बुधवार, 16 नवंबर 2011

"रामायण" व रामकथा पर नया छिड़ा विवाद
ए.के. रामानुजन का निबंध पाठ्यक्रम से बाहर निकालने पर विरोध प्रदर्शन
करते हुए: दिल्ली विश्वविद्यालय के वामपंथी अध्यापक व छात्र

दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत् परिषद ने पिछले दिनों बी.ए. (आनर्स) द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम (भारतीय संस्कृति) में शामिल एक विवादास्पद निबंध को हटाने का निर्णय ले लिया, इससे देश भ्र में तमाम वामपंथी बुद्धिजीवी, लेखक, अध्यापक, पत्रकार व इतिहासकार बेहद क्षुब्ध हैं और उसे वापस पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने की मांग कर रहे हैं। यह निबंध प्रसिद्ध कवि, लेखक, भाषाविद तथा अनुवादक ए.के. रामानुजन का है, जो महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णित रामकथा की प्राचीनता व प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हैं तथा अन्य गौण व विकृत कथाओं को उस पर तरजीह देने का प्रयत्न करते हैं।

यूरोप से आयातित साहित्य अध्ययन शैली, सामाजिक सोच और आलोचना दृष्टि ने इस देश के इतिहास, दर्शन, साहित्य और सामाजिक-सांस्कृतिक सोच का किस तरह बंटाधार किया है, इसका ताजा उदाहरण दिल्ली विश्व विद्यालय के बी.ए. (आनर्स) द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम भारतीय संस्कृति विषय की पाठ्य पुस्तक से हटाये गये उस निबंध पर छिड़ा विवाद है, जो रामायण या रामकथा से सम्बद्ध है। इस विवाद ने सबसे बड़ा सवाल तो यह खड़ा किया है कि किसी विश्वविद्यालय में किसी साहित्यिक कृति या ऐतिहासिक-सांस्कृतिक कथानक के पढ़ने-पढ़ाने का उद्देश्य क्या है।
दिल्ली विश्व विद्यालय की विद्वत्परिषद (एकेडमिक कौंसिल) ने विगत 9 अक्टूबर 2011 की अपनी बैठक में प्रख्यात लेखक अट्टिपट्ट कृष्णस्वामी रामानुजन के निबंध ‘थ्री हंड्रेड रामायनाज: फाइव इक्जाम्पल एंड थ्री थाट्स ऑन ट्रांसलेशन‘ को बी.ए. आनर्स के पाठ्यक्रम से बाहर कर देने का निर्णय लिया। इस पर इस विश्वविद्यालय के ही नहीं, प्रायः पूरे देश के वामपंथी शिक्षक, लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार, आलोचक, इतिहासकार तथा संस्कृतिकर्मी आपे से बाहर हो गये। विश्वविद्यालय के निर्णय के खिलाफ आंदोलनों, प्रदर्शनों, गोष्ठियों व लेखबद्ध प्रतिक्रियाओं का सिलसिला अब तक जारी है। इसे देश की उदार बौद्धिक परंपरा, विविधता के प्रति सम्मान तथा चिंतन की स्वतंत्रता पर प्रहार और राजनीतिक दबाव के आगे विद्वत् स्वतंत्रता (एकेडमिक फ्रीडम) का आत्म समर्पण बताया जा रहा है।
डॉ. रामानुजन का यह निबंध 1991 में लिखा गया था, जिसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित पुस्तक ‘मेरी रामायनाज- द डाइवर्सिटी ऑफ ए नरेटिव ट्रेडीशन इन साउथ  एशिया‘ में शामिल किया गया। पुस्तक की संपादिका पाड्ला रिचमैन ने जानबूझकर इस निबंध को उपर्युक्त पुस्तक में शामिल किया, क्योंकि वह भारत में वाल्मीकि कृत रामायण ग्रंथ और रामानंद सागर के रामायण सीरियल की असाधारण लोकप्रियता से बहुत चिंतित थीं। उस पुस्तक से ही लेकर इस निबंध को 2006 में दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. (आनर्स) की पाठ्य पुस्तक में शामिल किया गया। यहां यह जानना रोचक होगा कि इस पाठ्य पुस्तक को तैयार करने का काम देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की बेटी प्रो. उपिंदर सिंह ने किया है।
भारतीय संस्कृति के पाठ्यक्रम से इस निबंध को निकलवाने का प्रयास तभी शुरू हो गया था, जब इसकी पढ़ाई शुरू हुई थी। मार्च 2008 की विश्व विद्यालय की विद्वत् परिषद (एकेडमिक कौंसिल) की बैठक में भी राष्ट्रीय संस्कृति की चिंता करने वाले शिक्षक प्रतिनिधियों ने इसे हटाने पर जोर दिया था, लेकिन उस समय परिषद ने भारी विरोध के बावजूद उस निबंध को पाठ्यक्रम से निकालने से इनकार कर दिया था। शिक्षकों ने इस पर न्यायालय की शरण में भी जाने की चेतावनी दी थी। परिषद के बाहर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी इस निबंध को हटाने के लिए आंदोलन चलाया था। संसद में भी यह मसला उठा था, किंतु विश्वविद्यालय उपर्युक्त निबंध को पाठ्यक्रम में बनाए रहने पर अड़ा रहा। न्यायालय से भी कोई उम्मीद नहीं थी, क्योंकि किसी कक्षा में पाठ्यक्रम निर्धारण में विश्वविद्यालय को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है। किंतु संयोगवश सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले को विचारार्थ स्वीकार्य किया और विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह चार विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाए, जो इस प्रश्न पर विचार करे और उसके निष्कर्षों के आधार पर निर्णय लिया जा सके। विश्वविद्यालय ने इतिहास विभाग के चार प्रोफेसरों की एक कमेटी बना दी। इस कमेटी की रिपोर्ट विभाजित थी। दो प्रोफेसर लगभग तटस्थ थे। उन्हें इस निबंध के पाठ्यक्रम में बने रहने पर कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन उनका इसे बनाये रखने का कोई हठ भी नहीं था (दे वेयर नाट कमिटल), यानी विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल उसे हटाना चाहे तो हटा भी सकती है। तीसरे प्रोफेसर ने इसे पाठ्यक्रम में बनाये रखने का जोरदार समर्थन किया और लिखा कि यह केवल दक्षिण पंथियों का हो हल्ला है, जो इसे हटाना चाहते हैं, इसलिए उसे महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन चौथे प्रोफेसर ने इसे पाठ्यक्रम में रखने पर गहरी आपत्ति की और लिखा कि स्नातक स्तर पर इस तरह की सामग्री पढ़ाए जाने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
यह रिपोर्ट आने के बाद विद्वत् परिषद की 9 अक्टूबर 2011 की बैठक में इस मसले को विचार के लिए स्वीकार किया गया। विश्वविद्यालय की तरफ से उपर्युक्त 4 विशेषज्ञों की रिपोर्ट पेश की गयी। इस बैठक में इस सवाल को इसलिए लिया गया कि अगले दिन विश्वविद्यालय को इस विषय में सुप्रीमकोर्ट को अपनी राय देनी थी। इस बैठक में एक शिक्षक प्रतिनिधि ने नियमों का सवाल उठाया कि यह निबंध 2004 से 2008  तक पढ़ाए जाने के लिए था, उसके बाद इसे आगे बढ़ाए जाने का कोई औचित्य नहीं है। उसने यह भी बताया कि स्वयं ‘ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस‘ ने उस पुस्तक की बिक्री रोक दी है, जिसमें से इस निबंध को लिया गया है, ऐसे में उस निबंध को पाठ्यक्रम में शामिल रखना कतई तर्क संगत नहीं है। परिषद में उपस्थित वामपंथी शिक्षकों ने इस निबंध को पाठ्यक्रम से हटाने का जबर्दस्त विरोध किया, किंतु परिषद ने जब इस पर मतदान कराया, तो 120 सदस्यों की परिषद में तो लेख को हटाने के विरुद्ध केवल 9 मत पड़े और ये सब वामपंथी विचारधारा वाले शिक्षकों के थे। परिषद ने इन विरोधों की उपेक्षा करके इस निबंध को हटाने का निर्णय लिया और उसकी सूचना सर्वोच्च न्यायालय को दे दी। इस फैसले के बाद से ही वामपंथी बुद्धिजीवियों में तहलका मचा है। उपर्युक्त निबंध को हटाने के समर्थन में शायद केवल देवेंद्र स्वरूप ने अपनी कलम चलायी है, जो स्वयं दो दशक से अधिक समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे हैं, अन्यथा मीडिया में इस संदर्भ में जितने भी आलेख दिखायी दे रहे हैं, वे सभी वामपंथी विचार वालों के ही हैं, जो इस निबंध को पाठ्यक्रम से हटाने का विरोध कर रहे हैं और इसे लेखकीय स्वतंत्रता तथा वैविध्य की स्वीकार्यता पर हमला बता रहे हैं।
रामानुजन के आलेख का समर्थन करने वाले तथाकथित विद्वान यह भूल जाते हैं कि उनके विरोध का कारण यह नहीं है कि उन्होंने वाल्मीकि रामायण या तुलसीकृत रामायण (रामचरित मानस) से भिन्न अन्य रामकथाओं को सामने लाने का प्रयास किया है, बल्कि विरोध का कारण उनकी नीयत का है। वे वाल्मीकि की रामायण में वर्णित रामकथा को गौण करना चाहते हैं। इसमें उनकी बौद्धिक, लेखकीय व शोधकर्ता की ईमानदारी कम उनका पूर्वाग्रह तथा वाल्मीकि रामायण को नीचा दिखाने का प्रयत्न अधिक है। सबसे पहले तो वह इसी स्थापना पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं कि वाल्मीकि की रामायण ही मूल तथा रामकथा की प्रामाणिक कृति है। भारतीय परंपरा वाल्मीकि को आदि कवि तथा उनकी रचित रामायण को ही रामकथा का मूल मानती है। रामानुजन को यह स्वीकार्य नहीं। वह मानते हैं कि देश तथा विदेश में अन्य बहुत सी रामकथाएं (रामायण) प्रचलित हैं, जिनकी कथा वाल्मीकि की कथा से भिन्न हैं और वे अधिक प्राचीन व प्रामाणिक हो सकती हैं। कई कथाएं हैं, जिसमें राम और सीता को भाई-बहन बताया गया है अथवा किसी में सीमा को रावण की बेटी बताया गया है। संभव है राम की ये कथाएं ही अधिक सही हों। इसके अलावा रामानुजन की दूसरी स्थापना है कि देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं की अन्य रामकथाओं में उस क्षेत्र तथा उस भाषा को बोलने वाले की अपनी निजी जातीय व सांस्कृतिक अस्मिता निहित है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। परोक्षतः उनका आरोप है कि वाल्मीकि रामायण को प्रमुखता देकर अन्य कथाओं को उपेक्षित करने का प्रयास वस्तुतः उस भाषा और संस्कृति वालों की उपेक्षा करने या उनकी संस्कृति को दबाने का प्रयास है। इससे जाहिर है कि रामानुजन चाहे कितने बड़े विद्वान हों, कितनी ही भाषाओं के जानकार हों, किंतु न तो वह भारतीय संस्कृति व उसकी परंपरा को समझते हैं आऋैर न उसके प्रति उनमें कोई निष्ठा व प्रेम है। उनके निबंध को पाठ्यक्रम में शामिल करने वाले समर्थक तथाकथित विद्वानों की भी यही स्थिति है। पाठ्यक्रम से उपर्युक्त निबंध हटाने के निर्णय की घोषणा होते ही वामपंथी गुट के करीब डेढ़ दो सौ छात्रों और शिक्षकों ने एक विरोध जुलूस निकाला और दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों रामजस कॉलेज, किरोड़ीमल कॉलेज, हिन्दू कॉलेज व सेंट स्टिफेन कॉलेज आदि से होते हुए कुलपति डॉ. दिनेश सिंह के कार्यालय पहुंचे। वे इंकलाब जिंदाबाद, कुलपति मुर्दाबाद, दिनेश सिंह होश में आओ, विचारों की आजादी पर हमला बंद करो जैसे नारे लगा रहे थे। कुलपति कार्यालय के समक्ष उन्होंने एक सभा की, जिसे संबोधित करते हुए इतिहास के एक प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय का निर्णय हमारी वैचारिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास है। हम क्या पढ़े, क्या लिखें और क्या सोचें इसे नियंत्रित करने का फरमान है। हमें यह लड़ाई अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लड़नी है। किसी निबंध को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम से केवल इसलिए निकाल देना कि इससे किसी की या कुछ लोगों की धार्मिक भावनाओयं को चोट पहुंचती है, धार्मिक कट्टरवादियों के समक्ष शैक्षिक निष्ठा व उन्मुक्त विचारों की बलि देना है। रामजस कॉलेज के इतिहास विभाग के प्रोफेसर मुकुल मांगलिक का कहना था कि ‘आपको चाहे यह पसंद हो या नहीं, किंतु आप इस तथ्य को तो नहीं बदल सकते कि रामकथा के कई रूप विद्यमान हैं। रामानुजन का निबंध एक श्रेष्ठ तार्किक निबंध है, किंतु हमारे गणित विषय के प्रोफेसर कुलपति ने उसे हटा दिया। उनको गणित विषय का प्रोफेसर बताने के पीछे उनका आशय यह था कि वे साहित्यिक निबंध भला क्या समझें। विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल की बैठक में उपर्युक्त निबंध को हटाने के निर्णय का विरोध करने वाले एक प्रोफेसर संजय शर्मा ने विद्वानों का आह्वान किया है कि वे इस तरह के राजनीतिक दबाव के आगे हार मानकर न बैठ जाएं। इस तरह की राजनीति वस्तुतः पूरी बौद्धिकता को नष्ट करने पर आमादा है। इसी तरह शहीद भगत सिंह कॉलेज के प्रोफेसर शिव दत्त- जो करीब दो दशकों से स्नातक स्तर पर इतिहास पढ़ा रहे हैं- का कहना है कि धर्म (रिलीजन) की राजनीति करने वाले भाजपा के लोग पूरी शिक्षा प्रणाली को क्षीण कर रहे हैं। धार्मिक होना एक बात है, किंतु ये तथाकथित धर्मरक्षक शिक्षा के पूरे उद्देश्य को ही नष्ट कर दे रहे हैं। ये हिन्दूवादी केवल विदेशों में प्रचलित रामकथा के विरोधी नहीं, बल्कि इस देश की तमाम अन्य रामकथाओं के खिलाफ हैं। वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर के अनुवार विश्वविद्यालय का निर्णय राजनीतिक दबाव के आगे शैक्षिक स्वतंत्रता का समर्पण है।
प्रतिक्रियाएं और बहुत सी हैं, लेकिन यहां यह स्वाभाविक सवाल खड़ा हो जाता है कि आखिर ये वामपंथी बुद्धिजीवी पाठ्यक्रम से एक विवादास्पद लेख को निकालने मात्र से इतने बेचैन क्यों हैं। इस लेख को पाठ्यक्रम से बाहर निकालने का आंदोलन चलाने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (भाजपा की युवा शाखा) कोई इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग तो नहीं कर रही है। लाइब्रेरी में जाकर या पाड्ला रिचमैन की किताब खरीदकर कोई भी इस लेख को पढ़ सकता है। लेकिन ये वामपंथी उसे पाठ्यक्रम में रखने की जिद क्यों कर रहे हैं। वे कांग्रेस सरकार व उसकी पार्टी के नेताओं से उनके सेकुलरिज्म का हवाला देते हुए अपील कर रहे हैं कि वे इसे फिर से पाठ्यक्रम में शामिल शामिल कराएं। कांग्रेस पार्टी तथा  उसकी युवा व छात्र शाखा के लोग ज्यादातर चुप्पी साधे हुए हैं, क्योंकि वे किसी एक पक्ष के साथ खड़े होना नहीं चाहते, तुलसी या रामानंद सागर के राम यदि विजयी होते हैं, तो यह उनकी पराजय होगी, क्योंकि उनकी पूरी संस्कृति इनके विरोध पर टिकी है। पाड्ला रिचमैन ने भी राम के इस स्वरूप को पराजित करने के लिए ही अपनी पुस्तक प्रकाशित की और उसमें ए.के. रामानुजन का लेख शामिल किया। पाड्ला ने अपनी पुस्तक की भूमिका में साफ लिखा है कि जनवरी 1987 में भारतीय टीवी चैनल पर प्रसारित होने वाली रामानंद सागर की रामायण की लोकप्रियता से इतिहासकार रोमिला थापर और स्वयं वह भी बहुत चिंतित हो गयी थीं। यह चिंता क्योंकि थी? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि इन वामपंथी इतिहासकारों व लेखकों को भारत के प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों से चिढ़ है। वे उसे तोड़कर नष्ट करना चाहती हैं।
आखिर इन विरोधियों से यदि कोई पूछे कि आखिर शिक्षा क्रम में साहित्य और इतिहास के अध्ययन अध्यापन का लक्ष्य क्या है। क्या केवल विविधता व वैचारिक अथवा लेखकीय स्वतंत्रता का सम्मान करना कोई जीवन मूल्य है या किसी जीवन मूल्य की स्थापना के लिए इनकी जरूरत समझी जाती है। साहित्य व इतिहास का रचना व अध्ययन का मूल लक्ष्य होता है मनुष्ृय को बेहतर बनाना, समाज में न्याय की स्थापना करना तथा भेद को मिटाकर अभेद के प्रति प्रेम व निष्ठा कायम करना।
यदि इन आधुनिक वामपंथी साहित्यकारों व इतिहासकारों ने साहित्य और इतिहास पुराण के प्रयोजन की भारतीय परंपरा को पढ़ा समझा होता, तो वे शायद ए.के. रामानुजन के उपर्युक्त लेख को एक दिन भी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में न चलने देते।
अपने देश में वेद, शास्त्र, इतिहास, पुराण तथा काव्य इन सबकी रचना व अध्ययन का लक्ष्य जीवन में चारों पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, की प्राप्ति, प्राणिमात्र के प्रति प्रेम व सद्भाव की स्थापना तथा समदृष्टि का विकास। यहां वेद, पुराण व काव्य रचनाओं तीनों का उद्देश्य एक ही है। शास्त्रों की शासन व्यवस्था केवल राजदंड से सम्यक रूप से संचालित नहीं हो सकती, इसलिए उसकी व्यापक समझदारी विकसित करने के लिए काव्य या साहित्य रचना की गयी। इसीलिए इस देश में वैदिक ऋचाओं, पुराण कथाओं तथा काव्यों के रचयिता एक ही वर्ग के लोग हैं। काव्य शास्त्र के आदि आचार्य भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में काव्य का प्रयोजन स्पष्ट किया है- ‘उत्तमाधम मध्यानां, नराणां कर्म संश्रयं, हितोपदेश जननं धृति क्रीणा सुखादिकृतदुःखर्तानां, श्रमार्तानां, शोकार्तानाम, तपस्विनां विश्रांति जननं काले नाट्यमेत भविष्यतिधर्म्य यशस्यमायुष्यं हितं बुद्धि विवर्धनं लोकोपदेश जननं नाट्यमेतद् भविष्यति ।।‘
काव्य उत्तम, मध्यम तथा निन्म तीनों वर्गों के मनुष्य के लिए हितकारी उपदेश देता है। धैर्य, विनोद और सुख प्रदान करता है। मुसीबतों से घिरे लोगों, श्रमजीवियों, शोक संतप्त हृदयों तथा तपस्वियों तक को काव्य आराम देता है। धर्म-अधर्म यश-अपयश, काम्य-अकाम्य, हित-अहित आदि का विवेक देता है तथा आयु और बुद्धि की वृद्धि आदि के लिए उपयुक्त उपदेश देता है।
काव्यालंकार में वामन ने श्रेष्ठ काव्य के लक्षण के तौर पर कहा है-
धर्मार्थकाम मोक्षेणु वैचक्षूयं कलासु च
प्रीतिं करोति कीर्तियूच साधुकाव्य निषेवणर्म-
सत्काव्य का पठन-पाठन धर्म-अधर्म का विवेक प्रदान करता है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों की पूर्ति करता है तथा प्रेम और कीर्ति का विस्तार करता है।
अब इस कसौटी पर यदि देश भर में या विदेशों में प्रचलित विविध रामायणों का मूल्यांकन किया जाए, तो स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि कौनसी रामकथा समाज और व्यक्ति के लिए उपादेय है, कौनसी नहीं।
यदि तमाम उपलब्ध रामायणों का सम्यक अध्ययन विवेचन किया जाए, तो पता चलेगा कि केवल महर्षि वाल्मीकि व तुलसी का रामकाव्य ही ऐसा है, जिसकी रचना का उद्देश्य सामाजिक है। बल्कि आज की सामाजिक आवश्यकता के लिए तुलसी की रामकथा अधिक उपादेय है, क्योंकि तुलसी के सामने जो समाज था, वह वाल्मीकि कालीन समाज से बहुत अलग था। उन्होंने मनोरंजन के लिए, भक्ति प्रदर्शन के लिए या मोक्ष प्राप्ति के लिए अपना काव्य नहीं लिखा। बाकी प्रायः राम कथाश्रित काव्य या तो भक्तिवश लिखे गये हैं या अपनी रचनाभिव्यक्ति के लिए। उन रचनाकारों ने अपनी कािा को विशिष्टता व मौलिकता प्रदान करने के लिए अपनी कथाओं को अलग रंग दिया है, किंतु उन नई उद्भावनाओं से किसी नये सामाजिक मूल्य या आदर्श की स्थापना नहीं होती, केवल काव्य चमत्कार बढ़ता है।
वाल्मीकि का रामायण शायद सारे परवर्ती राम काव्यों का उपजीव्य है। वर्तमान वाल्मीकि का रामायण शायद सारे परवर्तीराम काव्यों का उपजीव्य है। वर्तमान वाल्मीकि रामायण की रचना के पहले भी कोई राम कथा प्रचलित हो सकती है, लेकिन इससे वाल्मीकि या तुलसी की श्रेष्ठता कम नहीं हो जाती।
वाल्मीकि रामायण के प्रारंभिक अध्यायों /सर्गों/ के वर्णन से ही पता चल जाता है कि यह कोई इतिहास ग्रंथ नहीं है। इसके विविध चरित्रों का स्वरूप कवि कल्पित है। वह इतिहास में प्रसिद्ध किसी ऐसे चरित्र की तलाश में रहते हैं, जो उनके सामाजिक उद्बोधन का काव्य आधार बन सके। इसीलिए वह नारद से पूछते हैं कि उनके काव्य नायक के लिए किसी ऐसे व्यक्ति  के बारे में बताएं, जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्य वक्ता, दृढ़ प्रतिज्ञ, सदाचार युक्त, समस्त प्राणियों का हित साधक, विद्वान, समर्थ, सुंदर, मन पर नियंत्रण रखने वाला, क्रोध को जीतने वाला, कांतिमान, किसी की निंदा न करने वाला तथा संग्राम में ऐसा पराक्रमी हो कि देवता भी उससे डरते हैं। ऐसे चरित्र की खोज से ही यह प्रमाणित होता कि वाल्मीकि अपने काव्य के द्वारा समाज में किन गुणों से युक्त तो इतिहास में केवल एक व्यक्ति हुआ है, वह है राम। वह वाल्मीकि को उनके बारे में कुछ जानकारी देते हैं, जिसके आधार पर अपनी कल्पना और बुद्धि कौशल के आधार पर वह अपनी रामकथा लिखते हैं। रामायण के प्रथम कांड के तीसरे सर्ग का पहला ही श्लोक है, जिसमें वाल्मीकि कहते हैं कि नारद  के मुख से धर्म, अर्थ एवं काम रूपी फल से युक्त हितकर सारी जानकारी प्राप्त करके फिर हृदय में पूर्ण कथा की अभिकल्पना (साक्षात्कार) करने लगे।
श्रुत्वा वस्तु समग्रं तद्धर्मार्थ सहितं हितंम्
व्यक्तमन्वेषते भूयो यद् वृत्तं तस्य धीमतः
बहुत स्पष्ट है कि राम कथा का सारा वर्णन इतिहास नहीं है। मूल कथा इतिहास प्रसिद्ध थी, लेकिन काव्य में वर्णित विविध घटनाएं, संवाद  आदि कवि की कलपना से उद्भूत है, जिसका लक्ष्य है समाज को विवेकशील, धर्मशील तथा सुखी बनाना। अब जो काव्य इस काम को सर्वश्रेष्ठ ढंग से कर रहा हो, उसी को अध्ययन अध्यापन का विषय बनाया जाना चाहिए। रामानुजन 300 रामायणों की बात करते हैं, हो सकता है अब तक यह संख्या और बढ़ गयी हो, लेकिन इनमें कथानक की नवीनता और प्राचीनता का कोई मुद्दा उठाना कतई प्रासंगिक नहीं है, उपादेय भी नहीं। उपादेय हैं केवल वे मूल्य, जो इन काव्यों में स्थापित किये गये हैं। और उस दृष्टि से वाल्मीकि और तुलसी के काव्य निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ हैं। अब इनकी निंदा आलोचना या स्वीकार्यता अस्वीकार्यता की बात इस आधार पर नहीं की जानी चाहिए कि वे किस भाषा, किस क्षेत्र, किस जाति अथवा किस संप्रदाय के थे। रामानुजन को मूल्यों की नहीं, केवल कथानक की चिंता है। वह पूर्वाग्रह व दृष्टि संकीर्णता के कारण देश की मूल्य आधारित एकता की रक्षा के बजाए क्षेत्रीय विभेद व विखंडन को बढ़ाना चाहते हैं। वास्तव में विश्वविद्यालय के कुलपति तथा विद्वत् परिषद को इसके लिए बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने साहसपूर्वक एक सही निर्णय लिया और वामपंथियों के दबाव को ठुकरा दिया।

रविवार, 6 नवंबर 2011

भारत के विरुद्ध पाक-चीन गठजोड़
पाक जिहादियों की नजर में तीन दशक बाद भारत की स्थिति

भारत और अमेरिका के बढ़ते रिश्तों ने पाकिस्तान एवं चीन को और निकट ला दिया है। अब वे दोनों रणनीतिक साझीदार हैं। चीन और पाकिस्तान कतई स्वाभाविक दोस्त नहीं हो सकते। दोनों में कोई सैद्धांतिक समानता भी नहीं है। जाहिर है उनकी दोस्ती नितांत अवसरवादी तथा भारत और अमेरिका के विरोध पर आधारित है। अमेरिका से इन दोनों की कोई सीधी दुश्मनी नहीं है, लेकिन भारत का विकास इन दोनों को फूटी आंखों नहीं सुहा रहा है। इसलिए ये दोनों ही भारत को कमजोर और विखंडित करने की साजिश रचने में लगे हैं। कश्मीर को दोनों ने ही भारत को दबाने का सबसे बड़ा हथियार बना रखा है। खबर है चीन पाक अधिकृत कश्मीर में अपना एक सैनिक अड्डा कायम करने जा रहा है। यह अपने देश से बाहर किसी दूसरे देश में उसका पहला सैनिक अड्डा होगा।

भारतीय उपमहाद्वीप की यह सबसे बड़ी विडंबना है कि इस क्षेत्र के दो बड़े देश भारत और पाकिस्तान कभी एक साथ एक खेमे में नहीं रह सकते। शीत युद्धकाल में भारत ने सोवियत संघ या रूस से दोस्ती बढ़ाई थी, तो पाकिस्तान ने अमेरिका से। अब उस युग की समाप्ति के बाद जब भारत और अमेरिका निकट आ रहे हैं, तो पाकिस्तान, अमेरिका से दूर होता जा रहा है। यद्यपि अभी भी अमेरिका पाकिस्तान को छोड़ना नहीं चाहता, किंतु वह एक साथ दोनों से अपने संबंध अच्छे नहीं रख सकता। यद्यपि पाकिस्तान ने बहुत पहले अपने लिए अमेरिका का विकल्प तलाश लिया था, किंतु जब तक अमेरिका और उसके हित एक थे तथा वह अमेरिका का झंडाबरदार बना रहा, किंतु अमेरिका का झुकाव भारत की ओर बढ़ते ही उसने अपने विकल्प का दामन मजबूती से पकड़ना शुरू कर दिया। इधर अमेरिका और पाकिस्तान के हित भी आपस में टकराने लगे, तो पाकिस्तानी हुक्मरानों के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि अमेरिकी कोप से बचने के लिए वह अपने दूसरे विकल्प और अमेरिका के पक्के प्रतिस्पर्धी चीन की शरणागति प्राप्त करे। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति भी ऐसी है कि चीन बहुत पहले से इस फिराक में था कि पाकिस्तान उसकी झोली में आ जाए या पाकिस्तान में पांव फैलाने का उसे अवसर मिल जाए। वहां अमेरिका का वर्चस्व रहते तो उसके लिए यह संभव नहीं था, लेकिन यदि पाकिस्तानी हुक्मरान स्वयं अमेरिका के खिलाफ उसे अपने यहां आमंत्रित करने को तैयार हो तो फिर उसके लिए क्या पूछना।

पाकिस्तान के लिए चीन के साथ गठजोड़ सर्वाधिक सुखद है, क्योंकि चीन केवल अमेरिका का ही नहीं भारत का भी जबर्दस्त प्रतिद्वंद्वी है। वैसे अमेरिका के साथ तो उसकी केवल सम्मान की लड़ाई है, लेकिन भारत के साथ तो उसका रोज का रगड़ा है। अमेरिका इस समय दुनिया की सबसे बड़ी सामरिक व आर्थिक शक्ति है, इसलिए चीन की महत्वाकांक्षा उसे पछाड़कर स्वयं विश्व की प्रथम महाशक्ति बनना है। चीन की इस महत्वाकांक्षा में सबसे बड़ा बाधक भारत है। मान लें एशिया में भारत न होता, तो आज पूरा एशिया व अफ्रीका अकेले चीन के प्रभाव में होता और इस प्रभव क्षेत्र के बल पर वह अमेरिका को सीधे चुनौती दे सकता था। चीन का सीधे मुकाबला करने की शक्ति भारत के अलावा अन्य किसी देश में नहीं है। जनसंख्या की दृष्टि से केवल भारत चीन का मुकाबला कर सकता है। चीन जनसंख्या जहां बुढ़ापे की ओर अग्रसर है, वहां भारतीय जनसंख्या जवानी की ओर है। भारत की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी की आयु 35 वर्ष से कम है। भारत की यह जवानी 2050 तक बनी रहने वाली है। भारत में बुढ़ापे का दौर उसके बाद आएगा। चीन इस समय सामरिक क्षमता व आर्थिक विकास में भले ही भारत से आगे हो, किंतु भारत में इस समय आर्थिक विकास की क्षमता चीन के मुकाबले कहीं अधिक है। इसीलिए कहा जा रहा है कि 2013 के बाद भारतीय आर्थिक विकास की दर चीन की विकास दर को पीछे छोड़ देगी। एकदलीय तानाशाही के शासन में जकड़ा चीन अपनी क्षमता के शिखर पर है। उसके बाद ढलान का दौर आना ही है। इसलिए चीन हर तरह से भारत के विकास को, उसकी आर्थिक व सामरिक क्षमता को रोकना चाहता है, जिससे चीनी वर्चस्व लंबे समय तक बना रह सके।

पाकिस्तान का ही सपना भारत की विकास यात्रा को रोकना और संभव हो तो उसे विखंडन के दौर में पहुंचा देना है। भारत यदि अपनी एकता बनाए रखता है, तो उसके विकास रथ को रोक पाना लगभग असंभव है। इसलिए पाकिस्तान दशकों से इस रणनीति पर काम कर रहा है कि कैसे भारत को तोड़ने का उपाय किया जाए। उसके पास इसका एक ही उपाय है- सांप्रदायिक अलगाववाद को तेज करना। इसीलिए उसने कश्मीर पर अपनी पूरी शक्ति लगा रखी है। चीन और पाकिस्तान दोनों का लक्ष्य है भारत को घेर कर उसे कमजोर करना और इस प्रकार न केवल एशिया पर अपना पूर्ण प्रभुत्व कायम करना, बल्कि अमेरिका को भी उत्तरी अमेरिका से बाहर केवल पश्चिमी यूरोप तक सीमित करना। चीन और पाकिस्तान दोनों बहुत दूर की कौड़ी पर नजर गड़ाएं हैं। दोनों इस ख्याल में हैं कि मुस्लिम जगत तथा एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देश यदि एक सूत्र में बंध जाएं, तो अमेरिका और उसके साथी यूरोपीय देशें को दुनिया की चौधराहट की गद्दी से नीचे उतारा जा सकता है। चीन अभी इस प्रलोभन में बहुत गहरे फंसा हुआ है। यह तय है कि यदि कभी ऐसी स्थिति कायम भी हो गयी, तो उसके बाद पहला संघर्ष स्वयं चीन और इस्लामी विश्व के बीच खड़ा होगा। क्योंकि चीन और पाकिस्तान अथवा चीन व इस्लामी विश्व के बीच कोई स्वाभाविक या सैद्धांतिक मैत्री नहीं है। दोनों के संबंध केवल स्वार्थ के अवसरवादी संबंध हैं, इसलिए अवसर निकलते ही दोनों के बीच संघर्ष छिड़ना अनिवार्य है। चीन तब निश्चय ही अपने किये पर पश्चाताप करेगा, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी रहेगी और उसे मदद करने वाला कोई शेष नहीं रहेगा।

अफगानिस्तान के मुद्दे पर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ी तनातनी के कारण चीन को पाकिस्तान में और गहराई तक जगह बनाने का अनायास ही एक स्वर्णिम अवसर मिल गया है। पाकिस्तान स्वयं चीन को अपने क्षेत्र में सैनिक अड्डे कायम करने के लिए आमंत्रित कर रहा है। ताजा खबरों के अनुसार पाकिस्तान ने चीन से अनुरोध किया है कि वह ग्वादर /ब्लूचिस्तान/ में जो बंदरगाह तैयार कर रहा है, उसे एक नौसैनिक अड्डे की तरह विकसित करे। चीन स्वयं इसे नौसैनिक अड्डे के रूप में विकसित करने का इच्छुक है, किंतु इसके पहले वह उत्तरी पाकिस्तान के कबायली इलाके में अपना एक सैन्य शिविर कायम करना चाहता है। चीन की नजर उत्तरी पाकिस्तान के केंद्र शासित क्षेत्रों ‘फाना‘ (फेडरल एडमिनिस्टर्ड नार्दर्न एरिया) पर है। यह इलाका चीन के मुस्लिम बहुल झिनजियांग प्रांत से लगा हुआ है, जहां इस्लाम विद्रोही चीन की नाक में दम किये हुए हैं। पाकिस्तान के एक पत्रकार व लेखक अमीर मीन ने ‘एशिया टाइम्स ऑनलाइन‘ पर लिखा है कि चीन पाकिस्तानी जिहादी संगठनों का झिनजियांग प्रांत से संबंध तोड़ने के लिए इस क्षेत्र में सैनिक अड्डा कायम करना चाहता है। पाक अधिकृत कश्मीर का यह इलाका चीनी कब्जे वाले कश्मीरी इलाके से भी लगा हुआ है। इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व भी अद्वितीय है। यहां से भारत, पाकिस्तान व अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र और पश्चिमी मध्य एशिया पर नजर रखी जा सकती है। अमीर मीर ने लिखा है कि चीनी झिनजियांग प्रांत में इस समय अलकायदा पोषित दो इस्लामी संगठन ‘ईस्ट तुर्कमेनिस्तान इस्लामिक मूवमेंट‘ और ‘तुर्किस्तानी इस्लामी पार्टी‘ तेजी से सक्रिया हैं। इन्हें हथियारों तथा प्रशिक्षण की पूरी सहायता पाकिस्तान से प्राप्त होती है। इस क्षेत्र के उइगर कबीले के लोगों ने - जिन्होंने हजारों वर्ष पहले इस्लाम कुबूल कर लिया था- चीन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद कर रखा है। चीनी रक्षा मंत्री लियांग गुआंगली के अनुसार इन इस्लामी उइगर विद्रोहियों पर नियंत्रण् के लिए यह आवश्यक है कि उनका पाकिस्तान के जिहादी संगठनों के साथ संपर्क काट दिया जाए। चीन की यों भी उत्तरी पाकिस्तान के गिलगित व बल्टिस्तान क्षेत्र में विशेष रुचि है, क्योंकि ये इस क्षेत्र के सर्वाधिक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थल है। पाकिस्तान की प्राथमिकता ग्वादर को नौसैनिक अड्डे के रूप में विकसित करने की है, जबकि चीन उसके साथ ही उत्तरी पाकिस्तान में अपना सैन्य अड्डा कायम करना चाहता है।

अभी एक अमेरिकी रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन भारत को सबक सिखाने या उस पर अपनी सैनिक क्षमता का दबदबा कायम करने के लिए कारगिल की तरह का घुसपैठ कर सकता है। ‘भारत-चीन संघर्ष के बारे में विचार‘ शीर्षक इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि चीन और भारत के बीच जैसी तनातनी चल रही है, उसमें कारगिल जैसे सीमित युद्ध की प्रबल संभावना है। यह संघर्ष पूरी सीमा के किस इलाके में हो सकता है, इसके बारे में उपर्युक्त रिपोर्ट में कोई संकेत नहीं है, किंतु अनुमान है कि यह अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में अथवा पश्चिमोत्तर क्षेत्र में लद्दाख या कश्मीरी नियंत्रण् रेखा के निकट किसी क्षेत्र में हो सकता है। चीन लगातार भारत से लगी अपनी दक्षिणी सीमा पर अपना दबाव बनाए हुए है। आए दिन सीमा क्षेत्र में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबरें आती रहती हैं। स्वयं भारतीय सेनाध्यक्ष ने यह चेतावनी दी है कि सीमा के बहुत अधिक निकट के क्षेत्र में चीनी सैनिकों का जमाव बढ़ रहा है। चीन ने भारतीय सीमा के निकट परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम मिसाइलों की श्रृंखला भी स्थापित कर रखी है। सीमा के बारे में उसका रवैया अभी भी संदेहास्पद बना हुआ है। अभी इसी बीते हफ्ते दिल्ली के एक समारोह में चीनी राजदूत ने एक भारतीय पत्रकार को ‘शट अप‘ कहकर झिड़क दिया, जिसने वहां वितरित पर्चे (ब्रोशर) पर अंकित भारत के नक्शे पर आपत्ति व्यक्त की थी। इस नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश तथा लद्दाख क्षेत्र को चीनी सीमा में दिखाया गया था।

पिछले दिनों भारत-पाकिस्तान के बीच केवल एक सकारात्मक खबर मिली कि पाकिस्तान सरकार ने भी भारत को व्यापारिक क्षेत्र में सर्वाधिक वरीयता प्राप्त (मोस्टर फेवर्ड कंट्री) देश का दर्जा दे दिया। भारतीय मीडिया ने इसे मोटी सुर्खियों में छापा मानो पाकिस्तान ने भारत के प्रति उदारता की सारी सीमाएं तोड़ दी हों, जबकि इसमें ऐसा कुछ नहीं है, जो भारत के लिए विशेष हो। पाकिस्तान ने अब तक सैकड़ों देशों को सर्वोच्च वरीयता प्राप्त देश (मोस्ट फेवर्ड कंट्री) का दर्जा दे रखा है। बल्कि सच कहा जाए तो भारत के प्रति शत्रुता के कारण ही वह अब तक उसे यह दर्जा देने से कतराता रहा, जबकि भारत पाकिस्तान को एक दशक से भी पहले यह दर्जा दे चुका है। इतनी विलंबित कार्रवाई के बावजूद पाकिस्तान में इसका विरोध शुरू हो गया है और कहा जा रहा है कि अमेरिका के दबाव में आकर ही भारत को इस तरह सर्वोच्च तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिया जा रहा है। एक अमेरिकी दैनिक में भारतीय विदेश विभाग के एक अधिकारी के हवाले से जब यह खबर छपी कि पाकिस्तान भारत को दिये गये दर्जे से अब पीछे हट रहा है, तो पकिस्तानी विदेश विभाग की प्रवक्ता तहमीना जोजुआ ने इसका त्वरित खंडन अवश्य किया, लेकिन पक्के तौर पर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि यह दर्जा बरकरार रहेगा। पाकिस्तान के दो वरिष्ठ मंत्रियों गृहमंत्री रहमान मलिक तथा रक्षा मंत्री चौधरी अहमद मुख्तार ने भारत को वरीयता प्राप्त देश का दर्जा दिये जाने का यद्यपि स्वागत किया है और कहा है कि भारत के साथ व्यापार में भेदभाव को खत्म करने के लिए यह आवश्यक था, फिर भी उनका कहना है कि पाकिस्तानी संसद (नेशनल असेंबली) यदि चाहेगी, तो वह इसे वापस भी ले सकती है। पाकिस्तानी व्यवसायियों ने आम तौर पर इसका स्वागत किया है, किंतु राजनीतिक विपक्षी दलों ने तीव्र विरोध किया है। जमाते इस्लामी ने तो इसके खिलाफ आंदोलन चलाने तक की धमकी दी है। जिन पाकिस्तानी नेताओं ने व्यापारिक संबंधों को और विकसित करने के इस निर्णय का स्वागत किया है, उन्होंने भी साथ में यह टिप्पणी जोड़ना जरूरी समझा है कि इसका यह अर्थ नहीं है कि पाकिस्तान के कश्मीर संबंधी रुख में कोई बदलाव आया है या भारत के प्रति उसकी नीति बदल गयी है।

कश्मीर एक ऐसा मुद्दा है, जिसे हर भारत विरोधी शक्ति अपने पहले हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है। इसलिए चीन भी कश्मीर के सवाल पर पूरी तरह पाकिस्तान के साथ है और उसके बहाने भारत को दबाव में रखना चाहता है। चीन पाकिस्तान गठजोड़ केवल पाक को अमेरिकी दबाव से बाहर निकालने के लिए ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत और अमेरिकी सम्मिलित प्रभाव का मुकाबला करना तथा एशिया में भारत के विकास की गति पर अंकुश लगाना। अंतर्राष्ट्रीय सामरिक रणनीति में अमेरिकी समकक्षता प्राप्त करने के लिए ही चीन ने महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के सभी रणनीतिक महत्व के बिंदुओं (क पॉइंट्स) पर अपनी उपस्थिति कायम करने की योजना बनायी है, जैसे स्ट्रेट ऑफ मंडाल, स्ट्रेट ऑफ मलक्का, स्ट्रेट ऑफ हरमुज तथा स्ट्रेट ऑफ लोम्बोक पर वह अपने और नौसैनिक पोत तैनात कर रहा है। मतबल हांगकांग से लेकर ‘पोर्ट ऑफ सूडान‘ तक वह अपनी इस तरह की सैन्य श्रृंखला बना रहा है। हिन्द महासागर में भारत को घेरने के लिए वह पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार (बर्मा), श्रीलंका, केन्या तथा सोमालिया में अपने अड्डे कायम कर रहा है। पाकिस्तान में बलूचिस्तान के क्षेत्र में चीन पूरी तरह अपने खर्चे पर ग्वादर बंदरगाह का विकास कर रहा है। उसी तरह बंगलादेश में चिटगांव, म्यांमार में सित्तवे, केन्या में लामू तथा श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह का विकास कर रहा है। पूरी तरह चीनी पैसे तथा नौसैनिक अड्डे ही बनेंगे। केन्या और सोमालिया हिन्द महासागर क्षेत्र में पूर्वी अफ्रीकी देश हैं। हिन्द महासागर में चीनी प्रभव बढ़ाने में इन अड्डों का खासा योगदान है।

चीन और पाकिस्तान की भारत के बारे में बहुत स्पष्ट समझदारी है। चीन का काम है भारत को सैनिक दृष्टि से घेरना और उसके बढ़ते रणनीतिक प्रभाव पर काबू रखना और पाकिस्तान का काम है भारत को भीतर से तोड़ने में सक्षम शक्तियों की मदद करना। कश्मीरियों के साथ पश्चिम में वह कुछ सिखों को भी भड़काने में लगा है और उन्हें स्वतंत्र खालिस्तान का सपना दिखा रहा है। पाकिस्तान उत्तर पूर्व भारत के उग्रवादी संगठनों तथा माओवादी उग्रवादियों से भी संपर्क बनाए हुए हैं।

पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई.एस.आई. ऐसे सभी संगठनों से संपर्क बनाये हुए है, जो भारत विरोधी गतिविधियों में लगे हैं या उसे तोड़ने अथवा कमजोर करने का काम कर रहे हैं। पाकिस्तान के जिहादी रणनीतिकारों के अनुसार अगले दो से चार दशकों के बीच इंडिया केवल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा व महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह जायेगा। उत्तर के मुस्लिम बहुल पूरे इलाके पाकिस्तान का अंग बन जायेंगे। तमिल अलग राज्य बन जायेगा। मराठे अपने राज्य बना लेंगे। हिन्दू बहुल राजस्थान गुजरात के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक हिन्दू राज्य बना रह सकता है। इन लोगों ने इस तरह के विखंडित भारत का एक नक्शा भी जारी कर रखा है।

ज्यादातर भारतीयों को यह सब अभी भले ही असंभव लगे, लेकिन विखंडनकारी शक्तियां जिस तेजी से सक्रिय हैं और राष्ट्रवादी शक्तियां जिस तरह की उदासीनता की शिकार हैं, उसमें ऐसा कुछ भी संभव हो सकता है। चीन की योजनाओं के खिलाफ देर से ही सही, भारत सरकार में कुछ चेतना आयी है। उसने चीन से लगी सीमा की निगरानी के लिए अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए एक लाख जवानों की नई भर्ती का निर्णय लिया है। उत्तरी सीमा पर क्रूज मिसाइलों की तैनाती का अभियान शुरू किया है। नौसेना तथा वायुसेना के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देने का फैसला किया है। लेकिन ये सब बाहरी रक्षा के उपकरण है। देश का सर्वाधिक खतरा भीतरी विखंडनकारी शक्तियों से है, लेकिन उन पर नियंत्रण की कोई योजना फिलहाल सरकार के पास नहीं है। संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति देश को सांप्रदायिक, जातीय तथा क्षेत्रवादी भावनाओं को भड़काकर अपना नितांत संकीर्ण स्वार्थ सिद्ध करने में लगी है। खतरा चीन और पाकिस्तान से तो है ही, लेकिन हमारा भीतरी खतरा उससे भी अधिक गंभीर है। क्या देश के राजनेता व प्रबुद्धजन इधर कुछ ध्यान देंगे ?

बुधवार, 2 नवंबर 2011

रियायतें देकर कश्मीर समस्या हल नहीं की जा सकती

श्रीनगर में आम हड़ताल: 27 अक्टूबर को हर वर्ष कश्मीर में काला दिवस मनाया जाता है,
क्योंकि इसी दिन 1947 में भारतीय सेना वहां उतरी थी।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एकतरफा तौर पर घोषणा कर दी है कि राज्य के कुछ इलाकों में सेना को दिया गया कानूनी विशेषाधिकार /ए.एफ.एस.पी.ए./ समाप्त कर दिया जाएगा। सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह ने इसका विरोध किया है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह स्वयं भी कश्मीरियों के लिए कुछ रियायतें तथा सहायता पैकेज घोषित करने वाले हैं। उसके साथ शायद वे यह पुरस्कार भी देना चाहें कि घाटी के कुछ इलाकों मेें सेना को निष्क्रिय कर दिया जाए। लेकिन सवाल है क्या ऐसा किया जाना देश हित में है ? क्या रियायतें दे देकर कश्मीर या पाकिस्तान को संतुष्ट किया जा सकता है? क्या कश्मीर जैसे मामले में केवल भावनात्मक आधार पर या मात्र राजनीतिक लाभ के लिए निर्णय लिया जाना चाहिए?

कश्मीर समस्या पाकिस्तान समस्या से अलग नहीं है। इसलिए पाकिस्तान की समस्या का समाधान हुए बिना कश्मीर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। पाकिस्तान के हुक्मरां कहते हैं कि उनके साथ भारत की समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि कश्मीर समस्या का समाधान नहीं हो जाता, जबकि सच्चाई यह है कि कश्मीर की अपनी कोई समस्या है ही नहीं, वह केवल पाकिस्तान समस्या का विस्तार है, जिसे पाकिस्तानी हुक्मरान भारत के विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। भारत सरकार तथा यहां के राजनेताओं को समझना चाहिए कि पाकिस्तान समस्या का समाधान हुए बिना कश्मीर में कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती। वास्तव में यदि कश्मीर में शांति स्थापित हो जाए, तो पाकिस्तान के अपने अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि उस स्थिति में पाकिस्तान की विशाल व शक्तिशाली सेना अप्रासंगिक हो जाएगी, उसका पूरे देश पर छाया दबदबा समाप्त हो जाएगा और तमाम आतंकवादियों की फौज बेरोजगार हो जाएगी। इसलिए इतना तय है कि भारत कितना भी चाह ले, पाकिस्तान कश्मीर में शांति स्थापित होने नहीं देगा।

तो जाहिर है कि यदि कश्मीर में शांति स्थापित करनी है, तो भारत को पाकिस्तान की तरफ ध्यान देना होगा और पहले उसकी समस्या से निपटना होगा। अब यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पाकिस्तान के साथ कश्मीर के अलावा और समस्या है ही क्या ? हमारे यानी भारत के राजनेता इस सवाल को कभी गंभीरता से लेने को तैयार नहीं होते। या तो वे इसे समझते नहीं या फिर समझते हुए भी वे इसे नजरंदाज करने की कोशिश करते हैं। दुनिया के तमाम देश भारत-पाक समस्या को दो पड़ोसी देशों की समस्या समझते हैं और मानते हैं कि किसी अन्य दो पड़ोसी देशों की तरह वे भी अपनी समस्या का समाधान कर सकते हैं। मिल बैठकर आपसी बातचीत से या कुछ ले-देकर वे आपसी तनाव दूर कर सकते हैं और एक अच्छे पड़ोसी की तरह रह सकते हैं। किंतु वे नहीं समझते कि भारत-पाक के मामले में यह अवधारणा सही नहीं है। भारत-पाक समस्या न तो दो राष्ट्रों की समस्या है और न दो पड़ोसियों की। वास्तव में यह इस क्षेत्र के कट्टरपंथी इस्लामी समुदाय के मजहबी अहंकार, अन्य मजहबों के प्रति द्वेष तथा पूरे देक्षिण एशिया पर अपना आधिपत्य कायम करने की मनोभावना की समस्या है। दूसरे शब्दों में यह इस्लामी शरीयत के शासन बनाम आधुनिक लोकतंत्र की समस्या है। इसलिए लड़ाई किसी देश से नहीं, बल्कि एक खास विचारधारा के साथ है। पाकिस्तान के साथ भारत की यही मूल समस्या है और इस समस्या का समाधान जब तक नहीं होता, तब तक न भारत-पाक समस्या का समाधान हो सकता है और न कश्मीर समस्या का।

कट्टरपंथी इस्लामी समुदाय का दावा इस पूरे दक्षिण एशिया पर अपने आधिपत्य का है। उनकी कल्पना थी कि अंग्रेजों के यहां से जाने के बाद इस पूरे क्षेत्र पर फिर से उनका राजनीतिक अधिकार होगा। लेकिन यह लक्ष्य पूरा न होता देखकर उन्होंने अपने लिए एक टुकड़ा लेकर समझौता कर लिया। यह समझौता कोई बंटवारा करके सुख से रहने का फैसला नहीं था, बल्कि यह एक रणनीतिक फैसला था। जितना अभी संभव है, उतना ले लो, बाकी के बारे में आगे निपट लिया जाएगा। वस्तुतः पाकिस्तान के कट्टरपंथी, इस्लामी राजनेताओं के लिए यह असहृय है कि उनके बगल में कोई गैर इस्लामी देश उनसे अधिक शक्तिशाली नजर आए। इसलिए उनकी हमेशा यह कोशिश रही है कि उनकी ताकत कतई भारत से कम न रहे उससे आगे नहीं तो उसके बराबर जरूर रहे। उनका भविष्य का एकमात्र सपना जैसे भी हो, भारत को तोड़ना फिर उस पर आधिपत्य जमाना मात्र है।

पाकिस्तान की विदेश नीति एकमात्र भारत केंद्रित है। अन्य देशें के साथ उसके संबंध भी उसकी भारत नीति से ही नियंत्रित होते हैं। दुनिया में जो भी भारत का विरोधी हो, वह उसका मित्र है। उसकी विदेश् नीति का एक ही सूत्र है, अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाना और भारत को कमजोर करना। अमेरिका के साथ उसके संबंध इसी नीति पर आधारित थे और आज चीन के साथ उसके संबंधें का विस्तार भी इसी नीति पर आधारित है। अमेरिका के साथ् उसके संबंध इसी नीति पर आधारित थे और आज चीन के साथ उसके संबंधों का विस्तार भी इसी नीति पर आधारित है। अमेरिका के साथ भारत के संबंध जैसे-जैसे सुधरने लगे, वैसे-वैसे पाक-अमेरिका संबंध में खटास आनी शुरू हो गयी। 1950 के दशक के प्रारंभ में ही पाकिस्तान ने स्वयं पहुंचकर अमेरिका के समक्ष सोवियत संघ के खिलाफ सहयोग करने का प्रस्ताव रखा, किंतु पाकिस्तान का लक्ष्य हमेशा भारत ही था। सोवियत संघ के कल्पित खतरे दिखाकर उसने अमेरिका से अधिक से अधिक सैनिक संसाधन एकत्र किये। अपने समय के आधुनिकतम लड़ाकू जहाज, टैंक, राडार तथा अन्य साजो सामान उसने अंतर्राष्ट्रीय सामरिक व्यूह रचना में अमेरिका की मदद के लिए एकत्र किया, किंतु उसका इस्तेमाल उसने 1965 में सीधे भारत के विरुद्ध किया। पाकिस्तान ने अपना परमाणु कार्यक्रम व मिसाइल कार्यक्रम भी भारत की सामरिक बराबरी के लिए ही चलाया, बल्कि आज यह समझा जाता है कि परमाणु अस्त्रों तथा मिसाइल प्रणाली में वह भारत से कहीं आगे है, जिस पर वह काफी गर्व का भी अनुभव करता है।

वास्तव में यदि पारंपरिक ढंग से भारत के मुकाबले पाकिस्तान की सामरिक शक्ति की तुलना की जाए, तो वह कहीं नहीं ठहरती। भारत पाकिस्तान के मुकाबले कहीं बड़ा देश है। उसकी सेना भी पाकिस्तानी सेना के दो गुने से अधिक है। और सबसे बड़ी बात यह कि आर्थिक शक्ति में भारत के मुकाबले पाकिस्तान की कहीं तुलना ही नहीं है। पाकिस्तान को इसका बोध न हो, ऐसा नहीं है, इसलिए उसने भारत पर अपनी श्रेष्ठता कायम करने के लिए भिन्न आधारों का चयन किया। भारत के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध में लगातार मुंह की खने के बाद उसने परोक्ष युद्ध के लिए आतंकवादी संगठनों का सहारा लिया। अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के खिलाफ जिहादी तालिबान फौजों के प्रयोग से उसे भारत के खिलाफ जिहादी संगठनों को खड़ा करने की प्रेरणा मिली। इसलिए ज्यादातर भारत विरोधी जिहादी संगठन 1990 के बाद गठित हुए। इसलिए अब भरत के विरुद्ध अपनी सामरिक श्रेष्ठता के लिए उसने आधार बना रखा है। एक तो प्रचुर परमाणु अस्त्र भंडार और उसे चलाने के लिए विविध स्तर की विश्वसनीय मिसाइल प्रणाली, दूसरे आतंकवादी जिहादी संगठन और तीसरे अफगानिस्तान को अपने साथ जोड़ना। अफगानिस्तान पर आधिपत्य उसकी भरत विरोधी रणनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इन तीन आधारों में से प्रथम दो में तो उसने अपनी श्रेष्ठता कायम कर ली है। चीन और उत्तर कोरिया के सहयोग से परमाणु अस्त्रों तथा उसके ‘डिलीवरी सिस्टम‘ यानी मिसाइलों के मामले में वह भारत से आगे है। जिहादी संगठन तो उसकी अकेली शक्ति है। भारत के पास उसके मुकाबले का कोई हथियार नहीं है। दुनिया के लोग अब तक नहीं समझ पा रहे हैं कि पाकिस्तान के जिहादी या आतंकवादी संगठन पाकिस्तानी सेना के ही विस्तार हैं। अपने सैन्य गुप्तचर संगठन आई.एस.आई. के माध्यम से पाकिस्तान की सरकार ही इनके प्रशिक्षण, हथियारों तथा आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करती है।

पाकिस्तान इन दिनों अफगानिस्तान में अपनी रणनीतिक विफलता को लेकर चिंतित है, किंतु अब वह चीन का सहयोग लेकर इस विफलता को सफलता में बदने की कोशिशमें लगा है। वैसे भी अफगानिस्तान पाकिस्तान की प्रतिरक्षात्मक आवश्यकता है, उसकी आक्रामक शक्ति तो उसके आतंकवादी संगठनों में है। और भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाने वाला सबसे बड़ा हथियार कश्मीर तो अभी उसके हाथ में है ही। भारतीय क्षेत्र में उसकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि कश्मीर के मामले में उसने स्वयं भरत में अपने समर्थकों की श्रृंखला खड़ी कर ली है। देश के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण जैसे लोग जहां पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने और वहां से सेना हटाने की बात कर रहे हैं, अरुंधती राय जैसी लेखिका कश्मीर के भारत के विलय की वैधानिकता पर सवाल उठा रही हो, द हिन्दू जैसे समाचार पत्र जहां यह लिख रहे हों कि जम्मू-कश्मीर से ज्यादा हिंसा और अपराध तो दिल्ली राज्य में हो रहे हैं, फिर वहां सेना रखने या सेना को विशेष कानूनी अधिकार (सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून- ए.एफ.एस.पी.ए.) देने की क्या जरूरत है, वहां पाकिस्तान को और अधिक क्या करने की आवश्यकता है। जहां राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करने की आम प्रवृत्ति हो, वहां किसी भी शत्रु का काम करना आसान हो जाता है।

गत सप्ताह कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एकरतफा तौर पर घोषणा कर दी कि जम्मू-कश्मीर के कुछ जिलों से सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून (ए.एफ.एस.पी.ए.) हटा लिया जाएगा। मुख्यमंत्री होने के नाते उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ गठित संयुक्त कमान के अध्यक्ष हैं। किंतु उनको इसका अधिकार कैसे मिल गया कि वह एकतरफा तौर पर इस कानून को हटाने की घोषणा कर दें। इस कानून को लागू करने या हटाने का अधिकार केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को है। राज्य में उमर अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस की कांग्रेस के साथ साझा सरकार है। उन्होंने इसके लिए अपनी सहयोगी पार्टी के अध्यक्ष सैफुद्दीन सोज ने साफ कहा है कि उमर ने इस बारे में कांग्रेस से राय नहीं ली। उन्होंने प्रतिरक्षा मंत्रालय से भी कोई सलाह-मशविरा नहीं किया और न जम्मू-कश्मीर में कार्यरत सुरक्षा बलों की ‘यूनीफाइड कमान‘ से ही कोई चर्चा की। उमर का कहना है कि इसकी चर्चा राज्य कैबिनेट की बैठक में हुई थी, जिसमें उपमुख्यमंत्री भी उपस्थित थे, जो कांग्रेस के सदस्य हैं।

जाहिर है उमर ने यह एकतरफा घोषणा करके कांग्रेस को उलझााने तथा घाटी में अपना राजनीतिक लाभ उठाने के लिए ही है। इसे राज्य में वह अपनी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में गिना सकते हैं और इसके द्वारा वह महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पी.डी.पी.) की जमीन कमजोर करने का भी काम कर सकते हैं, क्योंकि पी.डी.पी. लगातार कश्मीर से सेना को हटाने और नहीं तो कम से कम उसे दिये गये विशेषाधिकारों को समाप्त करने की मांग कर रही थी। भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर से सेना को हटाने या उसे दिये गये कानूनी अधिकारों को हटाने का विरोध किया है। सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह ने अपने एक सार्वजनिक वक्तव्य में कहा है कि विशेषाधिकार कानून हटाने या न हटाने का प्रश्न केंद्रीय गृह मंत्रालय के विचाराधीन है। उस संबंध में उसे ही निर्णय लेना है। इस संदर्भ में भारतीय सेना के विचार उसे बता दिये गये हैं। ऐसी खबर है कि गत गुरुवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निवास पर मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति की बैठक हुई, जिसमें ए.एम.एस.पी.ए. के बारे में चर्चा हुई। करीब 90 मिनट चली इस चर्चा में प्रतिरक्षा मंत्री ए.के एंटनी, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी तथा गृह मंत्री पी. चिदंबरम शामिल हुए। विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा राष्ट्रमंडल देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने आस्ट्रेलिया गये हुए थे, इसलिए वह शामिल नहीं हो सके। लंबी चर्चा के बाद भी इस बैठक में कोई निर्ण नहीं लिया जा सका।

यहां आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वहां सेना को ऐसे कौनसे कानूनी अधिकार दे दिये गये हैं, जिसे लेकर इतना हंगामा खड़ा है। वस्तुतः सेना बाह्य शत्रुओं से रक्षा के लिए गठित संगठन है। आंतरिक असुरक्षा की स्थिति में काम करने के लिए उसके पास ऐसे कोई कानूनी अधिकार नहीं हैं, जिस तरह केंद्रीय सुरक्षा बलों (सी.आर.पी.एफ.) या अन्य अर्धसैनिक बलों के पास हैं। इसलिए सेना को अपनी कार्रवाई में कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए यह कानून बनाया गया। इस कानून के अंतर्गत सेना को किसी की भी गिरफ्तारी करने, तलाशी लेने, हिरासत में लेकर पूछताछ करने और प्रतिरोध की स्थिति में प्रतिरोधक को ध्वस्त करने का अधिकार है। रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद के अनुसार सेना को इस कानून के अंतर्गत मिली शक्तियां राज्य पुलिस को मिली शक्तियों से भी कम हैं। उनका कहना है कि हमें समझना चाहिए कि यदि अपनी सीमा में अशांति से लड़ने के लिए सेना को लगाना है, तो उसे अपनी सुरक्षा के लिए कुछ कानूनी अधिकार तो देने ही होंगे। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि यह कानून पहले कुछ जिलों से हटाया जाएगा, किंतु यह स्थिति तो और घातक होगी। अपराधी अपराध करके आसानी से उन सुरक्षित इलाकों में जा छिपेगा, जहां सेना कोई कार्रवाई नहीं कर सकेगी। सूद के अनुसार इस कानून को आंशिक रूप से हटाना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। लश्कर-ए-तैयबा के जिहादी सीमा पर लगातार घुसपैठ की ताक में बैठे हैं, ऐसे में सेना की मामूली ढील से भी कश्मीर के हालात फिर बिगड़ सकते हैं। उनकी सलाह है कि उमर को घाटी के लोगों को संतुष्ट करने की इतनी ही बेताबी है, तो वह पहले वहां लागू ‘अशांत क्षेत्र कानून (डिस्टर्ब एरिया एक्ट) हटाने की कार्रवाई करें, जिसका उन्हें अधिकार भी है, किंतु देशहित में सबसे अच्छा तो यही है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के इस मामले में राजनीति न करें।

अफसोस की बात यह है कि राज्य की पार्टियां ही नहीं स्वयं कांग्रेस भी यह सोचती है कि कुछ रियायतें देकर कुछ और आर्थिक सहायता देकर कश्मीरी आंदोलनकारियों को शांत किया जा सकता है। स्वयं गृहमंत्री पी. चिदंबरम भी इस विचार के हैं कि कश्मीरी आंदोलनकारियों को शांत करने के लिए अंशतः सेना को हटाने की कार्रवाई की जा सकती है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सोच है कि यदि कश्मीरी युवकों के लिए रोजगार के और अधिक अवसर उपलब्ध कराये जाएं, तो आए दिन सड़कों पर तउरने की उनकी प्रवृत्ति रोकी जा सकती है। कश्मीर समस्या का समाधान तलाशने के लिए उनके द्वारा नियुक्त वार्ताकारों की एक समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी तरह का सुझाव दिया है। वर्तमान केंद्र सरकार व उसके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ही नहीं, उनके पहले की सरकारों का भी यही ख्याल था कि कुछ रियायतें तथा सहायता देकर कश्मीर की समस्या को भी सुलझाया जा सकता है और पाकिस्तान के साथ उत्पन्न तनाव को खत्म किया जा सकता है, किंतु पिछले 5-6 दशकों के अनुभव तो यही बताते हैं कि रियायतें देकर न तो पाकिस्तान समस्या का समाधान हो सकता है, न कश्मीर समस्या का। भारत के विरुद्ध पाकिस्तान या कश्मीर का संघर्ष कुछ रियायतें या सहायता पाने के लिए नहीं है। हां भारत यदि ऐसी रियायतें या सहायता देता है, तो उसे ले लेने में क्या हर्ज है। भारतीय रियायतों का लाभ उठाकर भारत के विरुद्ध लड़ाई लड़ना और आसान ही होगा।

पाकिस्तान को सहायता या रियायतें देकर मनचाही दिशा में मोड़ा नहीं जा सकता। इसका ताजा उदाहरण अमेरिका पाक संबंधों की वर्तमान स्थिति में देखा जा सकता है। पाकिस्तानी सेना ने अमेरिका को साफ बता दिया है कि वह उत्तरी वजीरिस्तान में हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगा। अमेरिका अपनी सैनिक व आर्थिक सहायता देय नहीं, किंतु तालिबान संगठनों के खिलाफ अब तक वह जो कुछ कर चुका है, अब उसके आगे कुछ नहीं करेगा। उस स्थिति में भी जब कि पाकिस्तान की पूरी अर्थव्यवस्था अमेरिकी आर्थिक सहायता पर टिकी है, वह उसे साफ जवाब देने में राई रत्ती संकोच नहीं कर रहा है। जबसे अफगानिस्तान में अमेरिकी हमला शुरू हुआ है, तब से अब तक अमेरिका उसे करीब 22 अरब डॉलर की सहायता दे चुका है, फिर भी पाकिस्तान एक सीमा से आगे झुकने के लिए तैयार नहीं है। जाहिर है वह अपनी शर्तों पर अमेरिका से सहायता लेता रहा है। अमेरिका स्वयं सहायता देकर या रियायतें देकर उसे झुकाने की स्थिति में नहीं है। 2001 में भी तत्कालीन पाक राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ अफगानिस्तान के विरुद्ध युद्ध में अमेरिका का साथ देने के लिए तब तैयार हुए थे, जब राष्ट्रपति बुश ने उन्हें चेतावनी दी थी कि यदि उन्होंने साथ नहीं दिया, तो अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान को भी खंडहर बना दिया जाएगा। जाहिर है कि यदि रियायतों और सहायता से अमेरिका पाकिस्तान को नहीं झुका सकता, तो भारत उसे क्या झुका लेगा।

पाकिस्तान हमेश यह कहता है कि भारत पाकिस्तान के बीच केंद्रीय विवाद का विषय कश्मीर है। भारत पहले कश्मीर समस्या का समाधान करे। उसकी नजर में कश्मीर समस्या का एक ही समाधान है- उसका भारत से अलग होना, जिससे कि वह पाकिस्तान का अंग बन सके। कश्मीरियों की भी यही मांग है। भारत वहां से अपना कब्जा हटाए। उनका तर्क है कश्मीर कश्मीरियों का है, भारत ने सैन्य बल से उस पर जबर्दस्ती कब्जा कर रखा है। कश्मीर से भारतीय सेना को हटाना उनके युद्ध का पहला पड़ाव बन गया है। इसीलिए घाटी में प्रत्येक 27 अक्टूबर को ‘विरोध दिवस‘ मनाया जाता है, क्योंकि इसी 27 अक्टूबर 1947 को पहली बार भारतीय सेना कश्मीर में उतरी थी। अपने देश में कोई भी संगठन उस दिवस को विरोध दिवस के रूप में नहीं मनाता, जब पाकिस्तानी सेना ने काबायलियों की ओट में कश्मीर पर हमला किया थ और भारी मार काट मचाई थी। हम पाकिस्तान से सद्भाव बनाए रखने के लिए उसकी काली करतूतों को उजागर करने का कभी कोई उपक्रम नहीं करते।

हमारी सरकारें और हमारी राजनीतिक पार्टियां भी देश-दुनिया को यह बताने की कोशिश नहीं करतीं कि कश्मीर समस्या मजहबी अलगाववाद तथा इस्लामी साम्राज्यवाद की समस्या है। यह किसी अन्याय अत्याचार के विरुद्ध कोई मानवाधिकार रक्षा की लड़ाई नहीं, बल्कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को तोड़ने और आधुनिक उदार मानववाद को ध्वस्त करने की हिंसक साजिश है।

कश्मीर हो या कोई भी अन्य क्षेत्र, उसके बारे में नीति निर्धारित करते समय राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे पहले ध्यान रखना चाहिए। कोई रियायत भी दी जाए, तो उसके लिए भी राष्ट्रीय हित को ही कसौटी बनाया जाना चाहिए। केवल अच्छा दिखने के लिए या अपनी अथवा अपनी पार्टी की छवि सुधारने के लिए ऐसी हरकतें नहीं करना चाहिए। भावनाओं के आधार पर कश्मीर जैसे मामले में कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता। फैसले जो भी हो, वे तार्किक व यथार्थपरक होने चाहिए। कश्मीर से सेना हटाने का काम हो सकता है। उसे दिये गये विशेषाधिकार भी वापस लिये जा सकते हैं, लेकिन जब वहां स्थितियां उसके अनुकूल हो जाएं तब। केवल उमर अब्दुल्ला की राजनीतिक छवि चमकाने के लिए या उनके मुकाबले कांग्रेस को अधिक उदार सिद्ध करने के लिए कश्मीर के बारे में कोई निर्ण नहीं लिया जाना चाहिए। सुरक्षा के मामले में सेना की राय हमेश निहित स्वार्थी राजनेताओं की राय से बेहतर होगी, इसलिए उसका सम्मान किया जाना चाहिए।