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शनिवार, 7 नवंबर 2009

हिंदी पत्रकारिता के एक प्रतीक पुरुष का अवसान

प्रभाष जोशी आज की हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में नैतिकता, आदर्श तथा प्रतिबद्धता के एक प्रतीक पुरुष थे। स्वभाव से गांधीवादी लेकिन चिंतन से समाजवादी जोशी जी ने हिंदी पत्रकारिता को एक नई भाषा, एक नई शैली और एक नया तेवर देने के साथ एक नया सामाजिक आयाम भी दिया था। उनकी नैतिकता के प्रति निष्ठा व सच्चाई के प्रति दृढ़ता आज की पत्रकारिता में अत्यंत दुर्लभ है। उन्होंने पत्रकारिता केसर्वश्रेष्ठ मूल्यों को जीने की कोशिश की, उनके साथ कभी कोई समझौता नहीं किया।पत्रकारिता के साथ-साथ उनकी खेलों तथा शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि थी। क्रिकेट के साथ तो उन्हें जुनून के स्तर तक लगाव था। वह भीतर से एक अत्यंत जुनूनी खिलाड़ी थे। उन्होंने स्वयं कभी कोई खेल खेला या नहीं यह नहीं पता, लेकिन वह खेल शास्त्र के पंडित थे। खेलों का विश्लेषण वह किसी राजनीतिक विश्लेषण से कम गंभीरता से नहीं करते थे। इसी तरह शास्त्रीय संगीत के भी वह असाधारण प्रेमी थे। यात्राओं के दौरान प्राय: हर समय उनका टेप रिकार्डर साथ रहता था और साथ में रहते थे उनके प्रिय गायकों के कैसेट।प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व की एक असाधारण बात यह भी थी कि वह एक अद्ïभुत श्रोता थे। अपनी ओर से अधिक बोलना उनकी आदत में कभी नहीं था। वे किसी की भी पूरी बात ध्यान से सुनते थे और फिर जरूरी होने पर ही अपनी राय देते थे। उनका यह गुण उनकी पत्रकारिता में भी मुखर था। उन्होंने अपने स्तर पर पाठकों को अपने अखबार से जोडऩे की जितनी और जैसी कोशिश की वैसी शायद ही किसी ने कभी की हो। 1983 में उन्होंने जब जनसत्ता शुरू किया, तो उसका शायद सर्वाधिक लोकप्रिय स्तम्भ चौपाल था, जो पाठकों के पत्र का कॉलम था। शुरू में इन पत्रों का चयन व संपादन वे स्वयं करते थे।प्रभाष जी किसी राजनीतिक दल की तरफ कभी नहीं द्ब्राुके। भारतीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा के कारण प्राय: उन्हें लोग दक्षिणपंथी करार दिया करते थे, लेकिन वह इन भावनाओं की राजनीति करने वालों के साथ कभी नहीं रहे। उनकी विशिष्टता थी जीवन के प्रति एक समग्र दृष्टि। जनसत्ता में नियमित प्रकाशित होने वाला उनका साप्ताहिक स्तम्भ 'कागदकारे इसका प्रमाण रहा है। मुद्दा राजनीति का हो या समाज का, उनसे असहमत रहने वालों की कभी कमी नहीं रही, लेकिन कभी किसी ने उनकी समाज निष्ठïा या राजनीतिक ईमानदारी पर उंगली नहीं उठाई। जनसत्ता से संपादक के रूप में सेवा मुक्त होने के बाद भी वे अंत तक उसके सलाहकार संपादक बने रहे और उनका 'कागदकारेस्तम्भ प्रकाशित होता रहा, लेकिन 1995 में सेवानिवृत्ति केबाद उनके पत्रकार जीवन में एक नया आयाम जुड़ा टीवी विश्लेषक का। टीवी चैनलों पर राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक के तौर पर उन्होंने एक अलग ही पहचान बनायी। बिना किसी लाग लपेट के दो टूक टिप्पणी का उनमें साहस भी था और कौशल भी।उनका निधन भी एक अजीब क्षण में हुआ। ऐसा लगता है कि क्रिकेट का असाधारण 'पैशन ही उनकी जान का गाहक बन गया। भारत-आस्ट्रेलिया का हैदराबाद में हो रहा मैच अभी खत्म ही हुआ था कि उन्हें सीने में कुछ दर्द सा उठता महसूस हुआ और जब तक अस्पताल पहुंचते, कालचक्र ने उन्हें अपने आगोश में ले लिया था। जोशी जी अब नहीं है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता शायद अपने इस अत्यंत मनस्वी व्यक्तित्व को कभी भुला नहीं सकेगी।

बुधवार, 4 नवंबर 2009

राजनीतिक लाभ के लिए हिंदी का विरोध

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने अब राज्य विधानसभा पर भी मराठी का डंडा घुमाना शुरू कर दिया है। उन्होंने सभी नवनिर्वाचित विधायकों को धमकी दी है कि यदि उन्होंने मराठी के अलावा और किसी भाषा में सदन की सदस्यता की शपथ ली तो फिर देख लेंगे कि सदन में उपस्थित उनके 13 विधायक क्या करते हैं। उनका कहना है कि सदन में केवल मराठी भाषा का व्यवहार होना चाहिए।राज्य विधानसभा में राज्य की भाषा का व्यवहार हो, इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन औपचारिक शपथ ग्रहण तक में इसकी बाध्यता को तो कतई लोकतांत्रिक करार नहीं दिया जा सकता। राज ने सदन में हिंदी तक के प्रयोग का निषेध किया है। उन्होंने हिंदी का विशेष तौर पर उल्लेख करते हुए उपर्युक्त चेतावनी दी है। हिंदी इस देश की राष्टï्रभाषा एवं राजभाषा है। किसी भी विधानसभा या केंद्र शासित प्रदेश में उसके प्रयोग का निषेध नहीं किया जा सकता। लोग स्वेच्छया मराठी का इस्तेमाल करें, यह अच्छी बात है, किन्तु किसी को बलपूर्वक हिंदी के प्रयोग से रोकना न केवल अलोकतांत्रिक, बल्कि एक तरह का राष्टï्र विरोधी कार्य है।इसे इस देश के संविधान व राजनीतिक प्रणाली की दुर्बलता ही कहा जाएगा कि ऐसे लोगों और उनके संगठनों को राजनीतिक मान्यता मिल जाती है और वे देश की विधायिकाओं में भी पहुंच जाते हैं, जिनका लोकतंत्र की सामान्य मर्यादाओं में भी कोई विश््वास नहीं है। अभी तक जम्मू-कश्मीर ही एक ऐसा राज्य था, जहां कोई विधायक स्वेच्छया हिंदी का इस्तेमाल नहीं कर सकता और यदि वह हिंदी में बोलना चाहता है, तो उसे इसके लिए स्पीकर से पूर्वानुमति लेनी पड़ती है, लेकिन अब महाराष्टï्र भी ऐसा राज्य बन जाएगा, जिसकी विधानसभा में दादागिरी के बल पर हिंदी का निषेध रहेगा।यहां यह उल्लेखनीय है कि महाराष्टï्र में यों भी सदन के भीतर मराठी का ही बोलबाला रहता है। बहुत कम लोग हिंदी और उससे भी कम लोग अंग्रेजी बोलते हैं, लेकिन राज ने यह धमकी देकर केवल यह जाहिर करने की कोशिश की है कि वह मराठी के एकमात्र अलम्बरदार हैं, बाकी सब मराठी विरोधी। वह अपने चाचा बाल ठाकरे के मराठावाद से भी आगे निकलना चाहते हैं। पिछले दिनों उन्होंने मराठावाद का जो हिंसक प्रदर्शन किया, उसका उन्हें चुनावों में जो शानदार प्रतिशाद मिला, उससे वह अब और अधिक उत्साहित हैं। ऐसा न होता, तो वह खुलेआम एक प्रेस कांफें्रस करके राज्य के 275 विधायकों को यह धमकी देने का साहस नहीं कर सकते थे।देश में यदि भाषा आधारित क्षेत्रीयताओं के आधार पर राज्यों का गठन किया गया है, तो वहां क्षेत्रीय राजनीति का उभरना या क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का पैदा होना स्वाभाविक है। बाल ठाकरे ने इस क्षेत्रीयता की भावना को भुनाकर ही अपना राजनीतिक आधार बनाया। लेकिन आज की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर किसी क्षेत्रीय दल को राष्टï्र विरोधी गतिविधियों की अनुमति तो नहीं दी जा सकती। क्या राज्य की कांग्रेस पार्टी इसका कोई प्रतिकार करेगी।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

हिंदी केवल एक भाषा नहीं, भारतीयता की अभिव्यक्ति है



हिंदी केवल एक भाषा नहीं, भारतीयता की अभिव्यक्ति है
http://cmpershad.blogspot.com/2009/09/hindi-not-only-language.html#comments
--डॉ. राधेश्याम शुक्ल, सम्पादक -स्वतंत्र वार्ता


केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने सभी राज्य शिक्षा परिषदों [स्टेट एजुकेशन बोर्ड्स] से कहा है कि वे सभी स्कूलों में हिन्दी पढ़ाने की व्यवस्था करें, जिससे कि यह भाषा देश की एक आम फ़हम भाषा [लिंग्वा फ़्रैंका] बन जाए। उनका कहना था कि स्कूलों में हिंदी शिक्षण पर जोर देना चाहिए, जिससे पूरे देश के बच्चे आपस में घुल-मिल सकें और बड़े होने पर उनमें बेहत्तर एकता स्थापित हो। मातृभाषा का ज्ञान जहाँ सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ती है, वहीं हिन्दी राष्ट्रीय एकता का माध्यम है और अंग्रेज़ी से दुनिया के अन्य देशों से जुड़ सकते हैं।



उनके सुझाव थे कि अभी देश में प्रचलित करीब ४१ शिक्षा बोर्डों को समाप्त कर क्षेत्रीय आधार पर केवल चार बोर्ड [उत्तर, दक्षिण, पूर्व व पश्चिम] का गठन किया जाय, विज्ञान तथा गणित की शिक्षा में पूरे देश में एकरूपता लाई जाए, हाईस्कूल की परीक्षा वैकल्पिक कर दी जाए तथा विश्वविद्यालय के डिग्री स्तर में प्रवेश के लिए पूरे देश में केवल एक परीक्षा की व्यवस्था की जाए। इनमें उनका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण वक्तव्य हिंदी भाषा को लेकर था।



उनके स्तर पर यह कहा जाना निश्चित ही बहुत महत्त्वपुर्ण है कि यदि हिंदी देश की 'लिंग्वा फ़्रैंका' बन जाए, तो भारत दुनिया के लिए ज्ञान प्रदाता बन सकता है। आज अंग्रेज़ी पर निर्भरता ही इस बात का सबसे बड़ा कारण है कि मौलिक ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भारत पिछड़ा हुआ है और शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया के अन्य देशों, विशेषकर अंग्रेज़ी वालों की मुखापेक्षी है।



भारत कभी 'जगद्‌गुरु' [पूरी दुनिया के लिए ज्ञान का प्रदाता] माना जाता था, तो इसीलिए कि भारत की भाषा संस्कृत न केवल इस देश के पढे़-लिखे लोगों की लिंग्वा फ़्रैंका थी, बल्कि उसे अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा का भी सम्मान प्राप्त था। दक्षिण पूर्व एशिया के देशों कंबोड़िया, लाओस, वियतनाम, इंडोनेशिया [हिंदेशिया], मलेशिया [मलय], थाइलैंड [श्याम], बर्मा [म्यांमार], श्रीलंका [सिंहल] आदि से लेकर पश्चिम एशिया, तिब्बत व हिमालय से लगे तमाम मध्येशियायी क्षेत्रों तक संस्कृत का प्रसार था। इन प्रायः सारे क्षेत्रों तक संस्कृत के प्राचीन अभिलेख पाए जाते हैं। चीन व अरब देश के विद्वान भी शिक्षा प्राप्ति के लिए भारत आते थे और संस्कृत सीखकर तमाम नया ज्ञान अर्जित करते थे। उस समय संस्कृत केवल धर्म दर्शन के अध्ययन का माध्यम नहीं थी, बल्कि ज्ञान-विज्ञान जैसे चिकित्सा, अर्थशास्त्र, मौसम विज्ञान, गणित, भूगोल, रसायन शास्त्र, ज्योतिष, यंत्रविज्ञान आदि का भी माध्यम थी। हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र तक का भारत देश भले कभी एक राजनीतिक तंत्र में न रहा हो, लेकिन भाषा व संस्कृति की दृष्टि से यह प्रायः सदैव एक देश रहा है। भाषा, शिक्षा और संस्कृति को लेकर पूरे उपमहाद्वीप में कभी कोई विवाद नहीं रहा, जब तक कि अंग्रेज़ों के साथ विदेशी शिक्षा पद्धति यहाँ नहीं आई।



ज्ञान-विज्ञान के शिक्षण की भारतीय परम्परा बहुत पहले टूट चुकी थी। तकनीकी ज्ञान - गणित, ज्योतिष, रसायन, यंत्रविज्ञान, धातुविज्ञान, रत्नविज्ञान, रंगाई, बुनाई, चित्रकला, शस्त्र निर्माण, वास्तुकला, मूर्तिकला, समुद्र विज्ञान, जहाज़ निर्माण, नगर निर्माण, काष्ठकला, खनन, औषधि विज्ञान आदि के अध्ययन अध्यापन की विधिवत श्रृंखला समाप्त हो चुकी थी। तक्षशिला, विक्रमशिला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय भी समाप्त हो चुके थे, जहाँ इनकी शिक्षा भी प्राप्त होती थी। मुस्लिम आक्रांताओं का सबसे बडा़ कहर इन शिक्षा केंद्रों पर ही टूटा था। इनके टूटने के बाद उपर्युक्त ज्ञान विज्ञान केवल वंश परम्पराओं में सीमित हो गए। पिता-पुत्र परम्परा ही उपर्युक्त तकनीकी शिक्षा का माध्यम रह गया था। संस्कृत के जो स्कूल, विद्यालय या महाविद्यालय थे, वे कुछ विशिष्ट आचार्यों, मंदिरों तथा धार्मिक समुदायों से जुडे़ हुए थे और वहाँ अध्ययन के विषय केवल वेद, वेदांत, संस्कृत भाषा, साहित्य, व्याकरण, दर्शन, इतिहास, पुराण, ज्योतिष व कर्मकाण्ड तक सीमित हो गए थे। इनमें भी रूढि़ग्रस्तता इतनी बढ़ गई थी कि वे कुछ भी नया स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।



अंग्रेज़ों का राजनीतिक आधिपत्य कायम होने के पहले यहां राजकाज में उर्दू व फ़ारसी की स्थापना हो चुकी थी, इसलिए राजनीति, व्यापार, प्रशासन, शिक्षा आदि में नौकरियों के अवसर केवल उर्दू, फ़ारसी व अंग्रेज़ी में उपलब्ध थे। इसीलिए महत्वाकांक्षी व मेधावी लोगों का रुझान भी इन्हीं भाषाओं व आधुनिक यूरोपीय शिक्षा की तरफ़ था। केवल परम्परानिष्ठ ब्राह्मण परिवार ही वेद, शास्त्र, व्याकरण, दर्शन आदि के लिए संस्कृत पढ़ते थे। मैकाले ने स्वयं लिखा है कि संस्कृत पढ़ने वाले सामान्य लोग इससे परेशान थे कि इसे पढ़कर उन्हें कोई नौकरी नहीं मिल सकती। इस तरह उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी नौकरियों की भाषा बन गई थी, इसलिए शिक्षा का माध्यम भी यही भाषाएं बन गईं। इस प्रकार, केवल मध्यवर्ग का एक छोटा सा तबका, जो संस्कृत भाषा तथा पारम्पारिक भारतीय वांग्मय के सम्पर्क में था, भारत की उच्च परम्परा श्रेष्ठ भाषा ज्ञान, अध्यात्म तथा दर्शन की गौरवगाथा के अध्ययन में लगा रहा। परम्परा के प्रति उसका उत्कट मोह भारतीयता की समृद्ध परम्परा को जीवित रखने में सहायक बना। उसने संस्कृत वांग्मय् के श्रेष्ठ साहित्य को क्षेत्रीय भाषाओं में अनूदित करने या उनके आधार पर नये ग्रंथ लिखने का प्रयास किया। इससे क्षेत्रीय भाषाओं का उत्थान हुआ, उनमें सहित्य सृजन की चेतना जगी।



अंग्रेज़ी शिक्षित स्वतंत्रचेता भारतीयों ने उस माध्यम की तलाश शुरू की, जो पूरे देश में एकता का भाव, संस्कृति का गौरव और मुक्ति की चेतना भर सके। यह काम न अंग्रेज़ी से सम्भव था और न फ़ारसी से। उर्दू इस देश में ही पैदा हुई भाषा थी, लेकिन उसने अपना अलग रास्ता पकड़ लिया था। वह इस देश में पैदा तो हुई, लेकिन उसने इस देश से कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक सम्बन्ध नहीं रखा। उसके लिए यह देश एक जागीर से अधिक नहीं था। उसने लिपि भी विदेशी अपनायी और भाव तथा सांस्कृतिक प्रतीकों को भी बाहर से लिया। इसलिए देश के कोने-कोने से सभी राष्ट्रचेता विद्वानों ने संस्कृत के अपभ्रंश तथा देशी भाषाओं के मेलजोल से बनी देश के आम आदमी की संपर्क भाषा को एक राष्ट्रभाषा के रूप में ऊपर उठाने व विकसित करने का बीड़ा उठाया और उसे ही देश के राजकाज की भाषा बनाने का संकल्प लिया। उन दिनों इस भाषा को मध्य एशिया, तुर्की व फ़ारस से आए मुसलमानों ने हिन्दी, हिन्दवी या हिन्दुस्तानी नाम दे रखा था। भारत में इसे 'भाषा' के नाम से ही जाना जाता था। विद्वानों व पढे़ लिखे लोगों की देश भर में अपनी संपर्क भाषा संस्कृत थी, तो उसके समानान्तर पूरे देश में आम लोगों, सैनिकों, व्यापारियों, पर्यटकों, मज़दूरों, कारिगरों, नटनर्तकों, साधुओं, तीर्थयात्रियों आदि के परस्पर संपर्क की भाषा यही हिंदी थी। यह हिंदी किसी क्षेत्र विशेष की भाषा नहीं थी। यह पूरे देश की भाषा थी और देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने वालों द्वारा व्यहृत होती थी। मध्यकालीन संत या भक्त कवियों की जिस भाषा को 'सधुक्कड़ी' कहा गया है, वही वास्तव में हिंदी थी। इसमें उत्तर भारत की राजस्थानी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी व मैथिली से लेकर दक्षिण के मराठी, तेलुगु, कन्नड़ व तमिल तक के शब्द पाए जाते हैं। इसलिए देश के जागरूक राजनेताओं, विद्वानों तथा राष्ट्रभक्तों ने इस संस्कृतोन्मुख भारतीय जन संपर्क भाषा को देश की राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प लिया।



जब देश एक राजनीतिक इकाई नहीं था, तब इसकी सांस्कृतिक एकता व राष्ट्रीयता बरकरार थी, क्योंकि देश एक भाषा व एक संस्कृति से बंधा था, लेकिन आज राजनीतिक एकीकरण के बावजूद देश, भाषा व संस्कृति के वैविध्य में बिखरता जा रहा है। देश की एक अपनी सम्पर्क भाषा के अभाव में वे संवादहीनता की स्थिति में है, जिसके कारण उनमें क्षेत्रीय संकीर्णता पनप रही है। वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि देश की एक जनभाषा को राष्ट्रभाषा व राजभाषा के रूप में स्वीकृति एवं व्याप्ति से देश की एकता व अखंडता कितनी दृढ़ होगी व उसकी विकासगति कितनी तेज़ हो सकेगी।

सवाल केवल मुद्दे को सही परिप्रेक्ष्य में सोंचने और अपनी सोच को बदलने का है।

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स्वतंत्रवार्ता के `साप्ताहिकी 'से साभार उद्धृत सारसंक्षेप

प्रस्तुतकर्ता cmpershad पर 11:14 am
लेबल: आलेख
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7 टिप्पणियाँ:
============================== hey prabhu yeh tera path ने कहा…
आप द्वारा प्रस्तुत हिन्दी दिवस पर विचार थोडे लम्बे थे पर सटीकता के साथ उचीत लगे- बधाई।
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मै यह नही कहता हू कि हिन्दी कि स्थिति सुधरी नही है। भाषा के प्रति लोगो कि जागरुकता बडी है। हिन्दी हमारी पहचान है। मै एक ऐसे भारत की कल्पना नही करता हू, जहॉ हिन्दी सारे देश मे समान रुप बोली जाऍ, लिखी जाऍ। मगर ऍसे देश की कल्पना जरुर करता हू जहॉ हिन्दी के प्रति हीनभावना खत्म हो जाऍ। (हे प्रभू यह तेरापन्थी)
आप को हिदी दिवस पर हार्दीक शुभकामनाऍ।

पहेली - 7 का हल, श्री रतन सिंहजी शेखावतजी का परिचय

हॉ मै हिदी हू भारत माता की बिन्दी हू

हिंदी दिवस है मै दकियानूसी वाली बात नहीं करुगा

September 14, 2009 12:04 PM
====================================== udan tashtari ने कहा…
विचारणीय आलेख है.

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.

कृप्या अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य का एक नया हिन्दी चिट्ठा शुरू करवा कर इस दिवस विशेष पर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का संकल्प लिजिये.

September 14, 2009 4:07 PM
=============================== संगीता पुरी ने कहा…
आपने हिन्‍दी से जुडे महत्‍वपूर्ण विंदुओं पर सुंदर विश्‍लेषण किया .. ब्‍लाग जगत में कल से ही हिन्‍दी के प्रति सबो की जागरूकता को देखकर अच्‍छा लग रहा है .. हिन्‍दी दिवस की बधाई और शुभकामनाएं !!

September 14, 2009 5:10 PM
======================================== संजय तिवारी 'संजू' ने कहा…
आपका हिन्दी में लिखने का प्रयास आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण है. आपके इस प्रयास के लिए आप साधुवाद के हकदार हैं.

आपको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.

September 14, 2009 6:52 PM
============================================== sacchai ने कहा…
" aapko hindi divas ki subhkamnaye , bahut hi sahi farmaya hai aapne aapke lekh me ...sunder vishleshan humne aaj dekha aur padh bhi is liye hum aapke sadaiv aabhari rahenge "

----- eksacchai { aawaz }

http://eksacchai.blogspot.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

September 15, 2009 11:50 AM
===================================== शरद कोकास ने कहा…
विस्तार से यहाँ हिन्दी की महिमा जानने का अवसर प्राप्त हुआ । धन्यवाद ।

September 15, 2009 2:50 PM
================================================== ज्ञानदत्त पाण्डेय | gyandutt pandey ने कहा…
पता नहीं, विश्व की अन्य भाषायें भी अंग्रेजी से इतनी आतंकित हैं? पता नहीं अन्य जगहों पर भी राष्ट्र और संस्कृति की पहचान मर रही है?

September 16, 2009 7:49 AM