बुधवार, 4 अगस्त 2010

पृथक तेलंगाना की आकांक्षा का जयघोष



तेलंगाना क्षेत्र की कुल 119 विधानसभा सीटों में से केवल 12 सीटों के लिए उपचुनाव हुए थे। तर्क के लिए यह कहा जा सकता है कि केवल 12 सीटों के चुनाव परिणामों को पूरे तेलंगाना क्षेत्र की जनाभिव्यक्ति नहीं कहा जा सकता, लेकिन सच्चाई यह है कि 12 सीटों के लिए हुआ यह चुनाव केवल विधानसभा की खाली हुई 12 सीटों को भरने का उपक्रम नहीं, बल्कि तेलंगाना क्षेत्र में कराया गया एक जनमत संग्रह था। इन 12 सीटों के चुनाव में वस्तुतः पूरे 119 सीटों की जनभावनाएं सिमटी हुई थीं। पृथक तेलंगाना की मांग के संदर्भ में जनभावनाओं की जांच पड़ताल के लिए गठित श्रीकृष्णा समिति के समक्ष पूरे क्षेत्र का यह सर्वाधिक सशक्त एवं प्रमाणिक ज्ञापन है, जिसे वह अपनी रिपोर्ट का आधार बना सकता है। निर्णय अंततः केंद्र सरकार अथवा हाईकमान को ही लेना है, फिर भी इतना तो कहा जा सकता है कि इस मामले में अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह गयी है कि तेलंगाना क्षेत्र की वास्तविक आकांक्षा क्या है।






शुक्रवार, 30 जुलाई का दिन भी तेलंगाना के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया है। 27 जुलाई को मतदान को केवल उपचुनाव की 12 विधानसभा सीटों के लिए हुआ था, लेकिन इस दिन घोषित उसके परिणामों में पूरे तेलंगाना क्षेत्र के करीब 4 करोड़ निवासियों की पृथक राज्य की कामना अट्टहास कर रही थी। पृथक तेलंगाना और संयुक्त आंध्र दोनों नावों पर पैर रखने वालों का पूरा सफाया हो गया था। सबसे बुरी हालत उस तेलुगु देशम पार्टी की थी, जिसके नेता चंद्रबाबू नायुडू तेलंगाना और आंध्रा दोनों को अपनी दो आंखें बता रहे थे और ऐन इस चुनाव के दौरान बाभली परियोजना का हंगामा खड़ा करके इस क्षेत्र के लोगों का ध्यान तेलंगाना से हटाकर बाभली की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे थे। चुनाव में वह चैथे स्थान पर रहे और कुल मतदान का छठवां हिस्सा भी अपनी झोली में नहीं ला सके, जिससे कि उनके उम्मीदवारों की जमानतें बच जाती। उनकी दोहरी नीति के कारण तेलंगाना क्षेत्र में उनकी पार्टी के अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा हो गया है। पार्टी के कार्यकर्ता तेजी से पलायन कर रहे हैं और अपना भविष्य बचाने के लिए इस आंदोलन के सर्वनेता कालवेंकटला चंद्रशेखर राव की पार्टी टी.आर.एस. की शरण ले रहे हैं।

सीट तो कांग्रेस को भी कोई नहीं मिली, लेकिन उसकी हालत तेलुगु देशम के मुकाबले थोड़ी बेहतर थी, तो शायद केवल इसलिए कि क्षेत्र की जनता यह समझ रही थी कि उसके क्षेत्रीय नेता व कार्यकर्ता बेचारे असहाय हैं, क्योंकि वे पार्टी हाईकमान का निर्देश मानने को बाध्य हैं। लेकिन उसने पार्टी के राज्य अध्यक्ष धर्मपुरी श्रीनिवास को कतई माफ नहीं किया, जो अंतिम क्षणों में स्वर बदलकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना चाहते थे। उन्हें लगातार दूसरी बार मंुह की खानी पड़ी। 2009 के चुनाव में भी वह भारतीय जनता पार्टी के येंदला लक्ष्मी नारायण के मुकाबले चुनाव हार गये थे। तेलंगाना के मसले पर जनता की राय जानने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्णा समिति की निर्धारित शर्तों -टम्र्स आफ रिफरेंसेज- के खिलाफ विधानसभा से इस्तीफा देने वाले टी.आर.एस. विधायकों के साथ लक्ष्मीनारायण के भी इस्तीफा दे दिये जाने के कारण श्रीनिवास को फिर एक बार भाग्य आजमाने का मौका मिल गया। यद्यपि यह कतई बुद्धिमत्ता का निर्णय नहीं था। स्वयं उनकी पार्टी यह उपचुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा पूर्ण करने के लोभ में अपने साथ पार्टी को भी इस दलदल में घसीटा। उन्हें लग रहा था कि यदि वह चुनाव जीत गये, तो वह मुख्यमंत्री की कुर्सी भी हासिल कर सकते हैं, नहीं तो तेलंगाना के नाम पर कम से कम उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तो पक्की ही है। वास्तव में धर्मपुरी श्रीनिवास जी 2004 से ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए बेताब हैं। 2004 में वाई.एस.आर. के साथ उन्होंने उस चुनाव अभियान का नेतृत्व किया था, जिसमें पार्टी को भारी सफलता मिली थी और केंद्र तथा राज्य दोनों स्थानों पर पार्टी को सत्ता में आने का अवसर मिला था। उनकी नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। पार्टी की राज्य इकाई का अध्यक्ष होने के नाते वे उस पर अपना पहला अधिकार मानते थे, लेकिन बाजी वाई.एस.आर. जीत गये। चुनावी सफलता में उनकी ऐतिहासिक पदयात्रा को अधिक महत्व मिला और मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके हाथ में चली गयी। उस दुर्भाग्यपूर्ण हेलीकॉप्टर दुर्घटना में वाईएसआर के निधन के बाद श्रीनिवास की महत्वाकांक्षा पूरी हो सकती थी, लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि 2009 के चुनाव में वह विधानसभा का चुनाव जीतने में विफल हो गये थे। इसलिए भाग्यलक्ष्मी वरमाला कोणिजेटी रोशय्या के गले जा पड़ी और मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें मिल गयी। यह सभी मान रहे हैं कि रोशय्या इस पद के स्वाभाविक अधिकारी नहीं हैं। वह केवल कार्यवाहक की भूमिका निभ रहे हैं। जैसे ही उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी सामने आया, वह उसके लिए आसन रिक्त कर देंगे। श्रीनिवास जी इसी लोभ में यह खतरा उठाने के लिए मैदान में कूद पड़े। उन्होंने अपना स्वर ही नहीं बदला, बल्कि पैसा भी पानी की तरह बहाया। 20-25 करोड़ के खर्चे का तो साधारण अनुमान है। उन्होंने प्रायः हर चुनावी सभा में यह दोहराया कि पृथक तेलंगाना की मांग को केवल कांग्रेस पूरा कर सकती है। उन्होंने यह संकेत देने में भी कोई संकोच नहीं किया कि यदि वह चुनाव जीत गये, तो वह मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री अवश्य बनेंगे और तब वह तेलंगाना का भाग्य पलट कर रख देंगे, किंतु मतदाताओं ने उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। परिणाम यह हुआ कि इस बार वह 2009 के मुकाबले कुछ अधिक वोट से ही हारे। मतगणना के समय एक बार को ऐसा जरूर लगा कि वह चुनाव जीत सकते हैं, जब भाजपा प्रत्याशी की बढ़त 24000 मतों से घटकर 52000 पर आ गयी, लेकिन अंतिम तीन चक्रों ने फिर पासा पलट दिया और श्रीनिवास की सारी आशाओं पर तुषारापात हो गया।

रोशय्या व बाबू दोनों में से किसी ने चुनाव प्रचार में भाग नहीं लिया। रोशय्या तो निरपेक्ष भाव से बैठे रहे, लेकिन बाबू ने सोचा होगा कि उनका बाभली अभियान शायद अधिक प्रभावशाली सिद्ध हो। तेलंगाना क्षेत्र के करीब 5 जिले उसके प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। लेकिन टी.आर.एस. नेता चंद्रशेखर राव अपने चुनाव अभियान में जुटे रहे। उन्होंने बाबू के बाभली अभियान की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। ‘एक ही साधे सब सधै-सब साधे सब जाए’। चंद्रशेखर राव यह समझते हैं कि लक्ष्य से भटकाव नुकसान पहंुचा सकता है। यह उनका अपना निजी अनुभव भी है, इसलिए वह चुनाव मैदान में ही डटे रहे। उनके लिए यह जीवन मृत्यु का प्रश्न भी था। 12 से एक भी कम सीट मिलती, तो कहा जा सकता था कि संपूर्ण तेलंगाना पृथक तेलंगाना के पक्ष में नहीं है, लेकिन अब किसी को भी कोई संदेह व्यक्त करने का कोई अवसर नहीं है। चंद्रशेखर राव के सामने लक्ष्य स्पष्ट था। वह जानते थे कि यह चुनाव सत्ता के लिए नहीं था। यह चुनाव यह प्रमाणित करने के लिए था कि वास्तव में तेलंगाना की आम जनता क्या चाहती है। इसीलिए परिणामों की घोषणा के बाद भी चंद्रशेखर राव ने यह साफ घोषणा की कि यदि जरूरत पड़ी तो उनके विधायक फिर अपनी सदस्यता से इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं। यह चुनाव जीतने का मतलब यह नहीं है कि वे बाकी के चार साल विधानसभा में बैठकर बिताएंगे। हम विधानसभा की पुनर्सदस्यता के लिए नहीं पृथक तेलंगाना की उत्कट जनभावना को प्रमाणित करने के लिए मुकाबले में उतरे थे। इसीलिए उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह इन चुनाव परिणामों को जनमत संग्रह की तरह स्वीकार करे और पृथक राज्य के लिए सीधे लोकसभा में प्रस्ताव पेश करे। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भी सलाह दी कि वे बहुत उत्तेजित न हों, क्योंकि इन चुनाव परिणामों ने उनके कंधे पर एक जबर्दस्त जिम्मेदारी डाल दी है। यह सही भी है, क्योंकि इन चुनाव परिणामों से ही यह सुनिश्चित नहीं हो गया है कि केंद्र सरकार पृथक तेलंगाना राज्य की मांग स्वीकार कर लेगी। प्याला होंठों तक पहुंचे, इसके बीच असंख्य बाधाएं खड़ी हो सकती हैं, लेकिन इन चुनावों से इतना तो अवश्य तय हो गया है कि तेलंगाना निवासी पृथक तेलंगाना के सवाल पर पूरी तरह एकमत है। इस पर निर्णय के लिए अब श्रीकृष्णा समिति को भी कोई खास मशक्कत करने की आवश्यकता नहीं रह गयी है। तेलंगाना की राय स्पष्ट है। अब न्यायमूर्ति श्रीकृष्णा को अपनी न्याय बुद्धि का इस्तेमाल करे अपनी रिपोर्ट देना है। उनकी समिति का कार्यकाल 31 दिसंबर तक है, लेकिन वह चाहें तो उसके पहले भी अपनी रिपोर्ट दे सकते हैं। सच यह है कि उन्हें न्यायिक औपचारिकताएं पूरी करने में जो भी समय लगे, लेकिन उनके सामने निर्णय की कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। इन उपचुनावों का परिणाम क्या आएगा, इसके बारे में कोई बहुत मतभेद पहले भी नहीं था। प्रायः सभी यह मानकर चल रहे थे कि टी.आर.एस. अपनी सभी सीटें जीतकर वापस लौटेगी। हां, एक-दो सीट कांग्रेस के हाथ लग सकती है। लेकिन शायद किसी को भी इस बात का अनुमान नहीं था कि टी.आर.एस. के प्रतिनिधि इस तरह के रिकार्ड तोड़ बहुमत से जीत हासिल करेंगे। चंद्रशेखर राव के भतीजे हरीश राव ने तो कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर के बहुमत का पिछला रिकार्ड तोड़कर एक नया रिकार्ड बनाया है। वाईएसआर ने पुलिवेंदुला से 68 हजार मतों से जीत का सार्वेच्च रिकार्ड बनाया था, लेकिन हरीश राव ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 95,858 वोटों से पराजित किया है। एक-दो को छोड़कर ज्यादातर उम्मीदवार 40 हजार से उूपर की संख्या में चुनाव जीते हैं।

लोग चकित हैं, ऐसा कैसे हुआ। ऐसी जीत की आश तो स्वयं टी.आर.एस. नेताओं ने भी नहीं की थी। लेकिन यह कोई रहस्य की बात नहीं। पिछले लगभग एक वर्ष में तेलंगाना आंदोलन इस पूरे क्षेत्र के गांव कस्बों तक फैल गया है। यह अब केवल हैदराबाद या अन्य बड़े शहरों का आंदोलन नहीं रहा। इस आंदोलन के दौरान गांव, कस्बे स्तर के स्कूल कॉलेजों में छात्रों ने संयुक्त कार्रवाई समितियां -ज्वाइंट एक्शन कमेटीज- बना ली, जिनके साथ अध्यापक, वकील, डॉक्टर व अन्य बुद्धिजीवी व प्रोफेशनल भी जुड़ गये। क्षेत्रीय जनसंगठनों के नेता कार्यकर्ता भी इसमें कूद पड़े। इस आंदोलन में आर्य समाज का भी भारी योगदान रहा। कभी निजामशाही के खिलाफ आंदोलन में उतरे इस संगठन ने पृथक तेलंगाना निर्माण के अभियान में भी अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। आंध्र प्रदेश आर्य समाज के प्रधान विट्ठलराव स्वयं टी.आर.एस. में शामिल होकर इस आंदोलन को जनजन तक फैलाने में लग गये। उपचुनावों की घोषणा हुई तो इस आंदोलन से जुड़ा हर व्यक्ति-छात्रों से लेकर प्रोफेसर, वकील, डॉक्टर व सरकारी कर्मचारी तक स्वतः चुनाव प्रचारक बन गया और उसमें टी.आर.एस. को जिताने का अभियान छेड़ दिया। इस अभियान का ही यह परिणाम रहा कि मतदान प्रतिशत इतना उंचा 64 से 68 प्रतिशत तक पहुंच गया।

यह उपचुनाव लड़ा तो जरूर पार्टियों के आधार पर गया, लेकिन इसमें जो जीत हासिल हुई, वह किसी एक पार्टी की नहीं। तेलंगाना राष्ट्र् समिति या टी.आर.एस. को वास्तव में पृथक तेलंगाना का प्रतीक मानकर जिताया गया। यही कारण है कि उसकी शत-प्रतिशत जीत से तेलंगाना क्षेत्र की प्रायः सभी पार्टियों के नेता व कार्यकर्ता प्रसन्न हैं। वे कंग्रेस के हों, तेलुगु देशम के हों या अन्य किसी पार्टी के। वामपंथी पार्टियों में सी.पी.आई. तो खुलेआम पृथक तेलंगाना की पक्षधर है ही, लेकिन सी.पी.एम. ने भी चुनाव के मामले में अपने कार्यकर्ताओं को खुली छूट दे दी कि वे जिसे चाहे अपना मत दें। इस तरह सिद्धांततः वह भले पृथक तेलंगाना राज्य निर्माण के विरुद्ध हो, किंतु व्यवहार में उसके पूरे काडर ने टी.आर.एस. को अपना समर्थन दिया।

पृथक तेलंगाना के जयघोष के साथ इन जिन चुनाव परिणामों की घोषणा हुई है, उससे कांग्रेस के खेमे में चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। इन परिणामों के बाद राज्य की राजनीति में कुछ चैंकाने वाले बदलाव भी दिखयी दे सकते हैं। टी.आर.एस. ने पहले ही घोषणा कर दी है कि आगे जो भी चुनाव आएंगे, उसे वह अपने बलबूते पर लड़ेगी। किसी से साझेदारी नहीं करेगी। कांगे्रस की चिंता यह है कि उनकी वर्तमान राजनीतिक स्थिति यदि आगे भी ऐसी ही बनी रही, तो पंचायत चुनावों में उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ेगा। इस उपचुनाव ने इतना तो प्रभावित कर ही दिया है कि किसी भी पार्टी की दोहरी चाल सफल होने वाली नहीं। इसलिए जो ज्यादा चतुराई दिखाने की कोशिश करेगा, वह ज्यादा नुकसान उठाएगा। यह कहा जा सकता है कि गेंद अब फिर केंद्र सरकार के पाले में है। टी.आर.एस. को या तेलंगाना की जनता को जो कुछ प्रमाणित करना था, वह प्रमाणित कर दिया है, जो संदेश देना था, वह संदेश भी दे दिया है। अब निर्णय केंद्र को करना है। निर्णय आसान नहीं है, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि पृथक तेलंगाना का लक्ष्य थोड़ और नजदीक अवश्य आ गया है। 1.8.2010

सोमवार, 2 अगस्त 2010

आध्यात्मिक गुरुओं की सामाजिक भूमिका का प्रश्न

आध्यात्मिक गुरुओं की सामाजिक भूमिका का प्रश्न





वाल्मीकि, व्यास प्रभुति गुरुओं एवं आचार्यों की पूरी परंपरा -तुलसी पर्यंत- सामाजिक उद्देश्यों के प्रति समर्पित रही है, किंतु आज अपवादों को छोड़कर प्रायः सारे धार्मिक गुरु एवं आचार्य केवल आध्यात्मिक साधना का ही उपदेश देते हैं और स्वयं सत्य की साधना से अधिक निजी सुविधा और वैभव की साधना में निमग्न रहते हैं। धर्माचार्यों की परंपरा में केवल जैन परंपरा ऐसी रह गयी है, जिसके साधु-साध्वी अभी धन संजय से विरत हैं, किंतु सुविधा तथा वैभव भोग की प्रवृत्ति उनमें भी बढ़ती जा रही है। ऐसे में क्या उपयोगिता रह गयी है उन परंपराओं के निर्वाह की, जो हजारों वर्षों से मात्र एक रुढ़ि निर्वाह के रूप में चली आ रही है।



वर्षाऋतु के प्रारंभ के साथ ही संन्यासियों, जैन संतों तथा साधक साधु साध्वियों का चातुर्मास व्रत पारंभ हो गया है। सनामन धर्मावलंबीजन आषढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से चातुर्मास का का प्रारंभ करते हैं। जैन समाज की विवध शाखाओं के संत व साध्वीवृंद अलग-अलग तिथियों से अपना चातुर्मास प्रारंभ करते हैं। सामान्यतया आषाढ़ मास की पूर्णिमा इसकी सर्वाधिक मान्य तिथि है, जब चातुर्मास साधना व व्रत का काल शुरू हुआ माना जाता है। यह पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा के रूप में भी मनायी जाती है। माना जाता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास, जिन्हें कृष्ण द्वैपायन व्यास के नाम से भी जाना जाता है -संपूर्ण भारतीय संस्कृति के अधिष्ठाता आचार्य। अपने युग के संपूर्ण भाषा निबद्ध ज्ञान का संकलन, विभाजन और संपादन का अद्भुत कार्य उनके द्वारा किया गया। वेदों के संपादन के अतिरिक्त उन्होंने महाभारत जैसे विराट इतिहास ग्रंथ तथा ‘ब्रह्मसूत्र’ जैसे दर्शन ग्रंथ की भी रचना की। 18 पुराणगंरथों की रचना श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है। ऐसे महान आचार्य की जन्मतिथि को यदि सभी गुरुओं एवं आचार्यों की स्मृतितिथि के रूप में मनाया जाने लगे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। उनकी जन्मतिथि की ठीक-ठीक जानकारी किसी को हो, यह तो असंभव ही है, इसलिए यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि चातुर्मास के प्रारंभ की पूर्णिमा को ही प्रतीक रूप में उनकी जन्मतिथि स्वीकार कर लिया गया। वर्षाकालीन साधना पर्व के प्रारंभ में महान आचार्य वेदव्यास के प्रति श्रद्धा अर्पित करना स्वभावतः प्रत्येक भारतीय का प्रमुख कर्तव्य है।

चातुर्मास आजकल केवल जैन समाज के साथ जुड़ा रह गया है। थोड़े से कुछ संन्यासी भी वर्षाकाल के इन चार महीनों में अपनी यात्राएं रोक देते हैं तथा किसी एक ही स्थान पर रहकर साध्ना व सदुपदेश करते हुए अपना समय व्यतीत करते हैं। अन्यथा बाकी समुदायों के लिए इसका कोई विशेष अर्थ नहीं रह गया है। फिर भी चातुर्मास की यह परंपरा बहुत पुरानी है। शायद वैदिक काल में भी यह प्रचलित थी। वास्तव में यह ऋतु पर्व है। इसलिए वैदिक गं्रथों में तीन ‘चातुर्मासों’ का वर्णन आता है, जो तीन प्रमुख ऋतुओं से संबद्ध है। पहला चातुर्मास फाल्गुन अथवा चैत्र से प्रारंभ माना जाता था और यह ‘वैश्वदेव’ (विश्वदेवता) के लिए समर्पित था। यह बसंतकालीन चातुर्मास था। दूसरा वर्षाकालीन चातुर्मास आषाढ़ पूर्णिमा -या आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी- से प्रारंभ होता था। इसे ‘वरुण प्रघास’ कहते थे। यह शायद वरुण (जल) और घास (जो खाया जाए अर्थात अन्न) को समर्पित था, इसलिए इसे ‘वरुण प्रघास’ कहते थे। वर्षा के काल आकाश से जल की झड़ी लग जाती थी, तो धरती से असंख्य अंकुर फूट पड़ते थे, जिससे पूरी धरती वनस्पतियों और तृण -घास- से भर जाती थी। कार्तिक पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाले शारदीय या हेमंत चातुर्मास को ‘साकमेघ’ की संज्ञा दी गयी थी। इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या था, यह स्पष्ट नहीं है, किंतु शायद यह भी शरदकालीन कृषि से संबद्ध था।

प्राचीन गं्रथों के अनुसार आषाढ़ की पूर्णिमा, एकादशी या द्वादशी को जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है, तब चातुर्मास व्रत का प्रारंभ होता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि चातुर्मास व्रत का प्रारंभ चाहे जिस तिथि को हो, किंतु उसका समापन कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जहां देवशयनी या हरिशयनी (देवताओं की सोने की) की एकादशी के नाम से जाना जाता है, वहीं कार्तिक शुक्लपक्ष की एकादशी को ‘देवोत्थानी’ (देवताओं के जागने की) कहा गया है। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी को सभी देवतागण सो जाते हैं और फिर चाह महीने बाद देवोत्थानी एकादशी को जगते हैं। देवताओं का शयनकाल मानकर ही इन चार महीनों में कोई शुभ कार्य विवाहादिक नहीं किया जाता है। लेकिन वास्तव में यह देवशयनी ओर देवोत्थानी एकादशी वर्षा के ऋतुकाल की एक कविकल्पना मात्र है। सूर्य वैदिक ऋषियों में सबसे बड़े देवता थेे। उनकी ही गति से धरती का सारा जीवन संचालित होता था। विष्णु और हरि आदि नाम ‘सूर्य’ के ही पर्याय हैं। वर्षाकाल में अधिकांश समय सूर्यदेवता अधिकतर बादलों में छिपे रहते हैं, इसलिए वैदिककालीन किसी कवि ने कह दिया कि वर्षा के इन चार महीनों में हरि (सूर्यदेव) सो जाते हैं। धरती पर उनकी उूष्मा व प्रकाश का पहुंचना कम हो जाता है। फिर जब वर्षाकाल समाप्त हो जाता है, तो वह जागृत हो जाते हैं। वस्तुतः ये व्रत-त्यौहार व परंपराएं जिन दिनों की हैं, उन दिनों वर्षाकाल में कहीं इधर-उधर जाना सचमुच बहुत कठिन और खतरे से भरा था। धरती पर सर्वत्र नव वनस्पतियों के उग जाने से मार्ग खो जाते थे। छोटे-छोटे नदी नालों में बहने वाला पानी भी रास्तों को छिन्न-भिन्न कर देता था। सर्पादिक जंतुओं का भी खतरा बढ़ जाता था। इसलिए सुरक्षा व सुविधा के लिए यह आवश्यक हो जाता था कि निरंतर भ्रमण करने वाले साधु, संत, संन्यासी, परिव्राजक व्यापारी आदि वर्षाकाल बितान के लिए कहीं किसी ग्राम, नगर आदि में ठहर जाते थे, जहां आहार का कष्ट न हो और सुरक्षित वातावरण में कालयापन किया जा सके।

विकास के इस युग में इस सबकी अब कोई आवश्यकता नहीं रह गयी है, फिर भी कुछ लोग हजारों वर्ष पूर्व मजबूरी में अपनायी गयी प्रथाओं का आज भी निर्वाह करते आ रहे हैं। जैन समाज के लिए तो ये चार महीने अद्भुत उत्साह व उत्सव के दिन होते हैं। साधु, साध्वियों एवं आर्चिकाओं के प्रभाव में तमाम श्रावक, श्राविकाएं या उपासक-उपासिकाएं भी तरह-तरह के कठिन व्रत, जप, अनुष्ठान आदि का आयोजन करते हैं। बहुत से साधु, संत एवं मुनिगण अपनी आत्मिक साधना के साथ अपने अनुयायियों के चरित्र निर्माण, व्यसन मुक्ति तथा परंपरा पालन हेतु उपदेशों की श्रृखला चलाते हैं। इनसे समाज को लाभ भी होता है, किंतु परंपरा में बंधे साधु संत परंपराओं की सीमा में ही अपने उपदेश देते हैं। वे आज की सामाजिक व राष्ट्रीय समस्याओं से टकराने का खतरा नहीं मोल लेते।

महर्षि व्यास ने अपने युग की समस्याओं से टकराने की कोशिश की थी। उन्होंने दर्शन, धर्म, राजनीति व सामाजिक आचार जैसे प्रायः सभी महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर एक आदर्श स्थापित करने की कोशिश की।

भगवद्गीता जैसा दार्शनिक गं्रथ उनके महान ऐतिहासिक महाकाव्य का एक अंश मात्र है, जिसमें उन्होंने कर्म की श्रेष्ठता का प्रतिपादन का है। यद्यपि बाद के अनेक दार्शनिक आचार्यों ने अपने मत की स्थापना के लिए अपने विचारों वाले बहुत से श्लोक उसमें डाल दिये, जिससे वह एक अत्यंत जटिल गं्रथ बन गया, अन्यथा उसमें कर्म की श्रेष्ठता का जैसा प्रतिपादन किया गया है, अन्यथा कहीं भी दुर्लभ है। आज की जाति-वर्ण संबंधी समस्याएं व्यास के अपने युग में भी थीं, किंतु व्यास ने तार्किक ढंग से उनका निराकरण करने की कोशिश की। यह जरूरी नहीं कि उनके समाधान आज भी इस्तेमाल में लाएं जाएं, लेकिन उनकी प्रगतिशीलता से तो आज भी प्रेरणा ली जा सकती है। महाभारत में कृष्ण के मुख से उन्होंने कहलवाया है कि अब तक समाज में रक्त मिश्रण इतना हो चुका है कि वंश पंरपरा के हिसाब से किसी का वर्ण निर्धारण नहीं किया जा सकता। वर्ण का निर्धारण अब केवल गुण और कर्म के आधार पर ही हो सकता है। वहां कृष्ण का वचन है- ‘चातुर्वूयम् मयाकृत्यम् गुण कर्म विभागशः’ अर्थात समाज का चार वर्णों में विभाजन मैंने गुण (स्वभाव) व कर्म के आधार पर किया है। यानी जन्म से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह छोटा सा उल्लेख मात्र एक उदाहरण के लिए किया गया है। उद्देश्य यह कहना है कि आज के आचार्यों को भी परंपरा का अंधानुकरण करने के बजाए समाज की तात्कालिक आवश्यकताओं को देखते हुए उसके समक्ष उत्पन्न चुनौतियों के निराकरण का उपाय ढूंढ़ना चाहिए। जो पुराना है, वह अच्छा भी हो, यह जरूरी नहीं (कालिदास के शब्दों में) पुराणमित्येव न साधु सर्वम- और इसी तरह जो नया है, वह सब बुरा ही हो, यह भी जरूरी नहीं।

हमारे देश की यह एक गंभीर समस्या रही है कि हमारे यहां व्यास-वाल्मीकि की परंपरा वाले आचार्यों से भिन्न आचार्यों ने लौकिक जीवन पर पारलौकिक जीवन को इस तरह थोप दिया कि पूरा लौकिक जीवन ही निरर्थक हो गया। आध्यात्मिक जीवन और उसके साथ जुड़े आचार का महत्व इतना अधिक बढ़ गया कि उससे भिन्न जीवनशैली वाले निंदित एवं हीन कोटी में आ गये। यह सही है कि यहां ऐसे भी आचार्य हुए और ऐसी दार्शनिक शाखाएं भी विकसित हुईं, जिन्होंने शूद्र (अशिक्षित या संस्कारहीन) को उच्च आध्यात्मिक जीवन एवं मोक्ष से वंचित कर दिया। पूर्व मीमांसा स्कूल को इस मामले में अग्रणी कह सकते हैं, जिसने शूद्रों के लिए वेदाध्ययन व यज्ञ संपादन वर्जित कर दिया, लेकिन उस शाखा के प्रारंभिक काल में भी ऐसे आचार्य हुए, जैसे महर्षि बादीर, जिन्होंने यह मत प्रतिपादित किया कि शूद्र भी वेदाध्ययन कर सकते हैं और यज्ञ भी संपादित कर सकते हैं। महाभारत के रचयिता व्यास ने तमाम रूढ़िवादी आचार्यों के विचारों का खंडन करते हुए अपने ग्रंथ में स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया। विदुर पारंपरिक ब्रह्मविद्याविद थे। कृष्ण ने दुर्योधन का राजकीय आतिथ्य छोड़कर विदुर के घर जाकर भोजन करना श्रेयस्कर समझा था। महाभारत के ही वन पर्व में धर्मव्याध की कहानी हाती है, जो शूद्र था, किंतु ब्रह्मविद्या का ज्ञाता था। वैदिक काल में भी रथकार को वैदिक अग्नि प्रतिष्ठापित करने की अनुमति दी गयी थी। भागवतपुराण तो यहां तक कहता है कि जन्म से चांडाल, लेकिन विष्णु भक्त वैष्णव उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ हैं, जो जन्म से तो ब्राह्मण है, किंतु विष्णु भक्त या आचारवान नहीं है।

भारतीय परंपरा का मूल प्रेरक तत्व यह है कि गलत रूढ़ियों का खंडन करने वाला कोई न कोई आचार्य उसी मूलधारा से पैदा होकर आगे आया, जिसने प्रगतिशीलता का मार्ग दिखाया। वैदिक यज्ञों की हिंसा और संकीर्ण स्वार्थ के लिए उनके प्रतिपादन के विरुद्ध उन यज्ञवादियों में से ही कोई उठ खड़ा हुआ। अफसोस की बात यह है कि हमारे देश की गुरु परंपरा में वह गतिशीलता नहीं रह गयी है, जो प्राचीनकाल के आचार्यों में थी। निर्वाण, अर्हतपद, मोक्ष या मुक्ति की आकांक्षा पालने का आज कोई औचित्य नहीं रह गया है, लेकिन विभिन्न पंथों के गुरु या आचार्य अभी भी देश की आम जनता को उसी में भरमाए हुए हैं।

आज के भारत को यदि उदाहरण के रूप में लें, तो यहां धर्म (रिलीज)- और भाषा की भी जाति बन गयी है। जातियां चूंकि राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने का साधन बन गयीं हैं, इसलिए जातिवाद खत्म होने के बजाए और और बढ़ रहा है और संघर्ष की जो स्थितियां मध्यपूर्व में विभिन्न धर्मों (रिलीजन) के कारण पेदा हुई थी (और आज भी चल रही हैं) वे इस देश में जाति के नाम पर पनप रही हैं। मनुष्यमात्र की यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जब वह एक समाज के तौर पर संगठित होता है, तो वह अपनी एक पहचान बनाना चाहता है। अपने देश में इस पहचान के लिए दो प्राकृतिक आधार चुने गये, एक जन्म का दूसरे व्यवसाय का। जन्म के आधार पर जाति बनी और व्यवसाय चयन के आधार पर वर्ण। देश की राजनीतिक व्यवस्था में जातियों को अपना आचार व्यवहार तय करने की पूरी स्वतंत्रता प्राप्त थी, इसलिए व्यवसाय और जन्म के आधार पर जातियों के संगठन बन गये। धर्म शास्त्रकारों ने चयनित व्यवसाय के आधार पर वर्णों के धर्म तो निर्धारित किये, जातियों के नहीं। जातियां अपनी व्यवस्था तय करने के लिए स्वतंत्र थीं। बस उन्हें वर्णधर्मों के उल्लंघन का अधिकार नहीं था। इस जातीय संगठन निर्माण की सुविधा ने इस देश में धार्मिक पहचान वाला कोई समाज नहीं बनने दिया। धार्मिक (रिलीजन) आचार्य अपने धार्मिक विश्वासों का प्रचार करते थे, लोग सुनते थे। जिन्हें जो पसंद आता था, उसका पालन करते थे, किंतु अपने सामाजिक व राजनीतिक जीवन के लिए अपने जातीय समुदाय के नियमों का ही अनुसरण करते थे। इसलिए यत्रतत्र कुछ गुरुओं के चेलों के बीच कहीं छोटा-मोटा संघर्ष भले हुआ हो, लेकिन अनुयायियों के समूह के बीच कभी कोई धार्मिक (मजहबी) संघर्ष नहीं हुआ। यह इस देश में जाति प्रथा का सबसे बड़ा वरदान था कि क्रुसेड व जिहादी जैसी कोई अवधारणा इस देश में नहीं पनप सकी। जाति समूहों की स्वतंत्रता के कारण इस देश में लोकतंत्र या गणतंत्र की भावना भी मजबूत हुई। हर जाति समूह अपने आप में लोकतांत्रिक समूहों को मिलाकर एक गांव बनता था। राजा केवल उन्हें सुरक्षा और न्याय की गारंटी देता था। किसी प्राकृतिक आपदा के समय उसे सुरक्षा और सहायता प्रदान करना भी राजा का कर्तव्य होता था। बाकी अन्य किसी मामले में लोगों के आपसी जीवन में राजा या राजनीति का कोई हस्तक्षेप नहीं रहता था। इस देश में ऐसी व्यवस्था कम से कम गुप्त युग तक तो जारी ही थी, जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कहा जाता है। कालिदास गुप्त युग की ही विभूति थे। उनके शाकुंतलम् नाटक के अंत में जब राजा दुश्यंत की मुलाकात मतंग ऋषि के आश्रम में अपने बेटे भरत से होती है, तो ऋषि, दुश्यंत को उनके पुत्र भरत को सौंपते हुए आशीर्वाद देते हैं कि वे लाखों लोकतंत्रों के अधिपति बने । इस आशीर्वाद से ही स्पष्ट है कि उस काल में राजा और राजनीति की सीमा तथा भूमिका क्या थी। आधुनिक युग के पिछले करीब 200 वर्षों के इतिहास पर नजर डालें, तो देश के पतन का दायित्व इस देश के अन्य दुर्गुणों पर अधिक जाएगा, जातिवाद पर कम। उदाहरण के लिए दक्षिण भारत के ही इतिहास का एक नमूना लें। 1818 में जब अंगे्रजों ने दक्षिण भारत पर अपना अधिकार जमाया, उस समय यह पूरा क्षेत्र करीब 600 छोटी बड़ी रियासतों में विभक्त था। इनमें से बमुश्किल एक दर्जन पर ब्राह्मणों का आधिपत्य रहा होगा। बाकी क्षत्रियों तथा अन्य जातियों के हाथ में थी। जो कुछ व्यापार वाणिज्य था, वह भी भाटियों, बनियों, मारवाड़ियों, जैनों और लिंगायतों के हाथ में था। ये सभी अवसरवादी और सुविधाभोगी थे। धार्मिक (रिलीजन) आचायों का तब भी उन पर प्रभाव था, लेकिन उन्होंने स्वातंत्र्य की कोई पे्ररणा नहीं दी। स्वतंत्रता की अलग जगाने के लिए तिलक जैसे ब्राह्मण को फिर महाभारत की गीता का सहारा लेना पड़ा।

आज के धार्मिक आचार्य भी सुविधा भोगी हो गये हैं। वे सदाचार, शांति, अहिंसा और सहिष्णुता का उपदेश तो देते हैं, किंतु अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष व प्राणाहुति का कोई उपदेश नहीं देते। आश्चर्य होता है उन दिगंबर जैनाचार्यों को देखकर जो सजी धजी पालकियों में बैठकर अपना जुलूस निकलवाते हैं, घड़ों दूध से अपने पैर धुलवाते हैं, स्त्री समूहों से पादवंदना कराते हैं। इसी तरह जगद्गुरु उपाधिकारी शंकराचार्य, रामानुजाचार्य आदि पीठाधीश्वर सोने चांदी के सिंहासनों पर बैठकर चांदी के पात्रों में भोजन करते हैं। सोने चांदी के तारों से बनाये गये छत्र धारण करते हैं और त्याग तपस्या का उपदेश देते हैं। क्या आदि शंकराचार्य या आदि रामानुजाचार्य का जीवन भी ऐसा ही वैभव विलासपूर्ण रहा होगा। क्या महावीर स्वामी ने ऐसी ही सजी पालकियों में बैठकर कभी नगर भ्रमण किया होगा। सवाल है, क्या अर्थ रह गया है आज की चातुर्मास साधना, गुरुपूर्णिमा या गुरुपूजा का। क्या आज के तमाम संप्रदायाचार्यों, गुरुओं तथा पीठाधीश्वरों को आज के भारत देश व समाज की कोई चिंता है? क्या उन्हें अहसास भी है उन चुनौतियों का जो आज देश के सामने खड़ी हैं? भारत के एक राष्ट्र् का स्वरूप लिए 6 दशक से अधिक हो गये हैं, लेकिन इस देश् के धर्मगुरु अभी भी हजार साल पहले के सामंती युग में जी रहे हैं, जब राष्ट्र् की कोई कल्पना नहीं थी। और यदि कोई राष्ट्र्ीय संदर्भ में सोचता भी है, तो वह उन चुनौतियों से टकराना नहीं चाहता, जो राष्ट्र् के सामने सबसे बड़ा ख्तरा बनकर खड़ी हैं।

वैयक्तिक विकास तथा आत्मिक शांति के लिए आध्यात्मिकता उपयोगी हो सकती है, लेकिन देश की राष्ट्र्ीय एकता, अस्मिता और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए राजनीति व समाज नीति पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, आज इसीलिए व्यास, वाल्मीकि, तुलसी, विद्यारण्य स्वामी, स्वामी रामदास जैसे गुरुओं की आवश्यकता है। आज के गुरु उनके जैसे नहीं बन सकते, तो उनका अनुकरण तो कर ही सकते हैं। आज के समय में गुरु पूर्णिमाएं तभी सार्थक हो सकती हैं, जब आज के गुरु पहले स्वयं अपने को रुढ़ियों से मुक्त करें, फिर देश और समाज को भी गर्हित रुढ़ियों से बाहर निकालकर से प्रगतिशील मानवता के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सके। (25-7-2010)

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

bharat-pak

भारत-पाक के बीच शांति का दिवास्वप्न




वर्तमान नीतियों और परिस्थितियों के बीच भारत-पाकिस्तान की समस्या का कोई समाधान नहीं है। दोनों के बीच कोई शांति वार्ता कभी सफल नहीं होने वाली नहीं, क्योंकि पाकिस्तान शांति चाहता ही नहीं। उसके लिए तो वार्ता कक्ष भी एक तरह की युद्ध भूमि ही है। वह शांति नहीं, बल्कि भारत की पराजय व अपनी जीत चाहता है। वह हर उस मौके की तलाश में रहता है, जब वह भारत को नीचा दिखा सके। वह एक तरह की हीनग्रंथि का शिकार है, जिससे वह कभी निजात नहीं पा सकता। वास्तव में वह जो युद्धों में नहीं हासिल कर सका, उसे आतंकवादी घुसपैठ व वार्ताओं की कूटनीति से हासिल करना चाहता है। अभी इस्लामाबाद में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई वार्ता के बाद जो कटुता सामने आयी, वह इस बात का प्रमाण है कि इस तरह की वार्ताओं से कोई समस्या हल नहीं हो सकती।





पाकिस्तान के विदेश मंत्री मखदूम शाह महमूद कुरैशी के 16 जुलाई के वक्तव्य से भारत सरकार के तमाम नेता और अफसर तिलमिला रहे होंगे, लेकिन वे अभी भी इससे कोई सबक लेने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत के विदेशमंत्री एस.एम. कृष्णा साहब उन्हें पहले ही भारत आने का न्यौता दे आए हैं और इस वर्षांत तक वह नई दिल्ली आकर भी वही कुछ दोहराएंगे, जो उन्होंने 16 जुलाई को इस्लामाबाद में आयोजित अपनी प्रेस क्रांफ्रेंस में कहा है। हमारे नेता और अफसर अभी यही कह रहे हैं कि कृष्णा की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान हुई बातचीत काफी सार्थक रही है और हम आगे यह सिलसिला जारी रखेंगे।

बहुत से लोगों ने इस 16 जुलाई के साथ 9 वर्ष पूर्व 2001 की इस 16 जुलाई का स्मरण किया है, जब पाकिस्तान के राष्ट्र्पति परवेज मुशर्रफ साहब भारत आये थे। आगरा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कई दौर की बातचीत के बाद, उनके हठवश जब बातचीत का कोई परिणाम नहीं निकाला, तो उन्होंने प्रेस को बुलाकर अपनी भड़ास निकाली और भारतीय नेताओं को बुरा भला कहते हुए अपनी औपचारिक यात्रा की अवधि पूरी होने के पहले ही बिना भारतीय नेताओं की परवाह किये अपने विशेष विमान से इस्लामाबाद रवाना हो गये। हमारे देश के नेताओं ने इसके बावजूद मुशर्रफ साहब के साथ वार्ताओं का क्रम बनाए रखा और उनसे सीमा समस्या, आतंकवाद व कश्मीर समस्या के समाधन की आशा बनाए रखी।

पता नहीं हमारे देश के नेताओं को यह सीधी सी बात कब समझ में आयेगी कि भारत-पाकिस्तान का विवाद कोई मात्र दो पड़ोसी देशें का विवाद नहीं है। उसके मसले दो पड़ोसियों के सिद्धांत से हल नहीं हो सकते। इसी तरह कश्मीर समस्या भी किसी क्षेत्रीय असंतोष की समस्या नहीं है। यह हिन्दू विरोधी मुस्लिम साम्राज्यविस्तार की समस्या है।

आज तमाम पत्रकार, नेता व बुद्धिजीवी यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर क्यों पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने गुरुवार को भारत के गृहसचिव जी.के. पिल्लै की तुलना लश्कर-ए-तैयबा के अध्यक्ष हाफिज सईद से की, फिर अगले दिन शुक्रवार को उन्होंने भारत के विदेशमंत्री का मजाक उड़ाया। क्या इस तरह किन्ही दो पड़ोसी देशों के बीच कोई बातचीत चल सकती है। वास्तव में पाकिस्तान स्वय यह बातचीत आगे नहीं बढ़ाना चाहता, लेकिन बातचीत रोकने या वापस लेने का ठीकरा वह भारत के सिर फोड़ना चाहता है। लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि पाकिस्तान वार्ता शुरू करने की लगातार मांग करता रहा है, वही उसके शुरू होने पर उसे भंग करने पर आमादा है।

वास्तव में पाकिस्तान के लिए वार्ता की मेज भी किसी युद्ध भूमि से कम नहीं होती। हमेशा उसकी एकमात्र मंशा भारत को नीचा दिखाने या से पराजित करने की रहती है। वह जो काम सीमा पर सैनिक कार्रवाई द्वारा अथवा सीमा पार जिहादी घुसपैठियों द्वारा नहीं करा पा रहा है, उसे वह वार्ता की मेज पर संपन्न करा लेना चाहता है। वास्तव में दोनों के बीच वार्ताओं के मुद्दे पर ही कोई सहमति नहीं है। भारत के लिए बातचीत का मुख्य मुद्दा है आतंकवाद, तो पाकिस्तान के लिए मुख्य मुद्दा है कश्मीर। फिर भी दोनों ही समग्र बातचीत का नाटक कर रहे हैं। यह ‘समग्र वार्ता’ एक कूटनीतिक शब्दावली है, जिसका भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए अलग-अलग अर्थ है। अंतर्राष्ट्र्ीय दबाव के कारण दोनों देश आपसी मसले निपटाने के लिए युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए उसी दबाववश् बातचीत करना चाहते हैं। पाकिस्तान तो युद्ध का विकल्प छोड़ चुका है, क्योंकि वह तीन-तीन बार मंुह की खाने के बाद समझ गया है कि युद्ध करके भारत से पार नहीं पाया जा सकता। दूसरा विकल्प उसने आतंकवाद का चुना, जिस पर वह अभी भी कायम है, लेकिन अमेरिका दबाव वश उसे इस आतंकवाद पर कुछ न कुछ दिखावे के लिए ही सही अंकुश लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। भारत आतंकवाद से पीड़ित देश है, लेकिन इसका जवाब वह अपनी सैनिक शक्ति से नहीं दे सकता, क्योंकि उसे उूपर भी अमेरिका व चीन जैसे देशों का दबाव है कि वह पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की सैनिक कार्रवाई का दुस्साहस न करे। अब इसके बाद भारत क्या करे। बातचीत के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बाच है और बातचीत की मेज पर जब वह आतंकवाद का मसला उठाना चाहता है, तो पाकिस्तान की कोशिश वह मेज ही पलट देने की होती है। क्योंकि पाकिस्तान आतंकवाद के मसले पर कोई बातचीत करना ही नहीं चाहता। आतंकवाद भारत के प्रति उसकी राष्ट्र्ीय नीति का मुख्य अंग है, फिर वह उस पर भारत से कोई समझौता कैसे कर सकता है। इसलिए उसका तर्क रहता है कि पहले आप कश्मीर पर बातचीत कीजिए। हम आतंकवाद के मसले पर भी बातचीत करने के लिए तैयार है, पर पहले कश्मीर का मसला तय हो जाए, फिर आतंकवाद का भी मसला देख लेंगे। इधर भारत है, जो कश्मीर पर कोई बातचीत नहीं करना चाहता, इसलिए वह कहता है कि ठहरिए हम कश्मीर पर भी बातचीत करने के लिए तैयार हैं, लेकिन पहले आतंकवाद से राहत मिले तो। वह चाहता है कि पाकिस्तान पहले आतंकवाद रोकने का वचन दे और उसे पूरा करने के लिए ठोस कार्रवाई करे, फिर कश्मीर पर भी बात की जा सकती है। जाहिर है जब दोनों देशों की प्राथमिकताएं बिल्कुल भिन्न है, तो उनके बीच कोई बातचीत भला कैसे हो सकती है।

15 जुलाई को इस्लामाबाद में निर्धारित इस बातचीत में भी यही हुआ। कई दौर की मैराथन बातचीत हुई। खुलेआम सबके सामने, फिर अलग कमरे में और फिर अकेले-अकेले रहकर भी बातें हुई। इतनी बातें कि दोनों की निर्धारित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस 6 घंटे देर से शुरू हो सकी, फिर भी दोनों का आपसी गतिरोध टूट नहीं सका। टूटता भी कैसे न एस.एम. कृष्णा, जनाब एस.एम. कुरैशी की बात मान सकते थे और न कुरैशी साहब एस.एम. कृष्णा की। संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में दोनों ने यथा संभव सहज दिखने की कोशिा की, लेकिन थोड़ी ही देर में दोंनों का नकाब उखड़ गया। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाते और सफाई देते नजर आए। इस दौर में एस.एम. कुरैशी ने भारत के गृहसचिव जी.के. पिल्लै की लश्कर-ए-तैयबा के अध्यक्ष हाफिज सईद से तुलना कर डाली। जाने क्यों एस.एम. कृष्णा ने उसकी इस बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी को नजरअंदाज कर गये। उन्हें इसका तत्काल जवाब देना चाहिए था, लेकिन वह चूक गये। बाद में दिल्ली पहुचकर उन्होंने इस पर बहुत सारी सफाई दी, लेकिन मौके पर जवाब न दे पाने का क्षोभ पूरे देश को साल रहा है। पे्रस के साथ बातचीत में भारत की विदेश सचिव निरूपमा राव ने इसकी सफाई देते हुए कहा कि पत्रकारों के सवालों के बौछारों के बीच हो सकता है कि विदेशमंत्री उसे नजरंदाज कर गये हों, अथवा हो सकता है कि शालीनतावश उन्होंने उस अवसर को और अधिक कटु होने से बचाने के लिए उस पर कोई जवाब न दिया हो, लेकिन उन्होंने इस तुलना पर अपनी सहमति व्यक्त की हो, यह तो संभव ही नहीं है। निश्चय ही इसमें दो राय नहीं कि कृष्णा, कुरैशी की उस तुलना से सहमत नहीं हो सकते, किंतु मौके पर जवाब न दे सकने की चूक उनके लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए भारी पड़ी। और इसके बाद अगले दिन, अभी शायद भारत के विदेशमंत्री की वापसी उड़ान पाकिस्तान से रवाना भी नहीं हुई थी कि कुरैशी साहब ने अखबार वालों को बुलाकर जो बयान दिया, वह बेहद आपत्तिजनक था, जिस पर भारत के पूर्व विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा की टिप्पणी थी कि कुरैशी किसी भी तरह किसी देश के विदेशमंत्री होने लायक नहीं है।

उन्होंने सबसे पहले तो एस.एम. कृष्णा की अधिकारिक क्षमता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा किया। उनका संकेत था कि उन्हें बातचीत के पूरे अधिकार देकर इस्लामाबाद नहीं भेजा गया। कुरैशी ने कहा कि उन्होंने पूरे दिन की बातचीत में एक बार भी टेलीफोन नहीं उठाया, जबकि भारतीय अधिकारी बार-बार वार्ता कक्ष से बाहर जाते रहे और फोन करते रहे। कृष्णा को भी बार-बार फोन पर दिल्ली से निर्देश मिल रहे थे। मैंने पूरे अधिकार के साथ पाकिस्तान की टीम का नेतृत्व किया, जबकि कृष्णा साहब शायद बातचीत की पूरी तैयारी के साथ नहीं आए थे। उनका यह भी कहना था कि पाकिस्तान हर तरह की बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन वह वार्ता सार्थक होनी चाहिए। लेकिन साथ में यह आग्रह भी था कि पाकिस्तानी जनता तथा कश्मीरियों को जम्मू-कश्मीर की स्थिति से कतई अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसके पहले संयुक्त पे्रस कांफ्रेंस में भी इस बात को कहा था कि भारत यदि कश्मीर में अपनी सेना भेजता है, तो उसका प्रभाव पाकिस्तान पर पड़ता है।

कुरैशी के इस वक्तव्य से भारत के नेता व अधिकारी भौचक थे। दिल्ली पहुंचते ही कृष्णा ने इसकी सफाई दी कि 15 जुलाई को उन्होंने बातचीत के दौरान फोन पर किसी से कोई बात नहीं की। मुझे दिल्ली से कोई निर्देश लेने की आवश्यकता नहीं थी। मेरे सामने सब कुछ स्पष्ट था। कहीं कोई भ्रम की स्थिति नहीं थी। इस बारे में पाक विदेशमंत्री जो कुछ कह रहे हैं, वह झूठ बोल रहे हैं। वार्ता के दौरान उग्रता व चिड़चिड़ेपन (एक्रिमनी)का भी उनका आरोप गलत है। यदि किसी तरह की रुक्षता व चिड़चिड़ेपन का प्रदर्शन हुआ, तो वह पाकिस्तानी प्रतिनिधियों की तरफ से ही हुआ। कृष्ण ने जी.के. पिल्लै की तुलना हाफिज सईद से किये जाने पर भी अपनी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी तुलना पर सहमति व्यक्त करने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता। पिल्लै ने तो केवल एक तथ्य का हवाला दिया है, जिसके दस्तावेजी सुबूत हैं। पिल्लै ने यही तो कहा कि पाकिस्तानी मूल का जिहादी अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली ने इसकी पुष्टि की कि 26@11 का मुंबई हमला पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आई.एस.आई. द्वारा कराया गया। आई.एस.आई. ने ही हमले की योजना बनाने वाले लश्कर-ए-तैयबा के अधिकारियों को 25 लाख रुपये नाव खरीदने के लिए दिया था, जिस पर सवार होकर हमलावर आतंकवादी मुंबई पहुंचे थे। यह बयान हेडली ने भारत की राष्ट्र्ीय जांच एजेंसी के अधिकारियों के समक्ष तब दिया, जब वहां अमेरिकी संघीय जांच एजेंसी एफ.बी.आई. के अधिकारी तथा हेडली के अपने वकील भी उपस्थित थे। इस बयान पर पिल्लै की तुलना उस जिहादी सरगना हाफिज सईद से कैसे की जा सकती है, जो आए दिन भारत के खिलाफ खूनी जंग छेड़ने तथा उसके पांच टुकड़े करने की बातें करता रहता है। कुरैशी ने पिल्लै की तुलना सईद से करते हुए कहा था कि ऐसे वक्तव्य देते हुए कैसे आश की जा सकती है कि भारत-पाक संबंध सुधरेंगे तथा वे आगे बढ़ेंगे। कुरैशी का यह भी कहना था कि बातचीत के प्रति भारत का रुख गंभीर नहीं है। थिम्पू (भूटान)में ‘सार्क’ (दक्षिण एशियायी क्षेत्रीय सहयोग संगठन)शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच जो सहमति हुई थी, यह उसके विरुद्ध है। पाकिस्तान निश्चय ही हर मसले पर बातचीत के लिए तैयार है, किंतु वह किसी जल्दबाजी में नहीं है। भारत यदि अपनी चिंताओं पर पाकिस्तान से मदद चाहता है, तो उसे पाकिस्तान की चिंताओं पर भी गौर करना चाहिए। इसके लिए भारत को खुले दिन से बात करनी होगी। यह कैसे हो सकता है कि हम भारत की चिंताओं के प्रति ध्यान केंद्रित करें, लेकिन भारत हमारी चिंताओं की तरफ कोई ध्यान न दे।

यह तो रही इस वार्ता की कहानी। अब कल्पना करें कि यदि वार्ता का दौर आगे बढ़ता है और नवंबर में जनाब कुरैशी भरत तशरीफ लाते हैं, तो वार्ता कहां से आगे बढ़ेगी और उसका क्या परिणाम होगा। साफ जाहिर है कि इस वार्ता श्रंृखला का कभी कोई परिणाम नहीं निकलने वाला है। पाकिस्तान और भारत दोनों ही चाहते हैं कि समस्याओं के समाधान के लिए समयबद्ध कार्यक्रम निर्धारित हों। लेकिन फिर वही समस्या। पाकिस्तान का कहना है कि आतंकवाद पर नियंत्रण के बारे में वह कोई समय सीमा निर्धारित नहीं कर सकता, क्योंकि वह स्वयं आतंकवादी हिंसा से पीड़ित है। दूसरी तरफ भारत कश्मीर के मामले में कोई समय सीमा तय करने के लिए तैयार नहीं है। तो इसका अर्थ है कि वार्ता यदि चलती है तो केवल एक अर्थहीन मुलाकातों की श्रंृखला होगी। पाकिस्तान का बार-बार कहना है कि वह केवल फोटो खिंचवाने के लिए वार्ताओं का आयोजन नहीं चाहता, लेकिन वर्तमान गतिरोध की स्थिति में कोई वार्ता फोटो खिंचवाने और फिर आगे मिलते रहने के वायदे के अलावा और कोई निर्णय ले भी नहीं सकती।

आप सवाल कर सकते हैं कि फिर क्या हो सकता है। जवाब है कि कुछ नहीं हो सकता। जब तक पाकिस्तान का अस्तित्व है, तब तक भारत-पाकिस्तान का संघर्ष भी चलता रहेगा और तब तक कश्मीर की समस्या भी बनी रहेगी। और जैसा कि वीर संघवी ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने कॉलम में लिखा है कि हो सकता है कि पाकिस्तान के न रहने पर भी यह समस्या बनी रहे। यह जरूरी नहीं कि पाकिस्तान के बिखर जाने से यह समस्या हल हो जाएगी। हां पाकिस्तान के बिखर जाने से उसका संगठित खतरा अवश्य कम हो जाएगा। इस देश के बहुत सारे लोग इस निष्कर्ष से सहमत नहीं होंगे, लेकिन यदि वे सहमति नहीं होते हैं, तो इसका केवल एक ही कारण है कि वे समस्या को ठीक से समझ नहीं रहे हैं। अपने देश का एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ पाकिस्तानी मीडिया के साथ मिलकर ‘अमन’ का एक अभियान चला रहा है। अपने देश के बहुत से प्रतिष्ठित पत्रकार तथा बुद्धिजीवी समझते हैं कि भारत-पाक समस्या अंग्रेज साम्राज्यवादियों की देन है और आज के राजनीतिक नेता अपने निहित स्वार्थवश उस द्वेष द्वंद्व को बनाए हुए हैं, इसलिए यदि देनों देशों के नागरिकों के बीच मेलजोल बढ़े, तो यह समस्या अपने आप हल हो जाएगी। दोनों देश आखिर पहले एक ही तो थे। वे परस्पर भाई-भाई हैं। राजनीतिक बाधाएं दूर हो जाएं, तो वे फिर भाई-भाई की तरह रह सकते हैं। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि भारत तो एक था ही, अगर भाई-भाई साथ रहना चाहते, तो अंग्रज भला उन्हें कैसे अलग कर सकते थे। पाकिस्तान का निर्माण अंग्रेजों के माध्यम से जरूर हुआ, लेकिन उसके निर्माता अंगे्रज नहीं थे। हिन्दुओं से मुसलमानों के मजहबी विरोध के कारण पाकिस्तान का जन्म हुआ है और वह भी मुसलमानों ने हिंसा के जोर पर हासिल किया था। इतिहास साक्षी है और इसके अगणित दस्तावेजी सबूत हैं कि मुस्लिमों की हिंसा से भयभीत कांग्रेस के नेताओं ने देश को गृहयुद्ध से बचाने के लिए पाकिस्तान का निर्माण स्वीकार किया। ‘हंस के लिया है पाकिस्तान- लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान’ यह नारा किसी अंग्रेज ने नहीं सिखाया था। इसका मतलब यह हुआ कि जब तक मुलसमानों की मजहबी अलगाववादी सोच में बदलाव नहीं आता, इस समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता। लेकिन इस्लाम की तमाम शक्तियां इस बदलाव को रोकने में लगी हैं। पाकिस्तान उन कट्टरपंथी शक्तियों का संगठित मूर्तमान स्वरूप है। उसकी सर्वग्रासी राजनीतिक आकांक्षा कश्मीर की भूमि प्राप्त करके भी शांत होने वाली नहीं है। भारत-पाकिस्तान की सीमा समस्या या कश्मीर की समस्या यदि मात्र जमीन की समस्या होती, तो उसका समाधान आसान था। कश्मीर का एक बहुत आसान समाधान था कि वर्तमान नियंत्रण रेखा को ही अंतर्राष्ट्र्ीय रेखा मान लिया जाए। इंदिरा गांधी ने शिमला में जब जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ द्विपक्षीय समझौता किया था, तो दोनों नेताओं के बीच इसी बिंदु पर सहमति बनी थी। किंतु भुट्टो के आग्रह पर इसे समझौते की शब्दावली में शामिल नहीं किया गया। भुट्टो ने इंदिरा गांधी को धोख दिया। वह पाकिस्तान पहुंचकर अपने वायदे से मुकर गये।

अब वर्तमान स्थिति में न तो पाक अधिकृत कश्मीर भारत को मिलना है- भले ही अपने नक्शे में वह उसे भारत का अंग दिखाता रहे- और न भारत के कब्जे वाला कश्मीर पाकिस्तान को, क्योंकि भारत उसे अभिन्न अंग मानता है और देश की किसी सरकार या यहां के किसी राजनेता में यह साहस नहीं कि वह भारतीय कश्मीरी भू भाग को पाकिस्तान के हवाले कर दे। दोनों कश्मीरों को मिलाकर अलग कश्मीर राज्य बनने की भी कोई संभावना नहीं है। जो लोग कश्मीर की स्वायत्तता की बात करते हैं, वे केवल एक धोखे की शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, जिसके सहारे अंतर्राष्ट्र्ीय जनमत तैयार करके कश्मीर को भारत से अलग किया जा सके, फिर उससे अलग होने के बाद तो वह पाकिस्तान का हिस्सा बन ही जाएगा।

तो फिर रास्ता क्या है ? रास्ता केवल एक है। यदि भारत सरकार के किसी शीर्षनेता में साहस हो तो वह आगे बढ़े और वर्तमान नियंत्रण् रेखा को अंतर्राष्ट्र्ीय सीमा घोषित करने की पहल करे। इसके लिए अंतर्राष्ट्र्ीय जनमत तैयार करना भी बहुत मुश्किल नहीं होगा। इसके बाद भारतीय नियंत्रण वाले कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करके उसे किसी भी अन्य सामान्य भारतीय राज्य का दर्जा प्रदान करे। कश्मीर से जिन गैर मुस्लिमों को बाहर भागने पर मजबूर कर दिया गया, उन्हें पुनः बसाने का यत्न करें। और जिहादी कट्टरपंथी विचारधारा के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष का अभियान शुरू करें। मजहबी तुष्टीकरण का (चाहे वह कोई मजहब हो)पूरी तरह निषेध करके शुद्ध लोकतांत्रिक मूल्यों का अनुपालन करे। और इसके विरुद्ध कोई आवाज उठती है, तो उसे कठोरता से कुचलने का उपक्रम करे। और यदि यह सब नहीं हो सकता, तो हमें अनंतकालीन संघर्ष व आतंकवादी हिंसा झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। वर्तमान स्थिति में वर्तमान नीतियों के तहत न भारत-पाक समस्या का कोई समाधान है, न कश्मीर समस्या का।(18-7-2010)