सोमवार, 24 मई 2010

राजनीतिक बदलाव की राह पर ब्रिटेन

2010 के संसदीय चुनाव ने ब्रिटिश राजनीति में एक नये युग का सूत्रपात किया है। कल तक जिसकी कल्पना भी कठिन थी, उसका व्यवहार में अवतरण हुआ है। सिद्धांततः दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ी राजनीतिक पार्टियों कंजर्वेटिव व लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टियों के युवा नेताओं डेविड कैमरन  तथा निक क्लेग (दोनों की आयु 43 वर्ष) ने देश साझा सरकार बनाकर एक नई तरह की राजनीति की शुरुआत की है। कहना कठिन है कि यह सरकार कब तक चलेगी। चल भी पाएगी या नहीं। लेकिन दोनों ने प्रारंभिक दौर में जिस तरह की समझदारी का प्रदर्शन किया है, उससे ऐसी आशा बंधती है कि शायद न केवल यह सरकार पूरे पांच वर्ष चले, बल्कि एक नई राजनीतिक संस्कृति का भी विकास करे, जो न केवल ब्रिटेन के कायापलट में सहायक हो, बल्कि उसके राजनीतिक अनुयायी अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए भी प्रेरणादायक सिद्ध हो सके।







अपने देश भारत की राजनीतिक स्थिति तो सबके सामने है। लोग स्वयं उसका अनुभव कर रहे हैं। मगर अब देख रहे हैं कि जिस महान देश से हमने अपनी राजनीतिक प्रणाली उधार ली है, वहां भी हालात ठीक नहीं है। 6 मई 2010 को हुए ब्रिटिश संसद के चुनाव में किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका। त्रिशंकु संसद की स्थिति बनी, दो परस्पर विरोधी विचारधारा वाले दल निकट आए और उन्होंने राजनीतिक स्थिरता के लिए एक साझा सरकार कायम करने का निश्चय किया। दोनों ने अपने सिद्धांतों और लक्ष्यों से कुछ समझौता किया- कुछ अपना छोड़ा, कुछ दूसरे का अपनाया और 11 मई को, करीब 65 वर्षों के बाद डेविड कैमरून के नेतृत्व में कंजर्वेटिव और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की एक साझा सरकार अस्तित्व में आयी। इसके बारे में अभी से संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि क्या यह सरकार चल पाएगी। यद्यपि प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने दावा किया है कि यह सरकार पूरे पांच साल चलेगी, किंतु राजनीतिक विश्लेषकों को उनके दावे पर भरोसा नहीं है। कई की तो राय है कि यह सरकार एक साल भी चल जाए, तो बहुत है। कुछ और भी दिन चल जाए तो भी इसके पूरे पांच साल खिंचने की तो उम्मीद नहीं है, यानी अगला आम चुनाव समय से पहले ही हो सकता है। और यदि यह सरकार पूरे पांच साल चल गयी, तो आज की ब्रिटिश राजनीति में यह एक चमत्कार होगा।

ब्रिटेन में गत 13 वर्षों से लेबर पार्टी का शासन था। टोनी ब्लेयर ने वर्षों से हाशिए में पड़ी लेबर पार्टी की नीतियों में सुधार करके उसे ब्रिटिश् मध्यवर्ग की आकांक्षाओं के अनुकूल बनाया, जिसका परिणाम हुआ कि 1997 के चुनाव में कंंजर्वेटिव पार्टी की जगह लेबर पार्टी की सत्ता कायम हुई और ब्लेयर एक चमत्कारी लेबर नेता के तौर पर प्रधानमंत्री बने। लेकिन इराक पर हुए हमले में अमेरिका का साथ देने के निर्णय ने उनकी लोकप्रियता कम कर दी और उन्हें अभी तीन साल पहले सत्ता से हटना पड़ा और गार्डन ब्राउन सत्ता में आए। किंतु ब्राउन भी लेबर सरकार की छवि संभाल नहीं सके और 2010 के इस चुनाव में इस पार्टी को 1918 के बाद सबसे कम सीटें मिली हैं। उसे 90 सीटों का घाटा हुआ और केवल 258 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

चुनाव में पराजित होने के बाद भी ब्राउन अभी कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ साझेदारी की बात चलायी, लेकिन बात बन नहीं सकी। लिबरल डेमोक्रेट नेता दोनों तरफ संपर्क साधे हुए थे। एक तरफ वे लेबर नेताओं से बातचीत कर रहे थे, दूसरी तरफ कंजर्वेटिव पार्टी के कर्णधरों से भी सौदेबाजी चल रही थी। अंत में कजर्वेटिव और लिबरल डेमोक्रेट्स के बीच पटरी बैठ गयी। शायद इसमें इन दोनों पार्टियों के युवा नेताओं की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका थी। कंजर्वेटिव नेता डेविड कैमरून और लिबरल डेमोके्रटिक पार्टी के निक क्लेग दोनों की पार्टियों की राजनीतिक विचारधारा में कितना भी फर्क क्यों न हो, लेकिन दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि व शिक्षा दीक्षा लगभग समान है। दोनों ही अभिजात वर्ग से आते हैं और संयोग से दोनों की आयु भी समान 43 वर्ष है। यों ब्रिटिश कानून के अनुसार वहां कंजर्वेटिव की अल्पमत सरकार भी चल सकती थी, किंतु राजनीतिक स्थिरता के लिए यह साझेदारी का प्रयोग अपनाया गया। ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी दक्षिण पंथी (सेंटर राइट) झुकाव वाली पार्टी मानी जाती है। लेबर पार्टी तो वामपंथी झुकाव वाली पार्टी है ही। इधर यूरोप में कुछ ऐसी हवा चल रही है कि वामपंथी झुकाव वाली पार्टियां कूड़े में फेंक दी जा रही हैं। ब्रिटेन के साथ फ्रांस, जर्मनी व इटली में भी यह रुख देखा जा सकता है। फ्रांस में सरकोजी, जर्मनी में मर्केल तथा इटली में बर्लुस्कोनी का सत्ता में आना इसका प्रमाण है। ये सभी दक्षिणपंथी झुकाव वाले नेता है। लेकिन साथ ही यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अर्थव्यवस्था की खराब स्थिति को लेकर पूरे यूरोप में असंतोष बढ़ रहा है, जिसका स्वाद सरकोजी और मर्केल को भी क्षेत्रीय चुनावों में चखना पड़ा है। इससे यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पार्टियों की विचारधारा अब बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह गयी है। महत्वपूर्ण यह है कि कौनसी पार्टी जनता का जीवन स्तर बेहतर बना सकती है या कौनसी वैसा करने में विफल रहती है। 2010 के इस चुनाव में प्रचार के दौरान लेबर पार्टी के नेताओं का कंजर्वेटिव पार्टी के नेता पर सबसे बड़ा हमला यही था कि वे ब्रिटिश अभिजात वर्ग से आते हैं, वे देश की आम जनता की समस्याओं को क्या जाने। उनका कभी आम आदमी से संपर्क तक नहीं हुआ। यद्यपि यही बात लिबरल डेमोक्रेट नेता निक क्लेग के बारे में भी कही जा सकती है, लेकिन उनकी पार्टी की छवि आम आदमी से जुड़ी है। कैररून एक ‘स्टॉक ब्रोकर‘ (शेयर दलाल) के बेटे हैं और यदि उनकी वंश परंपरा को देखें, तो वह सीधे ब्रिटिश राजवंश की श्रंृखला से जुड़े हुए हैं। उनके ग्रेटx५  ग्रैंडफादर‘ किंग विलियम चतुर्थ थे, जो महारानी विक्टोरिया के चाचा थे। रानी डोरोथिया जार्डन (जिनकी वंश परंपरा में डेविड कैमरून आते हैं) उनकी वैध पत्नी नहीं थीं, इसलिए उनके वंशज गद्दी के हकदार नहीं हुए, लेकिन रक्त परंपरा से वह ब्रिटिश राजवंश के ही प्रतिनिधि माने जाते हैं। कैमरून की शिक्षा-दीक्षा भी एटॉन व आक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में हुई। आक्सफोर्ड में उन्होंने दर्शन राजनीति एवं अर्थशास्त्र का अध्ययन किया तथा प्रथम श्रेणी आनर्स की स्नातक उपाधि प्राप्त की। क्लेग भी एक बैंकर के बेटे हैं। रईस बाप के बेटों की तरह उन्हें भी प्रारंभिक शिक्षा प्राइवेट ट्यूशन द्वारा घर पर ही मिली, लेकिन बाद में उच्च शिक्षा कैम्ब्रिज जैसे प्रतिष्ठान से प्राप्त की। इस तरह की सामाजिक व पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा आयु की समानता के कारण बहुत से लोगों का अनुमान है कि कैमरून तथा क्लेग एक अच्छी राजनीतिक जोड़ी के रूप में प्रतिष्ठित हो सकते हैं।

कैमरून ब्रिटेन के इतिहास में पिछले 198 वर्षों में अब तक के सबसे युवा प्रधानमंत्री हैं। 11 मई को प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद गुरुवार 14 मई को जब वह प्रधानमंत्री निवास (10 डाउनिंग स्ट्र्ीट) के ‘कैबिनेट रूम‘ में पहंचे, तो उन्होंने उस क्षण के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस कक्ष में 65 वर्षों के बाद किसी साझा सरकार की कैबिनेट बैठक होने जा रही है। द्वितीय विश्वयुद्धकाल में ब्रिटेन में सभी दलों की मिली जुली राष्ट्र्ीय सरकार (नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट) स्थापित की गयी थी, जिसके प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल थे। 1945 में एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी की नई सरकार कायम हुई थी। तब से अब तक किसी एक पार्टी की एकल सरकार ही बनती आयी थी, वह चाहे कंजर्वेटिव पार्टी की हो या लेबर पार्टी की। लिबरल डेमोक्रेट्स को अब तक कभी सत्ता सुख चखने का मौका नहीं मिला था। 1988 में अपने वर्तमान रूप में (लिबरल पार्टी तथा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के विलय से बनी) आने के बाद यह पहला अवसर है, जब उसे सत्ता मेंे भागीदारी का अवसर मिल रहा है। ब्रिटेन में 1918 तक किसी तीसरी पार्टी की मान्यता नहीं थी। बाद में प्रसिद्ध व्यक्ति स्वातंत्र्यवादी दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल के विचारों की प्रेरणा से लिबरल पार्टी का जन्म हुआ। इसका मूल लक्ष्य व्यक्ति के अपने व्यक्तिक अधिकारों की रक्षा का था। मिल की किताब ‘आॅन लिबर्टी‘ इस पार्टी का एक तरह से धर्मगं्रथ ही रहा। 1980 में लेबर पार्टी से टूटकर निकले एक धड़े ने ‘सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी‘ के नाम से एक पार्टी बनायी। लेकिन बाद में लिबरल पार्टी व सोशल डेमोक्रेटिक नेताओं ने अनुभव किया कि देश में चैथी राजनीतिक पार्टी के लिए जगह नहीं है, तो दोनों ने परस्पर गठबंधन कर लिया। और अंततः उन्होंने 1988 में परस्पर विलय करके लिबरल डेमोक्रेटिक (लिब-डेम) पार्टी बनायी।

ब्रिटेन के दीर्घकालिक लोकतांत्रिक राजनीति में सचमुच यह एक अपूर्व राजनीतिक अवसर है, जब देश की राजनीति के विपरीत ध्रुवों पर खड़ी राजनीतिक पार्टियों ने हाथ मिलाया हो। कैमरून शायद इसीलिए यह बार-बार दोहरा रहे हैं कि ‘यह एक नई तरह की सरकार होगी‘, ब्रिटेन में यह ‘एक नई राजनीति‘ की शुरुआत है। शुक्रवार को जब वह नवगठित कैबिनेट की पहली बैठक में पहुंचे, तो वह उत्साह व उत्तेजना से लबरेज थे। उनका आह्वान था कि अब हमें अपने सभी पुराने सैद्धांतिक मतभेदों को भुलाकर आगे की राजनीति को देखना चाहिए। हमें छूट देने और समझौता करने (कंसेशंस एंड कंप्रोमाइज) की रजानीति पर आगे बढ़ना है।

नवगठित कैबिनेट में कंजर्वेटिव पार्टी के 18 तथा लिब-डेम के 5 सदस्य हैं। 5 कैबिनेट सीटें लिब-डेम के पास चले जाने पर कंजर्वेटिव नेताओं के सीने पर सांप लोटना स्वाभाविक है, लेकिन समझौते के लिए कुछ तो त्याग करना ही पड़ेगा। कंजर्वेटिव नेताओं को इससे भी जलन हो रही है कि लिब-डेम के नेता क्लेग को भी उनके अपने नेता कैमरून के लगभग समकक्ष दर्जा प्राप्त है। क्लेग को उपप्रधानमंत्री का दर्जा दिया गया है और समान आयु के नाते दोनों ही एक-दूसरे को उनके प्रथम नाम से ही पुकारते हैं।

खैर, अब सरकार तो बन गयी है, लेकिन उसे अब उन चुनौतियों का मुकाबला करना है, जो उनके सामने मुंह फैलाए खड़ी है। कैमरून ने इस चुनौती के मुकाबले की शुरुआत कैबिनेट की अपनी पहली बैठक से ही कर दी है। देश के सामने सबसे गंभीर समस्या भारी बजट घाटे की है। वर्तमान समय में यह घाटा 250 अबर डॉलर से अधिक का है। यह शायद देश के कुल बजट के 13 प्रतिशत से भी अधिक है। इस घाटे को कम करने के लिए जरूरी है कि सरकारी खर्चे कम किये जाएं तथा आमदनी बढ़ाने के उपाय किये जाएं। खर्चे में कटौती कल्याण योजनाओं में कमी करके ही हो सकती है और आमदनी बढ़ाने के लिये नये कर लगाना पड़ेगा। कैबिनेट ने खर्चे कम करने की प्रतीकात्मकम शुरुआत मंत्रियों के वेतन में 5 प्रतिशत की कटौती का निर्णय लेकर की। इस कटौती से प्रधानमंत्री के वेतन में करीब 2,10,000 डॉलर की कमी आएगी। कैबिनेट की राय में 2014 तक इस बजट घाटे में कम से कम 60 से 70 अरब डॉलर की कमी किये जाने की जरूरत है। दिक्कत यही है कि सारी कल्याणकारी योजनाओं में एक साथ कटौती नहीं की जा सकती। बल्कि ‘राष्ट्र्ीय स्वास्थ्य सेवा‘ योजना का बजट बढ़ाये जाने की जरूरत है।आर्थिक के बाद दूसरी सबसे बड़ी चुनौती बीमार राजनीतिक प्रणाली में सुधार की है। राजनीतिक प्रणाली में कई तरह के सुधारों के प्रस्ताव हैं। लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी का एक बड़ा चुनावी वायदा चुनाव प्रणाली में सुधर का है। राजनीतिक स्थिरता के लिए संसद का कार्यकाल स्थिर करने का भी प्रस्ताव है। अपने देश में भी जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली साझा सरकार कायम हुई थी, तो संविधान व चुनाव प्रणाली में सुधार के अनेक प्रस्ताव सामने आए थे। संसद का कार्यकाल स्थिर करने का भी एक सुझाव था। लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक साथ पांच वर्ष के नियमित अंतराल पर कराये जाने के मामले को लेकर मीडिया में काफी बहसें भी हुईं। अमेरिकी शैली की राष्ट्र्पतीय शासन प्रणाली अपनाने के सुझाव भी सामने आये। लेकिन ये सारे प्रस्ताव और सुझाव धीरे-धीरे डूब गये, क्योंकि बहुदलीय शासन प्रणाली में उभरे तमाम छोटे-छोटे दलों के लिए वर्तमान स्थिति ही सर्वाधिक हितकर लगती है। अब तो कोई चुनाव प्रणाली में सुधार तक की बात नहीं करता, लेकिन ब्रिटेन में इस समय यह चर्चा काफी गर्म है। चुनाव खर्चों पर नियंत्रण की बात भी तेजी से उठायी जा रही है। उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया को लेकर भी मंथन चल रहा है। इस मामले पर कंजर्वेटिव व लिबरल डेमोक्रेट्स के बीच सीधी टक्कर की स्थिति पैदा हो सकती है।

एक तीसरी बड़ी चुनौती यूरोपीय संघ से संबंधों को लेकर है। कंजर्वेटिव पार्टी हमेशा ही ब्रिटेन की स्वतंत्र सत्ता की हिमायती रही है। वह ब्रिटेन को यूरोपीय संघ में विलीन करने के सख्त खिलाफ है। अंतर्राष्ट्र्ीय संबंधों में इसीलिए ब्रिटेन यूरोपीय देशों के बजाए अमेरिका के अधिक निकट रहता है। ब्रिटेन अपनी मुद्रा, अपनी राजनीतिक सत्ता तथा अपनी स्वतंत्र पहचान को बनाए रखने के प्रति अधिक आग्रही है। वह युरोपीय संघ का सदस्य होकर भी व्यवहार में उससे बाहर ही है। ब्रिटेन की यह मानसिकता वास्तव में उस ब्रिटिश अभिजात वर्ग की मानसिकता है, जिसका प्रतिनिधित्व कंजर्वेटिव पार्टी करती है। यह वर्ग अभी भी मानसिक स्तर पर उसी ब्रिटिश साम्राज्यवादी युग में जी रहा है, जब उसकी साम्राज्य सीमा में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। लिबरल डेमोके्रटिक पार्टी का नेतृत्व यूरोप के साथ अधिक घनिष्ठता कायम करने का पक्षधर है। उसकी राय में ब्रिटेन को अमेरिका का पिछलग्गू बनने के बजाए यूरोपीय देशों के साथ रहना चाहिए।

लगता है डेविड कैमरून यूरोप के मामले में अपनी पार्टी की पुरानी नीति त्यागकर लिबरल डेमोक्रेट्स की नीति अपनाना चाहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री पद ग्रहण करने के तुरंत बाद तमाम यूरोपीय राष्ट्र्ाध्यक्षों से फोन पर बात की। उन्होंने अभी सरकार गठित करने का काम पूरा करने के पहले ही जर्मनी की चांसलर एजेंला मार्केल को फोन किया और साझा सरकार के गठन के बारे में उनकी सलाह मांगी। बुधवार के उन्होंने फ्रांस के राष्ट्र्पति निकोलस सरकोजी से फोन पर बात की और फ्रांस के प्रसिद्ध नेता चाल्र्स दे गाल के 1940 में दिये गये ऐतिहासिक भाषण के वार्षिक स्मृति समारोह के अवसर पर उन्हें लंदन आने का निमंत्रण दिया। कैमरून की निश्चय ही यह एक अच्छी पहल थी। इससे लिबरल डेमोक्रेट्स का विश्वास जितने में मदद मिल सकती है। किंतु आर्थिक व राजनीतिक विशेषकर, चुनावी सुधारों को लेकर दोनों पार्टियों के बीच टकराव पैदा होने की पूरी संभावना है।

आर्थिक मसले ऐसे हैं, जहां समृद्ध अभिजात वर्ग के हित आम आदमी के हितों से टकराते हैं। जैसे कैमरून ने अपने मतदाताओं से वायदा किया था कि संपत्ति के उत्तराधिकार पर लगने वाला कर कम करेंगे, लेकिन लिबरल डेमोक्रेट्स इसके खिलाफ हैं। इस रियायत से केवल समृद्ध वर्ग लाभान्वित होगा, जिसको वर्तमान आर्थिक संकट के समय कोई रियायत देने की जरूरत नहीं है। इसी तरह क्लेग को बड़ी-बड़ी संपत्तियों पर कर (मैनसन टैक्स) लगाने की अपनी योजना को छोड़ना पड़ा, क्योंकि इससे कंजर्वेटिव पार्टी के बहुत से समर्थक नाराज हो जाते।

इस रविवार को लिबरल डेमोक्रेट्स का एक सम्मेलन होने जा रहा है। इसमें निक क्लेग नई सरकार की नीतियों को स्पष्ट करेंगे। कई ब्रिटिश राजनीतिक समीक्षकों ने इसके संदर्भ में 2006 के उनके सम्मेलन को याद किया है। उस सम्मेलन में जब किसी ने यह सवाल उठाया था कि क्या कभी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी का कंजर्वेटिव पार्टी के साथ समझौता हो सकता है, तो कहा गया था यह एक काल्पनिक प्रश्न है, जिसका व्यावहारिक राजनीति से कोई संबंध नहीं है। लेकिन आज यह काल्पनिक प्रश्न यथार्थ में बदल चुका है। दोनों पार्टियां न केवल साझा सरकार बना रही हैं, बल्कि वे अपने नीतियों और सिद्धांतों का भी संलयन कर रहे हैं।

यहां भारत के संदर्भ में सवाल उठाया जा सकता है कि क्या भारत आज की स्थिति में ब्रिटेन से कुछ सीखने की कोशिश कर सकता है। एक छोटे से देश में मात्र तीन पार्टियों की राजनीतिक व्यवस्था ने अस्थिरता की स्थिति खड़ी कर दी, किंतु आज परस्पर विरोधी सिद्धांतों वाली पार्टियां भी राष्ट्र््ीय हत को केंद्र में रखकर अपने सिद्धांतों में बदलाव का चिंतन कर रहे हैं। वे चुनाव प्रणाली तथा संवैधानिक व्यवस्था में आमूल बदलाव लाने के लिए सन्नद्ध है। क्या हमारे नेताओं को अपनी राष्ट्र्ीय जरूरतों के अनुसार राजनीतिक प्रणाली में बदलाव की कोई पहल नहीं करनी चाहिए। (16-5-2010)

कोई टिप्पणी नहीं: