सोमवार, 6 सितंबर 2010

इस सृष्टि का रचयिता

 इस सृष्टि का रचयिता कोई ईश्वर नहीं , स्वयं यह सृष्टि है




पश्चिमी धर्म-दर्शन में ईश्वर -गॉड- को इस सृष्टि से परे माना जाता है, जिसकी इच्छा से इस विश्व-ब्र्रह्मांड की रचना होती है और उसकी इच्छा से ही इसका अंत भी हो जाता है। जबकि भारतीय अद्वैत दर्शन की दृष्टि में यह सृष्टि स्वयं परमात्मा या ब्रह्म (गॉड) का आत्मविस्तार है। यानी यह सृष्टि अपने संपूर्ण रूप में स्वयं ब्रह्म या स्वयं स्रष्टा है। यही बात अब आज के विश्व प्रसिद्ध भौतिकीविद स्टिफेन हाकिंग ने गणित और भौतिकी के वैज्ञानिक सूत्रों से प्रमाणित की है। उन्होंने अपनी नई पुस्तक ‘द ग्रैंड डिजाइन’ में यह प्रमाणित किया है कि इस सृष्टि का रचयिता कोई ईश्वर नहीं है, यह स्वयं अपने प्राकृतिक नियमों से उत्पन्न हुई है। उन्होंने यह भी सिद्ध किया है कि इस विराट ब्रह्मांड का जन्म नितांत शून्य (नथिंगनेस) से हुआ है और यह पुनः उसी शून्य (नथिंगनेस) में विलीन हो जाएगी। और यह चक्र अनंतकाल तक चलता रहेगा। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका उत्तर उनके पास नहीं है, लेकिन इस बात का तो पक्का प्रमाण है कि इस सृष्टि से परे किसी ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है।





यह संपूर्ण सृष्टि, यह विश्व ब्रह्मांड क्या है? यह कैसे बना? उसका निर्माता कौन है ? उसने इसे क्यों बनाया? जैसे प्रश्न अनादिकाल से मानव मस्तिष्क में उठते आ रहे हैं, लेकिन इनका अंतिम उत्तर अब तक नहीं मिल सका है। तमाम वैज्ञानिकों, दार्शनिकों व तत्ववेत्ताओं ने अपने-अपने ढंग से इनका उत्तर देने का प्रयत्न किया है, किंतु कोई भी उत्तर संदेहों से परे नहीं है। अपनी सारी बौद्धिक क्षमता इस्तेमाल करने के बाद भी सृष्टि का रहस्य जानने में असमर्थ मनुष्य ने एक ऐसे अज्ञात लेकिन सर्वशक्तिमान व्यक्ति की कल्पना की, जो कुछ भी कर सकता है। इस संपूर्ण ब्रह्मांड जैसे कितने भी ब्रह्मांड बना सकता है और नष्ट कर सकता है। इस व्यक्ति की कल्पना करेन के बाद मनुष्य ने सुकून की सांस ली। उसने घोषित कर दिया कि इस सृष्टि की रचना उसी ने की है- उसे परमात्मा, गॉड, अल्लाह आदि की संज्ञा दी गयी। उसने इसे कैसे बनाया, क्यों बनाया, किस चीज से बनाया है और इसका अंत क्या होगा, यह सब वही जाने। मान लिया गया कि यह सब जानना मानव बुद्धि के परे है, लेकिन यह सब मानने के बाद भी मानव बुद्धि की शांति थोड़े समय ही रह सकी। संसार की तमाम समस्याएं तकलीफों, क्रूरताएं फिर उसे मथने लगीं। संसार में चारों तरफ जितना सुख नहीं है, उससे ज्यादा दुख है। बुढ़ापा, बीमारी, मौत और भूख प्यास से विकल मनुष्य इन सबसे छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा। अब इन सबके कारणों की व्याख्या आवश्यक हो गयी। इसके लिए तरह-तरह की अटकलें लगाने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

ज्यादा सोच-विचार की क्षमता रखने वाले इसे लेकर ‘ईश्वर’ या ‘गॉड’ के स्वरूप, उसके स्वभाव तथा मनुष्य के आचरण व व्यवहार की व्याख्या करने लगे। सृष्टि के रचयिता ईश्वर को तो अत्यंत कृपालु, दयालु बताया गया, तो मनुष्य के दुखों के लिए एक शैतान की कल्पना कर ली गयी। ईश्वर को न्यायकर्ता तथा कर्मों के अनुसार फल देने वाला बताया जाने लगा। मनुष्य के दुखाों तथा उसकी दुर्दशा के लिए उसके कर्मों को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। इस जन्म की स्थिति के लिए पूर्व जन्म की कल्पना की गयी और उस जनम के कर्मों के अनुसार इस जन्म की अच्छी या बुरी दशा की व्याख्या की जाने लगी। पाप को अन्याय अथवा कदाचार को दुखों का कारण बताया गया। यह भी कल्पना की गयी कि ईश्वर यदि सर्वशक्तिमान है, तो वह पापों को क्षमा भी कर सकता है। लेकिन वह अकारण किसी के पापों को क्षमा क्यों करे, इसलिए उसे प्रसन्न करने के लिए उसकी पूजा, उपासना या प्रार्थना का उपदेश दिया जाने लगा।

वस्तुतः यह सब मिथ्या तथा कल्पित था, लेकिन इस तरह के उपदेश करने वालों को ज्ञानी व सिद्ध समझा जाने लगा। उनके अनुयायियों के पंथ चल पड़े। कोई अपने को ईश्वर का दूत तो कोई अपने को उसका एकमात्र पुत्र कहने लगा। किसी ने साधना या तपस्या द्वारा उसे प्राप्त कर लेने का दावा किया। इन तमाम कल्पित बातों को लेकर बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे गये। इनमें कुछ तार्किक व्याख्या वाले थे, तो कुछ विश्वास को ही फलदायी बताने वाले। लेकिन एक बात सभी में समान थी कि सभी कल्पित थे। जिन कल्पनाओं की तर्कों से संतुष्टि हो सकी, उन्हें दर्शन या फिलासफी की उूंची संज्ञा दी गयी। पश्चिमी दुनिया में करीब 15वीं शताब्दी तक का सारा ज्ञान ईश्वर के इर्द-गिर्द ही घूम रहा था। लेकिन इस बीच चिंतकों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिसने प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण द्वारा उसका रहस्य समझने की कोशिश शुरू की। उसने ईश्वर को किनारे रखकर संसार की वस्तुओं व क्र्रियाओं को स्वयं देखना परखना शुरू किया। यहां से ईश्वर निरपेक्ष विज्ञान की शुरूआत हुई। इन निरीक्षणों के आधार पर जिन प्राकृतिक शक्तियों का बोध हुआ, उनका इस्तेमाल करके तरह-तरह के उपकरण, यंत्र एवं रसायन बनने लगे। और वह यात्रा आज के वैज्ञानिक युग तक आ पहुंची। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि आज के वैज्ञानिकों ने ईश्वर पर विश्वास करना छोड़ा दिया। वह प्रयोगशाला में तरह-तरह के प्रयोगों व निर्माण के साथ-साथ मंदिर, चर्च या मस्जिदों में जाकर माथा भी टेकता है। बहुत कम वैज्ञानिक ऐसे होंगे, जिन्होंने ईश्वर को पूरी तरह नकार दिया हो। जो नास्तिक है या चर्च नहीं जाते, वे भी बहुत बार ईश्वर का सहारा लेने के लिए मजबूर होेते दिखायी देते हैं।

कोई भी पूछ सकता है कि इसका कारण क्या है? कारण स्पष्ट है। कोई भी वैज्ञानिक यह तो बता सकता है कि यह कार्य कैसे हुआ या इस वस्तु का निर्माण कैसे हुआ, लेकिन वह इस प्रश्न का उत्तर कभी नहीं दे सकता कि वह क्यों हुआ। आज के समय के सबसे प्रसिद्ध नास्तिक वैज्ञानिक रिचर्ड डाकिंग की पुस्तक ‘गॉड डिल्यूजन’ जब प्रकाश्ति हुई, तो ऐसा लगा कि विज्ञानजगत से अब ‘गॉड’ लुप्त ही हो जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कहा जाता है कि ईश्वर के अस्तित्व को तो डार्विन ने ही निराधार सिद्ध कर दिया था, लेकिन उसके बाद की लंबी वैज्ञानिक यात्रा के बाद भी आज भी अधिकतर वैज्ञानिक उसी तरह ईश्वर में विश्वास रखने वाले धार्मिक भी है, जैसे डार्विन के पूर्वकाल के तमाम लोग थे।

इसलिए आज जब श्रेष्ठतम आधुनिक भौतिकविदों में एक स्टिफेन हाकिंग ने गणितीय आधार पर यह घोषित कर दिया है कि इस सृष्टि का निर्माता कोई ईश्वर नहीं है। इस सृष्टि के अपने भौतिक नियम ही इसके निर्माण और विनाश के स्वयं कारण हैं, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि आगे के भौतिकीविद ईश्वर पर विश्वास करना छोड़ देंगे और नितांत प्रकृति पर विश्वास करने वाले बन जाएंगे।

ईश्वरेच्छा बनाम प्राकृतिक नियमों का विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन इस बहस में नई गर्मी पिछले 2 सितंबर को तब पैदा हुई, जब स्टिफेन हाकिंग ने अपनी नई पुस्तक ‘द गैं्रड डिजाइन’ के प्रकाशन पूर्व प्रचार कार्यक्रम के अंतर्गत स्पष्ट घोषणा की कि ‘ईश्वर ने ब्रह्मांड की रचना नहीं की।’ यह पुस्तक इसी सप्ताह प्रकाशित होने वाली है, जिसमें उन्होंने पूरी गंभीरता के साथ यह कहा है कि इस सृष्टि की रचना से ईश्वर का (वह जो भी हो- ही, शी, इट) का कोई लेना-देना नहीं है। वास्तव में उनका कहना है कि ब्रह्मांड अपने स्वयं के नियमों से जन्म लेता है, बढ़ता है और फिर विलीन होता है। वैसे वे यह बात अपनी पिछली सर्वाधिक चर्चित पुस्तक ‘ए ब्रीफ हिस्ट्र् आफ टाइम’ में सिद्ध कर चुके हैं, लेकिन अपनी इस नई पुस्तक में (जो अभी आज की तारीख तक बाजार में नहीं आयी है) शायद वह अधिक पुष्ट तर्कों व प्रमाणों के साथ इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं। उस पुस्तक में उन्होंने गणितीय आधार पर यह प्रमाणित किया था कि ‘शून्य’ (नथिंगनेस) से इस विराट ब्रह्मांड की सृष्टि हो सकती है और फिर यह समूचा ब्रह्मांड ‘शून्य’ में (उसी  नथिंगनेस) में विलीन हो सकता है। इसे प्रमाणित करने के लिए अब वह एक नये सिद्धांत के साथ सामने आए हैं, जिसे सैद्धांतिक भौतिकी में ‘एम-थियरी’ (एम सिद्धांत) की संज्ञा दी गयी है। यह पुरानी ‘स्ट्रिं्ग-थियरी’ का विकसित रूप है। यहां ‘एम’ से आशय ‘मेम्ब्रेंस’ (झिल्ली) से है, लेकिन वैज्ञानिकों को ‘मैम्ब्रेंस थियरी’ के बजाए ‘एम थियरी’ कहना अधिक अच्छा लगा, क्योंकि यहां वे ‘एम’ का मनचाहा अर्थविस्तार कर सकते हैं। यहां ‘झिल्ली- का अर्थ साधारण झिल्ली से नहीं, बल्कि महागुरुत्व (सुपरग्रेविटी) की बहुआयामी, झिल्ली जैसी कल्पित सतह से है। एम-थियरी की यह ‘मेम्ब्रेन’ 11 आयामी है। सामान्यतया इन 11 आयामों (डाइमेंशन) के किसी बिम्ब का अनुभव कर पाना भी कठिन है। इसलिए यहां इस ‘थियरी’ के विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है। बस हम इतना समझ सकते हैं कि हाकिंग के अनुसार इस संसार के लिए इस संसाार से भिन्न किसी कारण या निमित्त तत्व यानी ‘गॉड’ या ‘ईश्वर’ की जरूरत नहीं है।

इस तरह यदि सच कहें तो स्टिफेन हाकिंग की इस वैज्ञानिक स्थापना का सर्वाधिक गहरा प्रहार ईसाई चर्च पर हुआ है। अन्य सेमेटिक धर्म (रिलीजन) यहूदी एवं इस्लाम भी इससे प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन इससे भारतीय दर्शन के ब्रह्म की कल्पना पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उसकी वैज्ञानिक पुष्टि ही होती है।

यद्यपि यहां हर तरह की दार्शनिक भौतिक व ईश्वरीय विश्वास वाली धारणाएं मौजूद हैं, लेकिन दर्शन के स्तर पर यहां का अंतिम विश्वास यही है कि यह संपूर्ण सृष्टि उस परम ब्रह्म का आत्मविस्तार है, वह स्वयं आत्मविस्तार करके ब्रह्मांड का रूप धारण कर लेता है और फिर संकोच के द्वारा ‘अंगुष्ठ’ मात्र का नितांत सूक्ष्म या ‘शून्य’ रूप धारण कर लेता है। यहां मनुष्य को गुमराह करने वाले शैतान की कोई परिकल्पना नहीं है और न जड़चेतन के बीच कोई तात्विक भेद किया गया है। इसलिए हाकिंग के वैज्ञानिक मत से जहां भारतीय सृष्टि सिद्धांत की पुष्टि होती है, वहां ‘ओल्ड रेस्टामेंट’ का सिद्धांत धराशायी हो जाता है। इसलिए अब यूरोप व अमेरिका बहुत से ईसाई वैज्ञानिक इस पुस्तक के निष्कर्षों की आलोचना पर उतर पड़े हैं। निश्चय ही वे हाकिंग के कथ्य को सही वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने के बजाए चर्च की रक्षा के लिए अधिक चिंतित हो उठे हैं। दो प्रसिद्ध गणितज्ञों एरिक प्रीस्ट तथा जान लेनाक्स ने उनकी स्थापनाओं के विरुद्ध लेख लिखे हैं। एरिक प्रीस्ट ने प्रतिष्ठित ब्रिटिश दैनिक ‘गार्जियन’ में एक लेख (स्टिफिन हाकिंग कैन नॉट यूज फिजिक्स टु आंसर ह्वाई वी आर हियर) लिखकर कहा है कि ईश्वर (गॉड) के बारे में आधुनिक विश्वास हमारे ज्ञान जगत में केवल खाली जगहों के भरने का साधन मात्र नहीं है, बल्कि वह भिन्न प्रकार के प्रश्नों का उत्तर पाने का साधन है। खाली जगहें भरने से आशय यह है कि जिन समस्याओं का उत्तर ढूंढ़ने में मनुष्य की बुद्धि काम नहीं करती, वहां हम ईश्वर को लाकर बैठा देते हैं। किंतु जब बुद्धि वहां तक पहुंच जाती है, तो ईश्वर को वहां से हटा देते हैं। भिन्न तरह के प्रश्नों से शायद उनका आशय है कि यह सृष्टि बनी ही क्यों ? इस सृष्टि में मनुष्य क्यों बनाया गया ? मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है ? मनुष्य में एक भिन्न तरह की चेतना क्यों है ? आदि, आदि। लेकिन यदि हाकिंग को या अपने देश के ही अद्वैतवादी दार्शनिकों को पढ़े तो पता चलेगा कि ये प्रश्न भी कोई तात्विक प्रश्न नहीं है। ये प्रकृति की अपनी सहज चेतना से अद्भुत है और प्रकृति स्वयं इनका उत्तर तलाश कर संतुष्ट भी हो लेती है। प्रीस्ट यू.के. में ‘ग्रेगरी चेयर आॅफ मैथमेटिक्स’ पर आसीन गणितज्ञ तथा सूर्य की आंतरिक गतिविधियों (सोलर मैगनेटोहाइड्र्ो डाइनमिक्स) के विशेषज्ञ हैं।

दूसरे गणितज्ञ है जॉन लेनाक्स। वह आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर तथा ‘मैथमेटिक्स एंड फिलोसोफी आॅफ साइंस’ के फेलो हैं। वह ‘ग्रीन टेम्प्लेटन कॉलेज’ में ग्रीन पास्टोरल एडवाइजर भी हैं। उन्होंने ‘मेल-आॅनलाइन’ पर लिखा है कि ‘एक वैज्ञानिक के रूप में मैं पूरे निश्चय के साथ कह सकता हूं कि स्टिफेन हाकिंग गलत हैं। आप ‘गॉड’ के बिना ब्रह्मांड की व्याख्या कर ही नहीं सकते। वह हाकिंग की बौद्धिक क्षमता तथा उनके भौतिकी ज्ञान की प्रशंसा करते हैं, लेकिन उनकी स्थापना को मानने से इंकार करते हैं, क्योेंकि वह चर्च के विश्वासों के विरुद्ध जाता है। इस श्रंृखला में कुछ वैज्ञानिक ऐसे भी हैं, जो यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि किसी किताब की बिक्री को बढ़ाने के लिए उसे ईश्वर के अस्तित्व के साथ जोड़ देना सर्वाधिक कारगर रणनीति है।

थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि हाकिंग ने पुस्तक की बिक्री बढ़ाने के लिए ही ऐसा विवादास्पद बयान दिया है, लेकिन इससे उन वैज्ञानिक तर्कों का तो निषेध नहीं हो जाता, जो उनकी पुस्तक में दिये गये हैं। यह भी कहा जा रहा है कि सृष्टि के निर्माण के लिए यदि आप ईश्वर पर विश्वास न करें तो अब ‘एम-थियरी’ पर विश्वास करें। यह थियरी भी उतनी ही रहस्यपूर्ण है, जितना कि ईश्वर स्वयं। अब यहां इस मुद्दे के और गहरे वैज्ञानिक विश्लेषण में जाने की जरूरत नहीं है। स्थूलतया हम हाकिंग की बात को इस तरह समझ सकते हैं कि इस विश्व ब्रह्मांड से परे या उससे भिन्न किसी ‘गॉड’ का अस्तित्व नहीं है कि जिसकी इच्छा से इसकी उत्पत्ति हो गयी या जिसकी कृपा या कोप से इस सृष्टि के जीव-जंतु या अन्य पिंड प्रभावित होते हों। अपने देश में तो ऐसे ‘गॉड’ के निषेध का आंदोलन बहुत पहले ही शुरू हो चुका था। गोकुल के कृष्ण ने गांव वालों से अब से हजारों वर्ष पहले कहा था कि ‘ईन्द्रादि’ देवताओं की पूजा करने की जरूरत नहीं है। उनकी कृपा या कोप से कुछ होने वाला नहीं है। पूजा करनी ही है तो अपनी नदियों, पहाड़ों, वृक्षों व पशुओं की करो, जिन पर तुम्हारा जीवन निर्भर है। अब आज यदि विश्व के शीर्षस्थ भौतिकीविद गणित और भौतिकी के वैज्ञानिक सूत्रों से यही प्रमाणित कर रहे हैं, तो यह हम भारतीयों के लिए बड़े गर्व की बात है। हाकिंग स्पष्ट करते हैं कि धरती पर जीवन कैसे आया और मनुष्य कैसे विकसित हुआ, इसकी व्याख्या ईश्वर -गॉड- की इच्छा में नहीं, बल्कि भौतिकी या प्रकृति के अपने नियमों में निहित है। उनका तर्क है कि ‘बिगबैंग’ (जिसके साथ इस ब्रह्मांड का जन्म हुआ) इन प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपरिहार्य था, क्योंकि गुरुत्व (ग्रेविटी) के ऐसे नियम हैं, जिनके अनुसार शून्य से सृष्टि का जन्म हो सकता है और पुनः वह शून्य में समाप्त हो सकती है।

यह सही है कि इस सृष्टि के वास्तविक रहस्य तक मनुष्य कभी नहीं पहुंच सकता। इस सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ, इसकी खोज तो विज्ञानी कर सकते हैं, लेकिन क्यों हुआ, इसका जवाब कभी नहीं मिल सकता। और जिनका वास्तविक उत्तर कभी नहीं मिल सकता, उसको बताने या जानने का दावा करने वाला जो भी हो, वह मनुष्य को गुमराह करेगा और अपने मिथ्या सिद्धांतों के सहारे अपने स्वार्थ के लिए उसका उपयोग करेगा। इसलिए आधुनिक धर्मशास्त्र प्रणेताओं को हाकिंग के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर मनुष्य के सामाजिक आचरण का सिद्धांत स्थापित करना चाहिए। और यदि कोई ईश्वर को सृष्टि का कारण तत्व मानना ही चाहता है, तो उसे इस सृष्टि को ही ईश्वर रूप मानना होगा और इसमें अंतर्निहित चेतना को ही अपनी उपास्य प्रतिभा या निर्गुण निराकार अवधारणा के रूप में स्वीकार करना होगा। (५-१०-२०१०)

3 टिप्‍पणियां:

ललित शर्मा-ললিত শর্মা ने कहा…

सार्थक लेखन के लिए बधाई
साधुवाद

लोहे की भैंस-नया अविष्कार
आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर

cmpershad ने कहा…

"वस्तुतः यह सब मिथ्या तथा कल्पित था, लेकिन इस तरह के उपदेश करने वालों को ज्ञानी व सिद्ध समझा जाने लगा। "

इसी भटकाव से ‘गुरु’ लोगों का धंधा जो चलता है :) एक गम्भीर और सार्थक चिंतन के लिए आभार॥

Hindi Choti ने कहा…


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