मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

कश्मीरी आंदोलन को देशव्यापी बनाने की साजिश




कश्मीरी अलगाववादी आंदोलन को अब राज्य की सीमा के बाहर राष्ट्रव्यापी आंदोलन बनाने का एक संगठित प्रयास शुरू हो गया है। पिछले दिनों दारूल उलूम देवबंद में कश्मीर मसले पर विचार के लिए पहली बार जमीयत-ए-उलेमाए हिन्द की बैठक हुई, जिसमें कई प्रस्ताव पारित किये गये। उसके बाद गत गुरुवार को नई दिल्ली में भरत की केंद्रीय सत्ता की ठीक नाम के नीचे कश्मीरी अलगाववादियों ने एक सेमीनार आयोजित किया, जिसमें माओवादी व खालिस्तान समर्थक बुद्धिजीवियों ने भी भाग लिया। सेमीनार में शामिल अरुंधती राय जैसी वामपंथी लेखिका ने तो कश्मीरी आंदोलन का समर्थन करते हुए भारत को उपनिवेशवादी देश तक कह डाला।



स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रायः तुरंत बाद कश्मीर पर हुए पाकिस्तान के पहले हमले के बाद 4 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी ने अपनी शाम की प्रार्थना सभा में बोलते हुए कहा था कि आओ हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें ऐसी शक्ति दे कि या तो हम (भारत और पाकिस्तान या हिन्दू और मुसलमान) एक दूसरे के साथ मैत्रीपूर्वक रहना सीख लें और यदि हमें लड़ना ही है, तो एक बार आर-पार की लड़ाई कर लें। यह बात मूर्खतापूर्ण लग सकती है, लेकिन देर-सबेर इससे हममें शुद्धता आ जाएगी (लेट अस प्रे टू गॉड इज टु ग्रांट दैट वी मे आइदर लर्न टु लिव इन एमिटी विद ईच अदर आॅर इफ वी मस्ट फाइट टू लेट अस फाइट टु द वेरी एंड दैट मे बी फॉली बट सूनर आॅर लेटर इट विल प्योरीफाई अस)।

गांधीजी की अन्य तमाम सलाहों की तरह यह सलाह भी व्यर्थ गयी। हम आज तक न तो मैत्रीपूर्वक साथ रहना सीख सके और न आर-पार की लड़ाई लड़ने का साहस ही जुटा सके। हमने तिलमिल मरने या भूसे की आग में सुलगते रहने का रास्ता अख्तियार किया है। हम सच्चाई को स्वीकार करने से डरते हैं, क्योंकि हम किसी भी तरह का नुकसान उठाने से डरते हैं और कम से कम अपनी जान तो खतरे में कतई नहीं डालना चाहते। गांधी जी ने यदि आज वही बात कही होती, जो 4 जनवरी 1948 में कही थी तो शायद उन पर भड़काउ भाषण देने के लिए मुकदमा कायम हो जाता। अखबारों में सुर्खियां छपती कि अहिंसा का तथाकथित पुजारी अब युद्ध की और वह भी आर-पार के युद्ध की बात करने लगा है।

भारत और पाकिस्तान आज शायद आर-पार की लड़ाई लड़ने की स्थिति में भी नहीं रह गये हैं। 1948 में जब वे लड़ सकते थे, तब नहीं लड़े, आज वे लड़ नहीं सकते, क्योंकि उन्हें परमाणु अस्त्रों का डर है। दोनों ही देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं। इसलिए छिटपुट युद्ध तो चल सकते हैं, लेकिन आर-पार की लड़ाई की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत यों भी अपनी युद्ध नीति में फिसड्डी है। उसकी सारी सुरक्षा तैयारी प्रतिरक्षात्मक है। उसने अब तक दुश्मन को मात देने के लिए अपनी कोई मौलिक रणनीति तक ईजाद नहीं की है। दुश्मन अपने हमले का तरीका बदलता है, तो हम अपनी प्रतिरक्षात्मक तकनीक बदलने की कोशिश में लग जाते हैं। हम किसी जवाबी कार्रवाई के लिए कभी नहीं सोचते। हमें शायद अपनी विशालता और संख्या बल का अधिक भरोसा है। दुश्मन कितनों को मारेगा? वह कितनों को ही मार डाले, कितना भी विनाश कर ले, हम तब भी बचे रहेंगे। हम अहिंसा के पुजारी हैं। हम शेर हैं, लेकिन शिकार न करने में शेर हैं। हमारा राष्ट्र चिह्न बौद्ध धर्म के प्रतीकों में से चुना गया है। चारों दिशाओं में मुंह करके पीठ सटाए बैठे सिंह के पांव तले घोड़े और बैल दौड़ रहे हैं। ये आराम फरमा रहे सिंह शाक्य सिंह (तथागत बुद्ध) के प्रतीक हैं। इन्होंने हिंसा का त्याग कर दिया है। ये अब धर्म चक्र के संरक्षक हैं।

लेकिन आज नहीं तो कल शायद इस देश को वह आर-पार की लड़ाई लड़नी ही पड़ेगी, जिसका संकेत महात्मा जी ने अब से 6 दशक पहले किया था। कश्मीर का विवाद अब बिल्कुल एक नये मोड़ पर आ गया है। अब वह सीमावर्ती क्षेत्र के केवल एक राज्य का मसला नहीं रह गया है। उसे अब एक राष्ट्रीय विवाद का रूप देने की कोशिश शुरू हो गयी हैै। कश्मीर अब केवल भारत-पाकिस्तान के बीच का विवाद नहीं रह गया है। अब यह कश्मीरी मुस्लिमों का भारत सरकार के खिलाफ युद्ध का रूप ले चुका है, जिसमें पाकिस्तान कश्मीरी मुसलमानों के अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी की भूमिका निभा रहा है। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि इस देश की सारी राष्ट्रविरोधी ताकतें मुस्लिम अलगाववादी ताकतों के साथ एकजुट हो गई हैं। बीते गुरुवार राजधानी दिल्ली के राजनीतिक सत्ताकेन्द्र के ठीक नाक के नीचे स्थित एल.टी.जी. (लिटिल थियेटर ग्रुप) आॅडिटोरियम में जो कुछ हुआ और जो कुछ देखा सुना गया वह देश के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक है। कला और संस्कृति के आयोजनों के लिए प्रसिद्ध इस सभागार में देश के विभाजन की आवाजें बुलंद की गईं। ’राजनीतिक कैदियों की आजादी के लिए समिति की ओर से इस सभाकक्ष में एक सेमीनार का आयोजन किया गया था जो कश्मीरी अलगाववाद पर केन्द्रित था। विषय था ’कश्मीर ः आजादी ही एक मात्र रास्ता है’ (कश्मीर ः आजादी द ओनली वे)। इसमें कश्मीरी अलगाववाद के समर्थक बुद्धिजीवियों के अलावा माओवादी तथा खालिस्थानवादी बुद्धिजीवी भी शामिल थे। कट्टरपंथी कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता अलीशाह गिलानी इस सेमीनार के मुख्य वक्ता थे। सेमीनार का संचालन कर रहे थे संसद पर हुए आतंकवादी हमले के मुख्य सूत्रधार समझे जाने वाले जामिया मिलिया के प्रोफेसर एस.ए.आर. गिलानी। प्रोफेसर गिलानी यद्यपि अदालत से रिहा हो गये थे, लेकिन उनके अलगाववादी उग्र विचारों से दिल्ली का शायद ही कोई बुद्धिजीवी अपरिचित हो। इस सेमीनार में उपस्थित प्रमुख लोगों में माओवादियों के समर्थन कवि वरवर राव, लेखिका अरुंधती राय, प्रो. अब्दुर्रहमान, प्रो. सुजाता राव, डॉ. शेख शौकत हुसैन, नजीब बुखारी तथा डॉ. एन. वेनु आदि के नाम गिनाये जा सकते हैं। दिल्ली के शैक्षिक संस्थानों में पढ़ रहे या पढ़ा रहे कश्मीरियों के अतिरिक्त उनके समर्थक छात्र व अध्यापक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

ऐसे सेमीनार में हुर्रियत नेता गिलानी क्या बोलेंगे इसका तो सभी को अनुमान था, लेकिन अरुंधती राय के वक्तव्य ने तो सबको चकित कर दिया। उन्होंने कश्मीर के अलगाववादी आन्दोलन को जनान्दोलन बताया और मंच से घोषणा की कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा। उन्होंने तो भारत को ‘उपनिवेशवादी देश’ तक कह डाला। उन्हें यह कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि भारत ने कश्मीर के सेना की ताकत पर अपना उपनिवेश बना रखा है। उन्होंने कश्मीर, नागालैंड तथा नक्सली आन्दोलन को जनान्दोलन की संज्ञा देते हुए कहा कि इन आन्दोलनकारियों की आवाज देश के अधिक से अधिक लोगों तक जानी चाहिए। उन्होंने यद्यपि विश्व हिन्दू परिषद को भी एक जनान्दोलन बताया, लेकिन साथ ही यह कहा कि विश्व हिन्दू परिषद का यह हिन्दू आन्दोलन ’सबके लिए न्याय के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, जबकि ये अलगाववादी आन्दोलन सबके लिए समान न्याय के सिद्धांत पर आधारित है।’

जैसा कि सेमीनार का विषय था गिलानी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आजादी ही कश्मीर समस्या के समाधान का एक मात्र रास्ता है। कश्मीर कोई भारत का आन्तरिक मामला नहीं है। वह एक अंतर्राष्ट्रीय मामला है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय ताकतों को भी इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। उनकी अमेरिका व ब्रिटेन से खासतौर पर अपील थी कि वे कश्मीर के मामले में भारत सरकार पर दबाव डाले कि वह कश्मीरी क्षेत्र से अपना नाजायज कब्जा तुरंत हटा ले। उन्होंने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए केन्द्र सरकार की बातचीत की कोशिशों को व्यर्थ की कवायद करार दिया। अभी भारत सरकार की ओर से जो तीन वार्ताकार नियुक्त किये गये हैं उनके बारे में गिलानी का कहना था कि यह भारत सरकार की केवल समय काटने की चाल है। उन्होंने कश्मीरियों से आग्रह किया कि वे इस वार्ताकार दल का बहिष्कार करें क्योंकि इनसे कुछ होने जाने वाला नहीं है। उनका कहना था कि अब तक वार्ता की जितनी भी कोशिशें की गईं वे सभी विफल हुई क्योंकि भारत सरकार इस समस्या का कोई समाधान करना ही नहीं चाहती। वह वार्ताकारों के नामपर कश्मीरियों को व्यर्थ में उलझाए रखना चाहती है।

गिलानी ने अपने आजाद कश्मीर राष्ट्र की एक रूप रेखा भी प्रस्तुत की। उनका कहना था कि आजाद कश्मीर एक सेकुलर राष्ट्र होगा, जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों की भी रक्षा की जाएगी। अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के उदाहरण स्वरूप उन्होंने बताया कि मुसलमानों के लिए तो राज्य में पूर्ण मद्यनिषेध रहेगा, किंतु जिनके मजहब में शराब पीने की अनुमति है, उन्हें शराब पीने की आजादी रहेगी। यदि कोई कट्टरपंथी मुस्लिम किसी अल्पसंख्यक की शराब की बोतल तोड़ देता है, तो या तो उस व्यक्ति से उसका हर्जाना दिलवाया जाएगा या फिर सरकार उस नुकसान की भरपायी करेगी। गिलानी का कहना था कि घाटी ही नहीं, जम्मू और लद्दाख के लोगों को भी भारत से आजादी चाहिए। इस सेमीनार में यह रोचक दृश्य था कि माओवादी वामपंथियों ने भी कश्मीरी अलगाववादियों के साथ् अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया। माओवाद के समर्थक कवि वरवर राव मंच पर सैयद गिलानी के ठीक बगल में विराजमान थे।

सभाकक्ष में अंदर व बाहर श्रोताओं-दर्शकों के बीच उपस्थित कुछ राष्ट्रवादी युवकों ने गिलानी तथा अरुंधती राय आदि के राष्ट्रविरोधी वक्तव्यों पर घेर आपत्ति जतायी। उन्होंने अलगाववादियों के विरुद्ध ’भारत माता की जय’, ’वंदेमातरम’, ’राष्ट्र एकता जिंदाबाद’ आदि के नारे लगाये, तो उनके जवाब में वहां उपस्थित अलगववादी समूह के युवकों ने ’वी वांट फ्रीडम’, ’गो इंडिया गो’, ’कौन करेगा तर्जुमानी-सैयद अली शाह गिलानी’ आदि नारे लगाये। सेमीनार आयोजकों के विरुद्ध हल्ला-गुल्ला बढ़ते देख पुलिस फौरन हरकत में आयी। उसने भारतीय एकता के नारे लगाते तथा भारतीय ध्वज लहराते युवकों को वहां से बलपूर्वक घसीटकर बाहर किया। सभाकक्ष के भीतर तथा बाहर करीब 40 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया।

इस सेमीनार पर देश के प्रायः सभी राजनीतिक दलों ने चुप्पी सी साध रखी है। केवल भारतीय जनता पार्टी ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि उसने ठीक अपनी नाक के नीचे अलगाववादियों को राष्ट्रद्रोही वक्तव्य देने का अवसर दिया है। उनका कहना था कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर राष्ट्रद्रोह या राष्ट्र के विभाजन की आवाज उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

गृहमंत्री पी. चिदंबरम का इस पर जवाब है कि दिल्ली की पुलिस सेमीनार में दिये गये वक्तव्यों का विश्लेषण कर रही है, यदि उसमें कोई ऐसा तत्व पाया गया, जो कानूनी दृष्टि से राष्ट्रद्रोह के अंतर्गत आता हो, तो ऐसा वक्तव्य देने वालों के खिलाफ अवश्य कार्रवाही होगी। सवाल है कि क्या गृहमंत्री को पता नहीं था कि इस सेमीनार में क्या होने जा रहा है। क्या यह कश्मीर की अशांति को पूरे देश में फैलाने की साजिश का अंग नहीं है। लोकतंत्र की सीमाओं को आखिर कहां तक खींचा जा सकता है।

भारत सरकार के नेतागण इसे स्वीकार करें या नहीं, लेकिन यह एक कड़वा सच है कि कश्मीर के मामले में क्रमशः भारत सरकार की स्थिति कमजोर पड़ती जा रही है। अमेरिका यदि आज खुलकर कश्मीर के मामले में पाकिस्तान का समर्थन नहीं कर रहा है, तो यह उसकी आर्थिक व राजनीतिक मजबूरी है, अन्यथा उसके अनेक नेता व अधिकारी अभी भी पाकिस्तानी पक्ष का समर्थन करते आ रहे हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता फिलिप क्राउले ने अभी कहा है कि यू.एस. यह मानता है कि कश्मीर एक परम मुद्दा (अल्टीमेट इशू) है, लेकिन उसे भारत-पाक को ही हल करना है। अभी बीते सप्ताह में ही वाशिंगटन में चल रही अमेरिका-पाकिस्तान रणनीतिक वार्ता के दूसरे दौर में अपना उद्घाटन वक्तव्य देते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा कि राष्ट्रपति ओबामा ने कश्मीर मुद्दे के समाधान का महत्व समझा है। इसका उन्होंने पहले वायदा भी किया था कि वह कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अपना विशेष दूत नियुक्त करेंगे। कुरैशी ने यह वक्तव्य अमेरिका मामले में कोई मध्यस्थता नहीं करेगा, जबकि अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन उनकी बगल में ही बैठी हुई थीं। कुरैशी का कहना था कि दक्षिण एशिया की शांति और स्थिरता में यू.एस. और पाक दोनों के साझा हित हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश कश्मीर की हाल की घटनाओं के कारण् इसके लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। इस रण्नीतिक बैठक में ही अमेरिका ने पाकिस्तान को दो अरब डॉलर की सैनिक साजो सामान की सहायता देने की घोषणा की।

यहां यह उल्लेखनीय है कि कश्मीर के बारे में पाकिस्तान ने अब एक नई नीति अख्तियार की है, जो आतंकवादी हमलों के आगे की है। आतंकवादी हमले तो अपनी जगह जारी ही रहेंगे, जिसे अब खुद भारतीय सुवक अंजाम देंगे। दूसरे कश्मीर के आंदोलनकारी अब हथियार छोड़कर आंदोलन के मैदान में उतरेंगे, तीसरे कश्मीर के आंदोलन को पूरे भरत के मुस्लिम समुदाय के साथ् जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। कश्मीरी युवकों द्वारा पथराव की रणनीति इस बदली नीति का ही अंग है। ये पथराव करने वाले युवक न तो बेरोजगार हैं, न गरीब हैं और न किराये के हैं। घटी में पुुलिस आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का हो अध्ययन किया गया है, उसके अनुसार उनमें कोई गरीब या बेरोजगार नहीं है। प्रायः सभी शिक्षित, अच्छे खाते-पीते परिवारों के, नौकरीपेशा या निजी रोजगार संपन्न परिवारों के हैं। कम से कम 70 प्रतिशत तो ऐसे हैं, जो किसी भी तरह किसी अभवग्रस्त वातावरण से नहीं आये हैं।

पथराव वस्तुतः उनके अहिंसक विरोध का माध्यम बन गया है। इसीलिए गिलानी कह रहे हैं कि ताजा आंदोलन में उनके पथराव से तो सुरक्षाबलों का कोई जवान नहीं मरा, जबकि उनकी गोलियों से 110 से अध्कि कश्मीरी युवक मारे जा चुके हैं। जब तक कश्मीरी आंदोलन हथियारबंद था, तब तक तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार का अवसर देना कठिन था, लेकिन अब आसानी से उसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आंदोलन से जोड़ा जा सकता है। पिछले दिनों दारूल उलूम देवबंद में जमायत-ए-उलेमाए हिन्द का कश्मीर के मसले को लेकर एक सम्मेलन हुआ। किसी भारतीय मुस्लिम मजहबी संगठन का कश्मीर को लेकर आयोजित यह शायद पहला सम्मेलन था, जिसमें यद्यपि कश्मीर समस्या का समाधान भारतीय संविधान के दायरे में तलाश करने की बात की गयी, लेकिन सम्मेलन का अधिक जोर इस बात पर था कि भारत का मुसलमान कश्मीर के प्रति इतना उदासीन क्यों है। यह सही है कि कश्मीरी मुसलमानों के प्रति पूरी सहानुभूति तथा उसे विशेष अधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रति पूर्ण समर्थन के बावजूद वह उसके देशमें कोई आवाज नहीं उठा रहा था। शायद उसने यह समझ रखा था कि पड़ोसी पाकिस्तान के नेता तथा कश्मीरी युवक स्वयं इसे निपट लेंगे। लेकिन अब बढ़ते अमेरिकी दबाव के आगे पाकिस्तान के हाथ पांव काफी कुछ बंध गये हैं, इसलिए अब समय आ गया है कि कश्मीरी अलगाववाद के समर्थन में देश के भीतर एक मुखर वातावरण बने। देवबंद में जमीयत उलेमाए हिन्द का सम्मेलन और दिल्ली में आयोजित सेमीनार इसी अभियान के अंग हैं।

पता नहीं भारत सरकार के नेतागण इसे समझ पा रहे हैं या नहीं अथवा समझ बूझकर भी उस तरफ से आंखें बंद किये हुए हैं, लेकिन यह सच्चाई है कि पाकिस्तान की नई रणनीति कश्मीरी अलगाववाद को देशव्यापी मुस्लिम संवेदना से जोड़ना है। पाकिस्तान के नेता हो या कश्मीरी अलगाववादी संगठनों के नेता, वे यह अच्छी तरह से स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी समस्या आर्थिक नहीं राजनीतिक है। उन्हें आर्थिक पैकेज और रोजगार के अवसर नहीं चाहिए। भारत सरकार यहां भी प्रतिरक्षात्मक भूमिका ही निभा रही है। वह पैकेज घोषित कर रही है, वार्ताकार नियुक्त कर रही है और आंदोलनकारी युवकों को गुमराह युवकों की संज्ञा दे रही है। वह साफ-साफ यह कहने का साहस नहीं कर पा रही है कि मजहब के आधार पर कश्मीर को भारत से अलग नहीं किया जा सकता। कश्मीर केवल मुसलमानों का नहीं है। भारत ने मजहब के आधार पर देश का एक विभाजन स्वीकार कर लिया, लेकिन अब दूसरा कतई स्वीकार नहीं करेगी। वह गांधी जी की तरह यह कहने की स्थिति में नहीं है कि भले इसके लिए हमें कोई आर-पार की लड़ाई ही क्यों न लड़नी पड़े। लेकिन हमारे देश की सरकारों में यह ताकत तभी पैदा हो सकती है, जब वे मजहब की राजनीति से अपने को उपर उठा सकें। देवबंद में हुई उलेमाओं की बैठक और नई दिल्ली में हुई सेमीनार भरत के क्षितिज पर उभरे भविष्य की चेतावनी के अभिलेख हैं। इन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। यदि अभी भी शुतुरमुर्गी नीति अपनायी गयी, तो देश का केवल एक विभाजन ही नहीं, विखंडन की एक श्रृंखला शुरू हो जाएगी, जिसे रोकना फिर शायद किसी के वश में न रह जाए। (24-10-2010)



बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

विजयदशमी के संदर्भ में
सार्वभौम मानवीय आदर्शों के प्रतीक पुरुष हैं श्रीराम



भगवान श्रीराम इस धरती पर पैदा हुए या नहीं या कब पैदा हुए, यह सब हम नहीं जानते। कोई इतिहासकार भी नहीं जानता। लेकिन उनकी ऐतिहासिकता प्रमाणित करने के लिए क्या इतना काफी नहीं कि प्राचीन विश्व साहित्य का कम से कम आधे से अधिक भाग केवल राम या रामकथा पर आधारित है? क्या आदिकवि वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक के रामकथा गायकों पर अकारण अविश्वास करने का कोई औचित्य है। फिर ऐतिहासिक राम जैसे भी रहे हों, वे हुए हों या न हुए हों, इससे हमें लेना-देना ही क्या है। हम तो वाल्मीकि के राम को या उनसे भी अधिक तुलसीदास के राम को जानते हैं, जिनका धरती पर जन्म संपूर्ण मनुष्यता की या संपूर्ण मानवीय आचरण के आदर्शों की रक्षा के लिए हुआ। वह भारत के सार्वभौम मानवीय संस्कृति के एक आदर्श प्रतीक हैं। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम या देशी-विदेशी में विभक्त नहीं किया जा सकता। तो फिर इसे स्वीकार करने में इस देश की सरकारों, राजनेताओं, बुद्धिजीवियों तथा धर्माधिकारियों को आखिर क्यों आपत्ति है।


तमाम अन्य वार्षिक पर्वों-त्यौहारों की तरह दशहरा भी हर वर्ष आता रहता है। इस बार भी आया है। आज नवरात्रि पर्यंत पूजित दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन हो जाएगा। शाम को रावण के पुतले जलाएं जाएंगे और असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और अधर्म पर धर्म के विजय स्वरूप राम के विजय की एक बार और घोषणा हो जाएगी। लेकिन यह पारंपरिक भारत की कथा है, आधुनिक भारत यानी 'इंडिया'  के लिए यह हिन्दुओं का एक पुराना नाटकीय उत्सव है, जो हिन्दू 'माइथलॉजी' से जुड़ा है और हिन्दू आस्थ वाले लोग इसे हर साल मनाते हैं। राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री इस अवसर पर उसी तरह बधाई संदेश जारी कर देते हैं, जिस तरह ईद या क्रिसमस पर जारी किया करते हैं। कल तक जो एक राष्ट्रीय, सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना जागृत करने वाला समारोह था, वह आज एक धर्म विशेष (हिन्दू) का एक वार्षिक नाट्योत्सव बनकर रह गया है।

राम और रामकथा को लेकर इस देश में आम लोगों, बुद्धिजीवियों, राजनेताओं तथा न्यायविदों की कैसी-कैसी और क्या-क्या धारणाएं हैं, उसको जानने समझने का एक बहुत अच्छा माध्यम है अयोध्या का राम जन्मभूमि व बाबरी मस्जिद विवाद। एक विवाद को लेकर इस देश् में जितना कुछ लिखा या कहा गया है या जितने लेख व पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, उतनी शायद ही किसी दूसरे विषय को लेकर प्रकाशित हुई हों। न्यायालय में चलने वाला तो यह देश् का सबसे लंबा विवाद है ही।

अभी करीब 6 दशकों की लंबी प्रतीक्षा के बाद इस मामले में उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट का एक फैसला सामने आया। करीब पांच सौ वर्षपुराने विवाद में आया यह पहला न्यायिक फैसला है। इस फैसले में यद्यपि बहुत सी विसंगतियां भी हैं   लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से प्रमाणित की गयी है कि अयोध्या का विवादित स्थल राम जन्मभूमि के रूप में जाना जाता था। वहां पर एक मंदिर थ, जिसके कस्बे के उपर 1528 में एक मस्जिद का निर्माण कराया गया। चूंकि मस्जिद के निर्माण के पूर्व वहां एक मंदिर थ, इसलिए उस पर हिन्दुओं का अधिकार है। अब इसका क्या प्रमाण है कि वह स्थान राम का जन्मस्थान ही था, इसके लिए न्यायपीठ के तीनों न्यायाधीशों ने हिन्दुओं के पारंपरिक विश्वास को ही प्रमाण माना है और कहा कि मस्जिद निर्माण के पूर्व अज्ञात काल से हिन्दू उसे राम का जन्म स्थान मानते आए हैं, इसलिए उसे राम का जन्म स्थान ही माना जाना चाहिए और उस पर हिन्दुओं का अधिकार स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि राम को हिन्दू ही अपना भगवान मानते हैं। आश्चर्य है कि यह फैसला आने के बाद न्यायालय में पूर्ण आस्था का दावा करने वाले तथा न्यायिक फैसले की खिल्ली उड़ा रहे हैं और न्यायाधीशों पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने तथ्यों व प्रमाणों की अनदेखी करके विश्वास के आधार पर फैसला दिया है। न्यायालय, न्याय के नियमों, कानूनों व सबूतों के आधार पर काम करता है, विश्वास के आधार पर नहीं। देश कानून के सहारे चलेगा, विश्वास के सहारे नहीं। मुस्लिम पक्ष एवं वामपंथी बुद्धिजीवी, पत्रकार एवं इतिहासकार न्यायाधीशें पर यह भी आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने इतिहास के तथ्यों की भी अनदेखी की है। उन्होंने 1949 व 1992 में किये गये अपराधों की तरफ से भी आंखें बंद रखी हैं। वे किसी 'टाइटिल सूट'  (मालिकाना हक निर्धारित करने वाले मुकदम) का फैसला पारंपरिक विश्वासों के आधार पर नहीं कर सकते। सत्ताधरी वर्ग के लोग चुप हैं। लोग चाहे आपस में लड़ लें या न्यायालय में लड़ लें, जब तक उनके अपने राजनीतिक हितों के लिए कोई समस्या नहीं खड़ी होती, तब तक वे क्यों जबान खोलें। अभी तो बीच में सर्वोच्च न्यायालय की एक दीवार खड़ी है। जब यह मसला उसे भी पार करके आगे आएगा, तब देखा जाएगा। देश के तमाम बुद्धिजीवी, पत्रकार व इतिहासकार जब यों ही उसका काम करने लगे हों, तो उसे नाहक अभी बीच में पड़ने की क्या जरूरत।

अब इन बुद्धिजीवियों को कौन समझाए कि इस देश में जिस संविधान, जिस लोकतंत्र और जिस न्याय परंपरा को स्वीकार किया गया है, उसमें 'फेथ' या विश्वास को ही सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यदि ऐसा न होता, तो राजनीति और समाज व्यवस्था का प्रधान तत्व धर्म (रिलीजन) न बनता। यहां 'रिलीजन' या 'फेथ' का जितना सम्मान है, उतना और किसी चीज का नहीं। कहने को यह व्यवस्था 'सेकुलर' (धर्मनिरपेक्ष) है, लेकिन व्यवहार में यह 'सर्वधर्मवादी' यानी सभी धर्मों व विश्वासों के आगे सिर झुकाने वाली है, फिर वह धर्म या विश्वास चाहे गलत हो या सही। किसी भी 'धर्म' या उसके विश्वास पर उंगली उठाना कानूनन अपराध् है। समाज और राजनीति में ही नहीं, कानून और न्याय में भी ‘धर्म‘ और ‘विश्वास‘ (फेथ) को प्रमुखता दे दी गयी है। इसलिए यदि किसी को सत्ता, राजनीति व न्याय व्यवस्था का लाभ उठाना है, तो उसके लिए ‘धर्म‘ और ‘विश्वास‘ का रास्ता सबसे आसान बना दिया गया है। और यहां का बुद्धिजीवी समाज अपनी सुविधानुसार कभी उसका समर्थन करता है, तो कभी आलोचना। और दोनों के लिए ही उसके पास यथेष्ठ तर्क होते हैं। अयोध्या की समस्या वस्तुतः राजनीतिक है, धार्मिक नहीं, लेकिन राजनीतिक स्तर पर समाधान न हो पाने के कारण उसे धार्मिक रूप देना पड़ा, क्योंकि देश् की वर्तमान व्यवस्था राजनीति व समाज से अधिक धर्म से डरती है, उसके आगे झुकती है। न्याय व्यवस्था भी इतिहास व संस्कृति को कम महत्व देती है, धर्म को अधिक। यह एक ऐतिहासिक व पुरातात्विक सत्य है कि मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं ने यहां के अधिकांश मंदिरों को तोड़ा और उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण कराया। यत्र-तत्र जहां भी मूर्तियां दिखायी पड़ीं, उन्हें अंग-भंग किया। किसी भी देश या जाति को रौंदने का सबसे आसान तरीका होता है उसकी संस्कृति व उसके विश्वास को रौंदना। भारत में हजारों वर्षों तक यही होता रहा। आक्रमणकर्ताओं ने अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम करने के लिए तलवार के साथ अपने रिलीजन का भी इस्तेमाल किया।

पारंपरिक भारतीय समाज 'जिसे आज हिन्दू कहा जाता है' 1528 से अब तक यदि अयोध्या की राम जन्मभूमि के लिए लड़ता आ रहा है, तो उसका लक्ष्य न तो धर्म है न कोई जमीन का टुकड़ा, वह वास्तव में अपना वह सांस्कृतिक सम्मान वापस पाना चाहता है, जिसे एक विदेशी हमलावर ने पांच सौ साल पहले रौंद डाला था। मसला शुद्ध राजनीतिक है। भारत का पारंपरिक समाज वस्तुतः आज तक अपनी सांस्कृतिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर सका है। इस्लामी शसन के बाद अंग्रेजी शासन आ गया और जब इन दोनों से स्वतंत्रता पाने का अवसर आया तो भी उसे अपनी सांस्कृतिक स्वतंत्रता हासिल नहीं हो सकी। वह आज भी उसके लिए तड़प रहा है।

वास्तव में भारतीय दार्शनिक परंपरा विश्वास (फेथ) पर नहीं तर्क पर आधारित रही है, फिर भी उसे विदेशियों से अपना अधिकार पाने के लिए विश्वास को अपना हथियार बनाना पड़ा। इस्लामी काल में भारतीय राजे-रजवाड़े अयोध्या के राम मंदिर के लिए लड़ रहे थे, तो उसके लिए उन्हें किसी तर्क का सहारा लेने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि तब कोई उसका तर्क सुनने वाला नहीं था। उसके हमले सीधे उस राम मंदिर स्थल पर कब्जे के लिए हो रहे थे। अंग्रेजों के शासनकाल में स्थिति बदल गयी। राजे-रजवाड़े या तो लड़-भिड़कर हार गये या अंग्रेजों के भक्त बन गये। तब अंग्रेजों के सामने आम भारतीयों ने अपने विश्वास को लेकर फरियाद शुरू की और लगातार अपने पिछले संघर्ष का हवाला दिया। मुस्लिम भी उनके सामने अपने विश्वास की दुहाई दे रहे थे और हिन्दू भी। तो अंग्रेजों ने मस्जिद परिसर के बीच एक दीवार खड़ी करके बाहरी हिस्से में हिन्दुओं को पूजा करने का अधिकार दे दिया। वे एक चबूतरा बनाकर वहां पूजा करने लगे। कहा जाता है कि अंग्रेजों के जमाने में उनके डर से शेर-बकरी दोनों एक घाट पर पानी पीते थे, तो यही हाल अयोध्या के हिन्दू-मुसलमानों का रहा। यहां से आगे के इतिहास की कहानी प्रायः सबको पता है, इसलिए विस्तार में जाने की जरूरत नहीं, लेकिन मुख्य कथ्य यह है कि हिन्दुओं ने केवल अपना सांस्कृतिक सम्मान वापस पाने के लिए विश्वास का सहारा लिया। क्या आज के हिन्दू को पता नहीं है कि वास्तव में भगवान राम कहां पैदा हुए थ्े, उस जमीन की पहचान का कोई अर्थ नहीं है। उसे यह भी पता है कि उसका धर्म किसी एक मंदिर या एक जमीन के टुकड़े पर नहीं टिका है। मंदिर के स्थान पर मस्जिद बन जाने से कोई हिन्दू धर्म नहीं नष्ट हुआ जा रहा है। वहां शौचालय बन जाए, तो भी धर्म को कोई क्षति नहीं पहुंचने जा रही है, लेकिन उससे हिन्दू समाज का सामूहिक स्वाभिमान जरूर आहत होगा। बाबर के या औरंगजेब के हमलों में अयोध्या, काशी या मथुरा के राम, शिव व कृष्ण मंदिरों के ध्वस्त कर दिये जाने से राम, कृष्ण या शिव का कुछ नहीं बिगड़ गया, लेकिन भरतीय समाज जब उन्हें अपने वर्तमान स्वरूप में देखता है, तो उसका चित्त अवश्य आहत होता है।

इन स्थलों का राजनीतिक आधार पर फैसला कर दिया जाना चाहिए था। इनके लिए कोई प्रमाण ढूंढ़ने की जरूरत नहीं थी। उपर्युक्त स्थलों पर खड़ी इमारतें स्वयं अपने इतिहास की प्रमाण थी। जरूरत केवल इस बात की थी कि उनके सत्य को स्वीकार किया जाता। भारतीय समाज ने स्वातंत्र्य आंदोलन काल में स्वतंत्रता के संघर्ष पर ध्यान केंद्रित किया। 1857 में बाबरी मस्जिद परिसर के बंटवारे और उसके बाहरी आंगन में राम की मूर्ति पूजा के लिए चबूतरे की स्थापना के बाद हिन्दू पूरे समय शांत रहा। उसने कोई हिंसक कार्रवाई नहीं की। 1885 में निर्मोही अखाड़े की तरफ से कानूनी स्तर पर मांग की गयी कि उसे चबूतरे पर एक पक्का मंदिर बनाने की इजाजत दे दी जाए (क्योंकि वहां केवल घास-फूस की टट्टी लगाकर- जो 5 फुट से अधिक उंची न हो- मूर्ति पूजा की इजाजत मिली थी), लेकिन शसन ने इस मांग को अस्वीकृत कर दिया। हिन्दू फिर चुप हो गये। शायद वे देश के स्वतंत्र होने की प्रतीक्षा में लग गये। उन्होंने मस्जिद पर अधिकार करने या घास फूस की छोटी-सी झोपड़ी (जिसमें सीधे खड़ा भी नहीं हुआ जा सकता था) को पक्का करने की भी कोशिश नहीं की। 1912 और 1936 में अयोध्या में जो दंगे हुए, वे भी मस्जिद पर कब्जे के लिए नहीं हुए, बल्कि रामनवमी के अवसर पर पड़ी बकरीद के अवसर पर वहां के डिप्टी कमिश्नर द्वारा मुसलमानों को गाय की कुर्बानी देने की इजाजत के विरोध में हुए। हां उसमें हमले का निशाना मस्जिद जरूर बनी। लेकिन इसकी सजा पूरी अयोध्या के हिन्दुओं को मिली। उनसे दंडात्मक कर वसूल कर मस्जिद के क्षतिग्रस्त गुम्बदों की मरम्मत करायी गयी।

हिन्दू समाज ने 15 अगस्त 1947 तक प्रतीक्षा की। मजहब के नाम पर देश बंटवारा हो गया। इसके बाद तो उसे पूरा भरोसा था कि अब तो उसका पुराना मंदिर स्थल अवश्य मिल जाएगा। लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब उसका धैर्य जवाब देने लगा। अयोध्या के हिन्दुओं ने एक नितांत शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया। मस्जिद में जाने वाले मुस्लिम मबूतरे वाले मंदिर के सामने से जूता पहनकर निकलते थे। तो सबसे पहले इसके खिलाफ आंदोलन श्ुरू हुआ। प्रशासन ने इस पर जूते बाहर उतारे जाने की व्यवस्था की। इसके बाद शासन का ध्यान आकृष्ट करने के लिए अयोध्या के साधु संत व गृहस्थ सबने सामूहिक रामचरित मानस पाठ का आयोजन श्ुरू किया। इस शांतिपूर्ण आंदोलन को किसी ने नोटिस नहीं किया। निर्मोही अखाड़े के रामचरण दास नाम के एक साधु ने मस्जिद को बम से उड़ा देने की योजना बनायी, लेकिन वह बम बनाते समय ही फट गया, जिससे न केवल वह योजना विफल हो गयी, बल्कि वह साध्ु भी अंधे हो गये। प्रशासन ने इसके बाद भी इस विवाद की ओर कोई ध्यान नहीं दिया, तो एक रात (22/23 दिसंबर 1949) को कुछ लोगों ने मिलकर राम की छोटी सी प्रतिमा मस्जिद के बीच वाले गुम्बद के नीचे स्थापित कर दी। मध्यरात्रि में वहां घंटा, घड़ियाल व शंख बजने लगे। -भये प्रगट कृपाला- की स्तुति होने लगी। कहा गया कि वहां मध्य रात्रि में 'रामलला' (बाल रूप भगवान राम) स्वयं प्रगट हो गये।

आखिर ऐसा क्यों करना पड़ा ? कारण स्पष्ट था। सरकार किसी तर्क, किसी इतिहास, किसी सांस्कृतिक भवना को मानने के लिए तैयार नहीं थी, किंतु आस्था के आगे झुकने को मजबूर थी। हिन्दू जानता है कि इस तरह कहीं मूर्तियां प्रकट नहीं होतीं। हिन्दू परंपरा स्वयं यह कहती आ रही हैं कि राम के बाद उनकी अयोध्या अब तक जाने कितनी बार उजड़ चुकी है। अयोध्या की पुनर्स्थापना की उसकी कहानी भी यही बताती है कि उसे नहीं पता था कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहां पैदा हुए थे, अयोध्या कहां थी। वह राजा विक्रमादित्य को इसका श्रेय देती है कि उन्होंने अयोध्या की खोज की और वहां 'शारंगिन विष्णु' (क्योंकि उस समय धनुर्धारी राम को विष्णु का अवतार माना जाता था) का मंदिर बनवाया। जाहिर है कि वह मंदिर स्थल भगवान राम के जन्म स्थान का माद्ध प्रतीक था, लेकिन हजारों साल पहले जो प्रतीक स्थापित हुआ था, उसका यदि आज भी सम्मान किया जाए, तो उसमें गलत क्या है।

1949 की इस घटना के बाद के सारे प्रशासनिक पत्राचार इसके प्रमाण हैं कि स्वतंत्र भारत की भी केंद्र व राज्य की सरकार जो इतिहास व जातीय स्वाभिमान के तर्क को नकारती आ रही थी- वह आस्था के दांव के आगे झुक गयी। उसने स्वयं वहां जबरिया चोरी से रात्रि में स्थापित प्रतिमा की पूजा अर्चना की व्यवस्था की और पूरे स्थल की सुरक्षा का भी प्रबंध किया। 1949 में जो कुछ हुआ वह कोई राजनीतिक षड्यंत्र नहीं था। वह शताब्दियों से आहत और पराजित हिन्दू मानस की एक अहिंसक प्रतिक्रिया थी। शासन को इधर ध्यान देना चाहिए था, लेकिन उसने इसकी उपेक्षा की, जिसकी स्वाभाविक परिणति दिसंबर 1992 में हुई। वह कभी न कभी होनी ही थी। संयोगवश वह 1992 में हो गयी।

अभी कुछ दिन पहले ही कानून व इतिहास के पंडित ए.जी. नूरानी द्वारा संपादित एक किताब 'बाबरी मस्जिद' प्रकाशित हुई। इसमें इस विवाद से जुड़ी घटनाओं तथा दस्तावेजों का बड़ा ही ब्यौरेवार संकलन दिया गया है। उनके निष्कर्षों को छोड़ दें, तो तथ्यों का इतना विस्तृत संकलन अन्यत्र दुर्लभ है। इसके अनुसार 1949 में मस्जिद में मूर्ति स्थापित किये जाने की घटना के बाद प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल, गवर्नर जनरल सी. राजगोपालचारी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत तथ अपने नजदीकी दोस्त के.जी. मशरूवाला सहित कई लोगों को लिखे अपने पत्र में इस घटना पर अपना गहरा क्षोभ व्यक्त किया था। दिसंबर 29, 1949 को पंत के नाम भेजे गये अपने एक टेलीग्राम में उन्होंने उसे एक 'खतरनाक उदाहरण' (डेंजरस इक्जाम्पल) बताया था, जिसके बड़े बुरे परिणाम (बैड कांसिक्वेंस ) होंगे। 5 मार्च 1950 को मशरूवाला को लिखे गये पत्र में नेहरू ने स्वीकार किया कि फैजाबाद जिले के अधिकारियों ने ठीक व्यवहार नहीं किया (मिस बिहैव्ड)। उन्होंने आगे यह भी लिखा कि यद्यपि पं. पंत ने बाद में कई अवसरों पर इस घटना की निंदा की, लेकिन उन्होंने इस पर कोई पक्की कार्रवाई करने से परहेज किया (हि रिफ्रेंड फ्राम टेकिंग डेफिनिट एक्शन)। 17 अप्रैल 1950 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम लिखे गये अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने लिखा कि -उत्तर प्रदेश मेरे लिए एक विदेशी भूमि होता जा रहा है। मैं देख रहा हूं कि जो लोग कभी कांग्रेस के स्तंभ थे, उनके भी दिलो

'दिमाग पर सांप्रदायिकता हावी होती जा रही है। यह पैरालिसस जैसा रोग है, जो फैलता जा रहा है, लेकिन (विडंबना यह है कि) रोगी इसे महसूस भी नहीं कर पा रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि कारण जो भी हों, या हो सकता है मात्र राजनीतिक कारणों से हम लोग इस बीमारी के प्रति बहुत अधिक नरमी बरत रहे हैं।'
कांग्रेस में वास्तव में सभी नेहरू नहीं थे। अयोध्या में मस्जिद के भीतर मूर्ति स्थापित किये जाने की खबर जब नेहरू को मिली, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि उसे वहां से हटाकर बाहर फेंक दिया जाए। उन्होंने गोविंद वल्लभ पंत को इसके लिए कहा भी और लिखा भी। पंत जी ने नेहरू के निर्देशों के अनुपालन में फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर को उस तरह का पत्र भी लिखा। जवाब में डिप्टी कमिश्नर के.के. नैयर ने भी पत्र लिखकर अपनी असमर्थता व्यक्त की। उन्होंने हिन्दू भावनाओं का हवाला देते हुए यथास्थिति बनाये रखने का समर्थन किया। पंत जी ने भी उसे मान लिया। केंद्रीय गृहमंत्री पटेल ने भी पंत को पत्र लिखा। मतलब यह कि कागजी खानापूरी हर स्तर पर हुई, किंतु मूर्ति हटाने की कार्रवाई किसी ने नहीं की। नेहरू खुद तो आकर उसे हटा नहीं सकते थे। इससे स्पष्ट है कि भले ही उस घटना के लिए अयोध्या के कुछ साधुओं और डिप्टी कमिश्नर के.के. नैयर को दोषी ठहरा दिया जाए, लेकिन सच्चाई यह थी कि कांग्रेस में भी नेहरू के अलावा और कोई नहीं था, जो मूर्ति हटाने का समर्थन करता।

इससे क्या अर्थ निकलता है ? क्या वे सब किसी राजनीतिक षड्यंत्र में शामिल थे? जी नहीं। के.के. नैयर के बाद में जनसंघ में शामिल हो जाने मात्र से यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि यह जनसंघ का षड्यंत्र था। यह वह व्यापक हिन्दू मानसिकता थी, जो मस्जिद पर खुद जाकर कब्जा करने का साहस तो नहीं कर सकती थी, लेकिन जैसे भी यदि किसी समूहने यह साहस कर दिखाया, तो फिर यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में स्थानीय ही नहीं, दिल्ली तक के प्रशासनिक नेता खड़े हो गये।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में तो न्यायमूर्ति अग्रवाल ने यहां तक लिखा है कि -इस मामले के फैसले में उपर्युक्त मूर्तिस्थापना की कोई कानूनी प्रासंगिता नहीं है। क्योंकि भगवान राम की 'जन्मभूमि' स्वयं में एक 'पूजाई प्रतिमा' (डीटी) के रूप में सारे न्यायिक अधिकारों से संपन्न है, क्योंकि हिन्दू विश्वास के अनुसार अज्ञातकाल से अनवरत निर्बाध उस स्थल पर पूजा होती आ रही है।'

यह इस देश की न्यायिक व्यवस्था का परिणाम है कि न्याय चाहने वाले व्यक्ति को कानूनी जरूरतें पूरी करने के लिए अनिवार्यतः झूठ बोलना पड़ता है। जिस देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला के 'मित्र' (नेक्स्ट फ्रेंड) के रूप में याचिका दायर की, उन्होंने देश के कानून का इस्तेमाल करने के लिए ही अपने को इस तरह प्रस्तुत किया। हाईकोर्ट में उनकी याचिका और उनके तर्क सर्वाधिक भारी पड़े, जिसके आधार पर रामलला को विवादित स्थल का एकमात्र केंद्रीय अधिकारी माना गया।

यहां कहने का आशय यह है कि उपलब्ध कानून के सहारे न्यायालय से न्याय प्राप्त करने के लिए इस तरह के झूठ और विश्वास का सहारा लेना पड़ता है। अब इस पर न्यायालय पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह एक राजनीतिक मसले को विश्वास का जामा पहनाकर फैसला लिख रहा है।

सच्चाई यह है कि अपवादों को छोड़कर यह पूरा देश दोहरे चरित्र वाला बन गया है और दोहरा जीवन जी रहा है। इसके लिए उसे मजबूर किया है इस देश् के संविधान व इस देश के कानून व इस देश की राजनीतिक व्यवस्था ने, जो केवल कहने को सेकुलर है, अन्यथा पूरी तरह धर्माश्रयी (रिलीजन पर आधारित) बन गयी।

आज जरूरत वास्तव में इस बात की थी कि इस मामले में सरकार स्वयं सामने आती और सभी धार्मिक (रिलीजन) व सांप्रदायिक पक्षकारों को अलग करके यह घोषित करती कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम भारत ही नहीं, पूरे सभ्य संसार के सर्वाधिक सम्मानित इतिहास पुरुष हैं। यदि वह कल्पित पुरुष हैं, तो भी उनके जैसा दूसरा चरित्र दुनिया में कोई नहीं। विश्व साहित्य में रामकथा जैसी व्यापकता दूसरे किसी मानवीय, दैवी या कल्पित पात्र को नहीं मिल सकती है। राम भरतीय संस्कृति के मूर्तमान स्वरूप हैं। उन्हें बाहर करके भरतीय संस्कृति का कोई मूल्य ही शेष नहीं बचता। ऐसे व्यक्तित्व को यदि सरकार भारत के राष्ट्र पुरुष के रूप में स्वीकार कर ले, तो इसमें दोष क्या है। राम किसी सांप्रदायिक नेता का तो नाम नहीं। वह तो पूरे विश्व की मनुष्यता के आदर्श पुरुष हो सकते हैं। इसलिए अयोध्या की विवादित भूमि जो इस समय सरकार के ही कब्जे में है, उस पर राम का ऐसा स्मारक बनवाती, जो किसी धर्म संप्रदाय के लिए वर्जित क्षेत्र न होता। राम के नाम पर होने वाली राजनीति यदि बंद करनी है, तो राम का सार्वभैमीकरण कर लिया जाना चाहिए और अयोध्या में उनका स्मारक बनाने का काम स्वयं अपने हाथ में ले लेना चाहिए।

हर वर्ष दशहरा या विजयदशमी को असत्यपर सत्य, अन्याय पर न्याय व अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है, क्या इस बार यह संकल्प नहीं लिया जा सकता कि इस दशहरा के पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट का जो फैसला आया है, उसके परिप्रेक्ष्य में संकीर्ण सांप्रदायिकता व दलीय स्वाथर्् को पराजित करके अयोध्या में एक सार्वभौम श्रीराम स्मारक का निर्माण किया जाए, जो पूरी विश्व मानवता के लिए आदर्श और भविष्य का पथप्रदर्शक हो।


17/10/2010

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

अधिनायकवाद विरोधी स्वर को मिला नोबेल पुरस्कार


                                                             लिऊ जियाबो अपनी पत्नी के साथ

इस बार नोबल का साहित्य व शांति पुरस्कार प्राप्त करने वालों में एक विशिष्ट समानता है कि दोनों ही मूलतः लेखक हैं। दोनों ही मानवाधिकारवादी हैं तथा दोनों स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए समर्पित हैं। पेरू (द. अमेरिका)  के स्पेनिश साहित्यकार मैरियो वेरगास लोसा स्पेनिश भाषी दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त साहित्यकार हैं। वह वैयक्तिक स्वतंत्रता के सबसे बड़े पक्षधरों में गिने जाते हैं। साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वह पहले पेरूवासी हैं। उधर शांति का नोबेल पुरस्कार चीन के विद्रोही लेखक व राजनीतिक कार्यकर्ता लियू जियाबो को प्राप्त हुआ है, जो इस समय चीन की जेल में कैद हैं। उनका अपराध है कि वह चीनी अधिनायकवाद के विरुद्ध लोकतंत्रवादी आंदोलन चला रहे हैं और वह उस 'नागरिक घोषणा पत्र 2008' के सह लेखक हैं, जो चीन में मानवीय स्वतंत्रता व लोकतंत्र का आह्वान करने वाला सर्वाधिक चर्चित दस्तावेज है।

नोबेल साहित्य व शांति पुरस्कारों के चयन को लेकर प्रायः कुछ न कुछ विवाद खड़ा होता रहा है, लेकिन इस बार पेरू के प्रतिष्ठित लेखक मैरियो वरगास लोसा के नाम की साहित्य के पुरस्कार के लिए घोषणा हुई, तो पूरी दुनिया में एक स्वर से स्वागत किया गया । शांति के पुरस्कार के लिए चीन के मानवाधिकारवादी विद्रोही नेता लियू जियाबो के नाम की घोषणा का भी पूरे विश्व में स्वागत किया गया। हां, इस घोषणा से स्वयं चीन जरूर आग बबूला हो उठा और इसके लिए न केवल नार्वे की उन नोबेल चयन समिति को खरी खोटी सुनायी, बल्कि नार्वे सरकार को भी धमकी दी कि इससे दोनों देशों के संबंध खराब हो सकते हैं। चीन के विदेश विभाग ने अपनी अत्यंत तीखी प्रतिक्रिया में कहा कि यह नोबेल पुरस्कार और उसी भावना का अपमान है। यह एक ऐसे अपराधी को दिया गया है, जिसे चीन के न्याय विभाग ने चीनी कानून के उल्लंघन का दोषी पाया है और उसे 11 वर्ष के कैद की सजा दी है।
यहां उल्लेखनीय है कि मैरियो लोसा और लियू जियाबो को यद्यपि अलग-अलग उपलब्धियों के लिए नोबेल सम्मान के लिए चुना गया है, लेकिन मूलतः दोनों ही लेखक हैं और दोनों ही मानवाधिकारों के सम्मान के लिए राजनीतिक परिवर्तनों के पक्षधर हैं। यह बात अलग है कि लोसा को जहां उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियों के लिए सराहा गया है, वहीं लियू को सीधे संघर्ष के लिए।
74 वर्षीय लोसा एक महान कथाकार ही नहीं, निबंधकार, नाटककार, पत्रकार और सांस्कृतिक टिप्पणीकार भी हैं। उनके 30 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। वह इन उपन्यासों की कथावस्तु के अलावा अपने अनूठे शिल्प के लिए भी प्रसिद्ध हैं। उन्हें दैवी प्रतिभा संपन्न कथाकार माना जाता है। समकालीन राजनीति व समाज उनके लेखन के मुख्य विषय हैं। वह ऐसे जनपक्षकार बुद्धिजीवी हैं, जो यह मानते हैं कि रोजमर्रा के महत्वपूर्ण मुद्दों से लेखक का अनिवार्यतः सरोकार होना चाहिए। उन्हें एक अत्यंत मुखर राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में भी जाना जाता है। राजनीतिक बदलाव की आकांक्षावश एक बार उन्होंने पेरू के राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा था। वह थोड़े मतों से हार गये थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी और लेखन पर ही अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। देश या समाज की राजनीति व संस्कृति को आकार देने में कलम की शक्ति के प्रति उनमें दृढ़ विश्वास है। यह विश्वास ही उनके लेखन की मूल अंतर्धारा है। नोबेल पुरस्कार के उनके प्रशस्ति पत्र में साफ लिखा गया है कि उन्हें यह सम्मान -सत्ता के ढांचे की संरचना तथा वैयक्तिक प्रतिरोध, विरोध और पराजय के उनके तीखे बिम्बों- के लिए दिया जा रहा है।
यह पेरू के लिए साहित्य का पहला नोबेल पुरस्कार है, लेकिन सच यह है कि लोसा ने पेरू को वैश्विक सम्मान दिलाया है। वह अपने को राष्ट्रीय सीमाओं के परे एक विश्व नागरिक मानते हैं। उनकी राजनीतिक विचारधारा में यद्यपि बदलाव आता रहा। वह वामपंथी से धीरे-धीरे दक्षिण-मध्यमार्गी बन गये, लेकिन उनका यह विश्वास कभी नहीं बदला कि किसी भी राष्ट्रीय या समाज के जीवन में कहानी एवं साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है और इसके बिना कोई भी विवेकशील मेधा $क्रिटिकल माइंड$ जो ऐतिहासिक परिवर्तनों का वास्तविक इंजिन तथा स्वतंत्रता की सर्वोत्तम संरक्षिका होती है, अपनी कोई सार्थक भूमिका नहीं अदा कर सकती। कहानी कहना या कहानी लिखना स्थूलतया केवल अपने समाज और दुनिया से जुड़ने का माध्यम है, किंतु लोसा की चिंताएं बहुत ठोस और वास्तविक हैं। उनकी कथाशैली की बुनावट भले ही जटिल हो तथा उसमें दर्शन का भी पुट हो, लेकिन वे हमेशा समकालीन विषयों व चिंताओं को ही अपने लेखन में उठाते हैं। उन्होंने बाद में पेरू छोड़ दिया। उनका कहना था कि उनके लिए सभ्यता का यदि कोई मूल आधार है, तो यही कि वह विश्व नागरिक बनें। उनके इस कथन का यह आशय नहीं था कि वह पेरू से निराश थे, लेकिन एक अत्यंत संवेदनश्ील तथा जागरूक लेखक के तौर पर उनकी आधारभूत कल्पना यही थी कि मनुष्य मनुष्य के बीच भेद की रेखाएं न हों, उनके बीच कोई राजनीतिक या राष्ट्रीय सीमा रेखा भी न हो। उनका यह सोचना अति आदर्शवादी कहा जा सकता है, लेकिन सभी उच्चतर मानवीय मेधाओं ने सदैव ऐसी ही कल्पना की है। भारत का यह प्रसिद्ध वाक्य तो सबको पता ही है कि -सीमाएं छोटे लोगों की सोच का हिस्सा होती हैं। यह मेरा है, वह तेरा है, यह अल्पबुद्धि वालों की या संकीर्ण चित्तवालों की सोच है। उदार चरित वाले लोगों के लिए तो यह संपूर्ण संसार ही उसका अपना है, उसका परिवार है (अयं निजः परोवेत्ति गणना लघु चेतसाम्। उदार चरितानाम् तु वसुधैव कुटुम्बकम) । लोसा की सोच भी इससे भिन्न नहीं है। उन्होंने मनुष्यता के इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साहित्य सृजन को अपना साधन बनाया है।
पुरस्कार की घोषणा के बाद अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में पहले तो उन्होंने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि उन्हें यह सम्मान मिला है, फिर छूटते ही उन्होंने कहा कि इससे न उनके जीवन में कोई फर्क पड़ने वाला है, न लेखन में। वह इससे प्रसन्न हैं, लेकिन यह सम्मान उनकी जिंदगी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी लेखक को नोबेल पुरस्कार के बारे में नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि यह उसके लेखन के लिए बुरा है।
लोसा स्पेनिश भाषी दुनिया के सर्वाधिक ख्याति प्राप्त लेखक हैं। कई वर्षों से उनका नाम नोबेल पुरस्कारों की चर्चा में रहा है, लेकिन अनेक राजनीतिक कारणों से वह उपर नीचे होता रहा। दक्षिण् अमेरिका की बौद्धिक विचारधारा ज्यादातर वामपंथी हैं। इस महाद्वीप के पिछले नोबेल पुरस्कार विजेता $कोलंबिया$ गैबरील गार्सिया मार्खेज (1982) वामपंथी बुद्धिजीवियों में अत्यधिक लोकप्रिय है। लोसा कभी उनके घनिष्ठ मित्रों में थ्े, लेकिन लोसा की राजनीतिक विचारधारा बदली तो दोनों विपरीत ध्रुवों की तरह दूर हो गये और 1976 की एक घटना तो अब तक लोग याद करते हैं, जब मेक्सिको शहर के एक सभागार में लोसा ने मार्खेज के मुह पर मुक्का जड़ दिया था और एक फोटोग्राफर ने इस घटना को न केवल दुनियाभर में फैला दिया, बल्कि उस क्षण को अमिट कर दिया। आज तक यह ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया था कि लोसा की यह प्रतिक्रिया राजनीतिक कारणों से थी या पारिवारिक।
उनके कुछ मित्रों के अनुसार लोसा की उनकी पत्नी से अनबन चल रही थी। मार्खेज ने उनकी पत्नी को सांत्वना देने के लिए उनका पक्ष लिया था, जिस पर लोसा गुस्से में थे और मेक्सिको में उस समय जब मार्खेज उन्हें गले लगाने के लिए आगे बढ़े, तो उन्होंने मुक्का जड़ दिया। जबकि दूसरे कुछ लोगों के अनुसार इस हमले का कारण् राजनीतिक था। मुक्का चलाते समय लोसा ने मार्खेज जो कास्त्रो का चमचा कहा था। कास्त्रो क्यूबा की वामपंथी क्रांति के प्रणेता व वहां के राष्ट्रपति थे। कास्त्रो अभी भी दुनिया में वामपंथी विचारधारा के प्रतीक पुरुष माने जाते हैं, जबकि अब उनकी भी विचारधारा बदल चुकी है और जबसे उन्होंने अपने भाई को क्यूबा की सत्ता सौंपी है, तबसे वह पूंजीवादी सुधारवाद के समर्थक बन गये हैं।
खैर, यह सब आज उनके नोबेल सम्मान के संदर्भ में प्रासंगिक नहीं है, फिर भी नोबेल पुरस्कार चयन समिति की दृष्टि उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की तरफ न रही हो, यह नहीं माना जा सकता। पिछले तमाम वर्षों के साहित्य के नोबेल पुरस्कार रचनाकारों की राजनीतिक विचारधारा को केंद्र में रखकर दिये गये हैं। कारण जो हों, लेकिन राजनीति के परे विशुद्ध साहित्यिक मूल्यों या कला को केंद्र में रखकर इधर शायद ही कोई पुरस्कार दिया गया हो। नोबेल के साहित्य व शांति के पुरस्कार इसीलिए विवाद के विषय भी बनते रहे हैं कि उनके चयन में राजनीतिक दृष्टि की प्रधानता रहती आयी है।
सामान्यतया यह माना जाता है कि साहित्य व शांति के नोबेल पुरस्कार पश्चिमी विचारधारा के प्रचार व पुष्टि के लिए दिये जाते रहे हैं। बीच-बीच में आने वाले अपवादों को छोड़ दें तो यह बहुत कुछ सच भी प्रतीत होता है। इस बार के पुरस्कारों पर ही ध्यान दें, तो यह बात बहुत मुखर है कि पुरस्कार के लिए पात्रों का चयन पश्चिमी लोकतंत्र, स्वतंत्रता तथा मानवाधिकार के मूल्यों के समर्थन में दिये गये हैं। लोसा पहले भले ही मार्क्सवादी रहे हों, लेकिन इस समय वह लोकतंत्र, खुले बाजारवाद तथा अंतर्राष्ट्रीयतावाद के समर्थक हैं। शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चीन के उस विद्रोही नेता को चुना गया है, जो चीनी अधिनायकवादी एकदलीय शासन के विरोध में विद्रोह का झंडा उठाए हुए हैं। मानवाधिकार, स्वतंत्रता, लोकतंत्र आदि निश्चय ही मनुष्यता के उच्चतम मूल्य हैं, जिनकी रक्षा तथा प्रसार का यत्न हर स्तर पर किया जाना चाहिए, लेकिन कई पश्चिमी देश इनका इस्तेमाल राजनीतिक अस्त्र के रूप में भी करते हैैं। चीनी शासन इसीलिए बौखलाया हुआ है, क्योंकि 54 वर्षीय लियू जियाबो को शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित करने के निर्णय को वह अनेक देश की राजनीतिक व्यवस्था में हस्तक्षेप मानता है।
लियू जियाबो को शांति का नोबेल पुरस्कार दिये जाने पर चीन का सवाल है कि एक विद्रोही को शांति का पुरस्कार दिये जाने का क्या औचित्य है, इसका जवाब नोबेल चयन समिति ने जियाबो के प्रशस्ति पत्र में पहले से शामिल कर रखा है। उसका कहना है कि मानवाधिकार व शांति का बहुत ही गहरा संबंध है। नार्वेजियन नोबेल कमेटी का यह अत्यंत दीर्घकालिक विश्वास है कि मानवाधिकारों की रक्षा से ही विश्व शांति सुनिश्चित की जा सकती है। इन पुरस्कारों के संस्थापक अल्फेर्ड नोबेल का भी यह विश्वास था कि राष्ट्रों के बीच भ्रातृत्व की यह पूर्व र्श्त है कि वे मानवाधिकारों का समान तथा उनकी सुरक्षा करें। यह सही भी है कि जहां मानवाधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे, वहां स्थाई शांति कभी कायम नहीं हो सकती। इस तरह का सवाल पिछले वर्ष उस समय भी उठा था, जब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को नोबेल के शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। कहा गया थ कि जो देश अभी भी दो देशों- इराक और अफगानिस्तान- में हिंसक युद्ध चला रहा है, उसके राष्ट्रपति को शांति का पुरस्कार कैसे दिया जा सकता है। उस समय भी यही तर्क दिया गया था कि बराक ओबामा इराक में शांति स्थापित करने के लिए वहां से अमेरिकी सेना की वापसी कर रहे हैं और अफगानिस्तान में चल रहे आतंकवाद के खिलाफ युद्ध वस्तुतः शांति के लिए लड़ा जा रहा युद्ध ही है।
लियू जियाबो थियानमेन चौक के उस छात्र विद्रोह में भी शामिल थे, जिसे चीनी शासन ने निर्दयता से रौंद दिया था। वह तबसे कई बार जेल में रहे, लेकिन उन्होंने अपना मानवाधिकारवादी आंदोलन छोड़ना स्वीकार नहीं किया। 2008 में उन्होंने लोकतंत्रवादी शक्तियों के लिए एक -नागरिक घोषणा पत्र- का निर्माण किया। 'नागरिक घोषणा पत्र-2008' शीर्षक के इस दस्तावेज के प्रकाशन के बाद दिसंबर 2008 में लियू को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया। उनके खिलाफ चीनी कानूनों के उल्लंघन का क्या-क्या आरोप लगाया गया, इसकी कोई खुली जानकारी दुनिया को नहीं है, लेकिन यह पता है कि तथाकथित न्यायालय ने उन्हें यह घोषणा पत्र तैयार करने के लिए 11 वर्ष के कैद की सजा सुना दी।
अभी ताजा खबर है कि चीनी पुलिस ने बीजिंग में रह रही उनकी पत्नी लियू जिया को भ्ी उनके घर से हटा दिया है। उनके पति को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, यह खबर जब उन्हें दी गयी, तो उन्होंने फोन पर बताया कि चीनी पुलिस उनके घर के चारों तरफ लगी हुई है। हो सकता है उन्हें भी उनके पति के पास भेजने की तैयारी हो। वैसे अभी तो ठीक-ठीक यह भी नहीं कहा जा सकता कि जियाबो को यह जानकारी भी है या नहीं कि उनके नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
खैर, जो भी हो, इस बार इन दोनों ही पुरस्कारों के चयन के लिए नोबेल चयन समिति की सराहना की जानी चाहिए। इसमें पश्चिम की राजनीति भी हो तो कोई हर्ज नहीं। स्वतंत्रता, लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपनी कलम चलाने या अपना जीवन दांव पर लगाने वालों का सम्मान होना चाहिए। चीन आज आर्थिक व सैनिक विकास के क्षेत्र में कितना भी आगे क्यों न बढ़ गया हो, लेकिन मानवीय स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र का तो उसने गला ही घोंट रखा है। एकदलीय अधिनायकवाद आज भले ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति हो, लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है, जो आज नहीं तो कल उसे पतन की ओर अवश्य ले जाएगी।
 
10-10-2010

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

अयोध्या-3



अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का न्यायिक फैसला गत 30 सितंबर को आ गया। निश्चय ही यह प्रसन्नता की बात है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की त्रिसदस्यीय न्यायपीठ ने एक स्वर से विवादित स्थल को राम जन्मभूमि माना है और उस पर अधिकार जताने वाले सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया है। लेकिन तीन में से दो न्यायाधीशों ने शायद सभी पक्षों को संतुष्ट करने के लिहाज से विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटकर एक हिस्सा रामलला को, एक निर्र्मोही अखाड़े को और एक सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने के लिए कहा है। जमीन का यह फैसला नितांत अनौचित्यपूर्ण है। कम से कम सुन्नी वक्फ बोर्ड का तो उस जमीन में किसी तरह कोई हक नहीं बनता। निर्मोही अखाड़ा और रामलला का दावा भी अलग करने का कोई औचित्य नहीं है। इसे निश्चय ही सुधारने की जरूरत है। या तो संबंधित पार्टियां स्वयं यह कार्य कर लें या सर्वोच्च न्यायालय की मदद हासिल करें।






अयोध्या विवाद का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया है। फैसले के बाद हिंसा व अशांति की जो आशंका थी, वह भी टल गयी है। प्रायः पूरे देश ने इस अत्यंत संवेदनशील मसले पर असाधारण संयम का परिचय दिया। कुछ छोटे क्षेत्रीय दलों को छोड़कर प्रायः सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने फैसले का स्वागत किया है। यदि कोई सर्वाधिक दुःखी है, तो वे हैं कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी लेखक, पत्रकार व इतिहासकार, क्योंकि न्यायालय का फैसला उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है। उनसे यह बात नहीं निगली जा रही है कि कैसे हाईकोर्ट के तीनों जजों ने एकमत से उस स्थल को राम का जन्मस्थल मान लिया, जहां पर तथाकथित बाबरी मस्जिद खड़ी थी। उन्होंने सारे ऐतिहासिक तथ्यों तथा कानूनी नुक्तों की अनदेखी करके इस तरह का फैसला दे दिया। वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर कह रही हैं कि न्यायालय का फैसला न्यायिक नहीं, राजनीतिक है। न्यायाधीशों ने इतिहास की अनदेखी की है और आस्था का भरोसा किया है। ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ के पूर्व संपादक व जाने माने स्तम्भ लेखक दिलीप पदगांवकर भी इस फैसले से थापर की तरह क्षुब्ध हैं। उनका भी कहना है कि न्यायाधीशों ने तथ्यों की और कानून के प्रावधानों की उपेक्षा की है। इस समुदाय के विद्वानों की नाराजगी सर्वाधिक इस बात को लेकर है कि उन्होंने राम को एक व्यक्ति मान लिया है और उनका जन्मस्थल स्वीकार कर लिया है और उनके नाम जमीन का बंटवारा भी कर दिया है।

राजनीतिक दलों में समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने तो मुस्लिम पक्षकारों से भी आगे बढ़कर अपना शोक व्यक्त किया है। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर अपनी गहरी नाखुशी जाहिर करते हुए कहा है कि इससे देश का मुस्लिम समुदाय सर्वाधिक मायूस है और अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उन्होंने तो पूरे देश व न्यायपालिका को चेतावनी देते हुए कह डाला कि यह फैसला देा के लिए संविधान के लिए और स्वयं न्यायपालिका के लिए अच्छा संकेत नहीं है और आगे चलकर इस निर्णय से काफी गहरे संकट पैदा हो सकते हैं। बिहार के राष्ट्र्ीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव ने व लोकजनशक्ति पार्टी के राम विलास पासवान ने भी मुलायम सिंह के स्वर में स्वर मिलाने की कोशिश की है।

देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने पहले तो इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन अब इनमें से कांग्रेस अपने को काफी असहज महसूस कर रही है। ऐसी अफवाह चल पड़ी है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला कांग्रेस के प्रयासों से ही आ सका है। यदि केंद्र सरकार यानी कांग्रेस पार्टी की तरफ से हरी झंडी न मिलती, तो इस तहर का फैसला नहीं आ सकता था। इस तर्क को प्रस्तुत करने वालों का कहना है कि अयोध्या में विवादित मस्जिद के सामने राम मंदिर का शिलान्यास कराने का काम कांग्रेस ने किया, मस्जिद में लगा ताला खुलवाने का काम कांग्रेस ने किया। दिसंबर 1992 में यदि केंद्र में स्थित पी.वी. नरसिंह राव वाली कांग्रेस सरकार की मदद न मिलती, तो बाबरी मस्जिद कतई नहीं गिरायी जा सकती थी। और अब मंदिर के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला आया है, तो इसके पीछे भी कांग्रेस का हाथ है।

इस तरह की चर्चा से कांग्रेस जन चिंतित हैं। उन्हें बिहार में इससे नुकसान होने की उम्मीद दिखायी दे रही है। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान इसलिए मुस्लिम पक्ष में सर्वाधिक शोकाकुल चेहरा प्रदर्शित कर रहे हैं, जिससे कांग्रेस की तरफ मुड़ते मुस्लिम वोट बैंक को फिर अपनी ओर आकर्षित किया जा सके। कांग्रेस के नीतिकार अब मंदिर मस्जिद मामले में अपने को भाजपा से अलग दिखाने की रणनीति बनाने में लगे हैं। गृहमंत्री पी. चिदंबरम कह रहे हैं कि गत बृहस्पतिवार के उच्च न्यायालय के फैसले से 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद ढहाये जाने का अपराध हल्का नहीं हो जाता। दोनों मामले अलग हैं। मस्जिद को गिराने का काम एक गंभीर अपराध है, जिसकी अलग से सुनवाई हो रही है, जिसमें वह चाहते हैं कि अपराधियों को कठोर सजा मिले। उस मामले को इस फैसले से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। विवादित मंस्जिद मंदिर तोड़कर बनी थी या मंदिर के मलबे पर बनवायी गयी थी, इससे उसे तोड़ने का अपराध हल्का नहीं हो जाता।

कांग्रेस की दिक्कत यह है कि न तो वह इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का विरोध कर सकती है ओर न वह उसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जा सकती है, क्योंकि वह इस मामले में केाई पार्टी नहीं थी और फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अधिकार उसी को है, जो मामले में किसी भी तरह पार्टी हो। इसलिए अब वह फिर अदालत के बाहर किसी समझौते की संभावना तलाश रही है। अदालत के बाहर कोई समझौता हो जाए, इसके लिए तो सभी उत्सुक हैं, लेकिन यह समझौता सभी केवल अपने पक्ष में चाहते हैं। कांग्रेस चाहती है कि कोई ऐसा रास्ता निकल आए, जिससे हिन्दू व मुसलमानों में से कोई नाराज न हो। हिन्दू पक्ष तथा भाजपा के लोग चाहते हैं कि मुस्लिम समुदाय अयोध्या विवाद में अपने अधिकारों का दावा छोड़ दे और मंदिर बनाने में मदद करे। मुस्लिम पक्ष चाहते हैं कि बाबरी मस्जिद स्थल उन्हें मिल जाए, बाकी सारी जमीन जो चाहे ले जाए। जाहिर है कि किसी भी समझौते में ये सारी बातें एक साथ नहीं हो सकतीं। तो मामला सर्वोच्च न्यायालय में अवश्य जाएगा। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय इस पूरे मामले को उलट दे, इसकी संभवना लगभग शून्य है। वह जमीन के बंटवारे के बारे में अपनी कोई अलग राय दे सकता है। लेकिन उससे मुस्लिम पक्ष संतुष्ट हो जाए, यह नहीं हो सकता है। वास्तव में हर पक्ष को संतुष्ट करने का जो फार्मूला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनाया है, उससे बेहतर शायद ही कोई दूसरा फार्मूला निकल सके, लेकिन जो भी पक्ष इतिहास को पूरी तरह नकारने पर आमादा है, वह इससे संतुष्ट नहीं हो सकता।

इसमें दो राय नहीं कि इलाहाबाद कोर्ट की लखनउ बेंच का यह फैसला न्यायिक कम राजनीतिक अधिक है। यदि इसमें राजनीतिक तुष्टीकरण का तत्व भी न समाया होता, तो जमीन के तीन टुकड़े करके तीन पक्षों को देने का फैसला कतई सामने नहीं आता। विवाद का मूल कुछ व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि दो समुदायों के बीच था, जिसमें से कोई एक गलत था। अब न्याय का असली तकाजा तो यही था कि जिस पक्ष का दावा भी न्यायसंगत ठहरता, उसके पक्ष में फैसला दे दिया जाता। लेकिन इस ‘टाइटिल सूट’ में तीन व्यक्तियों या संस्थाओं के पक्ष में फैसला देकर तीनों को जमीन का एक-एक टुकड़ा देने की बात की गयी है।

यह शायद भारतीय न्यायिक इतिहास का पहला अवसर है, जब सुनवाई कर रही पीठ के तीनों न्यायाधीशों ने अपना फैसला अलग-अलग पढ़ा। तीनों जजों द्वारा दिया गया कुल फैसला 8189 पृष्ठों का है। इसमें सबसे बड़ा 5238 पृष्ठ का फैसला न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल का है। दूसरे न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा ने अपना फैसला 2666 पृष्ठों में दिया है। सबसे छोटा फैसला न्यायमूर्ति सिबगत उल्ला खान का है, जो 285 पृष्ठों का है। तीनों ने अपने-अपने फैसले का सारांश पढ़कर सुनाया।

इनमें से दो टूक और स्पष्ट फैसला धर्मवीर शर्मा का था। उन्होंने पुरातात्विक तत्व तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर माना कि विवादित स्थल पर पहले मंदिर था, जिसे तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया गया। मस्जिद का यह निर्माण भी इस्लामी नियमों के विरुद्ध किया गया। इसलिए यह निर्माण भी अवैध था। उन्होंने स्पष्ट रूप से इस स्थल को भगवान राम के जन्मस्थल या उस पर बने मंदिर का स्थल माना, इसलिए पूरी विवादित जमीन को हिन्दुओं के पक्ष में देने का फैसला दिया। उन्होंने सुन्नी वक्फ बोर्ड तथा निर्मोही अखाड़े के किसी दावे को स्वीकार नहीं किया।

न्यायमूर्ति अग्रवाल ने अपने फैसले में यह तो माना कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को गिराकर हुआ, लेकिन उनकी नजर में इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मस्दिज बाबर के समय में या उसके आदेश से बनी। उन्होंने मूल स्थान को राम का जन्मस्थान माना, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि मुस्लिम भी इस स्थल का प्रार्थना के लिए उपयोग करते थे, इसलिए उन्हें भी यहां कुछ अधिकार मिलना चाहिए। न्यायमूर्ति अग्रवाल ने भी पुरातात्विक प्रमाणों को काफी महत्वपूर्ण माना हेै।

न्यायमूर्ति सिबगत उल्ला खान अपने संक्षिप्त फैसले में न्यायाधीश कम इस्लाम के प्रवक्ता के रूप में अधिक नजर आए। वह इस पुरातात्विक प्रमाण को तो नकार नहीं सके कि मस्जिद के ढांचे के नीचे एक मंदिर का अवशेष मौजूद था, लेकिन उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि इस मस्जिद का निर्माण मंदिर को गिराकर नहीं लेकिन उसके मलबे के उपर किया गया। तीनों न्यायाधीशों के फैसले में इस एक बात पर पूर्ण सहमति थी कि मस्जिद के मध्यवर्ती गुम्बद के स्थान पर जहां इस समय रामलला की मूर्ति विराजमान है, वहां पर पहले मंदिर था और हिन्दुओं का लोकविश्वास उस स्थल को राम जन्मभूमि मानता है, इसलिए वह स्थान रामलला के लिए निश्चित कर दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर यह फैसला दिया गया कि रामलला की मूर्ति जहां स्थापित है, वहां बनी रहेगी। उसे हटाया नहीं जाएगा और भूमि का वह हिस्सा रामलला को दिया जाएगा। यहां यह बात अवश्य उल्लेखनीय है कि तीनों ही न्यायाधीशों ने राम जन्म स्थल के रूप में उस भूमि की पहचान के लिए जन विश्वास को ही सर्वोपरि स्थान दिया, जबकि फैसला विश्वास की बात को बिना बीच में लाए भी मात्र पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर किया जा सकता था।

इन तीनों जजों की टिप्पणियों में सर्वाधिक रोचक टिप्पणियां खान की हैं। उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए किसी प्रचारक की शैली में कहा कि इस राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद फैसले ने भारतीय मुसलमानों को इस्लाम की शिक्षाओं को पूरी दुनिया में प्रसारित करने का एक सर्वोत्तम अवसर दिया है। मुस्लिम इस धरती के शासक रहे हैं, शासित रहे हैं और इस समय सत्ता में भागीदारी रखते हैं। भारतीय मुस्लिम यहां बहुमत में नहीं है, लेकिन वे इतने कम भी नहीं है कि उपेक्षणीय अल्पसंख्यक गिने जाएं। अन्य देशों में मुसलमान या तो भारी बहुमत में हैं, जिससे ऐसी समस्याओं से न पर कोई फर्क नहीं पड़ता या वे इतनी कम संख्या में हैं कि वे कुछ कर नहीं सकते। दुनिया की नजर इसय मुसलमानों पर हैं और वे इस्लाम की शिक्षाओं को मुसलमानों के आचरण के नजरिये से देखना व समझना चाहते हैं यानि मुसलमान दूसरे समुदायों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं, इससे वे इस्लाम के चरित्र को जानना चाहते हैं। भारतीय मुसलमानों के पास धार्मिक शिक्षा व ज्ञान की सुदीर्घ परंपरा है, इसलिए वे दुनिया को इसकी वास्तविक स्थिति बताने की सर्वोत्तम अवस्था में हैं। वे इसकी भूमिका सामने उपस्थित इस मसले से शुरू कर सकते हैं। यह तो उनका मुसलमानों को उपदेश था, लेकिन साथ ही उनकी पूरे देश के लिए यह चेतावनी भी थी कि ऐसा कुछ -6 दिसंबर जैसी घटना- दुबारा नहीं होना चाहिए। हम सबको यह समझ लेना चाहिए कि ऐसा कुछ यदि दुबारा हुआ, तो देश फिर उससे उबर नहीं पाएगा। 1992 के मुकाबले आज दुनिया की गति कहीं अधिक तीव्र है। हम उसमें कुचल जाएंगे -वी मे बी क्रश्ड-। न्यायमूर्ति खान का स्पष्ट कहना था कि उन्होंने इस मसले के इतिहास और पुरातत्व की गहरायी में जाने की कोशिश नहीं की। इसके उन्होंने चार कारण बताए। एक तो यह कि इस ‘सूट’ पर फैसले के लिए इसके भीतर जाने की जरूरत ही नहीं थी। दूसरे मुझे यह भरोसा नहीं था कि यदि इसके भीतर प्रवेश की कठिन प्रक्र्रिया से गुजरें भी तों हमें कोई खजाना मिलेगा या किसी शैतान से भेंट होगी -मतलब सच्चाई हाथ लगेगी या और भ्रम से सामाना होगा-। तीसरे मैं इतिहास का ज्ञानी होने का दावा नहीं कर सकता, इसलिए मैं नहीं चाहता था कि इतिहास की मैं कोई ऐसी बात करूं कि विद्वान इतिहासज्ञों की आलोचना का सामना करना पड़े। और चैथी बात के रूप में उन्होंने ‘कर्नाटक वक्फ बोर्ड बनाम भारत सरकार’ मामले में की गयी टिप्पणी को उद्धृत किया कि ‘जहां तक दीवानी मामले में किसी ‘सिविल सूट’ का वास्ता है, तो उसमें ऐतिहासिक तथ्योंे तथा दावों के लिए कोई स्थान नहीं है।’

न्यायमूर्ति खान ने इकबाल की इन पंक्तियों को भी उद्धृत किया कि ‘वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है, तेरी बरबादियों के मशवरे हैं आसमानों में, न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों, तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में’ उन्होंने इस धर्मिक मामले में भी डार्विन को उद्धृत किया कि वही जातियां जीवित रह पाती हैं, जो त्वरित प्रतिक्रिया सक्षम होती हैं और सहयोग करती हैं।

यद्यपि उन्होंने मुसलमानों को अच्छी नसीहत दी, लेकिन इतिहास पुरातत्व में प्रवेश न करने का बहाना उन्होंने केवल इसलिए ढूंढ़ा कि उन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की उत्खनन रिपोर्टों के प्रमाणों को न स्वीकार करना पड़े, जबकि मंदिर-मस्जिद के इस विवाद में फैसले का मुख्य आधार ही वह पुरातात्विक प्रमाण था। जब विवाद का मूल मुद्दा ही यही हो कि मस्जिद का निर्माण कैसे हुआ। क्या वह किसी मंदिर को तोड़कर बनायी गयी या किसी खाली जगह पर धार्मिक भावना से तैयार की गयी। ऐसे में पुरातात्विक उत्खनन व इतिहास की किताबों की उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। अब यदि उन्हें इतिहास व पुरातत्व का कोई बोध नहीं था, तो उन्होंने किस आधार पर यह कहा कि मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर नहीं किया गया, बल्कि मंदिर के मलबे पर उसे बनवाया गया। इसके बारे में उन्होंने अपने फैसले में कुछ नहीं लिखा कि उन्हें कैसे पता चला कि मस्जिद बनवाने वाले ने ही मंदिर का ध्वंस नहीं किया था।

खैर, यह तो रही फैसलों की बात। तीन में से दो जजों ने माना कि प्राचीन राममंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद का निर्माण किया गया। इस संदर्भ में केवल खान की राय अलग है। लेकिन तीनों ही जज इस मामले में एकमत हैं कि मस्जिद के मध्य गुम्बद का स्थल ही राम का जन्मस्थल है, जिसे राम के हवाले कर दिया जाना चाहिए। शर्मा को छोड़कर बाकी दो जजों ने ही विवादग्रस्त भूमि को तीन हिस्सों में बांटने की बात की है। एक हिस्सा रामलला को, दूसरा निर्मोही अखाड़ा को और तीसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड को। इन दोनों जजों के ये दो फैसले शायद सभी पक्षों को किसी तरह संतुष्ट करने के उद्देश्य से दिये गये हैं। क्योंकि जब सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा 1 के मुकाबले 2 के बहुमत से खारिज कर दिया गया, तो उसे विवादित जमीन में कोई हिस्सा पाने का हक कहां रह जाता है। इसी तरह निर्मोही अखाड़ा को अलग से कोई जमीन आवंटित करने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि भले ही वह विवादित स्थल पर स्थित राम चबूतरे पर रामलला की सैकड़ों वर्ष से सेवा करता रहा हो, लेकिन वह कार्य व्यापक हिन्दू समुदाय के स्थानीय प्रतिनिधि के रूप में ही कर रहा था। उसके इस सेवाकार्य के पीछे पूरा हिन्दु समुदाय खड़ा था। जमीन का एक हिस्सा राम को, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को यह एक हास्यास्पद निर्णय कहा जाएगा। इसलिए सच कहें तो केवल न्यायमूर्ति शर्मा का निर्णय समग्रता से ग्राह्य और न्यायपूर्ण हैै।

अब एक सवाल यह कि न्यायालय ने उस भगवान राम को एक व्यक्ति मान लिया और उनका जन्मस्थल भी स्वीकार कर लिया, जो घट-घट व्यापी हैं, निराकार हैं व परमात्मा हैं। अब इस तरह का सवाल उठाने वालों को क्या कहा जाए, जो अपने को ज्ञानी और आधुनिक चेतना का संवाहक भी मानते हैं। राम इस देश के इतिहास पुरुष हैं या परमात्मा हैं, यह अलग चर्चा का विषय है, लेकिन यह एक सर्वस्वीकार्य तथ्य है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर राम का एक प्रतीक स्थल था। उसके प्रति अगाध श्रद्धा ने ही बाबर या उसके सिपहसालार को उसे तोड़ने और उस जगह मस्जिद बनवाने के लिए प्रेरित किया।

इसके अलावा यदि उच्च न्यायालय के इन तीन न्यायाधीशों ने राम को एक व्यक्ति माना, तो यह उनका नहीं इस देश में स्थापित उस कानून का दोष है, जो किसी मंदिर में स्थापित प्रतिमा को एक व्यक्ति होने का अधिकार देती है और उसे तमाम संपत्तियों का मालिक भी घोषित करती है, कम से कम पदगांवकर जैसे व्यक्ति को तो यह तथ्य पता होना ही चाहिए। अदालत में एक मुकदमा रामलला की तरफ से देवकीनंदन अग्रवाल ने दायर किया था और अपने को उनका मित्र बताया था। यदि राम की प्रतिमा को कानूनी व्यक्तित्व का अधिकार न प्राप्त होता, तो वह मुकदमा ही स्वीकृत न होता। निश्चय ही यह नितांत हास्यास्पद कानून है, जो मंदिर में स्थापित प्रतिमा को एक नागरिक के अधिकार प्रदान करती है, लेकिन जब तक वह कानून है, तब तक उसके अंतर्गत फैसले होंगे ही।

बेहतर तो यह होता कि न्यायालय केवल यह फैसला करता कि विवादित स्थल का वैध मालिक कौन है मंदिर समर्थक हिन्दू या मस्जिद समर्थक मुस्लिम। उसके बाद सरकार को कहता कि वह पूरी जमीन को अपने अधिकार में लेकर फिर संबंधित समुदाय के उचित प्रतिनिधि व्यक्ति या संस्था को उसे सौंप दे। वहां मंदिर का निर्माण हो या कुछ और यह निर्णय वह प्रतिनिधि संस्था करे।

खैर, अब जो हो चुका है, वह हो चुका है, लेकिन विवादित जमीन के बंटवारे का मसला अभी भी अटका है। जमीन का यह बंटवारा नितांत अनौचित्यपूर्ण है। रामजन्मभूमि जैसे स्थल पर मंदिर निर्माण के लिए विशाल भूमिखंड चाहिए। अब इस विवाद के निपटाने के दो ही रास्ते हैं कि या तो निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्ष दोनों ही अपने हिस्से का त्याग करें और उसे रामलला को सौंप दें। या फिर इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाए। अभी तक कि खबरों के अनुसार सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा दोनों सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी में हैं, लेकिन यदि न्यायमूर्ति सिबगत उल्ला खान के उपदेशों की भावना को सभी पक्ष स्वीकार करें, तो इन दोनों ही पक्षों को जमीन का अपना अंश रामलला को सौंपकर केंद्र सरकार से आग्रह करना चाहिए कि वह वहां भव्य राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में आगे की कार्रवाई करे। (3-10-2010)

अयोध्या-2

यह भारत क़ि अस्मिता का प्रश्न है 


राम जन्मभूमि का विवाद न तो जमीन के टुकड़े का विवाद है न एक मंदिर नाम के किसी बिल्डिंग के निर्माण का। यह भारत की संपूर्ण सांस्कृतिक आस्था के सीने पर खाई हुई ऐतिहासिक चोट का विवाद है। एक ऐसी चोट, जिसका घाव अब तक भरा नहीं है और रिस रहा है। एक ऐसी चोट जिसे सबसे पहले पहुंचाने वाला व्यक्ति भले ही सैकड़ों वर्ष पहले के इतिहास में दफन हो चुका हो, किंतु जिसकी वह मानसिकता आज भी देश की सांस्कृतिक अस्मिता को मंुह चिढ़ाती हुई अपनी पूरी ताकत के साथ विद्यमान है। यह अक्सर कहा जाता है कि चार-पांच सौ साल पुराने मंदिर-मस्जिद के मसले को आज उठाने की क्या जरूरत है। उसे भूल जाना चाहिए। बात सही है। इसे भूला जा सकता था, लेकिन यदि वह मानसिकता जिसने करीब पांच सौ वर्ष पूर्व एक मंदिर को तोड़कर उस पर मस्जिद तामीर करायी थी, वही एक सामाजिक और राजनीतिक चुनौती के रूप में आज भी जीवित हो तो क्या किया जाए।


     कहा जाता है कि टाइटिल सूट या किसी संपत्ति पर मालिकाना हक के विवाद में अधिक समय लग ही जाता है, लेकिन अयोध्या का विवाद किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच के किसी जमीन-जायदाद के हक का मामला नहीं है। तकनीकी तौर पर या कानून की धाराओं के अनुसार यह भले जमीन के एक टुकड़े का विवाद हो कि उसका वास्तविक मालिक कौन है, लेकिन यथार्थ में यह वैसा नहीं है। जमीन-जायदाद के झगड़े में उस जमीन का बंटवारा किया जा सकात है या उससे दोनों पक्षों को बेदखल करके उसे सरकार के हवाले किया जा सकता है, इत्यादि।

इस विवाद को उसके सही परिप्रेक्ष्य में ठीक से न समझने वाले लोग आये दिन तरह-तरह की सलाहें देते रहते हैं। अरे एक जमीन के टुकड़े के लिए इतनी बड़ी लड़ाई क्यों। अपने परिवार की कलाह टालने के लिए भगवान राम ने तो पूरा अयोध्या का राज्य त्याग दिया था, फिर एक पूरे देश को धार्मिक कलक से मुक्त करने के लिए हिन्दू उस राम जन्मभूमि के छोटे से टुकड़े का परित्याग क्यों नहीं कर सकते। इसके जवाब में तर्क आता है कि ऐसी सलाह आखिर मुस्लिम पक्ष को क्यों नहीं दी जाती। कुछ लोग सलाह देते हैं कि हिन्दुओं को मंदिर ही बनवाना है, तो वहां से कुछ दूर हटकर क्यों नहीं बनवा लेते। जो जमीन विवादग्रस्त है, उसे यों ही खाली छोड़ दें, बगल में मंदिर बनवा लें। कुछ लोग इससे भी आगे जाकर तर्क देते हैं कि आखिर इसका क्या प्रमाण है कि भगवान राम वहीं पैदा हुए थे और राम की असली जन्मभूमि वही है, जहां पर तथाकथित बाबरी मस्जिद खड़ी थी। कुछ और बुद्धिमानों का कहना है कि मस्जिद की जगह पर पहले मंदिर होने की कहानी अंग्रजों के शासनकाल में गढ़ी गयी। उसके पहले मंदिर मस्जिद का कहीं कोई विवाद था ही नहीं। राम भक्त संत तुलसीदास ने अयोध्या में बैठकर अपनी रामायण -रामचरित मानस- लिखी, लेकिन उन्होंने बाबर द्वारा मंदिर तुड़वाकर मस्जिद बनवाने का कोई जिक्र नहीं किया। यदि अयोध्या में ऐसा पहले कुछ हुआ होता, तो तुलसी उसका अवश्य जिक्र करते। अब यदि तुलसी के साहित्य में बाबर द्वारा मंदिर तोड़वाकर मस्जिद बनाने का कोई जिक्र नहीं है, तो इसका मतलब है कि अयोध्या में किसी राम जन्मभूमि मंदिर होने और उसे तोड़कर मस्जिद बनवाने की सारी कहानी झूठी है।

अब ऐसे विद्वानों को भला कोई क्या जवाब दे सकता है, जो केवल अपने बुद्धिबल से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर लोगों को गुमराह करना चाहते हैं या अपना राजनीतिक पक्ष मजबूत करना चाहते हैं। राम जन्मभूमि का विवाद न तो जमीन के टुकड़े का विवाद है न एक मंदिर नाम के किसी बिल्डिंग के निर्माण का। यह भारत की संपूर्ण सांस्कृतिक आस्था के सीने पर खाई हुई ऐतिहासिक चोट का विवाद है। एक ऐसी चोट, जिसका घाव अब तक भरा नहीं है और रिस रहा है। एक ऐसी चोट जिसे सबसे पहले पहुंचाने वाला व्यक्ति भले ही सैकड़ों वर्ष पहले के इतिहास में दफन हो चुका हो, किंतु जिसकी वह मानसिकता आज भी देश की सांस्कृतिक अस्मिता को मंुह चिढ़ाती हुई अपनी पूरी ताकत के साथ विद्यमान है। यह अक्सर कहा जाता है कि चार-पांच सौ साल पुराने मंदिर-मस्जिद के मसले को आज उठाने की क्या जरूरत है। उसे भूल जाना चाहिए। बात सही है। इसे भूला जा सकता था, लेकिन यदि वह मानसिकता जिसने करीब पांच सौ वर्ष पूर्व एक मंदिर को तोड़कर उस पर मस्जिद तामीर करायी थी, वही एक सामाजिक और राजनीतिक चुनौती के रूप में आज भी जीवित हो तो क्या किया जाए। उसी मानसिकता ने देश का विभाजन कराया, जिसने अयोध्या, मथुरा व काशी स्थित भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों को रौंद कर इस देश की अस्मिता को कुचला था। और आज भी वह एक चुनौती के रूप में देश में विद्यमान है, तो भला इस देश की हजारों साल की सांस्कृतिक परंपरा से अपने को जोड़ने वाला हिन्दू कैसे उस अपमान को भूल सकता है। अदालत फैसला करे या न करे, लेकिन सांस्कृतिक अस्मिता का यह संघर्ष तो तब तक जारी रहेगा, जब तक कि कम से कम उसे कुचलने वाला पांव तो वहां से हट नहीं जाता। 6 दिसंबर को अयोध्या स्थित तथाकथित बाबरी ढांचे का ध्वंस कोई बदले की कार्रवाई नहीं थी। वह तो भारतीय संस्कृति पुरुष के सीने में गड़ी एक विदेशी आक्रांता की बर्छी को केवल निकाल फेंकने का काम था।

जो लोग यह सवाल उठाते हैं कि इसका क्या प्रमाण है कि भगवान राम वहीं पैदा हुए थे, लेकिन वे तो यह भी सवाल उठाते हैं कि इसका क्या प्रमाण है कि राम कभी पैदा भी हुए थे, या इसका ही क्या प्रमाण है कि यह वही अयोध्या है, जहां राम पैदा हुए थे। वास्तव में ये सवाल व्यर्थ के हैं। मुद्दा यह नहीं है कि राम पैदा हुए या नहीं हुए अथवा कहां पैदा हुए या कब पैदा हुए। सवाल केवल यह है कि अयोध्या में एक राम का (विष्णु हरि का या शारंगिन विष्णु का, क्योंकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है या विष्णु का वह रूप बताया जाता है, जो धनुषधारी था) मंदिर था, जिसे बाबर के समय में स्वयं उसके द्वारा या उसके आदेश पर किसी और के द्वारा तोड़ा गया और वहां मस्जिद का निर्माण कराया गया। इसे प्रमाणित करने के लिए न साहित्यिक साक्ष्यों की कमी है, न पुरातात्विक। स्वयं मुस्लिम लेखकों की अनेक किताबों में इसका गर्वपूर्वक जिक्र किया गया है कि बाबर ने अयोध्या स्थित राम मंदिर को तोड़कर वहां एक मस्जिद बनवायी। पुरातात्विक उत्खननों से भी यह प्रमाणित हो चुका है कि विवादित मस्जिद के ढांचे के नीचे एक और भवन के फर्श का अस्तित्व विद्यमान है, जिस पर कभी मंदिर रहा होगा।

कुछ लोग (जिनमें कुछ मुस्लिम विद्वान व कुछ वामपंथी इतिहासकार भी शामिल हैं) कहते हैं कि बाबर तो कभी अयोध्या आया ही नहीं, फिर वह कोई मंदिर तोड़कर मस्जिद कैसे बनवाने लगा। तो यह बात मुस्लिम पक्ष को समझायी जानी चाहिए, जो इसे बाबर की बनवायी मस्जिद बताकर उसे एक विशेष ऐतिहासिक महत्व प्रदान करता है। हिन्दू का पक्ष तो केवल इतना है कि उसके मंदिर को तोड़कर उसे सांस्कृतिक रूप से पददलित करने के लिए उसी स्थान पर मस्जिद बनवायी गयी। उसे तो वह स्थान वापस चाहिए। उसके लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उसे किसने तोड़वाया और फिर उस पर मस्जिद किसने बनवायी। लेकिन सारी परंपराएं, सारी किंवदंतियां, सारे साहित्य इसका श्रेय बाबर को देते हैं, तो उस पर और आगे बहस की कोई जरूरत नहीं रह जाती। हां, इसके बाद यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि बाबर ने अयोध्या में ही मस्जिद क्यों बनवायी। अयोध्या उसके लिए इतनी महत्पूर्ण जगह क्यों हो गयी। बाबर का भारत में कार्यकाल केवल चार वर्षों का था। उसने दिल्ली विजय करके लोदी वंश का अंत किया था और अपना शासन स्थापित किया था। तो उसे यदि अपनी आस्थावश किसी मस्जिद का निर्माण करना होता, तो वह दिल्ली में कहीं यह निर्माण कार्य करवाता। अयोध्या में राम पैदा हुए रहे हो या न हुए रहे हों, लेकिन अयोध्या की पहचान राम से जुड़ी थी। स्कंदगुप्त विक्रमादित्य ने इस उजड़ी अयोध्या का उद्धार कराया था। फिर यहां आकर मस्जिद बनवाने का अर्थ क्या था? उसके आदेश से यदि उसके सेनापति मीर बांकी ने ही यहां एक अनगढ़ सी मस्जिद खड़ी की तो उसका उद्देश्य क्या था। फिर क्यों उस मस्जिद के ढांचे में टूटे मंदिर के स्तंभों को यत्र-तत्र और मुख्य द्वार पर लगाया गया। इस सब पर आखिर सेकुलर इतिहासकार और राजनेता कोई विचार क्यों नहीं करते। फिर इस संदर्भ में संत तुलसी को घसीटना और हास्यास्पद लगता है। तुलसी किसी हिन्दू संगठन के नेता नहीं थे और न वह समकालीन अयोध्या का कोई इतिहास लिख रहे थे। और यदि अयोध्या के संदर्भ में उनकी पीड़ का अनुमान लगाना चाहते हो, तो वे लोग यह क्यों नहीं देखते कि तुलसी अपनी समकालीन काशी और चित्रकूट का वर्णन तो करते हैं, लेकिन समकालीन अयोध्या के बारे में कहीं एक शब्द नहीं लिखते। कोई यह सवाल क्यों नहीं उठाता कि राम का परम भक्त और सरयू के उपासक तुलसी ने अपने निवास के लिए काशी को क्यों चुना, उन्होंने अयोध्या को अपना निवास स्थल क्यों नहीं बनाया। अगर थोड़ा भी इस पर विचार करें, तो कारण स्पष्ट हो जाएगा। काशी में कम से कम उनके समय तक किसी मंदिर का ध्वंस नहीं हुआ था। ज्ञानवापी में भगवान विश्वनाथ शिव का मंदिर शान से खड़ा था। अयोध्या उस समय दिल्ली के मुस्लिम साम्राज्य की सूबाई राजधानी थी, जहां उस समय कोई एक भी मंदिर समूचा नहीं बचा था। तुलसी ने अयोध्या के किसी मंदिर में नहीं एक चबूतरे पर बैठकर अपनी रामकथा लिखानी शुरू की थी। उसे पूरा भी उन्होंने वहीं किया, इसका कुछ पता नहीं। शायद उसे पूर्ण करने का काम बनारस पहुंचकर किया हो। और मान लें अयोध्या में पूरा किया भी हो, तो अपना सारा कागज-पत्तर समेटकर उसे ग्रंथ रूप में प्रकाश में लाने का काम निश्चय ही वाराणसी में ही किया होगा। तुलसी किसी पंथ या मजहब के अनुयायी नहीं थे। वह मनुष्यता के व धर्म -न्याय- के उपासक थे। इसलिए बाबरी मस्जिद के प्रमाण के लिए उन्हें या उनके साहित्य को घसीटना नितांत अनुचित है।

खैर, अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस विवाद को उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट से लेकर अपने हाथ में संभाल लिया है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वह न्याय ही करेगा। इस मामले में सर्वाधिक हास्यास्पद बात तो यही है कि इस मामले का फैसला ‘टाइटिल सूट’ के अंतर्गत हो रहा है, जिसमें यह मालिकाना हक तय होना है कि उस जमीन का वास्तविक मालिक या अधिकारी कौन है, जहां पहले एक मस्जिद खड़ी थी और आज एक अस्थाई मंदिर में भगवान राम की मूर्तिपूजा हो रही है।

धरती पर स्थित जमीन का कोई भी टुकड़ा हो, उस पर किसी का मालिकाना हक कभी स्थिर नहीं रहा है। मालिकाना हक तो एक राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था है। जमीनी बंदोबस्त में सरकार के राजस्व खाते मेें जिसका नाम चढ़ जाए, वह जमींदार हो जाएगा और जिसका नाम कट जाए, वह भूमिहीन। इसलिए राम जन्मभूमि मंदिर का विवाद राजस्व कानूनों के तहत नहीं निपट सकता। लेकिन मजबूरी है दोनों पक्षों की कि यदि मामले का हल अदालत से प्राप्त करना है, तो उसे देश की उपलब्ध कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत ही प्राप्त किया जा सकता है।

अयोध्या विवाद का फैसला ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अंतर्गत ही हो सकता है। अभी जिन कानूनों के अंतर्गत सुनवाई हुई है व फैसले की प्रतीक्षा है, उनके अंतर्गत यदि उस जमीन का अधिकार हिन्दुओं को मिल जाता है, तो वह भी संयोगवश मिला न्याय होगा। वह वास्तविक न्याय तो तब कहा जाएगा, जब कोई अदालत यह फैसला दे कि अयोध्या में एक मंदिर को तोड़कर उस पर मस्जिद बनवाना एक मध्यकालीन विजेता की अन्यायपूर्ण कार्रवाई थी, जिसे आज के लोकतांत्रिक भारत की न्यायव्यवस्था रद्द करती है और उस भूमि को ससम्मान हिन्दू समुदाय को वापस करती है। अब इसके बाद यह सवाल पैदा होगा कि यह जमीन किसके हवाले की जाए। उसे सरकार अपने पास रखे, किसी प्रतिनिधि हिन्दू संगठन के हवाले करे या फिर उसे उस निर्मोही अखाड़े को सौंप दिया जाए, जो शताब्दियों तक मस्जिद के प्रांगण में स्थित चबूतरे पर स्थापित राम प्रतिमा की पूजा आराधना तब तक करता रहा, जब तक कि शासन ने पूरे स्थल को अपने कब्जे में लेकर वहां से सभी अन्य पक्षों को बाहर नहीं कर दिया।

इस पूरे मामले को अंततः सर्वोच्च न्यायालय में जाना ही था। यह अभी ही पहुंच गया यह अच्छी बात है। यदि संबंधित पक्ष इसके फैसले के लिए 60 वर्षों तक प्रतीक्षा कर लेंगे। किंतु इस मामले में आर या पार एक बार अंतिम न्यायिक फैसला हो ही जाना चाहिए। जहां तक आपसी सहमति से किसी समझौते की बात है, तो उसके लिए तो अवसर हमेशा खुला हुआ है। न्यायालय के फैसले के पहले ही नहीं, उसके बाद भी आपसी समझौता हो सकता है। लेकिन आपसी समझौते के लिए राजनीति से मुक्त एक संवेदनशीलता की दरकार होती है, जो आज के समाज में बहुत दुर्लभ हो गयी है। जल्दी ही सही या देर से सही, अयोध्या विवाद का अंतिम समाधान आपसी समझदारी से ही निकल सकता है। अदालत अपना फैसला सुना सकती है, समस्या का समाधान नहीं कर सकती। इसलिए अच्छा हो कि अदालत जल्दी से जल्दी अपना काम पूरा कर ले, यानी अपना फैसला दे दे, जिससे कि उसकी रौशनी में दोनों पक्ष आगे बढ़ सकें। हो सकता है उसके बाद किसी तरह की सामुदायिक सद्बुद्धि का विकास हो और यह मसला परस्पर द्वेष के बजाए प्रेम की आधारशिला बन सके। एक बार अधिकार का फैसला हो जाए, फिर हिन्दू समाज को भी वह भूमि किसी सार्वजनिक हित के लिए देने में कोई संकोच नहीं रह जाएगा। यहां अंत में यह फिर दुहरा देना आवश्यक लग रहा है कि मसला न जमीन का है न मंदिर का, वस्तुतः मसला हिन्दुओं की आहत सांस्कृतिक अस्मिता का है, जिसे वह मंदिर के बहाने वापस पाना चाहता है।