<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4357481173344464761</id><updated>2012-02-17T16:40:38.066+05:30</updated><category term='दर्शन'/><category term='साहित्य'/><category term='विज्ञान'/><category term='वन्देमातरम'/><category term='लोक'/><category term='राजनीति'/><category term='विदेश संबंध'/><category term='पर्व-संस्कृति'/><category term='स्मृति'/><category term='हिंदी'/><category term='विदेश नीति'/><category term='विश्व'/><category term='राष्ट्रनीति'/><category term='भाषा'/><title type='text'>नव्यदृष्टि</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><generator version='7.00' 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src="http://2.bp.blogspot.com/-Fgy7INXPvIU/TyJURNyK1kI/AAAAAAAAAhs/J8toG9MtbE8/s320/INDIASAL.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;सलमान रश्दी : बिना आए ही छा गये पूरे साहित्यिक मेले पर&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: blue; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: blue; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि  आजकल ऐसे किसी साहित्यिकसांस्कृतिक आयोजन की कल्पना करना कठिन है, जिसके  भीतर या बाहर कोई राजनीति न हो, फिर भी जयपुर का इस वर्ष का साहित्यिक मेला  तो सीधे चुनावी राजनीति की छाया तले हो रहा है। भारतीय मूल के ब्रिटिश  लेखक सलमान रश्दी को इस आयोजन में केवल इसलिए आने से रोकने का प्रयास किया  गया कि इसका प्रभाव उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति पर प़ड सकता था।&amp;nbsp; विवादास्पद  पुस्तक ‘द सैटनिक वर्सेज’ के लेखक रश्दी इस विवाद के बाद भी दो बार भारत आ  चुके हैं। २००७ में तो वह जयपुर के इस साहित्यिक मेले में ही भाग लेने आए  थे। मगर तब कहीं कोई आपत्ति नहीं ख़डी हुई। फिर इस बार ऐसा क्या है कि  दारुल उलूम देवबंद के मुखिया मौलाना नोमानी कह रहे हैं कि रश्दी को भारत  आने से रोका जाए और राजस्थान के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि रश्दी यदि आए,  तो राज्य में कानून व व्यवस्था का संकट ख़डा हो सकता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय  मूल के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ब्रिटिश लेखक सलमान रश्दी जयपुर के  सातवें साहित्य मेले में शामिल हों या नहीं, लेकिन उनकी भारत यात्रा को  लेकर देश के मुस्लिम कट्‌टरपंथियों द्वारा ख़डा किया गया विवाद और उस पर  भारत सरकार की प्रतिक्रिया ने प्राय: पूरी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा को  गिराया है। &lt;br /&gt;जयपुर का यह साहित्यिक मेला एशिया का अपने ढंग  का सबसे ब़डा आयोजन है, जिसमें दुनिया भर के सैक़डों प्रतिष्ठित साहित्यकार  व चिंतक भाग लेते हैं और हजारों की संख्या में दर्शक व श्रोता एकत्र होते  हैं। भारतीय तथा दक्षिण एशियायी साहित्य व सोच के साथ विश्व साहित्य व सोच  की साझेदारी का यह उत्सव अपने ढंग का अनूठा है।&lt;br /&gt;इस उत्सव का  महत्व इसलिए भी है कि यह एक ऐसे देश में आयोजित होता है, जहां मुक्त चिंतन  तथा स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए पूरा अवकाश है, लेकिन अफसोस कि इस पर भी  संकीर्णता, चुनावी राजनीति तथा तुष्टीकरण की सरकारी नीति अपनी काली छाया  डालने में सफल हो गयी। &lt;br /&gt;सलमान  रश्दी दुनिया के बहुचर्चित व ख्यातिलब्ध साहित्यकार अवश्य है, लेकिन वे  किन्हीं श्रेष्ठ साहित्यकारों में नहीं गिने जाते। सामान्य स्थिति में उनके  आने न आने से इस साहित्यिक उत्सव पर कोई प्रभाव नहीं प़डने वाला था, लेकिन  जिन कारणों से और जिस तरह से इस समारोह में उनका आना रोका गया, वह अवश्य  ही अत्यंत गहरा प्रभाव डालने वाला है।&lt;br /&gt;सलमान रश्दी अपने  ‘मिडनाइट चिल्ड्रेन’ उपन्यास के लिए ‘बुकर प्राइज’ से सम्मानित हुए, लेकिन  १९८८ में प्रकाशित अपने उपन्यास ‘द सैटनिक वर्सेज’ के लिए उन्हें पूरी  दुनिया के मुस्लिम समुदाय के बीच निंदा का पात्र बनना प़डा। यह बात अलग है  कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति में उनके इस विवादास्पद उपन्यास की भूमिका  अधिक है। भारत में भी इस पर अब तक प्रतिबंध लगा हुआ है। इस उपन्यास के  प्रकाशन के लगभग तुरंत बाद ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह  खोमेनी ने उनकी मौत का फतवा जारी कर दिया। रश्दी को गुप्तवास में जाना  प़डा।&lt;br /&gt;ब्रिटिश सरकार ने उनकी सुरक्षा का विशेष प्रबंध किया।  किसी तरह उनकी जान बची रही। १९९८ में ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी ने  फतवे में कुछ ढील दी। उन्होंने उसे वापस तो नहीं लिया, लेकिन इतना जरूर कह  दिया कि वह इसे कार्यान्वित करने पर जोर नहीं देंगे। इसके बाद रश्दी फिर  सार्वजनिक जीवन में सामने आए और सामान्य जीवन जीना शुरू किया। अपने उपन्यास  पर प्रतिबंध के बावजूद वह तबसे दो बार भारत की यात्रा पर भी आ चुके हैं। &lt;br /&gt;पहली  बार सन्‌ २००० में और फिर २००७ में। २००७ में तो वह इस जयपुर के साहित्यिक  मेले में ही भाग लेने के लिए आए थे, लेकिन तब उनकी यात्रा का कोई विरोध  नहीं हुआ। २००० की यात्रा के दौरान भी किसी ने उनके भारत आने पर सवाल नहीं  उठाया। इसलिए कोई भी आश्चर्य कर सकता है कि फिर इस २०१२ के आयोजन में उनके  भारत आने का विरोध क्यों किया गया और क्यों सरकार ने बिना कोई न नुकुर किये  कट्‌टरपंथियों की इच्छा का सम्मान करना अपना कर्तव्य मान लिया।&lt;br /&gt;२०१२  की खास बात यह है कि इस समय देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने  जा रहे हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश जैसा राज्य भी है, जो जनसंख्या व राजनीतिक  प्रभाव दोनों ही दृष्टियों से देश का सबसे ब़डा राज्य है और यहां मुस्लिम  वोटों का खास महत्व है। राज्य के १८ प्रतिशत मुस्लिम कम से कम एक चौथाई  विधानसभा सीटों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। अन्यत्र भी उनका  प्रभाव नगूय नहीं कहा जा सकता। इसलिए भारतीय जनता पार्टी को छ़ोड कर प्राय:  सारे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल मुस्लिम वोटों के लिए उनकी मनुहार में लगे  रहते हैं। यों भारतीय जनता पार्टी भी मुस्लिम वोटों के लिए कम लालायित नहीं  रहती, लेकिन वह करे क्या, देश का मुस्लिम समुदाय किसी भी तरह उस पर भरोसा  करने के लिए तैयार नहीं है।&lt;br /&gt;इस राजनीति का ही चक्कर है  कि  देश के सर्वोच्च इस्लामिक प्रतिष्ठान दारुल उलूम देवबंद के मुखिया मौलाना  अब्दुल कासिम नोमानी ने केंद्र के सामने यह मांग पेश कर दी कि सलमान रश्दी  को भारत में प्रवेश न करने दिया जाए। उन्होंने मुसलमानों की भावनाओं  को  आहत किया है, इसलिए उनका भारत आने का वीजा रद्‌द किया जाए और उन्हें जयपुर  के साहित्य समागम में शामिल होने से रोका जाए।&lt;br /&gt;इस मांग से  सरकार सकते में आ गयी, लेकिन उसमें यह साहस नहीं है कि वह मौलाना नोमानी  साहब से पूछे कि यदि सन्‌ २००० तथा २००७ में रश्दी के आने से भारतीय  मुसलमानों को कोई तकलीफ नहीं हुई, तो अब ऐसा क्या हो गया कि उनकी यात्रा का  विरोध किया जा रहा है। केंद्रीय विधि मंत्री तथा अल्पसंख्यक मामलों के  मंत्री सलमान खुर्शीद ने केवल इतना कहा कि सरकार किसी कानून के तहत रश्दी  को भारत आने से नहीं रोक सकती।&lt;br /&gt;उन्हें भारत आने के लिए किसी  वीजा की जरूरत नहीं, क्योंकि वह भारतीय मूल के हैं, इसलिए वीजा देने या  रद्‌द करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। लेकिन मौलाना नोमानी इससे संतुष्ट  नहीं हुए। उनके अतिरिक्त कई अन्य मुस्लिम संगठनों तथा नेताओं  ने सरकार पर    दबाव बनाना शुरू किया।&lt;br /&gt;राजस्थान के अनेक मुस्लिम संगठनों  ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से संपर्क किया और उन पर दबाव डाला कि यदि  कांग्रेस मुस्लिम समुदाय का विश्वास हासिल करना चाहती है, तो उसे रश्दी को  भारत आने से रोकना चाहिए।&lt;br /&gt;अब इस संदर्भ में खबर है कि  मुख्यमंत्री गहलोत ने इस मसले को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम से  मुलाकात की और उनके सामने कानूनव्यवस्था बनाए रखने की समस्या पेश की।  वास्तव में यह कानून व्यवस्था की समस्या उठाना कांग्रेस की अपनी कूटनीति का  हिस्सा है। जब यह सवाल पैदा हुआ कि सलमान रश्दी को किस आधार पर जयपुर आने  से रोका जाए, तो इसके अलावा कोई चारा नजर नहीं आया कि उनके आने से कानून  व्यवस्था बिग़डने का मसला उठाया जाए और इसके आधार पर स्वयं रश्दी पर इस तरह  का अनौपचारिक दबाव डाला जाए कि वे नाहक इस मेले का वातावरण खराब न करें और  स्वयं भारत आने का अपना इरादा रद्‌द कर दें। इससे सरकार का काम भी बन  जाएगा और उसके साथसाथ आयोजकों की भी इज्जत बच जाएगी।&lt;br /&gt;आयोजक  अंतिम क्षण तक यह कहते रहे कि उन्होंने रश्दी का आमंत्रण रद्द नहीं किया  है। पत्रकारों को उन्होंने बताया कि वे यह तो नहीं कह सकते कि रश्दी आएंगे  या नहीं, लेकिन उनका आमंत्रण रद्‌द नहीं किया गया है और रश्दी ने स्वयं इस  बात की पुष्टि की है कि वह इस मेले में शामिल होंगे और इसके लिए उन्हें  भारत सरकार से वीजा लेने की कोई जरूरत नहीं है। &lt;br /&gt;आयोजकों ने  केवल इतना स्वीकार किया कि रश्दी का २० जनवरी का उद्‌घाटन का कार्यक्रम टाल  दिया गया है, क्योंकि राज्य के मुस्लिम संगठनों ने उस दिन मेला परिसर के  समक्ष विरोध प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है। वास्तव में सरकार की तरह  आयोजक भी अपना दोहरा चरित्र निभा रहे हैं, एक तरफ वे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति  की आजादी, सेकुलरिज्म तथा लेखकीय अधिकार के सम्मान की बात करते हैं, दूसरी  तरफ वे देश के कट्‌टरपंथी संगठनों को भी संतुष्ट रखना चाहते हैं, इसलिए वे  रश्दी का आमंत्रण रद्‌द करने से भी बच रहे हैं और सरकार के साथ इस कोशिश  में भी लगे हैं कि रश्दी न आएं। उधर देश का, विशेषकर उत्तर प्रदेश का  मुस्लिम तबका कांग्रेस की परीक्षा लेने में लगा है कि वह कहां तक झुक सकती  है।&lt;br /&gt;केंद्र में सत्ताऱूढ कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल  गांधी की प्रतिष्ठा इस बार के उत्तर प्रदेश के चुनाव में पूरी तरह दांव पर  लगी है। यद्यपि पार्टी के वरिष्ठ नेता बारबार यह साफ करते रहते हैं कि  उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणामों को किसी भी तरह २०१४ के आम चुनाव  के संकेतक के तौर पर नहीं देखना चाहिए। &lt;br /&gt;इसकी सफलता विफलता  पार्टी के भविष्य से ज़ोडना उचित नहीं होगा। फिर भी राहुल गांधी ने जिस तरह  अपनी पूरी शक्ति उत्तर प्रदेश में लगा रखी है, उससे मतदाताओं  पर उनके  प्रभाव का आकलन अवश्य किया जाएगा। राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश में पूरा  दांव ही मुस्लिम वोट बैंक पर टिका हुआ है। वह जानते हैं कि दलित मायावती का  साथ छ़ोडकर उनके साथ आने वाला नहीं । पिछ़डा वर्ग भी विभिन्न दलों के बीच  बंटे रहने के लिए बाध्य है।&lt;br /&gt;यही दशा सवर्ण जातियों की भी  है। केवल मुस्लिम वर्ग ऐसा है, जो थोक में यदि कांग्रेस के पक्ष में आ जाए,  तो कांग्रेस का भाग्य परिवर्तन हो सकता है। इसलिए राहुल गांधी मुस्लिम  वर्ग की प्राय: हर मांग मानने के लिए तैयार हैं। उन्होंने मकतबों, मदरसों  के लिए केंद्रीय सहायता ब़ढाने के साथ उन्हें केद्रीय कानूनों से बाहर रखने  का भी आश्वासन दिया है। नौकरियों व शिक्षा में पिछ़डे मुस्लिमों को स़ाढे  चार प्रतिशत आरक्षण दिलाने का भी वायदा किया है, जिसे उनकी पार्टी  के एक  वरिष्ठ मंत्री सलमान खुर्शीद ने ९ प्रतिशत तक ब़ढाने का भी आश्वासन दे दिया  है।&lt;br /&gt;इसके बावजूद भी अभी यह नहीं कहा जा सकता कि मुस्लिम समुदाय  थोक में कांग्रेस को वोट देने के लिए तैयार हो जायेगा। आरक्षण का वायदा  कुछ बहुत कारगर होने वाला नहीं। पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी पार्टी ने  पिछले विधानसभा चुनावों में मुसलमानों को १० प्रतिशत आरक्षण देने का वायदा  किया था, लेकिन मुसलमान उससे कतई प्रभावित नहीं हुए। मुसलमानों का एक ब़डा  तबका अभी भी बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले को लेकर कांग्रेस से नाराज है। वह  समझता है कि केंद्र में स्थित तत्कालीन कांग्रेस की सरकार के सहयोग के बिना  वह मस्जिद नहीं गिर सकती थी।&lt;br /&gt;उसे यह भी शिकायत है कि बाद  में आने वाली केंद्र की कांग्रेस सरकारें भी ध्वंस के दोषियों को ठीक से  सजा दिलाने में असफल रही हैं। केंद्र सरकार इसका भी यथासंभव इलाज करने में  लगी है। उसने लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, बाल ठाकरे आदि के विरुद्ध बाबरी  मामले में आपराधिक षडयंत्र (क्रिमिनल कांस्पिरेसी) के जिन आरोपों को  रायबरेली की विशेष अदालत में रद्‌द कर दिया था तथा जिसकी हाईकोर्ट ने भी  पुष्टि कर दी थी, उसे सीबीआई ने फिर से खोलने के लिए सुप्रीमकोर्ट में  याचिका दायर कर रखी है। वास्तव में केंद्र की कांग्रेस सरकार इस तरह यह  सिद्ध करने में लगी है कि वह दोषियों को पूरी सजा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध  है।&lt;br /&gt;अब मौलाना नोमानी ने कांग्रेस की इसी निष्ठा की जांच के  लिए रश्दी का मसला फिर से    उछाला। कांग्रेस इस परीक्षा में भी विफल नहीं  होना चाहती, इसलिए उसने गहलोत द्वारा कानून व्यवस्था का मामला उठवाया और  उसके बहाने रश्दी पर दबाव बनाने की कोशिश की कि वह स्वत: भारत आने का  कार्यक्रम रद्‌द कर दें, जिससे सरकार को किसी मोर्चे पर क्षति न उठानी  प़डे।&lt;br /&gt;मुस्लिम भावनाओं  का भी सम्मान हो जाए और उसकी  प्रगतिशीलता और सेकुलरवाद पर भी कोई आंच न आने पाए। और शायद वह यह कर  दिखाने में सफल हो गयी है। अब यह बात दूसरी है कि उत्तर प्रदेश में उसे  इसका कोई प्रतिदान मिलता है  या नहीं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-7517246981192082047?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/7517246981192082047/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=7517246981192082047' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/7517246981192082047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/7517246981192082047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2012/01/blog-post_6775.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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में वास्तविक अर्थों में लोकतंत्र की स्ािपना संभव ही नहीं है। अब तक पाकिस्तान में जितनी भी तथाकथित लोकतांत्रिक या नागरिक सरकारें रही हैं, वे मात्र दिखावे के लिए रही हैं, वास्तविक सत्ता तो सीधे सेना के ही हाथ में थी। आज भी स्थिति भिन्न नहीं है, लेकिन दिक्कत यह पैदा हो गयी है कि उसका यह मुल्लमा टूट गया है कि वह किसी लोकतांत्रिक देश की सेना है। अब यह जगजाहिर हो गया है कि वह वास्तव में उन जिहादी शक्तियों का ही प्रतिनिधित्व करती है, जो लोकतंत्र विरोधी हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान इस समय ब़डे गहरे राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसा संकट शायद उसके जन्म से अब तक पहले कभी नहीं आया था। सैनिक तख्ता पलट तो वहां के लिए आम बात है, इसलिए उसे किसी संकट में नहीं गिना जाता। उसके जीवन का सबसे ब़डा संकट १९७१ में आया था, जब पूर्वी पाकिस्तान उससे अलग हो गया था और उसकी गर्वीली सेना को भारत के हाथों अपमानित होना प़डा था, लेकिन उस समय भी पाकिस्तान में किसी राजनीतिक अराजकता का संकट नहीं था। मगर इस समय की स्थिति ब़डी अनूठी है।&lt;br /&gt;पाकिस्तान के प्रशासनिक तंत्र में सेना का सदैव एक स्वतंत्र वर्चस्व रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मान्य धारणा है कि सेना को राजनीतिक नेतृत्व के अधीन रहकर उसके निर्देशानुसार काम करना चाहिए, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं रहा। वहां सदैव सेना सर्वोच्च रही और जब कभी राजनीतिक नेतृत्व जरा भी कमजोर प़डा या सेना के साथ उसका मतभेद ख़डा हुआ, तो फौरन बिना कोई विलंब किये सेना निर्वाचित राजनीतिक तंत्र को अपदस्थ करके सत्ता अपने हाथ में ले लेती रही है। &lt;br /&gt;लेकिन इस बार सेना की राजनीतिक नेतृत्व के साथ भी ठनी हुई है, किंतु सेना नागरिक सत्ता का तख्तापलट करने की पहल नहीं कर रही है। सेना और नागरिक प्रशासन का इतना लंबा रग़डा इस देश में पहले कभी नहीं चला। सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कयानी के संयम पर सभी को आश्चर्य है, लेकिन लगता है वह कुछ अधिक चार्तुय का प्रदर्शन कर रहे हैं। वह जानते हैं कि उनकी सेना भले ही कितनी शक्तिशाली हो, लेकिन देश में उसकी प्रतिष्ठा गिरी हुई है। ऐबटाबाद में हुए अमेरिकी हमले में ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद उसकी क्षमता पर भी संदेह किया जाने लगा है।&lt;br /&gt;अफगान युद्ध में अमेरिका का साथ देने के कारण उसकी नागरिक प्रतिष्ठा भी गिरी हुई है। देश के विपक्षी दल भी उसका समर्थन करने से दूर हैं। अमेरिका भी इस बार पाकिस्तान के राजनीतिक द्वंद्व में तटस्थ बना हुआ है। अब से पहले प्राय: हर सैनिक तख्तापलट को उसकी मौन स्वीकृति प्राप्त रहा करती थी। इसलिए जनरल कयानी ने इस बार दूसरी रणनीति अख्तियार की है। उन्होंने इस बार देश की न्यायपालिका को नागरिक प्रशासन के मुकाबले में ख़डा कर दिया है और स्वयं को लोकतंत्र का पूर्ण समर्थक सिद्ध करने का प्रयास किया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा भी है कि उनकी देश की राजनीतिक बागडोर अपने हाथ में लेने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। वह अपनी सीमाएं तथा लोकतांत्रिक शासन में अपनी भूमिका को अच्छी तरह समझते हैं।&lt;br /&gt;यद्यपि इन शब्दों से यह अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि कयानी बिल्कुल लोकतंत्र के भक्त हैं और वह कभी किसी सैनिक तख्ता पलट के बारे में सोच ही नहीं सकते, क्योंकि जिस देश में किसी भी उच्चाधिकारी या राजनेता की किसी बात या किसी वायदे का कोई ठिकाना नहीं, वहां जनरल कयानी की बात पर ही भरोसा क्यों किया जाए, फिर भी उनकी बात से उनकी रणनीति का संकेत अवश्य मिलता है।&lt;br /&gt;ऐबटाबाद में अमेरिकी सैनिक कार्रवाई के पहले तक पाकिस्तान की आंतरिक व्यवस्था में सब कुछ सामान्य था। सेना और नागरिक प्रशासन में पूरा तालमेल था, लेकिन इसके बाद से ही संतुलन बिग़डने लगा। इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान का पूरा शीर्ष नेतृत्व चौराहे पर नंगा हो गया। सारे नंगे एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप म़ढने लगे। अमेरिका का रुख भी बदलता नजर आने लगा। इसी बीच सलाला की सीमावर्ती चौकी पर नाटो के हेलीकॉप्टर हमले में २४ पाकिस्तानी सैनिकों की मौत ने पाक अमेरिका संबंधों को एकदम निचले धरातल पर ला दिया। राजनीतिक नेतृत्व और सेना के बीच तनाव और ब़ढा। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अपने को सर्वाधिक खतरे में अनुभव करने लगे। खबर आयी कि जरदारी साहब ने एक गुप्त संदेश भेजकर अमेरिका से गुहार की कि वह अमेरिकी सरकार तथा सेना से हर तरह का सहयोग करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते वह पाकिस्तानी सेना से उन्हें बचा ले। &lt;br /&gt;उनका सीधा आरोप था कि पाकिस्तानी सेना उनका तख्ता पलट करना चाहती है। जरदारी की तरफ से अमेरिका को गुप्त ज्ञापन वाशिंगटन स्थित पाक राजदूत के माध्यम से शायद उनकी सलाह पर ही भेजा गया। इसकी पुष्टि अमेरिका के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी जनरल मुलेन ने भी की। मुलेन ने स्वीकार किया कि उन्हें ऐसा ज्ञापन मिला था, लेकिन उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इस गोपनीय संदेश (मेमो) के उजागर होने पर पाकिस्तान में जबर्दस्त हंगामा उठ ख़डा हुआ। इस मामले को ही मीडिया ने ‘मेमोगेट’ कांड की संज्ञा दी। इस ‘मेमोगेट’ कांड के सामने आने के बाद पाकिस्तान में एक नया अस्थिरता का दौर शुरू हो गया और तब से ही सैनिक तख्ता पलट की आशंका व्यक्त की जाने लगी। वाशिंगटन स्थित पाक राजदूत हक्कानी को अपना पद गंवाना प़डा, लेकिन मामला शांत होने के बजाए और उग्रतर होता गया।&lt;br /&gt;सर्वोच्च न्यायालय ने भी ‘मेमोगेट’ को नोटिस में लिया और पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने का आदेश दिया। एक तरफ उसने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी पर आरोप लगाया कि वह ईमानदार नहीं हैं। वह अपनी पार्टी के हितों को देश के संविधान से ऊपर तरजीह दे रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री को निर्देश दिया था कि वह राष्ट्रपति के पद पर विराजमान आसिफ अली जरदारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कराकर उस पर कार्रवाई शुरू करें, लेकिन गिलानी ने ऐसा कुछ नहीं किया। &lt;br /&gt;यहां यह उल्लेखनीय है कि २००८ में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के साथ एक समझौते के तहत जरदारी सहित कई हजार लोगों को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त कर दिया था, किंतु पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को निरस्त कर दिया और जरदारी के खिलाफ जांच शुरू करने का सरकार को निर्देश दिया। न्यायालय ने गिलानी को यह चेतावनी भी दी कि वह उन्हें शासन करने के अयोग्य ठहराकर प्रधानमंत्री पद से हटा सकती है। वह राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री दोनों के खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम है। इसके साथ ही उसने मेमोगेट की जांच भी शुरू कर दी। सेनाध्यक्ष जनरल कयानी ने बिना सरकार को बताये या बिना उससे पूर्व अनुमति लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपना शपथ युक्त वक्तव्य पेश कर दिया।&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री गिलानी का इस पर बिफरना स्वाभाविक था। उन्होंने चीन के सरकारी मुख पत्र ‘पीपुल्स डेली’ के ऑन लाइन संस्करण को दिये गये अपने एक बयान में बताया कि सेनाध्यक्ष अशफाक परवेज कयानी तथा देश की सैन्य गुप्तचर एजेंसी आईएसआई के प्रमुख लेफ्टीनेंट जनरल शुजा पाशा ने बिना सरकार की पूर्व अनुमति लिए मेमोगेट के बारे में सर्वोच्च न्यायालय को अपना एकतरफा वक्तव्य देकर देश के संविधान का उल्लंघन किया है। इस पर जनरल कयानी ने ब़डी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी टिप्पणी है, जिसके लिए देश को बहुत गंभीर परिणाम झेलना प़ड सकता है। कयानी के इस तीखे बयान का जवाब प्रधानमंत्री गिलानी ने शब्दों से नहीं, बल्कि एक क़डी कार्रवाई से दिया।&lt;br /&gt;उन्होंने कयानी के एक अत्यंत नजदीकी रहे प्रतिरक्षा सचिव (पूर्व लेफ्टीनेंट जनरल) नईम खालिफ लोधी को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया। लोधी पर ‘दुर्व्यवहार’ तथा ‘गैरकानूनी कदम उठाने’ का आरोप लगाया गया। लोधी प्रतिरक्षा विभाग में कयानी के अपने विश्वस्त आदमी थे।&lt;br /&gt;उन्होंने अभी हाल में कहा था कि पाकिस्तान में सेना देश की नागरिक सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं है। इसके पहले शासन ने सेना की १११वीं ब्रिगेड के मुखिया को हटाने की कार्रवाई की। इस ब्रिगेड को पाकिस्तान में ‘तख्ता पलट ब्रिगेड’ के रूप में जाना जाता है। यह ब्रिगेड ही इस्लामाबाद व रावलपिंडी क्षेत्र की इंचार्ज है और अबसे पहले देश में जितने भी सैनिक तख्ता पलट हुए हैं, उनमें प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन तथा देश के टीवी व रेडियो जैसे संचार केंद्रों पर आधिपत्य जमाने की महती जिम्मेदारी इसी ब्रिगेड पर थी। इसलिए यदि इसे ‘तख्ता पलट ब्रिगेड’ कहा जाता है, तो इसमें काई आश्चर्य या अतिशयोक्ति की बात नहीं।&lt;br /&gt;अब एक के बाद एक ताब़डत़ोड इतनी घटनाओं के बीच इस तरह की अटकलों का बाजार गर्म हो गया था कि अब कभी भी कुछ हो सकता है। यदि सेना के दूसरी पंक्ति के अधिकारियों पर राजनीतिक नेतृत्व की पक़ड मजबूत है, तो सेनाध्यक्ष कयानी व आईएसआई प्रमुख पाशा को बर्खास्त किया जा सकता है और नहीं तो कयानी और पाशा मिलकर बागडोर भी अपने हाथ में ले सकते हैं। राष्ट्रपति जरदारी एकाएक दुबई के लिए रवाना हो गये, तो इन अनुमानों को और बल मिला।&lt;br /&gt;लेकिन जैसा अनुमान लगाया गया था, वैसा कुछ नहीं हुआ। प्रधानमंत्री की तरफ से इस बात का खंडन किया गया कि वे कयानी और पाशा को बर्खास्त करना चाहते हैं। कयानी ने भी संकेत दिया कि फिलहाल देश की राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में नहीं लेना चाहते। जरदारी भी मात्र एक दिन बाद ही दुबई से वापस इस्लामाबाद पहुंच गये और सारी तात्कालिक अटकलों को विराम लगा दिया।&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री गिलानी ने शुक्रवार को देश की ताजा राजनीतिक स्थिति पर विचार के लिए राष्ट्रीय असेम्बली की विशेष बैठक बुला रखी थी। इस बैठक में उन्होंने सारी ताजी स्थिति का ब्यौरा देते हुए कहा कि देश की सर्वोच्च राजनीतिक संस्था संसद को यह फैसला करना है कि वह देश में लोकतंत्र चाहती है या तानाशाही। उन्होंने कहा कि हमें देश का शासन चलाने के लिए विपक्ष का कोई सहयोग नहीं चाहिए, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा में विपक्ष की भी उतनी ही जिम्मेदारी है, जितनी की सत्ता पक्ष की। उन्होंने इस संदर्भ में सदन के सामने एक प्रस्ताव भी पेश किया, जिस पर सोमवार १६ जनवरी को मतदान होगा।&lt;br /&gt;तो १६ जनवरी २०१२ को पाकिस्तान में दो महत्वपूर्ण फैसले होने वाले हैं, जिसके बाद ही देश की राजनीति का अगला चरण निर्धारित होगा। एक तो राष्ट्रीय संसद को लोकतंत्र के बारे में अपने संकल्प को व्यक्त करना है, दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय को भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के बारे में अपना फैसला देना है। सर्वोच्च न्यायालय की १७ सदस्यीय पूर्ण पीठ इस मामले में सुनवाई करके अपना फैसला देने वाली है। वह प्रधानमंत्री को न्यायालय की अवमानना का दोषी करार दे सकती है अथवा उन्हें सत्ता के अयोग्य सिद्ध कर सकती है। इसी तरह वह राष्ट्रपति जरदारी के खिलाफ आपराधिक मामले फिर से जीवित हो जाने के बाद उनकी भी पद पर बने रहने की योग्यता के बारे में वह अपना फैसला सुना सकती है।&lt;br /&gt;खैर, कल इन दोनों सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाओं के निर्णय के बाद पाकिस्तान की राजनीति कौनसा रुख अख्तियार करती है, यह दीगर बात है। यह भी हो सकता है कि कोई स्पष्ट फैसला न आए और कठोर निर्णयों को टालने की कोशिश की जाए, क्योंकि इस बीच पर्दे के पीछे और आगे भी नागरिक शासन, सेना और न्यायपालिका के बीच टकराव टालने और सुलह सपाटे की भी कोशिशें चल रही हैं।&lt;br /&gt;बीते शनिवार को प्रधानमंत्री गिलानी ने अपनी कैबिनेट की प्रतिरक्षा मामलों की समिति की बैठक बुला रखी थी, जिसमें प्रधानमंत्री के साथ विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार व गृहमंत्री रहमान मलिक सहित सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों व अफसरों के अतिरिक्त सेनाध्यक्ष जनरल कयानी, आईएसआई प्रमुख शुजा पाशा भी शामिल हुए। फिर भी इतना तो तय है कि पाकिस्तान अब फिर अपने पुराने संतुलन की स्थिति में नहीं आ सकता। वहां आज नहीं तो कल कुछ न कुछ उथलपुथल होनी ही है।&lt;br /&gt;पाकिस्तान का सर्वोच्च न्यायालय प्राय: हमेशा ही एक कठपुतली की तरह काम करता रहा है। इस बार शायद पहली बार वह भी अपनी ताकत दिखाने पर आमादा है। यों इस बार भी उसे सेना की कठपुतली करार दिया जा सकता है, लेकिन पाकिस्तानी न्यायपालिका राष्ट्रपति मुशर्रफ के काल से ही जैसी सामाजिक व राजनीतिक सक्रियता दिखाता आ रहा है, उससे उसकी भी एक स्वतंत्र संवैधानिक पहचान बनी है।  &lt;br /&gt;हां, यह देखना अवश्य रोचक है कि इस बार सर्वोच्च न्यायालय भी सेना के साथ है और दोनों ने मिलकर अपनी बंदूकें नागरिक शासन की तरफ तान रखी है, जिसके कारण नागरिक सत्ता नितांत प्रतिरक्षात्मक रुख अपनाने के लिए विवश है। शनिवार की उपर्युक्त बैठक में, तनातनी के वर्तमान दौर के बाद प्रधानमंत्री गिलानी और सेनाध्यक्ष कयानी पहली बार आमनेसामने मिले। उनके बीच वास्तव में क्या बातें हुई, यह तो ठीकठीक पता नहीं, लेकिन वर्तमान स्थिति दोनों के लिए ही बेहद चुनौतीपूर्ण बन गयी है।&lt;br /&gt;यह सही है कि अब से १०१५ साल पहले की बात होती तो गिलानी के इस तरह के सीधे बयान के बाद कि सेनाध्यक्ष ने देश के संविधान का उल्लंघन किया है, अब तक तख्ता पलट हो गया होता। कोई पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष किसी प्रधानमंत्री की ऐसी टिप्पणी बर्दाश्त नहीं कर सकता था। लेकिन सेनाध्यक्ष कयानी ने संयम बरता। उन्होंने गत गुुरुवार को रावलपिंडी के सैनिक मुख्यालय पर अपने वरिष्ठ सैन्य कमांडरों के साथ बातचीत की, लेकिन उसके बाद अब तक कोई खास बयान नहीं दिया है।&lt;br /&gt;शायद उनके ऊपर देश के मीडिया और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का भी दबाव है। बीते हफ्ते पाकिस्तानी मीडिया में यही सब छाया रहा और प्राय: सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने अपने संपादकीयों में अपील की कि इस बार कृपया सैनिक तख्ता पलट नहीं। पाकिस्तान के पिछले राजनीतिक इतिहास का आधे से अधिक का काल सैनिक तानाशाही के अंतर्गत गुजरा है, इसलिए मीडिया में एक तरफ से यह अपील छाई रही कि अब और नहीं। देश में लोकतंत्र को एक बेहतर मौका दिया जाना चाहिए। &lt;br /&gt;लेकिन सवाल है कि क्या पाकिस्तान में वास्तव में लोकतंत्र चल सकता है? जवाब है जी नहीं। वहां लोकतंत्र का नाटक तो चल सकता है, लेकिन वास्तविक लोकतांत्रिक शासन नहीं। इस देश में जितने भी दिन लोकतंत्र रहा है, वह लोकतंत्र का नाटक ही रहा है, वास्तविक सत्ता तो उन दिनों में भी सीधे सेना के ही हाथों मेंं रही है। शायद किसी इस्लामिक देश में लोकतंत्र की गुंजाइश ही नहीं है। इस्लाम यों भी आधुनिक लोकतंत्र के खिलाफ है। जिस देश में वास्तविक आधुनिक लोकतंत्र कायम हो जाएगा, वहां इस्लाम अपनी अस्तित्व रक्षा नहीं कर पायेगा, क्योंकि आधुनिक लोकतंत्र की पहली शर्त है प्रत्येक नागरिक की वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा और उसका सम्मान। उसे किसी विश्वास के घेरे में बंधने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt;किसी इस्लामी देश में यह संभव नहीं है। वहां कुछ अफवाहों को नजरंदाज किया जा सकता है, लेकिन एक अनिवार्य सामाजिक व राजनीतिक मूल्य के रूप में उसकी प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती। इसके अतिरिक्त प्रत्येक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेना नागरिक सत्ता के हाथ का औजार होती है, जिसका नागरिक आवश्यकताआें के अनुसार इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन किसी इस्लामी या तानाशाही व्यवस्था में यह नहीं चल सकता। इसलिए यह कल्पना करना आकाश कुसुम त़ोड लाने जैसा है कि पाकिस्तान में सेना नागरिक प्रशासन के अंतर्गत काम करेगी। वहां नागरिक शासन दिखावे के लिए भी तभी तक चल सकता है, जब तक वह सेना के निर्देशों के अनुसार चले। इसलिए प्रधानमंत्री गिलानी की लोकतंत्र बचाओ की अपील का इससे अधिक कोई अर्थ नहीं है कि देश में उनकी व आसिफ जरदारी की सरकार को चलने दो।&lt;br /&gt;पाकिस्तान में फिर से प्रत्यक्ष सैनिक तानाशाही आ धमके, इसे रोकने का एक ही रास्ता है कि देश में तत्काल नये आम चुनाव की घोषणा की जाए। लेकिन इस तरह के चुनाव भी कितनी ही बार क्यों न करा लिये जाएं, देश की व्यवस्था ज्यों की त्यों रहेगी, उसमें कोई बदलाव नहीं आ सकता। सबसे अधिक जरूरी चीज है देश में आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना, जो वहां संभव नहीं है। फिर भी यदि किसी तरह देश की विभिन्न शक्तियों के बीच नये चुनाव कराने पर सहमति हो जाती है, तो वह देश के लिए शुभ ही होगा, क्योंकि उससे संभावित राजनीतिक अराजकता की स्थिति तो टल जाएगी। लेकिन पाकिस्तान में आज की स्थिति में यह भी कोई आसान काम नहीं। सबसे ब़डा सवाल तो यही ख़डा होगा कि जब तक चुनाव नहीं होते, देश में किसका शासन रहेगा ? क्या जनरल कयानी व देश की अन्य राजनीतिक शक्तियां यह चाहेंगी कि जरदारी और गिलानी की वर्तमान पीपीपी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) की सरकार के नेतृत्व में ही नए चुनाव हों। पाकिस्तान में नई उभरी राजनीतिक पार्टी ‘पाकिस्तान तहरीके इंसाफ’ के संस्थापक अध्यक्ष पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की नजर में वर्तमान संकट को टालने का इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं कि देश में नये चुनाव कराए जाएं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के बारे में उनका भी नजरिया साफ नहीं है।&lt;br /&gt;पाकिस्तान के साथ ज़ुडी यह एक क़डवी सच्चाई है कि वह तभी तक एक देश के रूप में विद्यमान है, जब तक उस पर सेना का नियंत्रण कायम है। यदि सेना का राजनीतिक नियंत्रण हट जाए, तो उसके बिखरने में देर नहीं लगेगी। इस तथ्य को वहां के ज्यादातर राजनीतिक नेता भी समझते हैं, इसलिए वे लोकतंत्र के नाम पर अपनी सत्ता तो चाहते हैं, लेकिन व्यवस्था बदलने के खिलाफ हैं। इसलिए पाकिस्तान में आधारभूत बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं। तंत्र कोई सा रहे, लेकिन वर्चस्व सेना व जिहादियों का ही रहेगा। यह स्थिति भारत के नजरिये से वांक्षित नहीं हो सकती, लेकिन वहां अराजकता या बिखराव पैदा हो यह भी भारत के हित में नहीं है। &lt;br /&gt;इसलिए हमें अपनी सीमाओं की बेहतर रखवाली करते हुए बस प्रतीक्षा करना चाहिए और देखते रहना चाहिए कि वहां आने वाले दिनों में किसकिस तरह के गुल खिलते हैं और वर्तमान तनातनी का क्या परिणाम निकलता है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-5102968265823538242?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/5102968265823538242/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=5102968265823538242' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/5102968265823538242'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/5102968265823538242'/><link rel='alternate' 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style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;ईश्वरीय विधान, नैतिकता और वैज्ञानिक अनुसंधान&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-_Xt6tgIJrXc/TxVXNlzN_WI/AAAAAAAAAhY/QIv7bJSdrwo/s1600/monkey.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="211" src="http://3.bp.blogspot.com/-_Xt6tgIJrXc/TxVXNlzN_WI/AAAAAAAAAhY/QIv7bJSdrwo/s320/monkey.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;b style="color: black;"&gt;&lt;span style="font-size: xx-small;"&gt;बंदरों की 6 अलग-अलग भू्रणें की कोशिकाओं को मिलाकर पहली बार बनाये गये बंदर। चिकित्सा क्षेत्र में इस प्रयोग की असीम संभावनाएं बतायी जा रही हैं।&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: blue; text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;वैज्ञानिक जीवन के रहस्यों के सूत्र खोजने में तेजी से आगे ब़ढ रहे हैं। प्रयोगशाला में वे एक से एक अनूठी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं। उन्होंने कृत्रिम कोशिका बना ली है, शुक्राणु बना लेने का भी दावा किया है। लक्ष्य एक ही है मनुष्य के जीवन को सुखकर बनाना, उसे रोगों से मुक्त करना और आनुवांशिक ग़डब़डयों को भी सुधार लेना। ब़ुढापा और मृत्यु को शाश्वत कहा जाता है, लेकिन दुनिया के तमाम वैज्ञानिक इसे पराजित करने की कोशिश में लगे हैं। जरा (ब़ुढापा) और मृत्यु को समाप्त शायद न किया जा सके, लेकिन उसे टाला तो जा ही सकता है। लेकिन इस अनुसंधान में भी अनेक बाधाएं हैं। कई तरह की नैतिक रुकावटें हैं। ईसाई सोच की परंपरा ने मनुष्य को एक विशिष्ट स्थान दे रखा है, सभी अन्य प्राणियों से ऊपर। इसलिए वह उसकी जन्ममृत्यु की प्राकृतिक प्रक्रिया में मनुष्य के हस्तक्षेप को ईश्वरीय विधान में हस्तक्षेप मानता है। वह मनुष्य की स्वास्थ्य रक्षा व प्राण रक्षा के उपायों की अनुमति तो देता है। इसके लिए मनुष्येतर प्राणियों के जीवन का भी उपयोग किया जा सकता है, किसी मनुष्य की प्राण रक्षा के लिए किसी दूसरे मनुष्य का उपयोग नहीं किया जा सकता, चाहे वह भ्रूण स्तर का ही क्यों न हो।&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यद्यपि प्रत्यक्ष जीवन व्यवहार में हम देखते हैं कि थ़ोडे से कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों की रक्षा करने या उनकी तरहतरह की लालसा पूरी करने में हजारों लाखों लोग अपने प्राण गंवाते रहते हैं, अंगहीनता के शिकार होते हैं या बीमारियां आमंत्रित करते हैं, लेकिन चिकित्सा कार्य के लिए एक मानव प्रतिकृति (ह्यूमन क्लोन) बनाकर उसका उपयोग करने की भी वैधानिक अनुमति नहीं दी जा सकती। इसलिए वैज्ञानिक प्राय: अन्य प्राणियों पर अपने प्रयोग करते रहते हैं। नैतिकता के सवाल वहां भी उठते हैं, लेकिन उतनी तीव्रता से नहीं, जितने कि मनुष्य को लेकर किये जाने वाले प्रयोगों पर उठते हैं। यद्यपि यह सही भी है कि यदि आज किसी के स्वास्थ्य के लिए किसी गर्भस्थ भ्रूण का प्राण लेने या उसके अंगों के उपयोग की अनुमति दे दी जाए, तो कल इसका विस्तार किसी भी मनुष्य को किसी अन्य के लिए बलि देने तक हो सकता है, फिर भी जीवन के रहस्यों को समझने के लिए तो इसकी अनुमति देनी ही प़डेगी कि कोई एक साधारण सी कोशिका किसी विशिष्ट स्थिति में कैसे एक पूर्ण प्राणी में बदल जाती है। उसमें कोई विकृति कैसे आती है, बीमारियां क्यों उत्पन्न होती हैं तथा इसको रोकने या विकृत अथवा बीमार अंग को बदलने के लिए क्या किया जा सकता है। ईसाई परंपरा गर्भ समापन की अनुमति नहीं देती। अभी कुछ दिन पहले एक चर्च गर्भनिरोधक उपायों के भी खिलाफ था। ब़डे दबावों के बाद अभी वैटिकन ने गर्भ निरोधक उपायों के इस्तेमाल की अनुमति दी है, लेकिन गर्भ समापन की या गर्भस्थ भ्रूण के साथ किसी तरह के छ़ेडछ़ाड की इजाजत अभी भी नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जबसे जेनेटिक इंजीनियरिंग का काम आगे ब़ढा है, तब से ये नैतिकता के सवाल अक्सर उठते रहते हैं कि क्या मनुष्य को जन्म मृत्यु के ईश्वरीय या प्राकृतिक विधान में हस्तक्षेप का अधिकार है ? पहली बर जब परखनली शिशु का प्रयोग किया गया, तो यह सवाल उठा, फिर जब पहली बार कृत्रिम ‘जीन’ के निर्माण की घोषणा हुई, तो भी यह सवाल उठा, फिर जब ‘एनिमल क्लोन’ पैदा करने का प्रयास सामने आया, तो भी इस सवाल को लेकर हंगामा ख़डा हुआ। ‘स्टेम सेल’ (ऐसी मास्टर कोशिका, जिससे शरीर का कोई भी अंग बन सकता है) प्राप्त करने के लिए प्रयोगशाला में भ्रूण की खेती करने की बात सामने आयी, तो भी यह सवाल पूरी तीव्रता के साथ ख़डा किया गया। अभी यह सवाल फिर ब़डी तेजी से उभर कर सामने आया, जब वैज्ञानिकों ने कई भ्रूणों की कोशिकाआें को मिलाकर एक प्राणी को जन्म देने की घोषणा की।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी इसी बीते हफ्ते यह घोषणा सामने आयी कि पहली बार अमेरिकी वैज्ञानिकों के एक दल ने विभिन्न भ्रूणों की कोशिकाआें को लेकर तीन बंदरों का निर्माण किया है। इन वैज्ञानिकों ने ६ भिन्न बंदरियों के गर्भस्थ भ्रूणों की कोशिकाआें को लेकर फिर उन्हें मिलाकर अन्य बंदरियों के गर्भ में स्थापित किया, जिससे तीन अनूठे बंदर पैदा हुए। इनके एक नहीं, दो नहीं, चार नहीं, १२ जैविक मांबाप है। ‘सेल’ नामक शोध पत्रिका के माध्यम से की गयी इस घोषणा में कहा गया है कि चिकित्सकीय अनुसंधान के क्षेत्र में इस उपलब्धि की असीम उपयोगिता है। वैज्ञानिक अभी तक केवल चुहियों पर इस तरह के प्रयोग करते रहे हैं। १९८४ में ब्रिटिश वैज्ञानिकों के एक दल ने बकरी और भ़ेंड के भ्रूणों को मिलाकर एक प्राणी को जन्म दिया था, जो भ़ेंड और बकरी का मिश्रण था। इस तरह के प्राणियों को गलती से उस तरह का संकर प्राणी नहीं समझ लेना चाहिए, जैसे घ़ोडे और गधे के संवरण से खच्चर पैदा होता है। खच्चर एक ही मांबाप की संतान होते हैं, जिनमें दोनों के गुण आ जाते हैं और वह मध्यवर्ती वर्ग का एक प्राणी बन जाता है। जबकि दो भिन्न भ्रूणों के संलयन से जो प्राणी जन्म लेता है, उसकी कोशिकाएं परस्पर मिलती नहीं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वे साथसाथ मिलकर अंगों और ऊतकों (टिशूज) का निर्माण तो करती हैं, लेकिन अपना अलग अस्तित्व बनाए रखती हैं। इसलिए इस तरह के संयोग से बने प्राणी का जो अंग जिस भ्रूण की कोशिका से बनता है, उस अंग में उस भ्रूण के गुण ही रहते हैं। जैसे बकरी और भ़ेंड के दो भिन्न भ्रूणों से जो प्राणी बनाया गया उसमें भ़ेंड के भ्रूण से बने अंग भ़ेेंडों जैसे हैं और बकरी के भ्रूण से बने अंग बकरियों जैसे। उसकी देह पर भ़ेंडों के जैसे ऊन भी हैं और बकरियों के जैसे बाल भी। इस तरह से विकसित प्राणियों को ‘किमेरा’ नाम दिया गया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी इस पद्धति से जो तीन बंदर तैयार किये गये हैं, उनके नाम किमेरो, रोकू और हेक्स रखे गये हैं। उनके ऊतकों का निर्माण ६ विभिन्न भ्रूणों की कोशिकाआे से हुआ है। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि ये कोशिकाएं कभी परस्पर लीन नहीं होतीं, लेकिन वे साथसाथ रहकर ऊतकों तथा विभिन्न शरीरांगों का निर्माण करती हैं। इस प्रयोग में शामिल वैज्ञानिक सौख्रात मिताली पोव के अनुसार कई असफल प्रयोगों के बाद यह प्रयोग सफल हुआ। उन्होंने बताया कि किमेराज के माध्यम से भ्रूण में किसी विशिष्ट जीन की भूमिका तथा भ्रूण से प्राणी के पूर्ण विकास की प्रक्रिया को शायद बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वैज्ञानिकों की सामान्य राय है कि मनुष्य की जीवन प्रक्रिया के हर अंग को चूहों और सुअरों के शरीर से ही नहीं समझा जा सकता। यदि ‘स्टेम सेल’ चिकित्सा पद्धति को प्रयोगशाला से चिकित्सालयों तक या चूहों से मनुष्यों तक पहुंचाना है, तो हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि उन्नत प्राणियों में इन आधारभूत कोशिकाआें (प्राइमेट सेल्स) की क्या भूमिका है। हमें इनका अध्ययन सीधे मनुष्य में करना होगा, मनुष्य के भ्रूणों में भी। लेकिन यहां हमें समझ लेना चाहिए कि मनुष्य का ‘किमेरा’ तैयार करने का कोई व्यावहारिक लाभ नहीं है। लेकिन भ्रूण स्तर पर उनका अध्ययन अवश्य उपयोगी है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी तक हम जानते हैं कि स्टेम सेल्स की सहायता से क्षतिग्रस्त शारीरिक कोशिकाआें को दूसरी स्वस्थ उसके जैसी कोशिका से बदला जा सकता है। इससे उन रोगियों को जीवनदान मिल सकता है, जिनके रोग अब तक असाध्य समझे जाते हैं। जैसे ऱीढ की हड्‌डी में चोट पहुंचने के कारण जो लोग ‘पैरालाइज्ड’ हो जाते हैं वे फिर से सक्षम जीवन जी सकते हैं। पार्किंसन बीमारी से ग्रस्त रोगियों की मस्तिष्क की मृत कोशिकाएं पुन: सृजित की जा सकती हैं। लेकिन यह सब तभी संभव है, जब मानव भ्रूण पर भी खुले प्रयोग की सुविधा मिले। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मनुष्य निश्चय ही धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है लेकिन वह भी अपनी आधारभूत संरचना में अन्य प्राणियों जैसा ही एक प्राणी है। फर्क इतना ही है कि विकास क्रम में वह अन्य प्राणियों की अपेक्षा ऊंचे विकास स्तर पर पहुंच गया है। वह अन्य प्राणियों से भिन्न किसी संसार से नहीं आया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जैसेजैसे वैज्ञानिक समझ ब़ढ रही है, नईनई तकनीक का विकास हो रहा है, वैसेवैसे यह धारणा मिथ्या सिद्ध होती जा रही है कि किसी सर्वशक्तिमान परमात्मा ने मनुष्य को विशेष रूप से जन्म दिया और बाकी सृष्टि को उसके उपभोग के लिए बनाया, अथवा यह कि सृष्टि के हर प्राणी की रचना परमात्मा करता है या कि जीवन देना परमात्मा का काम है। जब तक मनुष्य को प्रकृति के रहस्यों यानी कि उसके नियमों का ज्ञान नहीं था, वह सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप को किसी सर्वशक्तिमान सृष्टा या परमात्मा को जिम्मेदार मानता था। वैज्ञानिक विकास की शुरुआत ही इस धारणा को नकारने के साथ शुरू हुई। सृष्टि की हर क्रिया के पीछे प्रकृति के कुछ नियम सक्रिय हैं। जीवन भी इन नियमों और तज्जनित क्रियाआें का सहज परिणाम है। इनमें भी परिस्थितिगत भिन्नता के कारण कुछ असाधारण रचनाएं भी सामने आती रहती हैं। सृष्टि में ऐसे मनुष्यों की संख्या भी हजारों नहीं बल्कि लाखों में है, जिनमें एक साथ पुरुष और स्त्री दोनों के शरीरांग सम्मिलित हैं। ये गर्भ में ल़डकी और ल़डके के दो भिन्न भ्रूणों के मिल जाने के परिणाम है। वे अलगअलग ज़ुडवां संतान के रूप में जन्म लेते हैं, लेकिन किसी परिस्थितिवश यदि वे परस्पर लीन हो गये, तो प्राकृतिक ‘किमेरा’ की उत्पत्ति होगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रकृति में ऐसा बहुत कुछ होता रहता है, जो चमत्कारी प्रतीत होता है, लेकिन इनके कारणों की जानकारी हो जाने पर वह सहज हो जाता है। संतान ईश्वर की देन है, अब इस कथन का कोई अर्थ नहीं रह गया है। जब प्रयोगशाला में ‘स्टेम सेल’ से शुक्राणु (स्पर्म) का निर्माण हो सकता है, और इसी तरह अंडे (ओवम) का भी निर्माण हो सकता है और कृत्रिम गर्भाशय में बच्चा विकसित हो सकता है, तो फिर उसमें किसी दैवी शक्ति की भूमिका यों ही समाप्त हो जाती है। तो अगर हम किसी सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास करना ही चाहें, तो हम इस संपूर्ण सृष्टि को एक इकाई मानकर उसे परमात्मा का नाम दे सकते हैं। अन्यथा इससे परे किसी परमात्मा या उसके विधान की कोई कल्पना नहीं की जा सकती। चर्च या किसी मजहब के विश्वासों की रक्षा के लिए वैज्ञानिकों को उनके काम से रोकने का कोई औचित्य नहीं है। सृष्टि में मनुष्य श्रेष्ठ है तो अपने बुद्धिबल से और यह बुद्धिबल उसने हजारों लाखों वषा] के अध्यवसाय व प्राकृतिक संघातों से अर्जित किया है। वैज्ञानिक अपने अनुसंधानों से इस मानव जाति के विकास में ही लगे हैं। यह सही है कि इस प्रक्रिया में कुछ विनाशकारी तत्व भी जन्म ले रहे हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इनसे बचाव का साधन भी फिर उन वैज्ञानिकों के ही अगले विकास से संभव है। यह प्रक्रिया सदैव जारी रहनी है। विकास और विनाश दोनों ही अन्योन्याश्रित हैं। इनकी गति को धीमा या तेज तो शायद किया जा सकता है, किंतु उन्हें रोका नहीं जा सकता। कानूनी बंदिशें या ऱूढ नैतिकताएं मानवीय विकास यात्रा कभी न रोक सकी हैं, न रोक सकेंगी। इसलिए विकास पथ का अनुगमन करने के अलावा मनुष्यता के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-7811324469999687490?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/7811324469999687490/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=7811324469999687490' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/7811324469999687490'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/7811324469999687490'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2012/01/blog-post_14.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-_Xt6tgIJrXc/TxVXNlzN_WI/AAAAAAAAAhY/QIv7bJSdrwo/s72-c/monkey.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4357481173344464761.post-3526816966554376425</id><published>2012-01-12T13:09:00.000+05:30</published><updated>2012-01-12T13:09:44.605+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;मंगल पर मानव बस्ती बसाने का सपना&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-t9GzWGEuA10/Tw6OK95qO8I/AAAAAAAAAhM/Eo_GVdy2fRU/s1600/776PX-CO.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" kba="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-t9GzWGEuA10/Tw6OK95qO8I/AAAAAAAAAhM/Eo_GVdy2fRU/s1600/776PX-CO.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;एक चित्रकार की कल्पना में मंगल पर मनुष्य का आवास: वहां सतह के नीचे ही घर बनाए जा सकते हैं या वनस्पतियां उगाना सुविधाजनक हो सकता है।&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;इस धरती पर पली बढ़ी मनुष्य जाति को बचाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि उसके इस धरती से बाहर भी कहीं धरती पर बसने का इंतजाम किया जाए। इस लिहाज से अपने सौर मंडल में जितने भी ग्रह-उपग्रह उपलब्ध हैं, उनमें सबसे अधिक उपयुक्त मंगल को पाया गया है। धरती के बाहर मानव उपनिवेश के लिए अब तक चंद्रमा और मंगल को ही चुना गया है। मंगल चंद्रमा की अपेक्षा काफी दूर है, लेकिन स्वतंत्र जीवन जी सकने की संभावना मंगल पर अधिक है। इसलिए इधर अंतरिक्ष विज्ञानियों ने मंगल की ओर अपना ध्यान अधिक केंद्रित किया है। कम से कम मंगल पर मौसम बदलने का क्रम तो बहुत कुछ धरती जैसा ही है, क्योंकि मंगल भी अपने अक्ष पर लगभग धरती की तरह ही झुका हुआ है। मंगल पर थोड़ा बहुत वातावरण भी है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मंगल अपने सौर मंडल में पृथ्वी के सर्वाधिक नजदीक स्थित ग्रह है। अति प्राचीन काल से धरती के लोग इससे परिचित हैं। अपने लाल रंग के कारण शायद छोटे आकार के बावजूद इसने धरती के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। भरतीय परंपरा में मंगल को कल्याणकारी एवं शुभ माना जाता है, लेकिन जाने क्यों ज्योतिष में इसकी गणना क्रूर ग्रह के रूप में की गयी है। यूनान में भी इसे युद्ध का देवता माना जाता है। हां, रोमन जरूर इसे कृषि का देता मानते हैं। यूनानी इसे ‘ओरिस’ नाम से पुकारते हैं और रोमन ‘मार्स’। बाद में जाने कब इन दोनों का एकीकरण हो गया और ‘ओरिस’ ‘मार्स’ बन गया। अंग्रेजी वर्ष के तीसरे महीने ‘मार्च’ का नामकरण इसी ‘मार्स’ के आधार पर हुआ। सौर मंडल का दूसरा कोई ग्रह नहीं है, जिसे यह सम्मान मिला हो।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पश्चिम की पुरा कथाओं में जाने कब और कैसे यह धारणा बन गयी कि धरती पर ‘पुरुष’ जाति मंगल से आयी और ‘स्त्री’ शुक्र -वीनस- से। शायद इसमें इन दोनों के रंग रूप का प्रभाव है। मंगल लाल है, तो शुक्र चमकदार सफेद। पश्चिम में शायद उसके चमकदार रूप के कारण उसकी कल्पना स्त्री के रूप में कर ली गयी और उसे सौंदर्य की देवी वीनस का नाम दे दिया गया। अब इसके बाद यदि स्त्री के वहां से धरती पर आने की कल्पना की गयी, तो इसमें आश्चर्य नहीं। जाने कैसे एक समानांतर दंत कथा यह भी चल निकली कि धरती पर जीवन मंगल से ही आया। पहले मंगल जीवन से गुलजार था, लेकिन जाने क्या विपत्ती आयी कि वह उजाड़ हो गया। वहां से जीवन के बीज तत्व किसी उल्का पिंड पर पहुंचे और वह उल्का धरती पर ले आयी। शायद इन्हीं सारी कल्पनाओं के कारण मंगल विज्ञान कथा लेखकों का भी सर्वाधिक प्रिय ग्रह बन गया। धरती चांद और मंगल इन कथाओं में इस तरह गुंथे हुए हैं, मानों वे तीनों किसी एक ही पाणि संसार के अंग हों।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब वास्तविक विज्ञान इस कल्पना को चरितार्थ करने की दिशा में बढ़ रहा है। धरती पर मानव जीवन दिनों दिन कठिन होता जा रहा है। यहां स्वयं मनुष्य ने अपने विनाश के इतने उपकरण जुटा रखे हैं कि किसी दुर्घटना में अब अपनी ही जाति का अंत कर सकता है। फिर बाहर से संभावित दुर्घटनाओं का भी खतरा है। कब कौनसा भटका हुआ उल्का पिंड आ टकराए क्या ठिकाना। आखिर लाखों या करोड़ों वर्ष पूर्व धरती के विशालकाय जीवों -डायनासोरों- का जीवन इसी तरह तो समाप्त हो गया था। इसीलिए स्टिफेन हाकिंन जैसे ब्रह्मांड विज्ञानी बहुत पहले से यह सलाह दे रहे हैं कि यदि मानव जाति को विनष्ट होने से बचाना है, तो उसके आवास के लिए धरती के बाहर किसी अन्य ग्रह पर भी इंतजाम किये जाने चाहिए। धरती से सबसे निकट का पिंड उसका अपना ही उपग्रह चांद है। इस चांद पर बस्ती बसाने की योजना बहुत दिनों से चल रही है, लेकिन यदि मनुष्य जाति को धरती पर होने वाली किसी बड़ी दुर्घटना से बचाना है, तो उसका नया आवास कुछ अधिक दूरी पर बनाया जाना चाहिए। चांदी काफी नजदीक है और जीवन लायक प्राकृतिक सुविधाएं भी वहां बहुत कम हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने मंगल की ओर देखना शुरू किया है। मंगल थोड़ा दूर भी है और वहां शायद चांद से बेहर परिस्थितियां हैं। इसलिए अंतरिक्ष में चांद के बाद वैज्ञानिक खोजबीन का सबसे बड़ा केंद्र मंगल बन गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंतरिक्ष यानों के माध्यम से मंगल की खोज खबर का काम 1965 में शुरू हुआ, जब मैरिनर-4 नाम का पहला अंतरिक्ष यान मंगल की यात्रा पर निकला और उसके पास से गुजरा। इसके पहले के 6 प्रयास विफल हो चुके थे। उसके बाद सफल-असफल करीब 35 प्रयास और हुए, जिनमें कई यानों ने मंगल की परिक्रम की और कुछ उसकी सतह पर उतरे। इस दौरान तीन ‘मंगल गाड़ियां’ -मार्स रोवर- भी वहां उतारी गयीं। पहली ‘मंगल गाड़ी’ ‘मार्स-पाथ फाइंडर‘ द्वारा 1996 में मंगल की सतह पर उतारी गयी। यह एक छोटी सी गाड़ी थी, खिलौने जैसी, लेकिन इसने इतिहास का नया अध्याय लिखा। अगली गाड़ी थी ‘स्पिरिट’ जो 10 जून 2003 को मंगल की सतह पर उतरी। इसके एक महीने से भी कम समय के भीतर तीसरी गाड़ी ‘अपार्चुनिटी मिशन द्वारा 7 जुलाई 2003 को उतारी गयी। और इसके बाद अब तक की सबसे बड़ी -करीब 1 टन भार की गाड़ी- ‘मार्स साइंस लेबोरेटरी’ मिशन के अंतर्गत बीते 26 नवबंर को रवाना की गयी। इसका नाम ‘क्यूरियासिटी’ -जिज्ञासा- रखा गया है। यह करीब 9 महीने की यात्रा करके अगले वर्ष अगस्त 2012 में मंगल की सतह पर पहुंचेगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह रोबोटिक यानी स्वचालित गाड़ी मंगल पर भेजी गयी पिछली गाड़ी से 5 गुना अधिक भरी है। इसमें प्लूटोनियम बैटरी लगायी गयी है, जिसकी उर्जा से यह कम से कम 10 वर्षों तक मंगल का भ्रमण कर सकेगी। इसमें ऐस उपकरण लगे हैं, जो चट्टानों कोचूर्ण कर सकते हैं और सतह से एक मीटर भीतर तक मी मिट्टी का रासायनिक व परमाण्विक संरचना का पता लगा सकते हैं। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य मंगल पर जीवन की संभावनाओं का पता लगाना है। क्या वहां पहले किसी स्तर का कोई जीव था या इस समय क्या वहां सूक्ष्म स्तर का भी कोई जीवन है। यहां जीवन के रहने व विकसित होने की कितनी संभावनाएं हैं। करीब ढाई अरब डॉलर के खर्च से भेजे गये इस यान के साथ बहुत सी संभावनाएं जुड़ी हैं। नासा के मंगल अभियान के निदेशके अनुसार ‘हमने न केवल तकनीकी स्तर पर, बल्कि वैज्ञानिक स्तर पर एक नये युग की शुरुआत की है। हमें यकीन है कि जब यह यान मंगल पर उतरेगा, तो हमें मंगल ग्रह के ऐसे अनूठे दृश्य देखने को मिलेंगे, जिन्हें हमने पहले कभी नहीं देखा है तथा ऐसी जानकारियां प्राप्त होंगी, जिनके आधार पर मनुष्य मंगल पर कदम रखने की योजना बना सकेगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अपने सौर मंडल में जितने भी ग्रह हैं, उनमें से केवल मंगल ऐसा है, जिस पर मौसम का परिवर्तन उसी तरह होता है, जिस तरह धरती पर होता है। इसका कारण है कि मंगल भी अपने अक्ष पर उसी तरह और करीब उतना ही झुका हुआ है, जितना की पृथ्वी। हां, यह बात दूसरी है कि मंगल पर प्रत्येक मौसम के बने रहने की अवधि धरती की अपेक्षा दो गुनी है। चंूकि मंगल सूर्य से ज्यादा अधिक दूरी पर है, इसलिए मंगल का एक वर्ष धरती के करीब दो वर्षों के बराबर है। यानी मंगल जब तक सूर्य की एक परिक्रमा करता है, तब तक पृथ्वी दो परिक्रमा पूरी कर चुकी रहती है। हां, धरती और मंगल के तापक्रम में जरूर काफी अंतर है। सूर्य से अधिक दूरी होने के कारण उस पर सूर्य की गर्मी कम पहुंचती है, तो वहां की गर्मी में भ्ी जमने वाली ठंड पड़ती है और सर्दी का तो पूछना ही क्या। गर्मी में अधिकतम तापमान -5 डिग्री सेल्सियस रहता है और सर्दी का न्यूनतम -ध्रुवीय क्षेत्र में- -87 डिग्री सेल्सियस । गर्मी और सर्दी के तापमान में इतना ज्यादा फर्क होने का कारण यह है कि मंगल का वातावरण बहुत हल्का या पतला है, जिसके कारण वह सूर्य की गर्मी को अधिक मात्रा में अपने में सुरक्षित नहीं रख पाता । वातावरण् हल्का रहने के कारण वायुदाब भी बहुत कम है। लेकिन इस सबके बावजूद इतना तो कहा ही जा सकता है कि यदि मंगल सूर्य से पृथ्वी जितनी दूरी पर होता, तो इसका मौसम भी पृथ्वी जैसा ही होता, क्योंकिइसका झुकाव पृथ्वी जैसा ही है। मंगल की सूर्य से दूरी करीब 23 करोड़ कि.मी. है। मंगल के वातावरण की यह भी विशेषता है कि उसमें स्वतंत्र ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम है। वातावरण का 95 प्रतिशत कार्बनडाई ऑक्साइड है, 3 प्रतिशत नाइट्र्ोजन और 1.6 प्रतिशत आर्गन। जाहिर है हवा में पानी और ऑक्सीजन की उपस्थिति नाम मात्र को है, किंतु कार्बन के साथ जुड़ी हुई अवस्था में काफी ऑक्सीजन उपलब्ध है। मंगल का आयतन धरती का केवल 15 प्रतिशत है। उसका व्यास धरती के व्यास का केवल आधा है। मंगल का घनत्व धरती के घनत्व से कम है, इसलिए आकार के मुकाबले उसका कुल द्रव्यमान और कम यानी केवल 11 प्रतिशत है। मंगल का कुल धरातल धरती के सूखे क्षेत्र के लगभग बराबर है, इसलिए बसने की जगह बहुत कम नहीं है। हां, उसकी सतह पर न कोई नदी-समंदर है न जंगल, बस बड़े-बड़े गड्ढे हैं या उंचे-उंचे पहाड़। सतह का रंग लाल है, क्योंकि सतह की पूरी मिट्टी व चट्टानों में हेमेटाइड -लोहे का ऑक्साइड- की मात्रा बहुत अधिक है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बसने की दृष्टि से और ग्रहों पर नजर डालें तो उनकी स्थितियां और खराब हैं। बुध पर दिन में बेहद गर्मी है, रात में बेहद सर्दी, शुक्र की सतह तो तपती भट्टी जैसी है और दूर वाले ग्रह बेहद ठंडे हैं, क्योंकि वहां सूर्य की उर्जा बहुत कम पहुंचती है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यात्रा की दृष्टि से भी धरती से मंगल तक की यात्रा अपेक्षकृत आसान है। एक ता इस तक पहुंचने में कम उर्जा की जरूरत पड़ती है। यात्रा का समय अभी तो बहुत ज्यादा प्रतीत होता है। अभी 26 नवंबर को भेजा गया यान 9 महीने बाद आगामी अगस्त में वहां पहुंचेगां वास्तव में अभी इस यात्रा के लिए अंतरिक्ष में जो मार्ग अपनाया जाता है -हॉहमान ट्र्ांसफर आरबिट- वह बहुत लंबा है। इसमें सुधार करके यात्रा की अवधि को घटाकर 6 महीने तक किया जा सकता है। यात्रा समय इससे और कम करने के लिए नई टेक्नोलॉजी का सहारा लेना पड़ेगा। उस टेक्नोलॉजी का भी परीक्षण हो गया है, बस उसे इस्तेमाल में लाना है। ये हैं ‘वी.ए.एस.आई.एम.आर.’ टेकनीक और ‘न्यूक्लियर-रॉकेट‘ टेकनीक। इनका इस्तेमाल करके यात्रा की अवधि 2 हफ्ते तक घटाई जा सकती है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लेकिन केवल यात्रा का समय कम करना ही काफी नहीं है। अगणित और भी चुनौतियां हैं जिनका मुकाबला करने की तैयारी की जा रही है। एक अंतरिक्ष यात्रियों के लिए रास्ते में रेडियेशन का भारी खतरा है, जिससे कैंसर होने की संभावना है। मंगल तक पहुंच जाने के बाद वहां उतरना भी संकट का काम नहीं है। मंगल पर एक तो वातावरण अत्यंत क्षीण है, दूसरे वहां गुरुत्वाकर्षण घनत्व धरती का मात्र 0.38 प्रतिशत है। पर्यावरण का घनत्व धरती का केवल 1 प्रतिशत है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मंगल के साथ रेडियो संपर्क भी आसान है। धरती जब मंगल के क्षितिज से ठीक उपर होती है, उस समय सबसे सीध संपर्क कायम किया जा सकता है। अमेरिका और रूस द्वारा भेजे गये यान मंगल का चक्कर लगा रहेहैं।इन यानों में संदेश भेजने व ग्रहण करने के उपकरण पहले से ही लगे हैं। इसका मतलब है कि वहां अनेक संचार उपग्रह पहले मौजूद हैं, बस उनका इस्तेमाल करने की जरूरत है। जब तक वे पुराने और बेकार होंगे, तब तक ऐसे और कई यान उनकी कक्ष -आर्बिट- में पहुंच जायेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मंगल पर यदि मानव बस्ती बसाना है, तो उसकी प्रारंभिक तैयारी का काम रोबोटिक मशीनों द्वारा कराया जा सकता है। ये मशीनें मनुष्ृय के रहने लायक सुविधाएं जुटाने- जैसे विविध उपभोग वस्तुएं, ईंधन, पानी, निर्माण सामग्री आदि तैयार करने या खोजने- का काम कर सकती हैं। पानी की निश्चय ही बड़ी समस्या है। द्रव रूप में पानी वहां रह ही नहीं सकता, क्योंकि वहां वायु दाब बहुत कम है और ठंड काफी अधिक है। ध्रुवीय क्षेत्र में पानी का विशाल जमा हुआ भंडार है। किंतु अभी ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि निचले अक्षांशों पर भी पानी उपलब्ध हो सकता है। ध्रुवीय क्षेत्र में तो इतनी बर्फ है कि यदि वह सब पिघल जाए तो पूरा मंगल ग्रह पानी की 11 मीटर मोटी परत से ढक जाएगा। ऐसा माना जाता है कि पानी की विशाल मात्रा सतह के अन्य क्षेत्रों में भी चट्टानों में कैद हो सकती है। यदि बीच के इलाकों मं पानी मिल गया, तो फिर वहां मानव उपनिवेश बनने की संभावना स्वतः बढ़ जाएगी। असल में अंतरिक्ष विज्ञान में ज्ञान के नये-नये क्षेत्र जिस तरह खुल रहे हैं, उससे भविष्य की तमाम असंभव कल्पनाएं भी संभव लगने लगी हैं। लगातार बढ़ रहे ऐसे नये ज्ञान और नई तकनीक के कारण यह तय हो गया है कि मनुष्य जाति अकेले धरती की सीमाओं में कैद होकर नहीं रह सकती। हो सकता है धरती के बाहर उसका पहला चरण मंगल पर ही पड़े। 11-12-11&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-3526816966554376425?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/3526816966554376425/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=3526816966554376425' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/3526816966554376425'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/3526816966554376425'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2012/01/1965-4-6-35-1996-10-2003-7-2003-1-26-9.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-t9GzWGEuA10/Tw6OK95qO8I/AAAAAAAAAhM/Eo_GVdy2fRU/s72-c/776PX-CO.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4357481173344464761.post-549370948372210800</id><published>2012-01-04T17:23:00.000+05:30</published><updated>2012-01-04T17:23:17.450+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;खुदरा व्यापार में विदेशियों के आने का भय !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-GypzWA1MNxs/TwQ9da09KVI/AAAAAAAAAhE/SUl2l69JWu8/s1600/INDIARE1.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="211px" rea="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-GypzWA1MNxs/TwQ9da09KVI/AAAAAAAAAhE/SUl2l69JWu8/s320/INDIARE1.JPG" width="320px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;कहा जाता है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने अब तक के संपूर्ण कार्यकाल में यदि एकमात्र कोई सार्थक निर्णय लिया है, तो वह है खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेश्ी पूंजी निवेश बढ़ाने का, लेकिन उन्होंने जिस तरह अपने इस निर्णय की घेषणा की उससे उनकी नीयत पर ही संदेह होने लगा। क्या उन्होंने इसे देश् के व्यापक हत में घोषित किया या महंगाई, लोकपाल, कालाधन, भ्रष्टाचार व तेलंगाना आदि मुद्दों से संसद व देश् का ध्यान हटाने के लिए इसका शिगूफा छोड़ा। देश् के सामाजिक व आर्थिक आधुनिकीकरण के लिए उत्पादक-विरतक-उपभोक्ता संबंधों की उपनिवेशकाल की संस्कृति बदलने की सख्त जरूरत है। विदेशी खुदरा कंपनियों को आने का अवसर देकर इसकी एक अच्छी शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसके लिए पहले पूरे देश को विश्वास में लेने की जरूरत है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संसद का पिछला शीतकालीन सत्र बिना कोई कामकाज किये समाप्त हो गया था, अब इस बार का स. भी उसी तरह के गतिरोध की स्थिति में आ फंसा है। शुरुआत तो महंगाई, भ्रष्टाचार, काला धन, तेलंगाना आदि के मुद्दों को लेकर हुई, लेकिन बीच में आ धमका खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष निवेश -एफ.डी.आई.- का। सरकार ने शायद अन्य मसलों की तरफ से विपक्ष व जनता का ध्यान बंटाने के लिए एफ.डी.आई. का धमाका किया, लेकिन वह खुद उसके गले की हड्डी बन गया। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगी रहने वाली दलीय राजनीति को यदि दरकिनार कर दें, तो खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी पूंजी के निवेश का मार्ग प्रशस्त करना देश के व्यापक हित में बहुत जरूरी था, लेकिन सरकार ने बिना उचित तैयारी के जिस तरह से उसकी घोषणा की, उससे न केवल उनकी नीयत पर, बल्कि उसकी राजनीतिक कार्यदक्षता पर भी संदेह होने लगता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;विपक्ष तो विपक्ष, उसका तो काम ही है विरोध करना। यदि वह अपने राजनीतिक लाभ के लिए सरकार के इस उचित कदम का भी विरोध कर रहा है, तो यह कोई असाधारण बात नहीं, असाधारण् बात तो यह है कि स्वयं गठबंधन सरकार के अपने घटक दल भी उसका विरोध कर रहे हैं। इससे ज्यादा चकित करने वाली बात है खुद कांग्रेस पार्टी के भीतर इसके बारे मे ंएक राय नहीं है। उसकी अपनी कई राज्य इकाइयां चाहती हैं कि सरकार इसे वापस ले ले। उत्तर प्रदेश की कांग्रेस का कहना है कि केंद्र सरकार ने बहुत गलत समय पर इसकी घोषणा की। ऐसे समय यह नहीं किया जाना चाहिए था, जब उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में विधनसभा चुनाव होने जा रहे हों। पार्टी में मतभेदों का आलम यह है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा युवराज राहुल भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। युवा कांग्रेस के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों के दिल्ली में हुए द्विदिवसीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने किराना व्यापार के क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ाने के सरकार के फैसले और विपक्ष के विरोध की विस्तार से चर्चा की, लेकिन सोनिया गांधी व राहुल ने अपने वक्तव्यों में उसका नाम तक नहीं लिया। अभी पता चला कि इस सम्मेलन के बाद उत्तर प्रदेश के नेताओं ने एक बैठक में राहुल के सामने जब एफ.डी.आई. और लोकपाल का मुख्य मुद्दा है, इसलिए यहां पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं को केवल इसी मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, बाकी को भूल जाना चाहिए। अब अब इससे अनुमान लगा लिया जाना चाहए कि कांग्रेस पार्टी व सरकार राजनीति और सत्ता संचालन में कितनी कुशल है। खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश जैसे संवेदनशील व महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार ने अपनों को भी विश्वास में नहीं लिया, सहयोगी दलों की बात ही और है। सहयोगी दलों की मुख्य शिकायत भी यही है कि कांग्रेस नेतृत्व ने उनसे इस पर कोई विचार-विमर्श नहीं किया, उन्हें विश्वास में लेने की कोई कोशिश नहीं की। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रस की नेता ममता बनर्जी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में यह वायादा कर रख है क वह खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी निवेश नहीं होने देंगी, यानी विदेशी खुदरा व्यापारियों को देश में नहीं आने देंगी। अब इसके बाद कैसे वह सरकार के इस निर्णय का समर्थन कर सकती हैं। उसके दूसरे सहयोगी दल तमिलनाडु के डी.एम.के. के सामने ऐसी कोई तकनीकी मजबूरी नहीं है, वह सत्ता में भी नहीं है कि राज्य स्तर पर उसके उूपर किसी तरह का दबाव हो, फिर भी सरकार के सामने उसने अपना विरोध व्यक्त किया है। ममता को मनाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वयं उनके बात की, उन्होंने राज्य के विकास के लिए 8000 करोड़ रुपये का विशेष सहायता पैकेज देने का भी वायदा किया है, लेकिन ममता मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि उनके राज्य में 50 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण तथा छोटै व्यापारियों की है, वह उन्हें नाराज नहीं कर सकतीं, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री को विनम्रता पूर्वक बता दिया है कि वह केंद्र की यूपीए सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन वह एफ.डी.आई. नीति का समर्थन भी नहीं कर सकतीं। जाहिर है वह सरकार को गिरने का खतरा नहीं पैदा होने देंगी, लेकिन उन्होंने सरकार को एक अपमानजनक स्थिति में तो डाल ही दिया है। यदि प्रधानमंत्री अपनी सरकार में शामिल राजनीतिक दलों का समर्थन भी हासिल नहीं कर सकते, तो फिर वह विपक्ष को भला किस प्रकार समझायेंगे। इस स्थिति से प्रतीत होता है कि सरकार शायद स्वयं भी अभी खुदरा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोलने के लिए तैयार नहीं थी और उसने सरकार की फजीहत करा रहे तमाम मुद्दों की तरफ से जनता का ध्यान बंटाने के लिए एकाएक इसकी घोषणा का निर्णय ले लिया। यद्यपि प्रधानमंत्री बार-बार यह दोहरा रहे हैं कि उन्होंने बहुत सोच विचार के बाद यह निर्णय लिया है, कोई जल्दबाजी नहीं की है, किंतु परिस्थितियां और घटनाक्रम उन्हें गलत सिद्ध कर रहे हैं। वैसे दोनों ही स्थितियों में सरकार की अदूरदर्शिता तथा अक्षमता जाहिर होती है। यदि वह सुविचारित कदम था, तो प्रधानमंत्री ने अपनी पाअभर्् तथ अपनी सहयोगी पार्टियों को पहले से वश्विास में क्यों नहीं लिया। और यदि यह निर्णय आकस्मिक है तो भी वह अपने मकसद में विफल रहे हैं। ध्यान बंटाने का प्रयास तो विफल रहा ही, नाहक ही एक नई मुसीबत और खा खड़ी हुई है&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गत शक्रवार को संसद के चालू सत्र का लगातार नौंवा दिन था, जब कोई विधायी कामकाज नहीं हो सका और बैठक चार दिनों के लिए स्थगित कर दी गयी। शनिवार, रविवार का अवकाश रहता ही है, संयोग से इसी के साथ मोहर्रम की मुस्लिम त्यौहार भी आ गया, तो सोम, मंगल दो दिन उकसे लिए अवकाश हो गया। अब 7 दिसंबर को संसद की बैठक फिर शुरू होगी, जब एफ.डी.आई. के मसले पर विपक्ष्ज्ञ के कार्य स्थगन प्रस्ताव पर निर्णय लिया जाएगा। इस बीच सत्ता पक्ष के संकट निवारक नेता अपने लोगों को समझाने बुझाने व अपना संख्या बल मजबूत करने का प्रयास करेंगे। जैसी खबरें मिल रही हैं, उसके अनुसार सरकार नहीं चाहती कि कोई कार्य स्थगन प्रस्ताव सदन में आए और उस पर मत विभाजन हो। इसलिए यह हो सकता है कि यदि सरकार अपने सहयोगियों, साथ ही विपक्ष को मनाने में विफल रहती है, तो वह इस फैसले को किसी ठंडे बस्ते के हवाले कर दे। यद्यपि प्रधानमंत्री बार-बार कह रहे हैं कि इस फैसले को वापस लेना कठिन है। सरकार इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुकी है, अब इसे वापस लेने से सरकार की साख पर बट्टा लगेगा, फिर भी यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिस पर सरकार अपने अस्तित्व को ही दांव पर लगाने का खतरा मोल ले, जैसा कि परमाणु समझौते के संदर्भ में वर्ष 2008 में लिया था। फिर भी आखिरकार इसे टालना भी सरकार की कमजोरी ही सिद्ध करेगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह तो रही सरकार की बात, अब जरा मूल मुद्दे पर विचार कर लिया जाए। आखिर किराना व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेश निवेश को बढ़ाना देश के लिए क्यों उपयोगी है और क्यों इसका विरोध किया जा रहा है। सच कहा जाए, तो विरेाध का कोई कारण नहीं है। इस समय जो भी विरोध हो रहा है, वह राजनीतिक है या भावनात्मक है, अथवा शुद्ध रूप से गलतफहमी पर आधारित है। यदि सरकार समुचित जनमत बनाकर ठीक समय पर इसका प्रस्ताव करती, तो प्रायः हर वर्ग इसका समर्थन करता, लेकिन उसने इस तरह इसका आकस्मिक धमाका किया है कि भावनाएं सारे तर्कों पर हावी हो गयी है और सरकार को पराजित करना या पीछे हटने के लिए मजबूर करना विपक्ष का ही नहीं, अपने सहयोगी घटक दलों का भी राजनीतिक लक्ष्य बन गया है। कें्रद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा भी है कि सरकार के इस निर्णय को लागू करने में विभिन्न दलों का संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ आड़े आ रहा है। यद्यपि उनका यह प्रहार विपक्षी दलों पर था, लेकिन यह जुमला स्वयं उनकी पार्टी पर भी लागू हो रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के विकास के लिए विदेशी पूंजी व विदेशी तकनीक की जबर्दस्त आवश्यकता है।देश के अनेक क्षेत्रों में विदेशी पूंजी व तकनीक के सहारे विकास हो रहा है। अब तो बीमा और बैंकिंग जैसे क्षेत्र भी विदेशियों के लिए खुल चुके हैं। किराना व्यापार का क्षेत्र इस देश में कृषि के बार रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा साधन है, लेकिन यह अत्यंत असंगठित, पिछड़ा तथा असुरक्षित क्षेत्र बना हुआ है। इपने देश में कृषि क्षेत्र भी पिछड़ा हुआ है और किराना व्यापार का क्षेत्र, जबकि ये दोनों ही इस देश की अर्थव्यवस्था व समाज की रीढ़ हैं। वास्तव में इनके विाकस पर ही देश का वास्तविक विकास निर्भर है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खुली अर्थव्यवस्था और ग्लोबलाइजेशन का जो दौर 90 के दशक मंें पी.वी. नरसिंहा राव सरकार के दौर में शुरू हुआ, उसके उनके बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने बड़े उत्साह से आगे बढ़ाया, जिसमें पहली बार देश की विकास दर 3-4 प्रतिशत की दर से छलांग लगाकर 7-8 प्रतिशत तक पहुंची। औद्योगिक विाकस की दर पहली बार इस स्थिति में पहुंची की चीनी ड्र्ैगन की फुफकार और दक्षिण पूर्व एशियायी टाइगरों की दहाड़ के बीच भारतीय गज की गर्जना भी सुनाई देने लगी। इससे उत्साहित भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने किराना व्यापार के क्षेत्र में 100 प्रतिशत तक विदेशी निवेश को बढ़ाने का प्रस्ताव किया था। पूरे देश में अर्थव्यवस्था की चमक ने ही ‘फील गुड’ का नशीला वातावरण बनाया था, लेकिन 2004 के आम चुनावों में भाजपा की पराजय ने सारे ‘फील गुड’ की चमक उड़ा दी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पी.वी. नरसिंहा राव के शासन काल में खुली अर्थव्यवस्था का पहला चरण शुरू करने वाले अर्थशास्त्री वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 2004 में बनी कांग्रेस की सरकार में प्रधानमंत्री के पद स्थापित हुए। अब तो पूरे देश की पूरी लगाम उनके हाथ में थी, लेनिक वह उदारीकरण या ग्लोबलाइजेशन का अगला चरण नहीं शुरू कर सके। कांग्रेस फिर ग्रामीण पिछड़ेपन और गरीबी का सहारा लेकर सत्ता में पहुंची थी, इसलिए उसने आर्थिक क्षेत्र में सुधारों के बजाए देश के ग्रामीण पिछड़े व गरीब तबके को राहत पहुंचाने की ओर ध्यान दिया। किसानों के कर्जे माफ किये, ग्रामीण रोजगार योजना -मनरेगा- की शुरुआत की, मगर ऐसे सारे कार्यक्रमों को ठप रखा, जिससे अतिरिक्त पूंजी का उत्पादन हो या विदेशी पूंजी का आगमन सुनिश्चित हो। सत्ता की पहली पारी में यह सब न हो पाने के लिए वामपंथी दलों को दोषी ठहराया गया। केंद्रीय सत्ता चूंकि वामपंथी दलों के समर्थन पर टिकी थी, इसलिए कहा गया कि उसके विरोध के कारण सरकार अपने वायदे के अनुसार आगे नहीं बढऋ सकी, मगर सत्ता के दूसरे चरण में भी उसने अब तक पूरे कार्यकाल का लगभग आधा समय बीत जाने तक- कोई कदम नहीं उठाया। प्रधानमंत्री पिछले करीब डेढ़ साल से तो एकदम अनिर्णायक स्थिति में नजर आ रहे हैं। जो लोग यह आशा लगाये बैठे थे कि इस दूसरे चरण में आर्थिक सुधरों के सारे लंबित कार्यक्रम तेजी से शरू किये जायेंगे, उनका इस निष्क्रियता से निराश होना स्वाभाविक था। देश के तमाम आर्थिक विशेषज्ञों की राय में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जून-2004 से लेकर अब तक के अपने पूरे कार्यकाल में केवल एक सार्थक निर्णय लिया है और वह है किनारा क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ाने का, लेकिन इसे भी ईमानदारी से नहीं लिया गया। उन्होंने इसे एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उद्देश्य देश की आर्थिक हालत सुधारना नहीं, बल्कि अन्ना हजारे के लोकपाल बिल, महंगाई तथा राजनीतिक भ्रष्टाचार की ओर से लोगों का ध्यान हटाना था। यों कुछ लोग यह मानते हैं कि इसके पीछे डॉ. मनमोहन सिंह का अपना निजी राजनीतिक उद्देश्य भी है। इतनें दिनों सत्ता में हरकर अब वह अर्थशास्त्री से बड़े राजनीतिक नेता बन गये हैं। इधर सत्तारूढ़ दल की राजनीति राहुल केंद्रित रूप ले रही थी। मनमोहन सिंह को दरकिनार किया जा रहा था। देश में यह वातावरण बनाया जा रहा था कि राहुल बस अब कभी भी देश और सत्ता का नेतृत्व संभालने ही वाले हैं। मनमोहन सिंह बस संक्रमण काल के नेता रह गये हैं। शायद उन्होंने भी अपनी यह स्थिति स्वीकार कर ली थी। मगर किराना क्षेत्र में एफ.डी.आई. बढ़ाने की घोषणा करके वह फिर सत्ता और राजनीति के केंद्रीय चर्चा के विषय बन गये हैं। लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण निण्रय के समय सोनिया व राहुल का उनके समर्थन में खड़ा न दिखायी देना पार्टी में आंतरिक मतभेदों का संकेत माना जा रहा है। यों कांग्रेस हमेशा दोहरे चरित्र के साथ जीने वाली पार्टी रही है। सरकार का एक चरित्र दिखायी देता रहा है, पार्टी का दूसरा। शायद अभी भी यही संतुलन साधा जा रहा है। अभी पिछले दिनों महंगाई के प्रश्न पर जब सरकार पेट्र्ोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ाने की वकालत कर रही थी, उस समय पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी उससे इस पर पुनर्विचार करने का अनुरोध कर रही थीं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत की सामान्य मानसिकता किसी भी क्षेत्र में विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ है। लंबे समय की गुलामी के दौर से गुजरने के कारण यदि यह भय पूरी राष्ट्र्ीय मानसिकता में पैठ गया है, तो कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन अब उसे इस मानकिसता से बाहर निकालने की जरूरत है। आज का जमाना ईस्ट इंडिया का जमाना नहीं है। आज अंतर्राष्ट्र्ीय कंपनियों को भी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। यह सही है कि वे मुनाफे के लिए पूंजी निवेश कर रही हैं, लेकिन यह मुनाफा उनकी कार्यदक्षता और प्रबंध कौशल पर निर्भर है, अन्यथा उन्हें भी घाटा उठाना पड़ता है। अभी गत वर्ष ही शेयर बाजार में विदेशी कंपनियों को 45 प्रतिशत तक का नुकसान उठाना पड़ा। ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहां प्रतिस्पर्धा का अवसर ही समाप्त कर दिया था, लेकिन आज कोई विदेशी कंपनी ऐसा कर सकने में सक्षम नहीं है। दुनिया के अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि किराना क्षेत्र में विदेशी पूंजी को मिली छूट से उन देशों को लाभ ही पहुंचा है। यह धारणा तथा इसका प्रचार बिल्कुल गलत है कि इससे रोजगार के अवसर घटेंगे। अपने ही देश के अब तक के आंकड़े लें, तो खुदरा विक्रय की संगठित उन युवक-युवतियों को इसमें रोजगार का अच्छा अवसर मिल रहा है, जो उच्च शिक्षा से वंचित रह गये हैं, क्योंकि इसमें किसी तरह के कौशल या दक्षता से अधिक आपका व्यवहार काम आता है, जिससे कि आप ग्राहकों को संतुष्ट कर सकें। इतना तो साफ देखा जा सकता है कि पारंपरिक व्यापारिक दुकानेां पर काम करने वाले लड़के-लड़कियां बेहतर स्थिति में हैं। उन्हें बेहतर वेतन व सुविधाएं ही नहीं, एक सम्मानित जीवन जीने का भी अवसर मिल रहा है। विनम्रता और शिष्टाचार उनकी व्यावसायिक आवश्यकता बन जाने के कारण उनके सामान्य व पारिवारिक आचरण में भी फर्क आ रहा है। फिलीपिंस, थाईलैंड, मलेशिया और चीन के उदाहरण हमें बताते हैं कि विदेशी खुदरा कंपनियों के प्रवेश से वहां रोजगार की संख्या घटी नहीं, बल्कि बढ़ी है। ब्राजील, थाईलैंड तथा मलेशिया के आंकड़े बताते हैं कि इनके कारणवहां बेरोजगारी घटी है और देश का कुल राजस्व बढ़ा है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आप कह सकते हैंे कि किराना क्षेत्र में विदेशी पूंजी का आगमन यदि इतना हितकारी है, तो इस देश के किराना व्यापारी क्यों इतने आशंकित हैं कि वे विरेाध में सड़कों पर उतर आये हैं तथ राष्ट्र्ीय स्तर पर बंद का आह्वान करके अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इसका कारण निश्चय ही उनके अंदर फैला यह भय है कि किराना क्षेत्र में विदेशी कंपनियों के आ जाने के बाद उनकी छुट्टी हो जायेगी। यह धारणा कुछ तो गलतफहमीवश और कुछ राजनीतिक पार्टियों के प्रचारवश है, लेकिन इसका कुछ वाजिब कारण भी है। वाजिब व किसी हद तक वास्तविक कारण यही है कि यहां का किराना या खुदरा व्यापार का क्षेत्र अपने व्यवसाय के स्तर पर संगठित नहीं है और यदि इस देश में कृषि और व्यापार की कोई वैज्ञानिक व्यवस्था कायम करनी है, तो उनका व्यवसायिक स्तर पर संगठित होना जरूरी है। इसके लिए शासन की तरफ से जरूरी आर्थिक, तकनीकी व कानूनी मदद उपलब्ध कराये जाने की जरूरत है। मलेशिया व थाईलैंड आदि देशों की सरकारों ने यही किया। मलेशिया में 1995 में जब विदेशी किराना कंपनियों के प्रवेश की छूट मिली, तो वहां की सरकार अपने पारंपरिक किराना व्यापारियों की मदद के लिए आगे आयी। अपने देश् की राज्य सरकारें भी ऐसे विदेशी अनुभवों का लाभ उठा सकती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वास्तव में इस देश के राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे विदेशी कंपनियों का भय दूर करें और देशी व्यापारियों को इस तरह संगठित व साहसी बनाएं कि वे अपने देश में ही नहीं, दूसरे देशों में जाकर अपनी खुदरा व्यापार श्रंृखला शुरू कर सकें। देश को यह समझाने की जरूरत है कि विदेशी कंपनियां आएंगी, तो वे अपनी पूंजी के साथ नई तकनीक, नया प्रबंध कौशल तथ नया ज्ञान स्रोत भी लाएंगी, जिसका हम लाभ उठा सकेंगे। अव्वल तो में यह समझ लेना चाहिए कि कितनी भी विदेशी कंपनियां आ जाएं, वे इस विशाल देश की सौ प्रतिशत आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकती, किंतु उनके अनुभव, ज्ञान और कौशल का इस्तेमाल करके हम अपने देश् की पूरी कृषि और व्यापार प्रणाली की काया पलट कर सकते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह कए कड़वी सच्चाई है कि हमारा देश अभी भी औपनिवेश्काल वाली गुलामी की मानसिकता में जी रहा है। हमारा उत्पादक-वितरक-उपभोक्ता संबंध बिगड़ा हुआ है। वितरक या व्यापारी को उत्पादक व उपभोक्ता दोनों को शोषक समझा जाता है। अंग्रेज व्यापारियों ने इसी संस्कृति को जन्म दिया था, जिसे यहां के क्या, औपनिवेशिक क्षेत्र के सारे देशी व्यापारियों ने भी अपना लिया। कम्युनिस्ट राजनेताओं ने आम आदमी-कृषक व मजदूरों को व्यापारियों व उद्योगपतियों के खिलाफ भड़काया। उन्होंने उत्पादक-वितरक व उपभोक्ता के बीच सहयोगपूर्ण सौहार्द्य का संबंध स्थापित करने की कभी कोशिश नहीं की।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खुदरा व्यापार की नई संस्कृति उत्पादक व वितरक के बीच घनिष्ठ संबंधों पर आधारित है। नई टेक्नोलॉजी इसमें उसकी मदद कर रही है। हमारे देश के पास हजारों वर्षों का एक समृद्ध व्यापारिक अनुभव है, लेकिन यह अलग-अलग व्यावसायिक घरानों के पास कैद है। इसके साथ यदि आधुनिक वैज्ञानिक प्रणाली व तकनीकी कौशल जुड़ जाए, तो यहां का खुदरा व्यापारी भी चमत्कार कर सकता है, लेकिन इसके लिए अंतर्राष्ट्र्ीय सहयोग व अनुभव एवं तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान आवश्यक है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी इस देश का वातावरण बहुत ही संवेदनशील और उत्तेजनापूर्ण है, इसलिए सरकार के लिए बेहतर है कि एफ.डी.आई. के वर्तमान मसले को कुछ समय के लिए टाल दे। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, काले धन की वापसी आदि कम महत्वपूर्ण मुद्दे नहीं हैं, इनको निपटाने के बाद उसे पूरी गंभीरता के साथ खुदरा व्यापार के क्षेत्र में पूंजी निवेश बढ़ाने के मसले को हाथ में लेना चाहिए। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने अभी नई दिल्ली में हिन्दुस्तान टाइम्स के एक आयोजन में कहा कि ज्यादा लोकतंत्र भी आर्थिक विकास में बाधक होता है। भातर यदि चीन जैसा होता, तो अधिक विकास किया होता। यह बात किसी हद तक सही हो सकती है, लेकिन भारत में छलपूर्ण लोकतंत्र विकास में बाधक बना रहा है। लोकतंत्र यदि पारदर्शी हो और उसमें निहित स्वार्थ आड़े न आता हो, तो वह आर्थिक विकास में हमेशा सहायक ही बनेगा, बाधक नहीं। भारतीय मानसिकता सहज लोकतांत्रिक है, इसे उपनिवेश काल की शोषक संस्कृति ने भ्रष्ट कर रखा है, यदि वह एक बार उससे बाहर निकल जाए, तो फिर उसकी प्रगति के लिए चीन जैसी जकड़न वाली व्यवस्था को कभी आदर्श नहीं बताया जाएगा। 4-12-2011&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" style="text-align: justify;"&gt;﻿&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-549370948372210800?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/549370948372210800/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=549370948372210800' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/549370948372210800'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/549370948372210800'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-GypzWA1MNxs/TwQ9da09KVI/AAAAAAAAAhE/SUl2l69JWu8/s72-c/INDIARE1.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4357481173344464761.post-2706913540868051453</id><published>2011-11-28T12:53:00.001+05:30</published><updated>2011-11-28T12:53:43.049+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: purple; font-size: large;"&gt;शांति प्रयास भी पाकिस्तान की युद्ध नीति का ही हिस्सा &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-yDo9bjE66KA/TtM1Y-hwKBI/AAAAAAAAAg0/2kxn8t0s2Rw/s1600/MANMOHAN.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="236px" src="http://4.bp.blogspot.com/-yDo9bjE66KA/TtM1Y-hwKBI/AAAAAAAAAg0/2kxn8t0s2Rw/s400/MANMOHAN.JPG" width="400px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;शांति प्रयासों को आगे बढ़ाने की बात: मालदीव में भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह (बोलते हुए) व विदेश मंत्री एस.एम. कृष्ण (बाएं) के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी तथा विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;पाकिस्तान इन दिनों भारत के प्रति बहुत विनम्र हो गया है। वह शांति व सहयोग के प्रयासों को आगे बढ़ाने की बातें कर रहा है। भारतीय राजनेता भी बहुत प्रसन्न हैं। उन्हें लग रहा है कि उनकी ‘डिप्लोमेसी‘ काम आ रही है, पाकिस्तान बदल रहा है। लेकिन यह सच नहीं है, छलावा है। पाकिस्तान इन दिनों चौतरफा संकट में घिरा है, जिससे बाहर निकलने के लिए उसे कुछ समय चाहिए और चाहिए ‘शांतिप्रियता‘ का मुखौटा। समय निकलते ही वह फिर पुराने तेवर पर आ जायेगा। इसलिए उसके बारे में कोई गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। शेर शाकाहारी हो सकता है, तेंदुआ बेदाग बन सकता है, कुत्ते की पूंछ सीधी हो सकती है, किंतु पाकिस्तान नहीं बदल सकता। वह भारत का हितैषी मित्र कभी नहीं बन सकता।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत में इन दिनों इस बात पर बड़ा संतोष व्यक्त किया जा रहा है कि पाकिस्तान उसके साथ शांति और सहयोग के रास्ते पर बढ़ना चाहता है। उसने भारत को सर्वाधिक वरीयता प्राप्त देश (मोस्ट फेवर्ड नेशन) का दर्जा देने का प्रस्ताव किया है। यद्यपि भारत उसे यह दर्जा 15 साल पहले ही दे चुका है, फिर भी इतने दिनों बाद भी यदि उसने जवाबी पहल की है, तो यह स्वागत की बात है। 26/11 के मुंबई हमले की तीसरी बरसी के अवसर पर पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने गत शुक्रवार को कहा कि अगले सप्ताह पाकिस्तान का एक न्यायिक आयोग नई दिल्ली की यात्रा करेगा और 26/11 के आरोपियों के विरुद्ध मामलों की सुनवाई तेज करने के लिए भारत से सहयोग करेगा। उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तथा गृह मंत्री पी. चिदंबरम के प्रति आभार व्यक्त किया कि उन्होंने संबंधों को सामान्य बनाने और आपसी सहयोग बढ़ाने के मामले में गंभीर प्रयास किया है। उनहोंने पिछले ‘सार्क‘ शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशें के प्रधानमंत्रियों डॉ. मनमोहन सिंह और यूसुफ रजा गिलानी के बीच करीब एक घंटे तक हुई बातचीत का हवाला दिया और कहा कि दोनों शीर्ष नेताओं ने आपसी शांति कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण बातचीत की। इस मुलाकात में 26/11 के आरोपियों के विरुद्ध कार्रवाई को तेज करने का मामला भी उठा और हमें खुशी है कि 10 नवंबर को हुई बातचीत के एक पखवाड़े के भीतर ही पाकिस्तान का न्यायिक आयोग भारत जाने के लिए तैयार है। सोम-मंगल तक यदि सुप्रीमकोर्ट ने आयोग में शामिल होने वाले नामों को तय कर दिया, तो इसी हफ्ते में यह आयोग दिल्ली रवाना हो जायेगा। उन्होंने इस बात को गलत बताया कि पाकिस्तान 26/11 के दोषी पाकिस्तानियों को सजा दिलाने के प्रति गंभीर नहीं है। उन्होंने बताया कि भरत की शिकायत पर लश्कर-ए-तैयबा के एक उच्च अधिकारी जकीउर्रहमान लखवी को गिरफ्तार किया गया और वह अभी भी जेल में है। लखवी को मुंबई हमले की पूरी कार्रवाई का सूत्रधार माना जाता है, लेकिन भारत की नजर में इस हमले का मुख्य योजनाकार इस खूनी संगठन का संस्थापक अध्यक्ष हाफीज सईद है। उसके संदर्भ में रहमान मलिक का कहना है कि भारत ने उसके विरुद्ध पर्याप्त और पुष्ट प्रमाण नहीं दिये। हमने शुरू में उसे गिरफ्तार किया, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने उसे मुक्त कर दिया। उन्होंने भारत से अनुरोध किया है कि वह यथेष्ट प्रमाण दे, तो पाकिस्तान अवश्य कार्रवाई करेगा। मलिक से हाफिज सईद के भारत विरोधी वक्तव्यों व भड़काउ भाषणों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि ऐसे भाषणों पर पुलिस ने तीन बार उनके विरुद्ध एफ.आई.आर. दर्ज किया, किंतु कोर्ट ने उन्हें रद्द कर दिया। उनका कहना था कि यदि आगे भी हाफिज सईद इस तरह का भाषण देते हैं, तो मेरा वायदा कि हम फिर उनके खिलाफ मामला दर्ज करेंगे। 26/11 की इस तीसरी बरसी के अवसर पर शनिवार को भारत के विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने अपने एक वक्तव्य में पाकिस्तान को स्मरण दिलाया कि भारत अभी भी 26/11 के अभियुक्तों के विरुद्ध ठोस कार्रवाई की प्रतीक्षा में है, लेकिन उनका यह वक्तव्य भी एक कर्मकांड पूरा करने जैसा था। उन्होंने एक दिन पहले रहमान मलिक द्वारा दिये गये वक्तव्य के संदर्भ में कहा कि भारत पर्याप्त प्रमाण पाकिस्तान को सौंप चुका है, अब उसकी तरफ से केवल कार्रवाई की प्रतीक्षा है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक तरफ सरकारी नेताओं का इस तरह का वक्तव्य है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी तथा विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार पहले ही भारत के साथ शांतिपूर्ण संबंधों के विकास की दिशा में आगे बढ़ने की बातें कर चुके हैं। ‘सार्क‘ (दक्षिण एशियायी देशों के क्षेत्रीय सहयोग संगठन) की इस वर्ष की मालदीव में हुई शिखर बैठक में शायद पहला अवसर था, जब पाकिस्तान की ओर कश्मीर का मुद्दा नहीं उछाला गया। मनमोहन और गिलानी दोनों की बातचीत बड़े ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुई, जिससे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत संतुष्ट दिखे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस सबको देखते हुए यदि यहां के राजनीतिक नेताओं व आम लोगों को भी इस बात की गलतफहमी होने लगे कि अब पाकिस्तान बदल रहा है और वहां के नेता वास्तव में भारत के साथ शांतिपूर्ण संबंध विकसित करना चाहते हैं, तो यह अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि पाकिस्तान कभी नहीं बदल सकता। भारत के साथ शत्रुता उसका स्थाई भाव है। भारत के पूर्व विदेश सचिव जी. पार्थसारथी ने सही कहा है कि ‘शेर घास खाना शुरू कर सकता है, तेंदुए की चमड़ी के काले धब्बे धुल सकते हैं, कुत्ते की पूंछ सीधी हो सकती है, लेकिन पाकिस्तान कभी नहीं बदल सकता।‘ उनकी यह बात निश्चय ही सौ प्रतिशत सही है। पायिकस्तान वास्तव में भारत के साथ अपनी रणनीति बदलता रहता है। उसकी नीयत और लक्ष्य में कभी कोई बदलाव नहीं आया। भरतीय राजनेता और कूटनीतिज्ञ अक्सर पाकिस्तानी झांसे में आकर धोखा खाते रहते हैं, लेकिन पिछले अनुभवों से कोई सीख लेने का प्रयास नहीं करते। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वास्तव में पाकिस्तान इस समय चौतरफा संकट में है। इस संकट से बाहर निकलने के लिए उसने अपनी रणनीति बदली है। सच कहा जाए तो ‘शांति‘ भी उसके लिए भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किये जाने वाला एक हथियार है। जब सेना नाकाम हो गयी, आतंकवादी हमले भी काम में नहीं आए, तो अब उसने ‘शांति‘ के अस्त्र से भारत को परास्त करने या कम से कम उसकी आक्रामकता को कुंठित करने का निश्चय किया है। पाकिस्तान का सबसे बड़ा संकट यह है कि उसका दोगलापन अब पूरी दुनिया के सामने जाहिर हो गया है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साथ देने का वायदा करके पश्चिमी देशों को ठगने की उसकी चाल का पूरा भंडाफोड़ हो गया है। अब सब लोग यह जान गये हैं कि पूरी दुनिया में इस्लामी आतंकवाद का निर्यात करने वाला देश पाकिस्तान ही है। अब यह पता चल गया है कि पिछले 10-11 वर्षों से वह लगातार अमेरिका को धोखा देता आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ संघर्ष में पाकिस्तान का सहयोग पाने के लिए उसकी आर्थिक सहायता बढ़ाने का निर्णय लिया। लेकिन जब से यह पता चला है कि अमेरिका अफगानिस्तान में जिन तालिबानों से लड़ रहा है, वे सब तो पाकिस्तान के ही पिट्ठू हैं और पाकिस्तानी सेना की मदद लेकर स्वयं अमेरिकी सेना पर हमला कर रहे हैं। उसके बाद अब अमेरिकी विपक्ष संसद में सरकार पर दबाव डाल रहा है कि पाकिस्तान की सहायता बंद की जाए या उसे अत्यधिक कम किया जाए। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इससे पाकिस्तानी सरकार का संकट बढ़ गया है। उसके कुछ नेता व सैन्य अधिकारी अपने बड़बोले पर में यह कह जरूर रहे हैं कि उन्हें कोई अमेरिकी सहायता नहीं चाहिए। उनका देश बिना अमेरिकी सहायता के भी काम चला सकता है। लेकिन उन्हें पता है कि अमेरिकी सहायता के बिना उनका जीना मुश्किल हो जायेगा। कोई दूसरा देश उन्हें उतनी सहायता नहीं दे सकता, जितनी अमेरिका दे रहा है। पाकिस्तानी नेताओं ने चीन को अमेरिका का विकल्प बनाने की संभावना को भी तलाश लिया है। चीन पाकिस्तान को सैनिक सुरक्षा संभावना को भी तलाश लिया है। चीन पाकिस्तान को सैनिक सुरक्षा का आश्वासन दे सकता है, उसे हथियार दे सकता है, उसके सैनिक अड्डों का विकास कर सकता है, लेकिन वह उसे सारी सैनिक सहायता के अतिरिक्त हर वर्ष डेढ़ अरब डॉलर की नकद सहायता नहीं कर सकता। अमेरिकी सरकार पाकिस्तान से धोखा खाने के बाद भी उसकी सहायता करने के लिए तैयार है, क्योंकि वह उसे अपने आधिपत्य से बाहर नहीं जाने देना चाहता, लेकिन वह अपने देश की प्रबुद्ध जनता व विपक्ष को क्या समझाए। यद्यपि बहुत से पारंपरिक सोच वाले अमेरिकी अभी भी पाकिस्तान को अपना मित्र मानते हैं और उसे ‘नाटो‘ (नाथर्् एटलांटिक ट्रीटी आर्गनाइजेशन)के बाहर का सबसे बड़ा सहयोगी देश (मेजर नान नाटो एलाई) मानते हैं, लेकिन ज्यादातर जागरूक अमेरिकी अब पाकिस्तान को अपना शत्रु मानते हैं। इसीलिए शायद एक अमेरिकी पत्रकार ने पाकिस्तान के लिए एक नया वाक्यांक्ष गढ़ा है- ‘फ्रेनेमी ऑफ यू.एस.‘ (अमेरिका का दुश्मन-दोस्त)। ऐसे में अमेरिकी सरकार का पाकिस्तान पर दबाव पड़ रहा है कि यदि वह अमेरिकी सहायता पाते रहना चाहता है, तो अपने को बदले। नहीं बदलेगा तो अमेरिका उसकी सहायता जारी नहीं रख सकेगा। जाहिर है कि पाकिस्तान इस संकट से उबरने के लिए भारत के साथ थोड़े दिन का संघर्ष विराम चाहता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी इस 26/11 की बरसी के ठीक पहले गुरुवार तथा शुक्रवार को लश्कर-ए-तैयबा ने लाहौर तथा मुजफ्फराबाद में भारत के विरुद्ध जबर्दस्त रैली का आयोजन किया। रैली लश्कर-ए-तैयबा के नये अवतार जमात-उद-दवा के झंडे तले आयोजित की गयी, जिसमें भारत के विरुद्ध जमकर जहर उगला गया। भारतीय राष्ट्रध्वज को आग लगायी गयी तथा उसे जूतों तले रौंदा गया। लाहौर की रैली में पूरे सूबे से लोग आए। बसों, ट्रैक्टर ट्रालियों तथा मोटर साइकिलों पर सवार दूर-दूर से लोग इसमें भाग लेने पहुंचे। जमात-उद-दवा व लश्कर-ए-तैयबा के अलावा अन्य जिहादी संगठनों के लोग भी इसमें शामिल हुए। सब ने भारत को सर्वाधिक तरजीही देश (मोस्टर फेवर्ड नेशन) का दर्जा देने का प्रस्ताव का तिव्र विरोध किया और कहा कि भारत के साथ केवल ‘नफरत और गोली‘ का संबंध हो सकता है, दूसरा कोई संबंध संभव नहीं। भारत कभी भी पाकिस्तान का सर्वाधिक तरजीही देश नहीं बन सकता। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लाहौर की रैली में जमात के नेता अमीर हम्जा ने कहा कि हमारे नेता हाफिज सईद ने कश्मीर हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता अली शाह गिलानी को विश्वास दिलाया है कि वह भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिये जाने का तीव्र विरोध करेंगे। भारत कभी भी पाकिस्तान का पसंदीदा मुल्क नहीं हो सकता। यहां यह ध्यान देने की बात है कि लाहौर की रैली में सिर्फ जिहादी संगठनों के लोग ही नहीं शामिल हुए थे, बल्कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज गुट) के लोग भी शरीक हुए थे। पाकिस्तान ने भारत को सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र का दर्जा अभी दिया नहीं है, केवल प्रस्ताव किया है, जिसके बारे में निर्णय पाकिस्तानी संसद को करना है। रहमान मलिक साहब फरमाते हैं कि हाफिज सईद यदि भरत के विरुद्ध कोई भड़काउ बयानबाजी करते हैं, तो वह फिर उनके खिलाफ मामला दर्ज करायेंगे। पाकिस्तान में इस तरह का मामला दर्ज कराये जाने का अर्थ क्या है? जहां न्यायालय, सेना, पुलिस, गुप्तचर संगठनों तथा जिहादी संगठनों में कोई फर्क नहीं है। मुंबई में 170 लोगों की हत्या के अभियुक्त जिस हाफिज सईद को गिरफ्तार किया जाता है, उसे किसी जेल में नहीं डाला जाता, बल्कि उसके अपने महल में नजरबंद किया जाता है और पुलिस उसकी चौतरफा सुरक्षा करती है। अदालत उन्हें बाइज्जत रिया कर देती है। सरकार उन्हें गिरफ्तार तो करती है, लेकिन अदालत में उनके खिलाफ कोई आरोप पेश ही नहीं करती, इसलिए अदालत को भी उन्हें बाइज्जत रिहा करने में सुविधा होती है। जिन्हें गिरफ्तार करके जेल में रखा भी जाता है, उन्हें वहां वी.आई.पी. की सुविधा दी जाती है। वे केवल दुनिया को दिखाने के लिए जेल में होते हैं, अन्यथा वे अपने घ्र से भी अधिक सुविधाओं का वहां उपभोग करते रहते हैं। जैसे लखवी, जिन्हें जेल में मोबाइल के उपयोग की सुविधा भी प्राप्त है और वह वहां रहकर भी अपने संगठन के उपयोग की संचालन करता रहता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान जब भी दबाव में पड़ता है, तो उसके राजनेता उपर से मैत्री का दिखावा शुरू कर देते हैं, जिससे कि उन्हें संभलने का अवसर मिल जाए और वे अपनी भारत विरोधी रणनीति और पुख्ता कर लें। 1970 के दशक में राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक ने यही रणनीति चली थी। उस समय भारत के नेताओं और अधिकारियों ने उसका गलत आकलन किया। तत्कालीन विदेश सचिव जगत मेहता ने जिया उल हक को उदार (माडरेट) नेता समझाा था और उनका आकलन था कि जिया उल हक अपदस्थ प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी की सजा नहीं देंगे। लेकिन आकलन गलत निकला। भुट्टो को फांसी दी गयी और जिया के समय में पाकिस्तान का इस्लामी कट्टरपन और सख्त हुआ। संविधान में संशोधन हुआ। ईशनिंदा कानून बना। स्कूलों में भारत विरोधी शिक्षा को प्रोत्साहन दिया गया। पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम तेज हुआ। चीनी सहयोग से पाकिस्तान परमाणु बम बनाने में सफल हुआ। यह सब भारत की कूटनीतिक विफलता का परिणाम था। भारत ने यह मान लिया था कि पाकिस्तान की तरफ से अब कोई खतरा नहीं है, क्योंकि पाकिस्तानी शासक उपरी तौर पर मैत्री संबंध बढ़ाने का दिखावा करते रहे। पिछली शताब्दी के अंतिम वर्षों की कहानी लोग जानते ही है कि किस तरह भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पाकिस्तान के लिए मैत्री का संदेश लेकर एक बस में बैठकर लाहौर गये और पाग प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने उनका स्वागत करते हुए शांति और मैत्री की मीठी-मीठी बातें की, ठीक उसी समय पाकिस्तानी सेना के घुसपैठिये कारगिल पहाड़ी के भारतीय क्षेत्र में अपना कब्जा जमाने में लगे थे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज की स्थिति भी कमोबेश वैसी ही है। हम पाकिस्तान को एकतरफा सुविधाएं देकर शांति खरीदना चाहते हैं। पाकिस्तान ने अभी भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा देने की औपचारिकता भी पूरी नहीं की है, लेकिन हमने पाकिस्तानी व्यापारियों के लिए वीसा के नियम सरल करने, पूरे एक वर्ष के लिए विशेष वीसा देने का आदेश जारी कर दिया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत के लोग वास्तव में पाकिस्तान की मानसिकता को नहीं समझते। मजहबी रुढ़िवाद व कट्टरतावाद तो उसका एक हिस्सा मात्र है। वास्तव में पाकिस्तान की नई पीढ़ी का इस तरह ‘ब्रेन वाश‘ कर दिया गया है कि वह भारत को भी पाकिस्तान का अंग मानती है। दक्षिण एशिया के पूरे इलाके के मालिक मुस्लिम रहे हैं, हिन्दू नहीं, यह धारणा तो इस क्षेत्र के प्रायः पूरे मुस्लिम समाज की रही है, केवल पाकिस्तान की नहीं, मगर पाकिस्तान के लोग तो हिन्दुस्तान की अवधारण को ही स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि हिन्दुस्तान तो उनका दिया हुआ नाम है, जो गंगा घाटी पर कब्जा करने के बाद उन्होंने उसे दिया। पाकिस्तानी इतिहासकार मानते हैं कि मोहम्मद बिन कासिम पहला पाकिस्तानी था, जिसने सिंध और पंजाब पर हमला किया और उस पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। उनकी धारणा है कि अधिकांश पाकिस्तानी अरब से आए हुए या वहां के विस्थापित लोग हैं। वे यह भी समझते हैं कि अंग्रेजों के या यूरोपियों को दक्षिण एशिया में आने के पूर्व इस पूरे इलाके पर मुसलमानों का ही अधिकार था, इसलिए यदि अंग्रेज इस इलाके को छोड़कर गये, तो वास्तव में इस पूरे क्षेत्र पर मुसलमानों को कब्जा मिला चाहिए था। इस क्षेत्र में 1857 का प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम भी मुस्लिम नेतृत्व में लड़ा गया। क्रांतिकारियों ने अंतिम मुगल शासक बहादुर शह जफर को ही अपना नेता स्वीकार करके स्वातंत्र्य का संघर्ष छेड़ा था। यह लड़ाई उनकी थी, यह देश उनका था, किंतु हिन्दुओं ने तिकड़म करके मुसलमानों का यह अधिकार छीन लिया और उन्हें पाकिस्तान के नाम पर एक छोटा इलाका ही मिल सका। इसलिए जैसे भी हो, उन्हें इस पूरे इलाके पर अपना अधिकार कायम करना है। उनकी इस धारणा को कई अंग्रेज इतिहासकारों से भी जाने अनजाने समर्थन मिला। प्रख्यात पुरातत्वज्ञ ह्वीलर ने एक पुस्तक लिखी ‘5000 इयर्स ऑफ पाकिस्तान‘ (पाकिस्तान के 5000 वर्ष)। उन्होंने पाकिस्तानी क्षेत्र के 5 हजार साल के पुरातात्विक इतिहास का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया, लेकिन अपनी पुस्तक के शीर्षक से उन्होंने पाकिस्तान के इतिहास को 5000 साल पुराना बता दिया। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह सही है कि मुहम्मद बिन कासिम से इस क्षेत्र में मुस्लिम राजनीतिक आधिपत्य की शुरुआत होती है। कासिम का जन्म आज सउदी अरब इलाके के शहर तैफ में हुआ था। वह उम्मैद खलीफा का सैनिक कमांडर था। सिंध और पंजाब के क्षेत्र को जीत कर उसने भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी शासन की स्थापना की । इसका ज्यादातर इलाका इस समय पाकिस्तान में है। इसलिए पाकिस्तान की आज की पीढ़ी यह मानती है कि वे भारतीय मूल के नहीं, बल्कि अरबी मूल या अरबी नस्ल के हैं, तो कोई बहुत गलत बात नहीं। उन्हें जिस तरह की शिक्षा दी जाएगी, वैसी ही उनकी मानसिकता बनेगी। 695 ई. में जब मुहम्मद बिन कासिम का भारत पर हमला हुआ, यहां सम्राटों का युग समाप्त हो चुका था। लेकिन इस देश का सांस्कृतिक अस्तित्व किसी सम्राट या उसके साम्राज्य के राजनीतिक प्रभाव पर निर्भर नहीं था, इसलिए भारतीय संस्कृति का अस्तित्व या उसकी सांस्कृतिक राष्ट्रीयता सदैव विद्यमान नहीं, जिसके कारण मुस्लिम साम्राज्य भले कुछ समय के लिए इस पूरे उपमहाद्वीप पर छा गया हो, लेकिन इस्लाम का अधिपत्य कभी कायम नहीं हो सका। यह सांस्कृतिक युद्ध लगातार तबसे चला आ रहा है, जब कासिम ने हमला किया था और अब भी जारी है। आज का पाकिस्तान अभी भी अपने को मुहम्मद बिन कासिम या उसके बाद के उन बादशाहों का उत्तराधिकारी समझता है, जिन्होंने इस भारत देश पर राज्य किया और उस हैसियत को फिर से पाना चाहता है। इसलिए पाकिस्तान ने कभी बदल सकता है, न भारत का कभी मित्र हो सकता है और न कभी सेकुलर लोकतंत्र का समर्थक बन सकता है। वह अवसर देख कर अपनी रणनीति बदलने में कुशल है, क्योंकि कुशल युद्ध नीति का यही तकाजा है कि विपरीत समय में दो कदम पीछे हट लो, जरूरत पड़े तो अधीनता भी स्वीकार कर लो, अपनी रक्षा करो और शक्ति बढ़ाओ, जिससे अवसर मिलने पर दुगुनी ताकत से हमला करके निर्णायक विजय हासिल की जा सके। भारत के राजनेता और रणनीतिकार यदि इसे नहीं समझें, तो भविष्य की पीढ़ी की नजर में अपनी साख तो गंवाएंगे ही, साथ ही इस देश को पहले से घेरे हुए खतरे को और बढ़ाने का भी काम करेंगे। हमें इतिहास से सबक सीखना चाहिए, नहीं तो भविष्य हमारा अस्तित्व मिटा देगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-2706913540868051453?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/2706913540868051453/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=2706913540868051453' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/2706913540868051453'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/2706913540868051453'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' 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href="http://4.bp.blogspot.com/-fOM8Ot2_HAU/Ts3mLRfq9mI/AAAAAAAAAgs/FAU3dIs7CSs/s1600/MAP_UP_3.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="640px" src="http://4.bp.blogspot.com/-fOM8Ot2_HAU/Ts3mLRfq9mI/AAAAAAAAAgs/FAU3dIs7CSs/s640/MAP_UP_3.JPG" width="597px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;प्रस्तावित विभाजन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भारत के इस प्रतिनिधि राज्य के चार टुकड़े करने का प्रस्ताव किया है। यह प्रस्ताव यदि केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत कर लिया गया, तो देश् में 4 नये प्रदेश जुड़ जायेंगे और उत्तर प्रदेश का लोप हो जायेगा। यद्यपि किसी देश की भीतरी इकाइयों के विभाजन, पुनर्गठन या नाम परिवर्तन को कोई बड़ी बात नहीं माना जाता, किंतु जैसे किसी राष्ट्र की सीमाओं या स्वरूप का कोई ऐतिहासिक या सांस्कृतिक आधार होता है, उसी तरह इतिहास के विकासक्रम में स्वतः गठित हुए राज्यों की भी एक ऐतिहासिक व सांस्कृतिक अस्मिता होती है, जिसे केवल कुछ व्यक्तियों या दलों के राजनीतिक लाभ के लिए नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपने इस राज्य को चार टुकड़ों में विभाजित करके चार नये राज्य बनाने का निर्णय लिया है। उनकी कैबिनेट ने उनके इस प्रस्ताव पर अपनी मुहर भी लगा दी है। अब यह प्रस्ताव विधानमभा के इसी सप्ताह शुरू होने जा रहे सत्र में पेश किया जाने वाला है। उसके पास होने में कोई दिक्कत है नहीं, इसलिए विधानसभा से पारित यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा जायेगा। किसी राज्य के विभाजन या नये राज्य के निर्माण का पूरा अधिकार केंद्र के पास है। इसके लिए किसी विधानसभा के प्रस्ताव की कोई आवश्यकता नहीं, किंतु मायावती का कहना है कि इस विभाजन के बारे में वह केंद्र सरकार को कई बार पत्र लिख चुकी हैं, पर वह ध्यान नहीं देती, इसलिए इस बार वह अपना अनुरोध बाकायदे विधानसभा के प्रस्ताव के रूप में उसके पास भेजना चाहती हैं, जिससे केंद्र सरकार इस बात को समझे कि वह कोई अकेली उनकी इच्छा नहीं, बल्कि पूरे राज्य के बहुमत की इच्छा है कि 80 सांसदों वाले इस राज्य को कम से कम चार राज्यों में बांट दिया जाए। मायावती ने इन राज्यों के नाम भी प्रस्तावित कर दिया है- पूर्वांचल, अवध् प्रदेश, बुंदेलखंड तथा पश्चिम प्रदेश। इनका नक्श भी तय हो गया है और इसके साथ ही यह भी तय हो गया है कि किस राज्य में कितने और कौन-कौन से जिले, कितनी लोकसभा सीटें तथा कितनी विधानसभा सीटें आयेंगी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ऐसे धमाकेदार प्रस्ताव पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आना स्वाभाविक है, लेकिन प्रायः सारी प्रतिक्रियाएं राजनीतिक लाभ-हानि तथा प्रशासनिक सुविधा-असुविधा व आर्थिक विकास की संभावनाओं को लेकर ही आ रही हैं। ऐसी कोई भी प्रतिक्रिया प्रमुखता से अब तक सामने नहीं आयी, जो इस प्रदेश के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व या उसको पहुंचने वाली क्षति से जुड़ी हो या उसे रेखांकित करती है। ऐसा नहीं कि यह प्रदेश केवल अपनी विशाल जनसंख्या व सांसदों की संख्याबल से केंद्र की राजनीति को ही प्रभावित करता रहा है, बल्कि यह भरतीयता और भारतीय राष्ट्र की एक ऐतिहासिक व सांस्कृतिक मूर्ति भी गढ़ता रहा है। जहां तक राजनीतिक प्रभाव की बात है, तो यह विखंडित होकर भी वह करने में सक्षम रहेगा, क्योंकि राजनीतिक प्रभाव, क्षेत्र से नहीं, बल्कि उस क्षेत्र में सर्वाधिक प्रभाव वाले राजनीतिक दल के कारण पड़ता है। इस प्रदेश में जब तक कांग्रेस शक्तिशाली थी, तब तक ही लगता था कि पूरा देश इसी प्रदेश से नियंत्रित हो रहा है, लेकिन उसके हाशिये में जाने के बाद इसकी वह स्थिति नहीं रही। इसलिए विभाजन के बाद भी क्षेत्र की राजनीतिक हैसियत में कोई बदलाव आने वाला नहीं है। किंतु यह प्रदेश इस देश का जो सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करता था, वह अवश्य टूट जायेगा। उत्तर प्रदेश अब तक क्षेत्रवादी भावनाओं से मुक्त सचमुच इस देश का प्रतिनिधित्व करता रहा है। यह अपने को पूरे भारत का सम्पिंडित रूप समझता रहा है। देश के किसी कोने के व्यक्ति के लिए यहां पराएपन का भाव नहीं था। स्वयं के लिए भ्ी कोई भिन्न भाव बोध नहीं था। इसलिए इसके पास कोई आंचलिक अहंकार भी नहीं था। सबके साथ मिल जाना और सबको मिला लेना इसकी प्रकृति रही है। इस देश को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने वाले राम, कृष्ण और शिव के मूल केंद्र और अनादि भारतीय सांस्कृतिक प्रवाह का प्रतिनिधित्व करने वाली गंगा-यमुना की धाराएं इसी प्रदेश में बहती रही हैं। उनका महान संगम भी इसी प्रदेश के हृदयस्थल में हुआ। संयोगवशात ही इस प्रदेश ने वह रूप ले लिया था कि गंगा-यमुना का उद्गम, उनका पर्वतों से मैदान में अवतरण और फिर उनका संगम सब कुछ इस प्रदेश की सीमा में सिमट गया। लेकिन राजनीतिक स्वार्थ दृष्टि से इस सांस्कृतिक प्रतिमा का विखंडन वर्ष 2000 यानी इस शताब्दी के पहले ही वर्ष में शुरू कर दिया, जब इसका शिरोभाग अलग करके उत्तराखंड नाम से एक अलग राज्य बना दिया गया। अब इसके चार और टुकड़े करने का प्रस्ताव है। यदि यह प्रस्ताव स्वीकृत हो गया और चार नये राज्य बन गये, तो उसके साथ ही ‘उत्तर प्रदेश‘ का यह नाम भी विलीन हो जायेगा। और फिर इसके साथ ही अंत हो जायेगा एक इतिहास का एक सांस्कृतिक बोध का और एक क्षेत्रीयता की भावना से मुक्त सामाजिक सोच था। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वर्तमान उत्तर प्रदेश प्राचीन आर्यावर्त क्षेत्र का मुख्य भाग था। पुराण प्रसिद्ध प्राचीनतम राजवंशों-सूर्यवंश और चंद्रवंश दोनों की क्रीड़ा भूमि यही क्षेत्र था। भारतीय संस्कृति के निर्माता राम, कृष्ण ही नहीं बौद्धदर्शन के प्रवर्तक भगवान बुद्ध भी इसी क्षेत्र के थे। जैन संप्रदाय के अंतिम तीर्थंकर स्वामी महावीर का जन्म और निर्वाण भले ही बिहार में हुआ हो, लेकिन उनकी भी चारिका ज्यादातर इसी क्षेत्र में हुई। 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तो काशी के ही थे, जो उत्तर प्रदेश में आता है। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव सहित अधिकांश तीर्थंकरों की जन्मस्थली यही क्षेत्र है। चार तीर्थंकर तो अयोध्या में ही थे। इतिहास प्रसिद्ध प्रमुख वैदिक व वैदिकोत्त ऋषियों वशिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज, पतंजलि आदि के आश्रम इसी क्षेत्र में थे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस तरह ब्राह्मण, वैष्णव, जैन, बौद्ध इन चारों धर्मों की मुख्य भूमि यही प्रदेश है। भक्तिकाल के तुलसी, सूर, कबीर, जायसी जैसे महाकवि इसी भूमि के हैं। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो उपर्युक्त पौराणिक राजवंशों के बाद इतिहास काल के तीन प्रमुख महाजनपद काशी-कोशल-कुरु इसी क्षेत्र में आते हैं। इस पूरे क्षेत्र पर आधिपत्य के बिना कोई भी राजा-महाराजा सम्राट कहलाने का अधिकारी नहीं बन सका। गुप्तकाल, हर्षवर्धन काल और उसके बाद के राजपूत काल में इस क्षेत्र की अपनी केंद्रीय राजनीतिक भूमिका रही। राजधानियों के केंद्र कहीं रहे हों, लेकिन अधिकतर आर्थिक, राजनीतिक व सामरिक गतिविधियों का केंद्र यह क्षेत्र ही रहा। 10 वीं शताब्दी के बाद दिल्ली के इस्लामी सल्तनत काल में भी यह क्षेत्र एक इकाई बना रहा। मुगलिया सल्तनत काल में भी गंगा-यमुना-रसयू का यह क्षेत्र ही उसका हृदय प्रदेश था और मुगल शासकों ने ही इस क्षेत्र को ‘हिन्दुस्तान‘ का नाम दे रखा था। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुगलवंश के राजाओं हुमायू और अकबर के बीच के काल में इस पूरे क्षेत्र पर अपना एकछत्र राज्य काम करने वाले भारतीय राजा हेमचंद को तो आज लोग भूल चुके हैं, लेकिन उत्तर मध्यकाल में ‘विक्रमादित्य‘ की उपाधि धारण करने वाला वह एकमात्र भारतीय विजेता है, जिसने मुगलों को भी पराजित किया और उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर अपना साम्राज्य स्थापित किया और दिल्ली के पुराने किले में पारंपरिक भारतीय रीति से अपना राज्याभिषेक कराया और ‘सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य‘ का नाम धारण किया। उसने 22 लड़ाइयां लड़ीं और सबमें विजय हासिल की। उसने अकबर की सेना को भी परास्त किया। संयोगवश उसका राज्य अत्यल्पजीवी रहा। अकबर के दुबारा हुए हमले के समय पानीपत के मैदान में चल रहे युद्ध में अचानक एक तीर उसकी आंख में आ गया और वह अपने हाथी के हौदे में गिर गया। हाथी पर अपने सम्राट को न देखकर उसकी सेना ने मैदान छोड़ दिया और अकबर हारी हुई लड़ाई जीत गया। हेमंचद्र का सिर काट कर फरगाना ले जाया गया और वहां दिखाया गया कि देखो उस अजेय कहे जाने वाले हिन्दू सम्राट को मार डाला गया है। वास्तव में नवयुवक अकबर की सेना के तमाम अधिकारी और उसके अपने सलाहकार हेमचंद्र पर हमले के पक्ष में नहीं थे, उन सबका कहना था कि हेमचंद्र बहुत शक्तिशाली है, उसे अभी हजाया नहीं जा सकता, केवल बैरम खां चाहते थे कि जो भी हो, हमें हमला करना चाहिए। अकबर ने बैरम की राय मान ली और उसका सितारा चमक उठा। हेमचंद्र का सिर जहां फरगाना में लटकाया गया, वहीं उसका धड़ दिल्ली के उसके किले पर लटकाया गया, जिससे दिल्ली की जनता अपने सम्राट का हश्र देख ले और अकबर का आधिपत्य स्वीकार कर ले। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उत्तर प्रदेश का यह क्षेत्र सम्राट हेमचंद्र के राज्य का भी हृदय प्रदेश था। दिल्ली के सम्राट के पद पर शायद वह केवल एक महीने ही रह सका, क्योंकि भाग्यलक्ष्मी ने उसका साथ नहीं दिया, फिर भी उसने उत्तर प्रदेश कहे जाने वाले क्षेत्र पर अपनी अमिट छाप छोड़ी, क्योंकि इसकी ही सांस्कृतिक चेतना और शौर्य के बल पर उसने अपना साम्राज्य स्थापित किया था। मुगलकालीन उत्तर प्रदेश के इतिहास पर अब तक बहुत कम काम हुआ है। इतिहास मुगल शासन के बाद सीधे नवाबी शासन पर आ जाता है और लखनउ के नवाबों का गुणगान करने लग जाता है। वह उन स्थानीय संघर्षों का लेखा-जोखा तैयार करने में रुचि नहीं लेता, जो पूरे मुगलकाल में जारी रहा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देश के स्वतंत्र होने के बाद उत्तर प्रदेश के नाम से जो प्रांत सामने आया, वह अंग्रेज बहादुरों की देन है। इसके बदलते नामों और भौगोलिक आकार का इतिहास भी बड़ा रोचक है, लेकिन एक बात उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों की इस संरचना में उत्तर प्रदेश भारतीयता की एक संपूर्ण इकाई बना रहा, जिसे विखंडित करने का कार्य अब स्वतंत्र भारत में शुरू हुआ है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;18वीं शताब्दी में बंगाल पर कब्जे के बाद उत्तर प्रदेश में अंग्रेजों की जो विजय यात्रा शुरू हुई, वह 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक बनारस, बुंदेलखंड, कुमायूं, गढ़वाल व गंगा के दो आब से होकर दिल्ली, अजमेर और जयपुर तक पहुंच गया। यह पूरा क्षेत्र पहले बंगाल, प्रेसीडेंसी के अंतर्गत था और वहीं से शासित होता था, लेकिन बंगाल से इतनी दूर तक का शासन सूत्र संभालना उस समय मुश्किल था, इसलिए 1833 में बंगाल प्रेसीडेंसी का विभाजन कर दिया गया और उसके पश्चिमी हिस्से को ‘प्रेसीडेंसी ऑफ आगरा‘ नाम दिया गया। फिर 3 साल बाद ही इसे ‘नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज‘ (ऑफ आगरा) का नाम दिया गया और इसके लिए अलग ‘लेफ्टीनेंट गवर्नर‘ की नियुक्ति की गयी। 1857 की क्रांति के विफल होने के बाद अवध का क्षेत्र भी 1858 में अंग्रेजों के हाथ में आ गया, तो कुछ दिन बाद फिर प्रशासनिक फेरबदल हुए। अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ स्थानीय विद्रोह को कमजोर करने के लिए ‘नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज ऑफ आगरा‘ से दिल्ली क्षेत्र को काटकर पंजाब के साथ जोड़ दिया गया तथा अजमेर और मारवाड़ क्षेत्र को काटकर राजपूताना में मिला दिया गया। और इसके बाद 1877 में अवध को आगरा के साथ जोड़कर इस प्रांत को नया नाम दिया गया ‘नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध‘। 1902 में इसका नाम फिर बदला गया और इसे ‘यूनाइटेड प्राविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध‘ कहा जाने लगा। यहीं से इसके संक्षिप्त नाम ‘यू.पी.‘ की शुरुआत हुई। पहले इस प्रांत की राजधानी आगरा और इलाहाबाद के बीच बदलती रही, अंत में 1920 में इसे इलाहाबाद से हटाकर लखनउ कर दिया गया, लेकिन प्रांत का हाईकोर्ट अभी भी इलाहाबाद में ही बना हुआ हे, हां राजधानी लखनउ पहुंच जाने के कारण उसकी एक पीठ लखनउ में स्थापित कर दी गयी। यह स्थिति स्वतंत्रता प्राप्ति तब बनी रही । 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद राज्य के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने इसका अंग्रेजी नाम बदलकर इसे वर्तमान ‘उत्तर प्रदेश‘ का नाम दिया। इस क्षेत्र में कुमायूं गढ़वाल से लेकर बलिया तक का क्षेत्र शामिल था। मगर स्वतंत्र भारत में वर्ष 2000 में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य का विभाजन करके इसके पर्वतीय अंचल को काटकर ‘उत्तराखंड‘ के नाम से एक नया राज्य बना दिया। इस विभाजन के साथ ही देवभूमि कहा जाने वाला उत्तरांचल क्षेत्र इस राज्य से अलग हो गया, जिसके साथ ही गंगा और यमुना के उद्गम स्थल, बद्री और केदारधाम तथा हरिद्वार का गंगा अवतरण तीर्थ भी इसकी सीमा से बाहर हो गया। इसका दोनों विभाजित क्षेत्रों को भी जो राजनीतिक व आर्थिक लाभ मिला हो, किंतु उत्तर प्रदेश के रूप में सांचे में ढलकर निकली इस सांस्कृतिक भू प्रतिमा का अवश्य अंगभंग हो गया। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब शेष बचे इस उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती इस बचे प्रदेश को भी चार टुकड़ों में बांटना चाहती हैं। बदरिकाश्रम और हरिद्वार तो अलग हो ही चुके थे, अब काशी और मथुरा भी अलग-अलग प्रांतों में बंट जाएंगे। प्रत्येक टुकड़ा अब अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान बनाने की कोशिश करेगा और क्षेत्रीय गौरव गाथाएं गढ़ेगा। क्षेत्रीय भाषाओं का आग्रह भी तेज हो सकता है। होना भी चाहिए, यदि देश के अन्य राज्य अपनी भाषाई इकाइयों के आधार पर गठित हुए हैं, तो ये प्रांत भी क्यों न इसका दावा करें। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बल्कि सच कहें तो मायावती के इस प्रस्ताव के कारण ‘द्वितीय राज्य पुनर्गठन आयोग‘ की जरूरत और तीव्रता से महसूस की जाने लगी है। दक्षिण में आंध्र प्रदेश का विभाजन करके तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के लिए या महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा देने के लिए तो किसी नये आयोग की जरूरत नहीं, बस थोड़ी राजनीतिक निर्णय शक्ति की जरूरत है, लेकिन मायावती के इस प्रस्ताव को तो ज्यों का त्यों कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि देश में एक बार भाषा आधारित प्रांत निर्माण का सिद्धांत स्वीकार कर लिया गया है, तो उत्तर भारत में भी इसे लागू होना चाहिए। ब्रज भाषा के आधार पर ब्रजमंडल, बुंदेली के आधार पर बुंदेलखंड, अवधी के आधार पर अवध प्रदेश तो पूर्व में भोजपुरी या काशिका के आधार पर उसे भोजपुर या काशीराज्य का नाम दिया जा सकता है। वर्तमान प्रस्तावित नामों में अवध एवं बुंदेलखंड के नाम तो ठीक हैं, किंतु ‘पूर्वांचल‘ व ‘पश्चिमी प्रदेश‘ जैसे नाम का कोई औचित्य नहीं है। एक प्रदेश की सीमा में तो उन्हें पश्चिमी या पूर्वी कहना ठीक था, लेकिन जब वे भारत देश के स्वतंत्र प्रांत बन जायेंगे, तब उनका यह नाम अवश्य अटपटा लगेगा। क्योंकि वे तो देश के मध्य में हैं, कोई पश्चिमी या पूर्वी छोर पर तो नहीं। और यदि उन्हें भाषाई आधार दिया गया, तो क्षेत्र निर्धारण की समस्या निश्चय ही जटिल हो जाएगी और कई नये विवाद भी खड़े हो सकते हैं। लेकिन मायावती का प्रस्ताव भी ज्यों का त्यों मानने के योग्य नहीं है, भले ही उसे उत्तर प्रदेश विधानसभा पारित ही क्यों न कर दे। यों भी यदि ऐसा हुआ, तो यह पहला अवसर होगा, जब उत्तर प्रदेश राज्य और उसकी विधानसभा 4 बच्चों को जन्म देकर अपना अस्तित्व ही समाप्त कर दे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उत्तर प्रदेश सदैव भारतीय राजनीति साहित्य और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में रहा है। भारत के प्राचीन या मध्यकालीन ही नहीं, आधुनिक इतिहास में भी इसकी भूमिका अग्रणी रही है। 1857 की क्रांति हो या उसके बाद का स्वातंत्र्य आंदोलन, इस प्रांत की भूमिका उसमें स्पष्ट रूप से पहचानी जा सकती है। पाकिस्तान के निर्माण का अभियान भी यहीं जन्मा और यहीं से आगे बढ़ा। समाजवादी आंदोलन का भी यह प्रदेश गढ़ रहा। जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया, चंद्रशेखर, राजनारायण आदि ने कांग्रेस के भीतर जो समाजवादी गुट बना रखा था, उसका आधार उत्तर प्रदेश ही प्रदान कर रहा था। प्रथम अखिल भारतीय किसान सभा का गठन लखनउ में हुई (11 अप्रैल 1936) की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की महासभा में हुआ था, जिसमें प्रख्यात राष्ट्रवादी स्वामी सहजानंद सरस्वती को इसका पहला अध्यक्ष चुना गया था। ब्रिटिश कालीन जमींदारी प्रथा के विरुद्ध पहला आंदोलन इसी प्रदेश में शुरू हुआ था। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा अवश्य बॉम्बे (मुंबई) में हुई थी, किंतु उपनिवेशवादी सत्ता को उखाड़ फेंकने का पहला कार्य उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में चित्तू पांडेय ने कर दिखाया था। बलिया तभी से अंग्रेजों की शब्दावली में ‘बागी बलिया‘ बन गया था। स्वतंत्र भारत में इंदिरा गांधी के आपातकाल के विरोध में भी उत्तर प्रदेश ने अहम भूमिका अदा की। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;किसी इतिहास के विद्यार्थी या भारतीय संस्कृति व परंपरा के प्रति आस्थावान नागरिक के लिए तो यह कल्पना ही कंपित करने वाली प्रतीत होती है कि ऐसा भी कोई समय आ सकता है, जब भारत के नक्शे से उत्तर प्रदेश के नाम का ही लोप हो जाए। माना की आज की पीढ़ी को केवल अधिक से अधिक राजनीतिक अधिकार और आर्थिक समृद्धि चाहिए और शायद उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के विभाजन से उन राज्यों के रहने वालों की आकांक्षा पूरी हो जाए, किंतु यदि भारत के सांस्कृतिक व राजनीतिक इतिहास के प्रतीकों को सहेज कर नहीं रखा गया, तो भारतीयता की और उसकी रक्षा के संघर्षों की पहचान ही समाप्त हो जायेगी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को और शायद उनके समर्थकों को भी राष्ट्र और राष्ट्रीयता के किसी प्रतीक की आवश्कता ही नहीं रह गयी है। उन्होंने तो बुद्ध जैसे दार्शनिक आचार्य को अपनी जातीय राजनीति का प्रतीक बनाकर छोड़ दिया है, फिर उत्तर प्रदेश जैसे जमीनी टुकड़े को ऐतिहासिक व सांस्कृतिक अस्मिता का उनके लिए क्या मूल्य। यद्यपि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित मायावती का प्रस्ताव स्वीकार ही कर लेगी, लेकिन मायावती को इसकी चिंता नहीं है। उनके तो दोनों हाथों में लड्डू हैं। कांग्रेस सरकार उनका प्रस्ताव माने तो ठीक, न माने तो ठीक। दोनों ही स्थितियों में उनकी अपनी राजनीति का रंग चोखा रहेगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कम से कम उत्तर प्रदेश में अलग-अलग राज्य बनाने की राजनीति करने वाले तो अब मायावती के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं कर सकेंगे। इसलिए विधानसभा चुनावों के ठीक पहले छेड़े गये उनके इस शिगूफे के लिए निश्चय ही उनके राजनीतिक कौशल की दाद देनी पड़ेगी, लेकिन कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश का नाम लोप करके चार नये राज्य बनाने की यह राजनीति वांछनीय नहीं कही जा सकती है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;साधारणतया दुनिया में राज्य की राजनीतिक सीमाओं, उनके भौगोलिक आकारों या उनके नामों में बदलाव की प्रक्रियाएं तो चलती ही रहती हैं। तमाम राज्य लुप्त होते रहते हैं, नये बनते रहते हैं । और उत्तर प्रदेश तो एक राष्ट्र राज्य (नेशन स्टेट) का एक खंड मात्र (सब स्टेट) है, फिर उसके टुकड़े होने, नाम बदलने या नाम लोप होनेकी चिंता क्यों की जाए। बात किसी हद तक सही है, लेकिन उत्तर प्रदेश इस भारत देश के लिए मात्र एक प्रांतीय प्रशासनिक इकाई भर नहीं है। वह अपनी समग्रता में भारतीय राष्ट्रीयता की आत्मा को संजोए हुए है। उसमें भारत निहित है, भारतीयता निहित है और भारतीयता की रक्षा करने वाले संघर्ष की प्रेरणा निहित है। इस प्रांत का इस तरह हथौड़ा मार विखंडन इस आत्मा के लिए क्षतिकारक है, जिसे रोका ही जाना चाहिए। वैसे काल प्रवाह किसके रोके रुका है, किंतु उदात्त एवं श्रेष्ठ सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा तो काल से लड़कर भी की जानी चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-6364231447295132345?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/6364231447295132345/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=6364231447295132345' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/6364231447295132345'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/6364231447295132345'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2011/11/4-80-2000-23-10-22-18-19-1833-3-1857.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-fOM8Ot2_HAU/Ts3mLRfq9mI/AAAAAAAAAgs/FAU3dIs7CSs/s72-c/MAP_UP_3.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4357481173344464761.post-4651317543086922977</id><published>2011-11-16T15:13:00.000+05:30</published><updated>2011-11-16T15:13:15.961+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-size: x-large;"&gt;"रामायण" व रामकथा पर नया छिड़ा विवाद &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Ji_SPDkNfKc/TsOEebDCDWI/AAAAAAAAAgg/OdJIcY1hhAI/s1600/DELHIUNI.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="262" src="http://2.bp.blogspot.com/-Ji_SPDkNfKc/TsOEebDCDWI/AAAAAAAAAgg/OdJIcY1hhAI/s400/DELHIUNI.JPG" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;ए.के. रामानुजन का निबंध पाठ्यक्रम से बाहर निकालने पर विरोध &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;प्रदर्शन&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt; करते हुए: दिल्ली विश्वविद्यालय के वामपंथी अध्यापक व छात्र&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत् परिषद ने पिछले दिनों बी.ए. (आनर्स) द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम (भारतीय संस्कृति) में शामिल एक विवादास्पद निबंध को हटाने का निर्णय ले लिया, इससे देश भ्र में तमाम वामपंथी बुद्धिजीवी, लेखक, अध्यापक, पत्रकार व इतिहासकार बेहद क्षुब्ध हैं और उसे वापस पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने की मांग कर रहे हैं। यह निबंध प्रसिद्ध कवि, लेखक, भाषाविद तथा अनुवादक ए.के. रामानुजन का है, जो महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णित रामकथा की प्राचीनता व प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हैं तथा अन्य गौण व विकृत कथाओं को उस पर तरजीह देने का प्रयत्न करते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;यूरोप से आयातित साहित्य अध्ययन शैली, सामाजिक सोच और आलोचना दृष्टि ने इस देश के इतिहास, दर्शन, साहित्य और सामाजिक-सांस्कृतिक सोच का किस तरह बंटाधार किया है, इसका ताजा उदाहरण दिल्ली विश्व विद्यालय के बी.ए. (आनर्स) द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम भारतीय संस्कृति विषय की पाठ्य पुस्तक से हटाये गये उस निबंध पर छिड़ा विवाद है, जो रामायण या रामकथा से सम्बद्ध है। इस विवाद ने सबसे बड़ा सवाल तो यह खड़ा किया है कि किसी विश्वविद्यालय में किसी साहित्यिक कृति या ऐतिहासिक-सांस्कृतिक कथानक के पढ़ने-पढ़ाने का उद्देश्य क्या है। &lt;br /&gt;दिल्ली विश्व विद्यालय की विद्वत्परिषद (एकेडमिक कौंसिल) ने विगत 9 अक्टूबर 2011 की अपनी बैठक में प्रख्यात लेखक अट्टिपट्ट कृष्णस्वामी रामानुजन के निबंध ‘थ्री हंड्रेड रामायनाज: फाइव इक्जाम्पल एंड थ्री थाट्स ऑन ट्रांसलेशन‘ को बी.ए. आनर्स के पाठ्यक्रम से बाहर कर देने का निर्णय लिया। इस पर इस विश्वविद्यालय के ही नहीं, प्रायः पूरे देश के वामपंथी शिक्षक, लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार, आलोचक, इतिहासकार तथा संस्कृतिकर्मी आपे से बाहर हो गये। विश्वविद्यालय के निर्णय के खिलाफ आंदोलनों, प्रदर्शनों, गोष्ठियों व लेखबद्ध प्रतिक्रियाओं का सिलसिला अब तक जारी है। इसे देश की उदार बौद्धिक परंपरा, विविधता के प्रति सम्मान तथा चिंतन की स्वतंत्रता पर प्रहार और राजनीतिक दबाव के आगे विद्वत् स्वतंत्रता (एकेडमिक फ्रीडम) का आत्म समर्पण बताया जा रहा है। &lt;br /&gt;डॉ. रामानुजन का यह निबंध 1991 में लिखा गया था, जिसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित पुस्तक ‘मेरी रामायनाज- द डाइवर्सिटी ऑफ ए नरेटिव ट्रेडीशन इन साउथ&amp;nbsp; एशिया‘ में शामिल किया गया। पुस्तक की संपादिका पाड्ला रिचमैन ने जानबूझकर इस निबंध को उपर्युक्त पुस्तक में शामिल किया, क्योंकि वह भारत में वाल्मीकि कृत रामायण ग्रंथ और रामानंद सागर के रामायण सीरियल की असाधारण लोकप्रियता से बहुत चिंतित थीं। उस पुस्तक से ही लेकर इस निबंध को 2006 में दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. (आनर्स) की पाठ्य पुस्तक में शामिल किया गया। यहां यह जानना रोचक होगा कि इस पाठ्य पुस्तक को तैयार करने का काम देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की बेटी प्रो. उपिंदर सिंह ने किया है। &lt;br /&gt;भारतीय संस्कृति के पाठ्यक्रम से इस निबंध को निकलवाने का प्रयास तभी शुरू हो गया था, जब इसकी पढ़ाई शुरू हुई थी। मार्च 2008 की विश्व विद्यालय की विद्वत् परिषद (एकेडमिक कौंसिल) की बैठक में भी राष्ट्रीय संस्कृति की चिंता करने वाले शिक्षक प्रतिनिधियों ने इसे हटाने पर जोर दिया था, लेकिन उस समय परिषद ने भारी विरोध के बावजूद उस निबंध को पाठ्यक्रम से निकालने से इनकार कर दिया था। शिक्षकों ने इस पर न्यायालय की शरण में भी जाने की चेतावनी दी थी। परिषद के बाहर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी इस निबंध को हटाने के लिए आंदोलन चलाया था। संसद में भी यह मसला उठा था, किंतु विश्वविद्यालय उपर्युक्त निबंध को पाठ्यक्रम में बनाए रहने पर अड़ा रहा। न्यायालय से भी कोई उम्मीद नहीं थी, क्योंकि किसी कक्षा में पाठ्यक्रम निर्धारण में विश्वविद्यालय को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है। किंतु संयोगवश सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले को विचारार्थ स्वीकार्य किया और विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह चार विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाए, जो इस प्रश्न पर विचार करे और उसके निष्कर्षों के आधार पर निर्णय लिया जा सके। विश्वविद्यालय ने इतिहास विभाग के चार प्रोफेसरों की एक कमेटी बना दी। इस कमेटी की रिपोर्ट विभाजित थी। दो प्रोफेसर लगभग तटस्थ थे। उन्हें इस निबंध के पाठ्यक्रम में बने रहने पर कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन उनका इसे बनाये रखने का कोई हठ भी नहीं था (दे वेयर नाट कमिटल), यानी विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल उसे हटाना चाहे तो हटा भी सकती है। तीसरे प्रोफेसर ने इसे पाठ्यक्रम में बनाये रखने का जोरदार समर्थन किया और लिखा कि यह केवल दक्षिण पंथियों का हो हल्ला है, जो इसे हटाना चाहते हैं, इसलिए उसे महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन चौथे प्रोफेसर ने इसे पाठ्यक्रम में रखने पर गहरी आपत्ति की और लिखा कि स्नातक स्तर पर इस तरह की सामग्री पढ़ाए जाने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। &lt;br /&gt;यह रिपोर्ट आने के बाद विद्वत् परिषद की 9 अक्टूबर 2011 की बैठक में इस मसले को विचार के लिए स्वीकार किया गया। विश्वविद्यालय की तरफ से उपर्युक्त 4 विशेषज्ञों की रिपोर्ट पेश की गयी। इस बैठक में इस सवाल को इसलिए लिया गया कि अगले दिन विश्वविद्यालय को इस विषय में सुप्रीमकोर्ट को अपनी राय देनी थी। इस बैठक में एक शिक्षक प्रतिनिधि ने नियमों का सवाल उठाया कि यह निबंध 2004 से 2008&amp;nbsp; तक पढ़ाए जाने के लिए था, उसके बाद इसे आगे बढ़ाए जाने का कोई औचित्य नहीं है। उसने यह भी बताया कि स्वयं ‘ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस‘ ने उस पुस्तक की बिक्री रोक दी है, जिसमें से इस निबंध को लिया गया है, ऐसे में उस निबंध को पाठ्यक्रम में शामिल रखना कतई तर्क संगत नहीं है। परिषद में उपस्थित वामपंथी शिक्षकों ने इस निबंध को पाठ्यक्रम से हटाने का जबर्दस्त विरोध किया, किंतु परिषद ने जब इस पर मतदान कराया, तो 120 सदस्यों की परिषद में तो लेख को हटाने के विरुद्ध केवल 9 मत पड़े और ये सब वामपंथी विचारधारा वाले शिक्षकों के थे। परिषद ने इन विरोधों की उपेक्षा करके इस निबंध को हटाने का निर्णय लिया और उसकी सूचना सर्वोच्च न्यायालय को दे दी। इस फैसले के बाद से ही वामपंथी बुद्धिजीवियों में तहलका मचा है। उपर्युक्त निबंध को हटाने के समर्थन में शायद केवल देवेंद्र स्वरूप ने अपनी कलम चलायी है, जो स्वयं दो दशक से अधिक समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे हैं, अन्यथा मीडिया में इस संदर्भ में जितने भी आलेख दिखायी दे रहे हैं, वे सभी वामपंथी विचार वालों के ही हैं, जो इस निबंध को पाठ्यक्रम से हटाने का विरोध कर रहे हैं और इसे लेखकीय स्वतंत्रता तथा वैविध्य की स्वीकार्यता पर हमला बता रहे हैं। &lt;br /&gt;रामानुजन के आलेख का समर्थन करने वाले तथाकथित विद्वान यह भूल जाते हैं कि उनके विरोध का कारण यह नहीं है कि उन्होंने वाल्मीकि रामायण या तुलसीकृत रामायण (रामचरित मानस) से भिन्न अन्य रामकथाओं को सामने लाने का प्रयास किया है, बल्कि विरोध का कारण उनकी नीयत का है। वे वाल्मीकि की रामायण में वर्णित रामकथा को गौण करना चाहते हैं। इसमें उनकी बौद्धिक, लेखकीय व शोधकर्ता की ईमानदारी कम उनका पूर्वाग्रह तथा वाल्मीकि रामायण को नीचा दिखाने का प्रयत्न अधिक है। सबसे पहले तो वह इसी स्थापना पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं कि वाल्मीकि की रामायण ही मूल तथा रामकथा की प्रामाणिक कृति है। भारतीय परंपरा वाल्मीकि को आदि कवि तथा उनकी रचित रामायण को ही रामकथा का मूल मानती है। रामानुजन को यह स्वीकार्य नहीं। वह मानते हैं कि देश तथा विदेश में अन्य बहुत सी रामकथाएं (रामायण) प्रचलित हैं, जिनकी कथा वाल्मीकि की कथा से भिन्न हैं और वे अधिक प्राचीन व प्रामाणिक हो सकती हैं। कई कथाएं हैं, जिसमें राम और सीता को भाई-बहन बताया गया है अथवा किसी में सीमा को रावण की बेटी बताया गया है। संभव है राम की ये कथाएं ही अधिक सही हों। इसके अलावा रामानुजन की दूसरी स्थापना है कि देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं की अन्य रामकथाओं में उस क्षेत्र तथा उस भाषा को बोलने वाले की अपनी निजी जातीय व सांस्कृतिक अस्मिता निहित है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। परोक्षतः उनका आरोप है कि वाल्मीकि रामायण को प्रमुखता देकर अन्य कथाओं को उपेक्षित करने का प्रयास वस्तुतः उस भाषा और संस्कृति वालों की उपेक्षा करने या उनकी संस्कृति को दबाने का प्रयास है। इससे जाहिर है कि रामानुजन चाहे कितने बड़े विद्वान हों, कितनी ही भाषाओं के जानकार हों, किंतु न तो वह भारतीय संस्कृति व उसकी परंपरा को समझते हैं आऋैर न उसके प्रति उनमें कोई निष्ठा व प्रेम है। उनके निबंध को पाठ्यक्रम में शामिल करने वाले समर्थक तथाकथित विद्वानों की भी यही स्थिति है। पाठ्यक्रम से उपर्युक्त निबंध हटाने के निर्णय की घोषणा होते ही वामपंथी गुट के करीब डेढ़ दो सौ छात्रों और शिक्षकों ने एक विरोध जुलूस निकाला और दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों रामजस कॉलेज, किरोड़ीमल कॉलेज, हिन्दू कॉलेज व सेंट स्टिफेन कॉलेज आदि से होते हुए कुलपति डॉ. दिनेश सिंह के कार्यालय पहुंचे। वे इंकलाब जिंदाबाद, कुलपति मुर्दाबाद, दिनेश सिंह होश में आओ, विचारों की आजादी पर हमला बंद करो जैसे नारे लगा रहे थे। कुलपति कार्यालय के समक्ष उन्होंने एक सभा की, जिसे संबोधित करते हुए इतिहास के एक प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय का निर्णय हमारी वैचारिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास है। हम क्या पढ़े, क्या लिखें और क्या सोचें इसे नियंत्रित करने का फरमान है। हमें यह लड़ाई अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लड़नी है। किसी निबंध को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम से केवल इसलिए निकाल देना कि इससे किसी की या कुछ लोगों की धार्मिक भावनाओयं को चोट पहुंचती है, धार्मिक कट्टरवादियों के समक्ष शैक्षिक निष्ठा व उन्मुक्त विचारों की बलि देना है। रामजस कॉलेज के इतिहास विभाग के प्रोफेसर मुकुल मांगलिक का कहना था कि ‘आपको चाहे यह पसंद हो या नहीं, किंतु आप इस तथ्य को तो नहीं बदल सकते कि रामकथा के कई रूप विद्यमान हैं। रामानुजन का निबंध एक श्रेष्ठ तार्किक निबंध है, किंतु हमारे गणित विषय के प्रोफेसर कुलपति ने उसे हटा दिया। उनको गणित विषय का प्रोफेसर बताने के पीछे उनका आशय यह था कि वे साहित्यिक निबंध भला क्या समझें। विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल की बैठक में उपर्युक्त निबंध को हटाने के निर्णय का विरोध करने वाले एक प्रोफेसर संजय शर्मा ने विद्वानों का आह्वान किया है कि वे इस तरह के राजनीतिक दबाव के आगे हार मानकर न बैठ जाएं। इस तरह की राजनीति वस्तुतः पूरी बौद्धिकता को नष्ट करने पर आमादा है। इसी तरह शहीद भगत सिंह कॉलेज के प्रोफेसर शिव दत्त- जो करीब दो दशकों से स्नातक स्तर पर इतिहास पढ़ा रहे हैं- का कहना है कि धर्म (रिलीजन) की राजनीति करने वाले भाजपा के लोग पूरी शिक्षा प्रणाली को क्षीण कर रहे हैं। धार्मिक होना एक बात है, किंतु ये तथाकथित धर्मरक्षक शिक्षा के पूरे उद्देश्य को ही नष्ट कर दे रहे हैं। ये हिन्दूवादी केवल विदेशों में प्रचलित रामकथा के विरोधी नहीं, बल्कि इस देश की तमाम अन्य रामकथाओं के खिलाफ हैं। वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर के अनुवार विश्वविद्यालय का निर्णय राजनीतिक दबाव के आगे शैक्षिक स्वतंत्रता का समर्पण है। &lt;br /&gt;प्रतिक्रियाएं और बहुत सी हैं, लेकिन यहां यह स्वाभाविक सवाल खड़ा हो जाता है कि आखिर ये वामपंथी बुद्धिजीवी पाठ्यक्रम से एक विवादास्पद लेख को निकालने मात्र से इतने बेचैन क्यों हैं। इस लेख को पाठ्यक्रम से बाहर निकालने का आंदोलन चलाने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (भाजपा की युवा शाखा) कोई इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग तो नहीं कर रही है। लाइब्रेरी में जाकर या पाड्ला रिचमैन की किताब खरीदकर कोई भी इस लेख को पढ़ सकता है। लेकिन ये वामपंथी उसे पाठ्यक्रम में रखने की जिद क्यों कर रहे हैं। वे कांग्रेस सरकार व उसकी पार्टी के नेताओं से उनके सेकुलरिज्म का हवाला देते हुए अपील कर रहे हैं कि वे इसे फिर से पाठ्यक्रम में शामिल शामिल कराएं। कांग्रेस पार्टी तथा&amp;nbsp; उसकी युवा व छात्र शाखा के लोग ज्यादातर चुप्पी साधे हुए हैं, क्योंकि वे किसी एक पक्ष के साथ खड़े होना नहीं चाहते, तुलसी या रामानंद सागर के राम यदि विजयी होते हैं, तो यह उनकी पराजय होगी, क्योंकि उनकी पूरी संस्कृति इनके विरोध पर टिकी है। पाड्ला रिचमैन ने भी राम के इस स्वरूप को पराजित करने के लिए ही अपनी पुस्तक प्रकाशित की और उसमें ए.के. रामानुजन का लेख शामिल किया। पाड्ला ने अपनी पुस्तक की भूमिका में साफ लिखा है कि जनवरी 1987 में भारतीय टीवी चैनल पर प्रसारित होने वाली रामानंद सागर की रामायण की लोकप्रियता से इतिहासकार रोमिला थापर और स्वयं वह भी बहुत चिंतित हो गयी थीं। यह चिंता क्योंकि थी? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि इन वामपंथी इतिहासकारों व लेखकों को भारत के प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों से चिढ़ है। वे उसे तोड़कर नष्ट करना चाहती हैं। &lt;br /&gt;आखिर इन विरोधियों से यदि कोई पूछे कि आखिर शिक्षा क्रम में साहित्य और इतिहास के अध्ययन अध्यापन का लक्ष्य क्या है। क्या केवल विविधता व वैचारिक अथवा लेखकीय स्वतंत्रता का सम्मान करना कोई जीवन मूल्य है या किसी जीवन मूल्य की स्थापना के लिए इनकी जरूरत समझी जाती है। साहित्य व इतिहास का रचना व अध्ययन का मूल लक्ष्य होता है मनुष्ृय को बेहतर बनाना, समाज में न्याय की स्थापना करना तथा भेद को मिटाकर अभेद के प्रति प्रेम व निष्ठा कायम करना। &lt;br /&gt;यदि इन आधुनिक वामपंथी साहित्यकारों व इतिहासकारों ने साहित्य और इतिहास पुराण के प्रयोजन की भारतीय परंपरा को पढ़ा समझा होता, तो वे शायद ए.के. रामानुजन के उपर्युक्त लेख को एक दिन भी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में न चलने देते। &lt;br /&gt;अपने देश में वेद, शास्त्र, इतिहास, पुराण तथा काव्य इन सबकी रचना व अध्ययन का लक्ष्य जीवन में चारों पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, की प्राप्ति, प्राणिमात्र के प्रति प्रेम व सद्भाव की स्थापना तथा समदृष्टि का विकास। यहां वेद, पुराण व काव्य रचनाओं तीनों का उद्देश्य एक ही है। शास्त्रों की शासन व्यवस्था केवल राजदंड से सम्यक रूप से संचालित नहीं हो सकती, इसलिए उसकी व्यापक समझदारी विकसित करने के लिए काव्य या साहित्य रचना की गयी। इसीलिए इस देश में वैदिक ऋचाओं, पुराण कथाओं तथा काव्यों के रचयिता एक ही वर्ग के लोग हैं। काव्य शास्त्र के आदि आचार्य भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में काव्य का प्रयोजन स्पष्ट किया है- ‘उत्तमाधम मध्यानां, नराणां कर्म संश्रयं, हितोपदेश जननं धृति क्रीणा सुखादिकृतदुःखर्तानां, श्रमार्तानां, शोकार्तानाम, तपस्विनां विश्रांति जननं काले नाट्यमेत भविष्यतिधर्म्य यशस्यमायुष्यं हितं बुद्धि विवर्धनं लोकोपदेश जननं नाट्यमेतद् भविष्यति ।।‘&lt;br /&gt;काव्य उत्तम, मध्यम तथा निन्म तीनों वर्गों के मनुष्य के लिए हितकारी उपदेश देता है। धैर्य, विनोद और सुख प्रदान करता है। मुसीबतों से घिरे लोगों, श्रमजीवियों, शोक संतप्त हृदयों तथा तपस्वियों तक को काव्य आराम देता है। धर्म-अधर्म यश-अपयश, काम्य-अकाम्य, हित-अहित आदि का विवेक देता है तथा आयु और बुद्धि की वृद्धि आदि के लिए उपयुक्त उपदेश देता है। &lt;br /&gt;काव्यालंकार में वामन ने श्रेष्ठ काव्य के लक्षण के तौर पर कहा है-&lt;br /&gt;धर्मार्थकाम मोक्षेणु वैचक्षूयं कलासु च &lt;br /&gt;प्रीतिं करोति कीर्तियूच साधुकाव्य निषेवणर्म-&lt;br /&gt;सत्काव्य का पठन-पाठन धर्म-अधर्म का विवेक प्रदान करता है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों की पूर्ति करता है तथा प्रेम और कीर्ति का विस्तार करता है। &lt;br /&gt;अब इस कसौटी पर यदि देश भर में या विदेशों में प्रचलित विविध रामायणों का मूल्यांकन किया जाए, तो स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि कौनसी रामकथा समाज और व्यक्ति के लिए उपादेय है, कौनसी नहीं। &lt;br /&gt;यदि तमाम उपलब्ध रामायणों का सम्यक अध्ययन विवेचन किया जाए, तो पता चलेगा कि केवल महर्षि वाल्मीकि व तुलसी का रामकाव्य ही ऐसा है, जिसकी रचना का उद्देश्य सामाजिक है। बल्कि आज की सामाजिक आवश्यकता के लिए तुलसी की रामकथा अधिक उपादेय है, क्योंकि तुलसी के सामने जो समाज था, वह वाल्मीकि कालीन समाज से बहुत अलग था। उन्होंने मनोरंजन के लिए, भक्ति प्रदर्शन के लिए या मोक्ष प्राप्ति के लिए अपना काव्य नहीं लिखा। बाकी प्रायः राम कथाश्रित काव्य या तो भक्तिवश लिखे गये हैं या अपनी रचनाभिव्यक्ति के लिए। उन रचनाकारों ने अपनी कािा को विशिष्टता व मौलिकता प्रदान करने के लिए अपनी कथाओं को अलग रंग दिया है, किंतु उन नई उद्भावनाओं से किसी नये सामाजिक मूल्य या आदर्श की स्थापना नहीं होती, केवल काव्य चमत्कार बढ़ता है। &lt;br /&gt;वाल्मीकि का रामायण शायद सारे परवर्ती राम काव्यों का उपजीव्य है। वर्तमान वाल्मीकि का रामायण शायद सारे परवर्तीराम काव्यों का उपजीव्य है। वर्तमान वाल्मीकि रामायण की रचना के पहले भी कोई राम कथा प्रचलित हो सकती है, लेकिन इससे वाल्मीकि या तुलसी की श्रेष्ठता कम नहीं हो जाती। &lt;br /&gt;वाल्मीकि रामायण के प्रारंभिक अध्यायों /सर्गों/ के वर्णन से ही पता चल जाता है कि यह कोई इतिहास ग्रंथ नहीं है। इसके विविध चरित्रों का स्वरूप कवि कल्पित है। वह इतिहास में प्रसिद्ध किसी ऐसे चरित्र की तलाश में रहते हैं, जो उनके सामाजिक उद्बोधन का काव्य आधार बन सके। इसीलिए वह नारद से पूछते हैं कि उनके काव्य नायक के लिए किसी ऐसे व्यक्ति&amp;nbsp; के बारे में बताएं, जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्य वक्ता, दृढ़ प्रतिज्ञ, सदाचार युक्त, समस्त प्राणियों का हित साधक, विद्वान, समर्थ, सुंदर, मन पर नियंत्रण रखने वाला, क्रोध को जीतने वाला, कांतिमान, किसी की निंदा न करने वाला तथा संग्राम में ऐसा पराक्रमी हो कि देवता भी उससे डरते हैं। ऐसे चरित्र की खोज से ही यह प्रमाणित होता कि वाल्मीकि अपने काव्य के द्वारा समाज में किन गुणों से युक्त तो इतिहास में केवल एक व्यक्ति हुआ है, वह है राम। वह वाल्मीकि को उनके बारे में कुछ जानकारी देते हैं, जिसके आधार पर अपनी कल्पना और बुद्धि कौशल के आधार पर वह अपनी रामकथा लिखते हैं। रामायण के प्रथम कांड के तीसरे सर्ग का पहला ही श्लोक है, जिसमें वाल्मीकि कहते हैं कि नारद&amp;nbsp; के मुख से धर्म, अर्थ एवं काम रूपी फल से युक्त हितकर सारी जानकारी प्राप्त करके फिर हृदय में पूर्ण कथा की अभिकल्पना (साक्षात्कार) करने लगे। &lt;br /&gt;श्रुत्वा वस्तु समग्रं तद्धर्मार्थ सहितं हितंम् &lt;br /&gt;व्यक्तमन्वेषते भूयो यद् वृत्तं तस्य धीमतः &lt;br /&gt;बहुत स्पष्ट है कि राम कथा का सारा वर्णन इतिहास नहीं है। मूल कथा इतिहास प्रसिद्ध थी, लेकिन काव्य में वर्णित विविध घटनाएं, संवाद&amp;nbsp; आदि कवि की कलपना से उद्भूत है, जिसका लक्ष्य है समाज को विवेकशील, धर्मशील तथा सुखी बनाना। अब जो काव्य इस काम को सर्वश्रेष्ठ ढंग से कर रहा हो, उसी को अध्ययन अध्यापन का विषय बनाया जाना चाहिए। रामानुजन 300 रामायणों की बात करते हैं, हो सकता है अब तक यह संख्या और बढ़ गयी हो, लेकिन इनमें कथानक की नवीनता और प्राचीनता का कोई मुद्दा उठाना कतई प्रासंगिक नहीं है, उपादेय भी नहीं। उपादेय हैं केवल वे मूल्य, जो इन काव्यों में स्थापित किये गये हैं। और उस दृष्टि से वाल्मीकि और तुलसी के काव्य निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ हैं। अब इनकी निंदा आलोचना या स्वीकार्यता अस्वीकार्यता की बात इस आधार पर नहीं की जानी चाहिए कि वे किस भाषा, किस क्षेत्र, किस जाति अथवा किस संप्रदाय के थे। रामानुजन को मूल्यों की नहीं, केवल कथानक की चिंता है। वह पूर्वाग्रह व दृष्टि संकीर्णता के कारण देश की मूल्य आधारित एकता की रक्षा के बजाए क्षेत्रीय विभेद व विखंडन को बढ़ाना चाहते हैं। वास्तव में विश्वविद्यालय के कुलपति तथा विद्वत् परिषद को इसके लिए बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने साहसपूर्वक एक सही निर्णय लिया और वामपंथियों के दबाव को ठुकरा दिया।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-4651317543086922977?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/4651317543086922977/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=4651317543086922977' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/4651317543086922977'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/4651317543086922977'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-Ji_SPDkNfKc/TsOEebDCDWI/AAAAAAAAAgg/OdJIcY1hhAI/s72-c/DELHIUNI.JPG' height='72' 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/&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;पाक जिहादियों की नजर में तीन दशक बाद भारत की स्थिति&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;&lt;span style="color: #b45f06;"&gt;भारत और अमेरिका के बढ़ते रिश्तों ने पाकिस्तान एवं चीन को और निकट ला दिया है। अब वे दोनों रणनीतिक साझीदार हैं। चीन और पाकिस्तान कतई स्वाभाविक दोस्त नहीं हो सकते। दोनों में कोई सैद्धांतिक समानता भी नहीं है। जाहिर है उनकी दोस्ती नितांत अवसरवादी तथा भारत और अमेरिका के विरोध पर आधारित है। अमेरिका से इन दोनों की कोई सीधी दुश्मनी नहीं है, लेकिन भारत का विकास इन दोनों को फूटी आंखों नहीं सुहा रहा है। इसलिए ये दोनों ही भारत को कमजोर और विखंडित करने की साजिश रचने में लगे हैं। कश्मीर को दोनों ने ही भारत को दबाने का सबसे बड़ा हथियार बना रखा है। खबर है चीन पाक अधिकृत कश्मीर में अपना एक सैनिक अड्डा कायम करने जा रहा है। यह अपने देश से बाहर किसी दूसरे देश में उसका पहला सैनिक अड्डा होगा।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारतीय उपमहाद्वीप की यह सबसे बड़ी विडंबना है कि इस क्षेत्र के दो बड़े देश भारत और पाकिस्तान कभी एक साथ एक खेमे में नहीं रह सकते। शीत युद्धकाल में भारत ने सोवियत संघ या रूस से दोस्ती बढ़ाई थी, तो पाकिस्तान ने अमेरिका से। अब उस युग की समाप्ति के बाद जब भारत और अमेरिका निकट आ रहे हैं, तो पाकिस्तान, अमेरिका से दूर होता जा रहा है। यद्यपि अभी भी अमेरिका पाकिस्तान को छोड़ना नहीं चाहता, किंतु वह एक साथ दोनों से अपने संबंध अच्छे नहीं रख सकता। यद्यपि पाकिस्तान ने बहुत पहले अपने लिए अमेरिका का विकल्प तलाश लिया था, किंतु जब तक अमेरिका और उसके हित एक थे तथा वह अमेरिका का झंडाबरदार बना रहा, किंतु अमेरिका का झुकाव भारत की ओर बढ़ते ही उसने अपने विकल्प का दामन मजबूती से पकड़ना शुरू कर दिया। इधर अमेरिका और पाकिस्तान के हित भी आपस में टकराने लगे, तो पाकिस्तानी हुक्मरानों के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि अमेरिकी कोप से बचने के लिए वह अपने दूसरे विकल्प और अमेरिका के पक्के प्रतिस्पर्धी चीन की शरणागति प्राप्त करे। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति भी ऐसी है कि चीन बहुत पहले से इस फिराक में था कि पाकिस्तान उसकी झोली में आ जाए या पाकिस्तान में पांव फैलाने का उसे अवसर मिल जाए। वहां अमेरिका का वर्चस्व रहते तो उसके लिए यह संभव नहीं था, लेकिन यदि पाकिस्तानी हुक्मरान स्वयं अमेरिका के खिलाफ उसे अपने यहां आमंत्रित करने को तैयार हो तो फिर उसके लिए क्या पूछना। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान के लिए चीन के साथ गठजोड़ सर्वाधिक सुखद है, क्योंकि चीन केवल अमेरिका का ही नहीं भारत का भी जबर्दस्त प्रतिद्वंद्वी है। वैसे अमेरिका के साथ तो उसकी केवल सम्मान की लड़ाई है, लेकिन भारत के साथ तो उसका रोज का रगड़ा है। अमेरिका इस समय दुनिया की सबसे बड़ी सामरिक व आर्थिक शक्ति है, इसलिए चीन की महत्वाकांक्षा उसे पछाड़कर स्वयं विश्व की प्रथम महाशक्ति बनना है। चीन की इस महत्वाकांक्षा में सबसे बड़ा बाधक भारत है। मान लें एशिया में भारत न होता, तो आज पूरा एशिया व अफ्रीका अकेले चीन के प्रभाव में होता और इस प्रभव क्षेत्र के बल पर वह अमेरिका को सीधे चुनौती दे सकता था। चीन का सीधे मुकाबला करने की शक्ति भारत के अलावा अन्य किसी देश में नहीं है। जनसंख्या की दृष्टि से केवल भारत चीन का मुकाबला कर सकता है। चीन जनसंख्या जहां बुढ़ापे की ओर अग्रसर है, वहां भारतीय जनसंख्या जवानी की ओर है। भारत की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी की आयु 35 वर्ष से कम है। भारत की यह जवानी 2050 तक बनी रहने वाली है। भारत में बुढ़ापे का दौर उसके बाद आएगा। चीन इस समय सामरिक क्षमता व आर्थिक विकास में भले ही भारत से आगे हो, किंतु भारत में इस समय आर्थिक विकास की क्षमता चीन के मुकाबले कहीं अधिक है। इसीलिए कहा जा रहा है कि 2013 के बाद भारतीय आर्थिक विकास की दर चीन की विकास दर को पीछे छोड़ देगी। एकदलीय तानाशाही के शासन में जकड़ा चीन अपनी क्षमता के शिखर पर है। उसके बाद ढलान का दौर आना ही है। इसलिए चीन हर तरह से भारत के विकास को, उसकी आर्थिक व सामरिक क्षमता को रोकना चाहता है, जिससे चीनी वर्चस्व लंबे समय तक बना रह सके। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान का ही सपना भारत की विकास यात्रा को रोकना और संभव हो तो उसे विखंडन के दौर में पहुंचा देना है। भारत यदि अपनी एकता बनाए रखता है, तो उसके विकास रथ को रोक पाना लगभग असंभव है। इसलिए पाकिस्तान दशकों से इस रणनीति पर काम कर रहा है कि कैसे भारत को तोड़ने का उपाय किया जाए। उसके पास इसका एक ही उपाय है- सांप्रदायिक अलगाववाद को तेज करना। इसीलिए उसने कश्मीर पर अपनी पूरी शक्ति लगा रखी है। चीन और पाकिस्तान दोनों का लक्ष्य है भारत को घेर कर उसे कमजोर करना और इस प्रकार न केवल एशिया पर अपना पूर्ण प्रभुत्व कायम करना, बल्कि अमेरिका को भी उत्तरी अमेरिका से बाहर केवल पश्चिमी यूरोप तक सीमित करना। चीन और पाकिस्तान दोनों बहुत दूर की कौड़ी पर नजर गड़ाएं हैं। दोनों इस ख्याल में हैं कि मुस्लिम जगत तथा एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देश यदि एक सूत्र में बंध जाएं, तो अमेरिका और उसके साथी यूरोपीय देशें को दुनिया की चौधराहट की गद्दी से नीचे उतारा जा सकता है। चीन अभी इस प्रलोभन में बहुत गहरे फंसा हुआ है। यह तय है कि यदि कभी ऐसी स्थिति कायम भी हो गयी, तो उसके बाद पहला संघर्ष स्वयं चीन और इस्लामी विश्व के बीच खड़ा होगा। क्योंकि चीन और पाकिस्तान अथवा चीन व इस्लामी विश्व के बीच कोई स्वाभाविक या सैद्धांतिक मैत्री नहीं है। दोनों के संबंध केवल स्वार्थ के अवसरवादी संबंध हैं, इसलिए अवसर निकलते ही दोनों के बीच संघर्ष छिड़ना अनिवार्य है। चीन तब निश्चय ही अपने किये पर पश्चाताप करेगा, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी रहेगी और उसे मदद करने वाला कोई शेष नहीं रहेगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अफगानिस्तान के मुद्दे पर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ी तनातनी के कारण चीन को पाकिस्तान में और गहराई तक जगह बनाने का अनायास ही एक स्वर्णिम अवसर मिल गया है। पाकिस्तान स्वयं चीन को अपने क्षेत्र में सैनिक अड्डे कायम करने के लिए आमंत्रित कर रहा है। ताजा खबरों के अनुसार पाकिस्तान ने चीन से अनुरोध किया है कि वह ग्वादर /ब्लूचिस्तान/ में जो बंदरगाह तैयार कर रहा है, उसे एक नौसैनिक अड्डे की तरह विकसित करे। चीन स्वयं इसे नौसैनिक अड्डे के रूप में विकसित करने का इच्छुक है, किंतु इसके पहले वह उत्तरी पाकिस्तान के कबायली इलाके में अपना एक सैन्य शिविर कायम करना चाहता है। चीन की नजर उत्तरी पाकिस्तान के केंद्र शासित क्षेत्रों ‘फाना‘ (फेडरल एडमिनिस्टर्ड नार्दर्न एरिया) पर है। यह इलाका चीन के मुस्लिम बहुल झिनजियांग प्रांत से लगा हुआ है, जहां इस्लाम विद्रोही चीन की नाक में दम किये हुए हैं। पाकिस्तान के एक पत्रकार व लेखक अमीर मीन ने ‘एशिया टाइम्स ऑनलाइन‘ पर लिखा है कि चीन पाकिस्तानी जिहादी संगठनों का झिनजियांग प्रांत से संबंध तोड़ने के लिए इस क्षेत्र में सैनिक अड्डा कायम करना चाहता है। पाक अधिकृत कश्मीर का यह इलाका चीनी कब्जे वाले कश्मीरी इलाके से भी लगा हुआ है। इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व भी अद्वितीय है। यहां से भारत, पाकिस्तान व अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र और पश्चिमी मध्य एशिया पर नजर रखी जा सकती है। अमीर मीर ने लिखा है कि चीनी झिनजियांग प्रांत में इस समय अलकायदा पोषित दो इस्लामी संगठन ‘ईस्ट तुर्कमेनिस्तान इस्लामिक मूवमेंट‘ और ‘तुर्किस्तानी इस्लामी पार्टी‘ तेजी से सक्रिया हैं। इन्हें हथियारों तथा प्रशिक्षण की पूरी सहायता पाकिस्तान से प्राप्त होती है। इस क्षेत्र के उइगर कबीले के लोगों ने - जिन्होंने हजारों वर्ष पहले इस्लाम कुबूल कर लिया था- चीन के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद कर रखा है। चीनी रक्षा मंत्री लियांग गुआंगली के अनुसार इन इस्लामी उइगर विद्रोहियों पर नियंत्रण् के लिए यह आवश्यक है कि उनका पाकिस्तान के जिहादी संगठनों के साथ संपर्क काट दिया जाए। चीन की यों भी उत्तरी पाकिस्तान के गिलगित व बल्टिस्तान क्षेत्र में विशेष रुचि है, क्योंकि ये इस क्षेत्र के सर्वाधिक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थल है। पाकिस्तान की प्राथमिकता ग्वादर को नौसैनिक अड्डे के रूप में विकसित करने की है, जबकि चीन उसके साथ ही उत्तरी पाकिस्तान में अपना सैन्य अड्डा कायम करना चाहता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी एक अमेरिकी रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन भारत को सबक सिखाने या उस पर अपनी सैनिक क्षमता का दबदबा कायम करने के लिए कारगिल की तरह का घुसपैठ कर सकता है। ‘भारत-चीन संघर्ष के बारे में विचार‘ शीर्षक इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि चीन और भारत के बीच जैसी तनातनी चल रही है, उसमें कारगिल जैसे सीमित युद्ध की प्रबल संभावना है। यह संघर्ष पूरी सीमा के किस इलाके में हो सकता है, इसके बारे में उपर्युक्त रिपोर्ट में कोई संकेत नहीं है, किंतु अनुमान है कि यह अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में अथवा पश्चिमोत्तर क्षेत्र में लद्दाख या कश्मीरी नियंत्रण् रेखा के निकट किसी क्षेत्र में हो सकता है। चीन लगातार भारत से लगी अपनी दक्षिणी सीमा पर अपना दबाव बनाए हुए है। आए दिन सीमा क्षेत्र में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबरें आती रहती हैं। स्वयं भारतीय सेनाध्यक्ष ने यह चेतावनी दी है कि सीमा के बहुत अधिक निकट के क्षेत्र में चीनी सैनिकों का जमाव बढ़ रहा है। चीन ने भारतीय सीमा के निकट परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम मिसाइलों की श्रृंखला भी स्थापित कर रखी है। सीमा के बारे में उसका रवैया अभी भी संदेहास्पद बना हुआ है। अभी इसी बीते हफ्ते दिल्ली के एक समारोह में चीनी राजदूत ने एक भारतीय पत्रकार को ‘शट अप‘ कहकर झिड़क दिया, जिसने वहां वितरित पर्चे (ब्रोशर) पर अंकित भारत के नक्शे पर आपत्ति व्यक्त की थी। इस नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश तथा लद्दाख क्षेत्र को चीनी सीमा में दिखाया गया था। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पिछले दिनों भारत-पाकिस्तान के बीच केवल एक सकारात्मक खबर मिली कि पाकिस्तान सरकार ने भी भारत को व्यापारिक क्षेत्र में सर्वाधिक वरीयता प्राप्त (मोस्टर फेवर्ड कंट्री) देश का दर्जा दे दिया। भारतीय मीडिया ने इसे मोटी सुर्खियों में छापा मानो पाकिस्तान ने भारत के प्रति उदारता की सारी सीमाएं तोड़ दी हों, जबकि इसमें ऐसा कुछ नहीं है, जो भारत के लिए विशेष हो। पाकिस्तान ने अब तक सैकड़ों देशों को सर्वोच्च वरीयता प्राप्त देश (मोस्ट फेवर्ड कंट्री) का दर्जा दे रखा है। बल्कि सच कहा जाए तो भारत के प्रति शत्रुता के कारण ही वह अब तक उसे यह दर्जा देने से कतराता रहा, जबकि भारत पाकिस्तान को एक दशक से भी पहले यह दर्जा दे चुका है। इतनी विलंबित कार्रवाई के बावजूद पाकिस्तान में इसका विरोध शुरू हो गया है और कहा जा रहा है कि अमेरिका के दबाव में आकर ही भारत को इस तरह सर्वोच्च तरजीही राष्ट्र का दर्जा दिया जा रहा है। एक अमेरिकी दैनिक में भारतीय विदेश विभाग के एक अधिकारी के हवाले से जब यह खबर छपी कि पाकिस्तान भारत को दिये गये दर्जे से अब पीछे हट रहा है, तो पकिस्तानी विदेश विभाग की प्रवक्ता तहमीना जोजुआ ने इसका त्वरित खंडन अवश्य किया, लेकिन पक्के तौर पर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि यह दर्जा बरकरार रहेगा। पाकिस्तान के दो वरिष्ठ मंत्रियों गृहमंत्री रहमान मलिक तथा रक्षा मंत्री चौधरी अहमद मुख्तार ने भारत को वरीयता प्राप्त देश का दर्जा दिये जाने का यद्यपि स्वागत किया है और कहा है कि भारत के साथ व्यापार में भेदभाव को खत्म करने के लिए यह आवश्यक था, फिर भी उनका कहना है कि पाकिस्तानी संसद (नेशनल असेंबली) यदि चाहेगी, तो वह इसे वापस भी ले सकती है। पाकिस्तानी व्यवसायियों ने आम तौर पर इसका स्वागत किया है, किंतु राजनीतिक विपक्षी दलों ने तीव्र विरोध किया है। जमाते इस्लामी ने तो इसके खिलाफ आंदोलन चलाने तक की धमकी दी है। जिन पाकिस्तानी नेताओं ने व्यापारिक संबंधों को और विकसित करने के इस निर्णय का स्वागत किया है, उन्होंने भी साथ में यह टिप्पणी जोड़ना जरूरी समझा है कि इसका यह अर्थ नहीं है कि पाकिस्तान के कश्मीर संबंधी रुख में कोई बदलाव आया है या भारत के प्रति उसकी नीति बदल गयी है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कश्मीर एक ऐसा मुद्दा है, जिसे हर भारत विरोधी शक्ति अपने पहले हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है। इसलिए चीन भी कश्मीर के सवाल पर पूरी तरह पाकिस्तान के साथ है और उसके बहाने भारत को दबाव में रखना चाहता है। चीन पाकिस्तान गठजोड़ केवल पाक को अमेरिकी दबाव से बाहर निकालने के लिए ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत और अमेरिकी सम्मिलित प्रभाव का मुकाबला करना तथा एशिया में भारत के विकास की गति पर अंकुश लगाना। अंतर्राष्ट्रीय सामरिक रणनीति में अमेरिकी समकक्षता प्राप्त करने के लिए ही चीन ने महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के सभी रणनीतिक महत्व के बिंदुओं (क पॉइंट्स) पर अपनी उपस्थिति कायम करने की योजना बनायी है, जैसे स्ट्रेट ऑफ मंडाल, स्ट्रेट ऑफ मलक्का, स्ट्रेट ऑफ हरमुज तथा स्ट्रेट ऑफ लोम्बोक पर वह अपने और नौसैनिक पोत तैनात कर रहा है। मतबल हांगकांग से लेकर ‘पोर्ट ऑफ सूडान‘ तक वह अपनी इस तरह की सैन्य श्रृंखला बना रहा है। हिन्द महासागर में भारत को घेरने के लिए वह पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार (बर्मा), श्रीलंका, केन्या तथा सोमालिया में अपने अड्डे कायम कर रहा है। पाकिस्तान में बलूचिस्तान के क्षेत्र में चीन पूरी तरह अपने खर्चे पर ग्वादर बंदरगाह का विकास कर रहा है। उसी तरह बंगलादेश में चिटगांव, म्यांमार में सित्तवे, केन्या में लामू तथा श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह का विकास कर रहा है। पूरी तरह चीनी पैसे तथा नौसैनिक अड्डे ही बनेंगे। केन्या और सोमालिया हिन्द महासागर क्षेत्र में पूर्वी अफ्रीकी देश हैं। हिन्द महासागर में चीनी प्रभव बढ़ाने में इन अड्डों का खासा योगदान है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;चीन और पाकिस्तान की भारत के बारे में बहुत स्पष्ट समझदारी है। चीन का काम है भारत को सैनिक दृष्टि से घेरना और उसके बढ़ते रणनीतिक प्रभाव पर काबू रखना और पाकिस्तान का काम है भारत को भीतर से तोड़ने में सक्षम शक्तियों की मदद करना। कश्मीरियों के साथ पश्चिम में वह कुछ सिखों को भी भड़काने में लगा है और उन्हें स्वतंत्र खालिस्तान का सपना दिखा रहा है। पाकिस्तान उत्तर पूर्व भारत के उग्रवादी संगठनों तथा माओवादी उग्रवादियों से भी संपर्क बनाए हुए हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई.एस.आई. ऐसे सभी संगठनों से संपर्क बनाये हुए है, जो भारत विरोधी गतिविधियों में लगे हैं या उसे तोड़ने अथवा कमजोर करने का काम कर रहे हैं। पाकिस्तान के जिहादी रणनीतिकारों के अनुसार अगले दो से चार दशकों के बीच इंडिया केवल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा व महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह जायेगा। उत्तर के मुस्लिम बहुल पूरे इलाके पाकिस्तान का अंग बन जायेंगे। तमिल अलग राज्य बन जायेगा। मराठे अपने राज्य बना लेंगे। हिन्दू बहुल राजस्थान गुजरात के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक हिन्दू राज्य बना रह सकता है। इन लोगों ने इस तरह के विखंडित भारत का एक नक्शा भी जारी कर रखा है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ज्यादातर भारतीयों को यह सब अभी भले ही असंभव लगे, लेकिन विखंडनकारी शक्तियां जिस तेजी से सक्रिय हैं और राष्ट्रवादी शक्तियां जिस तरह की उदासीनता की शिकार हैं, उसमें ऐसा कुछ भी संभव हो सकता है। चीन की योजनाओं के खिलाफ देर से ही सही, भारत सरकार में कुछ चेतना आयी है। उसने चीन से लगी सीमा की निगरानी के लिए अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए एक लाख जवानों की नई भर्ती का निर्णय लिया है। उत्तरी सीमा पर क्रूज मिसाइलों की तैनाती का अभियान शुरू किया है। नौसेना तथा वायुसेना के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देने का फैसला किया है। लेकिन ये सब बाहरी रक्षा के उपकरण है। देश का सर्वाधिक खतरा भीतरी विखंडनकारी शक्तियों से है, लेकिन उन पर नियंत्रण की कोई योजना फिलहाल सरकार के पास नहीं है। संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति देश को सांप्रदायिक, जातीय तथा क्षेत्रवादी भावनाओं को भड़काकर अपना नितांत संकीर्ण स्वार्थ सिद्ध करने में लगी है। खतरा चीन और पाकिस्तान से तो है ही, लेकिन हमारा भीतरी खतरा उससे भी अधिक गंभीर है। क्या देश के राजनेता व प्रबुद्धजन इधर कुछ ध्यान देंगे ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-5748743193303614447?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/5748743193303614447/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=5748743193303614447' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/5748743193303614447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/5748743193303614447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2011/11/65-35-2050-2013.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-gufeRqjyMPE/TrZUD5YvRPI/AAAAAAAAAgY/UZIqDmiipVE/s72-c/INDIAPAK.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4357481173344464761.post-6665887785248953135</id><published>2011-11-02T11:18:00.000+05:30</published><updated>2011-11-02T11:18:09.646+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;रियायतें देकर कश्मीर समस्या हल नहीं की जा सकती&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-SuvlitcVUHc/TrDYdhd_kQI/AAAAAAAAAgQ/rZnS41INvMk/s1600/INDIAKAS.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266px" ida="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-SuvlitcVUHc/TrDYdhd_kQI/AAAAAAAAAgQ/rZnS41INvMk/s400/INDIAKAS.JPG" width="400px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: xx-small;"&gt;श्रीनगर में आम हड़ताल: 27 अक्टूबर को हर वर्ष कश्मीर में काला दिवस मनाया जाता है, &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: xx-small;"&gt;क्योंकि इसी दिन 1947 में भारतीय सेना वहां उतरी थी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: purple;"&gt;जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एकतरफा तौर पर घोषणा कर दी है कि राज्य के कुछ इलाकों में सेना को दिया गया कानूनी विशेषाधिकार /ए.एफ.एस.पी.ए./ समाप्त कर दिया जाएगा। सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह ने इसका विरोध किया है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह स्वयं भी कश्मीरियों के लिए कुछ रियायतें तथा सहायता पैकेज घोषित करने वाले हैं। उसके साथ शायद वे यह पुरस्कार भी देना चाहें कि घाटी के कुछ इलाकों मेें सेना को निष्क्रिय कर दिया जाए। लेकिन सवाल है क्या ऐसा किया जाना देश हित में है ? क्या रियायतें दे देकर कश्मीर या पाकिस्तान को संतुष्ट किया जा सकता है? क्या कश्मीर जैसे मामले में केवल भावनात्मक आधार पर या मात्र राजनीतिक लाभ के लिए निर्णय लिया जाना चाहिए?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कश्मीर समस्या पाकिस्तान समस्या से अलग नहीं है। इसलिए पाकिस्तान की समस्या का समाधान हुए बिना कश्मीर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। पाकिस्तान के हुक्मरां कहते हैं कि उनके साथ भारत की समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि कश्मीर समस्या का समाधान नहीं हो जाता, जबकि सच्चाई यह है कि कश्मीर की अपनी कोई समस्या है ही नहीं, वह केवल पाकिस्तान समस्या का विस्तार है, जिसे पाकिस्तानी हुक्मरान भारत के विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। भारत सरकार तथा यहां के राजनेताओं को समझना चाहिए कि पाकिस्तान समस्या का समाधान हुए बिना कश्मीर में कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती। वास्तव में यदि कश्मीर में शांति स्थापित हो जाए, तो पाकिस्तान के अपने अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि उस स्थिति में पाकिस्तान की विशाल व शक्तिशाली सेना अप्रासंगिक हो जाएगी, उसका पूरे देश पर छाया दबदबा समाप्त हो जाएगा और तमाम आतंकवादियों की फौज बेरोजगार हो जाएगी। इसलिए इतना तय है कि भारत कितना भी चाह ले, पाकिस्तान कश्मीर में शांति स्थापित होने नहीं देगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तो जाहिर है कि यदि कश्मीर में शांति स्थापित करनी है, तो भारत को पाकिस्तान की तरफ ध्यान देना होगा और पहले उसकी समस्या से निपटना होगा। अब यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पाकिस्तान के साथ कश्मीर के अलावा और समस्या है ही क्या ? हमारे यानी भारत के राजनेता इस सवाल को कभी गंभीरता से लेने को तैयार नहीं होते। या तो वे इसे समझते नहीं या फिर समझते हुए भी वे इसे नजरंदाज करने की कोशिश करते हैं। दुनिया के तमाम देश भारत-पाक समस्या को दो पड़ोसी देशों की समस्या समझते हैं और मानते हैं कि किसी अन्य दो पड़ोसी देशों की तरह वे भी अपनी समस्या का समाधान कर सकते हैं। मिल बैठकर आपसी बातचीत से या कुछ ले-देकर वे आपसी तनाव दूर कर सकते हैं और एक अच्छे पड़ोसी की तरह रह सकते हैं। किंतु वे नहीं समझते कि भारत-पाक के मामले में यह अवधारणा सही नहीं है। भारत-पाक समस्या न तो दो राष्ट्रों की समस्या है और न दो पड़ोसियों की। वास्तव में यह इस क्षेत्र के कट्टरपंथी इस्लामी समुदाय के मजहबी अहंकार, अन्य मजहबों के प्रति द्वेष तथा पूरे देक्षिण एशिया पर अपना आधिपत्य कायम करने की मनोभावना की समस्या है। दूसरे शब्दों में यह इस्लामी शरीयत के शासन बनाम आधुनिक लोकतंत्र की समस्या है। इसलिए लड़ाई किसी देश से नहीं, बल्कि एक खास विचारधारा के साथ है। पाकिस्तान के साथ भारत की यही मूल समस्या है और इस समस्या का समाधान जब तक नहीं होता, तब तक न भारत-पाक समस्या का समाधान हो सकता है और न कश्मीर समस्या का। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कट्टरपंथी इस्लामी समुदाय का दावा इस पूरे दक्षिण एशिया पर अपने आधिपत्य का है। उनकी कल्पना थी कि अंग्रेजों के यहां से जाने के बाद इस पूरे क्षेत्र पर फिर से उनका राजनीतिक अधिकार होगा। लेकिन यह लक्ष्य पूरा न होता देखकर उन्होंने अपने लिए एक टुकड़ा लेकर समझौता कर लिया। यह समझौता कोई बंटवारा करके सुख से रहने का फैसला नहीं था, बल्कि यह एक रणनीतिक फैसला था। जितना अभी संभव है, उतना ले लो, बाकी के बारे में आगे निपट लिया जाएगा। वस्तुतः पाकिस्तान के कट्टरपंथी, इस्लामी राजनेताओं के लिए यह असहृय है कि उनके बगल में कोई गैर इस्लामी देश उनसे अधिक शक्तिशाली नजर आए। इसलिए उनकी हमेशा यह कोशिश रही है कि उनकी ताकत कतई भारत से कम न रहे उससे आगे नहीं तो उसके बराबर जरूर रहे। उनका भविष्य का एकमात्र सपना जैसे भी हो, भारत को तोड़ना फिर उस पर आधिपत्य जमाना मात्र है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान की विदेश नीति एकमात्र भारत केंद्रित है। अन्य देशें के साथ उसके संबंध भी उसकी भारत नीति से ही नियंत्रित होते हैं। दुनिया में जो भी भारत का विरोधी हो, वह उसका मित्र है। उसकी विदेश् नीति का एक ही सूत्र है, अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाना और भारत को कमजोर करना। अमेरिका के साथ उसके संबंध इसी नीति पर आधारित थे और आज चीन के साथ उसके संबंधें का विस्तार भी इसी नीति पर आधारित है। अमेरिका के साथ् उसके संबंध इसी नीति पर आधारित थे और आज चीन के साथ उसके संबंधों का विस्तार भी इसी नीति पर आधारित है। अमेरिका के साथ भारत के संबंध जैसे-जैसे सुधरने लगे, वैसे-वैसे पाक-अमेरिका संबंध में खटास आनी शुरू हो गयी। 1950 के दशक के प्रारंभ में ही पाकिस्तान ने स्वयं पहुंचकर अमेरिका के समक्ष सोवियत संघ के खिलाफ सहयोग करने का प्रस्ताव रखा, किंतु पाकिस्तान का लक्ष्य हमेशा भारत ही था। सोवियत संघ के कल्पित खतरे दिखाकर उसने अमेरिका से अधिक से अधिक सैनिक संसाधन एकत्र किये। अपने समय के आधुनिकतम लड़ाकू जहाज, टैंक, राडार तथा अन्य साजो सामान उसने अंतर्राष्ट्रीय सामरिक व्यूह रचना में अमेरिका की मदद के लिए एकत्र किया, किंतु उसका इस्तेमाल उसने 1965 में सीधे भारत के विरुद्ध किया। पाकिस्तान ने अपना परमाणु कार्यक्रम व मिसाइल कार्यक्रम भी भारत की सामरिक बराबरी के लिए ही चलाया, बल्कि आज यह समझा जाता है कि परमाणु अस्त्रों तथा मिसाइल प्रणाली में वह भारत से कहीं आगे है, जिस पर वह काफी गर्व का भी अनुभव करता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वास्तव में यदि पारंपरिक ढंग से भारत के मुकाबले पाकिस्तान की सामरिक शक्ति की तुलना की जाए, तो वह कहीं नहीं ठहरती। भारत पाकिस्तान के मुकाबले कहीं बड़ा देश है। उसकी सेना भी पाकिस्तानी सेना के दो गुने से अधिक है। और सबसे बड़ी बात यह कि आर्थिक शक्ति में भारत के मुकाबले पाकिस्तान की कहीं तुलना ही नहीं है। पाकिस्तान को इसका बोध न हो, ऐसा नहीं है, इसलिए उसने भारत पर अपनी श्रेष्ठता कायम करने के लिए भिन्न आधारों का चयन किया। भारत के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध में लगातार मुंह की खने के बाद उसने परोक्ष युद्ध के लिए आतंकवादी संगठनों का सहारा लिया। अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के खिलाफ जिहादी तालिबान फौजों के प्रयोग से उसे भारत के खिलाफ जिहादी संगठनों को खड़ा करने की प्रेरणा मिली। इसलिए ज्यादातर भारत विरोधी जिहादी संगठन 1990 के बाद गठित हुए। इसलिए अब भरत के विरुद्ध अपनी सामरिक श्रेष्ठता के लिए उसने आधार बना रखा है। एक तो प्रचुर परमाणु अस्त्र भंडार और उसे चलाने के लिए विविध स्तर की विश्वसनीय मिसाइल प्रणाली, दूसरे आतंकवादी जिहादी संगठन और तीसरे अफगानिस्तान को अपने साथ जोड़ना। अफगानिस्तान पर आधिपत्य उसकी भरत विरोधी रणनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इन तीन आधारों में से प्रथम दो में तो उसने अपनी श्रेष्ठता कायम कर ली है। चीन और उत्तर कोरिया के सहयोग से परमाणु अस्त्रों तथा उसके ‘डिलीवरी सिस्टम‘ यानी मिसाइलों के मामले में वह भारत से आगे है। जिहादी संगठन तो उसकी अकेली शक्ति है। भारत के पास उसके मुकाबले का कोई हथियार नहीं है। दुनिया के लोग अब तक नहीं समझ पा रहे हैं कि पाकिस्तान के जिहादी या आतंकवादी संगठन पाकिस्तानी सेना के ही विस्तार हैं। अपने सैन्य गुप्तचर संगठन आई.एस.आई. के माध्यम से पाकिस्तान की सरकार ही इनके प्रशिक्षण, हथियारों तथा आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करती है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान इन दिनों अफगानिस्तान में अपनी रणनीतिक विफलता को लेकर चिंतित है, किंतु अब वह चीन का सहयोग लेकर इस विफलता को सफलता में बदने की कोशिशमें लगा है। वैसे भी अफगानिस्तान पाकिस्तान की प्रतिरक्षात्मक आवश्यकता है, उसकी आक्रामक शक्ति तो उसके आतंकवादी संगठनों में है। और भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाने वाला सबसे बड़ा हथियार कश्मीर तो अभी उसके हाथ में है ही। भारतीय क्षेत्र में उसकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि कश्मीर के मामले में उसने स्वयं भरत में अपने समर्थकों की श्रृंखला खड़ी कर ली है। देश के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण जैसे लोग जहां पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराने और वहां से सेना हटाने की बात कर रहे हैं, अरुंधती राय जैसी लेखिका कश्मीर के भारत के विलय की वैधानिकता पर सवाल उठा रही हो, द हिन्दू जैसे समाचार पत्र जहां यह लिख रहे हों कि जम्मू-कश्मीर से ज्यादा हिंसा और अपराध तो दिल्ली राज्य में हो रहे हैं, फिर वहां सेना रखने या सेना को विशेष कानूनी अधिकार (सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून- ए.एफ.एस.पी.ए.) देने की क्या जरूरत है, वहां पाकिस्तान को और अधिक क्या करने की आवश्यकता है। जहां राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करने की आम प्रवृत्ति हो, वहां किसी भी शत्रु का काम करना आसान हो जाता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गत सप्ताह कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एकरतफा तौर पर घोषणा कर दी कि जम्मू-कश्मीर के कुछ जिलों से सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून (ए.एफ.एस.पी.ए.) हटा लिया जाएगा। मुख्यमंत्री होने के नाते उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ गठित संयुक्त कमान के अध्यक्ष हैं। किंतु उनको इसका अधिकार कैसे मिल गया कि वह एकतरफा तौर पर इस कानून को हटाने की घोषणा कर दें। इस कानून को लागू करने या हटाने का अधिकार केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को है। राज्य में उमर अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस की कांग्रेस के साथ साझा सरकार है। उन्होंने इसके लिए अपनी सहयोगी पार्टी के अध्यक्ष सैफुद्दीन सोज ने साफ कहा है कि उमर ने इस बारे में कांग्रेस से राय नहीं ली। उन्होंने प्रतिरक्षा मंत्रालय से भी कोई सलाह-मशविरा नहीं किया और न जम्मू-कश्मीर में कार्यरत सुरक्षा बलों की ‘यूनीफाइड कमान‘ से ही कोई चर्चा की। उमर का कहना है कि इसकी चर्चा राज्य कैबिनेट की बैठक में हुई थी, जिसमें उपमुख्यमंत्री भी उपस्थित थे, जो कांग्रेस के सदस्य हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जाहिर है उमर ने यह एकतरफा घोषणा करके कांग्रेस को उलझााने तथा घाटी में अपना राजनीतिक लाभ उठाने के लिए ही है। इसे राज्य में वह अपनी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में गिना सकते हैं और इसके द्वारा वह महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पी.डी.पी.) की जमीन कमजोर करने का भी काम कर सकते हैं, क्योंकि पी.डी.पी. लगातार कश्मीर से सेना को हटाने और नहीं तो कम से कम उसे दिये गये विशेषाधिकारों को समाप्त करने की मांग कर रही थी। भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर से सेना को हटाने या उसे दिये गये कानूनी अधिकारों को हटाने का विरोध किया है। सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह ने अपने एक सार्वजनिक वक्तव्य में कहा है कि विशेषाधिकार कानून हटाने या न हटाने का प्रश्न केंद्रीय गृह मंत्रालय के विचाराधीन है। उस संबंध में उसे ही निर्णय लेना है। इस संदर्भ में भारतीय सेना के विचार उसे बता दिये गये हैं। ऐसी खबर है कि गत गुरुवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निवास पर मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति की बैठक हुई, जिसमें ए.एम.एस.पी.ए. के बारे में चर्चा हुई। करीब 90 मिनट चली इस चर्चा में प्रतिरक्षा मंत्री ए.के एंटनी, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी तथा गृह मंत्री पी. चिदंबरम शामिल हुए। विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा राष्ट्रमंडल देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने आस्ट्रेलिया गये हुए थे, इसलिए वह शामिल नहीं हो सके। लंबी चर्चा के बाद भी इस बैठक में कोई निर्ण नहीं लिया जा सका। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यहां आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वहां सेना को ऐसे कौनसे कानूनी अधिकार दे दिये गये हैं, जिसे लेकर इतना हंगामा खड़ा है। वस्तुतः सेना बाह्य शत्रुओं से रक्षा के लिए गठित संगठन है। आंतरिक असुरक्षा की स्थिति में काम करने के लिए उसके पास ऐसे कोई कानूनी अधिकार नहीं हैं, जिस तरह केंद्रीय सुरक्षा बलों (सी.आर.पी.एफ.) या अन्य अर्धसैनिक बलों के पास हैं। इसलिए सेना को अपनी कार्रवाई में कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए यह कानून बनाया गया। इस कानून के अंतर्गत सेना को किसी की भी गिरफ्तारी करने, तलाशी लेने, हिरासत में लेकर पूछताछ करने और प्रतिरोध की स्थिति में प्रतिरोधक को ध्वस्त करने का अधिकार है। रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद के अनुसार सेना को इस कानून के अंतर्गत मिली शक्तियां राज्य पुलिस को मिली शक्तियों से भी कम हैं। उनका कहना है कि हमें समझना चाहिए कि यदि अपनी सीमा में अशांति से लड़ने के लिए सेना को लगाना है, तो उसे अपनी सुरक्षा के लिए कुछ कानूनी अधिकार तो देने ही होंगे। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि यह कानून पहले कुछ जिलों से हटाया जाएगा, किंतु यह स्थिति तो और घातक होगी। अपराधी अपराध करके आसानी से उन सुरक्षित इलाकों में जा छिपेगा, जहां सेना कोई कार्रवाई नहीं कर सकेगी। सूद के अनुसार इस कानून को आंशिक रूप से हटाना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। लश्कर-ए-तैयबा के जिहादी सीमा पर लगातार घुसपैठ की ताक में बैठे हैं, ऐसे में सेना की मामूली ढील से भी कश्मीर के हालात फिर बिगड़ सकते हैं। उनकी सलाह है कि उमर को घाटी के लोगों को संतुष्ट करने की इतनी ही बेताबी है, तो वह पहले वहां लागू ‘अशांत क्षेत्र कानून (डिस्टर्ब एरिया एक्ट) हटाने की कार्रवाई करें, जिसका उन्हें अधिकार भी है, किंतु देशहित में सबसे अच्छा तो यही है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के इस मामले में राजनीति न करें। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अफसोस की बात यह है कि राज्य की पार्टियां ही नहीं स्वयं कांग्रेस भी यह सोचती है कि कुछ रियायतें देकर कुछ और आर्थिक सहायता देकर कश्मीरी आंदोलनकारियों को शांत किया जा सकता है। स्वयं गृहमंत्री पी. चिदंबरम भी इस विचार के हैं कि कश्मीरी आंदोलनकारियों को शांत करने के लिए अंशतः सेना को हटाने की कार्रवाई की जा सकती है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सोच है कि यदि कश्मीरी युवकों के लिए रोजगार के और अधिक अवसर उपलब्ध कराये जाएं, तो आए दिन सड़कों पर तउरने की उनकी प्रवृत्ति रोकी जा सकती है। कश्मीर समस्या का समाधान तलाशने के लिए उनके द्वारा नियुक्त वार्ताकारों की एक समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी तरह का सुझाव दिया है। वर्तमान केंद्र सरकार व उसके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ही नहीं, उनके पहले की सरकारों का भी यही ख्याल था कि कुछ रियायतें तथा सहायता देकर कश्मीर की समस्या को भी सुलझाया जा सकता है और पाकिस्तान के साथ उत्पन्न तनाव को खत्म किया जा सकता है, किंतु पिछले 5-6 दशकों के अनुभव तो यही बताते हैं कि रियायतें देकर न तो पाकिस्तान समस्या का समाधान हो सकता है, न कश्मीर समस्या का। भारत के विरुद्ध पाकिस्तान या कश्मीर का संघर्ष कुछ रियायतें या सहायता पाने के लिए नहीं है। हां भारत यदि ऐसी रियायतें या सहायता देता है, तो उसे ले लेने में क्या हर्ज है। भारतीय रियायतों का लाभ उठाकर भारत के विरुद्ध लड़ाई लड़ना और आसान ही होगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान को सहायता या रियायतें देकर मनचाही दिशा में मोड़ा नहीं जा सकता। इसका ताजा उदाहरण अमेरिका पाक संबंधों की वर्तमान स्थिति में देखा जा सकता है। पाकिस्तानी सेना ने अमेरिका को साफ बता दिया है कि वह उत्तरी वजीरिस्तान में हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगा। अमेरिका अपनी सैनिक व आर्थिक सहायता देय नहीं, किंतु तालिबान संगठनों के खिलाफ अब तक वह जो कुछ कर चुका है, अब उसके आगे कुछ नहीं करेगा। उस स्थिति में भी जब कि पाकिस्तान की पूरी अर्थव्यवस्था अमेरिकी आर्थिक सहायता पर टिकी है, वह उसे साफ जवाब देने में राई रत्ती संकोच नहीं कर रहा है। जबसे अफगानिस्तान में अमेरिकी हमला शुरू हुआ है, तब से अब तक अमेरिका उसे करीब 22 अरब डॉलर की सहायता दे चुका है, फिर भी पाकिस्तान एक सीमा से आगे झुकने के लिए तैयार नहीं है। जाहिर है वह अपनी शर्तों पर अमेरिका से सहायता लेता रहा है। अमेरिका स्वयं सहायता देकर या रियायतें देकर उसे झुकाने की स्थिति में नहीं है। 2001 में भी तत्कालीन पाक राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ अफगानिस्तान के विरुद्ध युद्ध में अमेरिका का साथ देने के लिए तब तैयार हुए थे, जब राष्ट्रपति बुश ने उन्हें चेतावनी दी थी कि यदि उन्होंने साथ नहीं दिया, तो अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान को भी खंडहर बना दिया जाएगा। जाहिर है कि यदि रियायतों और सहायता से अमेरिका पाकिस्तान को नहीं झुका सकता, तो भारत उसे क्या झुका लेगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान हमेश यह कहता है कि भारत पाकिस्तान के बीच केंद्रीय विवाद का विषय कश्मीर है। भारत पहले कश्मीर समस्या का समाधान करे। उसकी नजर में कश्मीर समस्या का एक ही समाधान है- उसका भारत से अलग होना, जिससे कि वह पाकिस्तान का अंग बन सके। कश्मीरियों की भी यही मांग है। भारत वहां से अपना कब्जा हटाए। उनका तर्क है कश्मीर कश्मीरियों का है, भारत ने सैन्य बल से उस पर जबर्दस्ती कब्जा कर रखा है। कश्मीर से भारतीय सेना को हटाना उनके युद्ध का पहला पड़ाव बन गया है। इसीलिए घाटी में प्रत्येक 27 अक्टूबर को ‘विरोध दिवस‘ मनाया जाता है, क्योंकि इसी 27 अक्टूबर 1947 को पहली बार भारतीय सेना कश्मीर में उतरी थी। अपने देश में कोई भी संगठन उस दिवस को विरोध दिवस के रूप में नहीं मनाता, जब पाकिस्तानी सेना ने काबायलियों की ओट में कश्मीर पर हमला किया थ और भारी मार काट मचाई थी। हम पाकिस्तान से सद्भाव बनाए रखने के लिए उसकी काली करतूतों को उजागर करने का कभी कोई उपक्रम नहीं करते। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमारी सरकारें और हमारी राजनीतिक पार्टियां भी देश-दुनिया को यह बताने की कोशिश नहीं करतीं कि कश्मीर समस्या मजहबी अलगाववाद तथा इस्लामी साम्राज्यवाद की समस्या है। यह किसी अन्याय अत्याचार के विरुद्ध कोई मानवाधिकार रक्षा की लड़ाई नहीं, बल्कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को तोड़ने और आधुनिक उदार मानववाद को ध्वस्त करने की हिंसक साजिश है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कश्मीर हो या कोई भी अन्य क्षेत्र, उसके बारे में नीति निर्धारित करते समय राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे पहले ध्यान रखना चाहिए। कोई रियायत भी दी जाए, तो उसके लिए भी राष्ट्रीय हित को ही कसौटी बनाया जाना चाहिए। केवल अच्छा दिखने के लिए या अपनी अथवा अपनी पार्टी की छवि सुधारने के लिए ऐसी हरकतें नहीं करना चाहिए। भावनाओं के आधार पर कश्मीर जैसे मामले में कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता। फैसले जो भी हो, वे तार्किक व यथार्थपरक होने चाहिए। कश्मीर से सेना हटाने का काम हो सकता है। उसे दिये गये विशेषाधिकार भी वापस लिये जा सकते हैं, लेकिन जब वहां स्थितियां उसके अनुकूल हो जाएं तब। केवल उमर अब्दुल्ला की राजनीतिक छवि चमकाने के लिए या उनके मुकाबले कांग्रेस को अधिक उदार सिद्ध करने के लिए कश्मीर के बारे में कोई निर्ण नहीं लिया जाना चाहिए। सुरक्षा के मामले में सेना की राय हमेश निहित स्वार्थी राजनेताओं की राय से बेहतर होगी, इसलिए उसका सम्मान किया जाना चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-6665887785248953135?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/6665887785248953135/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=6665887785248953135' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/6665887785248953135'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/6665887785248953135'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2011/11/27-1947.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail 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style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="271px" rda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-TJ1RABfBwx4/TqPmj3VTELI/AAAAAAAAAf4/zUlzSm8M_OA/s400/PAKISTA3.JPG" width="400px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: xx-small;"&gt;‘ऐसा नहीं हो सकता कि घ्र के पिछवाड़े पले सांप केवल दूसरों को काटे‘: संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस के दौरान पाक &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: xx-small;"&gt;में सुरक्षित आतंकवादियों पर अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की टिप्पणी&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;अफगानिस्तान की धरती पर अमेरिका व पाकिस्तान के परोक्ष युद्ध का दौर अब समाप्त हो चुका है। युद्धक्षेत्र अब वहां से खिसक कर पाकिस्तान की सीमा में आ गया है। अमेरिका अभी भी परदे के पीछे रहकर इसे निपटाना चाहता है, किन्तु अब वह होने वाला नहीं। इस क्षेत्र में यदि आतंकवाद को मिटाना है और शांति कायम करनी है तो अमेरिका को एकतरफा निर्णय लेना ही पड़ेगा।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब यह तथ्य पूरी दुनिया के सामने प्रकट हो गया है कि अफगानिस्तान में अमेरिका की लड़ाई किसी और से नहीं, बल्कि सीधे पाकिस्तान से है। इसे अमेरिका और पाकिस्तान के लोग बहुत पहले से जानते हैं, लेकिन वे दोनों मिलकर अब तक दुनिया को यह बताते रहे है कि वे अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी आतंकवाद से लड़ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के इतिहास में दोस्ती और दुश्मनी का ऐसा समन्वय अन्यत्र कहीं ढूंढ़ पाना लगभग असंभव है। अब तक यह लड़ाई परोक्ष थी, लेकिन अब वह क्रमशः प्रत्यक्ष रूप लेती जा रही है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;11 सितंबर 2001 की घटना के बाद अफगानिस्तान में जो कुछ शुरू हुआ वह देखने में तो वहां की तालिबान सत्ता के साथ अमेरिका का युद्ध था, जिसमें अमेरिका के साथ पाकिस्तान भी खड़ा नजर आ रहा था। अमेरिका का कहना था कि वह अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी आतंकवाद से विश्व मानवता तथा सभ्यता की रक्षा के लिए यह युद्ध लड़ रहा है। उसने पाकिस्तान को इस युद्ध में अपना साथी बनाया। पाकिस्तान ने बहुत सोची समझी रणनीति के तहत अमेरिका का साथ देना स्वीकार किया और इसकी आर्थिक व सैनिक सहायता के रूप में भारी कीमत वसूली। पाकिस्तान ने इस युद्ध में अमेरिका का साथ देना तो स्वीकार किया, किंतु प्रत्यक्ष लड़ाई में अपने सैनिकों को भेजने से इनकार कर दिया। अफसोस कि अमेरिकी राजनीतिक नेतृत्व अफगान युद्ध शुरू होने के वर्षों बाद तक यह समझ पाने में असमर्थ रहा है कि जिन शक्तियों के खिलाफ अफगानिस्तान में वह मोर्चा खोले हुए है, वे पाकिस्तान द्वारा खड़ी की गयी उसकी ही अपनी शक्तियां हैं और इन्हें तैयार करने में उसने अमेरिकी सहायता का ही इस्तेमाल किया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अपने यहां एक पुरानी कहावत है कि सर्वनाश की स्थिति उत्पन्न होने पर बुद्धिमान व्यक्ति आधा छोड़कर शेष आधा बचाने की कोशिश करता है (सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धम् त्यजति पंडितः)। पाकिस्तान ने यही किया। उसने अपनी मुख्य भूमि तथा सैन्य शक्ति की रक्षा के लिए अफगानिस्तान में तैनात अपनी शक्ति का विनाश होना स्वीकार कर लिया। तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने बड़ी बुद्धिमानी से अमेरिका का साथ देने के बहाने अफगानिस्तान की तालिबान सत्ता के प्रमुख नेताओं को अमेरिकी चंगुल में पड़ने से बचा लिया। वे अफगानिस्तान से भागकर पाकिस्तानी सीमा में आ गये और पाकिस्तान सरकार ने उन्हें पूरा संरक्षण प्रदान किया। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लड़ाई मूलतः यह रही कि सोवियत सेनाओं के अफगानिस्तान से चले जाने तथा नजीबुल्ला की कठपुतली कम्युनिस्ट सरकार के पतन के बाद वहां किसका कब्जा रहे। काबुल पर तालिबान परिषद की सत्ता कायम हो जाने के बाद पाकिस्तान प्रसन्नता के शिखर पर था कि अब वह अपराजेय शक्ति का मालिक हो जाएगा और भारत को अच्छा सबक सिखा सकेगा। उसने तालिबान लड़ाकों की फौज को कश्मीर मोर्चे की तरफ लगाने की योजना भी बना ली थी, लेकिन तभी न्यूयार्क पर हमले की घटना घट गयी। अमेरिका को अफगानिस्तान पर हमले का एक ठोस बहाना मिल गया। वैसे यदि न्यूयार्क पर हमले की घटना न घटी होती, तो भी अमेरिका को अफगानिस्तान में हस्तक्षेप करना पड़ता, लेकिन तब उसका स्वरूप दूसरा होता और इराक की तरह कोई अलग बहाना ढूंढ़ना पड़ता, क्योंकि वह यह तो बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि काबुल में बैठकर कोई अमेरिकी सत्ता को चुनौती दे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अफगानिस्तान पर कब्जे का पाकिस्तान का बहुत पुराना सपना है। पहले उसने सोचा था कि रूसियों के जाने के बाद फिर वहां उसके लिए कोई चुनौती नहीं रह जाएगी, किंतु उसका दुर्भाग्य कि ओसामा बिना लादेन की मूर्खतावश अमेरिका बीच में टपक पड़ा। इसके बाद भी पाकिस्तान ने अपना धैर्य बनाए रखा और अमेरिकी फौजों के अफगानिस्तान से विदा होने की प्रतीक्षा करता रहा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अमेरिका ने काबुल की तालिबान सत्ता को ध्वस्त करने के बाद पाकिस्तान की इच्छा के विरुद्ध हामिद करजई को वहां की सत्ता सौंपी। इसके बाद से ही अफगानिस्तान में अमेरिका के साथ पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध प्रारंभ हो गया। अमेरिका जहां करजई को आगे करके पीछे से अपने युद्ध का संचालन कर रहा थ, वहां पाकिस्तान करजई की सत्ता पलटने वाले तालिबान गुटों को मदद कर रहा था। पहले शायद अमेरिका इस रहस्य को नहीं समझ पाया, लेकिन बाद में अमेरिकी गुप्तचर संस्थाओं ने यह प्रमाण्ति करके दिखा दिया कि अफगानिस्तान में सरकारी सेना तथा अमेरिकी फौजों से लड़ने वाले कबायली गुटों को पाकिस्तान का संरक्षण प्राप्त है। इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण यह है कि अफगानिस्तान में लड़ रहे प्रायः सभी तालिबान गुटों के प्रवक्ताओं के मोबाइल नंबर का नेश्नल कोड पाकिस्तान का है। अमेरिकी गुप्तचर संस्थाओं ने जब सप्रमाण यह सिद्ध कर दिया कि अफगानिस्तान में लड़ रहे विद्रोहियों का संचालन पाकिस्तानी सैन्य गुप्तचर संगठन आई.एस.आई. के द्वारा होता है, तब अमेरिकी नेताओं के कान खड़े हुए और उन्होंने पाकिस्कान पर दबाव डालना शुरू किया कि वह पाकिस्तानी सीमा के सुरक्षित आरामगाह में जमे जिहादियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करे। पाकिस्तानी सेना ने दिखावे के लिए यह कार्रवाई शुरू भी की। अमेरिका ने इसके लिए पाकिस्तान की सहायता राशि तीन गुना बढ़ाने की घोषणा की। वजीरिस्तान के दक्षिणी इलाके में सेना ने व्यापक कार्रवाई की और अमेरिका को दिखाया कि पाकिस्तान कितनी निष्ठा से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के साथ्रा है, लेकिन उसके बाद उसने उत्तरी वजीरिस्तान में कार्रवाई करने से साफ मना कर दिया। वास्तव में दक्षिणी वजीरिस्तान में की गयी कार्रवाई केवल दिखावे के लिए थी। वहां जमे सारे तालिबानी नेता उत्तरी वजीरिस्तान की ओर निकल गये। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अमेरिका ने इसके लिए पाकिस्तान की काफी पीठ ठोकी और उसे उत्तरी वजीरिस्तान की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, मगर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष अशरफ परवेज कयानी साहब एकदम अड़ गये कि अब इसके आगे उनकी सेना कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। बहाना यह बनाया कि उत्तरी वजीरिस्तान में कार्रवाई के लिए उसके पास न तो पर्याप्त सैन्य बल है, न आवश्यक उपकरण। अमेरिका उपकरण तो सारे देने के लिए तैयार थ, किंतु सैन्य प्रबंध तो पाकिस्तान को ही करना था। उसे कहा गया कि वह अपनी पूर्वी सीमा पर अनावश्यक रूप से तैनात सैनिकों को वहां से हटा कर अपने पश्चिमी मोर्चे की तरफ से आए। कयानी ने इससे भी इनकार कर दिया। उनका सा। कहना था कि पूर्वी सीमा पर भारतीय खतरे को देखते हुए वहां से एक भी सैनिक नहीं हटाया जा सकता। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब यहां से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सीधी कश्मकश शुरू हो गयी है। अब अफगानिस्तान में मौजूद तालिबान शक्तियां तो इतनी कमजोर हो गयी हैं कि वे सीधे कोई बड़ी कार्रवाई नहीं कर सकती हैं। उनके नेता भी भागकर अब पाकिस्तान आ गये हैं, इसलिए मोर्चा अफगानिस्तान से खिसककर अब पाकिस्तान सीमा के भीतर आ गया है। अब पाकिस्तानी सीमा के भीतर तो पाकिस्तानी सेना को ही कार्रवाई करनी है, किंतु पाकिस्तानी सेना इससे साफ इनकार कर रही है। सेनाध्यक्ष जनरल कयानी तो साफ कह चुके हैं कि अमेरिका अपनी सहायता दे या न दे, पाकिस्तान सेना उत्तरी वजीरिस्तान में अब आगे और कोई सैनिक कार्रवाई नहीं करेगी। इसके बाद ही अमेरिका की तरफ से यह घोषणा की गयी कि पाकिस्तान साथ दे या न दे, लेकिन अमेरिका अफगानिस्तान में आतंकवादियों के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगा और यदि आवश्यक हुआ, तो पाकिस्तानी सीमा के भीतर घुसकर कार्रवाई करने में भी संकोच नहीं करेगा। वह पाकिस्तान की प्रभुसत्ता का आदर करता है, किंतु वह अमेरिका के दुश्मनों को वहां शरण लेने की इजाजत नहीं दे सकता। इसका प्रमाण उसने पाकिस्तानी सीमा में राजधानी इस्लामाबाद के निकट छिपे ओसामा बिन लादेन को मारकर दे दिया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ऐसी खबरें आ रही हैं कि अफगानिस्तान में स्थित अमेरिकी सैनिक अब पाकिस्तान से लगने वाली सीमा के निकट एकत्र हो रहे हैं। शायद इसी की प्रतिक्रिया में पाक सेनाध्यक्ष जनरल कयानी ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तानी सीमा में एकतरफा सैन्य कार्रवाई शुरू करने के पहले अमेरिका को भी 10 बार सोचना पड़ेगा। पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है। उसे इराक या अफगानिस्तान समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए। जनरल कयानी ने पाकिस्तानी संसद की प्रतिरक्षा मामलों की स्थाई समिति के समक्ष पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति पर रिपोर्ट देते हुए यह टिप्पणी की। इस टिप्पणी के अगले ही दिन गत गुरुवार को अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, नवनियुक्त अमेरिकी संयुक्त सेना के अध्यक्ष मार्टिन इ. डेम्पसे तथा गुप्तचर संस्था सी.आई.ए. के डायरेक्टर डेविड एच. पेट्रौस के साथ इस्लामाबाद पहुंची। इन तीनों की पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के साथ लंबी बातचीत हुई। बातचीत के दौरान पाक विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर, सेनाध्यक्ष जनरल कयानी और आई.एस.आई. के प्रमुख जनरल शुजा पाशा भी मौजूद थे। अमेरिकी मीडिया की खबरों के अनुसार अमेरिका की तरफ से पाकिस्तान को साफ कह दिया गया है कि वह अपनी सीमा में मौजूद जिहादी गुटों के सफाए की कार्रवाई शुरू करे। यदि वह नहीं करेगा, तो अमेरिका स्वयं यह कार्रवाई करेगा। ऐसी भी खबर है कि प्रधानमंत्री गिलानी ने अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह शांति का एक मौका और दे। पाक-अमेरिका संबंध केवल आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई तक सीमित नहीं है, हमें उसके आगे की भी देखना चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अगले दिन हिना रब्बानी के साथ अपनी संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में श्रीमती क्लिंटन का लहजा बहुत कठोर नहीं था, लेकिन संदेश स्पष्ट था कि पाकिस्तानी सेना ने यदि स्वयं कार्रवाई नहीं शुरू की, तो अमेरिका इसे एकतरफा पूरा करने से पीछे नहीं रहेगा। उन्होंने एक बहुचर्चित जुमले का इस्तेमाल किया कि ‘यदि आप अपने पिछवाड़े सांप पालते हैं, तो यह न समझें कि वे केवल पड़ोसियों को या दूसरों को ही काटेंगे।‘ उनका संकेत स्पष्ट ही पाकिस्तानी सीमा में छिपे आतंकवादियों की ओर था और पाकिस्तान को यह चेतावनी भी थी कि यदि उनका सफाया नहीं किया गया, तो वे पाकिस्तान को भी डंस सकते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बात हिलेरी की बहुत सही थी, लेकिन शायद वह अभी भी ठीक-ठीक यह समझ नहीं पा रही हैं कि वे पिछवाड़े के सांप पाकिस्तानी शासकों व सेनाप्रमुखों से कुछ अलग नहीं है। वे उन्हीं से भिन्न रूप हैं । उन सांपों को मारने का मतलब है कि अपने ही हाथ पांव काट डालना। इसलिए अमेरिका कितना ही प्रोत्साहन दे, कितनी भी सहायता दे, पाकिस्तान की सरकार अपने अंगभूत इन जिहादी संगठनों का सफाया नहीं कर सकती। अब यह अमेरिका को तय करना है कि वह हक्कानी नेटवर्क व अन्य तालिबान गुटों का सफाया करने के लिए एकतरफा कार्रवाई करने के लिए तैयार है या नहीं । &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लड़ाई अफगानिस्तान से हटकर अब पाकिस्तान में आ गयी है। अब परोक्ष युद्ध की गुंजाइश नहीं रही। अब सीधा मुकाबला होना तय है। जनरल कयानी का यह कहना सही है कि पाकिस्तान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई शुरू करते समय अमेरिका को भी 10 बार सोचना पड़ेगा। भले ही उसे पाकिस्तान की परमाणु शक्ति का कोई भय न हो, लेकिन वह नहीं चाहेगा कि दुनिया की नजर में पाकिस्तान के साथ उसका सीधा मुकाबला हो। फिर भी यदि आतंकवाद का सफाया करना है और अफगानिसतान को पाकिस्तान के कब्जे में जाने से रोकना है, तो अमेरिका को यह खतरा उठाना ही पड़ेगा। पाकिस्तान के विषदंत तोड़े बिना दक्षिण एशिया के इस क्षेत्र में कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-2394207671008274618?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/2394207671008274618/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=2394207671008274618' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/2394207671008274618'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/2394207671008274618'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2011/10/11-2001.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-TJ1RABfBwx4/TqPmj3VTELI/AAAAAAAAAf4/zUlzSm8M_OA/s72-c/PAKISTA3.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4357481173344464761.post-2162646932833608291</id><published>2011-10-15T17:00:00.000+05:30</published><updated>2011-10-15T17:00:03.605+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #990000; font-size: large;"&gt;भारत-अफगान निकटता से&amp;nbsp;तिलमिलाता पाकिस्तान&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-ad5zMyMxd2k/TpltApnxKyI/AAAAAAAAAfw/mYPV4iRJwQY/s1600/PTI10_4F.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="233px" oda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-ad5zMyMxd2k/TpltApnxKyI/AAAAAAAAAfw/mYPV4iRJwQY/s320/PTI10_4F.JPG" width="320px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;4 अक्टूबर मंगलवार को भारत-अफगानिस्तान के बीच हुआ ऐतिहासिक रणनीतिक समझौता। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;दस्तावेजों का आदान-प्रदान करते भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (दाएं) तथा अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;बीते सप्ताह भारत और अफगानिस्तान के बीच हुए व्यापक रणनीतिक सहयोग समझौते से लगभग पूरा पाकिस्तान तिलमिला उठा है। इस समझौते ने उसका दश्कों पुराना वह सपना तोड़ दिया है कि अफगानिस्तान को मिलाकर वह आकार और शक्ति में भारत को मात देने लायक बन जायेगा। अफगानिस्तान को वह पअने पिछवाड़े की जमीन मानता रहा है, जिसमें भारत की उपस्थिति उसे फूटी आंख् नहीं सुहा रही है। उसे लग रहा है कि काबुल उसके हाथ आते-आते निकल गया है। उसे कूटनीतिक मोर्चे पर अफगानिस्तान में भारत के हाथें मिली यह पराजय 1971 में सैनिक मोर्चे पर बंगलादेश् में मिली पराजय से कम आघात पहुंचाने वाली नहीं प्रतीत हो रही है।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गत मंगलवार 4 अक्टूबर 2011 को भारतीय विदेश नीति के इतिहास में निश्चय ही एक उल्लेखनीय तिथि के रूप में याद किया जाएगा, जब भारत और अफगानिस्तान ने नई दिल्ली में एक-एक व्यापक रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर किये। करीब पांच महीने से अधिक समय की तैयारी के बाद इन समझौतों को अंतिम रूप दिया जा सका, जिन पर अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई की दो दिवसीय भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ हस्ताक्षर की औपचारिकता पूरी हुई। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस समझौते से पाकिस्तान बेहद तिलमिलाया हुआ है। उसके नेता अपनी बौखलाहट छिपा नहीं पा रहे हैं। वे खुले आम इसके विरोध में उतर आये हैं और कह रहे हैं कि इससे किसी को कोई लाभ नहीं होगा और इससे भारत और पाकिस्तान के बीच का संघषर्् और बढ़ेगा। अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई को परोक्ष चेतावनियां दी जा रही हैं कि उन्होंने भारत के साथ यह समझौता करके अच्छा नहीं किया। इससे अफगानिस्तान में शांति स्थापना का कार्य और कठिन हो गया है। पाकिस्तान के केवल सत्ताधारी राजनेता ही नहीं राजनयिक, पत्रकार तथा बुद्धिजीवी वर्ग भी इस पर चिंता व्यक्त कर रहा है। पाकिस्तान के अंग्रेजी दैनिक ‘द नेशनब् ने लिखा है कि ‘समझौता बेहद चिंताजनक है।‘ इससे न तो अफगानिस्तान को फायदा होगा, न पाकिस्तान को। इसी तरह ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून‘ ने लिखा है कि पाकिस्तान के साथ मतभेदों के बीच अफगानिस्तान ने पहली बार भारत के साथ सामरिक समझौता किया है, जो स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के खतरे का संकेत है। एक और अखबार ‘पाकिस्तान टुडे‘ ने लिख है कि यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता में पाकिस्तान की भूमिका को खत्म कर देगा। ‘द नेशन‘ का भी कहना है कि यह समझौता पाकिस्तान के हित में नहीं है। पाकिस्तान की सैन्य विशेषज्ञ आयशा सिद्दीकी ने कहा है कि इससे अफगानिस्तान में भारत और पाकिस्तान की जंग और तेज होगी, दोनों के बीच अप्रत्यक्ष युद्ध (प्रॉक्सी वार) बढ़ेगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यहां यह सवाल उठाया जाना बहुत स्वाभाविक है कि आखिर पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान के बीच हुए समझौते से इतना क्षुब्ध क्यों है ? अफगानिस्तान में हामिद करजई की सरकार के बाद से भारत उसे अब तक 2 अरब डॉलर की सहायता दे चुका है। वह वहां पूरी तरह रचनात्मक भूमिका निभा रहा है। वह वहां व्यापारिक राजमार्गों, स्कूलों व अस्पतालों का निर्माण कर रहा है, औद्योगिक आधारभूत ढांचे तैयार कर रहा है तथा राजधानी काबुल के नवनिर्माण के साथ वहां संसद भवन का निर्माण कर रहा है। पाकिस्तान के लिए वहां यह सब करना संभव नहीं था। न तो उसके पास इसके लिए धन था और न इसके लिए जरूरी तकनीकी जनशक्ति। भारत वहां काबुल सरकार को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत करने में मदद दे रहा है। पिछले कई वर्षों से भारतीय सैन्य अधिकारी वहां अफगान सेना को प्रशिक्षित करने के काम में लगे हैं। कुछ अफगान उच्च सैनिक अधिकारी यहां भारत आकर भी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में यदि अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई भारत के साथ् ऐसा व्यापक समझौता करते हैं, जिसमें आथर््िाक व तकनीकी सहयोग ऐसा व्यापक समझौता करते हैं, जिसमें आर्थिक तकनीकी सहयोग के साथ् सामरिक सहयोग भी शामिल है, तो उससे पाकिस्तान को इतनी जलन क्यों हो रही है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसका उत्तर पाना कुछ बहुत मुश्किल नहीं है। जो लोग पाकिस्तान को जानते हैं, उनके लिए इस समझौते पर उसका बिफरना कोई चकित करने वाला नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान भारत व भारतीयों के प्रति मुस्लिम घृणा, द्वेष, प्रतिस्पर्धा व जलन की उपज है। उसका सपना कैसे भी हो, इसे पराजित करके उस पर अपना प्रभुत्व कायम करना है। बंगलादेश के अलग हो जाने के बाद पाकिस्तान के इन मुस्लिम नेताओं की जलन और बढ़ गयी। पहले अमेरिका व यूरोप की मदद लेकर अपने सैन्य बल से वे इसे कुचलना चाहते थे, लेकिन उनका सपना साकार होता, इसके पहले ही अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां बदल गयीं। सोवियत संघ का पतन हो गया। नई विश्व व्यवस्था सामने आयी। नेय अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरण बनने लगे। अंतर्राष्ट्रीय सामरिक रणनीति में अमेरिका के लिए पाकिस्तान का महत्व कम हो गया। उसने भारत के साथ भी संबंध सुधार के प्रयास शुरू किये। यह देखते हुए पाकिस्तान ने भी अपनी रणनीति बदली। उसने ‘प्रत्यक्ष चयुद्ध‘ की जगह ‘परोक्ष युद्ध‘ को अध्कि महत्व देना शुरू किया। उसने जिहादी संगठनों के रूप में अपनी नियमित सेना का अलग से विस्तार किया। प्रारंभ में ऐसे संगठनों के निर्माण् में अमेरिका ने भी भ्रपूर मदद की, क्योंकि उसे भ्ी अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को भगाना था। ‘तालिबान‘ का गठन मूलतः सोवियत सैनिकों को अफगानिस्तान से भ्गाने के लिए ही किया गया था। इन्हें पाकिस्तानी सेना ने ही प्रशिक्षित करके तैयार किया थ। इसके लिए जरूरी आर्थिक सहायता व हथियारों की मदद अमेरिका ने की थी पाकिस्तान ने इसके साथ ही कुछ और संगठनों को भी खड़ा किया थ जैसे लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन, हरकतुल मुजाहिदीन जैश-ए-मोहम्मद, अलबदर, अंजुमन सिपाहे सहाबा आदि, जिनको भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जाना था। उसने भारत पर अब घोष्ति प्रत्यक्ष सैनिक आक्रमण करने के बजाए आतंकवादी हमले करने शुरू किये। बहाना कश्मीर को बनाया गया। किंतु यह अप्रत्यक्ष युद्ध समूचे भारत के खिलाफ था। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ऐसे में अफगानिस्तान को लेकर भी उसने एक बड़ा सपना देखा था। उसके सामने यह बहुत साफ था कि सोवियत सेना के पलायन के बाद इस पड़ोस के अत्यंत रणनीतिक महत्व वाले देश पर उसका आधिपत्य कायम हो जायेगा और तब वह आकार और शक्ति में इतना बड़ा हो जायेगा कि वह भारत को आसानी से मात दे दे। उसके पास अपनी नियमित सेना के अतिरिक्त तालिबान तथा अन्य मुजाहिद संगठनों की एक विशाल जुनूनी सेना होगी, जिसका मुकाबला करना भारत के लिए असंभव होगा। ऐसा लगता हो भी गया था। काबुल में पाकिस्तान के द्वारा तैयार की गयी तालिबान फौजों ने अपनी सरकार कायम कर ली थी। तालिबान नेता मुल्ला उमर वहां का राष्ट्रपति बन बैठा था। अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के लिए भी यह अद्भुत उपलब्धि थी। अब उसे जंगल व पहाड़ी गुफाओं में छिपने की जरूरत नहीं थी। वह भी अब शान से काबुल के राष्ट्रपति निवास में मुल्ला उमर के साथ रह रहा था। लेकिन भारत के सौभाग्य तथा पाकिस्तान के दुर्भाग्यवश ओसामा की मति मारी गयी और उसने अमेरिका को ही सबक सिखाने की ठान ली और सीधे न्यूयार्क व वाशिंगटन पर हमला करा दिया। इस हमले ने पूरे इतिहास चक्र की दिशा ही बदल दी। अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया। इस हमले में काबुल में स्थापित तालिबान की सत्ता ही नहीं उखड़ गयी, उसका अफगानिस्तान में स्थापित पूरा गढ़ ध्वस्त हो गया। इसके साथ पाकिस्तानी सपना भी तार-तार हो गया। उसे शुक्रगुजार होना चाहिए अपने सेनाध्यक्ष से राष्ट्रपति बने जनरल परवेज मुशर्रफ का कि उन्होंने अत्यंत साहसिक कूअनीतिक चतुराई का परिचय देते हुए अमेरिकी कोप से पाकिस्तान की रक्षा की और तालिबान नेताओं की भी जान बचाई। इस कौशल ने अफगानिस्तान की मदद से भारत को मात देने के सपने को फिर से प्राणदान दे दिया। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अमेरिका ने अफगानिस्तान से रूसी फौजों को भगाने के लिए तो अपने सैनिकों को वहां नहीं उतारा, मगर तालिबान और अलकायदा के खिलाफ लड़ाई में उसे वहां अपने सैनिकों को उतारना पड़ा। पाकिस्तान इस लड़ाई में अमेरिका का सबसे निकट का मददगार बन गया। पाकिस्तान की भौगोलिक निकटता ने अमेरिका को भी मजबूर किया कि वह इस लड़ाई में उसे भी अपना साझीदार बनाए। पाकिस्तान ने इस साझेदारी के बदले अमेरिका से काफी मोटी रकम वसूली। 2001 से अब तक वह अमेरिका से करीब 22 अरब डॉलर की रकम ले चुका है। वास्तव में इस सहयोग के पीछे भी पाकिस्तान का रकम ले चुका है। वास्तव में इस सहयोग के पीछे भी पाकिस्तान का दोहरा स्वार्थ था। एक तो सहयोग के बदले में अमेरिका से अरबों उॉलर की नकद व सैनिक साजो-सामान की सहायता प्राप्त करना तथ दूसरे एक बार फिर काबुल पर अपना प्रभुत्व कायम करने का सपना पूरा करना। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान अच्छी तरह यह समझ रहा था कि अमेरिका सैनिक अनंतकाल तक अफगानिस्तान में नहीं ठहर सकते। उसके नेतृत्व वाली ‘उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन‘ /नाटो/ का भी कोई देश अपनी सेना वहां सदैव के लिए नहीं रख सकता। इसलिए जब ये विदेशी सैनिक वहां से हटेंगे, तो अपने आप उनके द्वारा खाली की गयी जगह पाकिस्तान के कब्जे में आ जाएगी। और जब अमेरिकी और अन्य नाटो देशों की सेना वहां नहीं रह जाएगी, तो अमेरिकी मदद से स्थापित की गयी काबुल की सरकार भी वहां नहीं टिक सकेगी। और तब फिर 2001 के पूर्व की स्थिति वहां वापस मिल जायेगी और पाकिस्तान तब फिर से भारत के खिलाफ वह अभियान शुरू कर सकेगा, जो न्यूयार्क पर हमले के बाद शुरू हुए घटनाक्रम में ध्वस्त हो गया था। लेकिन अफसोस, इस बीच अमेरिका के साथ बरती जा रही पाकिस्तान की कपट नीति के सारे पर्दे एकाएक फट गये और एक छली, धोखेबाज पाकिस्तान चौराहे पर नंगा खड़ा नजर आने लगा। उसकी कुरूप सच्चाई पर पड़ा अंतिम चीथड़ा भी तब उतर गया, जब राजधानी इस्लामाबाद के निकट उसकी सैन्य अकादमी की नाक के नीचे रह रहा अलकायदा नेता ओसामा बिन लादेन मारा गया। पाकिस्तान हतप्रभ था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अमेरिका ऐसा कदम भी उठा सकता है। रात के तीसरे पहर अमेरिकी कमांडो दस्ते ने पाकिस्तान में भीतर घुसकर लादेन को मार डाला और उसकी लाश तक लेकर चंपत हो गये और पाकिस्तानी सेना व सरकार को इसकी तब भनक लगी, जब स्वयं अमेरिका द्वारा इसकी घोषणा की गयी। पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना की विश्वसनीयता पर यह सबसे बड़ा आघात था। जिसके बारे में पाकिस्तान सरकार अक्सर बयान देती रहती थी कि वह शायद मर चुका है या पाकिस्तान छोड़कर जा चुका है या शायद कहीं उत्तरी वजीरिस्तान की पहाड़ियों में छिपा हो सकता है, वह राजधानी के निकट, सैन्य अकादमी के सुरक्षित इलाके में एक बड़ी इमारत में शान से रह रहा था। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए प्रायः सभी को धोखा दे रहा था, सभी से झूठ बोल रहा था, लेकिन उसका यह धोखा, यह झूठ, यह फरेब आखिर कब तक छिपा रह सकता था। उसे काबुल में भारत की उपस्थिति फटी आंख नहीं सहा रही थी। वह उसके पांव उखाड़ने के लिए अपने तालिबान गुर्गों से लगातार हमले करवा रहा था। राष्ट्रपति हादि करजई से भी उसकी नाराजगी इसीलिए थी कि करजई को भारत पर अधिक भरोसा था, इसलिए वह करजई सरकार का भी तख्ता पलटने की साजिश करता रहा। अमेरिकी सहायता के कारण वह इसमें सफल नहीं हो पा रहा था, तो उसने करजई की हत्या की साजिश रचनी शुरू कर दी। अमेरिका को भी यह झांसा देने की कोशिश करता रहा कि वह तालिबान के नरमगुट के साथ उसका समझौता करा सकता है, जिससे अफगानिस्तान में शांति कायम हो जाएगी और अमेरिका अपने सैनिकों को आराम से वापस बुला सकेगा। लेकिन जैसी की कहावत है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती, आखिर हरेक को धोखा देकर अपना उल्लू सीधा करने की साजिश कब तक काम करती। अंततः वही हुआ, जो होना चाहिए था। अमेरिका को भी यह समझ में आ गया कि पाकिस्तान की नीयत क्या है और वह चाहता क्या है। राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान को सार्वजनिक रूप से सलाह दी है कि वह भारत को अपना शत्रु मानना बंद करे। भारत उसका शत्रु नहीं है, लेकिन वह एकतरफा तौर पर भारत से शत्रुता रखता है, जो उसके लिए ठीक नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत के साथ हुए अफगान समझौते से पाकिस्तान इसीलिए तिलमिला रहा है कि इससे उसका दशकों पुराना सपना विफल होता नजर आ रहा है। उसने अफगानिस्तान को मिलाकर उसे मात देने की सोच रखा था, लेकिन अब यह संभव नहीं रह गया है। अमेरिका चला भी जायेगा, तो भी काबुल में भारत की उपस्थिति बनी रहेगी और उसके लिए सैनिक दृष्टि से पांव जमाने के लिए वहां कोई अवसर नहीं रह जायेगा। उसको सर्वाधिक खीझ इस बात को लेकर है कि अफगानिस्तान ने अपनी सुरक्षा सेना के गठन और प्रशिक्षण का अधिकार भारत को दे दिया है। इस प्रशिक्षण के बहाने भारत की सैन उपस्थिति भी काबुल में बनी रहेगी। अफगानिस्तान के पास अकूत खनिज संपदा है। उसकी धरती के नीचे लौह खनिज तथा तेल और गैस के विशाल भंडार हैं। भारत उसे खोजने और निकालने में अफगानिस्तान का साझीदार होगा। यह सब सोच-सोचकर पाकिस्तान का कलेजा राख हुआ जा रहा है। भारत के साथ नागरिक स्तर की मैत्री का दम भरने वाले बुद्धिजीवी, कलाकार, लेखक व पत्रकार भी इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति व सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ जैसे देश निकाल पाए राजनीतिक नेता ऋभी कह रहे हैं कि भारत, अफगानिस्तान को पाकिस्तान के विरुद्ध खड़ा करने में लगा है। उनके अनुसार अफगानिस्तान, भारत और पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध केंद्र बना हुआ है। उन्होंने यह तो नहीं बताया कि इस परोक्ष युद्ध की शुरुआत करने वाला कौन है, लेकिन उन्हें लग रहा है कि इस परोक्ष् युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को मात दे दी है। वह जानते हैं कि पाकिस्तान इतनी आसानी से यह मोर्चा छोड़ने वाला नहीं, इसलिए उन्होंने पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा है कि इससे अफगानिस्तान में शांति कायम करने में कोई मदद नहीं मिलेगी, बल्कि वहां भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष और बढ़ेगा, जिसका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा। मुशर्रफ ने बड़ी खीझ के साथ् कहा है कि जब वह सत्ता में थे, तो उन्होंने कई बार अफगान सरकार के समक्ष उसकी सेना को प्रशिक्षित करने का प्रस्ताव रखा, किंतु वहां से कभी एक आदमी भी आने के लिए तैयार नहीं हुआ। अब इन मुशर्रफ साहब को कौन बताए कि काबुल के शासक मूर्ख नहीं हैं। वे भारत और पाकिस्तान दोनों के प्रशिक्षण का फर्क समझते हैं। भारत के निश्चय ही अफगानिस्तान में अपने सामरिक हित हैं, लेकिन वह अफगानिस्तान को किसी के खिलाफ इस्तेमाल करने का सपना नहीं देख रहा है। वह केवल इतना चाहता है कि अफगानिस्तान किसी भारत विरोधी शक्ति के हाथ में न चला जाए। भारत सरकार के राजनीतिक नेताओं को भी इसके लिए बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने देश के इतिहास में पहली बार एक ऐसी विदेशी नीति को अगली जामा पहनाया, जो देश के दीर्घकालिक सामरिक व आर्थिक हितों से जुड़ी थी। 2001 में जब अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई शुरू हुई, तब इस देश में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का शासन था। तीन साल बाद कांग्रेस की सत्ता आयी, तो उसने भी अपनी अफगान नीति को सही दिशा में आगे बढ़ाया। भारतीय नीति को अमेरिका का भी समर्थन मिला, क्योंकि भारत जो कार्य अफगानिस्तान में कर रहा है, वह अमेरिका के लिए भी मुश्किल था। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कितने आश्चर्य की बात है कि पाकिस्तान के प्रायः सारे नेता एक स्वर में यह कह रहे हैं कि भारत वहां अपना सारा विकास कार्य बंद कर दे। पाकिस्तान के नेताओं में जनरल मुशर्रफ से लेकर यूसुफ रजा गिलानी तक सभी अमेरिका पर इसके लिए दबाव डालते रहे कि वह भारत को वहां अपना कामकाज फैलाने से रोके, क्योंकि वह पाकिस्तानी हितों के खिलाफ है। मुशर्रफ साहब तो अभी भी कह रहे हैं कि भारत को वहां अपना विकास कार्य बंद करने को कहा जाए। पाकिस्तानी राजनेता भी अमेरिका को चेतावनी दे रहे हैं कि पाकिस्तान पर दबाव डालने की उसकी कार्रवाई उलटी पड़ सकती है। पाकिस्तानी सिनेट की विदेश मामलों की कमेटी के चेयरमैन सलीम सैफुल्लाह ने कहा है कि अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है, ऐसे में यदि पाकिस्तान पर ही दबाव बढ़ाया गया, जो इससे वहां अमेरिकी विरोधी भावना भड़क सकती है। कितने आश्चर्य की बात है कि पाकिस्तानी नेता समझते हैं कि अमेरिका को अभी भी मूर्ख बनाया जा सकता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अमेरिका के पास अब इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि पाकिस्तान सरकार के स्वयं पाकिस्तान व अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादी संगठनों से सीध संबंध है और पाकिस्तानी सैन्य गुप्तचर संस्थ आई.एस.आई. उनका संचालन करती है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने अभी दो दिन की अपनी भारत यात्रा से वापस जाने के बाद गुरुवार को काबुल में प्रेस के सामने कहा कि बिना पाकिस्तानी सहायता के तालिबान आतंकवादी एक उंगली तक नहीं हिला सकते। अभी जब करजई दिल्ली में थे, तभी अफगानिस्तान में उनकी हत्या की साजिश में शामिल 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिसमें एक स्वयं करजई का अपना सुरक्षा गार्ड भी शामिल है। इन सभी के संबंध तालिबान के हक्कानी गुट से बताया जाता है। अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय के प्रवक्ता लुत्फुल्लाह मशाल के अनुसार करजई की हत्या का यह तीसरा प्रयास था, जिसे समय रहते विफल कर दिया गया। पिछले कुछ दिनों से करजई तथा उनके निकटस्थ लोगों की हत्या का एक पूरा अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें हमलावरों को कुछ सफलता भी मिली है। जैसे वे करजई के सौतेले भाई अहमद वली करजई तथा अफगानी शांति मिशन के अध्यक्ष पूर्व राष्ट्रपति वजी उल्लाह रब्बानी की हत्या करने में सफल हो गये। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसलिए अब पाकिस्तान लाख दावा करे कि अफगानिस्तान में शांति कायम करने में उसकी महान भूमिका रही है, यानि उसकी सहायता के बिना अमेरिका वहां कोई कामयाबी हासिल नहीं कर सकता था अथवा उसने भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारी कुर्बानी दी है, लेकिन फिलहाल वहां उसकी दाल गलने वाली नहीं है, क्योंकि अब यह पूरी दुनिया के सामने उजागर हो चुका है कि उसने जो कुछ भी किया है, वह अपने स्वार्थवश किया है और विश्व समुदाय के समक्ष लगातार झूठ बोलता रहा है और धोखा देता रहा है। हां, यह बात सही है कि अब भारत-पाक संघर्ष और बढ़ेगा। बंगलादेश में हुई पराजय के बाद अफगानिस्तान में यह उसकी दूसरी बड़ी पराजय है। वह सैनिक पराजय थी, तो यह कूटनीतिक। जिस तरह वह बंगलादेश की पराजय को अब तक नहीं भुला सका है और उसे याद करके तिलमिलाता रहता है, उसी तरह वह अफगानिस्तान की कूटनीतिक पराजय कभी नहीं भुला सकेगा। जाहिर है कि वह अब दुगुनी ताकत से भारत पर हमले करने की कोशिश करेगा। यह कोशिश् निश्चय ही प्रत्यक्ष नहीं, परोक्ष युद्ध की होगी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह खबरें पहले से ही मिलती आ रही हैं कि पाकिस्तान गुप्तचर संस्थ आई.एस.आई. ने भारत के नक्सलवादी संगठनों तथा उत्तर-पूर्व के विद्रोही संगठनों (जैसे मणिपुर की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) से निकट संपर्क बना रखा है तथा उन्हें हथियारों के साथ नकद सहायता भी उपलब्ध करवा रहा है। अब वह अपनी इस कार्रवाई को और तेज कर सकता है। देश में फैली जिहादी इकाइयों के साथ इन हिंसक विद्रोही संगठनों को जोड़कर पाकिस्तान देश में हिंसा व अशांति फैलाने के नये प्रयास कर सकता है। अभी तो वह अफगानिस्तान में भी भारत विरोधी कार्रवाइयां तेज करने की कोशिश करेगा। यद्यपि भारत में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो समझते हैं कि भारत ने नाहक अपने को अफगानिस्तान में फंसा रखा है, लेकिन ऐसे लोग या तो बेहद भोले और नासमझ हैं अथवा वे भारत विरोधी शक्तियों के दलाल हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के इस क्षेत्र में शांति बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि पाकिस्तान और उसके जिहादी संगठनों से अफगान मोर्चे पर ही निपट लिया जाए। इसके लिए कोई भी कीमत अदा करना महंगा सौदा नहीं होगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-2162646932833608291?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://navyadrishti.blogspot.com/feeds/2162646932833608291/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4357481173344464761&amp;postID=2162646932833608291' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/2162646932833608291'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4357481173344464761/posts/default/2162646932833608291'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://navyadrishti.blogspot.com/2011/10/4-1971-4-2011.html' title=''/><author><name>डॉ. राधेश्याम शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17286181709521019647</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='29' src='http://2.bp.blogspot.com/-Lr2II-N27uI/ThcKK6iR40I/AAAAAAAAAeA/XvYBDTFt3S0/s220/DSCN1044.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-ad5zMyMxd2k/TpltApnxKyI/AAAAAAAAAfw/mYPV4iRJwQY/s72-c/PTI10_4F.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4357481173344464761.post-3378842514862972443</id><published>2011-10-15T16:46:00.000+05:30</published><updated>2011-10-15T16:46:04.952+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;strong&gt;आडवाणी यों ही हार मानने वाले नहीं&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-ctsHuPE5H_Y/TplqosB49hI/AAAAAAAAAfo/Hl9XQKB8_oc/s1600/INDIAPOL.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="201px" oda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-ctsHuPE5H_Y/TplqosB49hI/AAAAAAAAAfo/Hl9XQKB8_oc/s320/INDIAPOL.JPG" width="320px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size: xx-small;"&gt;भाजपा में प्रधानमंत्री पद के दो संभावित चेहरे: एक हिन्दूवादी, एक सेकुलर&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.) नहीं चाहता कि लालकृष्ण आडवाणी फिर अपने को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाएं, इसलिए वह यह भी नहीं चाहता कि वे विपक्षी राजनीति का केंद्रीय आकर्षण बनने की कोशिश करें। उसके अनुसार 2009 में उनके लिए अंतिम मौका था, जो जा चुका है। अब आगे पार्टी के किसी युवा नेता को आगे आने का अवसर दिया जाना चाहिए। आडवाणी ने इसका कोई खुला प्रतिवाद नहीं किया है, लेकिन वे इसे स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं। संघ और पार्टी क्या करेगी यह वो जाने, मगर उन्होंने तो एक और मुकाबले में उतरना तय कर लिया है। संघ, मोदी के पीछे खड़ा है, तो परवाह नहीं, उन्होंने गुजरात का आश्रय छोड़ अब बिहार का दामन थाम लिया है।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बुधवार 21 सितंबर को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ् के प्रधान मोहन भागवत के साथ मुलाकात के बाद यद्यपि पत्रकारों से बातचीत करते हुए यह संकेत दिया कि वह स्वयं अब प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं हैं, किंतु ऐसा लगता नहीं कि वह दशकों से संजोई अपनी इस महत्वाकांक्षा का यों ही परित्याग कर देंगे। आडवाणी एक जुझारू नेता है, वह यों ही पराजय स्वीकार कर लेने वाले नहीं। उन्होंने इसका संकेत दे भी दिया है कि उनमें अभी काफी दम खम है और 2014 के चुनावों में उनके लिए अभी एक संभावना शेष है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नागपुर में आडवाणी ने कहा था कि पार्टी तथा देश की जनता ने अब तक उन्हें जो दिया है, वह किसी प्रधानमंत्री पद से कहीं अधिक है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से प्रारंभ करके, जनसंघ तथा भाजपा तक की अपनी इस राजनीतिक यात्रा में वह पार्टी का अंग बने रहकर प्रसन्न हैं। उनके ऐसा कहते हुए लग रहा था कि वह परम वीतरागी हो गये हैं, लेकिन निश्चय ही उनके भीतर आगे की संघर्ष योजना का मंथल चल रहा था। ऐसा समझा जाता है कि संघ नेतृत्व ने आडवाणी को अपने दरबार में तलब किया था, क्योंकि वह उनकी अगली रथ यात्रा की घोषणा से नाराज था। आडवाणी ने संसद के पिछले सत्र के अंतिक दिन भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी देशव्यापी रथ यात्रा की घोषणा की थी। संघ की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि उन्होंने अपनी इस रथ यात्रा के बारे में संघ के नेताओं से कोई विचार-विमर्श नहीं किया था। आडवाणी ने शायद इसके लिए संघ से पूर्व अनुमति लेने की कोई जरूरत नहीं समझाी होगी। यथार्थ की बात करें, तो संघ और भाजपा दोनों में आडवाणी इस समय आयु और राजनीतिक कद दोनों ही दृष्टियों से वरिष्ठतम स्थान पर हैं, इसलिए यदि उन्होंने अपनी घोषणा के लिए किसी पूर्व अनुमति लेना जरूरी न समझा हो, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। लेकिन इस घोषणा में संघ के अधिकारियों को यह बू आई कि आडवाणी शायद एक बार फिर अपने को विपक्षी राजनीति के केन्द्र में लाना चाहते हैं, इसलिए उसने अपनी नाराजगी का स्पष्ट संकेत दिया। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वास्तव में संघ आडवाणी से तब से क्षुब्ध हैं, जब उन्होंने अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान कराची में मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर पहुंचकर अपनी श्रद्धांजलि दी थी और प्रशंसा करते हुए उन्हें एक सेकुलर नेता बताया था। उनकी इस कारगुजारी पर संघ की त्यौरियां चढ़ना स्वाभाविक था। जिस जिन्ना को संघ देश का दुश्मन नंबर एक, भारत के विखंडन का मुख्य अपराधी मानता है, उसका यदि संघ की ही राजनीतिक शाखा का प्रमुख नेता, शत्रु समझे जाने वाले देश की धरती पर पहुंचकर गुणगान करे, इसे बर्दाश्त करना संघ के लिए निश्चय ही नामुमकिन था। उसने आडवाणी से इस पर स्पष्टीकरण मांगा और अपने वक्तव्य के लिए खेद व्यक्त करने को कहा, लेकिन आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ना स्वीकार कर लिया, मगर अपने वक्तव्य पर अड़े रहे। उन्होंने जिन्ना की प्रशंसा अपनी सोची-समझी रणनीति के तहत किया था। इसके पीछे उनका लक्ष्य था अपने को ‘सेकुलर‘ सिद्ध करना और देश के भीतर ‘अटल बिहारी वाजपेयी‘ वाली सर्वस्वीकार्य छवि अर्जित करना। वह जानते थे कि आगे जाने वाले बहुत वर्षों तक पार्टी को अकेले बहुमत तो मिलने वाला नहीं, इसलिए बिना अन्य दलों के साथ गठबंधन किये सत्ता तक पहुंचना असंभव है और इन अन्य दलों का समर्थन पाने के लिए ‘सेकुलर‘ छवि आवश्यक है, क्योंकि ये अधिकांश क्षेत्रीय दल मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर हैं, इसलिए उनकी भावनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। आडवाणी भाजपा के भीतर कट्टर हिन्दूवादियों के नेता समझे जाते थे- जिन्हें संघ का पूरा समर्थन हासिल था- जबकि वाजपेयी को संघ का वैसा प्यार हासिल नहीं था, किंतु वह पार्टी के बाहर सर्वाधिक लोकप्रिय थे, क्योंकि उनकी छवि उदारवादी और सेकुलर थी। गठबंधन की राजनीति में इसीलिए वाजपेयी स्वीकार्य थे, आडवाणी नहीं। वाजपेयी को इफ्तार पार्टियों में कभी भी मुसलमानों की गोल टोपी पहने देखा जा सकता था, किंतु आडवाणी को नहीं। इसलिए आडवाणी अपनी छवि बदलना चाहते थे। उनके सामने 2009 के चुनाव की संभावनाएं थीं, इसलिए उन्होंने छवि बदलने का ठोस प्रयास शुरू किया। संघ की नाराजगी झेलकर भी वह अपने वक्तव्य पर डटे रहे, जिससे कि देश में उनके विचारों की दृढ़ता का संदेश जाए। यह संदेश काफी कुछ गया भी, लेकिन 2009 के चुनाव में भी पार्टी कुछ नहीं कर पायी और कांग्रेस दुबारा सरकार बनाने की स्थिति में आ गयी। संघ ने नाराजगी के बावजूद आडवाणी को 2009 में अपनी किस्मत आजमाने का मौका दे दिया था। आडवाणी का छवि बदलने का प्रयास यदि भाजपा को पुनः सत्ता तक पहुंचा सकता है, तो इसमें तो संघ को कोई आपत्ति थी नहीं, मगर जब पार्टी यह चुनाव भी हार गयी, तो संघ ने आडवाणी को हाशिए में डालने का दो टूक निर्णय लिया। लोकसभा में आडवाणी के होते हुए भी पार्टी व विपक्ष का नेता पद सुषमा स्वराज को दिया गया और राज्यसभा में यह सम्मान अरुण जेटली जैसे युवा नेता को दिया गया। आडवाणी का सम्मान रखने के लिए उन्हें पार्टी के संसदीय दल का नेता बना दिया गया, लेकिन यह स्पष्ट संदेश दे दिया गया कि अब उनका राजनीतिक युग समाप्त हो गया है, अब वह अपने को एक सलाहकार की हैसियत में समझें और पार्टी की सक्रिय राजनीति का नेतृत्व युवा पीढ़ी के हवाले करे। आडवाणी ने मन मसोस कर इसे स्वीकार कर लिया, किंतु उनका जुझारू अंतरमन सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के लिए तैयार नहीं हुआ। जैसे भी हो पार्टी में अपनी सक्रियता बनाये रखते हुए उन्होंने समय की प्रतीक्षा करने का विकल्प चुना। उनके जैसे अनुभवी नेता जानते हैं कि राजनीति को करवट बदलने में देर नहीं लगती, लेकिन उसका लाभ वही उठा सकता है, जो राजनीति की मुख्यधारा में बना रहे, इसलिए वह थोड़ा अपमान झेलकर भी धारा में बने रहे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संसद के पिछले पावस सत्र में उन्होंने अनुभव किया कि कांग्रेस भ्रष्टाचार तथा प्रशासनिक निकम्मेपन के आरोपों से इस तरह घिर गयी है कि अगले आम चुनावों में फिर से बहुमत योग्य जन समर्थन प्राप्त करना बहुत कठिन होगा, इसलिए भाजपा फिर कांग्रेस से आगे निकल सकती है, इसलिए उन्होंने फिर राजनीति के मैदान में अपने को विपक्ष के प्रमुख योद्धा के तौर पर उतारने का संकल्प ले लिया। हो सकता है उनके दिमाग में एकाएक यह विचार कौंधा हो कि वह इस बार भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी रथ यात्रा शुरू करे और उन्होंने संसद की बैठक के अंतिम दिन के अवसर का लाभ उठाते हुए उसकी घोषणा कर दी। संघ तो क्या शायद इसके बारे में तब तक उन्होंने किसी के साथ इसके बारे में कोई विचार-विमर्श नहीं किया था। यात्रा की तिथि और बाकी चीजें तो बाद में तय ही की जानी थी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उनकी इस घोषणा से संघ के ही नहीं, उनकी पार्टी के भी तमाम नेता चौंके थे और प्रायः सबका ख्याल एक ही था कि आडवाणी फिर अपने को विपक्षी राजनीति के केंद्र में लाना चाहते हैं। लेकिन दिक्कत थी कि कोई इसका विरोध नहीं कर सकता था। इस यात्रा को न करने की सलाह तो संघ भी नहीं दे सकता था, लेकिन संघ उनसे यह आश्वासन जरूर ले लेना चाहता था कि अब वह फिर से अपने को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी नहीं बनायेंगे। इस बीच एकाएक राजनीतिक वातावरण ऐसा बदला कि नरेंद्र मोदी गुजरात से उछलकर राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गये। एक तरफ तो सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात दंगों के मामले में अपने को मोदी विरोधियों की राजनीति का हथियार बनाये जाने से रोक लिया और सारे मामले की सुनवाई गुजरात की निचली अदालत में करने का निर्देश दिया, जो सांप्रदायिक हिंसा के आरोपों में जकड़े मोदी के लिए बहुत बड़ी राहत थी तथा दूसरी तरफ एक अमेरिकी संसदीय समिति ने मोदी के शासन तथा उनके शासनकाल में हुए विकास की तारीफ करते हुए उन्हें 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया। उपर्युक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिख है कि अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री के संघर्ष में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का मुकाबला मोदी से हो सकता है। इस रिपोर्ट ने एकाएक मोदी का कद कई गुना बढ़ा दिया। उन्होंने भी इन दोनों घटनाओं का जश्न मनाने के लिए अपने जन्मदिन 17 सितंबर पर तीन दिन के उपवास की घोषणा कर दी। जश्न मनाने का यह अनूठा और बेहद नया राजनीतिक तरीका था। मोदी ने अपने इस उपवास को ‘सद्भावना मिशन‘ की संज्ञा दी और कहा कि राज्य के विभिन्न वर्गों के बीच सद्भावना एवं शांति के लिए वह इस प्रतीकात्मक उपवास पर बैठ रहे हैं। उन्हें भी लगा कि यदि राष्ट्रीय राजनीति में उतरना है, तो उन्हें भी एक सेकुलर छवि चाहिए। राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता हासिल करनी है, तो कट्टर हिन्दूवाद से काम नहीं चलेगा। उन्होंने सभी मजहबों के लोगों को इस उपवास समारोह में बुलाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि वह किसी जाति या वर्ग के तुष्टीकरण के पक्ष में नहीं है, किंतु वह किसी के विरोधी भी नहीं हैं। लेकिन एक मौलाना ने इसमें भी खलल डाल ही दिया। गुजरात के किसी सुदूर गांव में स्थित एक दरगाह के मौलाना हजरत सूफी इमाम शाही सईद मेंहदी हुसैन उर्फ ‘पीरान बाबा‘ ने मोदी को मंच पर पहुंचकर उन्हें मुस्लिम गोल टोपी पहनाने का प्रयास किया। मोदी ने वह टोपी पहनने से इनकार कर दिया, बदले में मौलाना से कहा कि यदि वह अपनी हरी शॉल उन्हें भेंट करना चाहें, तो उन्हें खुशी होगी। मौलाना ने वह शॉल अपने गले से निकालकर मोदी के गले में डाल दी और वापस आ गये। मिनट-मिनट की घटनाओं पर नजर रखने वाले मीडिया को एक जबर्दस्त शिगूफा मिल गया। मोदी ने इस्लामी टोपी पहनने से इनकार कर दिया। फौरन यह खबर पूरी दुनिया में फैल गयी। मौलाना ‘पीरान बाबा‘ को मीडिया के लोगों ने घेरा, तो उन्होंने मोदी के व्यवहार पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया। उनके साथ उपस्थित उनके बेटे ने कहा कि मोदी ने उनके बाबा की बड़ी बेइज्जती की। कितनी हसरत से वह इतनी दूर से मोदी से मिलने आये थे, लेकिन यहॉं पहुंचकर बेइज्जती मिली। मौलाना ने फरमाया यह कोई मेरा अपमान नहीं, बल्कि इस्लाम का अपमान है। उन्होंने बाद में यह भी कहा कि मोदी अब कभी इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। यहां इस्लाम का अपमान करने वाला कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। यहां इस्लाम का अपमान करने वाला कभी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं पहुंच सकता। मोदी ने खुद अपनी किस्मत पर प्रहार किया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह मसला इतना बड़ा हो गया कि लखनउ (उत्तर प्रदेश) के शिया धर्म गुरु कल्वे जव्वाद ने इस शुक्रवार को वहां स्थित बड़ा इमामबाड़ा में एक दिन के सामूहिक रोजा व उपवास का आयोजन किया, जिसमें आर्यसमाजी नेता स्वामी अग्निवेश सहित कई मजहबों के लोगों ने भाग लिया। इस एकदिवसीय उपवास में मोदी द्वारा इस्लामी टोपी का अपमान किये जाने की निंदा की गयी तथा कहा गया कि मोदी को इस तरह का उपवास करने का कोई हक नहीं है। जिसके हाथ हजारों मुसलमानों के खून से रंगे हों, उसे इस तरह उपवास करने या सद्भाव की बात करने का कोई अधिकार नहीं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर, इस उपवास राजनीति से मोदी को कितना लाभ हुआ, कितना नुकसान, यह अलग बात है, लेकिन उनके इस आयोजन के कारण आडवाणी की रथ यात्रा की घोषणा नेपथ्य में चली गयी। आडवाणी इससे भी क्षुब्ध रहे होंगे। उन्होंने मोदी को इस रथ यात्रा की तैयारी करने के लिए कहा था, लेकिन वह अपने ‘उपवास समारोह‘ में लग गये। आडवाणी यद्यपि पार्टी के अन्य तमाम नेताओं के साथ उनके इस उपवास में शामिल हुए और मोदी के लिए की गयी अमेरिकी संसदीय समिति की टिप्पणी का समर्थन भी किया, लेकिन अंदर कहीं कुछ दरक अवश्य रहा था। इसके तत्काल बाद ही वह नागपुर में मोहन भागवत से मिले। मोहन भागवत ने ठीक-ठीक उनसे क्या कहा, यह तो पता नहीं, लेकिन समझा यही जाता है कि उन्होंने सलाह दी कि वे अगले प्रधानमंत्री की दौड़ में अपने को शामिल न करें और विधिवत इस बात की सार्वजनिक घोषणा करें। बाहर पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने सीधे यह तो नहीं कहा कि अब वह प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करेंगे और पार्टी के किसी युवा नेता की इस पद पर ताजपोशी का समर्थन करेंगे, लेकिन यह संकेत देने की पूरी कोशिश की कि वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं। प्रधानमंत्री पद उनके लिए कोई बड़ी चीज नहीं है, अब तक पार्टी तथा इस देश ने उन्हें जो कुछ दिया है, वह किसी प्रधानमंत्री पद की उपलब्धि से बहुत अधिक है। आडवाणी के इस कथन से सामान्यतया लोगों ने समझ लिया कि उन्होंने संघ के अधिकारियों के समक्ष् आत्मसमर्पण कर दिया है। लेकिन यह सच नहीं था। आडवाणी ने संघ के नेताओं का कोई प्रतिवाद नहीं किया, किंतु उन्होंने अपनी रथ यात्रा का संकल्प और दृढ़ कर लिया। उन्होंने मोदी को भी दरकिनार करने की सोच ली। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उनकी यह रथ यात्रा पहले गुजरात से शुरू होने वाली थी और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही उसे हरी झंडी दिखाने वाले थे। यात्रा की शुरुआत के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल के पैतृक गांव करमसाद को चुना गया था। किंतु आडवाणी ने इसके बाद कार्यक्रम बदल दिया। उन्होंने गुजरात के बजाए अब यह यात्रा बिहार से शुरू करने का निर्णय लिया। यात्रा का प्रस्थान बिंदु समग्र क्रांति के स्वप्न द्रष्टा जय प्रकाश नारायण के गांव सिताबदियरा को चुना गया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से आग्रह किया गया है कि वे इस यात्रा का शुभारंभ कराएं। नीतीश ने यह आग्रह खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। आडवाणी ने अपनी आगे की राजनीति के लिए गुजरात को छोड़कर बिहार का आश्रय बहुत सोच-समझकर लिया है। देश में इस समय दो क्षेत्रीय राजनेता ‘विकास पुरुष‘ की ख्याति अर्जित कर रहे हैं, एक नरेंद्र मोदी और दूसरे नीतीश कुमार। लेकिन राजनीति ने दोनों के विकास को दो रंगों में रंग दिया है। मोदी के विकास पर जहां हिन्दू सांप्रदायिकता का आरोपण है, वहां नीतीश के विकास को सेकुलर उदारता का प्रमाण-पत्र मिला हुआ है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आडवाणी ने फिलहाल मोदी के आश्रय का परित्याग करके नीतीश का आश्रय ग्रहण कर लिया है। आडवाणी की सोच और संकल्प में आए बदलाव का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि इस बार उन्होंने 25 सितंबर को सोमनाथ जाने का अपना करीब 20 साल पुराना नियमित कार्यक्रम भी रद्द कर दिया। 25 सितंबर 1990 को उन्होंने पहली बार अयोध्या में राम मंदिर के संकल्प को लेकर अपनी रथ यात्रा सोमनाथ से ही शुरू की थी। तबसे वह प्रति वर्ष 25 सितंबर को सोमनाथ अवश्य पहुंचते थे, लेकिन इस बार उन्होंने यह क्रम तोड़ दिया। निश्चय ही उनके इस निर्णय से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत हतप्रभ होंगे, क्योंकि उन्होंने इस अवसर पर अहमदाबाद में एक रैली का आयोजन कर रखा था, जिसमें राज्यपाल कमला बेन को वापस बुलाने की मांग बुलंद की जानी थी। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आडवाणी अभी 83 साल के हैं। 2014 में वह 86 साल के होंगे। लेकिन वह पूरी तरह फिट हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह तब तक इतने बूढ़े हो जायेंगे कि प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं रह जायेंगे। इसलिए यदि वह एक अवसर और आजमाना चाहते हों, तो इसे कुछ बहुत गलत तो नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह सवाल जरूर किया जा सकता है कि वह इस देश के बहुसंख्यक युवा जनमत को अपनी तरफ आकर्षित कर सकेंगे। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि क्या वह अपने से आधी उमर वाले राहुल गांधी का राजनीतिक मुकाबला करते हुए अच्छे लगेंगे ? ऐसे और भी सवाल हो सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2014 के चुनाव में यदि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन एन.डी.ए. सरकार बनाने की स्थिति में आया, तो वह प्रधानमंत्री पद के लिए किसी आगे कर सकता है। आडवाणी को यदि दरकिनार कर दिया जाए, तो भाजपा में संभावित नाम हो सकते हैं- अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और नरेंद्र मोदी। एक नाम जसवंत सिन्हा का भी लिया जा सकता है। भाजपा के बाहर केवल एक नाम है नीतीश कुमार का। निश्चय ही एन.डी.ए. के घटकों में सबसे बड़ी संख्या भाजपा की होगी और सत्ता का शीर्ष नेतृत्व वह अपने पास रखना चाहेगी, तो उसे जेटली, सुषमा, मोदी और सिन्हा में से ही चुनना पड़ेगा। आज की राजनीति में ऐसी उदारता की कल्पना तो नहीं ही की जानी चाहिए कि मुख्य घटक दल संसद में सर्वाधिक सदस्य संख्या अपने पास होेेते हुए प्रधानमंत्री पद किसी वरिष्ठ पार्टी के सदस्य को दे दे। और ऐसा हो भी जाए, तो उसमें स्थिरता की उम्मीद नहीं की जा सकती। निश्चय ही बाकी बचे नामों में स्वयं भजपा के भीतर तथा घटक दलों के बीच सहमति कायम कर पाना कठिन होगा। 2014 में यदि विपक्षी गठबंधन बना तो उसमें जनता दल (यू) &amp;nbsp;के अतिरिक्त नवीन पटनायक के बीजू जनता दल, चंद्रबाबु नायुडू के तेलुगु देशम पार्टी, अजित सिंह व ओमप्रकाश चौटाला के अपने-अपने लोकदलों, जगन मोहन रेड्डी की वाय.एस.आर. कांग्रेस आदि की मुख्य भ्ूमिका होगी। ये सभी कट्टर सेकुलरवादी हैं, यानी ये मोदी के नाम पर तो कतई सहमत नहीं होंगे। केवल बाल ठाकरे की शिवसेना, राजठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, प्रकाश सिंह बादल के अकाली दल, चंद्रशेखर राव के टी.आर.एस. तथा जयललिता की अन्ना द्रमुक के बारे में कहा जा सकता है कि भाजपा के किसी भी नेता को अपना समर्थन दे सकते हैं। लेकिन उतने से कम नहीं चलेगा। ऐसे में यदि आडवाणी उपलब्ध रहे, तो उन पर सहज ही आम सहमति बन सकेगी। मोदी से दूरी बनाना उनकी सेकुलर छवि को निश्चय ही मजबूत करने वाला सिद्ध होगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर, आडवाणी ने तो अपनी रणनीति बना ली, मगर अभी भाजपा को सौ बार सोचना पड़ेगा कि क्या आडवाणी को फिर आगे करके 2014 के चुनाव में कांग्रेस को पछाड़ा जा सकता है। कांग्रेस की युवा चुनौती का मुकाबला करने लायक भाजपा के पास एक ही नाम है- नरेंद्र मोदी, जिसके पास अपना भी कोई जनाधार है। उसकी दूसरी पंक्ति के सारे अन्य नेता जमीन से कटे हुए हैं। थोड़ा बहुत जनाधार जसवंत सिन्हा के पास है, लेकिन वह भी केवल अपना चुनाव जीतने तक। अपने अलावा किसी दूसरे को भी जीतवाने की क्षमता मोदी के अलावा और किसी के पास नहीं। पार्टी की अजीब विडंबना है- जो चुनाव जिताने वाला नेता है, वह चुनाव के बाद ही राजनीति में स्वीकार्य नहीं है और जो बाद वाली राजनीति में स्वीकार्य हो सकता है, उसमें चुनाव जिताने की क्षमता का अभाव है। आडवाणी दोनों ही स्थितियों में अपनी क्षमता प्रमाणित करना चाहते हैं, किंतु यह संघ के नेताओं को स्वीकार्य नहीं, क्योंकि आडवाणी तो संघ की पहचान ही समाप्त कर देने लगे हैं। अब यदि पार्टी को 2014 में अपना वर्चस्व कायम करना है, तो उसे इन विडंबनाओं से बाहर निकलना होगा, अन्यथा जैसा भी है, उसे कांग्रेस का शासन उसके आगे भी स्वीकार करना होगा, फिर उसका नेतृत्व मनमोहन या प्रणव जैसे बूढ़े नेता करें या राहुल गांधी जैसे युवा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4357481173344464761-3378842514862972443?l=navyadrishti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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