्ड तथा निर्मोही अखाड़े के किसी दावे को स्वीकार नहीं किया।

न्यायमूर्ति अग्रवाल ने अपने फैसले में यह तो माना कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को गिराकर हुआ, लेकिन उनकी नजर में इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मस्दिज बाबर के समय में या उसके आदेश से बनी। उन्होंने मूल स्थान को राम का जन्मस्थान माना, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि मुस्लिम भी इस स्थल का प्रार्थना के लिए उपयोग करते थे, इसलिए उन्हें भी यहां कुछ अधिकार मिलना चाहिए। न्यायमूर्ति अग्रवाल ने भी पुरातात्विक प्रमाणों को काफी महत्वपूर्ण माना हेै।

न्यायमूर्ति सिबगत उल्ला खान अपने संक्षिप्त फैसले में न्यायाधीश कम इस्लाम के प्रवक्ता के रूप में अधिक नजर आए। वह इस पुरातात्विक प्रमाण को तो नकार नहीं सके कि मस्जिद के ढांचे के नीचे एक मंदिर का अवशेष मौजूद था, लेकिन उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि इस मस्जिद का निर्माण मंदिर को गिराकर नहीं लेकिन उसके मलबे के उपर किया गया। तीनों न्यायाधीशों के फैसले में इस एक बात पर पूर्ण सहमति थी कि मस्जिद के मध्यवर्ती गुम्बद के स्थान पर जहां इस समय रामलला की मूर्ति विराजमान है, वहां पर पहले मंदिर था और हिन्दुओं का लोकविश्वास उस स्थल को राम जन्मभूमि मानता है, इसलिए वह स्थान रामलला के लिए निश्चित कर दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर यह फैसला दिया गया कि रामलला की मूर्ति जहां स्थापित है, वहां बनी रहेगी। उसे हटाया नहीं जाएगा और भूमि का वह हिस्सा रामलला को दिया जाएगा। यहां यह बात अवश्य उल्लेखनीय है कि तीनों ही न्यायाधीशों ने राम जन्म स्थल के रूप में उस भूमि की पहचान के लिए जन विश्वास को ही सर्वोपरि स्थान दिया, जबकि फैसला विश्वास की बात को बिना बीच में लाए भी मात्र पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर किया जा सकता था।

इन तीनों जजों की टिप्पणियों में सर्वाधिक रोचक टिप्पणियां खान की हैं। उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए किसी प्रचारक की शैली में कहा कि इस राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद फैसले ने भारतीय मुसलमानों को इस्लाम की शिक्षाओं को पूरी दुनिया में प्रसारित करने का एक सर्वोत्तम अवसर दिया है। मुस्लिम इस धरती के शासक रहे हैं, शासित रहे हैं और इस समय सत्ता में भागीदारी रखते हैं। भारतीय मुस्लिम यहां बहुमत में नहीं है, लेकिन वे इतने कम भी नहीं है कि उपेक्षणीय अल्पसंख्यक गिने जाएं। अन्य देशों में मुसलमान या तो भारी बहुमत में हैं, जिससे ऐसी समस्याओं से न पर कोई फर्क नहीं पड़ता या वे इतनी कम संख्या में हैं कि वे कुछ कर नहीं सकते। दुनिया की नजर इसय मुसलमानों पर हैं और वे इस्लाम की शिक्षाओं को मुसलमानों के आचरण के नजरिये से देखना व समझना चाहते हैं यानि मुसलमान दूसरे समुदायों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं, इससे वे इस्लाम के चरित्र को जानना चाहते हैं। भारतीय मुसलमानों के पास धार्मिक शिक्षा व ज्ञान की सुदीर्घ परंपरा है, इसलिए वे दुनिया को इसकी वास्तविक स्थिति बताने की सर्वोत्तम अवस्था में हैं। वे इसकी भूमिका सामने उपस्थित इस मसले से शुरू कर सकते हैं। यह तो उनका मुसलमानों को उपदेश था, लेकिन साथ ही उनकी पूरे देश के लिए यह चेतावनी भी थी कि ऐसा कुछ -6 दिसंबर जैसी घटना- दुबारा नहीं होना चाहिए। हम सबको यह समझ लेना चाहिए कि ऐसा कुछ यदि दुबारा हुआ, तो देश फिर उससे उबर नहीं पाएगा। 1992 के मुकाबले आज दुनिया की गति कहीं अधिक तीव्र है। हम उसमें कुचल जाएंगे -वी मे बी क्रश्ड-। न्यायमूर्ति खान का स्पष्ट कहना था कि उन्होंने इस मसले के इतिहास और पुरातत्व की गहरायी में जाने की कोशिश नहीं की। इसके उन्होंने चार कारण बताए। एक तो यह कि इस ‘सूट’ पर फैसले के लिए इसके भीतर जाने की जरूरत ही नहीं थी। दूसरे मुझे यह भरोसा नहीं था कि यदि इसके भीतर प्रवेश की कठिन प्रक्र्रिया से गुजरें भी तों हमें कोई खजाना मिलेगा या किसी शैतान से भेंट होगी -मतलब सच्चाई हाथ लगेगी या और भ्रम से सामाना होगा-। तीसरे मैं इतिहास का ज्ञानी होने का दावा नहीं कर सकता, इसलिए मैं नहीं चाहता था कि इतिहास की मैं कोई ऐसी बात करूं कि विद्वान इतिहासज्ञों की आलोचना का सामना करना पड़े। और चैथी बात के रूप में उन्होंने ‘कर्नाटक वक्फ बोर्ड बनाम भारत सरकार’ मामले में की गयी टिप्पणी को उद्धृत किया कि ‘जहां तक दीवानी मामले में किसी ‘सिविल सूट’ का वास्ता है, तो उसमें ऐतिहासिक तथ्योंे तथा दावों के लिए कोई स्थान नहीं है।’

न्यायमूर्ति खान ने इकबाल की इन पंक्तियों को भी उद्धृत किया कि ‘वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है, तेरी बरबादियों के मशवरे हैं आसमानों में, न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों, तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में’ उन्होंने इस धर्मिक मामले में भी डार्विन को उद्धृत किया कि वही जातियां जीवित रह पाती हैं, जो त्वरित प्रतिक्रिया सक्षम होती हैं और सहयोग करती हैं।

यद्यपि उन्होंने मुसलमानों को अच्छी नसीहत दी, लेकिन इतिहास पुरातत्व में प्रवेश न करने का बहाना उन्होंने केवल इसलिए ढूंढ़ा कि उन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की उत्खनन रिपोर्टों के प्रमाणों को न स्वीकार करना पड़े, जबकि मंदिर-मस्जिद के इस विवाद में फैसले का मुख्य आधार ही वह पुरातात्विक प्रमाण था। जब विवाद का मूल मुद्दा ही यही हो कि मस्जिद का निर्माण कैसे हुआ। क्या वह किसी मंदिर को तोड़कर बनायी गयी या किसी खाली जगह पर धार्मिक भावना से तैयार की गयी। ऐसे में पुरातात्विक उत्खनन व इतिहास की किताबों की उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। अब यदि उन्हें इतिहास व पुरातत्व का कोई बोध नहीं था, तो उन्होंने किस आधार पर यह कहा कि मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर नहीं किया गया, बल्कि मंदिर के मलबे पर उसे बनवाया गया। इसके बारे में उन्होंने अपने फैसले में कुछ नहीं लिखा कि उन्हें कैसे पता चला कि मस्जिद बनवाने वाले ने ही मंदिर का ध्वंस नहीं किया था।

खैर, यह तो रही फैसलों की बात। तीन में से दो जजों ने माना कि प्राचीन राममंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद का निर्माण किया गया। इस संदर्भ में केवल खान की राय अलग है। लेकिन तीनों ही जज इस मामले में एकमत हैं कि मस्जिद के मध्य गुम्बद का स्थल ही राम का जन्मस्थल है, जिसे राम के हवाले कर दिया जाना चाहिए। शर्मा को छोड़कर बाकी दो जजों ने ही विवादग्रस्त भूमि को तीन हिस्सों में बांटने की बात की है। एक हिस्सा रामलला को, दूसरा निर्मोही अखाड़ा को और तीसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड को। इन दोनों जजों के ये दो फैसले शायद सभी पक्षों को किसी तरह संतुष्ट करने के उद्देश्य से दिये गये हैं। क्योंकि जब सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा 1 के मुकाबले 2 के बहुमत से खारिज कर दिया गया, तो उसे विवादित जमीन में कोई हिस्सा पाने का हक कहां रह जाता है। इसी तरह निर्मोही अखाड़ा को अलग से कोई जमीन आवंटित करने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि भले ही वह विवादित स्थल पर स्थित राम चबूतरे पर रामलला की सैकड़ों वर्ष से सेवा करता रहा हो, लेकिन वह कार्य व्यापक हिन्दू समुदाय के स्थानीय प्रतिनिधि के रूप में ही कर रहा था। उसके इस सेवाकार्य के पीछे पूरा हिन्दु समुदाय खड़ा था। जमीन का एक हिस्सा राम को, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को यह एक हास्यास्पद निर्णय कहा जाएगा। इसलिए सच कहें तो केवल न्यायमूर्ति शर्मा का निर्णय समग्रता से ग्राह्य और न्यायपूर्ण हैै।

अब एक सवाल यह कि न्यायालय ने उस भगवान राम को एक व्यक्ति मान लिया और उनका जन्मस्थल भी स्वीकार कर लिया, जो घट-घट व्यापी हैं, निराकार हैं व परमात्मा हैं। अब इस तरह का सवाल उठाने वालों को क्या कहा जाए, जो अपने को ज्ञानी और आधुनिक चेतना का संवाहक भी मानते हैं। राम इस देश के इतिहास पुरुष हैं या परमात्मा हैं, यह अलग चर्चा का विषय है, लेकिन यह एक सर्वस्वीकार्य तथ्य है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर राम का एक प्रतीक स्थल था। उसके प्रति अगाध श्रद्धा ने ही बाबर या उसके सिपहसालार को उसे तोड़ने और उस जगह मस्जिद बनवाने के लिए प्रेरित किया।

इसके अलावा यदि उच्च न्यायालय के इन तीन न्यायाधीशों ने राम को एक व्यक्ति माना, तो यह उनका नहीं इस देश में स्थापित उस कानून का दोष है, जो किसी मंदिर में स्थापित प्रतिमा को एक व्यक्ति होने का अधिकार देती है और उसे तमाम संपत्तियों का मालिक भी घोषित करती है, कम से कम पदगांवकर जैसे व्यक्ति को तो यह तथ्य पता होना ही चाहिए। अदालत में एक मुकदमा रामलला की तरफ से देवकीनंदन अग्रवाल ने दायर किया था और अपने को उनका मित्र बताया था। यदि राम की प्रतिमा को कानूनी व्यक्तित्व का अधिकार न प्राप्त होता, तो वह मुकदमा ही स्वीकृत न होता। निश्चय ही यह नितांत हास्यास्पद कानून है, जो मंदिर में स्थापित प्रतिमा को एक नागरिक के अधिकार प्रदान करती है, लेकिन जब तक वह कानून है, तब तक उसके अंतर्गत फैसले होंगे ही।

बेहतर तो यह होता कि न्यायालय केवल यह फैसला करता कि विवादित स्थल का वैध मालिक कौन है मंदिर समर्थक हिन्दू या मस्जिद समर्थक मुस्लिम। उसके बाद सरकार को कहता कि वह पूरी जमीन को अपने अधिकार में लेकर फिर संबंधित समुदाय के उचित प्रतिनिधि व्यक्ति या संस्था को उसे सौंप दे। वहां मंदिर का निर्माण हो या कुछ और यह निर्णय वह प्रतिनिधि संस्था करे।

खैर, अब जो हो चुका है, वह हो चुका है, लेकिन विवादित जमीन के बंटवारे का मसला अभी भी अटका है। जमीन का यह बंटवारा नितांत अनौचित्यपूर्ण है। रामजन्मभूमि जैसे स्थल पर मंदिर निर्माण के लिए विशाल भूमिखंड चाहिए। अब इस विवाद के निपटाने के दो ही रास्ते हैं कि या तो निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्ष दोनों ही अपने हिस्से का त्याग करें और उसे रामलला को सौंप दें। या फिर इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाए। अभी तक कि खबरों के अनुसार सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा दोनों सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी में हैं, लेकिन यदि न्यायमूर्ति सिबगत उल्ला खान के उपदेशों की भावना को सभी पक्ष स्वीकार करें, तो इन दोनों ही पक्षों को जमीन का अपना अंश रामलला को सौंपकर केंद्र सरकार से आग्रह करना चाहिए कि वह वहां भव्य राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में आगे की कार्रवाई करे। (3-10-2010)

अयोध्या-2

यह भारत क़ि अस्मिता का प्रश्न है 


राम जन्मभूमि का विवाद न तो जमीन के टुकड़े का विवाद है न एक मंदिर नाम के किसी बिल्डिंग के निर्माण का। यह भारत की संपूर्ण सांस्कृतिक आस्था के सीने पर खाई हुई ऐतिहासिक चोट का विवाद है। एक ऐसी चोट, जिसका घाव अब तक भरा नहीं है और रिस रहा है। एक ऐसी चोट जिसे सबसे पहले पहुंचाने वाला व्यक्ति भले ही सैकड़ों वर्ष पहले के इतिहास में दफन हो चुका हो, किंतु जिसकी वह मानसिकता आज भी देश की सांस्कृतिक अस्मिता को मंुह चिढ़ाती हुई अपनी पूरी ताकत के साथ विद्यमान है। यह अक्सर कहा जाता है कि चार-पांच सौ साल पुराने मंदिर-मस्जिद के मसले को आज उठाने की क्या जरूरत है। उसे भूल जाना चाहिए। बात सही है। इसे भूला जा सकता था, लेकिन यदि वह मानसिकता जिसने करीब पांच सौ वर्ष पूर्व एक मंदिर को तोड़कर उस पर मस्जिद तामीर करायी थी, वही एक सामाजिक और राजनीतिक चुनौती के रूप में आज भी जीवित हो तो क्या किया जाए।


     कहा जाता है कि टाइटिल सूट या किसी संपत्ति पर मालिकाना हक के विवाद में अधिक समय लग ही जाता है, लेकिन अयोध्या का विवाद किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच के किसी जमीन-जायदाद के हक का मामला नहीं है। तकनीकी तौर पर या कानून की धाराओं के अनुसार यह भले जमीन के एक टुकड़े का विवाद हो कि उसका वास्तविक मालिक कौन है, लेकिन यथार्थ में यह वैसा नहीं है। जमीन-जायदाद के झगड़े में उस जमीन का बंटवारा किया जा सकात है या उससे दोनों पक्षों को बेदखल करके उसे सरकार के हवाले किया जा सकता है, इत्यादि।

इस विवाद को उसके सही परिप्रेक्ष्य में ठीक से न समझने वाले लोग आये दिन तरह-तरह की सलाहें देते रहते हैं। अरे एक जमीन के टुकड़े के लिए इतनी बड़ी लड़ाई क्यों। अपने परिवार की कलाह टालने के लिए भगवान राम ने तो पूरा अयोध्या का राज्य त्याग दिया था, फिर एक पूरे देश को धार्मिक कलक से मुक्त करने के लिए हिन्दू उस राम जन्मभूमि के छोटे से टुकड़े का परित्याग क्यों नहीं कर सकते। इसके जवाब में तर्क आता है कि ऐसी सलाह आखिर मुस्लिम पक्ष को क्यों नहीं दी जाती। कुछ लोग सलाह देते हैं कि हिन्दुओं को मंदिर ही बनवाना है, तो वहां से कुछ दूर हटकर क्यों नहीं बनवा लेते। जो जमीन विवादग्रस्त है, उसे यों ही खाली छोड़ दें, बगल में मंदिर बनवा लें। कुछ लोग इससे भी आगे जाकर तर्क देते हैं कि आखिर इसका क्या प्रमाण है कि भगवान राम वहीं पैदा हुए थे और राम की असली जन्मभूमि वही है, जहां पर तथाकथित बाबरी मस्जिद खड़ी थी। कुछ और बुद्धिमानों का कहना है कि मस्जिद की जगह पर पहले मंदिर होने की कहानी अंग्रजों के शासनकाल में गढ़ी गयी। उसके पहले मंदिर मस्जिद का कहीं कोई विवाद था ही नहीं। राम भक्त संत तुलसीदास ने अयोध्या में बैठकर अपनी रामायण -रामचरित मानस- लिखी, लेकिन उन्होंने बाबर द्वारा मंदिर तुड़वाकर मस्जिद बनवाने का कोई जिक्र नहीं किया। यदि अयोध्या में ऐसा पहले कुछ हुआ होता, तो तुलसी उसका अवश्य जिक्र करते। अब यदि तुलसी के साहित्य में बाबर द्वारा मंदिर तोड़वाकर मस्जिद बनाने का कोई जिक्र नहीं है, तो इसका मतलब है कि अयोध्या में किसी राम जन्मभूमि मंदिर होने और उसे तोड़कर मस्जिद बनवाने की सारी कहानी झूठी है।

अब ऐसे विद्वानों को भला कोई क्या जवाब दे सकता है, जो केवल अपने बुद्धिबल से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर लोगों को गुमराह करना चाहते हैं या अपना राजनीतिक पक्ष मजबूत करना चाहते हैं। राम जन्मभूमि का विवाद न तो जमीन के टुकड़े का विवाद है न एक मंदिर नाम के किसी बिल्डिंग के निर्माण का। यह भारत की संपूर्ण सांस्कृतिक आस्था के सीने पर खाई हुई ऐतिहासिक चोट का विवाद है। एक ऐसी चोट, जिसका घाव अब तक भरा नहीं है और रिस रहा है। एक ऐसी चोट जिसे सबसे पहले पहुंचाने वाला व्यक्ति भले ही सैकड़ों वर्ष पहले के इतिहास में दफन हो चुका हो, किंतु जिसकी वह मानसिकता आज भी देश की सांस्कृतिक अस्मिता को मंुह चिढ़ाती हुई अपनी पूरी ताकत के साथ विद्यमान है। यह अक्सर कहा जाता है कि चार-पांच सौ साल पुराने मंदिर-मस्जिद के मसले को आज उठाने की क्या जरूरत है। उसे भूल जाना चाहिए। बात सही है। इसे भूला जा सकता था, लेकिन यदि वह मानसिकता जिसने करीब पांच सौ वर्ष पूर्व एक मंदिर को तोड़कर उस पर मस्जिद तामीर करायी थी, वही एक सामाजिक और राजनीतिक चुनौती के रूप में आज भी जीवित हो तो क्या किया जाए। उसी मानसिकता ने देश का विभाजन कराया, जिसने अयोध्या, मथुरा व काशी स्थित भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों को रौंद कर इस देश की अस्मिता को कुचला था। और आज भी वह एक चुनौती के रूप में देश में विद्यमान है, तो भला इस देश की हजारों साल की सांस्कृतिक परंपरा से अपने को जोड़ने वाला हिन्दू कैसे उस अपमान को भूल सकता है। अदालत फैसला करे या न करे, लेकिन सांस्कृतिक अस्मिता का यह संघर्ष तो तब तक जारी रहेगा, जब तक कि कम से कम उसे कुचलने वाला पांव तो वहां से हट नहीं जाता। 6 दिसंबर को अयोध्या स्थित तथाकथित बाबरी ढांचे का ध्वंस कोई बदले की कार्रवाई नहीं थी। वह तो भारतीय संस्कृति पुरुष के सीने में गड़ी एक विदेशी आक्रांता की बर्छी को केवल निकाल फेंकने का काम था।

जो लोग यह सवाल उठाते हैं कि इसका क्या प्रमाण है कि भगवान राम वहीं पैदा हुए थे, लेकिन वे तो यह भी सवाल उठाते हैं कि इसका क्या प्रमाण है कि राम कभी पैदा भी हुए थे, या इसका ही क्या प्रमाण है कि यह वही अयोध्या है, जहां राम पैदा हुए थे। वास्तव में ये सवाल व्यर्थ के हैं। मुद्दा यह नहीं है कि राम पैदा हुए या नहीं हुए अथवा कहां पैदा हुए या कब पैदा हुए। सवाल केवल यह है कि अयोध्या में एक राम का (विष्णु हरि का या शारंगिन विष्णु का, क्योंकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है या विष्णु का वह रूप बताया जाता है, जो धनुषधारी था) मंदिर था, जिसे बाबर के समय में स्वयं उसके द्वारा या उसके आदेश पर किसी और के द्वारा तोड़ा गया और वहां मस्जिद का निर्माण कराया गया। इसे प्रमाणित करने के लिए न साहित्यिक साक्ष्यों की कमी है, न पुरातात्विक। स्वयं मुस्लिम लेखकों की अनेक किताबों में इसका गर्वपूर्वक जिक्र किया गया है कि बाबर ने अयोध्या स्थित राम मंदिर को तोड़कर वहां एक मस्जिद बनवायी। पुरातात्विक उत्खननों से भी यह प्रमाणित हो चुका है कि विवादित मस्जिद के ढांचे के नीचे एक और भवन के फर्श का अस्तित्व विद्यमान है, जिस पर कभी मंदिर रहा होगा।

कुछ लोग (जिनमें कुछ मुस्लिम विद्वान व कुछ वामपंथी इतिहासकार भी शामिल हैं) कहते हैं कि बाबर तो कभी अयोध्या आया ही नहीं, फिर वह कोई मंदिर तोड़कर मस्जिद कैसे बनवाने लगा। तो यह बात मुस्लिम पक्ष को समझायी जानी चाहिए, जो इसे बाबर की बनवायी मस्जिद बताकर उसे एक विशेष ऐतिहासिक महत्व प्रदान करता है। हिन्दू का पक्ष तो केवल इतना है कि उसके मंदिर को तोड़कर उसे सांस्कृतिक रूप से पददलित करने के लिए उसी स्थान पर मस्जिद बनवायी गयी। उसे तो वह स्थान वापस चाहिए। उसके लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उसे किसने तोड़वाया और फिर उस पर मस्जिद किसने बनवायी। लेकिन सारी परंपराएं, सारी किंवदंतियां, सारे साहित्य इसका श्रेय बाबर को देते हैं, तो उस पर और आगे बहस की कोई जरूरत नहीं रह जाती। हां, इसके बाद यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि बाबर ने अयोध्या में ही मस्जिद क्यों बनवायी। अयोध्या उसके लिए इतनी महत्पूर्ण जगह क्यों हो गयी। बाबर का भारत में कार्यकाल केवल चार वर्षों का था। उसने दिल्ली विजय करके लोदी वंश का अंत किया था और अपना शासन स्थापित किया था। तो उसे यदि अपनी आस्थावश किसी मस्जिद का निर्माण करना होता, तो वह दिल्ली में कहीं यह निर्माण कार्य करवाता। अयोध्या में राम पैदा हुए रहे हो या न हुए रहे हों, लेकिन अयोध्या की पहचान राम से जुड़ी थी। स्कंदगुप्त विक्रमादित्य ने इस उजड़ी अयोध्या का उद्धार कराया था। फिर यहां आकर मस्जिद बनवाने का अर्थ क्या था? उसके आदेश से यदि उसके सेनापति मीर बांकी ने ही यहां एक अनगढ़ सी मस्जिद खड़ी की तो उसका उद्देश्य क्या था। फिर क्यों उस मस्जिद के ढांचे में टूटे मंदिर के स्तंभों को यत्र-तत्र और मुख्य द्वार पर लगाया गया। इस सब पर आखिर सेकुलर इतिहासकार और राजनेता कोई विचार क्यों नहीं करते। फिर इस संदर्भ में संत तुलसी को घसीटना और हास्यास्पद लगता है। तुलसी किसी हिन्दू संगठन के नेता नहीं थे और न वह समकालीन अयोध्या का कोई इतिहास लिख रहे थे। और यदि अयोध्या के संदर्भ में उनकी पीड़ का अनुमान लगाना चाहते हो, तो वे लोग यह क्यों नहीं देखते कि तुलसी अपनी समकालीन काशी और चित्रकूट का वर्णन तो करते हैं, लेकिन समकालीन अयोध्या के बारे में कहीं एक शब्द नहीं लिखते। कोई यह सवाल क्यों नहीं उठाता कि राम का परम भक्त और सरयू के उपासक तुलसी ने अपने निवास के लिए काशी को क्यों चुना, उन्होंने अयोध्या को अपना निवास स्थल क्यों नहीं बनाया। अगर थोड़ा भी इस पर विचार करें, तो कारण स्पष्ट हो जाएगा। काशी में कम से कम उनके समय तक किसी मंदिर का ध्वंस नहीं हुआ था। ज्ञानवापी में भगवान विश्वनाथ शिव का मंदिर शान से खड़ा था। अयोध्या उस समय दिल्ली के मुस्लिम साम्राज्य की सूबाई राजधानी थी, जहां उस समय कोई एक भी मंदिर समूचा नहीं बचा था। तुलसी ने अयोध्या के किसी मंदिर में नहीं एक चबूतरे पर बैठकर अपनी रामकथा लिखानी शुरू की थी। उसे पूरा भी उन्होंने वहीं किया, इसका कुछ पता नहीं। शायद उसे पूर्ण करने का काम बनारस पहुंचकर किया हो। और मान लें अयोध्या में पूरा किया भी हो, तो अपना सारा कागज-पत्तर समेटकर उसे ग्रंथ रूप में प्रकाश में लाने का काम निश्चय ही वाराणसी में ही किया होगा। तुलसी किसी पंथ या मजहब के अनुयायी नहीं थे। वह मनुष्यता के व धर्म -न्याय- के उपासक थे। इसलिए बाबरी मस्जिद के प्रमाण के लिए उन्हें या उनके साहित्य को घसीटना नितांत अनुचित है।

खैर, अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस विवाद को उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट से लेकर अपने हाथ में संभाल लिया है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वह न्याय ही करेगा। इस मामले में सर्वाधिक हास्यास्पद बात तो यही है कि इस मामले का फैसला ‘टाइटिल सूट’ के अंतर्गत हो रहा है, जिसमें यह मालिकाना हक तय होना है कि उस जमीन का वास्तविक मालिक या अधिकारी कौन है, जहां पहले एक मस्जिद खड़ी थी और आज एक अस्थाई मंदिर में भगवान राम की मूर्तिपूजा हो रही है।

धरती पर स्थित जमीन का कोई भी टुकड़ा हो, उस पर किसी का मालिकाना हक कभी स्थिर नहीं रहा है। मालिकाना हक तो एक राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था है। जमीनी बंदोबस्त में सरकार के राजस्व खाते मेें जिसका नाम चढ़ जाए, वह जमींदार हो जाएगा और जिसका नाम कट जाए, वह भूमिहीन। इसलिए राम जन्मभूमि मंदिर का विवाद राजस्व कानूनों के तहत नहीं निपट सकता। लेकिन मजबूरी है दोनों पक्षों की कि यदि मामले का हल अदालत से प्राप्त करना है, तो उसे देश की उपलब्ध कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत ही प्राप्त किया जा सकता है।

अयोध्या विवाद का फैसला ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अंतर्गत ही हो सकता है। अभी जिन कानूनों के अंतर्गत सुनवाई हुई है व फैसले की प्रतीक्षा है, उनके अंतर्गत यदि उस जमीन का अधिकार हिन्दुओं को मिल जाता है, तो वह भी संयोगवश मिला न्याय होगा। वह वास्तविक न्याय तो तब कहा जाएगा, जब कोई अदालत यह फैसला दे कि अयोध्या में एक मंदिर को तोड़कर उस पर मस्जिद बनवाना एक मध्यकालीन विजेता की अन्यायपूर्ण कार्रवाई थी, जिसे आज के लोकतांत्रिक भारत की न्यायव्यवस्था रद्द करती है और उस भूमि को ससम्मान हिन्दू समुदाय को वापस करती है। अब इसके बाद यह सवाल पैदा होगा कि यह जमीन किसके हवाले की जाए। उसे सरकार अपने पास रखे, किसी प्रतिनिधि हिन्दू संगठन के हवाले करे या फिर उसे उस निर्मोही अखाड़े को सौंप दिया जाए, जो शताब्दियों तक मस्जिद के प्रांगण में स्थित चबूतरे पर स्थापित राम प्रतिमा की पूजा आराधना तब तक करता रहा, जब तक कि शासन ने पूरे स्थल को अपने कब्जे में लेकर वहां से सभी अन्य पक्षों को बाहर नहीं कर दिया।

इस पूरे मामले को अंततः सर्वोच्च न्यायालय में जाना ही था। यह अभी ही पहुंच गया यह अच्छी बात है। यदि संबंधित पक्ष इसके फैसले के लिए 60 वर्षों तक प्रतीक्षा कर लेंगे। किंतु इस मामले में आर या पार एक बार अंतिम न्यायिक फैसला हो ही जाना चाहिए। जहां तक आपसी सहमति से किसी समझौते की बात है, तो उसके लिए तो अवसर हमेशा खुला हुआ है। न्यायालय के फैसले के पहले ही नहीं, उसके बाद भी आपसी समझौता हो सकता है। लेकिन आपसी समझौते के लिए राजनीति से मुक्त एक संवेदनशीलता की दरकार होती है, जो आज के समाज में बहुत दुर्लभ हो गयी है। जल्दी ही सही या देर से सही, अयोध्या विवाद का अंतिम समाधान आपसी समझदारी से ही निकल सकता है। अदालत अपना फैसला सुना सकती है, समस्या का समाधान नहीं कर सकती। इसलिए अच्छा हो कि अदालत जल्दी से जल्दी अपना काम पूरा कर ले, यानी अपना फैसला दे दे, जिससे कि उसकी रौशनी में दोनों पक्ष आगे बढ़ सकें। हो सकता है उसके बाद किसी तरह की सामुदायिक सद्बुद्धि का विकास हो और यह मसला परस्पर द्वेष के बजाए प्रेम की आधारशिला बन सके। एक बार अधिकार का फैसला हो जाए, फिर हिन्दू समाज को भी वह भूमि किसी सार्वजनिक हित के लिए देने में कोई संकोच नहीं रह जाएगा। यहां अंत में यह फिर दुहरा देना आवश्यक लग रहा है कि मसला न जमीन का है न मंदिर का, वस्तुतः मसला हिन्दुओं की आहत सांस्कृतिक अस्मिता का है, जिसे वह मंदिर के बहाने वापस पाना चाहता है।